आदि पर्व · अध्याय 141
द्रुपद द्वारा द्रोण का तिरस्कार और द्रोण का कुरुओं के पास आगमन
द्रोण पाञ्चाल के राजा बन चुके द्रुपद के पास जाकर उन्हें मित्र कहकर सम्बोधित करते हैं; ऐश्वर्य के मद में भरे द्रुपद उनका तिरस्कार करते हैं और कहते हैं कि मित्रता केवल धन, विद्या और पद में बराबर लोगों के बीच होती है। आहत द्रोण प्रतिशोध की प्रतिज्ञा करके शिष्यों और पुत्र के साथ हस्तिनापुर जाते हैं और वहाँ कृप के घर में छिपकर रहते हैं। जब कुमारों की गेंद और युधिष्ठिर की अँगूठी एक कुएँ में गिर जाती है, तो वे अभिमन्त्रित सींकों की लड़ी से गेंद और बाण से अँगूठी निकाल देते हैं, और कुमारों को भीष्म के पास अपना वर्णन करने भेजते हैं। भीष्म उन्हें पहचानकर उनका स्वागत करते हैं; द्रोण उन्हें द्रुपद के साथ बचपन की मित्रता, उस निर्धनता की कथा जो उन्हें द्रुपद के दरबार तक ले गई, और वहाँ हुए अपमान का वृत्तान्त सुनाते हैं, और भीष्म उन्हें कुरुओं के बीच सम्मानित स्थान देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.141.1)
ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् । अब्रवीत्पार्थिवं राजन्सखायं विद्धि मामिह ॥
tato drupadamāsādya bhāradvājaḥ pratāpavān | abravītpārthivaṃ rājansakhāyaṃ viddhi māmiha
हे राजन्! तब प्रतापी भरद्वाजपुत्र (द्रोण) ने द्रुपद के पास पहुँचकर उस राजा से कहा — "मुझे यहाँ अपना मित्र जानो।"
श्लोक 2 (1.141.2)
इत्येवमुक्तः सख्या स प्रीतिपूर्वं जनेश्वरः । भारद्वाजेन पाञ्चाल्यो नामृष्यत वचोऽस्य तत् ॥
ityevamuktaḥ sakhyā sa prītipūrvaṃ janeśvaraḥ | bhāradvājena pāñcālyo nāmṛṣyata vaco'sya tat
अपने मित्र भरद्वाजपुत्र के इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहने पर पाञ्चाल नरेश उसकी वह बात सहन न कर सके।
श्लोक 3 (1.141.3)
स क्रोधामर्षजिह्मभ्रूः कषायीकृतलोचनः । ऐश्वर्यमदसंपन्नो द्रोणं राजाऽब्रवीदिदम् ॥
sa krodhāmarṣajihmabhrūḥ kaṣāyīkṛtalocanaḥ | aiśvaryamadasaṃpanno droṇaṃ rājā'bravīdidam
क्रोध और असहिष्णुता से भौंहें टेढ़ी किए, लाल आँखों वाले, ऐश्वर्य के मद में भरे राजा ने द्रोण से यह कहा —
द्रुपद उवाच
श्लोक 4 (1.141.4)
अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन्नातिसमञ्जसा । यन्मां ब्रवीषि प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज ॥
akṛteyaṃ tava prajñā brahmannātisamañjasā | yanmāṃ bravīṣi prasabhaṃ sakhā te'hamiti dvija
द्रुपद ने कहा — "ब्रह्मन्! तुम्हारी बुद्धि अपरिपक्व है और तनिक भी उचित नहीं, कि हे द्विज, तुम मुझसे धृष्टता से कहते हो कि मैं तुम्हारा मित्र हूँ।
श्लोक 5 (1.141.5)
न हि राज्ञामुदीर्णानामेवंभूतैर्नरैः क्वचित् । सख्यं भवति मन्दात्मञ्श्रिया हीनैर्धनच्युतैः ॥
na hi rājñāmudīrṇānāmevaṃbhūtairnaraiḥ kvacit | sakhyaṃ bhavati mandātmañśriyā hīnairdhanacyutaiḥ
"हे मन्दबुद्धि! ऊँचे पद पर पहुँचे राजाओं की तुम जैसे श्रीहीन और धनहीन लोगों से कहीं भी मित्रता नहीं होती।
श्लोक 6 (1.141.6)
सौहृदान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यतः । सौहृदं मे त्वया ह्यासीत्पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् ॥
sauhṛdānyapi jīryante kālena parijīryataḥ | sauhṛdaṃ me tvayā hyāsītpūrvaṃ sāmarthyabandhanam
"जैसे मनुष्य समय के साथ जीर्ण होता है, वैसे ही मित्रताएँ भी जीर्ण हो जाती हैं। पहले तुम्हारे साथ मेरी मित्रता थी, जो उस समय की हमारी समानता पर टिकी थी।
श्लोक 7 (1.141.7)
न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित् । कामश्चैतन्नाशयति क्रोधो वैनं रहत्युत ॥
na sakhyamajaraṃ loke hṛdi tiṣṭhati kasyacit | kāmaścaitannāśayati krodho vainaṃ rahatyuta
"इस संसार में किसी के हृदय में कोई मित्रता अजर बनी नहीं रहती। काम उसे नष्ट कर देता है और क्रोध भी उसे तोड़ देता है।
श्लोक 8 (1.141.8)
मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवदुपाधिकृत् । आसीत्सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् ॥
maivaṃ jīrṇamupāssva tvaṃ sakhyaṃ bhavadupādhikṛt | āsītsakhyaṃ dvijaśreṣṭha tvayā me'rthanibandhanam
"इस जीर्ण मित्रता से इस प्रकार चिपके मत रहो; वह परिस्थितिवश बनी थी। हे द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ मेरी मित्रता किसी प्रयोजन से बँधी थी।
श्लोक 9 (1.141.9)
न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान्विदुषः सखा । न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते ॥
na daridro vasumato nāvidvānviduṣaḥ sakhā | na śūrasya sakhā klībaḥ sakhipūrvaṃ kimiṣyate
"निर्धन धनवान का मित्र नहीं होता, न अविद्वान विद्वान का; कायर शूरवीर का मित्र नहीं होता। फिर पुरानी मित्रता की चाह क्यों करते हो?
श्लोक 10 (1.141.10)
ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम् । तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥
yayoreva samaṃ vittaṃ yayoreva samaṃ śrutam | tayorvivāhaḥ sakhyaṃ ca na tu puṣṭavipuṣṭayoḥ
"जिनका धन समान हो और जिनकी विद्या समान हो, उन्हीं में विवाह और मित्रता होती है; भरे-पूरे और भूखे के बीच नहीं।
श्लोक 11 (1.141.11)
नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते ॥
nāśrotriyaḥ śrotriyasya nārathī rathinaḥ sakhā | nārājā pārthivasyāpi sakhipūrvaṃ kimiṣyate
"वेद न जानने वाला वेदज्ञ का मित्र नहीं होता, रथहीन रथी का मित्र नहीं होता, और जो राजा नहीं है वह राजा का मित्र नहीं होता। फिर पुरानी मित्रता की चाह क्यों करते हो?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (1.141.12)
द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाजः प्रतापवान् । मुहूर्तं चिन्तयित्वा तु मन्युनाऽभिपरिप्लुतः ॥
drupadenaivamuktastu bhāradvājaḥ pratāpavān | muhūrtaṃ cintayitvā tu manyunā'bhipariplutaḥ
द्रुपद के ऐसा कहने पर प्रतापी भरद्वाजपुत्र क्रोध से भरकर क्षणभर सोचते रहे।
श्लोक 13 (1.141.13)
स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चाल्यं प्रतिबुद्धिमान् । शिष्यैः परिवृतः श्रीमान्पुत्रेण सहितस्तथा ॥
sa viniścitya manasā pāñcālyaṃ pratibuddhimān | śiṣyaiḥ parivṛtaḥ śrīmānputreṇa sahitastathā
पाञ्चालराज के विषय में मन में निश्चय करके वे बुद्धिमान, श्रीमान द्रोण अपने शिष्यों से घिरे और पुत्र को साथ लिए
श्लोक 14 (1.141.14)
जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम् । तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्ता नचिरादिव ॥
jagāma kurumukhyānāṃ nagaraṃ nāgasāhvayam | tāṃ pratijñāṃ pratijñāya yāṃ kartā nacirādiva
कुरुश्रेष्ठों के नगर नागसाह्वय (हस्तिनापुर) को चल पड़े; उन्होंने एक प्रतिज्ञा कर ली थी, जिसे वे शीघ्र ही पूरी करने वाले थे।
श्लोक 15 (1.141.15)
स नागपुरमागम्य गौतमस्य निवेशने । भारद्वाजोऽवसत्तत्र प्रच्छन्नं द्विजसत्तमः ॥
sa nāgapuramāgamya gautamasya niveśane | bhāradvājo'vasattatra pracchannaṃ dvijasattamaḥ
नागपुर पहुँचकर ब्राह्मणश्रेष्ठ भरद्वाजपुत्र वहाँ गौतम (कृप) के घर में छिपकर रहने लगे।
श्लोक 16 (1.141.16)
ततोऽस्य तनुजः पार्थान्कृपस्यानन्तरं प्रभुः । अस्त्राणि शिक्षयामास नाबुध्यन्त च तं जनाः ॥
tato'sya tanujaḥ pārthānkṛpasyānantaraṃ prabhuḥ | astrāṇi śikṣayāmāsa nābudhyanta ca taṃ janāḥ
फिर उनके समर्थ पुत्र (अश्वत्थामा) कृप के बाद पार्थों को अस्त्र-विद्या सिखाने लगे, और लोग उन्हें पहचान न सके।
श्लोक 17 (1.141.17)
एवं स तत्र गूढात्मा कंचित्कालमुवास ह । कुमारास्त्वथ निष्क्रम्य समेता गजसाह्वयात् ॥
evaṃ sa tatra gūḍhātmā kaṃcitkālamuvāsa ha | kumārāstvatha niṣkramya sametā gajasāhvayāt
इस प्रकार वे अपने को छिपाए हुए कुछ समय वहाँ रहे। तब एक दिन सब कुमार मिलकर गजसाह्वय (हस्तिनापुर) से बाहर निकले
श्लोक 18 (1.141.18)
क्रीडन्तो वीटया तत्र वीराः पर्यचरन्मुदा । तेषां संक्रीडमानानामुदपानेऽङ्गुलीयकम् ॥
krīḍanto vīṭayā tatra vīrāḥ paryacaranmudā | teṣāṃ saṃkrīḍamānānāmudapāne'ṅgulīyakam
और वहाँ गेंद से खेलते हुए वे वीर आनन्द से घूमने लगे। उनके खेलते-खेलते एक कुएँ में
श्लोक 19 (1.141.19)
पपात धर्मपुत्रस्य वीटा तत्रैव चापतत् । गर्ताम्बुना प्रतिच्छन्नं तारारूपमिवाम्बरे ॥
papāta dharmaputrasya vīṭā tatraiva cāpatat | gartāmbunā praticchannaṃ tārārūpamivāmbare
धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) की अँगूठी गिर पड़ी, और गेंद भी वहीं जा गिरी। गड्ढे के जल से ढकी वह आकाश में तारे के समान चमक रही थी।
श्लोक 20 (1.141.20)
दृष्ट्वा चैते कुमाराश्च तं यत्नात्पर्यवारयन् । ततस्ते यत्नमातिष्ठन्वीटामुद्धर्तुमादृताः । न च ते प्रत्यपद्यन्त कर्म वीटोपलब्धये ॥
dṛṣṭvā caite kumārāśca taṃ yatnātparyavārayan | tataste yatnamātiṣṭhanvīṭāmuddhartumādṛtāḥ | na ca te pratyapadyanta karma vīṭopalabdhaye
उसे देखकर कुमार उत्सुकता से उसके चारों ओर आ जुटे। गेंद निकालने में लगकर उन्होंने बहुत यत्न किया, पर उसे पाने का कोई उपाय उन्हें न सूझा।
श्लोक 21 (1.141.21)
ततोऽन्योन्यमवैक्षन्त व्रीडयावनताननाः । तस्या योगमविदन्तो भृशं चोत्कण्ठिताभवन् ॥
tato'nyonyamavaikṣanta vrīḍayāvanatānanāḥ | tasyā yogamavidanto bhṛśaṃ cotkaṇṭhitābhavan
तब वे लज्जा से मुँह झुकाए एक-दूसरे को देखने लगे, और उसे निकालने का उपाय न जानकर बहुत व्याकुल हो उठे।
श्लोक 22 (1.141.22)
तेऽपश्यन्ब्राह्मणं श्याममापन्नं पलितं कृशम् । कृत्यवन्तमदूरस्थमग्निहोत्रपुरस्कृतम् ॥
te'paśyanbrāhmaṇaṃ śyāmamāpannaṃ palitaṃ kṛśam | kṛtyavantamadūrasthamagnihotrapuraskṛtam
तब उन्होंने पास ही एक ब्राह्मण को देखा — साँवले, पके बालों वाले, दुबले-पतले और विपन्न — जो अपने कर्म में लगे थे और जिनके सामने अग्निहोत्र की अग्नि थी।
श्लोक 23 (1.141.23)
ते तं दृष्ट्वा महात्मानमुपगम्य कुमारकाः । भग्नोत्साहक्रियात्मानो ब्राह्मणं पर्यवारयन् ॥
te taṃ dṛṣṭvā mahātmānamupagamya kumārakāḥ | bhagnotsāhakriyātmāno brāhmaṇaṃ paryavārayan
उन महात्मा को देखकर वे बालक उनके पास गए और, उत्साह और प्रयत्न दोनों टूट जाने पर, उस ब्राह्मण को घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 24 (1.141.24)
अथ द्रोणः कुमारांस्तान्दृष्ट्वा कृत्यवतस्तदा । प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान् ॥
atha droṇaḥ kumārāṃstāndṛṣṭvā kṛtyavatastadā | prahasya mandaṃ paiśalyādabhyabhāṣata vīryavān
तब पराक्रमी द्रोण ने उन कुमारों को अपने काम में लगे देखकर, मन्द मुस्कान के साथ, कुशलता से कहा —
द्रोण उवाच
श्लोक 25 (1.141.25)
अहो वो धिग्बलं क्षात्रं धिगेतां वः कृतास्त्रताम् । भरतस्यान्वये जाता ये वीटां नाधिगच्छत ॥
aho vo dhigbalaṃ kṣātraṃ dhigetāṃ vaḥ kṛtāstratām | bharatasyānvaye jātā ye vīṭāṃ nādhigacchata
"धिक्कार है तुम्हारे क्षत्रिय-बल को, और धिक्कार है तुम्हारी इस अस्त्र-निपुणता को! भरत के वंश में जन्म लेकर भी तुम एक गेंद नहीं निकाल पाते!
श्लोक 26 (1.141.26)
वीटां च मुद्रिकां चैव ह्यहमेतदपि द्वयम् । उद्धरेयमिषीकाभिर्भोजनं मे प्रदीयताम् ॥
vīṭāṃ ca mudrikāṃ caiva hyahametadapi dvayam | uddhareyamiṣīkābhirbhojanaṃ me pradīyatām
"गेंद और अँगूठी — इन दोनों को मैं सींकों से निकाल दूँगा। मुझे भोजन दिया जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (1.141.27)
ततोऽब्रवीत्तदा द्रोणं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । कृपस्यानुमते ब्रह्मन्भिक्षामाप्नुहि शाश्वतीम् ॥
tato'bravīttadā droṇaṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | kṛpasyānumate brahmanbhikṣāmāpnuhi śāśvatīm
तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने द्रोण से कहा — "ब्रह्मन्! कृप की अनुमति से आप सदा के लिए भिक्षा प्राप्त करें।"
श्लोक 28 (1.141.28)
एवमुक्तः प्रत्युवाच प्रहस्य भरतानिदम् । एषा मुष्टिरिषीकाणां मयाऽस्त्रेणाभिमन्त्रिता ॥
evamuktaḥ pratyuvāca prahasya bharatānidam | eṣā muṣṭiriṣīkāṇāṃ mayā'streṇābhimantritā
ऐसा कहे जाने पर वे हँसकर भरतवंशियों से बोले — "सींकों की यह मुट्ठी मैंने अस्त्र-मन्त्र से अभिमन्त्रित कर दी है।
द्रोण उवाच
श्लोक 29 (1.141.29)
अस्या वीर्यं निरीक्षध्वं यदन्येषु न विद्यते । वेत्स्यामीषिकया वीटां तामिषीकां तथाऽन्यया ॥
asyā vīryaṃ nirīkṣadhvaṃ yadanyeṣu na vidyate | vetsyāmīṣikayā vīṭāṃ tāmiṣīkāṃ tathā'nyayā
"इसका वह बल देखो, जो दूसरों में नहीं है। एक सींक से मैं गेंद को बेधूँगा, और उस सींक को दूसरी से,
श्लोक 30 (1.141.30)
तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम । ततो यथोक्तं द्रोणेन तत्सर्वं कृतमञ्जसा ॥
tāmanyayā samāyoge vīṭāyā grahaṇaṃ mama | tato yathoktaṃ droṇena tatsarvaṃ kṛtamañjasā
"और उसे फिर दूसरी से; इस प्रकार जोड़ते जाने से मैं गेंद को पकड़ लूँगा।" फिर द्रोण ने जैसा कहा था, वह सब सहज ही कर दिखाया गया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (1.141.31)
तदवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचोऽब्रुवन् ॥
tadavekṣya kumārāste vismayotphullalocanāḥ | āścaryamidamatyantamiti matvā vaco'bruvan
यह देखकर विस्मय से आँखें फाड़े वे कुमार इसे अत्यन्त आश्चर्यजनक मानकर बोले —
श्लोक 32 (1.141.32)
मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर । ततः शरं समादाय धनुश्चापि महायशाः ॥
mudrikāmapi viprarṣe śīghrametāṃ samuddhara | tataḥ śaraṃ samādāya dhanuścāpi mahāyaśāḥ
"हे विप्रर्षि! इस अँगूठी को भी शीघ्र निकाल दीजिए।" तब उन महायशस्वी ने बाण और धनुष उठाया,
श्लोक 33 (1.141.33)
शरेण विद्ध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत्प्रभुः । स शरं समुपादाय कूपादङ्गुलिवेष्टनम् ॥
śareṇa viddhvā mudrāṃ tāmūrdhvamāvāhayatprabhuḥ | sa śaraṃ samupādāya kūpādaṅguliveṣṭanam
और बाण से उस अँगूठी को बेधकर उन समर्थ ने उसे ऊपर खींच लिया। फिर बाण हाथ में लेकर उन्होंने कुएँ से निकली वह अँगूठी
श्लोक 34 (1.141.34)
ददौ ततः कुमाराणां विस्मितानामविस्मितः । मुद्रिकामुद्धृतां दृष्ट्वा तमाहुस्ते कुमारकाः ॥
dadau tataḥ kumārāṇāṃ vismitānāmavismitaḥ | mudrikāmuddhṛtāṃ dṛṣṭvā tamāhuste kumārakāḥ
विस्मित कुमारों को दे दी, स्वयं वे तनिक भी विस्मित न हुए। अँगूठी को निकली हुई देखकर कुमारों ने उनसे कहा —
कुमारा ऊचुः
श्लोक 35 (1.141.35)
अभिवन्दामहे ब्रह्मन्नैतदन्येषु विद्यते । कोऽसि कस्यासि जानीमो वयं किं करवामहे ॥
abhivandāmahe brahmannaitadanyeṣu vidyate | ko'si kasyāsi jānīmo vayaṃ kiṃ karavāmahe
कुमार बोले — "ब्रह्मन्! हम आपको प्रणाम करते हैं। ऐसा कौशल और किसी में नहीं है। आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं — हम जानना चाहते हैं। हम आपके लिए क्या करें?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 36 (1.141.36)
एवमुक्तस्ततो द्रोणः प्रत्युवाच कुमारकान् । आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्च माम् ॥
evamuktastato droṇaḥ pratyuvāca kumārakān | ācakṣadhvaṃ ca bhīṣmāya rūpeṇa ca guṇaiśca mām
ऐसा कहे जाने पर द्रोण ने कुमारों को उत्तर दिया — "भीष्म को मेरे रूप और गुणों के बारे में बताओ;
श्लोक 37 (1.141.37)
स एव सुमहातेजाः सांप्रतं प्रतिपत्स्यते । तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचुः कुमारकाः ॥
sa eva sumahātejāḥ sāṃprataṃ pratipatsyate | tathetyuktvā ca gatvā ca bhīṣmamūcuḥ kumārakāḥ
"वे महातेजस्वी तुरन्त समझ जाएँगे कि क्या करना है।" "ऐसा ही हो" कहकर कुमार गए और भीष्म को
श्लोक 38 (1.141.38)
ब्राह्मणस्य वचः कृत्स्नं तच्च कर्म तथाविधम् । भीष्मः श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत ॥
brāhmaṇasya vacaḥ kṛtsnaṃ tacca karma tathāvidham | bhīṣmaḥ śrutvā kumārāṇāṃ droṇaṃ taṃ pratyajānata
ब्राह्मण की सारी बात और उनका वह कर्म ज्यों का त्यों बता दिया। कुमारों से यह सुनकर भीष्म ने जान लिया कि वे द्रोण हैं।
श्लोक 39 (1.141.39)
युक्तरूपः स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च । अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम् ॥
yuktarūpaḥ sa hi gururityevamanucintya ca | athainamānīya tadā svayameva susatkṛtam
"यही उपयुक्त गुरु हैं" — ऐसा विचार करके भीष्म स्वयं उन्हें ले आए और उनका भली-भाँति सत्कार किया।
श्लोक 40 (1.141.40)
परिपप्रच्छ निपुणं भीष्मः शस्त्रभृतां वरः । हेतुमागमने तच्च द्रोणः सर्वं न्यवेदयत् ॥
paripapraccha nipuṇaṃ bhīṣmaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | hetumāgamane tacca droṇaḥ sarvaṃ nyavedayat
फिर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भीष्म ने उनसे आने का कारण ध्यान से पूछा, और द्रोण ने उन्हें सब कुछ बता दिया।
द्रोण उवाच
श्लोक 41 (1.141.41)
महर्षेरग्निवेश्यस्य सकाशमहमच्युत । अस्त्रार्थमगमं पूर्वं धनुर्वेदजिघृक्षया ॥
maharṣeragniveśyasya sakāśamahamacyuta | astrārthamagamaṃ pūrvaṃ dhanurvedajighṛkṣayā
द्रोण ने कहा — "हे अच्युत! पूर्वकाल में मैं अस्त्र-विद्या के लिए, धनुर्वेद सीखने की इच्छा से, महर्षि अग्निवेश्य के पास गया था।
श्लोक 42 (1.141.42)
ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुलाः समाः । अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रतः ॥
brahmacārī vinītātmā jaṭilo bahulāḥ samāḥ | avasaṃ suciraṃ tatra guruśuśrūṣaṇe rataḥ
"ब्रह्मचारी, विनीत और जटाधारी होकर मैं बहुत वर्षों तक वहाँ गुरु-सेवा में लगा रहा।
श्लोक 43 (1.141.43)
पाञ्चाल्यो राजपुत्रश्च यज्ञसेनो महाबलः । इष्वस्त्रहेतोर्न्यवसत्तस्मिन्नेव गुरौ प्रभुः ॥
pāñcālyo rājaputraśca yajñaseno mahābalaḥ | iṣvastrahetornyavasattasminneva gurau prabhuḥ
"पाञ्चाल का महाबली राजकुमार यज्ञसेन भी धनुर्विद्या सीखने के लिए उन्हीं गुरु के पास रहता था।
श्लोक 44 (1.141.44)
स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्च मे । तेनाहं सह संगम्य वर्तयन्सुचिरं प्रभो ॥
sa me tatra sakhā cāsīdupakārī priyaśca me | tenāhaṃ saha saṃgamya vartayansuciraṃ prabho
"वहाँ वह मेरा मित्र था — मेरा उपकारी और मुझे प्रिय। हे प्रभो! मैंने बहुत समय उसके साथ बिताया,
श्लोक 45 (1.141.45)
बाल्यात्प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च । स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकरः ॥
bālyātprabhṛti kauravya sahādhyayanameva ca | sa me sakhā sadā tatra priyavādī priyaṃkaraḥ
"हे कुरुनन्दन! बचपन से ही हम साथ पढ़े। वहाँ वह सदा मेरा मित्र रहा — प्रिय बोलने वाला और प्रिय करने वाला।
श्लोक 46 (1.141.46)
अब्रवीदिति मां भीष्म वचनं प्रीतिवर्धनम् । अहं प्रियतमः पुत्रः पितुर्द्रोण महात्मनः ॥
abravīditi māṃ bhīṣma vacanaṃ prītivardhanam | ahaṃ priyatamaḥ putraḥ piturdroṇa mahātmanaḥ
"हे भीष्म! उसने मुझसे प्रेम बढ़ाने वाली यह बात कही थी — 'द्रोण! मैं अपने महात्मा पिता का सबसे प्रिय पुत्र हूँ।
श्लोक 47 (1.141.47)
अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाञ्चाल्यो यदा तदा । तद्भोज्यं भवता राज्यमर्धं सत्येन ते शपे ॥
abhiṣekṣyati māṃ rājye sa pāñcālyo yadā tadā | tadbhojyaṃ bhavatā rājyamardhaṃ satyena te śape
"'जब पाञ्चालराज मेरा राज्याभिषेक करेंगे, तब आधा राज्य तुम्हारे भोगने के लिए होगा — मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ।
श्लोक 48 (1.141.48)
मम भोगाश्च वित्तं च त्वदधीनं सुखानि च । एवमुक्त्वाऽथ वव्राज कृतास्त्रः पूजितो मया ॥
mama bhogāśca vittaṃ ca tvadadhīnaṃ sukhāni ca | evamuktvā'tha vavrāja kṛtāstraḥ pūjito mayā
"'मेरे भोग, धन और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे।' यह कहकर अस्त्र-विद्या पूरी करके, मुझसे सम्मानित होकर वह चला गया।
श्लोक 49 (1.141.49)
तच्च वाक्यमहं नित्यं मनसा धारयंस्तदा । सोऽहं पितृनियोगेन पुत्रलोभाद्यशस्विनीम् ॥
tacca vākyamahaṃ nityaṃ manasā dhārayaṃstadā | so'haṃ pitṛniyogena putralobhādyaśasvinīm
"मैं उसकी वह बात सदा मन में धारण किए रहा। फिर पिता की आज्ञा से और पुत्र की कामना से मैंने
श्लोक 50 (1.141.50)
शारद्वतीं महाप्रज्ञामुपयेमे महाव्रताम् । अग्निहोत्रे च सत्रे च दमे च सततं रताम् ॥
śāradvatīṃ mahāprajñāmupayeme mahāvratām | agnihotre ca satre ca dame ca satataṃ ratām
"यशस्विनी, परम बुद्धिमती और महान व्रतों वाली शारद्वती (कृपी) से विवाह किया, जो अग्निहोत्र, यज्ञ और संयम में सदा लगी रहती थी।
श्लोक 51 (1.141.51)
लेभे च गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमौरसम् । भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम् ॥
lebhe ca gautamī putramaśvatthāmānamaurasam | bhīmavikramakarmāṇamādityasamatejasam
"गौतमी (कृपी) ने मेरे औरस पुत्र अश्वत्थामा को जन्म दिया, जो भयंकर पराक्रम वाला और सूर्य के समान तेजस्वी है।
श्लोक 52 (1.141.52)
पुत्रेण तेन प्रीतोऽहं भरद्वाजो मया यथा । गोक्षीरं पिबतो दृष्ट्वा धनिनस्तत्र पुत्रकान् । अश्वत्थामारुदद्बालस्तन्मे संदेहयद्दिशः ॥
putreṇa tena prīto'haṃ bharadvājo mayā yathā | gokṣīraṃ pibato dṛṣṭvā dhaninastatra putrakān | aśvatthāmārudadbālastanme saṃdehayaddiśaḥ
"उस पुत्र से मैं वैसे ही प्रसन्न था जैसे भरद्वाज मुझसे। एक बार वहाँ धनी लोगों के बच्चों को गाय का दूध पीते देखकर बालक अश्वत्थामा रोने लगा; इससे मेरी सुध-बुध खो गई।
श्लोक 53 (1.141.53)
न स्नातकोऽवसीदेत वर्तमानः स्वकर्मसु । इति संचिन्त्य मनसा तं देशं बहुशो भ्रमन् ॥
na snātako'vasīdeta vartamānaḥ svakarmasu | iti saṃcintya manasā taṃ deśaṃ bahuśo bhraman
"'अपने कर्मों में लगा स्नातक दुःख न पाए' — मन में ऐसा सोचकर मैं उस देश में बार-बार घूमा,
श्लोक 54 (1.141.54)
विशुद्धमिच्छन्गाङ्गेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम् । अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छं पयस्विनीम् ॥
viśuddhamicchangāṅgeya dharmopetaṃ pratigraham | antādantaṃ parikramya nādhyagacchaṃ payasvinīm
"हे गङ्गानन्दन! धर्मसम्मत, शुद्ध दान की खोज में। एक छोर से दूसरे छोर तक घूमकर भी मुझे कोई दुधारू गाय न मिली।
श्लोक 55 (1.141.55)
यवपिष्टोदकेनैनं लोभयेयं कुमारकम् । पीत्वा पिष्टरसं बालः क्षीरं पीतं मयाऽपि च ॥
yavapiṣṭodakenainaṃ lobhayeyaṃ kumārakam | pītvā piṣṭarasaṃ bālaḥ kṣīraṃ pītaṃ mayā'pi ca
"मैंने सोचा कि जौ के आटे के घोल से इस बालक को बहला दूँ। आटे का वह घोल पीकर बालक, यह सोचकर कि 'मैंने भी दूध पी लिया',
श्लोक 56 (1.141.56)
ननर्तोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद्विमोहितः । तं दृष्ट्वा नृत्यमानं तु बालैः परिवृतं सुतम् ॥
nanartotthāya kauravya hṛṣṭo bālyādvimohitaḥ | taṃ dṛṣṭvā nṛtyamānaṃ tu bālaiḥ parivṛtaṃ sutam
"हे कुरुनन्दन! बचपन के भोलेपन में खुशी से उठकर नाचने लगा। अपने पुत्र को इस प्रकार बालकों से घिरे नाचते
श्लोक 57 (1.141.57)
हास्यतामुपसंप्राप्तं कश्मलं तत्र मेऽभवत् । द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति ॥
hāsyatāmupasaṃprāptaṃ kaśmalaṃ tatra me'bhavat | droṇaṃ dhigastvadhaninaṃ yo dhanaṃ nādhigacchati
"और हँसी का पात्र बनते देखकर मुझ पर गहरा विषाद छा गया। 'धिक्कार है निर्धन द्रोण को, जो धन नहीं कमा पाता;
श्लोक 58 (1.141.58)
पिष्टोदकं सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया । नृत्यतिस्म मुदाविष्टः क्षीरं पीतं मयाऽप्युत ॥
piṣṭodakaṃ suto yasya pītvā kṣīrasya tṛṣṇayā | nṛtyatisma mudāviṣṭaḥ kṣīraṃ pītaṃ mayā'pyuta
"'जिसका पुत्र दूध की प्यास में आटे का घोल पीकर, यह मानकर कि उसने भी दूध पी लिया, आनन्द में भरकर नाचता है!'
श्लोक 59 (1.141.59)
इति संभाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत् । आत्मानं चात्मना गर्हन्मनसेदं व्यचिन्तयम् ॥
iti saṃbhāṣatāṃ vācaṃ śrutvā me buddhiracyavat | ātmānaṃ cātmanā garhanmanasedaṃ vyacintayam
"लोगों को ऐसी बातें करते सुनकर मेरी बुद्धि डगमगा गई। अपने आप को धिक्कारते हुए मैंने मन में यह विचार किया —
श्लोक 60 (1.141.60)
अपि चाहं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे । परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्यां धनेप्सया ॥
api cāhaṃ purā viprairvarjito garhito vase | paropasevāṃ pāpiṣṭhāṃ na ca kuryāṃ dhanepsayā
"'पहले भी मैं ब्राह्मणों से त्यागा और निन्दित होकर रहा हूँ; फिर भी धन की लालसा से मैं दूसरे की सेवा, जो सबसे पापपूर्ण है, नहीं करूँगा।'
श्लोक 61 (1.141.61)
इति मत्वा प्रियं पुत्रं भीष्मादाय ततो ह्यहम् । पूर्वस्नेहानुरागित्वात्सदारः सौमकिं गतः ॥
iti matvā priyaṃ putraṃ bhīṣmādāya tato hyaham | pūrvasnehānurāgitvātsadāraḥ saumakiṃ gataḥ
"हे भीष्म! यही सोचकर मैं अपने प्रिय पुत्र को साथ लेकर, पुराने स्नेह और अनुराग के कारण, पत्नी सहित सोमकवंशी (द्रुपद) के पास गया।
श्लोक 62 (1.141.62)
अभिषिक्तं तु श्रुत्वैव कृतार्थोऽस्मीति चिन्तयन् । प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम् ॥
abhiṣiktaṃ tu śrutvaiva kṛtārtho'smīti cintayan | priyaṃ sakhāyaṃ suprīto rājyasthaṃ samupāgamam
"उसका राज्याभिषेक हो गया है, यह सुनते ही 'मेरा काम बन गया' ऐसा सोचकर मैं बड़ी प्रसन्नता से राज्यासीन अपने प्रिय मित्र के पास पहुँचा,
श्लोक 63 (1.141.63)
संस्मरन्सङ्गमं चैव वचनं चैव तस्य तत् । ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो ॥
saṃsmaransaṅgamaṃ caiva vacanaṃ caiva tasya tat | tato drupadamāgamya sakhipūrvamahaṃ prabho
"हमारे साथ और उसके उन वचनों का स्मरण करते हुए। हे प्रभो! फिर द्रुपद के पास पहुँचकर, पुराने मित्र के नाते मैंने
श्लोक 64 (1.141.64)
अब्रुवं पुरुषव्याघ्र सखायं विद्धि मामिति । उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि सङ्गतः ॥
abruvaṃ puruṣavyāghra sakhāyaṃ viddhi māmiti | upasthitastu drupadaṃ sakhivaccāsmi saṅgataḥ
"कहा — 'हे पुरुषसिंह! मुझे अपना मित्र जानो।' मैं द्रुपद के सामने उपस्थित हुआ और मित्र की तरह उससे मिला।
श्लोक 65 (1.141.65)
स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत् । अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन्नातिसमञ्जसा ॥
sa māṃ nirākāramiva prahasannidamabravīt | akṛteyaṃ tava prajñā brahmannātisamañjasā
"पर वह मुझे मानो तुच्छ समझकर हँसते हुए बोला — 'ब्रह्मन्! तुम्हारी बुद्धि अपरिपक्व है और तनिक भी उचित नहीं,
श्लोक 66 (1.141.66)
यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज । संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यतः ॥
yadāttha māṃ tvaṃ prasabhaṃ sakhā te'hamiti dvija | saṃgatānīha jīryanti kālena parijīryataḥ
"'कि हे द्विज, तुम मुझसे धृष्टता से कहते हो कि तुम मेरे मित्र हो। इस संसार में जैसे मनुष्य समय के साथ जीर्ण होता है, वैसे ही सम्बन्ध भी जीर्ण हो जाते हैं।
श्लोक 67 (1.141.67)
सौहृदं मे त्वया ह्यासीत्पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् । नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ॥
sauhṛdaṃ me tvayā hyāsītpūrvaṃ sāmarthyabandhanam | nāśrotriyaḥ śrotriyasya nārathī rathinaḥ sakhā
"'पहले तुम्हारे साथ मेरी मित्रता थी, जो उस समय की हमारी समानता पर टिकी थी। वेद न जानने वाला वेदज्ञ का मित्र नहीं होता, न रथहीन रथी का।
श्लोक 68 (1.141.68)
साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यान्नोपपद्यते । न सख्यमजरं लोके विद्यते जातु कस्यचित् ॥
sāmyāddhi sakhyaṃ bhavati vaiṣamyānnopapadyate | na sakhyamajaraṃ loke vidyate jātu kasyacit
"'मित्रता समानता से होती है, विषमता में वह नहीं बनती। संसार में कोई भी मित्रता कभी अजर नहीं रहती।
श्लोक 69 (1.141.69)
कामो वैनं विहरति क्रोधो वैनं रहत्युत । मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवदुपाधिकृत् ॥
kāmo vainaṃ viharati krodho vainaṃ rahatyuta | maivaṃ jīrṇamupāssva tvaṃ sakhyaṃ bhavadupādhikṛt
"'काम उसे बिखेर देता है और क्रोध उसे तोड़ देता है। इस जीर्ण मित्रता से इस प्रकार चिपके मत रहो; वह परिस्थितिवश बनी थी।
श्लोक 70 (1.141.70)
आसीत्सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् । नह्यनाढ्यः सखाऽऽढ्यस्य नाविद्वान्विदुषः सखा ॥
āsītsakhyaṃ dvijaśreṣṭha tvayā me'rthanibandhanam | nahyanāḍhyaḥ sakhā''ḍhyasya nāvidvānviduṣaḥ sakhā
"'हे द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ मेरी मित्रता किसी प्रयोजन से बँधी थी। निर्धन धनी का मित्र नहीं होता, न अविद्वान विद्वान का;
श्लोक 71 (1.141.71)
न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते । न हि राज्ञामुदीर्णानामेवं भूतैर्नरैः क्वचित् ॥
na śūrasya sakhā klībaḥ sakhipūrvaṃ kimiṣyate | na hi rājñāmudīrṇānāmevaṃ bhūtairnaraiḥ kvacit
"'कायर शूरवीर का मित्र नहीं होता। फिर पुरानी मित्रता की चाह क्यों करते हो? हे मन्दबुद्धि! ऊँचे पद पर पहुँचे राजाओं की तुम जैसे
श्लोक 72 (1.141.72)
सख्यं भवति मन्दात्मञ्छ्रिया हीनैर्धनच्युतैः । नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ॥
sakhyaṃ bhavati mandātmañchriyā hīnairdhanacyutaiḥ | nāśrotriyaḥ śrotriyasya nārathī rathinaḥ sakhā
"'श्रीहीन और धनहीन लोगों से कभी मित्रता नहीं होती। वेद न जानने वाला वेदज्ञ का मित्र नहीं होता, न रथहीन रथी का;
श्लोक 73 (1.141.73)
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते । अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम् ॥
nārājā pārthivasyāpi sakhipūrvaṃ kimiṣyate | ahaṃ tvayā na jānāmi rājyārthe saṃvidaṃ kṛtām
"'और जो राजा नहीं, वह राजा का मित्र नहीं होता। फिर पुरानी मित्रता की चाह क्यों करते हो? राज्य के विषय में तुम्हारे साथ किया गया कोई वचन मुझे ज्ञात नहीं।
श्लोक 74 (1.141.74)
एकरात्रं तु ते ब्रह्मन्कामं दास्यामि भोजनम् । एवमुक्तस्त्वहं तेन सदारः प्रस्थितस्तदा ॥
ekarātraṃ tu te brahmankāmaṃ dāsyāmi bhojanam | evamuktastvahaṃ tena sadāraḥ prasthitastadā
"'हाँ, ब्रह्मन्! एक रात का भोजन मैं तुम्हें अवश्य दे दूँगा।' उसके ऐसा कहने पर मैं उसी समय पत्नी के साथ चल पड़ा,
श्लोक 75 (1.141.75)
तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्ताऽस्म्यचिरादिव । द्रुपदेनैवमुक्तोऽहं मन्युनाऽभिपरिप्लुतः ॥
tāṃ pratijñāṃ pratijñāya yāṃ kartā'smyacirādiva | drupadenaivamukto'haṃ manyunā'bhipariplutaḥ
"एक प्रतिज्ञा करके, जिसे मैं शीघ्र ही पूरी करूँगा। द्रुपद के ऐसा कहने पर क्रोध से भरकर
श्लोक 76 (1.141.76)
अभ्यागच्छं कुरून्भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितैः । ततोऽहं भवतः कामं संवर्धयितुमागतः ॥
abhyāgacchaṃ kurūnbhīṣma śiṣyairarthī guṇānvitaiḥ | tato'haṃ bhavataḥ kāmaṃ saṃvardhayitumāgataḥ
"हे भीष्म! मैं गुणवान शिष्यों की चाह लेकर कुरुओं के पास आया हूँ। इस प्रकार मैं आपकी इच्छा पूरी करने आया हूँ।
श्लोक 77 (1.141.77)
इदं नागपुरं रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत ॥
idaṃ nāgapuraṃ ramyaṃ brūhi kiṃ karavāṇi te | evamuktastadā bhīṣmo bhāradvājamabhāṣata
"यह रमणीय नागपुर है। बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ?" ऐसा कहे जाने पर भीष्म ने तब भरद्वाजपुत्र से कहा।
भीष्म उवाच
श्लोक 78 (1.141.78)
अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय । भुङ्क्ष्व भोगान्भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये ॥
apajyaṃ kriyatāṃ cāpaṃ sādhvastraṃ pratipādaya | bhuṅkṣva bhogānbhṛśaṃ prītaḥ pūjyamānaḥ kurukṣaye
भीष्म ने कहा — "अपने धनुष की डोरी उतार दीजिए और भली-भाँति अस्त्र-विद्या सिखाइए। कुरुओं के घर में सम्मान पाते हुए प्रसन्न होकर भरपूर भोग भोगिए।
श्लोक 79 (1.141.79)
कुरूणामस्ति यद्वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम् । त्वमेव परमो राजा सर्वे वाक्यकरास्तव ॥
kurūṇāmasti yadvittaṃ rājyaṃ cedaṃ sarāṣṭrakam | tvameva paramo rājā sarve vākyakarāstava
"कुरुओं का जो भी धन है, और राष्ट्र सहित यह राज्य — उसके परम राजा आप ही हैं; सब आपकी आज्ञा मानेंगे।
श्लोक 80 (1.141.80)
यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन्कृतं तदिति चिन्त्यताम् । दिष्ट्या प्राप्तोऽसि विप्रर्षे महान्मेऽनुग्रहः कृतः ॥
yacca te prārthitaṃ brahmankṛtaṃ taditi cintyatām | diṣṭyā prāpto'si viprarṣe mahānme'nugrahaḥ kṛtaḥ
"ब्रह्मन्! आपने जो कुछ चाहा है, उसे पूरा हुआ समझिए। हे विप्रर्षि! यह सौभाग्य है कि आप पधारे; आपने मुझ पर बड़ी कृपा की है।"