आदि पर्व · अध्याय 142
द्रोण के शिष्य और एकलव्य का अँगूठा
भीष्म अपने पौत्रों को द्रोण को सौंपते हैं। द्रोण राजकुमारों से वचन माँगते हैं कि अस्त्रविद्या सीखने के बाद वे उनका एक कार्य करेंगे; केवल अर्जुन यह वचन देते हैं और शीघ्र ही सब शिष्यों से आगे निकल जाते हैं, यहाँ तक कि अँधेरे में भी धनुष का अभ्यास करते हैं। द्रोण द्वारा लौटाया गया निषादपुत्र एकलव्य गुरु की मिट्टी की प्रतिमा के सामने स्वयं अभ्यास करके अर्जुन से भी बढ़ जाता है; तब द्रोण गुरुदक्षिणा में उसका दाहिना अँगूठा माँगते हैं और वह तुरन्त दे देता है। अध्याय के अन्त में राजकुमारों की विशेष योग्यताएँ बताई गई हैं और पेड़ की चोटी पर रखे कृत्रिम पक्षी से द्रोण की परीक्षा आरम्भ होती है, जिसमें युधिष्ठिर और अन्य राजकुमार विफल रहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.142.1)
प्रतिजग्राह तं भीष्मो गुरुं पाण्डुसुतैः सह । पौत्रानादाय तान्सर्वान्वसूनि विविधानि च ॥
pratijagrāha taṃ bhīṣmo guruṃ pāṇḍusutaiḥ saha | pautrānādāya tānsarvānvasūni vividhāni ca
पाण्डुपुत्रों सहित भीष्म ने उन्हें गुरु के रूप में स्वीकार किया। अपने सभी पौत्रों को और नाना प्रकार का धन लेकर
श्लोक 2 (1.142.2)
शिष्य इति ददौ राजन्द्रोणाय विधिपूर्वकम् । तदा द्रोणोऽब्रवीद्वाक्यं भीष्मं बुद्धिमतां वरम् ॥
śiṣya iti dadau rājandroṇāya vidhipūrvakam | tadā droṇo'bravīdvākyaṃ bhīṣmaṃ buddhimatāṃ varam
हे राजन्, उन्होंने विधिपूर्वक उन्हें शिष्य के रूप में द्रोण को सौंप दिया। तब द्रोण ने बुद्धिमानों में श्रेष्ठ भीष्म से कहा—
द्रोण उवाच
श्लोक 3 (1.142.3)
कृपस्तिष्ठति चाचार्यः शस्त्रज्ञः प्राज्ञसंमतः । मयि तिष्ठति चेद्विप्रो वैमनस्यं गमिष्यति ॥
kṛpastiṣṭhati cācāryaḥ śastrajñaḥ prājñasaṃmataḥ | mayi tiṣṭhati cedvipro vaimanasyaṃ gamiṣyati
"आचार्य कृप यहाँ पहले से हैं, जो शस्त्रों के ज्ञाता हैं और विद्वान् जिनका सम्मान करते हैं। यदि मैं यहाँ रहूँ, तो वे ब्राह्मण खिन्न होंगे।
श्लोक 4 (1.142.4)
युष्मान्किंचिच्च याचित्वा धनं संगृह्य हर्षितः । स्वमाश्रमपदं राजन्गमिष्यामि यथागतम् ॥
yuṣmānkiṃcicca yācitvā dhanaṃ saṃgṛhya harṣitaḥ | svamāśramapadaṃ rājangamiṣyāmi yathāgatam
"हे राजन्, मैं आपसे कुछ माँगकर, धन लेकर, प्रसन्नतापूर्वक जैसे आया था वैसे ही अपने आश्रम लौट जाऊँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (1.142.5)
एवमुक्ते तु विप्रेन्द्रं भीष्मः प्रहरतां वरः । अब्रवीद्द्रोणमाचार्यमुख्यं शस्त्रविदां वरम् ॥
evamukte tu viprendraṃ bhīṣmaḥ praharatāṃ varaḥ | abravīddroṇamācāryamukhyaṃ śastravidāṃ varam
उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के ऐसा कहने पर योद्धाओं में श्रेष्ठ भीष्म ने आचार्यों में प्रमुख और शस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण से कहा—
भीष्म उवाच
श्लोक 6 (1.142.6)
कृपस्तिष्ठतु पूज्यश्च भर्तव्यश्च मया सदा । त्वं गुरुर्भव पौत्राणामाचार्यस्त्वं मतो मम । प्रतिगृह्णीष्व पुत्रांस्त्वमस्त्रज्ञान्कुरु वै सदा ॥
kṛpastiṣṭhatu pūjyaśca bhartavyaśca mayā sadā | tvaṃ gururbhava pautrāṇāmācāryastvaṃ mato mama | pratigṛhṇīṣva putrāṃstvamastrajñānkuru vai sadā
"कृप यहीं रहें; मैं सदा उनका सम्मान और भरण-पोषण करूँगा। पर मेरे पौत्रों के गुरु आप बनिए; मैं आपको ही उनका आचार्य मानता हूँ। इन बालकों को स्वीकार कीजिए और इन्हें सदा के लिए अस्त्रविद्या में निपुण बनाइए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (1.142.7)
ततः संपूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः । विशश्राम महातेजाः पूजितः कुरुवेश्मनि ॥
tataḥ saṃpūjito droṇo bhīṣmeṇa dvipadāṃ varaḥ | viśaśrāma mahātejāḥ pūjitaḥ kuruveśmani
भीष्म से इस प्रकार सम्मानित होकर मनुष्यों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी द्रोण कुरुओं के भवन में आदरपूर्वक विश्राम करने लगे।
श्लोक 8 (1.142.8)
विश्रान्तेऽथ गुरौ तस्मिन्पौत्रानादाय कौरवान् । शिष्यत्वेन ददौ भीष्मो वसूनि विविधानि च ॥
viśrānte'tha gurau tasminpautrānādāya kauravān | śiṣyatvena dadau bhīṣmo vasūni vividhāni ca
गुरु के विश्राम कर लेने पर भीष्म ने अपने पौत्रों, कौरवों, को लाकर शिष्य रूप में उन्हें सौंपा और नाना प्रकार का धन भी दिया।
श्लोक 9 (1.142.9)
गृहं च सुपरिच्छन्नं धनधान्यसमाकुलम् । भारद्वाजाय सुप्रीतः प्रत्यपादयत प्रभुः ॥
gṛhaṃ ca suparicchannaṃ dhanadhānyasamākulam | bhāradvājāya suprītaḥ pratyapādayata prabhuḥ
प्रसन्न होकर प्रभु भीष्म ने भरद्वाजपुत्र को धन-धान्य से भरा हुआ एक सुसज्जित भवन भी दिया।
श्लोक 10 (1.142.10)
स ताञ्शिष्यान्महेष्वासः प्रतिजग्राह कौरवान् । पाण्डवान्धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो मुदितमानसः ॥
sa tāñśiṣyānmaheṣvāsaḥ pratijagrāha kauravān | pāṇḍavāndhārtarāṣṭrāṃśca droṇo muditamānasaḥ
महान धनुर्धर द्रोण ने प्रसन्नचित्त होकर उन कुरुवंशी शिष्यों—पाण्डवों और धृतराष्ट्र के पुत्रों—को स्वीकार किया।
श्लोक 11 (1.142.11)
प्रतिगृह्य च तान्सर्वान्द्रोणो वचनमब्रवीत् । रहस्येकः प्रतीतात्मा कृतोपसदनांस्तथा ॥
pratigṛhya ca tānsarvāndroṇo vacanamabravīt | rahasyekaḥ pratītātmā kṛtopasadanāṃstathā
उन सबको स्वीकार करके, जब वे विधिपूर्वक उनके पास आ गए, तब आत्मविश्वास से भरे द्रोण ने एकान्त में उनसे कहा—
द्रोण उवाच
श्लोक 12 (1.142.12)
कार्यं मे काङ्क्षितं किंचिद्धृदि संपरिवर्तते । कृतास्त्रैस्तत्प्रदेयं मे तदेतद्वदतानघाः ॥
kāryaṃ me kāṅkṣitaṃ kiṃciddhṛdi saṃparivartate | kṛtāstraistatpradeyaṃ me tadetadvadatānaghāḥ
"मेरे हृदय में एक कार्य की कामना बार-बार उठती रहती है। अस्त्रविद्या में निपुण हो जाने पर तुम्हें वह मेरे लिए पूरा करना होगा। हे निष्पाप बालको, यह बताओ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (1.142.13)
तच्छ्रुत्वा कौरवेयास्ते तूष्णीमासन्विशांपते । अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परन्तप ॥
tacchrutvā kauraveyāste tūṣṇīmāsanviśāṃpate | arjunastu tataḥ sarvaṃ pratijajñe parantapa
हे प्रजापालक, यह सुनकर कुरुवंशी राजकुमार चुप रह गए; पर हे परन्तप, अर्जुन ने वह सब करने की प्रतिज्ञा कर ली।
श्लोक 14 (1.142.14)
ततोऽर्जुनं तदा मूर्ध्नि समाघ्राय पुनः पुनः । प्रीतिपूर्वं परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा ॥
tato'rjunaṃ tadā mūrdhni samāghrāya punaḥ punaḥ | prītipūrvaṃ pariṣvajya praruroda mudā tadā
तब द्रोण ने बार-बार अर्जुन का मस्तक सूँघा, उन्हें प्रेम से गले लगाया और आनन्द से रो पड़े।
श्लोक 15 (1.142.15)
अश्वत्थामानमाहूय द्रोणो वचनमब्रवीत् । सखायं विद्धि ते पार्थं मया दत्तः प्रगृह्यताम् ॥
aśvatthāmānamāhūya droṇo vacanamabravīt | sakhāyaṃ viddhi te pārthaṃ mayā dattaḥ pragṛhyatām
द्रोण ने अश्वत्थामा को बुलाकर कहा— "पार्थ को अपना मित्र समझो। मैंने उसे तुम्हें सौंपा है; उसे अपना लो।"
श्लोक 16 (1.142.16)
साधुसाध्विति तं पार्थः परिष्वज्येदमब्रवीत् । अद्यप्रभृति विप्रेन्द्र परवानस्मि धर्मतः ॥
sādhusādhviti taṃ pārthaḥ pariṣvajyedamabravīt | adyaprabhṛti viprendra paravānasmi dharmataḥ
"बहुत अच्छा, बहुत अच्छा!" कहकर पार्थ ने उसे गले लगाया और कहा— "हे विप्रश्रेष्ठ, आज से मैं धर्मपूर्वक आपके अधीन हूँ।
श्लोक 17 (1.142.17)
शिष्योऽहं त्वत्प्रसादेन जीवामि द्विजसत्तम । इत्युक्त्वा तु तदा पार्थः पादौ जग्राह पाण्डवः ॥
śiṣyo'haṃ tvatprasādena jīvāmi dvijasattama | ityuktvā tu tadā pārthaḥ pādau jagrāha pāṇḍavaḥ
"मैं आपका शिष्य हूँ; हे द्विजश्रेष्ठ, आपकी कृपा से ही जीता हूँ।" यह कहकर पाण्डुपुत्र पार्थ ने उनके चरण पकड़ लिए।
श्लोक 18 (1.142.18)
ततो द्रोणः पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च । ग्राहयामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान् ॥
tato droṇaḥ pāṇḍuputrānastrāṇi vividhāni ca | grāhayāmāsa divyāni mānuṣāṇi ca vīryavān
तब पराक्रमी द्रोण ने पाण्डुपुत्रों को दिव्य और मानुष, अनेक प्रकार के अस्त्र सिखाए।
श्लोक 19 (1.142.19)
राजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ । अभिजग्मुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम् ॥
rājaputrāstathā cānye sametya bharatarṣabha | abhijagmustato droṇamastrārthe dvijasattamam
हे भरतश्रेष्ठ, दूसरे राजकुमार भी एकत्र होकर अस्त्रविद्या सीखने के लिए द्विजश्रेष्ठ द्रोण के पास आए—
श्लोक 20 (1.142.20)
वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः । सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात्तदा ॥
vṛṣṇayaścāndhakāścaiva nānādeśyāśca pārthivāḥ | sūtaputraśca rādheyo guruṃ droṇamiyāttadā
वृष्णि और अन्धक, तथा नाना देशों के राजा; और सूतपुत्र राधेय (कर्ण) भी तब गुरु द्रोण के पास आया।
श्लोक 21 (1.142.21)
स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्षणः । दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान् ॥
spardhamānastu pārthena sūtaputro'tyamarṣaṇaḥ | duryodhanaṃ samāśritya so'vamanyata pāṇḍavān
पार्थ से होड़ रखने वाला, अत्यन्त असहिष्णु सूतपुत्र दुर्योधन का आश्रय लेकर पाण्डवों का अनादर करता था।
श्लोक 22 (1.142.22)
अभ्ययात्स ततो द्रोणं धनुर्वेदचिकीर्षया । शिक्षाभुजबलोद्योगैस्तेषु सर्वेषु पाण्डवः ॥
abhyayātsa tato droṇaṃ dhanurvedacikīrṣayā | śikṣābhujabalodyogaisteṣu sarveṣu pāṇḍavaḥ
वह भी तब धनुर्वेद सीखने की इच्छा से द्रोण के पास पहुँचा। शिक्षा, भुजबल और उद्यम में उन सबमें पाण्डुपुत्र
श्लोक 23 (1.142.23)
अस्त्रविद्यानुरागाच्च विशिष्टोऽभवदर्जुनः । तुल्येष्वस्त्रप्रयोगेषु लाघवे सौष्टवेषु च ॥
astravidyānurāgācca viśiṣṭo'bhavadarjunaḥ | tulyeṣvastraprayogeṣu lāghave sauṣṭaveṣu ca
अर्जुन अस्त्रविद्या के प्रति अपने अनुराग के कारण सबसे आगे रहे। अस्त्रों की शिक्षा समान होने पर भी फुर्ती और कौशल में
श्लोक 24 (1.142.24)
सर्वेषामेव शिष्याणां बभूवाभ्यधिकोऽर्जुनः । ऐन्द्रिमप्रतिमं द्रोण उपदेशेष्वमन्यत ॥
sarveṣāmeva śiṣyāṇāṃ babhūvābhyadhiko'rjunaḥ | aindrimapratimaṃ droṇa upadeśeṣvamanyata
अर्जुन सब शिष्यों से बढ़कर निकले। द्रोण ने इन्द्रपुत्र को उपदेश ग्रहण करने में अद्वितीय माना।
श्लोक 25 (1.142.25)
एवं सर्वकुमाराणामिष्वस्त्रं प्रत्यपादयत् । कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छच्चिरकारणात् ॥
evaṃ sarvakumārāṇāmiṣvastraṃ pratyapādayat | kamaṇḍaluṃ ca sarveṣāṃ prāyacchaccirakāraṇāt
इस प्रकार उन्होंने सभी राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाई। सबको उन्होंने कमण्डलु दिया, ताकि उसे भरने में उन्हें देर लगे;
श्लोक 26 (1.142.26)
पुत्राय च ददौ कुम्भमविलम्बनकारणात् । यावत्ते नोपगच्छन्ति तावदस्मै परां क्रियाम् ॥
putrāya ca dadau kumbhamavilambanakāraṇāt | yāvatte nopagacchanti tāvadasmai parāṃ kriyām
पर अपने पुत्र को उन्होंने चौड़े मुँह का घड़ा दिया, ताकि उसे देर न हो। जब तक दूसरे लौटकर न आते, तब तक
श्लोक 27 (1.142.27)
द्रोण आचष्ट पुत्राय कर्म तज्जिष्णुरौहत । ततः स वारुणास्त्रेण पूरयित्वा कमण्डलुम् ॥
droṇa ācaṣṭa putrāya karma tajjiṣṇurauhata | tataḥ sa vāruṇāstreṇa pūrayitvā kamaṇḍalum
द्रोण अपने पुत्र को कोई उत्तम विद्या बता देते। जिष्णु (अर्जुन) ने यह बात भाँप ली। तब वे वारुणास्त्र से अपना कमण्डलु भरकर
श्लोक 28 (1.142.28)
सममाचार्यपुत्रेण गुरुमभ्येति फाल्गुनः । आचार्यपुत्रात्तस्मात्तु विशेषोपचयेऽपृथक् ॥
samamācāryaputreṇa gurumabhyeti phālgunaḥ | ācāryaputrāttasmāttu viśeṣopacaye'pṛthak
आचार्यपुत्र के साथ ही गुरु के पास पहुँच जाते। विशेष विद्या के अर्जन में उस आचार्यपुत्र से कभी अलग न रहकर
श्लोक 29 (1.142.29)
न व्यहीयत मेधावी पार्थोऽप्यस्त्रविदां वरः । अर्जुनः परमं यत्नमातिष्ठद्गुरुपूजने ॥
na vyahīyata medhāvī pārtho'pyastravidāṃ varaḥ | arjunaḥ paramaṃ yatnamātiṣṭhadgurupūjane
शस्त्रज्ञों में श्रेष्ठ, मेधावी पार्थ उससे कभी पीछे नहीं रहे। अर्जुन ने गुरु की सेवा में परम प्रयत्न किया
श्लोक 30 (1.142.30)
अस्त्रे च परमं योगं प्रियो द्रोणस्य चाभवत् । तं दृष्ट्वा नित्यमुद्युक्तमिष्वस्त्रं प्रति फाल्गुनम् ॥
astre ca paramaṃ yogaṃ priyo droṇasya cābhavat | taṃ dṛṣṭvā nityamudyuktamiṣvastraṃ prati phālgunam
और अस्त्रविद्या में परम एकाग्रता रखी, जिससे वे द्रोण के प्रिय हो गए। फाल्गुन को धनुर्विद्या के लिए सदा उद्यत देखकर
श्लोक 31 (1.142.31)
आहूय वचनं द्रोणो रहः सूदमभाषत । अन्धकारेऽर्जुनायान्नं न देयं ते कदाचन । न चाख्येयमिदं चापि मद्वाक्यं विजये त्वया ॥
āhūya vacanaṃ droṇo rahaḥ sūdamabhāṣata | andhakāre'rjunāyānnaṃ na deyaṃ te kadācana | na cākhyeyamidaṃ cāpi madvākyaṃ vijaye tvayā
द्रोण ने रसोइए को बुलाकर एकान्त में कहा— "तुम अर्जुन को अँधेरे में कभी भोजन न परोसना। और मेरी यह बात विजय (अर्जुन) से भी मत कहना।"
श्लोक 32 (1.142.32)
ततः कदाचिद्भुञ्जाने प्रववौ वायुरर्जुने । तेन तत्र प्रदीपः स दीप्यमानो विलोपितः ॥
tataḥ kadācidbhuñjāne pravavau vāyurarjune | tena tatra pradīpaḥ sa dīpyamāno vilopitaḥ
फिर एक दिन जब अर्जुन भोजन कर रहे थे, तब हवा चली और वहाँ जलता हुआ दीपक बुझ गया।
श्लोक 33 (1.142.33)
भुक्त एव तु कौन्तेयो नास्यादन्यत्र वर्तते । हस्तस्तेजस्विनस्तस्य अनुग्रहणकारणात् ॥
bhukta eva tu kaunteyo nāsyādanyatra vartate | hastastejasvinastasya anugrahaṇakāraṇāt
फिर भी भोजन करते समय उन तेजस्वी कुन्तीपुत्र का हाथ अभ्यास के कारण मुख के सिवा और कहीं नहीं गया।
श्लोक 34 (1.142.34)
तदभ्यासकृतं मत्वा रात्रावपि स पाण्डवः । योग्यां चक्रे महाबाहुर्धनुषा पाण्डुनन्दनः ॥
tadabhyāsakṛtaṃ matvā rātrāvapi sa pāṇḍavaḥ | yogyāṃ cakre mahābāhurdhanuṣā pāṇḍunandanaḥ
यह समझकर कि यह अभ्यास का फल है, महाबाहु पाण्डुनन्दन रात में भी धनुष से अभ्यास करने लगे।
श्लोक 35 (1.142.35)
तस्य ज्यातलनिर्घोषं द्रोणः शुश्राव भारत । उपेत्य चैनमुत्थाय परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥
tasya jyātalanirghoṣaṃ droṇaḥ śuśrāva bhārata | upetya cainamutthāya pariṣvajyedamabravīt
हे भारत, द्रोण ने उनकी प्रत्यंचा की टंकार सुनी। वे उठे, उनके पास गए और उन्हें गले लगाकर बोले—
द्रोण उवाच
श्लोक 36 (1.142.36)
प्रयतिष्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः । त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
prayatiṣye tathā kartuṃ yathā nānyo dhanurdharaḥ | tvatsamo bhavitā loke satyametadbravīmi te
"मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि संसार में कोई दूसरा धनुर्धर तुम्हारे समान न हो। यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 37 (1.142.37)
ततो द्रोणोऽर्जुनं भूयो हयेषु च गजेषु च । रथेषु भूमावपि च रणशिक्षामशिक्षयत् ॥
tato droṇo'rjunaṃ bhūyo hayeṣu ca gajeṣu ca | ratheṣu bhūmāvapi ca raṇaśikṣāmaśikṣayat
तब द्रोण ने अर्जुन को घोड़ों, हाथियों और रथों पर तथा भूमि पर भी युद्ध की शिक्षा दी।
श्लोक 38 (1.142.38)
गदायुद्धेऽसिचर्यायां तोमरप्रासशक्तिषु । द्रोणः संकीर्णयुद्धे च शिक्षयामास कौरवान् ॥
gadāyuddhe'sicaryāyāṃ tomaraprāsaśaktiṣu | droṇaḥ saṃkīrṇayuddhe ca śikṣayāmāsa kauravān
गदायुद्ध और खड्ग-संचालन में, तोमर, प्रास और शक्ति के प्रयोग में, तथा संकुल युद्ध में द्रोण ने कौरवों को शिक्षा दी।
श्लोक 39 (1.142.39)
तस्य तत्कौशलं श्रुत्वा धनुर्वेदजिघृक्षवः । राजानो राजपुत्राश्च समाजग्मुः सहस्रशः ॥
tasya tatkauśalaṃ śrutvā dhanurvedajighṛkṣavaḥ | rājāno rājaputrāśca samājagmuḥ sahasraśaḥ
उनके कौशल की ख्याति सुनकर धनुर्वेद सीखने के इच्छुक राजा और राजकुमार हज़ारों की संख्या में वहाँ आ जुटे।
श्लोक 40 (1.142.40)
तान्सर्वाञ्शिक्षयामास द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः । एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह ॥
tānsarvāñśikṣayāmāsa droṇaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | tato niṣādarājasya hiraṇyadhanuṣaḥ sutaḥ | ekalavyo mahārāja droṇamabhyājagāma ha
शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोण ने उन सबको शिक्षा दी। तब हे महाराज, निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य द्रोण के पास आया।
श्लोक 41 (1.142.41)
न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन् । शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया ॥
na sa taṃ pratijagrāha naiṣādiriti cintayan | śiṣyaṃ dhanuṣi dharmajñasteṣāmevānvavekṣayā
पर धर्मज्ञ द्रोण ने "यह निषाद है" यह सोचकर, और उन्हीं राजकुमारों का ध्यान रखते हुए, उसे धनुर्विद्या का शिष्य स्वीकार नहीं किया।
द्रोण उवाच
श्लोक 42 (1.142.42)
शिष्योऽसि मम नैषादे प्रयोगे बलवत्तरः । निवर्तस्व गृहानेव अनुज्ञातोऽसि नित्यशः ॥
śiṣyo'si mama naiṣāde prayoge balavattaraḥ | nivartasva gṛhāneva anujñāto'si nityaśaḥ
"हे निषादपुत्र, तुम मेरे शिष्य हो; अभ्यास में ही अधिक बल है। अपने घर लौट जाओ; तुम्हें मेरी सदा के लिए अनुमति है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 43 (1.142.43)
स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परन्तपः । अरण्यमनुसंप्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम् ॥
sa tu droṇasya śirasā pādau gṛhya parantapaḥ | araṇyamanusaṃprāpya kṛtvā droṇaṃ mahīmayam
उस शत्रुतापी ने सिर झुकाकर द्रोण के चरण छुए और वन में चला गया। वहाँ उसने मिट्टी की द्रोण-प्रतिमा बनाई
श्लोक 44 (1.142.44)
तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा । इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः ॥
tasminnācāryavṛttiṃ ca paramāmāsthitastadā | iṣvastre yogamātasthe paraṃ niyamamāsthitaḥ
और उसमें परम आचार्य-भाव रखते हुए, कठोर नियम का पालन करते हुए वह एकाग्र होकर धनुर्विद्या के अभ्यास में लग गया।
श्लोक 45 (1.142.45)
परया श्रद्धयोपेतो योगेन परमेण च । विमोक्षादानसन्धाने लघुत्वं परमाप सः ॥
parayā śraddhayopeto yogena parameṇa ca | vimokṣādānasandhāne laghutvaṃ paramāpa saḥ
परम श्रद्धा और परम एकाग्रता से युक्त होकर उसने बाण निकालने, चढ़ाने और छोड़ने में बड़ी फुर्ती प्राप्त कर ली।
श्लोक 46 (1.142.46)
लाघवं चास्त्रयोगं च नचिरात्प्रत्यपद्यत । अथ द्रोणाभ्यनुज्ञाताः कदाचित्कुरुपाण्डवाः । रथैर्विनिर्ययुः सर्वे मृगयामरिमर्दनाः ॥
lāghavaṃ cāstrayogaṃ ca nacirātpratyapadyata | atha droṇābhyanujñātāḥ kadācitkurupāṇḍavāḥ | rathairviniryayuḥ sarve mṛgayāmarimardanāḥ
शीघ्र ही उसने हाथ की फुर्ती और अस्त्र-प्रयोग पर अधिकार पा लिया। फिर एक दिन द्रोण की अनुमति से शत्रुओं का मर्दन करने वाले सभी कौरव और पाण्डव रथों पर सवार होकर शिकार के लिए निकले।
श्लोक 47 (1.142.47)
तत्रोपकरणं गृह्य नरः कश्चिद्यदृच्छया । राजन्ननुजगामैकः श्वानमादाय पाण्डवान् ॥
tatropakaraṇaṃ gṛhya naraḥ kaścidyadṛcchayā | rājannanujagāmaikaḥ śvānamādāya pāṇḍavān
हे राजन्, संयोग से एक व्यक्ति साज-सामान लेकर और एक कुत्ते को साथ लिए अकेला पाण्डवों के पीछे-पीछे चल पड़ा।
श्लोक 48 (1.142.48)
तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्मचिकीर्षया । श्वाचरन्स पथा क्रीडन्नैषादिं प्रति जग्मिवान् ॥
teṣāṃ vicaratāṃ tatra tattatkarmacikīrṣayā | śvācaransa pathā krīḍannaiṣādiṃ prati jagmivān
जब वे वहाँ अपने-अपने कार्य में लगे घूम रहे थे, तब वह कुत्ता रास्ते में खेलता हुआ भटककर निषादपुत्र के पास जा पहुँचा।
श्लोक 49 (1.142.49)
स कृष्णमलदिग्धाङ्गं कृष्णाजिनजटाधरम् । नैषादिं श्वा समालक्ष्य भषंस्तस्थौ तदन्तिके ॥
sa kṛṣṇamaladigdhāṅgaṃ kṛṣṇājinajaṭādharam | naiṣādiṃ śvā samālakṣya bhaṣaṃstasthau tadantike
काले रंग के, मैल से सने अंगों वाले, काला मृगचर्म और जटाएँ धारण किए निषादपुत्र को देखकर वह कुत्ता उसके पास खड़ा होकर भौंकने लगा।
श्लोक 50 (1.142.50)
तदा तस्याथ भषतः शुनः सप्त शरान्मुखे । लाघवं दर्शयन्नस्त्रे मुमोच युगपद्यथा ॥
tadā tasyātha bhaṣataḥ śunaḥ sapta śarānmukhe | lāghavaṃ darśayannastre mumoca yugapadyathā
तब उस भौंकते हुए कुत्ते के मुँह में निषादपुत्र ने अपनी अस्त्र-फुर्ती दिखाते हुए मानो एक साथ सात बाण छोड़ दिए।
श्लोक 51 (1.142.51)
स तु श्वा शरपूर्णास्यः पाण्डवानाजगाम ह । तं दृष्ट्वा पाण्डवा वीराः परं विस्मयमागताः ॥
sa tu śvā śarapūrṇāsyaḥ pāṇḍavānājagāma ha | taṃ dṛṣṭvā pāṇḍavā vīrāḥ paraṃ vismayamāgatāḥ
बाणों से भरे मुँह वाला वह कुत्ता पाण्डवों के पास लौट आया। उसे देखकर वीर पाण्डव अत्यन्त विस्मित हुए।
श्लोक 52 (1.142.52)
लाघवं शब्दवेधित्वं दृष्ट्वा तत्परमं तदा । प्रेक्ष्य तं व्रीडिताश्चासन्प्रशशंसुश्च सर्वशः ॥
lāghavaṃ śabdavedhitvaṃ dṛṣṭvā tatparamaṃ tadā | prekṣya taṃ vrīḍitāścāsanpraśaśaṃsuśca sarvaśaḥ
वह परम फुर्ती और केवल शब्द सुनकर लक्ष्य भेदने की कला देखकर वे लज्जित हुए और हर प्रकार से उस धनुर्धर की प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 53 (1.142.53)
तं ततोऽन्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम् । ददृशुः पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान् ॥
taṃ tato'nveṣamāṇāste vane vananivāsinam | dadṛśuḥ pāṇḍavā rājannasyantamaniśaṃ śarān
फिर उस वनवासी को वन में खोजते हुए, हे राजन्, पाण्डवों ने उसे निरन्तर बाण चलाते हुए देखा।
श्लोक 54 (1.142.54)
न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम् । तथैनं परिपप्रच्छुः को भवान्कस्य वेत्युत ॥
na cainamabhyajānaṃste tadā vikṛtadarśanam | tathainaṃ paripapracchuḥ ko bhavānkasya vetyuta
उसका रूप इतना विचित्र था कि वे उसे पहचान न सके, इसलिए उन्होंने उससे पूछा— "आप कौन हैं, और किसके पुत्र हैं?"
एकलव्य उवाच
श्लोक 55 (1.142.55)
निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुषः सुतम् । द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम् ॥
niṣādādhipatervīrā hiraṇyadhanuṣaḥ sutam | droṇaśiṣyaṃ ca māṃ vitta dhanurvedakṛtaśramam
"हे वीरो, मुझे निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र, द्रोण का शिष्य और धनुर्वेद में परिश्रम करने वाला जानो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 56 (1.142.56)
ते तमाज्ञाय तत्त्वेन पुनरागम्य पाण्डवाः । यथा वृत्तं वने सर्वं द्रोणायाचख्युरद्भुतम् ॥
te tamājñāya tattvena punarāgamya pāṇḍavāḥ | yathā vṛttaṃ vane sarvaṃ droṇāyācakhyuradbhutam
उसका सच्चा परिचय जानकर पाण्डव लौट आए और वन में जो अद्भुत घटना हुई थी, वह सब द्रोण को कह सुनाई।
श्लोक 57 (1.142.57)
कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन् । रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत् ॥
kaunteyastvarjuno rājannekalavyamanusmaran | raho droṇaṃ samāsādya praṇayādidamabravīt
पर हे राजन्, कुन्तीपुत्र अर्जुन एकलव्य को ही याद करते रहे। उन्होंने एकान्त में द्रोण के पास जाकर प्रेमपूर्वक कहा—
अर्जुन उवाच
श्लोक 58 (1.142.58)
नन्वहं परिरभ्यैकः प्रीतिपूर्वमिदं वचः । भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्विशिष्टो भविष्यति ॥
nanvahaṃ parirabhyaikaḥ prītipūrvamidaṃ vacaḥ | bhavatokto na me śiṣyastvadviśiṣṭo bhaviṣyati
"क्या आपने एक बार मुझे अकेले में गले लगाकर प्रेम से यह नहीं कहा था कि मेरा कोई भी शिष्य तुमसे बढ़कर नहीं होगा?
श्लोक 59 (1.142.59)
अथ कस्मान्मद्विशिष्टो लोकादपि च वीर्यवान् । अन्योऽस्ति भवतः शिष्यो निषादाधिपतेः सुतः ॥
atha kasmānmadviśiṣṭo lokādapi ca vīryavān | anyo'sti bhavataḥ śiṣyo niṣādādhipateḥ sutaḥ
"तो फिर आपका एक और शिष्य, निषादराज का पुत्र, मुझसे बढ़कर और संसार में सबसे अधिक पराक्रमी कैसे है?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 60 (1.142.60)
मुहूर्तमिव तं द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्चयम् । सव्यसाचिनमादाय नैषादिं प्रति जग्मिवान् ॥
muhūrtamiva taṃ droṇaścintayitvā viniścayam | savyasācinamādāya naiṣādiṃ prati jagmivān
द्रोण ने क्षण भर सोचकर निश्चय किया और सव्यसाची को साथ लेकर निषादपुत्र के पास गए।
श्लोक 61 (1.142.61)
ददर्श मलदिग्धाङ्गं जटिलं चीरवाससम् । एकलव्यं धनुष्पाणिमस्यन्तमनिशं शरान् ॥
dadarśa maladigdhāṅgaṃ jaṭilaṃ cīravāsasam | ekalavyaṃ dhanuṣpāṇimasyantamaniśaṃ śarān
उन्होंने मैल से सने शरीर वाले, जटाधारी, चीर-वस्त्र पहने, हाथ में धनुष लिए निरन्तर बाण चलाते हुए एकलव्य को देखा।
श्लोक 62 (1.142.62)
एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमायान्तमन्तिकात् । अभिगम्योपसंगृह्य जगाम शिरसा महीम् ॥
ekalavyastu taṃ dṛṣṭvā droṇamāyāntamantikāt | abhigamyopasaṃgṛhya jagāma śirasā mahīm
द्रोण को निकट आते देखकर एकलव्य आगे बढ़ा, उनके चरण पकड़े और सिर से धरती को छुआ।
श्लोक 63 (1.142.63)
पूजयित्वा ततो द्रोणं विधिवत्स निषादजः । निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः ॥
pūjayitvā tato droṇaṃ vidhivatsa niṣādajaḥ | nivedya śiṣyamātmānaṃ tasthau prāñjaliragrataḥ
निषादपुत्र ने विधिपूर्वक द्रोण की पूजा की, स्वयं को उनका शिष्य बताया और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया।
श्लोक 64 (1.142.64)
ततो द्रोणोऽब्रवीद्राजन्नेकलव्यमिदं वचः । यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम ॥
tato droṇo'bravīdrājannekalavyamidaṃ vacaḥ | yadi śiṣyo'si me vīra vetanaṃ dīyatāṃ mama
तब हे राजन्, द्रोण ने एकलव्य से कहा— "हे वीर, यदि तुम मेरे शिष्य हो, तो मुझे मेरी गुरुदक्षिणा दो।"
श्लोक 65 (1.142.65)
एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीयमाणोऽब्रवीदिदम् । किं प्रयच्छामि भगवन्नाज्ञापयतु मां गुरुः ॥
ekalavyastu tacchrutvā prīyamāṇo'bravīdidam | kiṃ prayacchāmi bhagavannājñāpayatu māṃ guruḥ
यह सुनकर एकलव्य ने प्रसन्न होकर कहा— "भगवन्, मैं क्या दूँ? गुरुदेव मुझे आज्ञा दें।
श्लोक 66 (1.142.66)
न हि किंचिददेयं मे गुरवे ब्रह्मवित्तम । तमब्रवीत्त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति ॥
na hi kiṃcidadeyaṃ me gurave brahmavittama | tamabravīttvayāṅguṣṭho dakṣiṇo dīyatāmiti
"हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, गुरु के लिए मेरे पास कुछ भी अदेय नहीं है।" द्रोण ने उससे कहा— "अपना दाहिना अँगूठा दे दो।"
श्लोक 67 (1.142.67)
एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम् । प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्सत्ये च नियतः सदा ॥
ekalavyastu tacchrutvā vaco droṇasya dāruṇam | pratijñāmātmano rakṣansatye ca niyataḥ sadā
द्रोण के ये कठोर वचन सुनकर अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करने वाले और सदा सत्य में अडिग एकलव्य ने
श्लोक 68 (1.142.68)
तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः । छित्त्वाऽविचार्य तं प्रादाद्द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः ॥
tathaiva hṛṣṭavadanastathaivādīnamānasaḥ | chittvā'vicārya taṃ prādāddroṇāyāṅguṣṭhamātmanaḥ
पहले जैसे ही प्रसन्न मुख और अदीन मन से, बिना कुछ सोचे अपना अँगूठा काटकर द्रोण को दे दिया।
श्लोक 69 (1.142.69)
ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत । न तथा च स शीघ्रोऽभूद्यथा पूर्वं नराधिप ॥
tataḥ śaraṃ tu naiṣādiraṅgulībhirvyakarṣata | na tathā ca sa śīghro'bhūdyathā pūrvaṃ narādhipa
उसके बाद निषादपुत्र उँगलियों से बाण खींचने लगा, पर हे नरेश्वर, वह पहले जैसा शीघ्र नहीं रहा।
श्लोक 70 (1.142.70)
ततोऽर्जुनः प्रीतमना बभूव विगतज्वरः । द्रोणश्च सत्यवागासीन्नान्योऽभिभविताऽर्जुनम् ॥
tato'rjunaḥ prītamanā babhūva vigatajvaraḥ | droṇaśca satyavāgāsīnnānyo'bhibhavitā'rjunam
तब अर्जुन प्रसन्नचित्त और चिन्तामुक्त हो गए; और द्रोण का यह वचन भी सत्य हुआ कि अर्जुन को कोई दूसरा नहीं पछाड़ सकेगा।
श्लोक 71 (1.142.71)
द्रोणस्य तु तदा शिष्यौ गदायोग्यौ बभूवतुः । दुर्योधनश्च भीमश्च सदा संरब्धमानसौ ॥
droṇasya tu tadā śiṣyau gadāyogyau babhūvatuḥ | duryodhanaśca bhīmaśca sadā saṃrabdhamānasau
द्रोण के दो शिष्य, दुर्योधन और भीम, जिनके मन सदा क्रोध से भरे रहते थे, गदायुद्ध में निपुण हुए।
श्लोक 72 (1.142.72)
अश्वत्थामा रहस्येषु सर्वेष्वभ्यधिकोऽभवत् । तथाऽतिपुरुषानन्यान्त्सारुकौ यमजावुभौ ॥
aśvatthāmā rahasyeṣu sarveṣvabhyadhiko'bhavat | tathā'tipuruṣānanyāntsārukau yamajāvubhau
अश्वत्थामा अस्त्रों के रहस्यों में सबसे बढ़कर हुए; दोनों जुड़वाँ भाई खड्गयुद्ध में दूसरों से आगे निकल गए;
श्लोक 73 (1.142.73)
युधिष्ठिरो रथश्रेष्ठः सर्वत्र तु धनञ्जयः । प्रथितः सागरान्तायां रथयूथपयूथपः ॥
yudhiṣṭhiro rathaśreṣṭhaḥ sarvatra tu dhanañjayaḥ | prathitaḥ sāgarāntāyāṃ rathayūthapayūthapaḥ
युधिष्ठिर श्रेष्ठ रथी हुए; पर धनंजय सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ थे—समुद्र तक फैली पृथ्वी पर विख्यात, रथ-सेनापतियों के भी नायक।
श्लोक 74 (1.142.74)
बुद्धियोगबलोत्साहः सर्वास्त्रेषु च निष्ठितः । अस्त्रे गुर्वनुरागे च विशिष्टोऽभवदर्जुनः ॥
buddhiyogabalotsāhaḥ sarvāstreṣu ca niṣṭhitaḥ | astre gurvanurāge ca viśiṣṭo'bhavadarjunaḥ
बुद्धि, एकाग्रता, बल और उत्साह से सम्पन्न, सभी अस्त्रों में पारंगत अर्जुन अस्त्रविद्या और गुरुभक्ति, दोनों में सबसे विशिष्ट हुए।
श्लोक 75 (1.142.75)
तुल्येष्वस्त्रोपदेशेषु सौष्ठवेन च वीर्यवान् । एकः सर्वकुमाराणां बभूवातिरथोऽर्जुनः ॥
tulyeṣvastropadeśeṣu sauṣṭhavena ca vīryavān | ekaḥ sarvakumārāṇāṃ babhūvātiratho'rjunaḥ
अस्त्रों की शिक्षा सबको समान मिलने पर भी, अपने कौशल के बल पर पराक्रमी अर्जुन सब राजकुमारों में एकमात्र अतिरथी बने।
श्लोक 76 (1.142.76)
प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनञ्जयम् । धार्तराष्ट्रा दुरात्मानो नामृष्यन्त परस्परम् ॥
prāṇādhikaṃ bhīmasenaṃ kṛtavidyaṃ dhanañjayam | dhārtarāṣṭrā durātmāno nāmṛṣyanta parasparam
बल में सबसे बढ़कर भीमसेन और विद्या में निपुण धनंजय को दुष्टात्मा धृतराष्ट्रपुत्र सहन नहीं कर पाते थे, और दोनों पक्ष एक-दूसरे को सह न सके।
श्लोक 77 (1.142.77)
तांस्तु सर्वान्समानीय सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान् । द्रोणः प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुषर्षभः ॥
tāṃstu sarvānsamānīya sarvavidyāstraśikṣitān | droṇaḥ praharaṇajñāne jijñāsuḥ puruṣarṣabhaḥ
सभी विद्याओं और अस्त्रों में शिक्षित उन सबको एकत्र करके पुरुषश्रेष्ठ द्रोण ने उनके शस्त्रज्ञान की परीक्षा लेनी चाही।
श्लोक 78 (1.142.78)
कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभिः कृतम् । अविज्ञातं कुमाराणां लक्ष्यभूतमुपादिशत् ॥
kṛtrimaṃ bhāsamāropya vṛkṣāgre śilpibhiḥ kṛtam | avijñātaṃ kumārāṇāṃ lakṣyabhūtamupādiśat
उन्होंने शिल्पियों से एक कृत्रिम भास पक्षी बनवाया, राजकुमारों को बताए बिना उसे पेड़ की चोटी पर रखवाया और उसे लक्ष्य के रूप में दिखाया।
द्रोण उवाच
श्लोक 79 (1.142.79)
शीघ्रं भवन्तः सर्वेऽपि धनूंष्यादाय सर्वशः । भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठध्वं सन्धितेषवः ॥
śīghraṃ bhavantaḥ sarve'pi dhanūṃṣyādāya sarvaśaḥ | bhāsametaṃ samuddiśya tiṣṭhadhvaṃ sandhiteṣavaḥ
"तुम सब शीघ्र अपने-अपने धनुष उठाओ और बाण चढ़ाकर इस पक्षी को निशाना बनाते हुए खड़े हो जाओ।
श्लोक 80 (1.142.80)
मद्वाक्यसमकालं तु शिरोऽस्य विनिपात्यताम् । एकैकशो नियोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रकाः ॥
madvākyasamakālaṃ tu śiro'sya vinipātyatām | ekaikaśo niyokṣyāmi tathā kuruta putrakāḥ
"मेरे कहते ही इसका सिर काटकर गिरा देना। मैं एक-एक करके तुम्हें आदेश दूँगा; हे पुत्रो, वैसा ही करना।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 81 (1.142.81)
ततो युधिष्ठिरं पूर्वमुवाचाङ्गिरसां वरः । संधत्स्व बाणं दुर्धर्ष मद्वाक्यान्ते विमुञ्च तम् ॥
tato yudhiṣṭhiraṃ pūrvamuvācāṅgirasāṃ varaḥ | saṃdhatsva bāṇaṃ durdharṣa madvākyānte vimuñca tam
तब अंगिरा-वंशियों में श्रेष्ठ द्रोण ने पहले युधिष्ठिर से कहा— "हे दुर्धर्ष, बाण चढ़ाओ और मेरी बात पूरी होते ही उसे छोड़ देना।"
श्लोक 82 (1.142.82)
ततो युधिष्ठिरः पूर्वं धनुर्गृह्य परन्तपः । तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ॥
tato yudhiṣṭhiraḥ pūrvaṃ dhanurgṛhya parantapaḥ | tasthau bhāsaṃ samuddiśya guruvākyapracoditaḥ
तब परन्तप युधिष्ठिर सबसे पहले धनुष लेकर गुरु की आज्ञा के अनुसार उस पक्षी को लक्ष्य बनाकर खड़े हो गए।
श्लोक 83 (1.142.83)
ततो विततधन्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम् । स मुहूर्तादुवाचेदं वचनं भरतर्षभ ॥
tato vitatadhanvānaṃ droṇastaṃ kurunandanam | sa muhūrtāduvācedaṃ vacanaṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, जब वे कुरुनन्दन धनुष ताने खड़े थे, तब क्षण भर बाद द्रोण ने उनसे कहा—
श्लोक 84 (1.142.84)
पश्यसि त्वं द्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज । पश्यामीत्येवमाचार्यं प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ॥
paśyasi tvaṃ drumāgrasthaṃ bhāsaṃ naravarātmaja | paśyāmītyevamācāryaṃ pratyuvāca yudhiṣṭhiraḥ
"हे नरश्रेष्ठ के पुत्र, क्या तुम पेड़ की चोटी पर बैठे पक्षी को देख रहे हो?" युधिष्ठिर ने आचार्य को उत्तर दिया— "देख रहा हूँ।"
श्लोक 85 (1.142.85)
स मुहूर्तादिव पुनर्द्रोणस्तं प्रत्यभाषत । अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातॄन्वाऽपि प्रपश्यसि ॥
sa muhūrtādiva punardroṇastaṃ pratyabhāṣata | atha vṛkṣamimaṃ māṃ vā bhrātṝnvā'pi prapaśyasi
क्षण भर बाद द्रोण ने उनसे फिर कहा— "क्या तुम इस वृक्ष को, मुझे और अपने भाइयों को भी देख रहे हो?"
श्लोक 86 (1.142.86)
तमुवाच स कौन्तेयः पश्याम्येनं वनस्पतिम् । भवन्तं च तथा भ्रातॄन्भासं चेति पुनःपुनः ॥
tamuvāca sa kaunteyaḥ paśyāmyenaṃ vanaspatim | bhavantaṃ ca tathā bhrātṝnbhāsaṃ ceti punaḥpunaḥ
कुन्तीपुत्र ने उन्हें बार-बार यही उत्तर दिया— "मैं इस वृक्ष को, आपको, अपने भाइयों को और पक्षी को भी देख रहा हूँ।"
श्लोक 87 (1.142.87)
तमुवाचापसर्पेति द्रोणोऽप्रीतमना इव । नैतच्छक्यं त्वया वेद्धुं लक्ष्यमित्येव कुत्सयन् ॥
tamuvācāpasarpeti droṇo'prītamanā iva | naitacchakyaṃ tvayā veddhuṃ lakṣyamityeva kutsayan
तब द्रोण ने मानो अप्रसन्न होकर उन्हें झिड़कते हुए कहा— "हट जाओ; तुम इस लक्ष्य को नहीं भेद सकते।"
श्लोक 88 (1.142.88)
ततो दुर्योधनादींस्तान्धार्तराष्ट्रान्महायशाः । तेनैव क्रमयोगेन जिज्ञासुः पर्यपृच्छत ॥
tato duryodhanādīṃstāndhārtarāṣṭrānmahāyaśāḥ | tenaiva kramayogena jijñāsuḥ paryapṛcchata
फिर उस यशस्वी आचार्य ने परीक्षा के लिए दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रों से भी उसी क्रम से पूछा,
श्लोक 89 (1.142.89)
अन्यांश्च शिष्यान्भीमादीन्राज्ञश्चैवान्यदेशजान् । यदा च सर्वे तत्सर्वं पश्याम इति कुत्सिताः ॥
anyāṃśca śiṣyānbhīmādīnrājñaścaivānyadeśajān | yadā ca sarve tatsarvaṃ paśyāma iti kutsitāḥ
और भीम आदि अन्य शिष्यों तथा दूसरे देशों के राजकुमारों से भी; और जब सबने कहा, "हम सब कुछ देख रहे हैं", तब उन्हें भी झिड़क दिया गया।