Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 143

अर्जुन का लक्ष्यवेध और ब्रह्मशिर अस्त्र की प्राप्ति

द्रोण की परीक्षा अर्जुन के साथ पूरी होती है: वे कहते हैं कि उन्हें केवल पक्षी का सिर दिखाई देता है, और एक ही बाण से उसे काट गिराते हैं, जिससे द्रोण द्रुपद को पराजित मान लेते हैं। गंगा में स्नान करते समय जब एक ग्राह द्रोण को पकड़ लेता है, तब केवल अर्जुन बाणों से उसके टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं; आँखों पर पट्टी बँधी होने पर भी वे जल में डूबे मिट्टी के शिशु को बेध देते हैं। प्रसन्न होकर द्रोण उन्हें ब्रह्मशिर अस्त्र देते हैं, मनुष्यों पर उसके प्रयोग का निषेध करते हैं और वचन देते हैं कि संसार में कोई धनुर्धर उनके समान नहीं होगा।

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.143.1)

ततो धनञ्जयं द्रोणः स्मयमानोऽभ्यभाषत । त्वयेदानीं प्रहर्तव्यमेतल्लक्ष्यं विलोक्यताम् ॥

tato dhanañjayaṃ droṇaḥ smayamāno'bhyabhāṣata | tvayedānīṃ prahartavyametallakṣyaṃ vilokyatām

तब द्रोण ने मुस्कुराते हुए धनंजय से कहा— "अब तुम्हें प्रहार करना है। इस लक्ष्य को देखो।

द्रोण उवाच

श्लोक 2 (1.143.2)

मद्वाक्यसमकालं ते मोक्तव्योऽत्र भवेच्छरः । वितत्य कार्मुकं पुत्र तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ॥

madvākyasamakālaṃ te moktavyo'tra bhaveccharaḥ | vitatya kārmukaṃ putra tiṣṭha tāvanmuhūrtakam

"मेरे कहते ही तुम्हें इस पर बाण छोड़ना है। हे पुत्र, धनुष तानकर क्षण भर ठहरो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (1.143.3)

एवमुक्तः सव्यसाची मण्डलीकृतकार्मुकः । तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ॥

evamuktaḥ savyasācī maṇḍalīkṛtakārmukaḥ | tasthau bhāsaṃ samuddiśya guruvākyapracoditaḥ

ऐसा कहे जाने पर सव्यसाची धनुष को मण्डलाकार खींचकर गुरु की आज्ञा के अनुसार उस पक्षी को लक्ष्य बनाकर खड़े हो गए।

श्लोक 4 (1.143.4)

मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत । पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि चार्जुन ॥

muhūrtādiva taṃ droṇastathaiva samabhāṣata | paśyasyenaṃ sthitaṃ bhāsaṃ drumaṃ māmapi cārjuna

क्षण भर बाद द्रोण ने उनसे भी उसी प्रकार पूछा— "अर्जुन, क्या तुम वहाँ बैठे पक्षी को, वृक्ष को और मुझे भी देख रहे हो?"

श्लोक 5 (1.143.5)

पश्याम्येकं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत । न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत ॥

paśyāmyekaṃ bhāsamiti droṇaṃ pārtho'bhyabhāṣata | na tu vṛkṣaṃ bhavantaṃ vā paśyāmīti ca bhārata

हे भारत, पार्थ ने द्रोण से कहा— "मैं केवल पक्षी को देख रहा हूँ; न वृक्ष को देख रहा हूँ, न आपको।"

श्लोक 6 (1.143.6)

ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः । प्रत्यभाषत दुर्धर्षः पाण्डवानां महारथम् ॥

tataḥ prītamanā droṇo muhūrtādiva taṃ punaḥ | pratyabhāṣata durdharṣaḥ pāṇḍavānāṃ mahāratham

तब प्रसन्नचित्त होकर दुर्धर्ष द्रोण ने क्षण भर बाद पाण्डवों के उस महारथी से फिर कहा—

श्लोक 7 (1.143.7)

भासं पश्यसि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः । शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ॥

bhāsaṃ paśyasi yadyenaṃ tathā brūhi punarvacaḥ | śiraḥ paśyāmi bhāsasya na gātramiti so'bravīt

"यदि तुम पक्षी को देख रहे हो, तो फिर से बताओ।" अर्जुन बोले— "मैं पक्षी का सिर देख रहा हूँ, उसका शरीर नहीं।"

श्लोक 8 (1.143.8)

अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः । मुञ्चस्वेत्यब्रवीत्पार्थं स मुमोचाविचारयन् ॥

arjunenaivamuktastu droṇo hṛṣṭatanūruhaḥ | muñcasvetyabravītpārthaṃ sa mumocāvicārayan

अर्जुन के ऐसा कहने पर हर्ष से द्रोण के रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने पार्थ से कहा— "छोड़ो!" और पार्थ ने बिना हिचके बाण छोड़ दिया।

श्लोक 9 (1.143.9)

ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन च । शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः ॥

tatastasya nagasthasya kṣureṇa niśitena ca | śira utkṛtya tarasā pātayāmāsa pāṇḍavaḥ

पाण्डुपुत्र ने तीखे क्षुरप्र बाण से वृक्ष पर बैठे उस पक्षी का सिर वेग से काटकर गिरा दिया।

श्लोक 10 (1.143.10)

तस्मिन्कर्मणि संसिद्धे पर्यष्वजत पाण्डवम् । मेने च द्रुपदं सङ्ख्ये सानुबन्धं पराजितम् ॥

tasminkarmaṇi saṃsiddhe paryaṣvajata pāṇḍavam | mene ca drupadaṃ saṅkhye sānubandhaṃ parājitam

यह कार्य सिद्ध होने पर द्रोण ने पाण्डुपुत्र को गले लगा लिया और मान लिया कि द्रुपद युद्ध में अपने बन्धु-बान्धवों सहित पराजित हो चुका है।

श्लोक 11 (1.143.11)

कस्य चित्त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः । जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ ॥

kasya cittvatha kālasya saśiṣyo'ṅgirasāṃ varaḥ | jagāma gaṅgāmabhito majjituṃ bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, कुछ समय बाद अंगिरा-वंशियों में श्रेष्ठ द्रोण अपने शिष्यों के साथ स्नान करने गंगा पर गए।

श्लोक 12 (1.143.12)

अवगाढमथो द्रोणं सलिले सलिलेचरः । ग्राहो जग्राह बलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः ॥

avagāḍhamatho droṇaṃ salile salilecaraḥ | grāho jagrāha balavāñjaṅghānte kālacoditaḥ

जब द्रोण जल में उतरे, तब वहाँ रहने वाले एक बलवान ग्राह ने काल से प्रेरित होकर उनकी पिंडली पकड़ ली।

श्लोक 13 (1.143.13)

स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान्सर्वानचोदयत् । ग्राहं हत्वा तु मोक्ष्यध्वं मामिति त्वरयन्निव ॥

sa samartho'pi mokṣāya śiṣyānsarvānacodayat | grāhaṃ hatvā tu mokṣyadhvaṃ māmiti tvarayanniva

स्वयं छूटने में समर्थ होते हुए भी उन्होंने मानो जल्दी मचाते हुए अपने सब शिष्यों से कहा— "ग्राह को मारकर मुझे छुड़ाओ!"

श्लोक 14 (1.143.14)

तद्वाक्यसमकालं तु बीभत्सुर्निशितैः शरैः । अवार्यैः पञ्चभिर्ग्राहं मग्नमम्भस्यताडयत् ॥

tadvākyasamakālaṃ tu bībhatsurniśitaiḥ śaraiḥ | avāryaiḥ pañcabhirgrāhaṃ magnamambhasyatāḍayat

उनके कहते ही बीभत्सु (अर्जुन) ने जल में डूबे उस ग्राह पर पाँच तीखे, अमोघ बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 15 (1.143.15)

इतरे त्वथ संमूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे । तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् ॥

itare tvatha saṃmūḍhāstatra tatra prapedire | taṃ tu dṛṣṭvā kriyopetaṃ droṇo'manyata pāṇḍavam

दूसरे शिष्य घबराकर इधर-उधर खड़े रह गए। पाण्डुपुत्र को इस प्रकार कर्म में तत्पर देखकर द्रोण ने उन्हें

श्लोक 16 (1.143.16)

विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत्तदा । स पार्थबाणैर्बहुधा खण्डशः परिकल्पितः ॥

viśiṣṭaṃ sarvaśiṣyebhyaḥ prītimāṃścābhavattadā | sa pārthabāṇairbahudhā khaṇḍaśaḥ parikalpitaḥ

सब शिष्यों में श्रेष्ठ माना और वे उनसे बहुत प्रसन्न हुए। पार्थ के बाणों से टुकड़े-टुकड़े हुआ वह ग्राह

श्लोक 17 (1.143.17)

ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः । सर्वक्रियाभ्यनुज्ञानात्तथा शिष्यान्समानयत् ॥

grāhaḥ pañcatvamāpede jaṅghāṃ tyaktvā mahātmanaḥ | sarvakriyābhyanujñānāttathā śiṣyānsamānayat

महात्मा द्रोण की पिंडली छोड़कर मर गया। फिर सब प्रकार की क्रियाओं की परख के लिए द्रोण ने अपने शिष्यों को एकत्र किया—

श्लोक 18 (1.143.18)

दुर्योधनं चित्रसेनं दुःशासनविविंशती । अर्जुनं च समानीय ह्यश्वत्थामानमेव च ॥

duryodhanaṃ citrasenaṃ duḥśāsanaviviṃśatī | arjunaṃ ca samānīya hyaśvatthāmānameva ca

दुर्योधन, चित्रसेन, दुःशासन और विविंशति को; और अर्जुन तथा अश्वत्थामा को भी बुलाकर

श्लोक 19 (1.143.19)

शिशुकं मृण्मयं कृत्वा द्रोणो गङ्गाजले ततः । शिष्याणां पश्यतां चैव क्षिपति स्म महाभुजः ॥

śiśukaṃ mṛṇmayaṃ kṛtvā droṇo gaṅgājale tataḥ | śiṣyāṇāṃ paśyatāṃ caiva kṣipati sma mahābhujaḥ

महाबाहु द्रोण ने मिट्टी का एक शिशु बनाया और शिष्यों के देखते-देखते उसे गंगा के जल में फेंक दिया।

श्लोक 20 (1.143.20)

चक्षुषी वाससा चैव बद्ध्वा प्रादाच्छरासनम् । शिशुकं विध्यतेमं वै जलस्थं बद्धचक्षुषः ॥

cakṣuṣī vāsasā caiva baddhvā prādāccharāsanam | śiśukaṃ vidhyatemaṃ vai jalasthaṃ baddhacakṣuṣaḥ

उन्होंने कपड़े से उनकी आँखें बाँधकर उन्हें धनुष दिया और कहा— "आँखें बँधी रहने पर भी जल में पड़े इस शिशु को बेधो।"

श्लोक 21 (1.143.21)

तत्क्षणेनैव बीभत्सुरावापैर्दशभिर्वशी । पञ्चकैरनुविव्याध मग्नं शिशुकमम्भसि ॥

tatkṣaṇenaiva bībhatsurāvāpairdaśabhirvaśī | pañcakairanuvivyādha magnaṃ śiśukamambhasi

उसी क्षण संयमी बीभत्सु ने पाँच-पाँच बाणों की दस बौछारों से जल में डूबे उस शिशु को बेध दिया।

श्लोक 22 (1.143.22)

ताः स दृष्ट्वा क्रियाः सर्वा द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् । विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत्तदा । तथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् ॥

tāḥ sa dṛṣṭvā kriyāḥ sarvā droṇo'manyata pāṇḍavam | viśiṣṭaṃ sarvaśiṣyebhyaḥ prītimāṃścābhavattadā | tathābravīnmahātmānaṃ bhāradvājo mahāratham

ये सब कर्म देखकर द्रोण ने पाण्डुपुत्र को सब शिष्यों में श्रेष्ठ माना और वे प्रसन्न हुए। तब भरद्वाजपुत्र ने उस महात्मा महारथी से कहा—

द्रोण उवाच

श्लोक 23 (1.143.23)

गृहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् । अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम् ॥

gṛhāṇedaṃ mahābāho viśiṣṭamatidurdharam | astraṃ brahmaśiro nāma saprayoganivartanam

"हे महाबाहु, ब्रह्मशिर नामक यह विशिष्ट और अत्यन्त दुर्धर्ष अस्त्र, इसके प्रयोग और लौटाने की विधि सहित, ग्रहण करो।

श्लोक 24 (1.143.24)

न च ते मानुषेष्वेतत्प्रयोक्तव्यं कथंचन । जगद्विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ॥

na ca te mānuṣeṣvetatprayoktavyaṃ kathaṃcana | jagadvinirdahedetadalpatejasi pātitam

"इसे मनुष्यों पर कभी न चलाना। किसी अल्प तेज वाले पर छोड़ा गया यह अस्त्र जगत् को भस्म कर देगा।

श्लोक 25 (1.143.25)

असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते । तद्धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम ॥

asāmānyamidaṃ tāta lokeṣvastraṃ nigadyate | taddhārayethāḥ prayataḥ śṛṇu cedaṃ vaco mama

"हे तात, यह अस्त्र लोकों में असाधारण कहा जाता है। इसे सावधानी से धारण करो और मेरी यह बात सुनो—

श्लोक 26 (1.143.26)

बाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन । तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे ॥

bādhetāmānuṣaḥ śatruryadi tvāṃ vīra kaścana | tadvadhāya prayuñjīthāstadastramidamāhave

"हे वीर, यदि कभी कोई अमानुष शत्रु तुम्हें पीड़ित करे, तो उसके वध के लिए युद्ध में इस अस्त्र का प्रयोग करना।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (1.143.27)

तथेति संप्रतिश्रुत्य बीभत्सुः स कृताञ्जलिः । जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः । भविता त्वत्समो नान्यः पुमाँल्लोके धनुर्धरः ॥

tatheti saṃpratiśrutya bībhatsuḥ sa kṛtāñjaliḥ | jagrāha paramāstraṃ tadāha cainaṃ punarguruḥ | bhavitā tvatsamo nānyaḥ pumām̐lloke dhanurdharaḥ

"ऐसा ही होगा" कहकर हाथ जोड़े हुए बीभत्सु ने वचन दिया और वह परम अस्त्र ग्रहण किया। तब गुरु ने उनसे फिर कहा— "संसार में तुम्हारे समान दूसरा कोई धनुर्धर नहीं होगा।"

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144