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आदि पर्व · अध्याय 144

राजकुमारों का अस्त्र-कौशल प्रदर्शन

द्रोण धृतराष्ट्र से कहते हैं कि राजकुमारों की शिक्षा पूरी हो गई है, और अन्धे राजा प्रसन्न होकर उन्हें सार्वजनिक प्रदर्शन का प्रबन्ध करने की अनुमति देते हैं। भूमि नापकर प्रेक्षागृहों और मंचों सहित रंगभूमि बनाई जाती है; राजा, राजकुल की स्त्रियाँ और सब वर्णों के लोग वहाँ एकत्र होते हैं, और द्रोण अश्वत्थामा के साथ प्रवेश करके आरम्भिक विधियाँ सम्पन्न करते हैं। युधिष्ठिर के नेतृत्व में आयु के क्रम से राजकुमार धनुष, रथ, घोड़े, हाथी, बाहुयुद्ध और तलवार-ढाल का कौशल दिखाते हैं, और दुर्योधन तथा भीम गदा लेकर रंगभूमि में उतरते हैं; विदुर और कुन्ती यह सब धृतराष्ट्र और गान्धारी को बताते जाते हैं।

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.144.1)

कृतास्त्रान्धार्तराष्ट्रांश्च पाण्डुपुत्रांश्च भारत । दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद्राजन्धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥

kṛtāstrāndhārtarāṣṭrāṃśca pāṇḍuputrāṃśca bhārata | dṛṣṭvā droṇo'bravīdrājandhṛtarāṣṭraṃ janeśvaram

हे भारत, धृतराष्ट्र के पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों को अस्त्र-विद्या में निपुण देखकर, हे राजन्, द्रोण ने जनेश्वर धृतराष्ट्र से कहा,

श्लोक 2 (1.144.2)

कृपस्य सोमदत्तस्य वाह्लीकस्य च धीमतः । गाङ्गेयस्य च सान्निध्ये व्यासस्य विदुरस्य च ॥

kṛpasya somadattasya vāhlīkasya ca dhīmataḥ | gāṅgeyasya ca sānnidhye vyāsasya vidurasya ca

कृप, सोमदत्त, बुद्धिमान् वाह्लीक, गांगेय (भीष्म), व्यास और विदुर की उपस्थिति में:

द्रोण उवाच

श्लोक 3 (1.144.3)

राजन्संप्राप्तविद्यास्ते कुमाराः कुरुसत्तम । ते दर्शयेयुः स्वां शिक्षां राजन्ननुमते तव ॥

rājansaṃprāptavidyāste kumārāḥ kurusattama | te darśayeyuḥ svāṃ śikṣāṃ rājannanumate tava

हे कुरुश्रेष्ठ राजन्, आपके कुमारों ने अपनी विद्या पूरी कर ली है। हे राजन्, आपकी अनुमति हो तो वे अपनी शिक्षा का प्रदर्शन करें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (1.144.4)

ततोऽब्रवीन्महाराजः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । भारद्वाज महत्कर्म कृतं ते द्विजसत्तम ॥

tato'bravīnmahārājaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā | bhāradvāja mahatkarma kṛtaṃ te dvijasattama

तब महाराज ने अत्यन्त प्रसन्न मन से कहा: "हे भरद्वाजनन्दन, द्विजश्रेष्ठ, आपने बड़ा कार्य सम्पन्न किया है।"

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 5 (1.144.5)

यदानुमन्यसे कालं यस्मिन्देशे यथायथा । तथातथा विधानाय स्वयमाज्ञापयस्व माम् ॥

yadānumanyase kālaṃ yasmindeśe yathāyathā | tathātathā vidhānāya svayamājñāpayasva mām

आप जब उचित समय समझें, जिस स्थान पर और जिस प्रकार चाहें, उसी के अनुसार प्रबन्ध करने के लिए स्वयं मुझे आज्ञा दीजिए।

श्लोक 6 (1.144.6)

स्पृहयाम्यद्य निर्वेदान्पुरुषाणां सचक्षुषाम् । अस्त्रहेतोः पराक्रान्तान्ये मे द्रक्ष्यन्ति पुत्रकान् ॥

spṛhayāmyadya nirvedānpuruṣāṇāṃ sacakṣuṣām | astrahetoḥ parākrāntānye me drakṣyanti putrakān

आज खिन्न होकर मैं आँखों वाले उन पुरुषों से ईर्ष्या करता हूँ जो अस्त्र-विद्या में पराक्रम दिखाते मेरे पुत्रों को देखेंगे।

श्लोक 7 (1.144.7)

क्षत्तर्यद्गुरुराचार्यो ब्रवीति कुरु तत्तथा । न हीदृशं प्रियं मन्ये भविता धर्मवत्सल ॥

kṣattaryadgururācāryo bravīti kuru tattathā | na hīdṛśaṃ priyaṃ manye bhavitā dharmavatsala

हे क्षत्ता (विदुर), गुरु आचार्य जो कहें, वैसा ही करो। हे धर्मप्रेमी, मेरे विचार में इससे अधिक प्रिय बात कोई नहीं होगी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (1.144.8)

ततो राजानमामन्त्र्य विदुरानुमतोऽपि हि । भारद्वाजो महाप्राज्ञो मापयामास मेदिनीम् ॥

tato rājānamāmantrya vidurānumato'pi hi | bhāradvājo mahāprājño māpayāmāsa medinīm

तब राजा से विदा लेकर और विदुर की सहमति भी पाकर महाबुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन ने भूमि नपवाई,

श्लोक 9 (1.144.9)

समामवृक्षां निर्गुल्मामुदक्प्रवणसंस्थिताम् । तस्यां भूमौ बलिं चक्रे तिथौ नक्षत्रपूजिते ॥

samāmavṛkṣāṃ nirgulmāmudakpravaṇasaṃsthitām | tasyāṃ bhūmau baliṃ cakre tithau nakṣatrapūjite

जो समतल थी, वृक्षों और झाड़ियों से रहित थी और उत्तर की ओर ढलवाँ थी। उस भूमि पर उन्होंने शुभ नक्षत्र से युक्त तिथि को बलि अर्पित की।

श्लोक 10 (1.144.10)

अवघुष्टं पुरं चापि तदर्थं भरतर्षभ । रङ्गभूमौ सुविपुलं शास्त्रदृष्टं यथाविधि ॥

avaghuṣṭaṃ puraṃ cāpi tadarthaṃ bharatarṣabha | raṅgabhūmau suvipulaṃ śāstradṛṣṭaṃ yathāvidhi

हे भरतश्रेष्ठ, इसके लिए नगर में घोषणा भी करवाई गई। रंगभूमि में, जो बहुत विस्तृत थी और शास्त्रोक्त विधि से बनाई गई थी,

श्लोक 11 (1.144.11)

प्रेक्षागारं सुविहितं चक्रुस्ते तस्य शिल्पिनः । रक्षां सर्वायुधोपेतां स्त्रीणां चैव नरर्षभ ॥

prekṣāgāraṃ suvihitaṃ cakruste tasya śilpinaḥ | rakṣāṃ sarvāyudhopetāṃ strīṇāṃ caiva nararṣabha

उनके शिल्पियों ने एक सुनिर्मित प्रेक्षागृह बनाया, और हे नरश्रेष्ठ, स्त्रियों के लिए सब प्रकार के आयुधों से सुरक्षित एक घेरा भी।

श्लोक 12 (1.144.12)

मञ्चांश्च कारयामासुर्यत्र जानपदा जनाः । विपुलानुच्छ्रयोपेताञ्शिबिकाश्च महाधनाः ॥

mañcāṃśca kārayāmāsuryatra jānapadā janāḥ | vipulānucchrayopetāñśibikāśca mahādhanāḥ

जनपद के लोगों ने वहाँ ऊँचे और विशाल मंच बनवाए, और बहुमूल्य पालकियाँ भी।

श्लोक 13 (1.144.13)

तस्मिंस्ततोऽहनि प्राप्ते राजा ससचिवस्तदा । सान्तःपुरः सहामात्यो व्यासस्यानुमते तदा । भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा कृपं चाचार्यसत्तमम् ॥

tasmiṃstato'hani prāpte rājā sasacivastadā | sāntaḥpuraḥ sahāmātyo vyāsasyānumate tadā | bhīṣmaṃ pramukhataḥ kṛtvā kṛpaṃ cācāryasattamam

जब वह दिन आया, तब राजा अपने सचिवों, अन्तःपुर की स्त्रियों और मन्त्रियों के साथ, व्यास की अनुमति से, भीष्म और आचार्यश्रेष्ठ कृप को आगे करके,

श्लोक 14 (1.144.14)

बाह्लीकं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च । कुरूनन्यांश्च सचिवानादाय नगराद्बहिः ॥

bāhlīkaṃ somadattaṃ ca bhūriśravasameva ca | kurūnanyāṃśca sacivānādāya nagarādbahiḥ

बाह्लीक, सोमदत्त, भूरिश्रवा तथा अन्य कुरुवंशियों और सचिवों को साथ लेकर नगर से बाहर निकले।

श्लोक 15 (1.144.15)

रङ्गभूमिं समासाद्य ब्राह्मणैः सहितो नृपः ॥

raṅgabhūmiṃ samāsādya brāhmaṇaiḥ sahito nṛpaḥ

रंगभूमि में पहुँचकर ब्राह्मणों के साथ राजा

श्लोक 16 (1.144.16)

मुक्ताजालपरिक्षिप्तं वैदूर्यमणिशोभितम् । शातकुम्भमयं दिव्यं प्रेक्षागारमुपागमत् ॥

muktājālaparikṣiptaṃ vaidūryamaṇiśobhitam | śātakumbhamayaṃ divyaṃ prekṣāgāramupāgamat

मोतियों की जालियों से घिरे, वैदूर्य मणियों से सुशोभित, स्वर्णमय दिव्य प्रेक्षागृह में आए।

श्लोक 17 (1.144.17)

गान्धारी च महाभागा कुन्ती च जयतां वर । स्त्रियश्च राज्ञः सर्वास्ताः सप्रेष्याः सपरिच्छदाः ॥

gāndhārī ca mahābhāgā kuntī ca jayatāṃ vara | striyaśca rājñaḥ sarvāstāḥ sapreṣyāḥ saparicchadāḥ

हे विजेताओं में श्रेष्ठ, महाभागा गान्धारी, कुन्ती और राजा की सभी स्त्रियाँ अपनी दासियों और परिजनों सहित

श्लोक 18 (1.144.18)

हर्षादारुरुहुर्मञ्चान्मेरुं देवस्त्रियो यथा । ब्राह्मणक्षत्रियाद्यं च चातुर्वर्ण्यं पुराद्द्रुतम् ॥

harṣādāruruhurmañcānmeruṃ devastriyo yathā | brāhmaṇakṣatriyādyaṃ ca cāturvarṇyaṃ purāddrutam

हर्ष से मंचों पर ऐसे चढ़ीं जैसे देवांगनाएँ मेरु पर्वत पर चढ़ती हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि चारों वर्णों के लोग नगर से दौड़े चले आए,

श्लोक 19 (1.144.19)

दर्शनेप्सुः समभ्यागात्कुमाराणां कृतास्त्रताम् । क्षणेनैकस्थतां तत्र दर्शनेप्सुर्जगाम ह ॥

darśanepsuḥ samabhyāgātkumārāṇāṃ kṛtāstratām | kṣaṇenaikasthatāṃ tatra darśanepsurjagāma ha

कुमारों की अस्त्र-निपुणता देखने की इच्छा से। देखने को उत्सुक वह जनसमूह क्षण भर में वहाँ एक स्थान पर एकत्र हो गया।

श्लोक 20 (1.144.20)

प्रवादितैश्च वादित्रैर्जनकौतूहलेन च । महार्णव इव क्षुब्धः समाजः सोऽभवत्तदा ॥

pravāditaiśca vāditrairjanakautūhalena ca | mahārṇava iva kṣubdhaḥ samājaḥ so'bhavattadā

बजते हुए वाद्यों और लोगों के कौतूहल से वह सभा उस समय क्षुब्ध महासागर के समान हो गई।

श्लोक 21 (1.144.21)

ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लयज्ञोपवीतवान् । शुक्लकेशः सितश्मश्रुः शुक्लमाल्यानुलेपनः ॥

tataḥ śuklāmbaradharaḥ śuklayajñopavītavān | śuklakeśaḥ sitaśmaśruḥ śuklamālyānulepanaḥ

तब श्वेत वस्त्र धारण किए, श्वेत यज्ञोपवीत पहने, श्वेत केश और श्वेत दाढ़ी वाले, श्वेत माला और श्वेत अनुलेपन से युक्त

श्लोक 22 (1.144.22)

रङ्गमध्यं तदाचार्यः सपुत्रः प्रविवेश ह । नभो जलधरैर्हीनं साङ्गारक इवांशुमान् ॥

raṅgamadhyaṃ tadācāryaḥ saputraḥ praviveśa ha | nabho jaladharairhīnaṃ sāṅgāraka ivāṃśumān

आचार्य ने अपने पुत्र के साथ रंगभूमि के मध्य में प्रवेश किया, जैसे बादलों से रहित आकाश में मंगल के साथ चन्द्रमा।

श्लोक 23 (1.144.23)

व्यासस्यानुमते चक्रे बलिं बलवतां वरः । ब्राह्मणांस्तु सुमन्त्रज्ञान्कारयामास मङ्गलम् ॥

vyāsasyānumate cakre baliṃ balavatāṃ varaḥ | brāhmaṇāṃstu sumantrajñānkārayāmāsa maṅgalam

बलवानों में श्रेष्ठ द्रोण ने व्यास की अनुमति से बलि अर्पित की और मन्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मणों से मंगल-कर्म करवाया।

श्लोक 24 (1.144.24)

सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राणि विविधानि च । प्रददौ दक्षिणां राजा द्रोणाय च कृपाय च ॥

suvarṇamaṇiratnāni vastrāṇi vividhāni ca | pradadau dakṣiṇāṃ rājā droṇāya ca kṛpāya ca

राजा ने द्रोण और कृप को दक्षिणा में सोना, मणि, रत्न और अनेक प्रकार के वस्त्र दिए।

श्लोक 25 (1.144.25)

सुखपुण्याहघोषस्य पुण्यस्य समनन्तरम् । विविशुर्विविधं गृह्य शस्त्रोपकरणं नराः ॥

sukhapuṇyāhaghoṣasya puṇyasya samanantaram | viviśurvividhaṃ gṛhya śastropakaraṇaṃ narāḥ

शुभ और सुखद पुण्याहवाचन का घोष होते ही लोग अनेक प्रकार के शस्त्र और उपकरण लेकर भीतर आए।

श्लोक 26 (1.144.26)

ततो बद्धाङ्गुलित्राणा बद्धकक्ष्या महारथाः । बद्धतूणाः सधनुषो विविशुर्भरतर्षभाः ॥

tato baddhāṅgulitrāṇā baddhakakṣyā mahārathāḥ | baddhatūṇāḥ sadhanuṣo viviśurbharatarṣabhāḥ

तब भरतवंश के श्रेष्ठ महारथी अंगुलित्राण बाँधे, कमर कसे, तरकश बाँधे और धनुष लिए भीतर आए।

श्लोक 27 (1.144.27)

रङ्गमध्ये स्थितं द्रोणमभिवाद्य नरर्षभाः । चक्रुः पूजां यथान्यायं द्रोणस्य च कृपस्य च ॥

raṅgamadhye sthitaṃ droṇamabhivādya nararṣabhāḥ | cakruḥ pūjāṃ yathānyāyaṃ droṇasya ca kṛpasya ca

रंगभूमि के मध्य में खड़े द्रोण को प्रणाम करके उन नरश्रेष्ठों ने द्रोण और कृप की यथाविधि पूजा की।

श्लोक 28 (1.144.28)

आशीर्भिश्च प्रयुक्ताभिः सर्वे संहृष्टमानसाः । अभिवाद्य पुनः शस्त्रान्बलिपुष्पैः समर्चितान् ॥

āśīrbhiśca prayuktābhiḥ sarve saṃhṛṣṭamānasāḥ | abhivādya punaḥ śastrānbalipuṣpaiḥ samarcitān

उन पर आशीर्वाद दिए गए, और प्रसन्न मन से उन सबने बलि और पुष्पों से पूजित अपने शस्त्रों को फिर प्रणाम किया।

श्लोक 29 (1.144.29)

रक्तचन्दनसंमिश्रैः स्वयमर्चन्ति कौरवाः । रक्तचन्दनदिग्धाश्च रक्तमाल्यानुधारिणः ॥

raktacandanasaṃmiśraiḥ svayamarcanti kauravāḥ | raktacandanadigdhāśca raktamālyānudhāriṇaḥ

कौरवों ने स्वयं लाल चन्दन मिली सामग्री से उनकी पूजा की। लाल चन्दन से लिपे, लाल मालाएँ पहने,

श्लोक 30 (1.144.30)

सर्वे रक्तपताकाश्च सर्वे रक्तान्तलोचनाः । द्रोणेन समनुज्ञाता गृह्य शस्त्रं परन्तपाः ॥

sarve raktapatākāśca sarve raktāntalocanāḥ | droṇena samanujñātā gṛhya śastraṃ parantapāḥ

सबके ध्वज लाल थे, सबकी आँखों के कोर लाल थे; द्रोण की अनुमति पाकर उन शत्रुतापन वीरों ने शस्त्र उठाए।

श्लोक 31 (1.144.31)

धनूंषि पूर्वं संगृह्य तप्तकाञ्चनभूषिताः । सज्यानि विविधाकाराः शरैः सन्धाय कौरवाः ॥

dhanūṃṣi pūrvaṃ saṃgṛhya taptakāñcanabhūṣitāḥ | sajyāni vividhākārāḥ śaraiḥ sandhāya kauravāḥ

पहले तपे सोने से विभूषित, प्रत्यंचा चढ़े, अनेक आकारों के धनुष लेकर और उन पर बाण चढ़ाकर कौरवों ने

श्लोक 32 (1.144.32)

ज्याघोषं तलघोषं च कृत्वा भूतान्यमोहयन् ॥

jyāghoṣaṃ talaghoṣaṃ ca kṛtvā bhūtānyamohayan

प्रत्यंचा की टंकार और हथेलियों की थाप से सब प्राणियों को चकित कर दिया।

श्लोक 33 (1.144.33)

अनुज्येष्ठं च ते तत्र युधिष्ठिरपुरोगमाः । चक्रुरस्त्रं महावीर्याः कुमाराः परमाद्भुतम् ॥

anujyeṣṭhaṃ ca te tatra yudhiṣṭhirapurogamāḥ | cakrurastraṃ mahāvīryāḥ kumārāḥ paramādbhutam

फिर युधिष्ठिर को आगे करके, आयु के क्रम से, उन महापराक्रमी कुमारों ने वहाँ अस्त्रों के अत्यन्त अद्भुत करतब दिखाए।

श्लोक 34 (1.144.34)

केषांचित्तत्र माल्येषु शरा निपतिता नृप । केषांचित्पुष्पमुकुटे निपतन्ति स्म सायकाः ॥

keṣāṃcittatra mālyeṣu śarā nipatitā nṛpa | keṣāṃcitpuṣpamukuṭe nipatanti sma sāyakāḥ

हे राजन्, किसी के बाण मालाओं पर जा गिरे, तो किसी के बाण फूलों के मुकुटों पर।

श्लोक 35 (1.144.35)

केचिल्लक्ष्याणि विविधैर्बाणैराहितलक्षणैः । बिभिदुर्लाघवोत्सृष्टैर्गुरूणि च लघूनि च ॥

kecillakṣyāṇi vividhairbāṇairāhitalakṣaṇaiḥ | bibhidurlāghavotsṛṣṭairgurūṇi ca laghūni ca

कुछ ने चिह्न लगे बाणों को फुर्ती से छोड़कर भारी और हल्के, अनेक प्रकार के लक्ष्य भेद डाले।

श्लोक 36 (1.144.36)

केचिच्छराक्षेपभयाच्छिरांस्यवननामिरे । मनुजा धृष्टमपरे वीक्षाञ्चक्रुः सुविस्मिताः ॥

keciccharākṣepabhayācchirāṃsyavananāmire | manujā dhṛṣṭamapare vīkṣāñcakruḥ suvismitāḥ

कुछ लोगों ने बाणों के छूटने के भय से सिर झुका लिए, और दूसरे बड़े विस्मय से निडर होकर देखते रहे।

श्लोक 37 (1.144.37)

ते स्म लक्ष्याणि बिभिदुर्बाणैर्नामाङ्कशोभितैः । विविधैर्लाघवोत्सृष्टैरुह्यन्तो वाजिभिर्द्रुतम् ॥

te sma lakṣyāṇi bibhidurbāṇairnāmāṅkaśobhitaiḥ | vividhairlāghavotsṛṣṭairuhyanto vājibhirdrutam

घोड़ों पर तेज़ी से दौड़ते हुए उन्होंने अपने नामों से अंकित, फुर्ती से छोड़े गए अनेक प्रकार के बाणों से लक्ष्यों को भेदा।

श्लोक 38 (1.144.38)

तत्कुमारबलं तत्र गृहीतशरकार्मुकम् । गन्धर्वनगराकारं प्रेक्ष्य ते विस्मिताभवन् ॥

tatkumārabalaṃ tatra gṛhītaśarakārmukam | gandharvanagarākāraṃ prekṣya te vismitābhavan

धनुष-बाण लिए उन कुमारों की टोली को गन्धर्वनगर के समान अद्भुत देखकर दर्शक विस्मित हो गए।

श्लोक 39 (1.144.39)

सहसा चुक्रुशुश्चान्ये नराः शतसहस्रशः । विस्मयोत्फुल्लनयनाः साधुसाध्विति भारत ॥

sahasā cukruśuścānye narāḥ śatasahasraśaḥ | vismayotphullanayanāḥ sādhusādhviti bhārata

हे भारत, लाखों दूसरे लोग विस्मय से आँखें फैलाए सहसा "वाह! वाह!" कहकर पुकार उठे।

श्लोक 40 (1.144.40)

कृत्वा धनुषि ते मार्गान्रथचर्यासु चासकृत् । गजपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च नियुद्धे च महाबलाः ॥

kṛtvā dhanuṣi te mārgānrathacaryāsu cāsakṛt | gajapṛṣṭhe'śvapṛṣṭhe ca niyuddhe ca mahābalāḥ

उन महाबली कुमारों ने धनुष के, रथ-संचालन के, हाथी और घोड़े की पीठ पर के तथा बाहुयुद्ध के दाँव-पेंच बार-बार दिखाए।

श्लोक 41 (1.144.41)

गृहीतखड्गचर्माणस्ततो भूयः प्रहारिणः । त्सरुमार्गान्यथोद्दिष्टांश्चेरुः सर्वासु भूमिषु ॥

gṛhītakhaḍgacarmāṇastato bhūyaḥ prahāriṇaḥ | tsarumārgānyathoddiṣṭāṃśceruḥ sarvāsu bhūmiṣu

फिर तलवार और ढाल लेकर, बार-बार प्रहार करते हुए, वे सिखाए गए खड्ग-मार्गों के अनुसार सब प्रकार की भूमियों पर विचरे।

श्लोक 42 (1.144.42)

लाघवं सौष्ठवं शोभां स्थिरत्वं दृढमुष्टिताम् । ददृशुस्तत्र सर्वेषां प्रयोगं खड्गचर्मणोः ॥

lāghavaṃ sauṣṭhavaṃ śobhāṃ sthiratvaṃ dṛḍhamuṣṭitām | dadṛśustatra sarveṣāṃ prayogaṃ khaḍgacarmaṇoḥ

वहाँ दर्शकों ने उन सबमें तलवार और ढाल के प्रयोग में फुर्ती, सुघड़ता, शोभा, स्थिरता और मुट्ठी की दृढ़ता देखी।

श्लोक 43 (1.144.43)

अथ तौ नित्यसंहृष्टौ सुयोधनवृकोदरौ । अवतीर्णौ गदाहस्तावेकशृङ्गाविवाचलौ ॥

atha tau nityasaṃhṛṣṭau suyodhanavṛkodarau | avatīrṇau gadāhastāvekaśṛṅgāvivācalau

तब सदा एक-दूसरे को जीतने को उत्सुक सुयोधन और वृकोदर हाथ में गदा लिए उतरे, मानो एक-एक शिखर वाले दो पर्वत हों।

श्लोक 44 (1.144.44)

बद्धकक्ष्यौ महाबाहू पौरुषे पर्यवस्थितौ । बृंहन्तौ वासिताहेतोः समदाविव कुञ्जरौ ॥

baddhakakṣyau mahābāhū pauruṣe paryavasthitau | bṛṃhantau vāsitāhetoḥ samadāviva kuñjarau

कमर कसे वे दोनों महाबाहु पौरुष दिखाने को डटे खड़े थे, हथिनी के लिए चिंघाड़ते दो मतवाले हाथियों के समान।

श्लोक 45 (1.144.45)

तौ प्रदक्षिणसव्यानि मण्डलानि महाबलौ । चेरतुर्मण्डलगतौ समदाविव कुञ्जरौ ॥

tau pradakṣiṇasavyāni maṇḍalāni mahābalau | ceraturmaṇḍalagatau samadāviva kuñjarau

वे दोनों महाबली दाएँ और बाएँ मण्डल बनाते हुए, घूमती गदाओं के घेरे में मतवाले हाथियों के समान विचरने लगे।

श्लोक 46 (1.144.46)

विदुरो धृतराष्ट्राय गान्धार्याः पाण्डवारणिः । न्यवेदयेतां तत्सर्वं कुमाराणां विचेष्टितम् ॥

viduro dhṛtarāṣṭrāya gāndhāryāḥ pāṇḍavāraṇiḥ | nyavedayetāṃ tatsarvaṃ kumārāṇāṃ viceṣṭitam

विदुर ने धृतराष्ट्र को, और पाण्डवों की जननी कुन्ती ने गान्धारी को, कुमारों की सारी चेष्टाएँ बताईं।

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