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आदि पर्व · अध्याय 145

रंगभूमि में अर्जुन का प्रदर्शन

दर्शक दुर्योधन और भीम के पक्षों में बँट जाते हैं, और द्रोण अश्वत्थामा से दोनों को अलग करवाते हैं ताकि उनका मुकाबला सच्चे क्रोध में न बदल जाए। फिर द्रोण अर्जुन को बुलाते हैं; दर्शक उन्हें श्रेष्ठ योद्धा कहकर जय-जयकार करते हैं, कुन्ती हर्ष के आँसू बहाती हैं, और विदुर से कोलाहल का कारण जानकर धृतराष्ट्र प्रसन्न होते हैं। अर्जुन दिव्य अस्त्रों से अग्नि, जल, वायु, मेघ, भूमि और पर्वत उत्पन्न करते हैं और धनुर्विद्या के अद्भुत करतब दिखाते हैं। प्रदर्शन समाप्त होने को है कि द्वार पर भुजाओं के ठोंकने का वज्र-सा शब्द सुनाई देता है, और दोनों पक्ष द्रोण और दुर्योधन के चारों ओर एकत्र हो जाते हैं।

अध्याय 144अध्याय-सूचीअध्याय 146

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.145.1)

कुरुराजे हि रङ्गस्थे भीमे च बलिनां वरे । पक्षपातकृतस्नेहः स द्विधेवाभवज्जनः ॥

kururāje hi raṅgasthe bhīme ca balināṃ vare | pakṣapātakṛtasnehaḥ sa dvidhevābhavajjanaḥ

कुरुराज (दुर्योधन) और बलवानों में श्रेष्ठ भीम के रंगभूमि में खड़े होने पर, पक्षपात के अनुसार स्नेह बँट जाने से जनता मानो दो भागों में बँट गई।

श्लोक 2 (1.145.2)

जय हे कुरुराजेति जय हे भीम इत्युत । पुरुषाणां सुविपुलाः प्रणादाः सहसोत्थिताः ॥

jaya he kururājeti jaya he bhīma ityuta | puruṣāṇāṃ suvipulāḥ praṇādāḥ sahasotthitāḥ

"कुरुराज की जय हो!", "भीम की जय हो!", लोगों के ऐसे प्रचण्ड नाद सहसा उठने लगे।

श्लोक 3 (1.145.3)

ततः क्षुब्धार्णवनिभं रङ्गमालोक्य बुद्धिमान् । भारद्वाजः प्रियं पुत्रमश्वत्थामानमब्रवीत् ॥

tataḥ kṣubdhārṇavanibhaṃ raṅgamālokya buddhimān | bhāradvājaḥ priyaṃ putramaśvatthāmānamabravīt

तब रंगभूमि को क्षुब्ध सागर के समान देखकर बुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन ने अपने प्रिय पुत्र अश्वत्थामा से कहा:

द्रोण उवाच

श्लोक 4 (1.145.4)

वारयैतौ महावीर्यौ कृतयोग्यावुभावपि । मा भूद्रङ्गप्रकोपोऽयं भीमदुर्योधनोद्भवः ॥

vārayaitau mahāvīryau kṛtayogyāvubhāvapi | mā bhūdraṅgaprakopo'yaṃ bhīmaduryodhanodbhavaḥ

इन दोनों महापराक्रमी, भली-भाँति प्रशिक्षित वीरों को रोको, जिससे भीम और दुर्योधन के कारण रंगभूमि में क्रोध न भड़क उठे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (1.145.5)

तत उत्थाय वेगेन अश्वत्थामा न्यवारयत् । गुरोराज्ञा भीम इति गान्धारे गुरुशासनम् । अलं शिक्षाकृतं वेगमलं साहसमित्युत ॥

tata utthāya vegena aśvatthāmā nyavārayat | gurorājñā bhīma iti gāndhāre guruśāsanam | alaṃ śikṣākṛtaṃ vegamalaṃ sāhasamityuta

अश्वत्थामा ने वेग से उठकर उन्हें रोका: "भीम, यह गुरु की आज्ञा है! गान्धारीनन्दन, यह गुरु का आदेश है! शिक्षा के प्रदर्शन में इतना आवेश बहुत हुआ, यह दुस्साहस बस करो!"

श्लोक 6 (1.145.6)

ततस्तावुद्यतगदौ गुरुपुत्रेण वारितौ । युगान्तानिलसंक्षुब्धौ महावेलाविवार्णवौ ॥

tatastāvudyatagadau guruputreṇa vāritau | yugāntānilasaṃkṣubdhau mahāvelāvivārṇavau

तब गदाएँ उठाए वे दोनों, गुरुपुत्र द्वारा रोके जाने पर, प्रलयकाल की वायु से क्षुब्ध, ऊँचे ज्वार वाले दो सागरों के समान लगे।

श्लोक 7 (1.145.7)

ततो रङ्गाङ्गणगतो द्रोणो वचनमब्रवीत् । निवार्य वादित्रगणं महामेघनिभस्वनम् ॥

tato raṅgāṅgaṇagato droṇo vacanamabravīt | nivārya vāditragaṇaṃ mahāmeghanibhasvanam

तब रंगभूमि के आँगन में खड़े द्रोण ने महामेघों जैसी ध्वनि वाले वाद्यवृन्द को रोककर यह वचन कहा:

द्रोण उवाच

श्लोक 8 (1.145.8)

यो मे पुत्रात्प्रियतरः सर्वशस्त्रविशारदः । ऐन्द्रिरिन्द्रानुजसमः स पार्थो दृश्यतामिति ॥

yo me putrātpriyataraḥ sarvaśastraviśāradaḥ | aindririndrānujasamaḥ sa pārtho dṛśyatāmiti

देखिए उस पार्थ को, जो मुझे पुत्र से भी अधिक प्रिय है, सब शस्त्रों में निपुण है, इन्द्र का पुत्र है और इन्द्र के अनुज (विष्णु) के समान है!

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (1.145.9)

आचार्यवचनेनाथ कृतस्वस्त्ययनो युवा । बद्धगोधाङ्गुलित्राणः पूर्णतूणः सकार्मुकः ॥

ācāryavacanenātha kṛtasvastyayano yuvā | baddhagodhāṅgulitrāṇaḥ pūrṇatūṇaḥ sakārmukaḥ

आचार्य के कहने पर, स्वस्तिवाचन हो जाने के बाद, गोह के चमड़े का अंगुलित्राण बाँधे, भरा तरकश और धनुष लिए वह युवक

श्लोक 10 (1.145.10)

काञ्चनं कवचं बिभ्रत्प्रत्यदृश्यत फाल्गुनः । सार्कः सेन्द्रायुधतडित्ससन्ध्य इव तोयदः ॥

kāñcanaṃ kavacaṃ bibhratpratyadṛśyata phālgunaḥ | sārkaḥ sendrāyudhataḍitsasandhya iva toyadaḥ

फाल्गुन (अर्जुन) स्वर्ण-कवच धारण किए प्रकट हुए, जैसे सूर्य, इन्द्रधनुष और बिजली से युक्त सन्ध्याकालीन मेघ।

श्लोक 11 (1.145.11)

ततः सर्वस्य रङ्गस्य समुत्पिञ्जलकोऽभवत् । प्रावाद्यन्त च वाद्यानि सशङ्खानि समन्ततः ॥

tataḥ sarvasya raṅgasya samutpiñjalako'bhavat | prāvādyanta ca vādyāni saśaṅkhāni samantataḥ

तब सारी रंगभूमि में उल्लास छा गया, और चारों ओर शंखों सहित बाजे बजने लगे।

प्रेक्षका ऊचुः

श्लोक 12 (1.145.12)

एष कुन्तीसुतः श्रीमानेष मध्यमपाण्डवः । एष पुत्रो महेन्द्रस्य कुरूणामेष रक्षिता ॥

eṣa kuntīsutaḥ śrīmāneṣa madhyamapāṇḍavaḥ | eṣa putro mahendrasya kurūṇāmeṣa rakṣitā

यह कुन्ती का श्रीमान् पुत्र है! यह मँझला पाण्डव है! यह महेन्द्र का पुत्र है, यही कुरुओं का रक्षक है!

श्लोक 13 (1.145.13)

एषोऽस्त्रविदुषां श्रेष्ठ एष धर्मभृतां वरः । एष शीलवतां चापि शीलज्ञाननिधिः परः ॥

eṣo'straviduṣāṃ śreṣṭha eṣa dharmabhṛtāṃ varaḥ | eṣa śīlavatāṃ cāpi śīlajñānanidhiḥ paraḥ

यह अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ है, यह धर्मधारियों में उत्तम है, यह शीलवानों में भी शील और ज्ञान का परम भण्डार है!

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (1.145.14)

इत्येवं तुमुला वाचः शुश्रुवुः प्रेक्षकेरिताः । कुन्त्याः प्रस्रवसंयुक्तैरस्रैः क्लिन्नमुरोऽभवत् ॥

ityevaṃ tumulā vācaḥ śuśruvuḥ prekṣakeritāḥ | kuntyāḥ prasravasaṃyuktairasraiḥ klinnamuro'bhavat

दर्शकों के मुख से निकले ऐसे कोलाहलपूर्ण वचन सबने सुने। कुन्ती का वक्षःस्थल स्तनों से बहते दूध मिले आँसुओं से भीग गया।

श्लोक 15 (1.145.15)

तेन शब्देन महता पूर्णश्रुतिरथाब्रवीत् । धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठो विदुरं हृष्टमानसः ॥

tena śabdena mahatā pūrṇaśrutirathābravīt | dhṛtarāṣṭro naraśreṣṭho viduraṃ hṛṣṭamānasaḥ

उस महान् कोलाहल से कान भर जाने पर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र ने प्रसन्न मन से विदुर से कहा:

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 16 (1.145.16)

क्षत्तः क्षुब्धार्णवनिभः किमेष सुमहास्वनः । सहसैवोत्थितो रङ्गे भिन्दन्निव नभस्तलम् ॥

kṣattaḥ kṣubdhārṇavanibhaḥ kimeṣa sumahāsvanaḥ | sahasaivotthito raṅge bhindanniva nabhastalam

हे क्षत्ता, क्षुब्ध सागर जैसा यह महान् कोलाहल क्या है, जो आकाश को चीरता-सा सहसा रंगभूमि में उठा है?

विदुर उवाच

श्लोक 17 (1.145.17)

एष पार्थो महाराज फाल्गुनः पाण्डुनन्दनः । अवतीर्णः सकवचस्तत्रैव सुमहास्वनः ॥

eṣa pārtho mahārāja phālgunaḥ pāṇḍunandanaḥ | avatīrṇaḥ sakavacastatraiva sumahāsvanaḥ

महाराज, पाण्डुनन्दन पार्थ फाल्गुन कवच पहनकर रंगभूमि में उतरे हैं; यह महान् कोलाहल उन्हीं के कारण है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 18 (1.145.18)

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि रक्षितोऽस्मि महामते । पृथारणिसमुद्भूतैस्त्रिभिः पाण्डववह्निभिः ॥

dhanyo'smyanugṛhīto'smi rakṣito'smi mahāmate | pṛthāraṇisamudbhūtaistribhiḥ pāṇḍavavahnibhiḥ

हे महामति, पृथा-रूपी अरणि से उत्पन्न तीन पाण्डव-अग्नियों से मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, सुरक्षित हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (1.145.19)

तस्मिन्प्रमुदिते रङ्गे कथंचित्प्रत्युपस्थिते । दर्शयामास बीभत्सुराचार्यायास्त्रलाघवम् ॥

tasminpramudite raṅge kathaṃcitpratyupasthite | darśayāmāsa bībhatsurācāryāyāstralāghavam

जब प्रसन्न रंगभूमि किसी प्रकार फिर शान्त हुई, तब बीभत्सु (अर्जुन) ने आचार्य को अपने अस्त्रों की फुर्ती दिखाई।

श्लोक 20 (1.145.20)

आग्नेयेनासृजद्वह्निं वारुणेनासृजत्पयः । वायव्येनासृजद्वायुं पार्जन्येनासृजद्धनान् ॥

āgneyenāsṛjadvahniṃ vāruṇenāsṛjatpayaḥ | vāyavyenāsṛjadvāyuṃ pārjanyenāsṛjaddhanān

आग्नेयास्त्र से उन्होंने अग्नि उत्पन्न की, वारुणास्त्र से जल, वायव्यास्त्र से वायु और पर्जन्यास्त्र से मेघ।

श्लोक 21 (1.145.21)

भौमेन प्रासृजद्भूमिं पार्वतेनासृजद्गिरीन् । अन्तर्धानेन चास्त्रेण पुनरन्तर्हितोऽभवत् ॥

bhaumena prāsṛjadbhūmiṃ pārvatenāsṛjadgirīn | antardhānena cāstreṇa punarantarhito'bhavat

भौमास्त्र से उन्होंने भूमि उत्पन्न की, पार्वतास्त्र से पर्वत, और अन्तर्धान-अस्त्र से वे फिर अदृश्य हो गए।

श्लोक 22 (1.145.22)

क्षणात्प्रांशुः क्षणाद्ध्रस्वः क्षणाच्च रथधूर्गतः । क्षणेन रथमध्यस्थः क्षणेनावतरन्महीम् ॥

kṣaṇātprāṃśuḥ kṣaṇāddhrasvaḥ kṣaṇācca rathadhūrgataḥ | kṣaṇena rathamadhyasthaḥ kṣaṇenāvataranmahīm

क्षण में वे ऊँचे दिखते, क्षण में नाटे; क्षण में रथ के जुए पर, क्षण में रथ के बीच में, और क्षण में भूमि पर उतरते।

श्लोक 23 (1.145.23)

सुकुमारं च सूक्ष्मं च गुरु चापि गुरुप्रियः । सौष्ठवेनाभिसंयुक्तः सोऽविध्यद्विविधैः शरैः ॥

sukumāraṃ ca sūkṣmaṃ ca guru cāpi gurupriyaḥ | sauṣṭhavenābhisaṃyuktaḥ so'vidhyadvividhaiḥ śaraiḥ

गुरु के प्रिय अर्जुन ने पूरी सुघड़ता के साथ अनेक प्रकार के बाणों से कोमल, सूक्ष्म और भारी लक्ष्यों को भेदा।

श्लोक 24 (1.145.24)

भ्रमतश्च वराहस्य लोहस्य प्रमुखे समम् । पञ्चबाणानसंसक्तान्संमुमोचैकबाणवत् ॥

bhramataśca varāhasya lohasya pramukhe samam | pañcabāṇānasaṃsaktānsaṃmumocaikabāṇavat

घूमते हुए लोहे के सूअर के मुख में उन्होंने एक साथ पाँच बाण, आपस में बिना सटे, ऐसे छोड़े मानो एक ही बाण हो।

श्लोक 25 (1.145.25)

गव्ये विषाणकोशे च चले रज्ज्ववलम्बिनि । निचखान महावीर्यः सायकानेकविंशतिम् ॥

gavye viṣāṇakośe ca cale rajjvavalambini | nicakhāna mahāvīryaḥ sāyakānekaviṃśatim

रस्सी से लटकते, हिलते गाय के सींग के खोखल में उस महापराक्रमी ने इक्कीस बाण गाड़ दिए।

श्लोक 26 (1.145.26)

इत्येवमादि सुमहत्खड्गे धनुषि चानघ । गदायां शस्त्रकुशलो मण्डलानि ह्यदर्शयत् ॥

ityevamādi sumahatkhaḍge dhanuṣi cānagha | gadāyāṃ śastrakuśalo maṇḍalāni hyadarśayat

हे निष्पाप, इस प्रकार शस्त्रकुशल अर्जुन ने तलवार और धनुष से ऐसे अनेक महान् करतब दिखाए, और गदा के मण्डल भी दिखाए।

श्लोक 27 (1.145.27)

ततः समाप्तभूयिष्ठे तस्मिन्कर्मणि भारत । मन्दीभूते समाजे च वादित्रस्य च निःस्वने ॥

tataḥ samāptabhūyiṣṭhe tasminkarmaṇi bhārata | mandībhūte samāje ca vāditrasya ca niḥsvane

फिर हे भारत, जब वह प्रदर्शन लगभग समाप्त हो चला, सभा शान्त हो गई और वाद्यों की ध्वनि मन्द पड़ गई,

श्लोक 28 (1.145.28)

द्वारदेशात्समुद्भूतो माहात्म्यबलसूचकः । वज्रनिष्पेषसदृशः शुश्रुवे भुजनिःस्वनः ॥

dvāradeśātsamudbhūto māhātmyabalasūcakaḥ | vajraniṣpeṣasadṛśaḥ śuśruve bhujaniḥsvanaḥ

तब द्वार की ओर से वज्रपात के समान भुजाएँ ठोंकने का शब्द सुनाई दिया, जो महानता और बल का सूचक था।

श्लोक 29 (1.145.29)

दीर्यन्ते किं नु गिरयः किंस्विद्भूमिर्विदीर्यते । किंस्विदापूर्यते व्योम जलधाराघनैर्घनैः ॥

dīryante kiṃ nu girayaḥ kiṃsvidbhūmirvidīryate | kiṃsvidāpūryate vyoma jaladhārāghanairghanaiḥ

"क्या पर्वत फट रहे हैं? क्या पृथ्वी फट रही है? या आकाश जलधाराओं से भरे घने बादलों से भर रहा है?"

श्लोक 30 (1.145.30)

रङ्गस्यैवं मतिरभूत्क्षणेन वसुधाधिप । द्वारं चाभिमुखाः सर्वे बभूवुः प्रेक्षकास्तदा ॥

raṅgasyaivaṃ matirabhūtkṣaṇena vasudhādhipa | dvāraṃ cābhimukhāḥ sarve babhūvuḥ prekṣakāstadā

हे पृथ्वीपति, उस क्षण सारी रंगभूमि के मन में यही विचार आया, और सब दर्शक द्वार की ओर मुँह करके देखने लगे।

श्लोक 31 (1.145.31)

पञ्चभिर्भ्रातृभिः पार्थैर्द्रोणः परिवृतो बभौ । पञ्चतारेण संयुक्तः सावित्रेणेव चन्द्रमाः ॥

pañcabhirbhrātṛbhiḥ pārthairdroṇaḥ parivṛto babhau | pañcatāreṇa saṃyuktaḥ sāvitreṇeva candramāḥ

पाँचों पार्थ भाइयों से घिरे द्रोण ऐसे शोभित हुए जैसे पाँच तारों वाले सावित्र (हस्त) नक्षत्र से युक्त चन्द्रमा।

श्लोक 32 (1.145.32)

अश्वत्थाम्ना च सहितं भ्रातॄणां शतमूर्जितम् । दुर्योधनममित्रघ्नमुत्थितं पर्यवारयत् ॥

aśvatthāmnā ca sahitaṃ bhrātṝṇāṃ śatamūrjitam | duryodhanamamitraghnamutthitaṃ paryavārayat

अश्वत्थामा के साथ सौ बलशाली भाइयों ने शत्रुनाशक दुर्योधन को, जो उठ खड़ा हुआ था, घेर लिया।

श्लोक 33 (1.145.33)

स तैस्तदा भ्रातृभिरुद्यतायुधै- । र्गदाग्रपाणिः समवस्थितैर्वृतः । बभौ यथा दानवसंक्षये पुरा । पुरन्दरो देवगणैः समावृतः ॥

sa taistadā bhrātṛbhirudyatāyudhai- | rgadāgrapāṇiḥ samavasthitairvṛtaḥ | babhau yathā dānavasaṃkṣaye purā | purandaro devagaṇaiḥ samāvṛtaḥ

शस्त्र उठाए खड़े उन भाइयों से घिरा, हाथ में गदा लिए दुर्योधन ऐसा शोभित हुआ जैसे प्राचीन काल में दानवों के संहार के समय देवगणों से घिरे पुरन्दर (इन्द्र)।

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