आदि पर्व · अध्याय 148
द्रोण की गुरुदक्षिणा : द्रुपद का बन्दी होना
शिष्यों के अस्त्र-विद्या में निपुण हो जाने पर द्रोण गुरुदक्षिणा माँगते हैं — पाञ्चालराज द्रुपद को जीवित बन्दी बनाकर लाना। पहले कौरव राजकुमार आक्रमण करते हैं, पर द्रुपद और काम्पिल्य के नगरवासी उन्हें खदेड़ देते हैं, जबकि अर्जुन अपने भाइयों के साथ नगर के बाहर प्रतीक्षा करते हैं। फिर पाण्डव आगे बढ़ते हैं; भीम हाथियों की सेना को कुचल डालते हैं, और अर्जुन सत्यजित् को परास्त कर द्रुपद के रथ पर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं। द्रोण बन्दी राजा को पुराने अपमान की याद दिलाते हैं, बराबरी की मित्रता के लिए उन्हें आधा राज्य लौटा देते हैं और अहिच्छत्र अपने पास रखते हैं; क्षत्रिय-बल से जीत न पाने के कारण द्रुपद पुत्र-प्राप्ति का उपाय खोजने निकल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.148.1)
पाण्डवान्धार्तराष्ट्रांश्च कृतास्त्रान्प्रसमीक्ष्य सः । गुर्वर्थं दक्षिणां काले प्राप्तेऽमन्यत वै गुरुः ॥
pāṇḍavāndhārtarāṣṭrāṃśca kṛtāstrānprasamīkṣya saḥ | gurvarthaṃ dakṣiṇāṃ kāle prāpte'manyata vai guruḥ
जब गुरु ने देखा कि पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र अस्त्र-विद्या में निपुण हो गए हैं, तब उन्होंने माना कि गुरुदक्षिणा का समय आ गया है।
श्लोक 2 (1.148.2)
अस्त्रशिक्षामनुज्ञातान्रङ्गद्वारमुपागतान् । भारद्वाजस्ततस्तांस्तु सर्वानेवाभ्यभाषत ॥
astraśikṣāmanujñātānraṅgadvāramupāgatān | bhāradvājastatastāṃstu sarvānevābhyabhāṣata
जब वे अस्त्र-शिक्षा पूरी कर अनुमति पाकर रंगभूमि के द्वार पर आ पहुँचे, तब भरद्वाजपुत्र द्रोण ने उन सबसे कहा —
श्लोक 3 (1.148.3)
इच्छामि दत्तां सहितां मह्यं परमदक्षिणाम् । एवमुक्तास्ततः सर्वे शिष्या द्रोणमथाब्रुवन् । भगवन्किं प्रयच्छाम आज्ञापयतु नो गुरुः ॥
icchāmi dattāṃ sahitāṃ mahyaṃ paramadakṣiṇām | evamuktāstataḥ sarve śiṣyā droṇamathābruvan | bhagavankiṃ prayacchāma ājñāpayatu no guruḥ
"मैं चाहता हूँ कि तुम सब मिलकर मुझे श्रेष्ठ दक्षिणा दो।" ऐसा कहे जाने पर सब शिष्यों ने द्रोण से कहा — "भगवन्! हम क्या दें? गुरुदेव हमें आज्ञा दें।"
श्लोक 4 (1.148.4)
ततः शिष्यान्समाहूय आचार्योऽर्थमचोदयत् । द्रोणः सर्वानशेषेण दक्षिणार्थं महीपते ॥
tataḥ śiṣyānsamāhūya ācāryo'rthamacodayat | droṇaḥ sarvānaśeṣeṇa dakṣiṇārthaṃ mahīpate
हे पृथ्वीपति! तब आचार्य द्रोण ने सब शिष्यों को बुलाकर दक्षिणा के लिए उन सबको यह कार्य सौंपा —
द्रोण उवाच
श्लोक 5 (1.148.5)
पञ्चालराजं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि । पर्यानयत भद्रं वः सा स्यात्परमदक्षिणा ॥
pañcālarājaṃ drupadaṃ gṛhītvā raṇamūrdhani | paryānayata bhadraṃ vaḥ sā syātparamadakṣiṇā
"पाञ्चालराज द्रुपद को रणभूमि के अग्रभाग में पकड़कर यहाँ ले आओ। तुम्हारा कल्याण हो — वही श्रेष्ठ दक्षिणा होगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (1.148.6)
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे रथैस्तूर्णं प्रहारिणः । आचार्यधनदानार्थं द्रोणेन सहिता ययुः ॥
tathetyuktvā tu te sarve rathaistūrṇaṃ prahāriṇaḥ | ācāryadhanadānārthaṃ droṇena sahitā yayuḥ
"ऐसा ही हो" कहकर वे सब प्रहार को उत्सुक योद्धा गुरु का धन चुकाने के लिए द्रोण के साथ रथों पर शीघ्र चल पड़े।
श्लोक 7 (1.148.7)
ततोऽभिजग्मुः पञ्चालान्निघ्नन्तस्ते नरर्षभाः । ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महौजसः ॥
tato'bhijagmuḥ pañcālānnighnantaste nararṣabhāḥ | mamṛdustasya nagaraṃ drupadasya mahaujasaḥ
तब वे नरश्रेष्ठ पाञ्चालों का संहार करते हुए उन पर चढ़ आए और महाबली द्रुपद के नगर को रौंद डाला।
श्लोक 8 (1.148.8)
दुर्योधनश्च कर्णश्च युयुत्सुश्च महाबलः । दुःशासनो विकर्णश्च जलसन्धः सुलोचनः ॥
duryodhanaśca karṇaśca yuyutsuśca mahābalaḥ | duḥśāsano vikarṇaśca jalasandhaḥ sulocanaḥ
दुर्योधन और कर्ण, महाबली युयुत्सु, दुःशासन, विकर्ण, जलसन्ध और सुलोचन —
श्लोक 9 (1.148.9)
एते चान्ये च बहवः कुमारा बहुविक्रमाः । अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं क्षत्रियर्षभाः ॥
ete cānye ca bahavaḥ kumārā bahuvikramāḥ | ahaṃ pūrvamahaṃ pūrvamityevaṃ kṣatriyarṣabhāḥ
ये तथा अन्य बहुत-से पराक्रमी क्षत्रियश्रेष्ठ राजकुमार, "पहले मैं, पहले मैं" कहते हुए —
श्लोक 10 (1.148.10)
ततो वररथारूढाः कुमाराः सादिभिः सह । प्रविश्य नगरं सर्वे राजमार्गमुपाययुः ॥
tato vararathārūḍhāḥ kumārāḥ sādibhiḥ saha | praviśya nagaraṃ sarve rājamārgamupāyayuḥ
तब सब राजकुमार उत्तम रथों पर सवार होकर घुड़सवारों के साथ नगर में घुसे और राजमार्ग पर जा पहुँचे।
श्लोक 11 (1.148.11)
तस्मिन्काले तु पाञ्चालः श्रुत्वा दृष्ट्वा महद्बलम् । भ्रातृभिः सहितो राजंस्त्वरया निर्ययौ गृहात् ॥
tasminkāle tu pāñcālaḥ śrutvā dṛṣṭvā mahadbalam | bhrātṛbhiḥ sahito rājaṃstvarayā niryayau gṛhāt
हे राजन्! उसी समय पाञ्चालराज उस विशाल सेना के विषय में सुनकर और उसे देखकर अपने भाइयों के साथ शीघ्रता से महल से बाहर निकले।
श्लोक 12 (1.148.12)
ततस्तु कृतसन्नाहा यज्ञसेनसहोदराः । शरवर्षाणि मुञ्चन्तः प्रणेदुः सर्व एव ते ॥
tatastu kṛtasannāhā yajñasenasahodarāḥ | śaravarṣāṇi muñcantaḥ praṇeduḥ sarva eva te
तब कवच धारण किए यज्ञसेन के सब भाई बाणों की वर्षा करते हुए गरज उठे।
श्लोक 13 (1.148.13)
ततो रथेन शुभ्रेण समासाद्य तु कौरवान् । यज्ञसेनः शरान्घोरान्ववर्ष युधि दुर्जयः ॥
tato rathena śubhreṇa samāsādya tu kauravān | yajñasenaḥ śarānghorānvavarṣa yudhi durjayaḥ
तब युद्ध में दुर्जय यज्ञसेन अपने उज्ज्वल रथ से कौरवों के पास पहुँचे और उन पर भयंकर बाण बरसाने लगे।
श्लोक 14 (1.148.14)
पूर्वमेव तु संमन्त्र्य पार्थो द्रोणमथाऽब्रवीत् । दर्पोद्रेकात्कुमाराणामाचार्यं द्विजसत्तमम् ॥
pūrvameva tu saṃmantrya pārtho droṇamathā'bravīt | darpodrekātkumārāṇāmācāryaṃ dvijasattamam
इससे पहले ही राजकुमारों के बढ़े हुए दर्प को देखकर पार्थ ने विचार करके द्विजश्रेष्ठ आचार्य द्रोण से कहा था —
अर्जुन उवाच
श्लोक 15 (1.148.15)
एषां पराक्रमस्यान्ते वयं कुर्याम साहसम् । एतैरशक्यः पाञ्चालो ग्रहीतुं रणमूर्धनि ॥
eṣāṃ parākramasyānte vayaṃ kuryāma sāhasam | etairaśakyaḥ pāñcālo grahītuṃ raṇamūrdhani
"इनका पराक्रम समाप्त हो जाने के बाद हम साहस करेंगे। ये लोग पाञ्चालराज को रणभूमि में नहीं पकड़ सकते।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (1.148.16)
एवमुक्त्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सहितोऽनघः । अर्धक्रोशे तु नगरादतिष्ठद्बहिरेव सः ॥
evamuktvā tu kaunteyo bhrātṛbhiḥ sahito'naghaḥ | ardhakrośe tu nagarādatiṣṭhadbahireva saḥ
ऐसा कहकर निष्पाप कुन्तीपुत्र अपने भाइयों के साथ नगर से आधे कोस की दूरी पर बाहर ही ठहर गए।
श्लोक 17 (1.148.17)
द्रुपदः कौरवान्दृष्ट्वा प्राधावत समन्ततः । शरजालेन महता मोहयन्कौरवीं चमूम् ॥
drupadaḥ kauravāndṛṣṭvā prādhāvata samantataḥ | śarajālena mahatā mohayankauravīṃ camūm
द्रुपद ने कौरवों को देखकर बाणों के विशाल जाल से कौरव-सेना को मोहित करते हुए चारों ओर से उन पर धावा बोल दिया।
श्लोक 18 (1.148.18)
तमुद्यतं रथेनैकमाशुकारिणमाहवे । अनेकमिव सन्त्रासान्मेनिरे तत्र कौरवाः ॥
tamudyataṃ rathenaikamāśukāriṇamāhave | anekamiva santrāsānmenire tatra kauravāḥ
युद्ध में फुर्ती से प्रहार करते हुए एक ही रथ पर आक्रमण करते उन्हें कौरवों ने भय के मारे अनेक समझा।
श्लोक 19 (1.148.19)
द्रुपदस्य शरा घोरा विचेरुः सर्वतोदिशम् । ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्च सहस्रशः ॥
drupadasya śarā ghorā viceruḥ sarvatodiśam | tataḥ śaṅkhāśca bheryaśca mṛdaṅgāśca sahasraśaḥ
द्रुपद के भयंकर बाण सब दिशाओं में फैल गए। तब सहस्रों शंख, भेरियाँ और मृदंग
श्लोक 20 (1.148.20)
प्रावाद्यन्त महाराज पञ्चालानां निवेशने । सिंहनादश्च संजज्ञे पञ्चालानां महात्मनाम् ॥
prāvādyanta mahārāja pañcālānāṃ niveśane | siṃhanādaśca saṃjajñe pañcālānāṃ mahātmanām
हे महाराज! पाञ्चालों के नगर में बज उठे, और महामना पाञ्चालों का सिंहनाद गूँज उठा;
श्लोक 21 (1.148.21)
धनुर्ज्यातलशब्दश्च संस्पृश्य गगनं महान् । दुर्योधनो विकर्णश्च सुबाहुर्दीर्घलोचनः ॥
dhanurjyātalaśabdaśca saṃspṛśya gaganaṃ mahān | duryodhano vikarṇaśca subāhurdīrghalocanaḥ
साथ ही धनुष की डोरी के प्रहार का प्रचण्ड शब्द आकाश तक जा पहुँचा। दुर्योधन, विकर्ण, सुबाहु, दीर्घलोचन
श्लोक 22 (1.148.22)
दुःशासनश्च संक्रुद्धः शरवर्षैरवाकिरन् । सोऽतिविद्धो महेष्वासः पार्षतो युधि दुर्जयः ॥
duḥśāsanaśca saṃkruddhaḥ śaravarṣairavākiran | so'tividdho maheṣvāsaḥ pārṣato yudhi durjayaḥ
और दुःशासन ने क्रोध में भरकर उन पर बाणों की वर्षा कर दी। अत्यन्त घायल होकर भी युद्ध में दुर्जय महाधनुर्धर पार्षत (द्रुपद) ने
श्लोक 23 (1.148.23)
व्यधमत्तान्यनीकानि तत्क्षणादेव भारत । दुर्योधनं विकर्णं च कर्णं चापि महाबलम् ॥
vyadhamattānyanīkāni tatkṣaṇādeva bhārata | duryodhanaṃ vikarṇaṃ ca karṇaṃ cāpi mahābalam
हे भारत! क्षण-भर में उन सेनाओं को तितर-बितर कर दिया। दुर्योधन, विकर्ण और महाबली कर्ण को भी,
श्लोक 24 (1.148.24)
नानानृपसुतान्वीरान्सैन्यानि विविधानि च । अलातचक्रवत्सर्वं चरन्बाणैरतर्पयत् ॥
nānānṛpasutānvīrānsainyāni vividhāni ca | alātacakravatsarvaṃ caranbāṇairatarpayat
अनेक राजाओं के वीर पुत्रों और भाँति-भाँति की सेनाओं को — अलातचक्र की तरह घूमते हुए उन्होंने सबको बाणों से तृप्त कर दिया।
श्लोक 25 (1.148.25)
ततस्तु नागराः सर्वे मुसलैर्यष्टिभिस्तदा । अभ्यवर्षन्त कौरव्यान्वर्षमाणा घना इव ॥
tatastu nāgarāḥ sarve musalairyaṣṭibhistadā | abhyavarṣanta kauravyānvarṣamāṇā ghanā iva
तब सब नगरवासी मूसलों और लाठियों से कौरवों पर ऐसे टूट पड़े जैसे बरसते हुए बादल।
श्लोक 26 (1.148.26)
सबालवृद्धाः काम्पिल्याः कौरवानभ्ययुस्तदा । श्रुत्वा सुतुमुलं युद्धं कौरवानेव भारत ॥
sabālavṛddhāḥ kāmpilyāḥ kauravānabhyayustadā | śrutvā sutumulaṃ yuddhaṃ kauravāneva bhārata
हे भारत! काम्पिल्य के बालक और वृद्ध सब कौरवों पर चढ़ आए; और उस घोर युद्ध का कोलाहल सुनकर कौरव
श्लोक 27 (1.148.27)
द्रवन्तिस्म नदन्तिस्म क्रोशन्तः पाण्डवान्प्रति । पाण्डवास्तु स्वनं श्रुत्वा आर्तानां रोमहर्षणम् ॥
dravantisma nadantisma krośantaḥ pāṇḍavānprati | pāṇḍavāstu svanaṃ śrutvā ārtānāṃ romaharṣaṇam
चीखते-चिल्लाते पाण्डवों की ओर भागे। पाण्डवों ने उन पीड़ितों का रोंगटे खड़े कर देने वाला आर्तनाद सुना,
श्लोक 28 (1.148.28)
अभिवाद्य ततो द्रोणं रथानारुरुहुस्तदा । युधिष्ठिरं निवार्याशु मा युध्यस्वेति पाण्डवम् ॥
abhivādya tato droṇaṃ rathānāruruhustadā | yudhiṣṭhiraṃ nivāryāśu mā yudhyasveti pāṇḍavam
तब द्रोण को प्रणाम करके वे रथों पर चढ़ गए। पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को "आप युद्ध न करें" कहकर तुरन्त रोकते हुए
श्लोक 29 (1.148.29)
माद्रेयौ चक्ररक्षौ तु फाल्गुनश्च तदाऽकरोत् । सेनाग्रगो भीमसेनस्तदाभूद्गदया सह ॥
mādreyau cakrarakṣau tu phālgunaśca tadā'karot | senāgrago bhīmasenastadābhūdgadayā saha
फाल्गुन (अर्जुन) ने माद्री के दोनों पुत्रों को अपने रथ के पहियों का रक्षक बनाया। गदा लिए भीमसेन सेना के आगे-आगे चले।
श्लोक 30 (1.148.30)
तदा शत्रुस्वनं श्रुत्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः । आयाज्जवेन कौन्तेयो रथेनानादयन्दिशः ॥
tadā śatrusvanaṃ śrutvā bhrātṛbhiḥ sahito'naghaḥ | āyājjavena kaunteyo rathenānādayandiśaḥ
तब शत्रुओं का कोलाहल सुनकर निष्पाप कुन्तीपुत्र अपने भाइयों के साथ रथ की घरघराहट से दिशाओं को गुँजाते हुए वेग से आ पहुँचे।
श्लोक 31 (1.148.31)
पञ्चालानां ततः सेनामुद्धूतार्णवनिःस्वनाम् । भीमसेनो महाबाहुर्दण्डपाणिरिवान्तकः ॥
pañcālānāṃ tataḥ senāmuddhūtārṇavaniḥsvanām | bhīmaseno mahābāhurdaṇḍapāṇirivāntakaḥ
तब महाबाहु भीमसेन दण्डधारी यमराज के समान, उफनते सागर-सी गर्जना करती पाञ्चालों की उस सेना में
श्लोक 32 (1.148.32)
प्रविवेश महासेनां मकरः सागरं यथा । चतुरङ्गबलाकीर्णे ततस्तस्मिन्रणोत्सवे ॥
praviveśa mahāsenāṃ makaraḥ sāgaraṃ yathā | caturaṅgabalākīrṇe tatastasminraṇotsave
ऐसे घुस गए जैसे मगर सागर में प्रवेश करता है। तब चतुरंगिणी सेना से भरे उस युद्ध-महोत्सव में
श्लोक 33 (1.148.33)
स्वयमभ्यद्रवद्भीमो नागानीकं गदाधरः ॥
svayamabhyadravadbhīmo nāgānīkaṃ gadādharaḥ
गदाधारी भीम ने स्वयं हाथियों की सेना पर धावा बोला।
श्लोक 34 (1.148.34)
स युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चातुलः । अहनत्कुञ्जरानीकं गदया कालरूपधृक् ॥
sa yuddhakuśalaḥ pārtho bāhuvīryeṇa cātulaḥ | ahanatkuñjarānīkaṃ gadayā kālarūpadhṛk
युद्धकुशल और बाहुबल में अतुलनीय उस पृथापुत्र ने काल का रूप धारण कर गदा से हाथियों की सेना को मार गिराया।
श्लोक 35 (1.148.35)
ते गजा गिरिसङ्काशाः क्षरन्तो रुधिरं बहु । भीमसेनस्य गदया भिन्नमस्तकपिण्डकाः ॥
te gajā girisaṅkāśāḥ kṣaranto rudhiraṃ bahu | bhīmasenasya gadayā bhinnamastakapiṇḍakāḥ
पर्वत-जैसे विशाल वे हाथी, जिनके मस्तक और कुम्भस्थल भीमसेन की गदा से फट गए थे, बहुत-सा रक्त बहाते हुए
श्लोक 36 (1.148.36)
पतन्ति द्विरदा भूमौ वज्रघातादिवाचलाः । गजानश्वान्रथांश्चैव पातयामास पाण्डवः ॥
patanti dviradā bhūmau vajraghātādivācalāḥ | gajānaśvānrathāṃścaiva pātayāmāsa pāṇḍavaḥ
वज्र से आहत पर्वतों की भाँति भूमि पर गिरने लगे। पाण्डुपुत्र ने हाथियों, घोड़ों और रथों को धराशायी कर दिया;
श्लोक 37 (1.148.37)
पदातींश्च रथांश्चैव न्यवधीदर्जुनाग्रजः । गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान्वने ॥
padātīṃśca rathāṃścaiva nyavadhīdarjunāgrajaḥ | gopāla iva daṇḍena yathā paśugaṇānvane
अर्जुन के बड़े भाई ने पैदल सैनिकों और रथियों का वध किया — जैसे वन में ग्वाला डंडे से पशुओं के झुंड को हाँकता है।
श्लोक 38 (1.148.38)
चालयन्रथनागांश्च संचचाल वृकोदरः । भारद्वाजप्रियं कर्तुमुद्यतः फाल्गुनस्तदा ॥
cālayanrathanāgāṃśca saṃcacāla vṛkodaraḥ | bhāradvājapriyaṃ kartumudyataḥ phālgunastadā
रथों और हाथियों को खदेड़ते हुए वृकोदर रणभूमि में विचरने लगे। तब भरद्वाजपुत्र द्रोण का प्रिय करने को उद्यत फाल्गुन
श्लोक 39 (1.148.39)
पार्षतं शरजालेन क्षिपन्नागात्स पाण्डवः । हयौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च समन्ततः ॥
pārṣataṃ śarajālena kṣipannāgātsa pāṇḍavaḥ | hayaughāṃśca rathaughāṃśca gajaughāṃśca samantataḥ
बाणों का जाल फेंकते हुए पार्षत (द्रुपद) की ओर बढ़े। चारों ओर घोड़ों, रथों और हाथियों के समूहों को गिराते हुए वह पाण्डुपुत्र
श्लोक 40 (1.148.40)
पातयन्समरे राजन्युगान्ताग्निरिव ज्वलन् । ततस्ते हन्यमाना वै पञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ॥
pātayansamare rājanyugāntāgniriva jvalan | tataste hanyamānā vai pañcālāḥ sṛñjayāstathā
हे राजन्! युद्ध में प्रलयकाल की अग्नि के समान धधक उठे। तब मारे जाते हुए पाञ्चालों और सृंजयों ने
श्लोक 41 (1.148.41)
शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पार्थं संछाद्य सर्वशः । सिंहनादं मुखैः कृत्वा समयुध्यन्त पाण्डवम् ॥
śarairnānāvidhaistūrṇaṃ pārthaṃ saṃchādya sarvaśaḥ | siṃhanādaṃ mukhaiḥ kṛtvā samayudhyanta pāṇḍavam
शीघ्र ही नाना प्रकार के बाणों से पार्थ को सब ओर से ढक दिया और मुँह से सिंहनाद करते हुए उस पाण्डुपुत्र से युद्ध करने लगे।
श्लोक 42 (1.148.42)
तद्युद्धमभवद्धोरं सुमहाद्भुतदर्शनम् । सिंहनादस्वनं श्रुत्वा नामृष्यत्पाकशासनिः ॥
tadyuddhamabhavaddhoraṃ sumahādbhutadarśanam | siṃhanādasvanaṃ śrutvā nāmṛṣyatpākaśāsaniḥ
वह युद्ध भयंकर और देखने में अत्यन्त अद्भुत था। सिंहनाद का स्वर सुनकर इन्द्रपुत्र अर्जुन उसे सह न सके।
श्लोक 43 (1.148.43)
ततः किरीटी सहसा पञ्चालान्समरेऽद्रवत् । छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव ॥
tataḥ kirīṭī sahasā pañcālānsamare'dravat | chādayanniṣujālena mahatā mohayanniva
तब किरीटी अर्जुन सहसा युद्ध में पाञ्चालों पर टूट पड़े और बाणों के विशाल जाल से उन्हें मानो मोहित करते हुए ढक दिया।
श्लोक 44 (1.148.44)
शीघ्रमभ्यस्यतो बाणान्संदधानस्य चानिशम् । नान्तरं ददृशे किंचित्कौन्तेयस्य यशस्विनः ॥
śīghramabhyasyato bāṇānsaṃdadhānasya cāniśam | nāntaraṃ dadṛśe kiṃcitkaunteyasya yaśasvinaḥ
यशस्वी कुन्तीपुत्र इतनी शीघ्रता से बाण चलाते और निरन्तर संधान करते थे कि उनके बीच कोई अन्तराल दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 45 (1.148.45)
न दिशो नान्तरिक्षं च तदा नैव च मेदिनी । अदृश्यत महाराज तत्र किंचिन्न सङ्गरे ॥
na diśo nāntarikṣaṃ ca tadā naiva ca medinī | adṛśyata mahārāja tatra kiṃcinna saṅgare
हे महाराज! उस समय उस युद्ध में न दिशाएँ दिखाई देती थीं, न आकाश, न पृथ्वी — कुछ भी दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 46 (1.148.46)
पाञ्चालानां कुरूणां च साधुसाध्विति निस्वनः । तत्र तूर्यनिनादश्च शङ्खानां च महास्वनः ॥
pāñcālānāṃ kurūṇāṃ ca sādhusādhviti nisvanaḥ | tatra tūryaninādaśca śaṅkhānāṃ ca mahāsvanaḥ
पाञ्चालों और कुरुओं में "साधु! साधु!" का घोष उठा; वहाँ तुरहियों का निनाद और शंखों की महाध्वनि भी होने लगी,
श्लोक 47 (1.148.47)
सिंहनादश्च संजज्ञे साधुशब्देन मिश्रितः । ततः पाञ्चालराजस्तु तथा सत्यजिता सह ॥
siṃhanādaśca saṃjajñe sādhuśabdena miśritaḥ | tataḥ pāñcālarājastu tathā satyajitā saha
और साधुवाद से मिला हुआ सिंहनाद गूँज उठा। तब पाञ्चालराज सत्यजित् के साथ
श्लोक 48 (1.148.48)
त्वरमाणोऽभिदुद्राव महेन्द्रं शम्बरो यथा । महता शरवर्षेण पार्थः पाञ्चालमावृणोत् ॥
tvaramāṇo'bhidudrāva mahendraṃ śambaro yathā | mahatā śaravarṣeṇa pārthaḥ pāñcālamāvṛṇot
शीघ्रता से वैसे ही आगे दौड़े जैसे शम्बर महेन्द्र पर झपटा था। पार्थ ने बाणों की भारी वर्षा से पाञ्चालराज को ढक दिया।
श्लोक 49 (1.148.49)
ततो हलहलाशब्द आसीत्पाञ्चालके बले । जिघृक्षति महासिंहे गजानामिव यूथपम् ॥
tato halahalāśabda āsītpāñcālake bale | jighṛkṣati mahāsiṃhe gajānāmiva yūthapam
तब पाञ्चालों की सेना में भारी कोलाहल मच गया, जैसे किसी महासिंह के यूथपति हाथी को पकड़ने के लिए झपटने पर हाथियों में मचता है।
श्लोक 50 (1.148.50)
दृष्ट्वा पार्थं तदायान्तं सत्यजित्सत्यविक्रमः । पाञ्चालं वै परिप्रेप्सुर्धनञ्जयमदुद्रुवत् ॥
dṛṣṭvā pārthaṃ tadāyāntaṃ satyajitsatyavikramaḥ | pāñcālaṃ vai pariprepsurdhanañjayamadudruvat
पार्थ को आते देखकर सच्चे पराक्रम वाले सत्यजित् पाञ्चालराज की रक्षा करने की इच्छा से धनंजय की ओर दौड़े।
श्लोक 51 (1.148.51)
ततस्त्वर्जुनपाञ्चालौ युद्धाय समुपागतौ । व्यक्षोभयेतां तौ सैन्यमिन्द्रवैरोचनाविव ॥
tatastvarjunapāñcālau yuddhāya samupāgatau | vyakṣobhayetāṃ tau sainyamindravairocanāviva
तब अर्जुन और वह पाञ्चाल वीर युद्ध के लिए आमने-सामने आ डटे और इन्द्र तथा विरोचनपुत्र (बलि) की भाँति उन्होंने सेना को मथ डाला।
श्लोक 52 (1.148.52)
ततः सत्यजितं पार्थो दशभिर्मर्मभेदिभिः । विव्याध बलवद्गाढं तदद्भुतमिवाभवत् ॥
tataḥ satyajitaṃ pārtho daśabhirmarmabhedibhiḥ | vivyādha balavadgāḍhaṃ tadadbhutamivābhavat
तब पार्थ ने मर्मस्थलों को भेदने वाले दस बाणों से सत्यजित् को बलपूर्वक गहरा बींध दिया; यह एक अद्भुत-सी बात थी।
श्लोक 53 (1.148.53)
ततः शरशतैः पार्थं पाञ्चालः शीघ्रमार्दयत् । पार्थस्तु शरवर्षेण च्छाद्यमानो महारथः ॥
tataḥ śaraśataiḥ pārthaṃ pāñcālaḥ śīghramārdayat | pārthastu śaravarṣeṇa cchādyamāno mahārathaḥ
तब उस पाञ्चाल वीर ने शीघ्र ही सैकड़ों बाणों से पार्थ को पीड़ित किया। बाणों की वर्षा से ढके जाते हुए महारथी पार्थ ने
श्लोक 54 (1.148.54)
वेगं चक्रे महावेगो धनुर्ज्यामवमृज्य च । ततः सत्यजितश्चापं छित्त्वा राजानमभ्ययात् ॥
vegaṃ cakre mahāvego dhanurjyāmavamṛjya ca | tataḥ satyajitaścāpaṃ chittvā rājānamabhyayāt
महान् वेगशाली होने के कारण और अधिक वेग पकड़ा, और धनुष की डोरी को पोंछकर सत्यजित् का धनुष काट डाला तथा राजा की ओर बढ़े।
श्लोक 55 (1.148.55)
अथान्यद्धनुरादाय सत्यजिद्वेगवत्तरम् । साश्वं ससूतं सरथं पार्थं विव्याध सत्वरः ॥
athānyaddhanurādāya satyajidvegavattaram | sāśvaṃ sasūtaṃ sarathaṃ pārthaṃ vivyādha satvaraḥ
तब सत्यजित् ने दूसरा, और भी वेगवान् धनुष उठाकर शीघ्र ही घोड़ों, सारथि और रथ सहित पार्थ को बींध दिया।
श्लोक 56 (1.148.56)
स तं न ममृषे पार्थः पाञ्चालेनार्दितो युधि । ततस्तस्य विनाशार्थं सत्वरं व्यसृजच्छरान् ॥
sa taṃ na mamṛṣe pārthaḥ pāñcālenārdito yudhi | tatastasya vināśārthaṃ satvaraṃ vyasṛjaccharān
युद्ध में पाञ्चाल वीर से पीड़ित पार्थ यह सह न सके, और उसका विनाश करने के लिए उन्होंने तेज़ी से बाण छोड़े —
श्लोक 57 (1.148.57)
हयान्ध्वजं धनुर्मुष्टिमुभौ तौ पार्ष्णिसारथी । स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः ॥
hayāndhvajaṃ dhanurmuṣṭimubhau tau pārṣṇisārathī | sa tathā bhidyamāneṣu kārmukeṣu punaḥ punaḥ
उसके घोड़ों, ध्वज, धनुष और मुट्ठी पर, तथा पार्श्व की रक्षा करने वाले दोनों सारथियों पर। बार-बार धनुष टूटने
श्लोक 58 (1.148.58)
हयेषु विनिकृत्तेषु विमुखोऽभवदाहवे । स सत्यजितमालोक्य तथा विमुखमाहवे ॥
hayeṣu vinikṛtteṣu vimukho'bhavadāhave | sa satyajitamālokya tathā vimukhamāhave
और घोड़ों के कट जाने पर सत्यजित् युद्ध से विमुख हो गया। सत्यजित् को इस प्रकार युद्ध से विमुख देखकर
श्लोक 59 (1.148.59)
वेगेन महता राजन्नभ्यधावत पार्षतम् । तदा चक्रे महद्युद्धमर्जुनो जयतां वरः ॥
vegena mahatā rājannabhyadhāvata pārṣatam | tadā cakre mahadyuddhamarjuno jayatāṃ varaḥ
हे राजन्! अर्जुन बड़े वेग से पार्षत (द्रुपद) की ओर दौड़े; तब विजेताओं में श्रेष्ठ अर्जुन ने भीषण युद्ध किया।
श्लोक 60 (1.148.60)
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा ध्वजं चोर्व्यामपातयत् । पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान्सूतं च सायकैः ॥
tasya pārtho dhanuśchittvā dhvajaṃ corvyāmapātayat | pañcabhistasya vivyādha hayānsūtaṃ ca sāyakaiḥ
पार्थ ने उनका धनुष काटकर ध्वज को पृथ्वी पर गिरा दिया और पाँच बाणों से उनके घोड़ों तथा सारथि को बींध डाला।
श्लोक 61 (1.148.61)
तत उत्सृज्य तच्चापमाददानः शरावरम् । खड्गमुद्धृत्य कौन्तेयः सिंहनादमथाकरोत् ॥
tata utsṛjya taccāpamādadānaḥ śarāvaram | khaḍgamuddhṛtya kaunteyaḥ siṃhanādamathākarot
तब कुन्तीपुत्र ने अपना धनुष छोड़कर ढाल उठाई, तलवार खींच ली और सिंहनाद किया।
श्लोक 62 (1.148.62)
पाञ्चालस्य रथस्येषामाप्लुत्य सहसाऽपतत् । पाञ्चालरथमास्थाय अवित्रस्तो धनञ्जयः ॥
pāñcālasya rathasyeṣāmāplutya sahasā'patat | pāñcālarathamāsthāya avitrasto dhanañjayaḥ
वे उछलकर सहसा पाञ्चालराज के रथ के जुए-दण्ड पर जा उतरे। पाञ्चाल के रथ पर खड़े होकर निर्भय धनंजय ने
श्लोक 63 (1.148.63)
विक्षोभ्याम्भोनिधिं तार्क्ष्यस्तं नागमिव सोऽग्रहीत् । ततस्तु सर्वपाञ्चाला विद्रवन्ति दिशो दश ॥
vikṣobhyāmbhonidhiṃ tārkṣyastaṃ nāgamiva so'grahīt | tatastu sarvapāñcālā vidravanti diśo daśa
उन्हें वैसे ही पकड़ लिया जैसे गरुड़ समुद्र को मथकर नाग को पकड़ लेते हैं। तब सब पाञ्चाल दसों दिशाओं में भाग खड़े हुए।
श्लोक 64 (1.148.64)
दर्शयन्सर्वसैन्यानां स बाह्वोर्बलमात्मनः । सिंहनादस्वनं कृत्वा निर्जगाम धनञ्जयः ॥
darśayansarvasainyānāṃ sa bāhvorbalamātmanaḥ | siṃhanādasvanaṃ kṛtvā nirjagāma dhanañjayaḥ
सब सेनाओं को अपनी भुजाओं का बल दिखाते हुए धनंजय सिंहनाद करके बाहर निकल आए।
श्लोक 65 (1.148.65)
आयान्तमर्जुनं दृष्ट्वा कुमाराः सहितास्तदा । ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महात्मनः ॥
āyāntamarjunaṃ dṛṣṭvā kumārāḥ sahitāstadā | mamṛdustasya nagaraṃ drupadasya mahātmanaḥ
अर्जुन को आते देखकर राजकुमारों ने मिलकर महात्मा द्रुपद के नगर को रौंदना आरम्भ कर दिया।
अर्जुन उवाच
श्लोक 66 (1.148.66)
संबन्धी कुरुवीराणां द्रुपदो राजसत्तमः । मा वधीस्तद्बलं भीम गुरुदानं प्रदीयताम् ॥
saṃbandhī kuruvīrāṇāṃ drupado rājasattamaḥ | mā vadhīstadbalaṃ bhīma gurudānaṃ pradīyatām
अर्जुन ने कहा — "राजश्रेष्ठ द्रुपद कुरुवीरों के सम्बन्धी हैं। हे भीम! उनकी सेना का वध मत करो; गुरु को दक्षिणा दी जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 67 (1.148.67)
भीमसेनस्तदा राजन्नर्जुनेन निवारितः । अतृप्तो युद्धधर्मेषु न्यवर्तत महाबलः ॥
bhīmasenastadā rājannarjunena nivāritaḥ | atṛpto yuddhadharmeṣu nyavartata mahābalaḥ
हे राजन्! अर्जुन के रोकने पर महाबली भीमसेन युद्ध-कर्म से अतृप्त रहते हुए भी लौट आए।
श्लोक 68 (1.148.68)
ते यज्ञसेनं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि । उपाजग्मुः सहामात्यं द्रोणाय भरतर्षभ ॥
te yajñasenaṃ drupadaṃ gṛhītvā raṇamūrdhani | upājagmuḥ sahāmātyaṃ droṇāya bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! वे रणभूमि के अग्रभाग में पकड़े गए यज्ञसेन द्रुपद को उनके मन्त्रियों सहित द्रोण के पास ले आए।
श्लोक 69 (1.148.69)
भग्नदर्पं हृतधनं तं तथा वशमागतम् । स वैरं मनसा ध्यात्वा द्रोणो द्रुपदमब्रवीत् ॥
bhagnadarpaṃ hṛtadhanaṃ taṃ tathā vaśamāgatam | sa vairaṃ manasā dhyātvā droṇo drupadamabravīt
द्रुपद का अभिमान चूर हो चुका था, धन छिन गया था और वे इस प्रकार वश में आ गए थे; तब मन में पुराने वैर का स्मरण करते हुए द्रोण ने उनसे कहा —
द्रोण उवाच
श्लोक 70 (1.148.70)
विमृज्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मया । प्राप्य जीवन्रिपुवशं सखिपूर्वं किमिष्यते ॥
vimṛjya tarasā rāṣṭraṃ puraṃ te mṛditaṃ mayā | prāpya jīvanripuvaśaṃ sakhipūrvaṃ kimiṣyate
"मैंने बलपूर्वक तुम्हारा राष्ट्र उजाड़ दिया और तुम्हारा नगर रौंद डाला। जीते-जी शत्रु के वश में आकर अब तुम पुरानी मित्रता से क्या चाहते हो?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 71 (1.148.71)
एवमुक्त्वा प्रहस्यैनं किंचित्स पुनरब्रवीत् । मा भैः प्राणभयाद्वीर क्षमिणो ब्राह्मणा वयम् ॥
evamuktvā prahasyainaṃ kiṃcitsa punarabravīt | mā bhaiḥ prāṇabhayādvīra kṣamiṇo brāhmaṇā vayam
ऐसा कहकर वे उन पर कुछ हँसे और फिर बोले — "हे वीर! प्राणों का भय मत करो; हम ब्राह्मण क्षमाशील होते हैं।
द्रोण उवाच
श्लोक 72 (1.148.72)
आश्रमे क्रीडितं यत्तु त्वया बाल्ये मया सह । तेन संवर्धितः स्नेहः प्रीतिश्च क्षत्रियर्षभ ॥
āśrame krīḍitaṃ yattu tvayā bālye mayā saha | tena saṃvardhitaḥ snehaḥ prītiśca kṣatriyarṣabha
"हे क्षत्रियश्रेष्ठ! बचपन में आश्रम में तुम मेरे साथ जो खेले, उससे हमारे बीच स्नेह और प्रीति बढ़ी थी।
श्लोक 73 (1.148.73)
प्रार्थयेयं त्वया सख्यं पुनरेव जनाधिप । वरं ददामि ते राजन्राज्यस्यार्धमवाप्नुहि ॥
prārthayeyaṃ tvayā sakhyaṃ punareva janādhipa | varaṃ dadāmi te rājanrājyasyārdhamavāpnuhi
"हे जनाधिप! मैं फिर से तुम्हारी मित्रता चाहता हूँ। हे राजन्! मैं तुम्हें वर देता हूँ — आधा राज्य ले लो।
श्लोक 74 (1.148.74)
अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हति । अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन मया तव ॥
arājā kila no rājñaḥ sakhā bhavitumarhati | ataḥ prayatitaṃ rājye yajñasena mayā tava
"कहते हैं कि जो राजा नहीं है, वह राजा का मित्र नहीं हो सकता। हे यज्ञसेन! इसीलिए मैंने तुम्हारे राज्य के लिए यह प्रयत्न किया।
श्लोक 75 (1.148.75)
राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे । सखायं मां विजानीहि पाञ्चाल यदि मन्यसे ॥
rājāsi dakṣiṇe kūle bhāgīrathyāhamuttare | sakhāyaṃ māṃ vijānīhi pāñcāla yadi manyase
"तुम भागीरथी के दक्षिणी तट पर राजा हो और मैं उत्तरी तट पर। हे पाञ्चाल! यदि उचित समझो तो मुझे अपना मित्र मानो।"
द्रुपद उवाच
श्लोक 76 (1.148.76)
अनाश्चर्यमिदं ब्रह्मन्विक्रान्तेषु महात्मसु । प्रीये त्वयाऽहं त्वत्तश्च प्रीतिमिच्छामि शाश्वतीम् ॥
anāścaryamidaṃ brahmanvikrānteṣu mahātmasu | prīye tvayā'haṃ tvattaśca prītimicchāmi śāśvatīm
द्रुपद ने कहा — "हे ब्रह्मन्! पराक्रमी महात्माओं में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मैं आपसे प्रसन्न हूँ और आपकी चिरस्थायी प्रीति चाहता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 77 (1.148.77)
एवमुक्तः स तं द्रोणो मोक्षयामास भारत । सत्कृत्य चैनं प्रीतात्मा राज्यार्धं प्रत्यपादयत् ॥
evamuktaḥ sa taṃ droṇo mokṣayāmāsa bhārata | satkṛtya cainaṃ prītātmā rājyārdhaṃ pratyapādayat
हे भारत! ऐसा कहे जाने पर द्रोण ने उन्हें मुक्त कर दिया, और प्रसन्नचित्त होकर उनका सत्कार करते हुए उन्हें आधा राज्य सौंप दिया।
श्लोक 78 (1.148.78)
माकन्दीमथ गङ्गायास्तीरे जनपदायुताम् । सोऽध्यावसद्दीनमनाः काम्पिल्यं च पुरोत्तमम् ॥
mākandīmatha gaṅgāyāstīre janapadāyutām | so'dhyāvasaddīnamanāḥ kāmpilyaṃ ca purottamam
तब खिन्न मन से द्रुपद गंगा के तट पर बसे जनपदों से भरे माकन्दी में तथा श्रेष्ठ नगरी काम्पिल्य में रहने लगे,
श्लोक 79 (1.148.79)
दक्षिणांश्चापि पञ्चालान्यावच्चर्मण्वती नदी । द्रोणेन चैवं द्रुपदः परिभूयाथ पालितः ॥
dakṣiṇāṃścāpi pañcālānyāvaccarmaṇvatī nadī | droṇena caivaṃ drupadaḥ paribhūyātha pālitaḥ
और चर्मण्वती नदी तक फैले दक्षिण पाञ्चाल पर शासन करने लगे। इस प्रकार द्रोण से पराभूत होकर द्रुपद उन्हीं के द्वारा संरक्षित हुए।
श्लोक 80 (1.148.80)
क्षात्रेण च बलेनास्य नापश्यत्स पराजयम् । हीनं विदित्वा चात्मानं ब्राह्मेण स बलेन तु ॥
kṣātreṇa ca balenāsya nāpaśyatsa parājayam | hīnaṃ viditvā cātmānaṃ brāhmeṇa sa balena tu
क्षत्रिय-बल से उन्हें द्रोण को पराजित करने का कोई उपाय नहीं दिखा, और ब्राह्मण-बल में अपने को हीन जानकर
श्लोक 81 (1.148.81)
पुत्रजन्म परीप्सन्वै पृथिवीमन्वसंचरत् । अहिच्छत्रं च विषयं द्रोणः समभिपद्यत ॥
putrajanma parīpsanvai pṛthivīmanvasaṃcarat | ahicchatraṃ ca viṣayaṃ droṇaḥ samabhipadyata
पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से वे पृथ्वी पर घूमने लगे। और द्रोण ने अहिच्छत्र प्रदेश को अपने अधिकार में ले लिया।
श्लोक 82 (1.148.82)
एवं राजन्नहिच्छत्रा पुरीजनपदायुता । युधि निर्जित्य पार्थेन द्रोणाय प्रतिपादिता ॥
evaṃ rājannahicchatrā purījanapadāyutā | yudhi nirjitya pārthena droṇāya pratipāditā
हे राजन्! इस प्रकार जनपदों सहित अहिच्छत्र नगरी पार्थ ने युद्ध में जीतकर द्रोण को सौंप दी।