आदि पर्व · अध्याय 149
धृष्टद्युम्न और द्रौपदी का जन्म
द्रोण द्वारा हुए अपमान को न भूल पाने वाले द्रुपद ब्राह्मणों की बस्तियों में ऐसे पुरोहित की खोज करते हैं जो उन्हें द्रोण का वध करने वाला पुत्र दे सके। छोटे ऋषि उपयाज मना कर देते हैं, पर एक वर्ष की सेवा के बाद उन्हें अपने बड़े भाई याज के पास भेजते हैं, जो यज्ञ करना स्वीकार कर लेते हैं। अग्नि से कवचधारी कुमार धृष्टद्युम्न और वेदी से साँवली, तेजस्विनी कृष्णा प्रकट होती हैं, और आकाशवाणी द्रोण की मृत्यु तथा क्षत्रियों के विनाश की भविष्यवाणी करती है। होनी को अटल मानकर द्रोण धृष्टद्युम्न को अस्त्र-शिक्षा के लिए शिष्य बना लेते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.149.1)
द्रोणेन वैरं द्रुपदो न सुष्वाप स्मरंस्तदा । क्षात्रेण वै बलेनास्य नाऽशशंसे पराजयम् ॥
droṇena vairaṃ drupado na suṣvāpa smaraṃstadā | kṣātreṇa vai balenāsya nā'śaśaṃse parājayam
द्रोण से अपने वैर को याद करते हुए द्रुपद को तब नींद नहीं आती थी; क्षत्रिय-बल से उन्हें पराजित कर पाने की आशा भी उन्हें नहीं थी।
श्लोक 2 (1.149.2)
हीनं विदित्वा चात्मानं ब्राह्मेणापि बलेन च । द्रुपदोऽमर्षणाद्राजा कर्मसिद्धान्द्विजोत्तमान् ॥
hīnaṃ viditvā cātmānaṃ brāhmeṇāpi balena ca | drupado'marṣaṇādrājā karmasiddhāndvijottamān
यह जानकर कि वे ब्रह्म-बल में भी उनसे हीन हैं, अपमान सहन न कर पाने वाले राजा द्रुपद कर्मकाण्ड में सिद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मणों की खोज में निकले।
श्लोक 3 (1.149.3)
अन्विच्छन्परिचक्राम ब्राह्मणावसथान्बहून् । नास्ति श्रेष्ठं ममापत्यं धिग्बन्धूनिति च ब्रुवन् ॥
anvicchanparicakrāma brāhmaṇāvasathānbahūn | nāsti śreṣṭhaṃ mamāpatyaṃ dhigbandhūniti ca bruvan
उन्हें खोजते हुए वे ब्राह्मणों के अनेक आश्रमों में घूमते रहे और कहते रहे — "मेरी कोई श्रेष्ठ संतान नहीं है; मेरे बन्धु-बान्धवों को धिक्कार है!"
श्लोक 4 (1.149.4)
निश्वासपरमो ह्यासीद्द्रोणं प्रतिचिकीर्षया । न सन्ति मम मित्राणि लोकेऽस्मिन्नास्ति वीर्यवान् ॥
niśvāsaparamo hyāsīddroṇaṃ praticikīrṣayā | na santi mama mitrāṇi loke'sminnāsti vīryavān
द्रोण से बदला लेने की इच्छा से वे बस लम्बी साँसें भरते रहते थे — "मेरे कोई मित्र नहीं हैं; इस लोक में कोई पराक्रमी नहीं है।"
श्लोक 5 (1.149.5)
पुत्रजन्म परीप्सन्वै पृथिवीमन्वयादिमाम् । प्रभावशिक्षाविनयाद्द्रोणस्यास्त्रबलेन च ॥
putrajanma parīpsanvai pṛthivīmanvayādimām | prabhāvaśikṣāvinayāddroṇasyāstrabalena ca
पुत्र-जन्म की कामना से वे इस पृथ्वी पर घूमते रहे। पर द्रोण के प्रभाव, शिक्षा और विनय के कारण, तथा उनके अस्त्र-बल के कारण,
श्लोक 6 (1.149.6)
कर्तुं प्रयतमानो वै न शशाक पराजयम् । अभितः सोऽथ कल्माषीं गङ्गातीरे परिभ्रमन् ॥
kartuṃ prayatamāno vai na śaśāka parājayam | abhitaḥ so'tha kalmāṣīṃ gaṅgātīre paribhraman
प्रयत्न करते हुए भी वे उनकी पराजय नहीं कर सके। तब कल्माषी के आस-पास गंगा के तट पर घूमते हुए
श्लोक 7 (1.149.7)
ब्राह्मणावसथं पुण्यमाससाद महीपतिः । तत्र नास्नातकः कश्चिन्न चासीदव्रतो द्विजः ॥
brāhmaṇāvasathaṃ puṇyamāsasāda mahīpatiḥ | tatra nāsnātakaḥ kaścinna cāsīdavrato dvijaḥ
राजा एक पवित्र ब्राह्मण-बस्ती में पहुँचे। वहाँ कोई ऐसा द्विज नहीं था जो स्नातक न हो, और न कोई व्रतहीन था।
श्लोक 8 (1.149.8)
तथैव तौ महाभागौ सोऽपश्यच्छंसितव्रतौ । याजोपयाजौ ब्रह्मर्षी भ्रातरौ पृषतात्मजः ॥
tathaiva tau mahābhāgau so'paśyacchaṃsitavratau | yājopayājau brahmarṣī bhrātarau pṛṣatātmajaḥ
वहीं पृषत के पुत्र द्रुपद ने प्रशंसनीय व्रतों वाले दो महाभाग ब्रह्मर्षि भाइयों — याज और उपयाज — को देखा,
श्लोक 9 (1.149.9)
संहिताध्ययने युक्तौ गोत्रतश्चापि काश्यपौ । अरण्ये युक्तरूपौ तौ ब्राह्मणावृषिसत्तमौ ॥
saṃhitādhyayane yuktau gotrataścāpi kāśyapau | araṇye yuktarūpau tau brāhmaṇāvṛṣisattamau
जो संहिता के अध्ययन में लगे रहते थे और गोत्र से काश्यप थे — वन-जीवन के योग्य, ऋषियों में श्रेष्ठ दो ब्राह्मण।
श्लोक 10 (1.149.10)
स उपामन्त्रयामास सर्वकामैरतन्द्रितः । बुद्ध्वा तयोर्बलं बुद्धिं कनीयांसमुपह्वरे ॥
sa upāmantrayāmāsa sarvakāmairatandritaḥ | buddhvā tayorbalaṃ buddhiṃ kanīyāṃsamupahvare
उन्होंने बिना थके, सब मनचाही वस्तुएँ देने का प्रस्ताव रखकर उन्हें आमन्त्रित किया। उनके बल और बुद्धि को परखकर वे एकान्त में छोटे भाई के पास पहुँचे —
श्लोक 11 (1.149.11)
प्रपेदे छन्दयन्कामैरुपयाजं धृतव्रतम् । गुरुशुश्रूषणे युक्तः प्रियकृत्सर्वकामदम् ॥
prapede chandayankāmairupayājaṃ dhṛtavratam | guruśuśrūṣaṇe yuktaḥ priyakṛtsarvakāmadam
दृढ़व्रती उपयाज के पास — और सब कामनाओं से उन्हें लुभाने लगे। गुरु की भाँति उनकी सेवा में लगे, उनका प्रिय करते और सब इच्छाएँ पूरी करते हुए
श्लोक 12 (1.149.12)
पाद्येनासनदानेन तथाऽर्घ्येण फलैश्च तम् । अर्हयित्वा यथान्यायमुपयाजोऽब्रवीत्ततः ॥
pādyenāsanadānena tathā'rghyeṇa phalaiśca tam | arhayitvā yathānyāyamupayājo'bravīttataḥ
उन्होंने पाद्य, आसन, अर्घ्य और फलों से विधिपूर्वक उनका सत्कार किया। तब उपयाज बोले —
उपयाज उवाच
श्लोक 13 (1.149.13)
येन कार्यविशेषेण त्वमस्मानभिकाङ्क्षसे । कृतश्चायं समुद्योगस्तद्ब्रवीतु भवानिति ॥
yena kāryaviśeṣeṇa tvamasmānabhikāṅkṣase | kṛtaścāyaṃ samudyogastadbravītu bhavāniti
"किस विशेष कार्य के लिए आप हमें चाहते हैं, और यह सारा प्रयास किसलिए किया गया है? यह आप बताइए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (1.149.14)
स बुद्ध्वा प्रीतिसंयुक्तमृषीणामुत्तमं तदा । उवाच छन्दयन्कामैर्द्रुपदः स तपस्विनम् ॥
sa buddhvā prītisaṃyuktamṛṣīṇāmuttamaṃ tadā | uvāca chandayankāmairdrupadaḥ sa tapasvinam
यह देखकर कि ऋषियों में श्रेष्ठ उपयाज प्रसन्न हैं, द्रुपद ने तब मनचाही वस्तुओं का प्रलोभन देते हुए उन तपस्वी से कहा —
द्रुपद उवाच
श्लोक 15 (1.149.15)
येन मे कर्मणा ब्रह्मन्पुत्रः स्याद्द्रोणमृत्यवे । उपयाज चरस्वैतत्प्रदास्यामि धनं तव ॥
yena me karmaṇā brahmanputraḥ syāddroṇamṛtyave | upayāja carasvaitatpradāsyāmi dhanaṃ tava
"हे ब्रह्मन् उपयाज! वह कर्म कीजिए जिससे मुझे ऐसा पुत्र मिले जो द्रोण की मृत्यु बने; मैं आपको धन दूँगा।"
उपयाज उवाच
श्लोक 16 (1.149.16)
नाहं फलार्थी द्रुपद योऽर्थी स्यात्तत्र गम्यताम् । प्रत्याख्यातस्तु तेनैवं स वै सज्जनसंनिधौ ॥
nāhaṃ phalārthī drupada yo'rthī syāttatra gamyatām | pratyākhyātastu tenaivaṃ sa vai sajjanasaṃnidhau
"द्रुपद! मैं फल का इच्छुक नहीं हूँ; जो इच्छुक हो, उसके पास जाइए।" सज्जनों के सामने इस प्रकार उनके द्वारा मना कर दिए जाने पर
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (1.149.17)
आराधयिष्यन्द्रुपदः स तं पर्यचरत्तदा । ततः संवत्सरस्यान्ते द्रुपदं द्विजसत्तमः ॥
ārādhayiṣyandrupadaḥ sa taṃ paryacarattadā | tataḥ saṃvatsarasyānte drupadaṃ dvijasattamaḥ
द्रुपद उन्हें प्रसन्न करने की आशा से उनकी सेवा करते रहे। फिर एक वर्ष बीतने पर वे श्रेष्ठ द्विज
श्लोक 18 (1.149.18)
उपयाजोऽब्रवीद्वाक्यं काले मधुरया गिरा । ज्येष्ठो भ्राता न मेऽत्याक्षीद्विचरन्विजने वने ॥
upayājo'bravīdvākyaṃ kāle madhurayā girā | jyeṣṭho bhrātā na me'tyākṣīdvicaranvijane vane
उपयाज उचित समय आने पर मधुर वाणी में द्रुपद से बोले — "मेरे बड़े भाई ने निर्जन वन में घूमते हुए
उपयाज उवाच
श्लोक 19 (1.149.19)
अपरिज्ञातशौचायां भूमौ निपतितं फलम् । तदपश्यमहं भ्रातुरसांप्रतमनुव्रजन् ॥
aparijñātaśaucāyāṃ bhūmau nipatitaṃ phalam | tadapaśyamahaṃ bhrāturasāṃpratamanuvrajan
ऐसी भूमि पर गिरे फल को नहीं छोड़ा जिसकी शुद्धता का पता नहीं था। भाई के पीछे-पीछे चलते हुए मैंने उनका यह अनुचित आचरण देखा।
श्लोक 20 (1.149.20)
विमर्शं हि फलादाने नायं कुर्यात्कथंचन । नापश्यत्फलं दृष्ट्वा दोषांस्तस्याऽऽनुबन्धिकान् ॥
vimarśaṃ hi phalādāne nāyaṃ kuryātkathaṃcana | nāpaśyatphalaṃ dṛṣṭvā doṣāṃstasyā''nubandhikān
फल लेते समय वे कभी सोच-विचार नहीं करते; फल को देखकर उन्हें उससे जुड़े दोष दिखाई नहीं दिए।
श्लोक 21 (1.149.21)
विविनक्ति न शौचार्थी सोऽन्यत्रापि कथं भवेत् । संहिताध्ययनस्यान्ते पञ्चयज्ञान्निरूप्य च ॥
vivinakti na śaucārthī so'nyatrāpi kathaṃ bhavet | saṃhitādhyayanasyānte pañcayajñānnirūpya ca
जो शुद्धि का ध्यान रखने वाला होकर भी यहाँ भेद नहीं करता, वह अन्य बातों में भी भिन्न कैसे होगा? संहिता-पाठ के अन्त में पञ्चयज्ञ सम्पन्न करके
श्लोक 22 (1.149.22)
भैक्षमुञ्छेन सहितं भुञ्जानस्तु तदा तदा । कीर्तयत्येव राजर्षे भोजनस्य रसं पुनः ॥
bhaikṣamuñchena sahitaṃ bhuñjānastu tadā tadā | kīrtayatyeva rājarṣe bhojanasya rasaṃ punaḥ
वे समय-समय पर उञ्छवृत्ति से मिले अन्न के साथ भिक्षा का भोजन करते हैं, और हे राजर्षि, बार-बार भोजन के स्वाद की प्रशंसा करते रहते हैं।
श्लोक 23 (1.149.23)
संहिताध्ययनं कुर्वन्वने गुरुकुले वसन् । भैक्षमुच्छिष्टमन्येषां भुङ्क्ते स्म सततं तथा ॥
saṃhitādhyayanaṃ kurvanvane gurukule vasan | bhaikṣamucchiṣṭamanyeṣāṃ bhuṅkte sma satataṃ tathā
वन में गुरुकुल में रहकर संहिता का अध्ययन करते समय भी वे सदा दूसरों की जूठी भिक्षा खाया करते थे,
श्लोक 24 (1.149.24)
कीर्तयन्गुणमन्नानामथ प्रीतो मुहुर्मुहुः । एवं फलार्थिनं तस्मान्मन्येऽहं तर्कचक्षुषा ॥
kīrtayanguṇamannānāmatha prīto muhurmuhuḥ | evaṃ phalārthinaṃ tasmānmanye'haṃ tarkacakṣuṣā
और प्रसन्न होकर बार-बार अन्न के गुणों का बखान करते थे। इसलिए तर्क की दृष्टि से मैं उन्हें फल का इच्छुक मानता हूँ।
श्लोक 25 (1.149.25)
तं वै गच्छेह नृपते त्वां स संयाजयिष्यति ॥
taṃ vai gaccheha nṛpate tvāṃ sa saṃyājayiṣyati
हे राजन्, उन्हीं के पास जाइए; वे आपका यज्ञ करा देंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (1.149.26)
उपयाजवचः श्रुत्वा याजस्याश्रममभ्यगात् । जुगुप्समानो नृपतिर्मनसेदं विचिन्तयन् ॥
upayājavacaḥ śrutvā yājasyāśramamabhyagāt | jugupsamāno nṛpatirmanasedaṃ vicintayan
उपयाज की बात सुनकर राजा याज के आश्रम में गए, यद्यपि मन में इस पर विचार करते हुए उन्हें अरुचि हो रही थी।
श्लोक 27 (1.149.27)
भृशं संपूज्य पूजार्हमृषिं याजमुवाच ह । गोशतानि ददान्यष्टौ याज याजय मां विभो ॥
bhṛśaṃ saṃpūjya pūjārhamṛṣiṃ yājamuvāca ha | gośatāni dadānyaṣṭau yāja yājaya māṃ vibho
पूजा के योग्य ऋषि याज का भली-भाँति सम्मान करके उन्होंने कहा — "हे याज, मैं आपको आठ सौ गौएँ दूँगा; हे प्रभो, मेरा यज्ञ कराइए।
द्रुपद उवाच
श्लोक 28 (1.149.28)
द्रोणवैरान्तरे तप्तं विषण्णं शरणागतम् । ब्रह्मबन्धुप्रणिहितं न क्षत्रं क्षत्रियो जयेत् ॥
droṇavairāntare taptaṃ viṣaṇṇaṃ śaraṇāgatam | brahmabandhupraṇihitaṃ na kṣatraṃ kṣatriyo jayet
द्रोण के वैर से मैं संतप्त और दुखी हूँ, और आपकी शरण में आया हूँ। जिस क्षात्र-बल के पीछे ब्राह्मण खड़ा हो, उसे कोई क्षत्रिय नहीं जीत सकता।
श्लोक 29 (1.149.29)
तस्माद्द्रोणभयार्तं मां भवांस्त्रातुमिहार्हति । येन मे कर्मणा ब्रह्मन्पुत्रः स्याद्द्रोणमृत्यवे ॥
tasmāddroṇabhayārtaṃ māṃ bhavāṃstrātumihārhati | yena me karmaṇā brahmanputraḥ syāddroṇamṛtyave
इसलिए द्रोण के भय से पीड़ित मेरी आप यहाँ रक्षा करें। हे ब्रह्मन्, वह कर्म कीजिए जिससे मुझे द्रोण की मृत्यु बनने वाला पुत्र प्राप्त हो,
श्लोक 30 (1.149.30)
अर्जुनस्यापि वै भार्या भवेद्या वरवर्णिनी । स हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो ब्राह्मे क्षात्रेऽप्यनुत्तमः ॥
arjunasyāpi vai bhāryā bhavedyā varavarṇinī | sa hi brahmavidāṃ śreṣṭho brāhme kṣātre'pyanuttamaḥ
और एक सुन्दर वर्ण वाली कन्या भी, जो अर्जुन की पत्नी बने। क्योंकि द्रोण वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ हैं, और ब्राह्मण-विद्या तथा क्षात्र-विद्या दोनों में अनुपम हैं।
श्लोक 31 (1.149.31)
ततो द्रोणस्तु माऽजैषीत्सखिविग्रहकारणात् । क्षत्रियो नास्ति तुल्योऽस्य पृथिव्यां कश्चिदग्रणीः ॥
tato droṇastu mā'jaiṣītsakhivigrahakāraṇāt | kṣatriyo nāsti tulyo'sya pṛthivyāṃ kaścidagraṇīḥ
इसी कारण मित्रता के झगड़े में द्रोण ने मुझे हरा दिया। पृथ्वी पर कोई भी क्षत्रिय उनके समान नहीं है, न कोई उनसे आगे है।
श्लोक 32 (1.149.32)
भारताचार्यमुख्यस्य भारद्वाजस्य धीमतः । द्रोणस्य शरजालानि रिपुदेहहराणि च ॥
bhāratācāryamukhyasya bhāradvājasya dhīmataḥ | droṇasya śarajālāni ripudehaharāṇi ca
भरतवंशियों के आचार्यों में प्रमुख, बुद्धिमान भरद्वाजपुत्र द्रोण के बाणों के जाल शत्रुओं के शरीर हर लेते हैं।
श्लोक 33 (1.149.33)
षडरत्नि धनुश्चास्य खड्गमप्रतिमं तथा । स हि ब्राह्मणवेषेण क्षात्रं वेगमसंशयम् ॥
ṣaḍaratni dhanuścāsya khaḍgamapratimaṃ tathā | sa hi brāhmaṇaveṣeṇa kṣātraṃ vegamasaṃśayam
उनका धनुष छह अरत्नि लम्बा है और उनका खड्ग भी अनुपम है। ब्राह्मण के वेश में रहकर भी वे महाधनुर्धर, महामना भरद्वाजपुत्र निःसंदेह
श्लोक 34 (1.149.34)
प्रतिहन्ति महेष्वासो भारद्वाजो महामनाः । कार्तवीर्यसमो ह्येष खट्वाङ्गप्रतिमो रणे ॥
pratihanti maheṣvāso bhāradvājo mahāmanāḥ | kārtavīryasamo hyeṣa khaṭvāṅgapratimo raṇe
क्षत्रियों के वेग को पीछे धकेल देते हैं। युद्ध में वे कार्तवीर्य के समान और खट्वाङ्ग जैसे हैं;
श्लोक 35 (1.149.35)
क्षत्रोच्छेदाय विहितो जामदग्न्य इवास्थितः ॥
kṣatrocchedāya vihito jāmadagnya ivāsthitaḥ
वे मानो क्षत्रियों के संहार के लिए नियुक्त जमदग्निपुत्र परशुराम की भाँति खड़े हैं।
श्लोक 36 (1.149.36)
सहितं क्षत्रवेगेन ब्रह्मवेगेन सांप्रतम् । उपपन्नं हि मन्येऽहं भारद्वाजं यशस्विनम् ॥
sahitaṃ kṣatravegena brahmavegena sāṃpratam | upapannaṃ hi manye'haṃ bhāradvājaṃ yaśasvinam
मैं यशस्वी भरद्वाजपुत्र को इस समय क्षात्र-वेग और ब्रह्म-वेग दोनों से सम्पन्न मानता हूँ।
श्लोक 37 (1.149.37)
नेषवस्तमपाकुर्युर्न च प्रासा न चासयः । ब्राह्मं तस्य महातेजो मन्त्राहुतिहुतं यथा ॥
neṣavastamapākuryurna ca prāsā na cāsayaḥ | brāhmaṃ tasya mahātejo mantrāhutihutaṃ yathā
न बाण उन्हें पीछे हटा सकते हैं, न भाले, न तलवारें; उनका महान ब्राह्म तेज मन्त्रों के साथ दी गई आहुतियों से प्रज्वलित अग्नि जैसा है।
श्लोक 38 (1.149.38)
तस्य ह्यस्त्रबलं घोरमप्रसह्यं परैर्भुवि । शत्रून्समेत्य जयति क्षत्रं ब्रह्मपुरस्कृतम् ॥
tasya hyastrabalaṃ ghoramaprasahyaṃ parairbhuvi | śatrūnsametya jayati kṣatraṃ brahmapuraskṛtam
उनका अस्त्र-बल भयंकर है, पृथ्वी पर शत्रुओं के लिए असह्य। ब्राह्मण को आगे रखकर चलने वाला क्षात्र-बल शत्रुओं से भिड़कर उन्हें जीत लेता है।
श्लोक 39 (1.149.39)
ब्रह्मक्षत्रे च सहिते ब्रह्मतेजो विशिष्यते । सोऽहं क्षत्रबलाद्दीनो ब्रह्मतेजः प्रपेदिवान् ॥
brahmakṣatre ca sahite brahmatejo viśiṣyate | so'haṃ kṣatrabalāddīno brahmatejaḥ prapedivān
जहाँ ब्रह्म और क्षत्र एक साथ हों, वहाँ ब्रह्मतेज ही बढ़कर ठहरता है। इसलिए क्षात्र-बल में हीन मैंने ब्रह्मतेज की शरण ली है।
श्लोक 40 (1.149.40)
द्रोणाद्विशिष्टमासाद्य भवन्तं ब्रह्मवित्तमम् । द्रोणान्तकमहं पुत्रं लभेयं युधि दुर्जयम् ॥
droṇādviśiṣṭamāsādya bhavantaṃ brahmavittamam | droṇāntakamahaṃ putraṃ labheyaṃ yudhi durjayam
द्रोण से भी श्रेष्ठ, वेदवेत्ताओं में सर्वोत्तम आपको पाकर मैं ऐसा पुत्र पाऊँ जो युद्ध में अजेय हो और द्रोण का अन्त करे।
श्लोक 41 (1.149.41)
द्रोणमृत्युर्यथा मेऽद्य पुत्रो जायेत वीर्यवान् । तत्कर्म कुरु मे याज निर्वपाम्यर्बुदं गवाम् ॥
droṇamṛtyuryathā me'dya putro jāyeta vīryavān | tatkarma kuru me yāja nirvapāmyarbudaṃ gavām
हे याज, मेरे लिए वह कर्म कीजिए जिससे आज ही मुझे द्रोण की मृत्यु बनने वाला पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हो। मैं आपको एक अर्बुद गौएँ अर्पित करूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 42 (1.149.42)
तथेत्युक्त्वा तु तं याजो यज्ञार्थमुपकल्पयन् । गुर्वर्थ इति चाकाममुपयाजमचोदयत् ॥
tathetyuktvā tu taṃ yājo yajñārthamupakalpayan | gurvartha iti cākāmamupayājamacodayat
"ऐसा ही हो" कहकर याज यज्ञ की तैयारी करने लगे, और "यह बड़े भाई का कार्य है" कहकर उन्होंने अनिच्छुक उपयाज को भी इसमें लगने को प्रेरित किया।
श्लोक 43 (1.149.43)
द्रुपदं च महाराजमिदं वचनमब्रवीत् । मा भैस्त्वं संप्रदास्यामि कर्मणा भवतः सुतम् ॥
drupadaṃ ca mahārājamidaṃ vacanamabravīt | mā bhaistvaṃ saṃpradāsyāmi karmaṇā bhavataḥ sutam
और उन्होंने महाराज द्रुपद से यह वचन कहा — "डरिए मत। इस कर्म के द्वारा मैं आपको पुत्र प्रदान करूँगा।
याज उवाच
श्लोक 44 (1.149.44)
क्षिप्रमुत्तिष्ठ चाव्यग्रः संभारानुपकल्पय । एवमुक्त्वा प्रतिज्ञाय कर्म चास्याददे मुनिः ॥
kṣipramuttiṣṭha cāvyagraḥ saṃbhārānupakalpaya | evamuktvā pratijñāya karma cāsyādade muniḥ
शीघ्र और निश्चिन्त होकर उठिए और यज्ञ की सामग्री जुटाइए।" ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके मुनि ने उनका कर्म अपने हाथ में ले लिया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (1.149.45)
ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो यथाविधि कथाक्रमम् । याजो द्रोणविनाशाय याजयामास तं नृपम् ॥
brāhmaṇo dvipadāṃ śreṣṭho yathāvidhi kathākramam | yājo droṇavināśāya yājayāmāsa taṃ nṛpam
मनुष्यों में श्रेष्ठ ब्राह्मण याज ने द्रोण के विनाश के लिए उस राजा का यज्ञ विधिपूर्वक, क्रम से सम्पन्न कराया।
श्लोक 46 (1.149.46)
गुर्वर्थेऽयोजयत्कर्म याजस्यापि समीपतः । ततस्तस्य नरेन्द्रस्य उपयाजो महातपाः ॥
gurvarthe'yojayatkarma yājasyāpi samīpataḥ | tatastasya narendrasya upayājo mahātapāḥ
बड़े भाई के लिए उपयाज भी याज के पास रहकर कर्म में लगे। फिर महातपस्वी उपयाज ने
श्लोक 47 (1.149.47)
आचख्यौ कर्म वैतानं तथा पुत्रफलाय वै । इह पुत्रो महावीर्यो महातेजा महाबलः । इष्यते यद्विधो राजन्भविता स तथाविधः ॥
ācakhyau karma vaitānaṃ tathā putraphalāya vai | iha putro mahāvīryo mahātejā mahābalaḥ | iṣyate yadvidho rājanbhavitā sa tathāvidhaḥ
उस राजा को पुत्र-प्राप्ति के लिए वैतान (श्रौत) यज्ञ-कर्म समझाया — "हे राजन्, यहाँ जैसा पुत्र चाहा जा रहा है — महापराक्रमी, महातेजस्वी, महाबली — वैसा ही वह होगा।"
श्लोक 48 (1.149.48)
भारद्वाजस्य हन्तारं सोऽभिसन्धाय पार्थिवः । आजह्रेऽथ तदा राजन्द्रुपदः कर्म सिद्धये ॥
bhāradvājasya hantāraṃ so'bhisandhāya pārthivaḥ | ājahre'tha tadā rājandrupadaḥ karma siddhaye
भरद्वाजपुत्र द्रोण के वधकर्ता का संकल्प करके राजा द्रुपद ने तब, हे राजन्, कर्म की सिद्धि के लिए सब सामग्री जुटाई।
श्लोक 49 (1.149.49)
ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो जुहाव च यथाविधि । कौसवी नाम तस्यासीद्या वै तां पुत्रगृद्धिनः ॥
brāhmaṇo dvipadāṃ śreṣṭho juhāva ca yathāvidhi | kausavī nāma tasyāsīdyā vai tāṃ putragṛddhinaḥ
मनुष्यों में श्रेष्ठ ब्राह्मण ने विधिपूर्वक आहुतियाँ दीं। पुत्र की कामना करने वाले उस राजा की कौसवी नाम की रानी थी;
श्लोक 50 (1.149.50)
सौत्रामणिं तथा पत्नीं ततः कालेऽभ्ययात्तदा । याजस्तु सवनस्यान्ते देवीमाह्वापयत्तदा ॥
sautrāmaṇiṃ tathā patnīṃ tataḥ kāle'bhyayāttadā | yājastu savanasyānte devīmāhvāpayattadā
फिर उचित समय पर वे अपनी पत्नी के साथ सौत्रामणी यज्ञ में प्रवृत्त हुए। आहुति के अन्त में याज ने रानी को बुलवाया —
याज उवाच
श्लोक 51 (1.149.51)
प्रेहि मां राज्ञि पृषति मिथुनं त्वामुपस्थितम् । कुमारश्च कुमारी च पितृवंशविवृद्धये ॥
prehi māṃ rājñi pṛṣati mithunaṃ tvāmupasthitam | kumāraśca kumārī ca pitṛvaṃśavivṛddhaye
"हे रानी पृषती, मेरे पास आइए! आपके लिए एक जोड़ा उपस्थित है — एक कुमार और एक कुमारी — जो पिता के वंश को आगे बढ़ाएँगे।"
पृषत्युवाच
श्लोक 52 (1.149.52)
नालिप्तं वै मम मुखं पुण्यान्गन्धान्बिभर्मि च । न पत्नी तेऽस्मि सूत्यर्थे तिष्ठ याज मम प्रिये ॥
nāliptaṃ vai mama mukhaṃ puṇyāngandhānbibharmi ca | na patnī te'smi sūtyarthe tiṣṭha yāja mama priye
"अभी मेरा मुख अनुलिप्त नहीं हुआ है, और मैंने पवित्र सुगन्धियाँ धारण कर रखी हैं; सन्तान-प्राप्ति के कर्म के लिए मैं अभी पत्नी के रूप में तैयार नहीं हूँ। हे याज, मेरी प्रसन्नता के लिए रुकिए।"
याज उवाच
श्लोक 53 (1.149.53)
याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजेन मन्त्रितम् । कथं कामं न संदध्यात्पृषति प्रेहि तिष्ठ वा ॥
yājena śrapitaṃ havyamupayājena mantritam | kathaṃ kāmaṃ na saṃdadhyātpṛṣati prehi tiṣṭha vā
"जो हवि याज ने पकाई है और उपयाज ने मन्त्रों से अभिमन्त्रित की है, वह मनोरथ पूरा कैसे न करेगी? पृषती, आओ या रुकी रहो!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 54 (1.149.54)
एवमुक्त्वा तु याजेन हुते हविषि संस्कृते । उत्तस्थौ पावकात्तस्मात्कुमारो देवसंनिभः ॥
evamuktvā tu yājena hute haviṣi saṃskṛte | uttasthau pāvakāttasmātkumāro devasaṃnibhaḥ
ऐसा कहकर जब याज ने संस्कारित हवि की आहुति दी, तब उस अग्नि से देवता के समान एक कुमार उठ खड़ा हुआ —
श्लोक 55 (1.149.55)
ज्वालावर्णो घोररूपः किरीटी वर्म धारयन् । वीरः सखड्गः सशरो धनुष्मान्स नदन्मुहुः ॥
jvālāvarṇo ghorarūpaḥ kirīṭī varma dhārayan | vīraḥ sakhaḍgaḥ saśaro dhanuṣmānsa nadanmuhuḥ
अग्नि की लपटों जैसे वर्ण वाला, भयंकर रूप वाला, मुकुट और कवच धारण किए हुए — खड्ग, बाण और धनुष लिए वह वीर बार-बार गर्जना कर रहा था।
श्लोक 56 (1.149.56)
सोऽभ्यरोहद्रथवरं तेन च प्रययौ तदा । जातमात्रे कुमारे च वाक्किलान्तर्हिताब्रवीत् ॥
so'bhyarohadrathavaraṃ tena ca prayayau tadā | jātamātre kumāre ca vākkilāntarhitābravīt
वह एक श्रेष्ठ रथ पर चढ़ गया और उसी पर चल पड़ा। कुमार के जन्म लेते ही एक अदृश्य वाणी बोली —
वागुवाच
श्लोक 57 (1.149.57)
एष शिष्यश्च मृत्युश्च भारद्वाजस्य जायते । भयापहो राजपुत्रः पाञ्चालानां यशस्करः ॥
eṣa śiṣyaśca mṛtyuśca bhāradvājasya jāyate | bhayāpaho rājaputraḥ pāñcālānāṃ yaśaskaraḥ
"यह राजकुमार भरद्वाजपुत्र द्रोण का शिष्य भी होगा और मृत्यु भी। यह भय दूर करने वाला और पाञ्चालों का यश बढ़ाने वाला है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 58 (1.149.58)
राज्ञः शोकापहो जात एष द्रोणवधाय हि । इत्यवोचन्महद्भूतमदृश्यं खेचरं तदा ॥
rājñaḥ śokāpaho jāta eṣa droṇavadhāya hi | ityavocanmahadbhūtamadṛśyaṃ khecaraṃ tadā
यह राजा का शोक हरने वाला है और द्रोण के वध के लिए ही जन्मा है।" — आकाश में विचरने वाले एक अदृश्य महान प्राणी ने तब ऐसा कहा।
श्लोक 59 (1.149.59)
ततः प्रणेदुः पाञ्चालाः प्रहृष्टाः साधुसाध्विति । द्वितीयायां च होत्रायां हुते हविषि मन्त्रिते ॥
tataḥ praṇeduḥ pāñcālāḥ prahṛṣṭāḥ sādhusādhviti | dvitīyāyāṃ ca hotrāyāṃ hute haviṣi mantrite
तब पाञ्चाल हर्ष से "साधु, साधु!" कहकर जयघोष करने लगे। फिर दूसरी आहुति में, जब मन्त्रों से अभिमन्त्रित हवि अर्पित की गई,
श्लोक 60 (1.149.60)
कुमारी चापि पाञ्चाली वेदिमध्यात्समुत्थिता । प्रत्याख्याते पृषत्या च याजके भरतर्षभ ॥
kumārī cāpi pāñcālī vedimadhyātsamutthitā | pratyākhyāte pṛṣatyā ca yājake bharatarṣabha
तब, हे भरतश्रेष्ठ, वेदी के मध्य से एक पाञ्चाल-कुमारी भी प्रकट हुई — यद्यपि पृषती ने याजक को लौटा दिया था।
श्लोक 61 (1.149.61)
पुनः कुमारी पाञ्चाली सुभगा वेदिमध्यगा । अन्तर्वेद्यां समुद्भूता कन्या सा सुमनोहरा ॥
punaḥ kumārī pāñcālī subhagā vedimadhyagā | antarvedyāṃ samudbhūtā kanyā sā sumanoharā
फिर से — वेदी के मध्य में स्थित वह सौभाग्यशालिनी पाञ्चाल-कुमारी, अन्तर्वेदी से प्रकट हुई अत्यन्त मनोहर कन्या —
श्लोक 62 (1.149.62)
श्यामा पद्मपलाशाक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा । मानुषं विग्रहं कृत्वा साक्षाच्छ्रीरिव वर्णिनी ॥
śyāmā padmapalāśākṣī nīlakuñcitamūrdhajā | mānuṣaṃ vigrahaṃ kṛtvā sākṣācchrīriva varṇinī
साँवली थी, कमल-दल जैसे नेत्रों वाली, काले घुँघराले केशों वाली, सुन्दर वर्ण वाली — मानो साक्षात् श्री (लक्ष्मी) ने मनुष्य का शरीर धारण कर लिया हो।
श्लोक 63 (1.149.63)
ताम्रतुङ्गनखी सुभ्रूश्चारुपीनपयोधरा । नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात्प्रधावति ॥
tāmratuṅganakhī subhrūścārupīnapayodharā | nīlotpalasamo gandho yasyāḥ krośātpradhāvati
उसके नख ताँबे जैसे लाल और उभरे हुए थे, भौंहें सुन्दर, स्तन मनोहर और पुष्ट; उसके शरीर से नील कमल जैसी सुगन्ध एक कोस तक फैलती थी।
श्लोक 64 (1.149.64)
या बिभर्ति परं रूपं यस्या नास्त्युपमा भुवि । देवदानवयक्षाणामीप्सिता वरवर्णिनी ॥
yā bibharti paraṃ rūpaṃ yasyā nāstyupamā bhuvi | devadānavayakṣāṇāmīpsitā varavarṇinī
वह परम रूप धारण किए हुए थी; पृथ्वी पर उसकी कोई उपमा नहीं थी। देवता, दानव और यक्ष सभी उस सुन्दरी को पाना चाहते थे।
श्लोक 65 (1.149.65)
तां चापि जातां सुश्रोणीं वागुवाचाशरीरिणी । सर्वयोषिद्वरा कृष्णा क्षयं क्षत्रस्य नेष्यति ॥
tāṃ cāpi jātāṃ suśroṇīṃ vāguvācāśarīriṇī | sarvayoṣidvarā kṛṣṇā kṣayaṃ kṣatrasya neṣyati
उस सुन्दर नितम्बों वाली कन्या के जन्म लेने पर एक अशरीरी वाणी बोली — "सब स्त्रियों में श्रेष्ठ यह कृष्णा क्षत्रियों का विनाश कराएगी।
वागुवाच
श्लोक 66 (1.149.66)
सुरकार्यमियं काले करिष्यति सुमध्यमा । अस्या हेतोः क्षत्रियाणां महदुत्पत्स्यते भयम् ॥
surakāryamiyaṃ kāle kariṣyati sumadhyamā | asyā hetoḥ kṣatriyāṇāṃ mahadutpatsyate bhayam
समय आने पर यह पतली कमर वाली देवताओं का कार्य सिद्ध करेगी। इसके कारण क्षत्रियों पर महान भय आएगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 67 (1.149.67)
तच्छ्रुत्वा सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् । न चैनान्हर्षसंपन्नानियं सेहे वसुन्धरा ॥
tacchrutvā sarvapāñcālāḥ praṇeduḥ siṃhasaṅghavat | na cainānharṣasaṃpannāniyaṃ sehe vasundharā
यह सुनकर सब पाञ्चाल सिंहों के झुण्ड की तरह गरज उठे; हर्ष से भरे उन लोगों का भार यह पृथ्वी सह न सकी।
श्लोक 68 (1.149.68)
तथा तु मिथुनं जज्ञे द्रुपदस्य महात्मनः । कुमारश्च कुमारी च मनोज्ञौ तौ नरर्षभौ ॥
tathā tu mithunaṃ jajñe drupadasya mahātmanaḥ | kumāraśca kumārī ca manojñau tau nararṣabhau
इस प्रकार महात्मा द्रुपद के यहाँ जुड़वाँ सन्तान उत्पन्न हुई — एक कुमार और एक कुमारी, दोनों मनोहर और श्रेष्ठ,
श्लोक 69 (1.149.69)
श्रिया परमया युक्तौ क्षात्रेण वपुषा तथा । तौ दृष्ट्वा पृषती याजं प्रपेदे सा सुतार्थिनी ॥
śriyā paramayā yuktau kṣātreṇa vapuṣā tathā | tau dṛṣṭvā pṛṣatī yājaṃ prapede sā sutārthinī
परम शोभा और क्षत्रियोचित शरीर से युक्त। उन्हें देखकर सन्तान की इच्छुक पृषती याज के पास गईं और बोलीं —
श्लोक 70 (1.149.70)
न वै मदन्यां जननीं जानीयातामिमाविति । तथेत्युवाच तां याजो राज्ञः प्रियचिकीर्षया ॥
na vai madanyāṃ jananīṃ jānīyātāmimāviti | tathetyuvāca tāṃ yājo rājñaḥ priyacikīrṣayā
"ये दोनों मेरे अतिरिक्त किसी और को अपनी माता न जानें।" राजा का प्रिय करने की इच्छा से याज ने उनसे कहा — "ऐसा ही हो।"
श्लोक 71 (1.149.71)
तयोस्तु नामनी चक्रुर्द्विजाः संपूर्णमानसाः । धृष्टत्वादप्रधृष्यत्वात् द्युम्नाद्युत्संभवादपि ॥
tayostu nāmanī cakrurdvijāḥ saṃpūrṇamānasāḥ | dhṛṣṭatvādapradhṛṣyatvāt dyumnādyutsaṃbhavādapi
फिर सन्तुष्ट मन वाले ब्राह्मणों ने उन दोनों के नाम रखे। धृष्टता (साहस) के कारण, अजेय होने के कारण, और द्युम्न (तेज) के साथ जन्म लेने के कारण —
श्लोक 72 (1.149.72)
धृष्टद्युम्नः कुमारोऽयं द्रुपदस्य भवत्विति । कृष्णेत्येवाभवत्कन्या कृष्णाभूत्सा हि वर्णतः ॥
dhṛṣṭadyumnaḥ kumāro'yaṃ drupadasya bhavatviti | kṛṣṇetyevābhavatkanyā kṛṣṇābhūtsā hi varṇataḥ
"द्रुपद का यह कुमार धृष्टद्युम्न कहलाए।" और कन्या का नाम कृष्णा पड़ा, क्योंकि वह वर्ण से साँवली थी।
श्लोक 73 (1.149.73)
तथा तन्मिथुनं जज्ञे द्रुपदस्य महामखे । वैदिकाध्ययने पारं धृष्टद्युम्नो गतस्तदा ॥
tathā tanmithunaṃ jajñe drupadasya mahāmakhe | vaidikādhyayane pāraṃ dhṛṣṭadyumno gatastadā
इस प्रकार द्रुपद के महायज्ञ में वह जोड़ा उत्पन्न हुआ। आगे चलकर धृष्टद्युम्न वैदिक अध्ययन में पारंगत हो गए।
श्लोक 74 (1.149.74)
धृष्टद्युम्नं तु पाञ्चाल्यमानीय स्वं निवेशनम् । उपाकरोदस्त्रहेतोर्भारद्वाजः प्रतापवान् ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ tu pāñcālyamānīya svaṃ niveśanam | upākarodastrahetorbhāradvājaḥ pratāpavān
प्रतापी भरद्वाजपुत्र द्रोण पाञ्चाल-राजकुमार धृष्टद्युम्न को अपने घर ले आए और अस्त्र-शिक्षा के लिए उन्हें अपना शिष्य बनाया।
श्लोक 75 (1.149.75)
अमोक्षणीयं दैवं हि भावि मत्वा महामतिः । तथा तत्कृतवान्द्रोण आत्मकीर्त्यनुरक्षणात् ॥
amokṣaṇīyaṃ daivaṃ hi bhāvi matvā mahāmatiḥ | tathā tatkṛtavāndroṇa ātmakīrtyanurakṣaṇāt
यह मानकर कि होनी टल नहीं सकती, बुद्धिमान द्रोण ने अपनी कीर्ति की रक्षा के लिए ऐसा किया।
श्लोक 76 (1.149.76)
सर्वास्त्राणि स तु क्षिप्रमाप्तवान्परया धिया ॥
sarvāstrāṇi sa tu kṣipramāptavānparayā dhiyā
और उस राजकुमार ने अपनी श्रेष्ठ बुद्धि से शीघ्र ही सब अस्त्र प्राप्त कर लिए।