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आदि पर्व · अध्याय 150

द्रुपद का जन्म

जनमेजय पूछते हैं कि स्वयं द्रुपद का जन्म कैसे हुआ। वैशम्पायन बताते हैं कि पाञ्चाल देश के एक निःसन्तान राजा ने वन में लम्बा तप किया; वसन्त में गंगा-तट पर मेनका अप्सरा के दिखने पर उनका वीर्य भूमि पर गिर पड़ा, जिसे उन्होंने लज्जा से पैरों से दबा दिया, और उसी से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम ऋषियों ने द्रुपद रखा। भरद्वाज के आश्रम में पले और द्रोण के साथ वेद तथा धनुर्वेद सीखे द्रुपद पिता की मृत्यु के बाद पाञ्चालों के राजा बने और धर्मपूर्वक राज्य किया।

अध्याय 149अध्याय-सूचीअध्याय 151

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (1.150.1)

द्रुपदस्यापि विप्रर्षे श्रोतुमिच्छामि संभवम् । कथं चापि समुत्पन्नः कथमस्त्राण्यवाप्तवान् ॥

drupadasyāpi viprarṣe śrotumicchāmi saṃbhavam | kathaṃ cāpi samutpannaḥ kathamastrāṇyavāptavān

"हे विप्रर्षि, मैं द्रुपद का भी जन्म-वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ — वे कैसे उत्पन्न हुए और उन्होंने अस्त्र कैसे प्राप्त किए?

श्लोक 2 (1.150.2)

एतदिच्छामि भगवंस्त्वत्तः श्रोतुं द्विजोत्तम । कौतूहलं जन्मसु मे कीर्त्यमानेष्वनेकशः ॥

etadicchāmi bhagavaṃstvattaḥ śrotuṃ dvijottama | kautūhalaṃ janmasu me kīrtyamāneṣvanekaśaḥ

हे भगवन्, हे द्विजश्रेष्ठ, यह मैं आपसे सुनना चाहता हूँ; अनेक प्रकार से वर्णित इन जन्म-कथाओं के विषय में मुझे बड़ा कौतूहल है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (1.150.3)

राजा बभूव पाञ्चालः पुत्रार्थी पुत्रकारणात् । वनं गतो महाराजस्तपस्तेपे सुदारुणम् ॥

rājā babhūva pāñcālaḥ putrārthī putrakāraṇāt | vanaṃ gato mahārājastapastepe sudāruṇam

पाञ्चाल देश के एक राजा थे जो पुत्र चाहते थे। पुत्र के लिए वे महाराज वन में गए और अत्यन्त कठोर तप करने लगे,

श्लोक 4 (1.150.4)

आराधयन्प्रयत्नेन महर्षीन्संशितव्रतान् । तस्य संतप्यमानस्य वने मृगगणायुते ॥

ārādhayanprayatnena maharṣīnsaṃśitavratān | tasya saṃtapyamānasya vane mṛgagaṇāyute

और प्रयत्नपूर्वक कठोर व्रत वाले महर्षियों की आराधना करने लगे। हिरणों के झुण्डों से भरे उस वन में तप करते हुए

श्लोक 5 (1.150.5)

कालस्तु सुमहान्राजन्नत्ययात्सुतकारणात् । स तु राजा महातेजास्तपस्तीव्रं समाददे ॥

kālastu sumahānrājannatyayātsutakāraṇāt | sa tu rājā mahātejāstapastīvraṃ samādade

पुत्र की चाह में, हे राजन्, बहुत लम्बा समय बीत गया। तब उस महातेजस्वी राजा ने कठोर तप आरम्भ किया।

श्लोक 6 (1.150.6)

कंचित्कालं वायुभक्षो निराहारस्तथैव च । तथैव तु महाबाहोर्वर्तमानस्य भारत ॥

kaṃcitkālaṃ vāyubhakṣo nirāhārastathaiva ca | tathaiva tu mahābāhorvartamānasya bhārata

कुछ समय तक वे केवल वायु पर रहे और निराहार रहे। हे भारत, उस महाबाहु के इसी प्रकार रहते हुए

श्लोक 7 (1.150.7)

कालस्तस्य महाराज यातो वै नृपसत्तम । ततो नातिचिरात्काले वसन्ते कामदीपने ॥

kālastasya mahārāja yāto vai nṛpasattama | tato nāticirātkāle vasante kāmadīpane

हे महाराज, हे नृपश्रेष्ठ, उनका बहुत समय बीत गया। फिर कुछ ही समय बाद, कामना जगाने वाली वसन्त ऋतु में,

श्लोक 8 (1.150.8)

फुल्लाशोकवने चैव प्राणिनां सुमनोहरे । नद्यास्तीरं ततो गत्वा गङ्गायाः पद्मलोचनः ॥

phullāśokavane caiva prāṇināṃ sumanohare | nadyāstīraṃ tato gatvā gaṅgāyāḥ padmalocanaḥ

सब प्राणियों का मन मोहने वाले खिले हुए अशोक-वन में, कमलनयन राजा गंगा नदी के तट पर गए

श्लोक 9 (1.150.9)

नियमस्थश्च राजासीत्तदा भरतसत्तम । ततो नातिचिरात्काले वनं तन्मनुजेश्वर ॥

niyamasthaśca rājāsīttadā bharatasattama | tato nāticirātkāle vanaṃ tanmanujeśvara

और वहाँ नियमों का पालन करते हुए रहने लगे, हे भरतश्रेष्ठ। फिर कुछ ही समय बाद, हे मनुजेश्वर, उस वन में

श्लोक 10 (1.150.10)

संप्राप्ता ह्यप्सरा राजन्मेनकेत्यभिविश्रुता । पुष्पद्रुमान्सज्जमाना राज्ञो दर्शनमागमत् ॥

saṃprāptā hyapsarā rājanmenaketyabhiviśrutā | puṣpadrumānsajjamānā rājño darśanamāgamat

मेनका नाम से प्रसिद्ध अप्सरा आई, हे राजन्। फूलों से लदे वृक्षों के बीच ठहरती-विचरती वह राजा की दृष्टि में आ गई।

श्लोक 11 (1.150.11)

न ददर्श तु सा राजंस्तत्र स्थानगतं नृपम् । दृष्ट्वा चाप्सरसं तां तु शुक्रं राज्ञोऽपतद्भुवि ॥

na dadarśa tu sā rājaṃstatra sthānagataṃ nṛpam | dṛṣṭvā cāpsarasaṃ tāṃ tu śukraṃ rājño'patadbhuvi

हे राजन्, उसने वहाँ स्थित राजा को नहीं देखा; पर उस अप्सरा को देखकर राजा का वीर्य भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 12 (1.150.12)

ततः स राजा राजेन्द्र लज्जया नृपतिः स्वयम् । पद्भ्यामाक्रमतायुष्मंस्ततस्तु द्रुपदोऽभवत् ॥

tataḥ sa rājā rājendra lajjayā nṛpatiḥ svayam | padbhyāmākramatāyuṣmaṃstatastu drupado'bhavat

तब, हे राजेन्द्र, लज्जा के कारण राजा ने स्वयं उसे पैरों से दबा दिया। हे आयुष्मन्, उसी से द्रुपद उत्पन्न हुए।

श्लोक 13 (1.150.13)

ततस्तु तपसा तस्य राजर्षेर्भावितात्मनः । पुत्रः समभवच्छीघ्रं पदोस्तस्य क्रमेण तु ॥

tatastu tapasā tasya rājarṣerbhāvitātmanaḥ | putraḥ samabhavacchīghraṃ padostasya krameṇa tu

उस शुद्धचित्त राजर्षि के तप के प्रभाव से, उनके पैरों के दबाव से, शीघ्र ही एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 14 (1.150.14)

तेनास्य ऋषयः सर्वे समागम्य तपोधनाः । नाम चुक्रुर्हि विद्वांसो द्रुपदोऽस्त्विति भारत ॥

tenāsya ṛṣayaḥ sarve samāgamya tapodhanāḥ | nāma cukrurhi vidvāṃso drupado'stviti bhārata

इसी कारण, हे भारत, तपस्वी और विद्वान सभी ऋषियों ने एकत्र होकर उसका नाम "द्रुपद" रखा।

श्लोक 15 (1.150.15)

स तस्यैवाश्रमे राजन्भरद्वाजस्य भारत । ववृधे सुमुखं तत्र कामैः सर्वैर्नृपोत्तम ॥

sa tasyaivāśrame rājanbharadvājasya bhārata | vavṛdhe sumukhaṃ tatra kāmaiḥ sarvairnṛpottama

हे राजन्, हे भारत, हे नृपश्रेष्ठ, वह उन्हीं भरद्वाज के आश्रम में, सब कामनाएँ पूरी होते हुए, आनन्द से बड़ा हुआ।

श्लोक 16 (1.150.16)

पाञ्चालोऽपि हि राजेन्द्र स्वराज्यं गतवान्प्रभुः । भरद्वाजस्य विद्यार्थं सुतं दत्वा महात्मनः ॥

pāñcālo'pi hi rājendra svarājyaṃ gatavānprabhuḥ | bharadvājasya vidyārthaṃ sutaṃ datvā mahātmanaḥ

हे राजेन्द्र, पाञ्चालराज भी विद्या के लिए अपना पुत्र महात्मा भरद्वाज को सौंपकर अपने राज्य को लौट गए।

श्लोक 17 (1.150.17)

स कुमारस्ततो राजन्द्रोणेन सहितो वने । वेदांश्चाधिजगे साङ्गान्धनुर्वेदांश्च भारत ॥

sa kumārastato rājandroṇena sahito vane | vedāṃścādhijage sāṅgāndhanurvedāṃśca bhārata

फिर, हे भारत, वह कुमार वन में द्रोण के साथ रहकर अंगों सहित वेदों और धनुर्वेद का अध्ययन करने लगा।

श्लोक 18 (1.150.18)

परया स मुदा युक्तो विचचार वने सुखम् । तस्यैवं वर्तमानस्य वने वनचरैः सह ॥

parayā sa mudā yukto vicacāra vane sukham | tasyaivaṃ vartamānasya vane vanacaraiḥ saha

परम आनन्द से भरा वह वन में सुखपूर्वक विचरता रहा। वन में वनवासियों के साथ इस प्रकार रहते हुए

श्लोक 19 (1.150.19)

कालेनातिचिराद्राजन्पिता स्वर्गमुपेयिवान् । स समागम्य पाञ्चालैः पाञ्चालेष्वभिषेचितः ॥

kālenāticirādrājanpitā svargamupeyivān | sa samāgamya pāñcālaiḥ pāñcāleṣvabhiṣecitaḥ

कुछ ही समय बाद, हे राजन्, उसके पिता स्वर्ग सिधार गए। तब पाञ्चालों के साथ मिलकर पाञ्चाल देश में उसका राज्याभिषेक हुआ,

श्लोक 20 (1.150.20)

प्राप्तश्च राज्यं राजेन्द्र सुहृदां प्रीतिवर्धनः । राज्यं ररक्ष धर्मेण यथा चेन्द्रस्त्रिविष्टपम् ॥

prāptaśca rājyaṃ rājendra suhṛdāṃ prītivardhanaḥ | rājyaṃ rarakṣa dharmeṇa yathā cendrastriviṣṭapam

और हे राजेन्द्र, राज्य पाकर, अपने सुहृदों का आनन्द बढ़ाते हुए, उसने धर्मपूर्वक राज्य की रक्षा की, जैसे इन्द्र स्वर्ग की करते हैं।

श्लोक 21 (1.150.21)

एतन्मया ते राजेन्द्र यथावत्परिकीर्तितम् । द्रुपदस्य च राजर्षेर्धृष्टद्युम्नस्य जन्म च ॥

etanmayā te rājendra yathāvatparikīrtitam | drupadasya ca rājarṣerdhṛṣṭadyumnasya janma ca

हे राजेन्द्र, यह मैंने आपको यथावत् सुनाया — राजर्षि द्रुपद का और धृष्टद्युम्न का जन्म।

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