आदि पर्व · अध्याय 151
युधिष्ठिर का युवराज-पद पर अभिषेक और द्रोण का अर्जुन को आदेश
धृतराष्ट्र युधिष्ठिर को युवराज बनाते हैं, जिससे उनके अपने पुत्र दुखी होते हैं। भीम बलराम से शिक्षा पाते हैं और अर्जुन सब धनुर्धरों से आगे निकल जाते हैं; कौरवों की सभा में द्रोण उन्हें ब्रह्मशिर अस्त्र और उसके नियम के बारे में बताते हैं, गुरुदक्षिणा में यह वचन माँगते हैं कि आवश्यकता पड़ने पर अर्जुन युद्ध में उनसे लड़ेंगे, और कहते हैं कि केवल कृष्ण ही उनसे बढ़कर हैं। फिर पाण्डव सौवीरों, यवनराज और पूर्व तथा दक्षिण के राजाओं को जीतते हैं, और उनकी शक्ति से चिन्तित धृतराष्ट्र का मन उनके विरुद्ध हो जाता है, जिससे उन्हें नींद नहीं आती।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.151.1)
धृतराष्ट्रस्तु राजेन्द्र यदा कौरवनन्दनम् । युधिष्ठिरं विजानन्वै समर्थं राज्यरक्षणे ॥
dhṛtarāṣṭrastu rājendra yadā kauravanandanam | yudhiṣṭhiraṃ vijānanvai samarthaṃ rājyarakṣaṇe
वैशम्पायन ने कहा — हे राजेन्द्र! जब धृतराष्ट्र ने जान लिया कि कुरुकुल को आनन्द देने वाले युधिष्ठिर राज्य की रक्षा करने में समर्थ हैं,
श्लोक 2 (1.151.2)
यौवराज्याभिषेकार्थममन्त्रयत मन्त्रिभिः । ते तु बुद्ध्वान्वतप्यन्त धृतराष्ट्रात्मजास्तदा ॥
yauvarājyābhiṣekārthamamantrayata mantribhiḥ | te tu buddhvānvatapyanta dhṛtarāṣṭrātmajāstadā
तब उन्होंने उन्हें युवराज-पद पर अभिषिक्त करने के लिए मन्त्रियों से विचार-विमर्श किया। यह जानकर धृतराष्ट्र के पुत्र बहुत दुखी हुए।
श्लोक 3 (1.151.3)
ततः संवत्सरस्यान्ते यौवराज्याय पार्थिव । स्थापितो धृतराष्ट्रेण पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
tataḥ saṃvatsarasyānte yauvarājyāya pārthiva | sthāpito dhṛtarāṣṭreṇa pāṇḍuputro yudhiṣṭhiraḥ
हे राजन्! फिर एक वर्ष पूरा होने पर धृतराष्ट्र ने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को युवराज के पद पर स्थापित कर दिया।
श्लोक 4 (1.151.4)
ततोऽदीर्घेण कालेन कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । पितुरन्तर्दधे कीर्तिं शीलवृत्तसमाधिभिः ॥
tato'dīrgheṇa kālena kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | piturantardadhe kīrtiṃ śīlavṛttasamādhibhiḥ
थोड़े ही समय में कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने अपने शील, आचरण और चित्त की एकाग्रता से अपने पिता की कीर्ति को भी ढक दिया।
श्लोक 5 (1.151.5)
असियुद्धे गदायुद्धे रथयुद्धे च पाण्डवः । संकर्षणादशिक्षद्वै शश्वच्छिक्षां वृकोदरः ॥
asiyuddhe gadāyuddhe rathayuddhe ca pāṇḍavaḥ | saṃkarṣaṇādaśikṣadvai śaśvacchikṣāṃ vṛkodaraḥ
पाण्डुपुत्र वृकोदर (भीम) ने संकर्षण (बलराम) से तलवार, गदा और रथ के युद्ध की निरन्तर शिक्षा ली।
श्लोक 6 (1.151.6)
समाप्तशिक्षो भीमस्तु द्युमत्सेनसमो बले । पराक्रमेण संपन्नो भ्रातॄणामचरद्वशे ॥
samāptaśikṣo bhīmastu dyumatsenasamo bale | parākrameṇa saṃpanno bhrātṝṇāmacaradvaśe
शिक्षा पूरी होने पर बल में द्युमत्सेन के समान और पराक्रम से सम्पन्न भीम अपने भाइयों की आज्ञा में रहने लगे।
श्लोक 7 (1.151.7)
प्रगाढदृढमुष्टित्वे लाघवे वेधने तथा । क्षुरनाराचभल्लानां विपाठानां च तत्त्ववित् ॥
pragāḍhadṛḍhamuṣṭitve lāghave vedhane tathā | kṣuranārācabhallānāṃ vipāṭhānāṃ ca tattvavit
दृढ़ और कसी हुई मुट्ठी, फुर्ती और लक्ष्य-भेद में फाल्गुन (अर्जुन) निपुण थे; वे क्षुर, नाराच, भल्ल और विपाठ नामक बाणों का तत्त्व जानते थे,
श्लोक 8 (1.151.8)
ऋजुवक्रविशालानां प्रयोक्ता फाल्गुनोऽभवत् । लाघवे सौष्ठवे चैव नान्यः कश्चन विद्यते ॥
ṛjuvakraviśālānāṃ prayoktā phālguno'bhavat | lāghave sauṣṭhave caiva nānyaḥ kaścana vidyate
और उन्हें सीधा, टेढ़ा तथा दूर तक फैलाकर चलाने में कुशल हो गए। फुर्ती और कौशल में उनके समान कोई दूसरा नहीं था।
श्लोक 9 (1.151.9)
बीभत्सुसदृशो लोक इति द्रोणो व्यवस्थितः । ततोऽब्रवीद्गुडाकेशं द्रोणः कौरवसंसदि ॥
bībhatsusadṛśo loka iti droṇo vyavasthitaḥ | tato'bravīdguḍākeśaṃ droṇaḥ kauravasaṃsadi
द्रोण का यह निश्चित मत था कि संसार में बीभत्सु (अर्जुन) के समान कोई नहीं है। तब द्रोण ने कौरवों की सभा में गुडाकेश (अर्जुन) से कहा —
द्रोण उवाच
श्लोक 10 (1.151.10)
अगस्त्यस्य धनुर्वेदे शिष्यो मम गुरुः पुरा । अग्निवेश्य इति ख्यातस्तस्य शिष्योऽस्मि भारत ॥
agastyasya dhanurvede śiṣyo mama guruḥ purā | agniveśya iti khyātastasya śiṣyo'smi bhārata
"हे भारत! पूर्वकाल में अग्निवेश्य नाम से प्रसिद्ध मेरे गुरु धनुर्वेद में अगस्त्य के शिष्य थे, और मैं उन्हीं का शिष्य हूँ।
श्लोक 11 (1.151.11)
तीर्थात्तीर्थं गमयितुमहमेतत्समुद्यतः । तपसा यन्मया प्राप्तममोघमशनिप्रभम् ॥
tīrthāttīrthaṃ gamayitumahametatsamudyataḥ | tapasā yanmayā prāptamamoghamaśaniprabham
तपस्या से मैंने जो अमोघ और वज्र के समान चमकने वाला अस्त्र पाया है, उसे एक सुपात्र से दूसरे सुपात्र तक पहुँचाने के लिए मैं उद्यत हूँ —
श्लोक 12 (1.151.12)
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम यद्दहेत्पृथिवीमपि । ददता गुरुणा चोक्तं न मनुष्येष्विदंत्वया ॥
astraṃ brahmaśiro nāma yaddahetpṛthivīmapi | dadatā guruṇā coktaṃ na manuṣyeṣvidaṃtvayā
वह ब्रह्मशिर नाम का अस्त्र, जो पृथ्वी को भी जला सकता है। उसे देते समय गुरु ने कहा था — 'तुम इसे मनुष्यों पर
श्लोक 13 (1.151.13)
भारद्वाज विमोक्तव्यमल्पवीर्येषु संयुगे । यद्यदन्तर्हितं भूतं किंचिद्युद्ध्येत्त्वया सह ॥
bhāradvāja vimoktavyamalpavīryeṣu saṃyuge | yadyadantarhitaṃ bhūtaṃ kiṃcidyuddhyettvayā saha
और युद्ध में अल्प पराक्रम वालों पर नहीं छोड़ना, हे भारद्वाज! किन्तु यदि कोई छिपा हुआ प्राणी तुमसे युद्ध करे,
श्लोक 14 (1.151.14)
महातेजस्त्वमेतेन हन्याः शस्त्रेण संयुगे । त्वया प्राप्तमिदं वीर दिव्यं नान्योऽर्हति त्विदम् ॥
mahātejastvametena hanyāḥ śastreṇa saṃyuge | tvayā prāptamidaṃ vīra divyaṃ nānyo'rhati tvidam
तो हे महातेजस्वी! तुम युद्ध में इस अस्त्र से उसे मार सकते हो।' हे वीर! यह दिव्य अस्त्र तुमने प्राप्त किया है; इसका कोई दूसरा अधिकारी नहीं है।
श्लोक 15 (1.151.15)
समयस्तु त्वया रक्ष्यो मुनिसृष्टो विशांपते । आचार्यदक्षिणां देहि ज्ञातिग्रामस्य पश्यतः ॥
samayastu tvayā rakṣyo munisṛṣṭo viśāṃpate | ācāryadakṣiṇāṃ dehi jñātigrāmasya paśyataḥ
परन्तु हे प्रजानाथ! मुनि द्वारा बाँधे गए नियम का तुम्हें पालन करना होगा। अब अपने बन्धु-बान्धवों के सामने मुझे गुरुदक्षिणा दो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (1.151.16)
ददानीति प्रतिज्ञाते फाल्गुनेनाब्रवीद्गुरुः । युद्धेऽहं प्रतियोद्धव्यो युध्यमानस्त्वयाऽनघ ॥
dadānīti pratijñāte phālgunenābravīdguruḥ | yuddhe'haṃ pratiyoddhavyo yudhyamānastvayā'nagha
जब फाल्गुन ने "दूँगा" कहकर वचन दिया, तब गुरु बोले — "हे निष्पाप! युद्ध में जब मैं तुमसे लड़ूँ, तब तुम्हें भी मुझसे लड़ना होगा।"
श्लोक 17 (1.151.17)
तथेति च प्रतिज्ञाय द्रोणाय कुरुपुङ्गवः । उपसंगृह्य चरणावुपतस्थे विनीतवत् ॥
tatheti ca pratijñāya droṇāya kurupuṅgavaḥ | upasaṃgṛhya caraṇāvupatasthe vinītavat
कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ने "ऐसा ही होगा" कहकर द्रोण को वचन दिया और उनके चरण पकड़कर विनम्र भाव से उनके सामने खड़े हो गए।
श्लोक 18 (1.151.18)
द्रोणो जगाद वचनं समालिङ्ग्य तु फाल्गुनम् । यन्मयोक्तं पुरा पार्थ तव लोके नरं क्वचित् ॥
droṇo jagāda vacanaṃ samāliṅgya tu phālgunam | yanmayoktaṃ purā pārtha tava loke naraṃ kvacit
तब द्रोण ने फाल्गुन को गले लगाकर ये वचन कहे — "हे पार्थ! मैंने पहले जो कहा था कि संसार में किसी मनुष्य को
द्रोण उवाच
श्लोक 19 (1.151.19)
सदृशं कारये नैव सर्वप्रहरणे युधि । तत्कृतं च मया सम्यक्तव तुल्यो न वर्तते ॥
sadṛśaṃ kāraye naiva sarvapraharaṇe yudhi | tatkṛtaṃ ca mayā samyaktava tulyo na vartate
सब प्रकार के शस्त्रों से होने वाले युद्ध में तुम्हारे समान नहीं बनाऊँगा, वह मैंने भली-भाँति पूरा कर दिया। तुम्हारे समान कोई नहीं है।
श्लोक 20 (1.151.20)
देवा युधि न शक्तास्त्वां योद्धुं दैत्या न दानवाः । नाहं त्वत्तो विशिष्टोऽस्मि किं पुनर्मानवा रणे ॥
devā yudhi na śaktāstvāṃ yoddhuṃ daityā na dānavāḥ | nāhaṃ tvatto viśiṣṭo'smi kiṃ punarmānavā raṇe
युद्ध में न देवता तुमसे लड़ सकते हैं, न दैत्य, न दानव। मैं भी तुमसे बढ़कर नहीं हूँ; फिर रणभूमि में मनुष्यों की तो बात ही क्या!
श्लोक 21 (1.151.21)
एकस्तवाधिको लोके यो हि वृष्णिकुलोद्भवः । कृष्णः कमलपत्राक्षः कंसकालियसूदनः ॥
ekastavādhiko loke yo hi vṛṣṇikulodbhavaḥ | kṛṣṇaḥ kamalapatrākṣaḥ kaṃsakāliyasūdanaḥ
संसार में केवल एक ही तुमसे बढ़कर है — वृष्णिकुल में उत्पन्न, कमलनयन कृष्ण, जिन्होंने कंस और कालिय का दमन किया।
श्लोक 22 (1.151.22)
स जेता सर्वलोकानां सर्वप्रहरणायुधः । नैतावता ते पार्थाहं भवाम्यनृतवागिह ॥
sa jetā sarvalokānāṃ sarvapraharaṇāyudhaḥ | naitāvatā te pārthāhaṃ bhavāmyanṛtavāgiha
वे सब लोकों को जीतने वाले हैं और सब प्रकार के शस्त्र धारण करते हैं। हे पार्थ! यह कहकर मैं असत्य नहीं बोल रहा हूँ।
श्लोक 23 (1.151.23)
तदधीनं जगत्सर्वं तत्प्रलीनं तदुद्भवम् । तत्पदं न विजानन्ति ब्रह्मेशानादयोऽपि वा ॥
tadadhīnaṃ jagatsarvaṃ tatpralīnaṃ tadudbhavam | tatpadaṃ na vijānanti brahmeśānādayo'pi vā
सारा जगत् उन्हीं के अधीन है, उन्हीं में लीन होता है और उन्हीं से उत्पन्न होता है। ब्रह्मा, ईशान आदि भी उनके पद को नहीं जानते।
श्लोक 24 (1.151.24)
तन्नाभिप्रभवो ब्रह्मा सर्वभूतानि निर्ममे । स एव कर्ता भोक्ता च संहर्ता च जगन्मयम् ॥
tannābhiprabhavo brahmā sarvabhūtāni nirmame | sa eva kartā bhoktā ca saṃhartā ca jaganmayam
उनकी नाभि से उत्पन्न ब्रह्मा ने सब प्राणियों की रचना की। वही कर्ता हैं, वही भोक्ता हैं और वही संहर्ता हैं; यह जगत् उन्हीं का रूप है।
श्लोक 25 (1.151.25)
स एव भूतं भव्यं च भवच्च पुरुषः परः । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
sa eva bhūtaṃ bhavyaṃ ca bhavacca puruṣaḥ paraḥ | nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalo'yaṃ sanātanaḥ
वही भूत, भविष्य और वर्तमान हैं; वही परम पुरुष हैं — नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन।
श्लोक 26 (1.151.26)
प्रादुर्भवति योगात्मा पालनार्थं स लीलया । तत्तुल्यो हि न जायेत न जातो न जनिष्यते ॥
prādurbhavati yogātmā pālanārthaṃ sa līlayā | tattulyo hi na jāyeta na jāto na janiṣyate
वे योगात्मा जगत् की रक्षा के लिए लीला से प्रकट होते हैं। उनके समान न कोई उत्पन्न होता है, न हुआ है और न आगे होगा।
श्लोक 27 (1.151.27)
स हि मातुलजोऽभूत्ते चराचरगुरुः पिता । को हि तं जेतुमीहेत जानन्नात्महितं नरः ॥
sa hi mātulajo'bhūtte carācaraguruḥ pitā | ko hi taṃ jetumīheta jānannātmahitaṃ naraḥ
चर-अचर के गुरु और पिता वे तुम्हारे मामा के पुत्र हैं। अपना हित जानने वाला कौन मनुष्य उन्हें जीतने की इच्छा करेगा?
श्लोक 28 (1.151.28)
श्यालश्च ते सखा चासौ तस्य त्वं प्राणवल्लभः । स्नेहमभ्यधिकं तस्य तव सख्यमवस्थितम् ॥
śyālaśca te sakhā cāsau tasya tvaṃ prāṇavallabhaḥ | snehamabhyadhikaṃ tasya tava sakhyamavasthitam
वे तुम्हारे साले और सखा भी हैं, और तुम उन्हें प्राणों के समान प्रिय हो। तुम पर उनका स्नेह अधिक है, और उनके प्रति तुम्हारी मित्रता अटल है।
श्लोक 29 (1.151.29)
न तेन भवतो युद्धं भविता नर्मतोऽपि वा । अपिचार्थे तव पुरा शक्रेण किल चोदितः ॥
na tena bhavato yuddhaṃ bhavitā narmato'pi vā | apicārthe tava purā śakreṇa kila coditaḥ
तुम्हारा उनसे युद्ध कभी नहीं होगा, हँसी में भी नहीं। इतना ही नहीं, कहते हैं कि पूर्वकाल में तुम्हारे लिए शक्र (इन्द्र) ने उनसे अनुरोध किया था,
श्लोक 30 (1.151.30)
गोकुले वर्धमानस्तु नन्दगोपस्य कारणात् । ममांशः पाण्डवो लोके पृथिव्यां पुरुषोत्तमः ॥
gokule vardhamānastu nandagopasya kāraṇāt | mamāṃśaḥ pāṇḍavo loke pṛthivyāṃ puruṣottamaḥ
जब वे नन्दगोप के निमित्त गोकुल में पल-बढ़ रहे थे — 'हे पुरुषोत्तम! मेरा अंश संसार में, पृथ्वी पर, पाण्डव के रूप में जन्मा है;
श्लोक 31 (1.151.31)
कौन्तेयावरजः श्रीमानर्जुनो नाम वीर्यवान् । भुवो भारापहरणे साहाय्यं ते करिष्यति ॥
kaunteyāvarajaḥ śrīmānarjuno nāma vīryavān | bhuvo bhārāpaharaṇe sāhāyyaṃ te kariṣyati
वह कुन्तीपुत्र का छोटा भाई, श्रीमान् और पराक्रमी अर्जुन है। पृथ्वी का भार उतारने में वह तुम्हारी सहायता करेगा।
श्लोक 32 (1.151.32)
तदर्थमभयं देहि पाहि चास्मत्कृते प्रभो । इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षस्तदा शक्रेण फल्गुन ॥
tadarthamabhayaṃ dehi pāhi cāsmatkṛte prabho | ityuktaḥ puṇḍarīkākṣastadā śakreṇa phalguna
इसलिए उसे अभय दो और मेरे लिए उसकी रक्षा करो, हे प्रभो!' हे फाल्गुन! शक्र के ऐसा कहने पर कमलनयन,
श्लोक 33 (1.151.33)
तमुवाच ततः श्रीमाञ्शङ्खचक्रगदाधरः । जानामि पाण्डवे वंशे जातं पार्थं पितृष्वसुः ॥
tamuvāca tataḥ śrīmāñśaṅkhacakragadādharaḥ | jānāmi pāṇḍave vaṃśe jātaṃ pārthaṃ pitṛṣvasuḥ
शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले श्रीमान् भगवान् ने उनसे कहा — 'मैं जानता हूँ कि पाण्डु के वंश में मेरी बुआ का पुत्र पार्थ जन्मा है,
श्लोक 34 (1.151.34)
पुत्रं परमधर्मिष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । पालयामि त्वदंशं तं सर्वलोकमहाभुजम् ॥
putraṃ paramadharmiṣṭhaṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam | pālayāmi tvadaṃśaṃ taṃ sarvalokamahābhujam
जो परम धर्मनिष्ठ और सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ है। तुम्हारे अंश उस सम्पूर्ण लोक में महाबाहु पार्थ की मैं रक्षा करता हूँ।
श्लोक 35 (1.151.35)
आवयोः सख्यसदृशं न च लोके भविष्यति । यस्तद्भक्तः समद्भक्तो यस्तं द्वेष्टि स मामपि ॥
āvayoḥ sakhyasadṛśaṃ na ca loke bhaviṣyati | yastadbhaktaḥ samadbhakto yastaṃ dveṣṭi sa māmapi
संसार में हम दोनों की मित्रता जैसी मित्रता कभी न होगी। जो उसका भक्त है, वह मेरा भक्त है; जो उससे द्वेष करता है, वह मुझसे भी द्वेष करता है।
श्लोक 36 (1.151.36)
यन्मे वित्तं तु तत्तस्य तं विनाहं न जीवये । इति पार्थ पुरा शक्रमाह सर्वेश्वरो हरिः ॥
yanme vittaṃ tu tattasya taṃ vināhaṃ na jīvaye | iti pārtha purā śakramāha sarveśvaro hariḥ
मेरा जो धन है, वह उसका है; उसके बिना मैं जीवित नहीं रहूँगा।' हे पार्थ! सबके ईश्वर हरि ने पूर्वकाल में शक्र से ऐसा कहा था।
श्लोक 37 (1.151.37)
तस्मात्तवापि सदृशस्तं विनाभ्यधिकः पुमान् । न चेह भविता लोके तमेव शरणं व्रज ॥
tasmāttavāpi sadṛśastaṃ vinābhyadhikaḥ pumān | na ceha bhavitā loke tameva śaraṇaṃ vraja
इसलिए उनके सिवा इस संसार में न कोई तुम्हारे समान होगा, न तुमसे बढ़कर। तुम उन्हीं की शरण में जाओ,
श्लोक 38 (1.151.38)
शरण्यः सर्वभूतानां देवदेवो जनार्दनः ॥
śaraṇyaḥ sarvabhūtānāṃ devadevo janārdanaḥ
जो सब प्राणियों के शरणदाता, देवों के देव जनार्दन हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (1.151.39)
तथेति च प्रतिज्ञाय द्रोणाय कुरुपुङ्गवः । उपसंगृह्य चरणौ युधिष्ठिरवशोऽभवत् ॥
tatheti ca pratijñāya droṇāya kurupuṅgavaḥ | upasaṃgṛhya caraṇau yudhiṣṭhiravaśo'bhavat
वैशम्पायन ने कहा — कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ने "ऐसा ही होगा" कहकर द्रोण को वचन दिया और उनके चरण छूकर युधिष्ठिर की आज्ञा में रहने लगे।
श्लोक 40 (1.151.40)
स्वभावादगमच्छब्दो महीं सागरमेखलाम् । अर्जुनस्य समो लोके नास्ति कश्चिद्धनुर्धरः ॥
svabhāvādagamacchabdo mahīṃ sāgaramekhalām | arjunasya samo loke nāsti kaściddhanurdharaḥ
अपने-आप ही समुद्र से घिरी पृथ्वी पर यह बात फैल गई कि "संसार में अर्जुन के समान कोई धनुर्धर नहीं है।"
श्लोक 41 (1.151.41)
गदायुद्धेऽसियुद्धे च रथयुद्धे च पाण्डवः । पारगश्च धनुर्युद्धे बभूवाथ धनञ्जयः ॥
gadāyuddhe'siyuddhe ca rathayuddhe ca pāṇḍavaḥ | pāragaśca dhanuryuddhe babhūvātha dhanañjayaḥ
पाण्डुपुत्र धनञ्जय गदा, तलवार और रथ के युद्ध में तथा धनुष के युद्ध में भी पारंगत हो गए।
श्लोक 42 (1.151.42)
नीतिमान्सकलां नीतिं विबुधाधिपतेस्तदा । अस्त्रे शस्त्रे च शास्त्रे च रथनागाश्वकर्मणि । अवाप्य सहदेवोऽपि भ्रातॄणां ववृते वशे ॥
nītimānsakalāṃ nītiṃ vibudhādhipatestadā | astre śastre ca śāstre ca rathanāgāśvakarmaṇi | avāpya sahadevo'pi bhrātṝṇāṃ vavṛte vaśe
नीतिज्ञ सहदेव ने भी तब देवताओं के अधिपति से सम्पूर्ण नीतिशास्त्र, तथा अस्त्र, शस्त्र, शास्त्र और रथ, हाथी व घोड़ों के संचालन की विद्या प्राप्त की, और वे अपने भाइयों की आज्ञा में रहने लगे।
श्लोक 43 (1.151.43)
द्रोणेनैवं विनीतश्च भ्रातॄणां नकुलः प्रियः । चित्रयोधी समाख्यातो बभूवातिरथोदितः ॥
droṇenaivaṃ vinītaśca bhrātṝṇāṃ nakulaḥ priyaḥ | citrayodhī samākhyāto babhūvātirathoditaḥ
भाइयों के प्रिय नकुल भी इसी प्रकार द्रोण से शिक्षित होकर विचित्र युद्ध करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हुए और अतिरथी कहलाए।
श्लोक 44 (1.151.44)
त्रिवर्षकृतयज्ञस्तु गन्धर्वाणामुपप्लवे । अर्जुनप्रमुखैः पार्थैः सौवीरः समरे हतः ॥
trivarṣakṛtayajñastu gandharvāṇāmupaplave | arjunapramukhaiḥ pārthaiḥ sauvīraḥ samare hataḥ
गन्धर्वों के उपद्रव के बीच भी तीन वर्ष तक यज्ञ करते रहने वाले सौवीर-नरेश को अर्जुन आदि पार्थों ने युद्ध में मार डाला।
श्लोक 45 (1.151.45)
न शशाक वशे कर्तुं यं पाण्डुरपि वीर्यवान् । सोऽर्जुनेन वशं नीतो राजासीद्यवनाधिपः ॥
na śaśāka vaśe kartuṃ yaṃ pāṇḍurapi vīryavān | so'rjunena vaśaṃ nīto rājāsīdyavanādhipaḥ
जिस यवनराज को पराक्रमी पाण्डु भी वश में नहीं कर सके थे, उसे अर्जुन ने अपने अधीन कर लिया।
श्लोक 46 (1.151.46)
अतीव बलसंपन्नः सदा मानी कुरून्प्रति । विपुलो नाम सौवीरः शस्तः पार्थेन धीमता ॥
atīva balasaṃpannaḥ sadā mānī kurūnprati | vipulo nāma sauvīraḥ śastaḥ pārthena dhīmatā
अत्यन्त बलवान् और कौरवों के प्रति सदा अभिमान रखने वाले विपुल नामक सौवीर को बुद्धिमान् पार्थ ने मार गिराया।
श्लोक 47 (1.151.47)
दत्तामित्र इति ख्यातं सङ्ग्रामे कृतनिश्चयम् । सुमित्रं नाम सौवीरमर्जुनोऽदमयच्छरैः ॥
dattāmitra iti khyātaṃ saṅgrāme kṛtaniścayam | sumitraṃ nāma sauvīramarjuno'damayaccharaiḥ
दत्तामित्र नाम से प्रसिद्ध और युद्ध में दृढ़ निश्चय वाले सुमित्र नामक सौवीर को अर्जुन ने अपने बाणों से दबा दिया।
श्लोक 48 (1.151.48)
भीमसेनसहायश्च रथानामयुतं च सः । अर्जुनः समरे प्राच्यान्सर्वानेकरथोऽजयत् ॥
bhīmasenasahāyaśca rathānāmayutaṃ ca saḥ | arjunaḥ samare prācyānsarvānekaratho'jayat
भीमसेन को साथ लेकर अर्जुन ने अकेले एक रथ से युद्ध में पूर्व दिशा के सब राजाओं को और दस हज़ार रथों को जीत लिया।
श्लोक 49 (1.151.49)
तथैवैकरथो गत्वा दक्षिणामजयद्दिशम् । धनौघं प्रापयामास कुरुराष्ट्रं धनञ्जयः ॥
tathaivaikaratho gatvā dakṣiṇāmajayaddiśam | dhanaughaṃ prāpayāmāsa kururāṣṭraṃ dhanañjayaḥ
इसी प्रकार एक ही रथ से जाकर उन्होंने दक्षिण दिशा को जीता, और धनञ्जय ने कुरुराष्ट्र में धन का प्रवाह ला दिया।
श्लोक 50 (1.151.50)
यतः पञ्चदशे वर्षे सर्वमेतच्चकार सः । तं दृष्ट्वा धार्तराष्ट्राणां ततो भयमजायत ॥
yataḥ pañcadaśe varṣe sarvametaccakāra saḥ | taṃ dṛṣṭvā dhārtarāṣṭrāṇāṃ tato bhayamajāyata
क्योंकि उन्होंने यह सब पन्द्रहवें वर्ष में कर दिखाया था, इसलिए उन्हें देखकर धृतराष्ट्र के पुत्रों के मन में भय उत्पन्न हो गया।
श्लोक 51 (1.151.51)
यः सर्वान्धृतराष्ट्रस्य पुत्रान्विप्रचकार ह । भीमसेनो महाबाहुर्बलाद्बलवतां वरः ॥
yaḥ sarvāndhṛtarāṣṭrasya putrānvipracakāra ha | bhīmaseno mahābāhurbalādbalavatāṃ varaḥ
महाबाहु भीमसेन ने, जो बलवानों में श्रेष्ठ थे, अपने बल से धृतराष्ट्र के सब पुत्रों को सताया था।
श्लोक 52 (1.151.52)
अदुष्टभावं तं दोषैर्जगृहुर्दोषबुद्धयः । धार्तराष्ट्रास्तथा सर्वे भयाद्भीमस्य कर्मणा ॥
aduṣṭabhāvaṃ taṃ doṣairjagṛhurdoṣabuddhayaḥ | dhārtarāṣṭrāstathā sarve bhayādbhīmasya karmaṇā
उनके मन में कोई दुर्भाव नहीं था, फिर भी दोष-दृष्टि वाले धृतराष्ट्र के सब पुत्र भीम के कर्मों से डरकर उन पर दोष मढ़ने लगे।
श्लोक 53 (1.151.53)
तं दृष्ट्वा कर्मभिः पार्थान्सर्वानागतलक्षणान् । बलाद्बहुगुणांस्तेभ्यो बिभियुर्दोषबुद्धयः ॥
taṃ dṛṣṭvā karmabhiḥ pārthānsarvānāgatalakṣaṇān | balādbahuguṇāṃstebhyo bibhiyurdoṣabuddhayaḥ
पार्थों के कर्मों से यह देखकर कि उन सबमें महानता के लक्षण प्रकट हो गए हैं और वे बल में उनसे कई गुना बढ़कर हैं, वे दोषदर्शी राजकुमार भयभीत हो गए।
श्लोक 54 (1.151.54)
एवं सर्वे महात्मानः पाण्डवा मनुजोत्तमाः । परराष्ट्राणि निर्जित्य स्वराष्ट्रं ववृधुः पुरा ॥
evaṃ sarve mahātmānaḥ pāṇḍavā manujottamāḥ | pararāṣṭrāṇi nirjitya svarāṣṭraṃ vavṛdhuḥ purā
इस प्रकार सभी महात्मा, नरश्रेष्ठ पाण्डवों ने उस समय दूसरे राज्यों को जीतकर अपने राज्य को बढ़ाया।
श्लोक 55 (1.151.55)
ततो बलमतिख्यातं विज्ञाय दृढधन्विनाम् । दूषितः सहसा भावो धृतराष्ट्रस्य पाण्डुषु । स चिन्तापरमो राजा न निद्रामलभन्निशि ॥
tato balamatikhyātaṃ vijñāya dṛḍhadhanvinām | dūṣitaḥ sahasā bhāvo dhṛtarāṣṭrasya pāṇḍuṣu | sa cintāparamo rājā na nidrāmalabhanniśi
तब उन दृढ़ धनुर्धारियों के अत्यन्त प्रसिद्ध बल को जानकर पाण्डवों के प्रति धृतराष्ट्र का भाव सहसा दूषित हो गया। चिन्ता में डूबे उस राजा को रात में नींद नहीं आई।