आदि पर्व · अध्याय 153
कणिक द्वारा धृतराष्ट्र को कुटिल नीति का उपदेश
पाण्डवों के बढ़ते बल से चिन्तित धृतराष्ट्र अपने मन्त्री कणिक से पूछते हैं कि सन्धि करें या विग्रह; दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दुःशासन भी यही प्रश्न करते हैं। कणिक कठोर राजनीति का उपदेश देता है: दण्ड सदा उठाए रखो, अपनी दुर्बलता छिपाओ, शत्रु को — चाहे वह सगा ही क्यों न हो — जड़ से नष्ट करो, प्रहार का समय आने तक धर्म और मधुरता का दिखावा करो, सर्वत्र गुप्तचर लगाओ और मन्त्रणा गुप्त रखो। इसे वह उस गीदड़ की कथा से समझाता है जिसने अपने साथियों — बाघ, चूहे, भेड़िये और नेवले — को छल से भगाकर सबके मिलकर मारे हिरन को अकेले खा लिया, और अन्त में राजा को अपने बलवान भतीजों से अपनी रक्षा करने की सलाह देता है। कणिक घर लौट जाता है और धृतराष्ट्र शोक में डूब जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.153.1)
श्रुत्वा पाण्डुसुतान्वीरान्बलोद्रिक्तान्महौजसः । धृतराष्ट्रो महीपालश्चिन्तामगमदातुरः ॥
śrutvā pāṇḍusutānvīrānbalodriktānmahaujasaḥ | dhṛtarāṣṭro mahīpālaścintāmagamadāturaḥ
पाण्डु के पुत्रों को वीर, बल से भरपूर और महान तेजस्वी सुनकर पृथ्वीपालक धृतराष्ट्र व्याकुल होकर चिन्ता में पड़ गए।
श्लोक 2 (1.153.2)
तत आहूय मन्त्रज्ञं राजशास्त्रार्थवित्तमम् । कणिकं मन्त्रिणां श्रेष्ठं धृतराष्ट्रोऽब्रवीद्वचः ॥
tata āhūya mantrajñaṃ rājaśāstrārthavittamam | kaṇikaṃ mantriṇāṃ śreṣṭhaṃ dhṛtarāṣṭro'bravīdvacaḥ
तब उन्होंने मन्त्रणा में कुशल, राजशास्त्र के अर्थ को भली-भाँति जानने वाले, मन्त्रियों में श्रेष्ठ कणिक को बुलवाया और धृतराष्ट्र ने यह बात कही —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 3 (1.153.3)
उत्सिक्ताः पाण्डवा नित्यं तेभ्योऽसूये द्विजोत्तम । तत्र मे निश्चिततमं सन्धिविग्रहकारणम् । कणिक त्वं ममाचक्ष्व करिष्ये वचनं तव ॥
utsiktāḥ pāṇḍavā nityaṃ tebhyo'sūye dvijottama | tatra me niścitatamaṃ sandhivigrahakāraṇam | kaṇika tvaṃ mamācakṣva kariṣye vacanaṃ tava
"हे द्विजश्रेष्ठ! पाण्डव दिन-दिन गर्व से भरते जा रहे हैं और मुझे उनसे ईर्ष्या होती है। कणिक, इस विषय में सन्धि या विग्रह का जो सबसे निश्चित कारण हो, वह मुझे बताओ; मैं तुम्हारी बात मानूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (1.153.4)
दुर्योधनोऽथ शकुनिः कर्णदुःशासनावपि । कणिकं ह्युपसंगृह्य मन्त्रिणं सौबलस्य च ॥
duryodhano'tha śakuniḥ karṇaduḥśāsanāvapi | kaṇikaṃ hyupasaṃgṛhya mantriṇaṃ saubalasya ca
तब दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दुःशासन भी सुबलपुत्र (शकुनि) के मन्त्री कणिक के पास गए
श्लोक 5 (1.153.5)
पप्रच्छुर्भरतश्रेष्ठ पाण्डवान्प्रति नैकधा । प्रबुद्धाः पाण्डवा नित्यं सर्वे तेभ्यस्त्रसामहे ॥
papracchurbharataśreṣṭha pāṇḍavānprati naikadhā | prabuddhāḥ pāṇḍavā nityaṃ sarve tebhyastrasāmahe
और, हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डवों के विषय में उससे अनेक प्रकार से पूछने लगे — "पाण्डव सदा सजग रहते हैं; हम सब उनसे डरते हैं।
दुर्योधनादय ऊचुः
श्लोक 6 (1.153.6)
अनूनं सर्वपक्षाणां यद्भवेत्क्षेमकारकम् । भारद्वाज तदाचक्ष्व करिष्यामः कथं वयम् ॥
anūnaṃ sarvapakṣāṇāṃ yadbhavetkṣemakārakam | bhāradvāja tadācakṣva kariṣyāmaḥ kathaṃ vayam
"हे भारद्वाज! जो उपाय सब पक्षों के लिए पूरी तरह कल्याणकारी हो, वह हमें बताइए। हम क्या करें?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (1.153.7)
स प्रसन्नमनास्तेन परिपृष्टो द्विजोत्तमः । उवाच वचनं तीक्ष्णं राजशास्त्रार्थदर्शनम् ॥
sa prasannamanāstena paripṛṣṭo dvijottamaḥ | uvāca vacanaṃ tīkṣṇaṃ rājaśāstrārthadarśanam
इस प्रकार पूछे जाने पर वह द्विजश्रेष्ठ प्रसन्नचित्त होकर राजशास्त्र का सार प्रकट करने वाले तीखे वचन बोला।
कणिक उवाच
श्लोक 8 (1.153.8)
शृणु राजन्निदं तत्र प्रोच्यमानं मयानघ । न मेऽभ्यसूया कर्तव्या श्रुत्वैतत्कुरुसत्तम ॥
śṛṇu rājannidaṃ tatra procyamānaṃ mayānagha | na me'bhyasūyā kartavyā śrutvaitatkurusattama
"हे निष्पाप राजन्, इस विषय में मैं जो कहता हूँ, उसे सुनिए; हे कुरुश्रेष्ठ, इसे सुनकर मुझ पर रुष्ट न होइएगा।"
श्लोक 9 (1.153.9)
नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः । अच्छिद्रश्छिद्रदर्शी स्यात्परेषां विवरानुगः ॥
nityamudyatadaṇḍaḥ syānnityaṃ vivṛtapauruṣaḥ | acchidraśchidradarśī syātpareṣāṃ vivarānugaḥ
"राजा सदा दण्ड उठाए रहे और अपना पराक्रम सदा प्रकट रखे। स्वयं में कोई छिद्र न रहने दे, दूसरों के छिद्र देखता रहे और शत्रुओं की कमज़ोरियों का पीछा करता रहे।"
श्लोक 10 (1.153.10)
नित्यमुद्यतदण्डाद्धि भृशमुद्विजते जनः । तस्मात्सर्वाणि कार्याणि दण्डेनैव विधारयेत् ॥
nityamudyatadaṇḍāddhi bhṛśamudvijate janaḥ | tasmātsarvāṇi kāryāṇi daṇḍenaiva vidhārayet
"क्योंकि जिसका दण्ड सदा उठा रहता है, उससे लोग बहुत डरते हैं; इसलिए सारे कार्य दण्ड के बल पर ही सिद्ध करे।"
श्लोक 11 (1.153.11)
नास्य च्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेण परमन्वियात् । गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥
nāsya cchidraṃ paraḥ paśyecchidreṇa paramanviyāt | gūhetkūrma ivāṅgāni rakṣedvivaramātmanaḥ
"शत्रु उसका कोई छिद्र न देख पाए, पर वह शत्रु के छिद्र से ही उस पर चढ़ाई करे। जैसे कछुआ अपने अंग समेट लेता है, वैसे ही वह अपने अंग छिपाए रखे और अपनी दुर्बलता की रक्षा करे।"
श्लोक 12 (1.153.12)
नित्यं च ब्राह्मणाः पूज्या नृपेण हितमिच्छता । सृष्टो नृपो हि विप्राणां पालने दुष्टनिग्रहे ॥
nityaṃ ca brāhmaṇāḥ pūjyā nṛpeṇa hitamicchatā | sṛṣṭo nṛpo hi viprāṇāṃ pālane duṣṭanigrahe
"अपना हित चाहने वाले राजा को सदा ब्राह्मणों का आदर करना चाहिए; क्योंकि राजा की सृष्टि ब्राह्मणों की रक्षा और दुष्टों के दमन के लिए ही हुई है।"
श्लोक 13 (1.153.13)
उभाभ्यां वर्धते धर्मो धर्मवृद्ध्या जितावुभौ । लोकश्चायं परश्चैव ततो धर्मं समाचरेत् ॥
ubhābhyāṃ vardhate dharmo dharmavṛddhyā jitāvubhau | lokaścāyaṃ paraścaiva tato dharmaṃ samācaret
"इन दोनों से धर्म बढ़ता है, और धर्म के बढ़ने से दोनों लोक — यह लोक और परलोक — जीत लिए जाते हैं। इसलिए धर्म का आचरण करना चाहिए।"
श्लोक 14 (1.153.14)
कृतापराधं पुरुषं दृष्ट्वा यः क्षमते नृपः । तेनावमानमाप्नोति पापं चेह परत्र च ॥
kṛtāparādhaṃ puruṣaṃ dṛṣṭvā yaḥ kṣamate nṛpaḥ | tenāvamānamāpnoti pāpaṃ ceha paratra ca
"जो राजा अपराधी को देखकर भी उसे क्षमा कर देता है, वह इससे अपमान पाता है और इस लोक तथा परलोक में पाप का भागी होता है।"
श्लोक 15 (1.153.15)
यो विभूतिमवाप्योच्चै राज्ञो विकुरुतेऽधमः । तमानयित्वा हत्वा च दद्याद्धीनाय तद्धनम् ॥
yo vibhūtimavāpyoccai rājño vikurute'dhamaḥ | tamānayitvā hatvā ca dadyāddhīnāya taddhanam
"जो नीच व्यक्ति ऊँचा वैभव पाकर राजा के विरुद्ध आचरण करे, उसे बुलवाकर मार डाले और उसका धन किसी साधारण, दीन व्यक्ति को दे दे।"
श्लोक 16 (1.153.16)
नो चेद्धुरि नियुक्ता ये स्थास्यन्ति वशमात्मनः । राजा नियुञ्ज्यात्पुरुषानाप्तान्धर्मार्थकोविदान् ॥
no ceddhuri niyuktā ye sthāsyanti vaśamātmanaḥ | rājā niyuñjyātpuruṣānāptāndharmārthakovidān
"ऐसा न करने पर जो लोग भार सँभालने को नियुक्त हैं, वे अपनी मनमानी करने लगेंगे। राजा धर्म और अर्थ के जानकार विश्वसनीय पुरुषों को ही नियुक्त करे।"
श्लोक 17 (1.153.17)
ये नियुक्तास्तथा केचिद्राष्ट्रं वा यदि वा पुरम् । ग्रामं जनपदं वापि बाधेयुर्यदि वा न वा ॥
ye niyuktāstathā kecidrāṣṭraṃ vā yadi vā puram | grāmaṃ janapadaṃ vāpi bādheyuryadi vā na vā
"इस प्रकार नियुक्त लोगों में से कोई राष्ट्र को, नगर को, गाँव को या जनपद को सताता है या नहीं —"
श्लोक 18 (1.153.18)
परीक्षणार्थं विसृजेदानतांश्छन्नरूपिणः । परीक्ष्य पापकं जह्याद्धनमादाय सर्वशः ॥
parīkṣaṇārthaṃ visṛjedānatāṃśchannarūpiṇaḥ | parīkṣya pāpakaṃ jahyāddhanamādāya sarvaśaḥ
"इसकी परीक्षा के लिए वह स्वामिभक्त गुप्तवेशधारी पुरुषों को भेजे; और परखकर दुष्ट का सारा धन छीनकर उसे निकाल दे।"
श्लोक 19 (1.153.19)
नासम्यक्कृत्यकारी स्यादुपक्रम्य कदाचन । कण्टको ह्यपि दुश्छिन्न आस्रावं जनयेच्चिरम् ॥
nāsamyakkṛtyakārī syādupakramya kadācana | kaṇṭako hyapi duśchinna āsrāvaṃ janayecciram
"कोई कार्य आरम्भ करके उसे कभी अधूरे ढंग से न करे; क्योंकि ठीक से न निकाला गया काँटा भी बहुत समय तक पीब बहाता रहता है।"
श्लोक 20 (1.153.20)
वधमेव प्रशंसन्ति शत्रूणामपकारिणाम् । सुविदीर्णं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् ॥
vadhameva praśaṃsanti śatrūṇāmapakāriṇām | suvidīrṇaṃ suvikrāntaṃ suyuddhaṃ supalāyitam
"बुद्धिमान लोग अपकार करने वाले शत्रुओं के वध की ही प्रशंसा करते हैं। शत्रु को भली-भाँति छिन्न-भिन्न करना, उस पर भली-भाँति आक्रमण करना, भली-भाँति युद्ध करना और समय आने पर भली-भाँति पीछे हट जाना — ये सब सराहे जाते हैं।"
श्लोक 21 (1.153.21)
आपद्यापदि काले कुर्वीत न विचारयेत् । नावज्ञेयो रिपुस्तात दुर्बलोऽपि कथं चन ॥
āpadyāpadi kāle kurvīta na vicārayet | nāvajñeyo ripustāta durbalo'pi kathaṃ cana
"हर आपत्ति में समय पर कार्य करे, सोच-विचार में न उलझा रहे। तात, शत्रु को, चाहे वह दुर्बल ही क्यों न हो, कभी तुच्छ न समझे।"
श्लोक 22 (1.153.22)
अल्पोऽप्यग्निर्वनं कृत्स्नं दहत्याश्रयसंश्रयात् । अन्धः स्यादन्धवेलायां बाधिर्यमपि चाश्रयेत् ॥
alpo'pyagnirvanaṃ kṛtsnaṃ dahatyāśrayasaṃśrayāt | andhaḥ syādandhavelāyāṃ bādhiryamapi cāśrayet
"छोटी-सी आग भी आश्रय पाकर सारे वन को जला डालती है। जब अंधा बनने का समय हो तब अंधा बन जाए, और बहरापन भी ओढ़ ले।"
श्लोक 23 (1.153.23)
कुर्यात्तृणमयं चापं शयीत मृगशायिकाम् । सान्त्वादिभिरुपायैस्तु हन्याच्छत्रुं वशे स्थितं ॥
kuryāttṛṇamayaṃ cāpaṃ śayīta mṛgaśāyikām | sāntvādibhirupāyaistu hanyācchatruṃ vaśe sthitaṃ
"वह अपने धनुष को तिनके का-सा (हानिरहित) दिखाए और हिरन की तरह (सजग) सोए; पर जब शत्रु वश में आ जाए, तब सान्त्वना आदि उपायों से उसे मार डाले।"
श्लोक 24 (1.153.24)
दया न तस्मिन्कर्तव्या शरणागत इत्युत । निरुद्विग्नो हि भवति न हताज्जायते भयम् ॥
dayā na tasminkartavyā śaraṇāgata ityuta | nirudvigno hi bhavati na hatājjāyate bhayam
"'यह शरण में आया है' — ऐसा सोचकर उस पर दया न करे। तभी मनुष्य निश्चिन्त होता है, क्योंकि मारे गए शत्रु से कोई भय उत्पन्न नहीं होता।"
श्लोक 25 (1.153.25)
हन्यादमित्रं दानेन तथा पूर्वापकारिणम् । हन्यात्त्रीन्पञ्च सप्तेति परपक्षस्य सर्वशः ॥
hanyādamitraṃ dānena tathā pūrvāpakāriṇam | hanyāttrīnpañca sapteti parapakṣasya sarvaśaḥ
"शत्रु को, और इसी प्रकार पहले अपकार करने वाले को भी, दान के द्वारा (विश्वास में लेकर) मार डाले। विरोधी पक्ष के तीन, पाँच और सात — सबको सब ओर से नष्ट करे।"
श्लोक 26 (1.153.26)
मूलमेवादितश्छिन्द्यात्परपक्षस्य नित्यशः । ततः सहायांस्तत्पक्षान्सर्वांश्च तदनन्तरम् ॥
mūlamevāditaśchindyātparapakṣasya nityaśaḥ | tataḥ sahāyāṃstatpakṣānsarvāṃśca tadanantaram
"वह विरोधी पक्ष की जड़ को ही सबसे पहले काटे, फिर उसके सहायकों और पक्षधरों को, और उसके बाद शेष सबको।"
श्लोक 27 (1.153.27)
छिन्नमूले ह्यधिष्ठाने सर्वे तज्जीविनो हताः । कथं नु शाखास्तिष्ठेरंश्छिन्नमूले वनस्पतौ ॥
chinnamūle hyadhiṣṭhāne sarve tajjīvino hatāḥ | kathaṃ nu śākhāstiṣṭheraṃśchinnamūle vanaspatau
"क्योंकि आधार की जड़ कट जाने पर उस पर जीने वाले सब नष्ट हो जाते हैं। वृक्ष की जड़ कट जाए तो शाखाएँ कैसे टिकेंगी?"
श्लोक 28 (1.153.28)
एकाग्रः स्यादविवृतो नित्यं विवरदर्शकः । राजन्नित्यं सपत्नेषु नित्योद्विग्नः समाचरेत् ॥
ekāgraḥ syādavivṛto nityaṃ vivaradarśakaḥ | rājannityaṃ sapatneṣu nityodvignaḥ samācaret
"वह एकाग्र रहे, अपना भेद न खोले और सदा दूसरों के छिद्र देखता रहे। हे राजन्, प्रतिद्वन्द्वियों के प्रति सदा सावधान और सशंकित रहकर आचरण करे।"
श्लोक 29 (1.153.29)
अग्न्याधानेन यज्ञेन काषायेण जटाजिनैः । लोकान्विश्वासयित्वैव ततो लुम्पेद्यथा वृकः ॥
agnyādhānena yajñena kāṣāyeṇa jaṭājinaiḥ | lokānviśvāsayitvaiva tato lumpedyathā vṛkaḥ
"अग्न्याधान, यज्ञ, गेरुए वस्त्र, जटा और मृगचर्म के सहारे पहले लोगों का विश्वास जीते, फिर भेड़िये की तरह उन पर टूट पड़े।"
श्लोक 30 (1.153.30)
अङ्कुशं शौचमित्याहुरर्थानामुपधारणे । आनाम्य फलितां शाखां पक्वं पक्वं प्रशातयेत् ॥
aṅkuśaṃ śaucamityāhurarthānāmupadhāraṇe | ānāmya phalitāṃ śākhāṃ pakvaṃ pakvaṃ praśātayet
"कहते हैं कि धन हथियाने में पवित्रता (का दिखावा) अंकुश का काम करता है। फलों से लदी डाल को झुकाकर जो-जो फल पकता जाए, उसे तोड़ता जाए।"
श्लोक 31 (1.153.31)
फलार्थोऽयं समारम्भो लोके पुंसां विपश्चिताम् । वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्कालस्य पर्ययः ॥
phalārtho'yaṃ samārambho loke puṃsāṃ vipaścitām | vahedamitraṃ skandhena yāvatkālasya paryayaḥ
"संसार में बुद्धिमान पुरुषों का हर उद्योग फल के लिए ही होता है। जब तक समय न पलटे, तब तक शत्रु को कंधे पर भी ढोता रहे।"
श्लोक 32 (1.153.32)
ततः प्रत्यागते काले भिन्द्याद्घटमिवाश्मनि । अमित्रो न विमोक्तव्यः कृपणं बह्वपि ब्रुवन् ॥
tataḥ pratyāgate kāle bhindyādghaṭamivāśmani | amitro na vimoktavyaḥ kṛpaṇaṃ bahvapi bruvan
"फिर समय आने पर उसे पत्थर पर घड़े की तरह फोड़ डाले। शत्रु चाहे कितना ही दीन होकर गिड़गिड़ाए, उसे छोड़ना नहीं चाहिए।"
श्लोक 33 (1.153.33)
कृपा न तस्मिन्कर्तव्या हन्यादेवापकारिणम् । हन्यादमित्रं सान्त्वेन तथा दानेन वा पुनः ॥
kṛpā na tasminkartavyā hanyādevāpakāriṇam | hanyādamitraṃ sāntvena tathā dānena vā punaḥ
"उस पर कृपा न करे, अपकारी को मार ही डाले। शत्रु को सान्त्वना से, अथवा दान से,"
श्लोक 34 (1.153.34)
तथैव भेददण्डाभ्यां सर्वोपायैः प्रशातयेत् । कथं सान्त्वेन दानेन भेदैर्दण्डेन वा पुनः ॥
tathaiva bhedadaṇḍābhyāṃ sarvopāyaiḥ praśātayet | kathaṃ sāntvena dānena bhedairdaṇḍena vā punaḥ
"और इसी प्रकार भेद और दण्ड से — सब उपायों से उसे गिरा दे।" धृतराष्ट्र बोले — "सान्त्वना, दान, भेद अथवा दण्ड से
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 35 (1.153.35)
अमित्रः शक्यते हन्तुं तन्मे ब्रूहि यथातथम् । शृणु राजन्यथा वृत्तं वने निवसतः पुरा ॥
amitraḥ śakyate hantuṃ tanme brūhi yathātatham | śṛṇu rājanyathā vṛttaṃ vane nivasataḥ purā
"शत्रु को कैसे मारा जा सकता है? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ।" कणिक बोला — "हे राजन्, सुनिए कि पूर्वकाल में वन में रहने वाले एक गीदड़ के साथ क्या हुआ,
कणिक उवाच
श्लोक 36 (1.153.36)
जम्बुकस्य महाराज नीतिशास्त्रार्थदर्शिनः । अथ कश्चित्कृतप्रज्ञः शृगालः स्वार्थपण्डितः ॥
jambukasya mahārāja nītiśāstrārthadarśinaḥ | atha kaścitkṛtaprajñaḥ śṛgālaḥ svārthapaṇḍitaḥ
"हे महाराज, वह गीदड़ नीतिशास्त्र के अर्थ को समझने वाला था। एक बार कोई चतुर, अपने स्वार्थ में निपुण गीदड़"
श्लोक 37 (1.153.37)
सखिभिर्न्यवसत्सार्धं व्याघ्राखुवृकबभ्रुभिः । तेऽपश्यन्विपिने तस्मिन्बलिनं मृगयूथपम् ॥
sakhibhirnyavasatsārdhaṃ vyāghrākhuvṛkababhrubhiḥ | te'paśyanvipine tasminbalinaṃ mṛgayūthapam
"अपने मित्रों — बाघ, चूहे, भेड़िये और नेवले — के साथ रहता था। उन्होंने उस वन में एक बलवान हिरन देखा, जो झुंड का नायक था।"
श्लोक 38 (1.153.38)
अशक्ता ग्रहणे तस्य ततो मन्त्रममन्त्रयन् । असकृद्यतितो ह्येष हन्तुं व्याघ्र वने त्वया ॥
aśaktā grahaṇe tasya tato mantramamantrayan | asakṛdyatito hyeṣa hantuṃ vyāghra vane tvayā
"उसे पकड़ न पाने के कारण उन्होंने आपस में सलाह की।" गीदड़ बोला — "हे बाघ, तुमने वन में इसे मारने का बार-बार प्रयत्न किया है,
जम्बुक उवाच
श्लोक 39 (1.153.39)
युवा वै जवसंपन्नो बुद्धिशाली न शक्यते । मूषिकोऽस्य शयानस्य चरणौ भक्षयत्वयम् ॥
yuvā vai javasaṃpanno buddhiśālī na śakyate | mūṣiko'sya śayānasya caraṇau bhakṣayatvayam
"पर यह जवान, वेगवान और बुद्धिमान है, इसलिए पकड़ में नहीं आता। जब यह सोया हो, तब यह चूहा इसके पैर कुतर डाले।"
श्लोक 40 (1.153.40)
अथैनं भक्षितैः पादैर्व्याघ्रो गृह्णातु वै ततः । ततो वै भक्षयिष्यामः सर्वे मुदितमानसाः ॥
athainaṃ bhakṣitaiḥ pādairvyāghro gṛhṇātu vai tataḥ | tato vai bhakṣayiṣyāmaḥ sarve muditamānasāḥ
"फिर पैर कुतर दिए जाने पर बाघ इसे पकड़ ले। तब हम सब प्रसन्न मन से इसे खाएँगे।"
कणिक उवाच
श्लोक 41 (1.153.41)
जम्बुकस्य तु तद्वाक्यं तथा चक्रुः समाहिताः । मूषिकाभक्षितैः पादैर्मृगं व्याघ्रोऽवधीत्तदा ॥
jambukasya tu tadvākyaṃ tathā cakruḥ samāhitāḥ | mūṣikābhakṣitaiḥ pādairmṛgaṃ vyāghro'vadhīttadā
"गीदड़ की बात मानकर उन्होंने सावधानी से वैसा ही किया; चूहे के पैर कुतर देने पर बाघ ने हिरन को मार डाला।"
श्लोक 42 (1.153.42)
दृष्ट्वैवाचेष्टमानं तु भूमौ मृगकलेवरम् । स्नात्वाऽऽगच्छत भद्रं वोरक्षामीत्याह जम्बुकः ॥
dṛṣṭvaivāceṣṭamānaṃ tu bhūmau mṛgakalevaram | snātvā''gacchata bhadraṃ vorakṣāmītyāha jambukaḥ
"हिरन के शरीर को धरती पर निश्चेष्ट पड़ा देखकर गीदड़ ने कहा — 'तुम्हारा भला हो, नहाकर आओ; मैं पहरा देता हूँ।'"
श्लोक 43 (1.153.43)
शृगालवचनात्तेऽपि गताः सर्वे नदीं ततः । स चिन्तापरमो भूत्वा तस्थौ तत्रैव जम्बुकः ॥
śṛgālavacanātte'pi gatāḥ sarve nadīṃ tataḥ | sa cintāparamo bhūtvā tasthau tatraiva jambukaḥ
"गीदड़ के कहने पर वे सब नदी पर चले गए, और गीदड़ गहरी चिन्ता में डूबा वहीं खड़ा रहा।"
श्लोक 44 (1.153.44)
अथाजगाम पूर्वं तु स्नात्वा व्याघ्रो महाबलः । ददर्श जम्बुकं चैव चिन्ताकुलितमानसम् ॥
athājagāma pūrvaṃ tu snātvā vyāghro mahābalaḥ | dadarśa jambukaṃ caiva cintākulitamānasam
"तब महाबली बाघ नहाकर सबसे पहले लौटा और उसने गीदड़ को चिन्ता से व्याकुल देखा।"
व्याघ्र उवाच
श्लोक 45 (1.153.45)
किं शोचसि महाप्राज्ञ त्वं नो बुद्धिमतां वरः । अशित्वा पिशितान्यद्य विहरिष्यामहे वयम् ॥
kiṃ śocasi mahāprājña tvaṃ no buddhimatāṃ varaḥ | aśitvā piśitānyadya vihariṣyāmahe vayam
"हे महाबुद्धिमान, तुम क्यों शोक कर रहे हो? तुम तो हम बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हो। आज हम मांस खाकर मौज करेंगे।"
जम्बुक उवाच
श्लोक 46 (1.153.46)
शृणु मे त्वं महाबाहो यद्वाक्यं मूषिकोऽब्रवीत् । धिग्बलं मृगराजस्य मयाद्यायं मृगो हतः ॥
śṛṇu me tvaṃ mahābāho yadvākyaṃ mūṣiko'bravīt | dhigbalaṃ mṛgarājasya mayādyāyaṃ mṛgo hataḥ
"हे महाबाहु, सुनो, चूहे ने क्या कहा — 'धिक्कार है मृगराज के बल को! आज इस हिरन को मैंने मारा है।"
श्लोक 47 (1.153.47)
मद्बाहुबलमाश्रित्य तृप्तिमद्य गमिष्यति । तस्यैवं गर्जितं श्रुत्वा ततो भक्ष्यं न रोचये ॥
madbāhubalamāśritya tṛptimadya gamiṣyati | tasyaivaṃ garjitaṃ śrutvā tato bhakṣyaṃ na rocaye
"मेरे बाहुबल के सहारे आज वह तृप्त होगा।' उसकी ऐसी डींग सुनकर मुझे यह भोजन अच्छा नहीं लगता।"
व्याघ्र उवाच
श्लोक 48 (1.153.48)
ब्रवीति यदि स ह्येवं काले ह्यस्मि प्रबोधितः । स्वबाहुबलमाश्रित्य हनिष्येऽहं वनेचरान् ॥
bravīti yadi sa hyevaṃ kāle hyasmi prabodhitaḥ | svabāhubalamāśritya haniṣye'haṃ vanecarān
"यदि वह सचमुच ऐसा कहता है, तो मुझे समय रहते सचेत कर दिया गया है। मैं अपने ही बाहुबल के भरोसे वन के जीवों को मारूँगा"
श्लोक 49 (1.153.49)
खादिष्ये तत्र मांसानि इत्युक्त्वा प्रस्थितोवनम् । एतस्मिन्नेव काले तु मूषिकोऽप्याजगाम ह ॥
khādiṣye tatra māṃsāni ityuktvā prasthitovanam | etasminneva kāle tu mūṣiko'pyājagāma ha
"और वहीं उनका मांस खाऊँगा।" यह कहकर वह वन की ओर चल पड़ा। उसी समय चूहा भी आ पहुँचा।
कणिक उवाच
श्लोक 50 (1.153.50)
तमागतमभिप्रेक्ष्य शृगालोऽप्यब्रवीद्वचः । शृणु मूषिक भद्रं ते नकुलो यदिहाब्रवीत् ॥
tamāgatamabhiprekṣya śṛgālo'pyabravīdvacaḥ | śṛṇu mūṣika bhadraṃ te nakulo yadihābravīt
"उसे आया देखकर गीदड़ ने कहा — 'हे चूहे, तुम्हारा भला हो; सुनो, नेवले ने यहाँ क्या कहा —"
जम्बुक उवाच
श्लोक 51 (1.153.51)
मृगमांसं न खादेयं गरमेतन्न रोचते । मूषिकं भक्षयिष्यामि तद्भवाननुमन्यताम् ॥
mṛgamāṃsaṃ na khādeyaṃ garametanna rocate | mūṣikaṃ bhakṣayiṣyāmi tadbhavānanumanyatām
"'मैं हिरन का मांस नहीं खाऊँगा; यह विषैला है, मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं चूहे को खाऊँगा — आप अनुमति दें।'"
कणिक उवाच
श्लोक 52 (1.153.52)
तच्छ्रुत्वा मूषिको वाक्यं संत्रस्तः प्रगतो बिलम् । ततः स्नात्वा स वै तत्र आजगाम वृको नृप ॥
tacchrutvā mūṣiko vākyaṃ saṃtrastaḥ pragato bilam | tataḥ snātvā sa vai tatra ājagāma vṛko nṛpa
"यह बात सुनकर चूहा डर के मारे अपने बिल में भाग गया। तब, हे राजन्, भेड़िया नहाकर वहाँ आया।"
श्लोक 53 (1.153.53)
तमागतमिदं वाक्यमब्रवीज्जम्बुकस्तदा । मृगराजो हि संक्रुद्धो न ते साधु भविष्यति ॥
tamāgatamidaṃ vākyamabravījjambukastadā | mṛgarājo hi saṃkruddho na te sādhu bhaviṣyati
"उसके आने पर गीदड़ ने उससे कहा — 'मृगराज बहुत क्रोधित है; तुम्हारी खैर नहीं।"
जम्बुक उवाच
श्लोक 54 (1.153.54)
सकलत्रस्त्विहायाति कुरुष्व यदनन्तरम् । एवं संचोदितस्तेन जम्बुकेन तदा वृकः ॥
sakalatrastvihāyāti kuruṣva yadanantaram | evaṃ saṃcoditastena jambukena tadā vṛkaḥ
"वह अपनी पत्नी के साथ यहाँ आ रहा है; अब जो करना हो, कर लो।' गीदड़ के इस प्रकार उकसाने पर भेड़िया"
कणिक उवाच
श्लोक 55 (1.153.55)
ततोऽवलुम्पनं कृत्वा प्रयातः पिशिताशनः । एतस्मिन्नेव काले तु नकुलोऽप्याजगाम ह ॥
tato'valumpanaṃ kṛtvā prayātaḥ piśitāśanaḥ | etasminneva kāle tu nakulo'pyājagāma ha
"— वह मांसभक्षी — अपने अंग सिकोड़कर चलता बना। उसी समय नेवला भी आ पहुँचा।"
श्लोक 56 (1.153.56)
तमुवाच महाराज नकुलं जम्बुको वने । स्वबाहुबलमाश्रित्य निर्जितास्तेऽन्यतो गताः ॥
tamuvāca mahārāja nakulaṃ jambuko vane | svabāhubalamāśritya nirjitāste'nyato gatāḥ
"हे महाराज, वन में गीदड़ ने नेवले से कहा — 'अपने बाहुबल के भरोसे मैंने दूसरों को हरा दिया है, और वे कहीं और चले गए हैं।"
जम्बुक उवाच
श्लोक 57 (1.153.57)
मम दत्वा नियुद्धं त्वं भुङ्क्ष्व मांसं यथेप्सितम् । मृगराजो वृकश्चैव बुद्धिमानपि मूषिकः ॥
mama datvā niyuddhaṃ tvaṃ bhuṅkṣva māṃsaṃ yathepsitam | mṛgarājo vṛkaścaiva buddhimānapi mūṣikaḥ
"पहले मुझसे लड़ो, फिर जितना चाहो मांस खाओ।" नेवला बोला — "मृगराज, भेड़िया और बुद्धिमान चूहा भी —
नकुल उवाच
श्लोक 58 (1.153.58)
निर्जिता यत्त्वया वीरास्तस्माद्वीरतरो भवान् । न त्वयाप्युत्सहे योद्धुमित्युक्त्वा सोऽप्युपागमत् ॥
nirjitā yattvayā vīrāstasmādvīrataro bhavān | na tvayāpyutsahe yoddhumityuktvā so'pyupāgamat
"जब इन वीरों को तुमने हरा दिया है, तो तुम उनसे भी बड़े वीर हो। मैं तुमसे लड़ने का साहस नहीं करता।" यह कहकर वह भी चला गया।
कणिक उवाच
श्लोक 59 (1.153.59)
एवं तेषु प्रयातेषु जम्बुको हृष्टमानसः । खादति स्म तदा मांसमेकः सन्मन्त्रनिश्चयात् । एवं समाचरन्नित्यं सुखमेधेत भूपतिः ॥
evaṃ teṣu prayāteṣu jambuko hṛṣṭamānasaḥ | khādati sma tadā māṃsamekaḥ sanmantraniścayāt | evaṃ samācarannityaṃ sukhamedheta bhūpatiḥ
"जब वे सब चले गए, तब गीदड़ ने प्रसन्न मन से, अपनी सधी हुई युक्ति के बल पर, अकेले ही वह मांस खाया। जो राजा सदा ऐसा आचरण करता है, वह सुखपूर्वक बढ़ता है।"
श्लोक 60 (1.153.60)
भयेन भेदयेद्भीरुं शूरमञ्जलिकर्मणा । लुब्धमर्थप्रदानेन समं न्यूनं तथौजसा ॥
bhayena bhedayedbhīruṃ śūramañjalikarmaṇā | lubdhamarthapradānena samaṃ nyūnaṃ tathaujasā
"डरपोक को भय दिखाकर फोड़े, शूरवीर को हाथ जोड़कर, लोभी को धन देकर, और बराबर वाले या अपने से दुर्बल को बल से वश में करे।"
श्लोक 61 (1.153.61)
एवं ते कथितं राजन् शृणु चाप्यपरं तथा ॥
evaṃ te kathitaṃ rājan śṛṇu cāpyaparaṃ tathā
"हे राजन्, यह मैंने आपको बताया; अब कुछ और भी सुनिए।"
श्लोक 62 (1.153.62)
पुत्रः सखा वा भ्राता वा पिता वा यदि वा गुरुः । रिपुस्थानेषु वर्तन्तो हन्तव्या भूतिमिच्छता ॥
putraḥ sakhā vā bhrātā vā pitā vā yadi vā guruḥ | ripusthāneṣu vartanto hantavyā bhūtimicchatā
"पुत्र हो, मित्र हो, भाई हो, पिता हो या गुरु ही क्यों न हो — जो शत्रु के स्थान पर खड़ा हो, उसे ऐश्वर्य चाहने वाला मार डाले।"
श्लोक 63 (1.153.63)
शपथेनाप्यरिं हन्यादर्थदानेन वा पुनः । विषेण मायया वापि नोपेक्षेत कथंचन । उभौ चेत्संशयोपेतौ श्रद्धावांस्तत्र वर्धते ॥
śapathenāpyariṃ hanyādarthadānena vā punaḥ | viṣeṇa māyayā vāpi nopekṣeta kathaṃcana | ubhau cetsaṃśayopetau śraddhāvāṃstatra vardhate
"शपथ खाकर भी, अथवा धन देकर, विष से या छल से शत्रु को मार डाले; किसी भी प्रकार उसकी उपेक्षा न करे। जब दोनों पक्ष संशय में हों, तब इस उपदेश पर श्रद्धा रखने वाला ही आगे बढ़ता है।"
श्लोक 64 (1.153.64)
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथं प्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् ॥
gurorapyavaliptasya kāryākāryamajānataḥ | utpathaṃ pratipannasya nyāyyaṃ bhavati śāsanam
"गुरु भी यदि घमंडी हो, कर्तव्य-अकर्तव्य न जानता हो और कुमार्ग पर चल पड़ा हो, तो उसे दण्ड देना उचित है।"
श्लोक 65 (1.153.65)
क्रुद्धोऽप्यक्रुद्धरूपः स्यात्स्मितपूर्वाभिभाषिता । न चैनं क्रोधसंदीप्तं विद्यात्कश्चित्कथंचन । न चाप्यन्यमपध्वंसेत्कदाचित्कोपसंयुतः ॥
kruddho'pyakruddharūpaḥ syātsmitapūrvābhibhāṣitā | na cainaṃ krodhasaṃdīptaṃ vidyātkaścitkathaṃcana | na cāpyanyamapadhvaṃsetkadācitkopasaṃyutaḥ
"क्रोध में होकर भी वह क्रोधरहित दिखे और मुसकराकर बोले। किसी को कभी पता न चले कि वह क्रोध से जल रहा है। और क्रोध में आकर कभी किसी दूसरे का तिरस्कार न करे।"
श्लोक 66 (1.153.66)
प्रहरिष्यन्प्रियं ब्रूयात्प्रहरन्नपि भारत । प्रहृत्य च प्रियं ब्रूयाच्छोचन्निव रुदन्निव ॥
prahariṣyanpriyaṃ brūyātpraharannapi bhārata | prahṛtya ca priyaṃ brūyācchocanniva rudanniva
"हे भारत, प्रहार करने से पहले मीठा बोले, प्रहार करते समय भी मीठा बोले, और प्रहार कर चुकने पर भी मानो शोक करता हुआ, मानो रोता हुआ, मीठे वचन ही कहे।"
श्लोक 67 (1.153.67)
आश्वासयेच्चापि परं सान्त्वधर्मार्थवृत्तिभिः । अथ तं प्रहरेत्काले तथा विचलितं पथि ॥
āśvāsayeccāpi paraṃ sāntvadharmārthavṛttibhiḥ | atha taṃ praharetkāle tathā vicalitaṃ pathi
"वह सान्त्वना तथा धर्म और अर्थ के अनुकूल दिखने वाले व्यवहार से दूसरे को आश्वस्त करे, और फिर जब वह मार्ग से भटक जाए, तब उचित समय पर उस पर प्रहार करे।"
श्लोक 68 (1.153.68)
अपि घोरापराधस्य धर्ममाश्रित्य तिष्ठतः । स हि प्रच्छाद्यते दोषः शैलो मेघैरिवासितैः ॥
api ghorāparādhasya dharmamāśritya tiṣṭhataḥ | sa hi pracchādyate doṣaḥ śailo meghairivāsitaiḥ
"भयानक अपराध करने वाला भी यदि धर्म का आश्रय लेकर खड़ा रहे, तो उसका दोष वैसे ही ढक जाता है जैसे काले बादलों से पर्वत।"
श्लोक 69 (1.153.69)
यः स्यादनुप्राप्तवधस्तस्यागारं प्रदीपयेत् । अधनान्नास्तिकांश्चोरान्विषकर्मसु योजयेत् ॥
yaḥ syādanuprāptavadhastasyāgāraṃ pradīpayet | adhanānnāstikāṃścorānviṣakarmasu yojayet
"जिसे मारना ठान लिया हो, उसके घर में आग लगवा दे; और निर्धनों, नास्तिकों तथा चोरों को विष देने के कामों में लगाए।"
श्लोक 70 (1.153.70)
प्रत्युत्थानासनाद्येन संप्रदानेन केनचित् । अतिविश्रब्धघाती स्यात्तीक्ष्णदंष्ट्रो निमग्नकः ॥
pratyutthānāsanādyena saṃpradānena kenacit | ativiśrabdhaghātī syāttīkṣṇadaṃṣṭro nimagnakaḥ
"उठकर स्वागत करने, आसन देने या कुछ-न-कुछ भेंट देने के द्वारा वह अत्यधिक विश्वास करने वाले का घातक बने — जैसे तीखे दाँतों वाला (बाघ) सिर झुकाकर घात लगाए रहता है।"
श्लोक 71 (1.153.71)
अशङ्कितेभ्यः शङ्केत शङ्कितेभ्यश्च सर्वशः । अशङ्क्याद्भयमुत्पन्नमपि मूलं निकृन्तति ॥
aśaṅkitebhyaḥ śaṅketa śaṅkitebhyaśca sarvaśaḥ | aśaṅkyādbhayamutpannamapi mūlaṃ nikṛntati
"जिन पर शंका न हो, उनसे भी सावधान रहे, और जिन पर शंका हो उनसे तो सब प्रकार से। जहाँ से शंका न हो, वहाँ से उठा भय जड़ तक काट डालता है।"
श्लोक 72 (1.153.72)
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥
na viśvasedaviśvaste viśvaste nātiviśvaset | viśvāsādbhayamutpannaṃ mūlānyapi nikṛntati
"अविश्वसनीय पर विश्वास न करे, और विश्वसनीय पर भी अत्यधिक विश्वास न करे। विश्वास से उत्पन्न भय जड़ों तक को काट डालता है।"
श्लोक 73 (1.153.73)
चारः सुविहितः कार्य आत्मनश्च परस्य वा । पाषण्डांस्तापसादींश्च परराष्ट्रेषु योजयेत् ॥
cāraḥ suvihitaḥ kārya ātmanaśca parasya vā | pāṣaṇḍāṃstāpasādīṃśca pararāṣṭreṣu yojayet
"अपने और पराए — दोनों पर भली-भाँति परखे हुए गुप्तचर लगाए। शत्रु राज्यों में पाखण्डियों, तपस्वियों आदि को नियुक्त करे।"
श्लोक 74 (1.153.74)
उद्यानेषु विहारेषु देवतायतनेषु च । पानागारेषु रथ्यासु सर्वतीर्थेषु चाप्यथ ॥
udyāneṣu vihāreṣu devatāyataneṣu ca | pānāgāreṣu rathyāsu sarvatīrtheṣu cāpyatha
"उद्यानों में, विहार-स्थलों में, देवालयों में, मदिरालयों में, गलियों में और सभी तीर्थों में,"
श्लोक 75 (1.153.75)
चत्वरेषु च कूपेषु पर्वतेषु वनेषु च । समवायेषु सर्वेषु सरित्सु च विचारयेत् ॥
catvareṣu ca kūpeṣu parvateṣu vaneṣu ca | samavāyeṣu sarveṣu saritsu ca vicārayet
"चौराहों पर, कुओं पर, पर्वतों पर, वनों में, सब प्रकार के जनसमूहों में और नदियों के तट पर उन्हें घुमाता रहे।"
श्लोक 76 (1.153.76)
वाचा भृशं विनीतः स्याद्धृदयेन तथा क्षुरः । स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात्सृष्टो रौद्रस्य कर्मणः ॥
vācā bhṛśaṃ vinītaḥ syāddhṛdayena tathā kṣuraḥ | smitapūrvābhibhāṣī syātsṛṣṭo raudrasya karmaṇaḥ
"वाणी से वह अत्यन्त विनम्र रहे, पर हृदय से उस्तरे-सा तीखा; किसी भयंकर कर्म में लगा हो, तब भी मुसकराकर बोले।"
श्लोक 77 (1.153.77)
अञ्जलिः शपथः सान्त्वं शिरसा पादवन्दनम् । आशाकरणमित्येवं कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥
añjaliḥ śapathaḥ sāntvaṃ śirasā pādavandanam | āśākaraṇamityevaṃ kartavyaṃ bhūtimicchatā
"हाथ जोड़ना, शपथ खाना, मीठे वचन बोलना, सिर झुकाकर चरणों में प्रणाम करना और आशा बँधाना — ऐश्वर्य चाहने वाले को ये सब करने चाहिए।"
श्लोक 78 (1.153.78)
सुपुष्पितः स्यादफलः फलवान्स्याद्दुरारुहः । आमः स्यात्पक्वसङ्काशो नच जीर्येत कर्हिचित् ॥
supuṣpitaḥ syādaphalaḥ phalavānsyāddurāruhaḥ | āmaḥ syātpakvasaṅkāśo naca jīryeta karhicit
"वह ऐसे वृक्ष के समान हो जो खूब फूला हो पर फल न दे, या फल दे तो उस पर चढ़ना कठिन हो; कच्चा हो पर पका-सा दिखे; और कभी जीर्ण न हो।"
श्लोक 79 (1.153.79)
त्रिवर्गे त्रिविधा पीडा ह्यनुबन्धास्तथैव च । अनुबन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडास्तु परिवर्जयेत् ॥
trivarge trividhā pīḍā hyanubandhāstathaiva ca | anubandhāḥ śubhā jñeyāḥ pīḍāstu parivarjayet
"त्रिवर्ग — धर्म, अर्थ और काम — में तीन प्रकार की पीड़ा होती है और उसी प्रकार उनके फल भी। फलों को शुभ समझे, पर पीड़ाओं से बचे।"
श्लोक 80 (1.153.80)
धर्मं विचरतः पीडा सापि द्वाभ्यां नियच्छति । अर्थं चाप्यर्थलुब्धस्य कामं चातिप्रवर्तिनः ॥
dharmaṃ vicarataḥ pīḍā sāpi dvābhyāṃ niyacchati | arthaṃ cāpyarthalubdhasya kāmaṃ cātipravartinaḥ
"जो (अत्यधिक) धर्म का आचरण करता है, उसे शेष दोनों — अर्थ और काम — से पीड़ा होती है, और वह पीड़ा धर्म को भी रोक देती है; इसी प्रकार धन के लोभी के लिए अर्थ और अति भोगी के लिए काम पीड़ा का कारण बनते हैं।"
श्लोक 81 (1.153.81)
अगर्वितात्मा युक्तश्च सान्त्वयुक्तोऽनसूयिता । अवेक्षितार्थः शुद्धात्मा मन्त्रयीत द्विजैः सह ॥
agarvitātmā yuktaśca sāntvayukto'nasūyitā | avekṣitārthaḥ śuddhātmā mantrayīta dvijaiḥ saha
"अहंकाररहित, सावधान, मधुरभाषी और ईर्ष्याहीन होकर, अपने प्रयोजनों को भली-भाँति परखकर, शुद्ध मन से वह ब्राह्मणों के साथ मन्त्रणा करे।"
श्लोक 82 (1.153.82)
कर्मणा येन केनैव मृदुना दारुणेन च । उद्धरेद्दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥
karmaṇā yena kenaiva mṛdunā dāruṇena ca | uddhareddīnamātmānaṃ samartho dharmamācaret
"कोमल हो या कठोर, जिस किसी भी कर्म से हो सके, अपने को दीन दशा से उबारे; समर्थ हो जाने पर धर्म का आचरण करे।"
श्लोक 83 (1.153.83)
न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति । संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति ॥
na saṃśayamanāruhya naro bhadrāṇi paśyati | saṃśayaṃ punarāruhya yadi jīvati paśyati
"संकट में उतरे बिना मनुष्य कल्याण का मुख नहीं देखता; संकट में उतरकर यदि वह जीवित रहता है, तो उसे देख पाता है।"
श्लोक 84 (1.153.84)
यस्य बुद्धिः परिभवेत्तमतीतेन सान्त्वयेत् । अनागतेन दुर्बुद्धिं प्रत्युत्पन्नेन पण्डितम् ॥
yasya buddhiḥ paribhavettamatītena sāntvayet | anāgatena durbuddhiṃ pratyutpannena paṇḍitam
"जिसकी बुद्धि शोक से दबी हो, उसे बीते समय की कथाओं से सान्त्वना दे; दुर्बुद्धि को आने वाले समय की आशा से; और बुद्धिमान को वर्तमान (धन आदि) से।"
श्लोक 85 (1.153.85)
योऽरिणा सह सन्धाय शयीत कृतकृत्यवत् । स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिबुध्यते ॥
yo'riṇā saha sandhāya śayīta kṛtakṛtyavat | sa vṛkṣāgre yathā suptaḥ patitaḥ pratibudhyate
"जो शत्रु से सन्धि करके ऐसे सो जाता है मानो उसका काम पूरा हो गया, वह पेड़ की चोटी पर सोए मनुष्य की तरह गिरने पर ही जागता है।"
श्लोक 86 (1.153.86)
मन्त्रसंवरणे यत्नः सदा कार्योऽनसूयता । आकारमभिरक्षेत चारेणाप्यनुपालितः ॥
mantrasaṃvaraṇe yatnaḥ sadā kāryo'nasūyatā | ākāramabhirakṣeta cāreṇāpyanupālitaḥ
"ईर्ष्यारहित होकर सदा अपनी मन्त्रणा को गुप्त रखने का यत्न करे; और गुप्तचरों द्वारा सुरक्षित रहकर अपने चेहरे के भाव को भी छिपाए रखे।"
श्लोक 87 (1.153.87)
न रात्रौ मन्त्रयेद्विद्वान्न च कैश्चिदुपासितः । प्रासादाग्रे शिलाग्रे वा विशाले विजनेपि वा ॥
na rātrau mantrayedvidvānna ca kaiścidupāsitaḥ | prāsādāgre śilāgre vā viśāle vijanepi vā
"बुद्धिमान रात में मन्त्रणा न करे, न ऐसे स्थान पर जहाँ लोग बैठे हों; बल्कि महल की छत पर, शिला के ऊपर, या किसी खुले निर्जन स्थान में,"
श्लोक 88 (1.153.88)
समन्तात्तत्र पश्यद्भिः सहाप्तैरेव मन्त्रयेत् । नैव संवेशयेत्तत्र मन्त्रवेश्मनि शारिकाम् ॥
samantāttatra paśyadbhiḥ sahāptaireva mantrayet | naiva saṃveśayettatra mantraveśmani śārikām
"जहाँ चारों ओर देखा जा सके, वहाँ केवल विश्वस्त लोगों के साथ ही मन्त्रणा करे। मन्त्रणागृह में मैना तक को न रहने दे।"
श्लोक 89 (1.153.89)
शुकान्वा शारिका वापि बालमूर्खजडानपि । प्रविष्टानपि निर्वास्य मन्त्रयेद्धार्मिकैर्द्विजैः ॥
śukānvā śārikā vāpi bālamūrkhajaḍānapi | praviṣṭānapi nirvāsya mantrayeddhārmikairdvijaiḥ
"तोते हों या मैना, बालक, मूर्ख या जड़बुद्धि — यदि कोई भीतर आ गए हों तो उन्हें बाहर निकालकर धार्मिक ब्राह्मणों के साथ मन्त्रणा करे,"
श्लोक 90 (1.153.90)
नीतिज्ञैर्न्यायशास्त्रज्ञैरितिहासे सुनिष्ठितैः । रक्षां मन्त्रस्य निश्छिद्रां मन्त्रान्ते निश्चयेत्स्वयम् ॥
nītijñairnyāyaśāstrajñairitihāse suniṣṭhitaiḥ | rakṣāṃ mantrasya niśchidrāṃ mantrānte niścayetsvayam
"जो नीति और न्यायशास्त्र के ज्ञाता हों तथा इतिहास में भली-भाँति निष्णात हों। मन्त्रणा के अन्त में वह स्वयं सुनिश्चित करे कि मन्त्र की रक्षा में कोई छिद्र न रहे।"
श्लोक 91 (1.153.91)
वीरोपवर्णितात्तस्माद्धर्मार्थाभ्यामथात्मना । एकेन वाथ विप्रेण ज्ञातबुद्धिर्विनिश्चयेत् ॥
vīropavarṇitāttasmāddharmārthābhyāmathātmanā | ekena vātha vipreṇa jñātabuddhirviniścayet
"वीर मन्त्रियों के बताए हुए विचार में से, धर्म और अर्थ को तौलकर, वह अपनी बुद्धि से, अथवा किसी एक ऐसे ब्राह्मण के साथ जिसकी बुद्धि को वह जानता हो, अन्तिम निर्णय करे।"
श्लोक 92 (1.153.92)
तृतीयेन न चान्येन व्रजेन्निश्चयमात्मवान् । षट्कर्णश्छिद्यते मन्त्र इति नीतिषु पठ्यते ॥
tṛtīyena na cānyena vrajenniścayamātmavān | ṣaṭkarṇaśchidyate mantra iti nītiṣu paṭhyate
"संयमी पुरुष किसी तीसरे या अन्य व्यक्ति के साथ निर्णय न करे। नीतिग्रन्थों में कहा गया है — 'छह कानों तक पहुँची मन्त्रणा भंग हो जाती है।'"
श्लोक 93 (1.153.93)
निःसृतो नाशयेन्मन्त्रो हस्तप्राप्तामपि श्रियम् । स्वमतं च परेषां च विचार्य च पुनःपुनः । गुणवद्वाक्यमादद्यान्नैव तृप्येद्विचक्षणः ॥
niḥsṛto nāśayenmantro hastaprāptāmapi śriyam | svamataṃ ca pareṣāṃ ca vicārya ca punaḥpunaḥ | guṇavadvākyamādadyānnaiva tṛpyedvicakṣaṇaḥ
"बाहर निकली मन्त्रणा हाथ आई लक्ष्मी को भी नष्ट कर देती है। अपने और दूसरों के मत पर बार-बार विचार करके विवेकी पुरुष गुणयुक्त बात को ग्रहण करे, और विचार करने से कभी तृप्त न हो।"
श्लोक 94 (1.153.94)
नाच्छित्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम् । नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥
nācchitvā paramarmāṇi nākṛtvā karma dāruṇam | nāhatvā matsyaghātīva prāpnoti mahatīṃ śriyam
"दूसरों के मर्मस्थल काटे बिना, कठोर कर्म किए बिना और मछुआरे की तरह मारे बिना कोई बड़ी सम्पत्ति नहीं पाता।"
श्लोक 95 (1.153.95)
कर्शितं व्याधितं क्लिन्नमपानीयमघासकम् । परिविश्वस्तमन्दं च प्रहर्तव्यमरेर्बलम् ॥
karśitaṃ vyādhitaṃ klinnamapānīyamaghāsakam | pariviśvastamandaṃ ca prahartavyamarerbalam
"शत्रु की सेना पर तब प्रहार करना चाहिए जब वह थकी-माँदी, रोगग्रस्त, भीगी हुई, पानी और भोजन से रहित, या अधिक विश्वास के कारण असावधान हो।"
श्लोक 96 (1.153.96)
नार्थिकोऽर्थिनमभ्येति कृतार्थे नास्ति सङ्गतम् । तस्मात्सर्वाणि साध्यानि सावशेषाणि कारयेत् ॥
nārthiko'rthinamabhyeti kṛtārthe nāsti saṅgatam | tasmātsarvāṇi sādhyāni sāvaśeṣāṇi kārayet
"जिसका प्रयोजन पूरा हो गया, वह फिर देने वाले के पास नहीं आता; काम निकल जाने पर मेल नहीं रहता। इसलिए सब कार्य कराए, पर कुछ शेष रखकर।"
श्लोक 97 (1.153.97)
संग्रहे विग्रहे चैव यत्नः कार्योऽनसूयता । उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ॥
saṃgrahe vigrahe caiva yatnaḥ kāryo'nasūyatā | utsāhaścāpi yatnena kartavyo bhūtimicchatā
"सन्धि और विग्रह दोनों में ईर्ष्यारहित होकर यत्न करे; और ऐश्वर्य चाहने वाले को प्रयत्नपूर्वक उत्साह बनाए रखना चाहिए।"
श्लोक 98 (1.153.98)
नास्य कृत्यानि बुध्येरन्मित्राणि रिपवस्तथा । आरब्धान्येव पश्येरन्सुपर्यवसितान्यपि ॥
nāsya kṛtyāni budhyeranmitrāṇi ripavastathā | ārabdhānyeva paśyeransuparyavasitānyapi
"उसके कार्यों का पता न मित्रों को चले, न शत्रुओं को; वे उन्हें तभी देखें जब वे आरम्भ हो चुके हों, बल्कि भली-भाँति पूरे हो चुके हों।"
श्लोक 99 (1.153.99)
भीतवत्संविधातव्यं यावद्भयमनागतम् । आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत् ॥
bhītavatsaṃvidhātavyaṃ yāvadbhayamanāgatam | āgataṃ tu bhayaṃ dṛṣṭvā prahartavyamabhītavat
"जब तक भय आया न हो, तब तक डरे हुए की तरह तैयारी करे; पर भय को आया देखकर निर्भय की तरह प्रहार करे।"
श्लोक 100 (1.153.100)
दैवेनोपहतं शत्रुमनुगृह्णाति यो नरः । स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ॥
daivenopahataṃ śatrumanugṛhṇāti yo naraḥ | sa mṛtyumupagṛhṇāti garbhamaśvatarī yathā
"जो मनुष्य भाग्य के मारे शत्रु पर अनुग्रह करता है, वह अपनी मृत्यु को वैसे ही धारण करता है जैसे खच्चरी गर्भ को।"
श्लोक 101 (1.153.101)
अनागतं हि बुध्येत यच्च कार्यं पुरः स्थितम् । न तु बुद्धिक्षयात्किंचिदतिक्रामेत्प्रयोजनम् ॥
anāgataṃ hi budhyeta yacca kāryaṃ puraḥ sthitam | na tu buddhikṣayātkiṃcidatikrāmetprayojanam
"जो आने वाला है और जो कार्य सामने उपस्थित है, दोनों को समझे; बुद्धि की कमी से किसी प्रयोजन को हाथ से न जाने दे।"
श्लोक 102 (1.153.102)
उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता । विभज्य देशकालौ च दैवं धर्मादयस्त्रयः । नैःश्रेयसौ तु तौ ज्ञेयौ देशकालाविति स्थितिः ॥
utsāhaścāpi yatnena kartavyo bhūtimicchatā | vibhajya deśakālau ca daivaṃ dharmādayastrayaḥ | naiḥśreyasau tu tau jñeyau deśakālāviti sthitiḥ
"ऐश्वर्य चाहने वाले को प्रयत्नपूर्वक उत्साह रखना चाहिए — देश और काल, दैव (प्रारब्ध) तथा धर्म आदि तीनों का विवेक करके। इनमें देश और काल को ही परम कल्याण का साधन जानना चाहिए — यही निश्चित सिद्धान्त है।"
श्लोक 103 (1.153.103)
तालवत्कुरुते मूलं बालः शत्रुरुपेक्षितः । गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः क्षिप्रं संजायते महान् ॥
tālavatkurute mūlaṃ bālaḥ śatrurupekṣitaḥ | gahane'gnirivotsṛṣṭaḥ kṣipraṃ saṃjāyate mahān
"उपेक्षित छोटा शत्रु भी ताड़ के पेड़ की तरह अपनी जड़ें फैला लेता है; घने वन में छोड़ी गई आग की तरह वह शीघ्र ही विशाल हो जाता है।"
श्लोक 104 (1.153.104)
अग्निस्तोकमिवात्मानं सन्धुक्षयति यो नरः । स वर्धमानो ग्रसते महान्तमपि संचयम् ॥
agnistokamivātmānaṃ sandhukṣayati yo naraḥ | sa vardhamāno grasate mahāntamapi saṃcayam
"जो मनुष्य छोटी-सी आग की तरह अपने को (सहायकों के सहारे) प्रज्वलित करता है, वह बढ़ते-बढ़ते बड़े-से-बड़े ढेर को भी निगल जाता है।"
श्लोक 105 (1.153.105)
आदावेव ददानीति प्रियं ब्रूयान्निरर्थकम् ॥
ādāveva dadānīti priyaṃ brūyānnirarthakam
"'मैं अभी दे देता हूँ' — ऐसा प्रिय पर खोखला वचन कहे।"
श्लोक 106 (1.153.106)
आशां कालवतीं कुर्यात्कालं विघ्नेन योजयेत् । विघ्नं निमित्ततो ब्रूयान्निमित्तं वाऽपि हेतुतः ॥
āśāṃ kālavatīṃ kuryātkālaṃ vighnena yojayet | vighnaṃ nimittato brūyānnimittaṃ vā'pi hetutaḥ
"आशा को किसी समय पर टाल दे, समय को किसी विघ्न से जोड़ दे, विघ्न का कोई बहाना बता दे, और उस बहाने का भी कोई और कारण गढ़ दे।"
श्लोक 107 (1.153.107)
क्षुरो भूत्वा हरेत्प्राणान्निशितः कालसाधनः । प्रतिच्छन्नो लोमहारी द्विषतां परिकर्तनः ॥
kṣuro bhūtvā haretprāṇānniśitaḥ kālasādhanaḥ | praticchanno lomahārī dviṣatāṃ parikartanaḥ
"उस्तरे की तरह तीखा होकर, उचित समय की प्रतीक्षा करते हुए, छिपा रहकर, रोम-रोम उतारता हुआ वह शत्रुओं के प्राण हर ले और उन्हें काट डाले।"
श्लोक 108 (1.153.108)
पाण्डवेषु यथान्यायमन्येषु च कुरूद्वह । वर्तमानो न मज्जेस्त्वं तथा कृत्यं समाचर ॥
pāṇḍaveṣu yathānyāyamanyeṣu ca kurūdvaha | vartamāno na majjestvaṃ tathā kṛtyaṃ samācara
"हे कुरुकुल के धुरन्धर, पाण्डवों और दूसरों के प्रति नीति के अनुसार ऐसा व्यवहार कीजिए कि आप डूबें नहीं; वैसा ही कार्य कीजिए।"
श्लोक 109 (1.153.109)
सर्वकल्याणसंपन्नो विशिष्ट इति निश्चयः । तस्मात्त्वं पाण्डुपुत्रेभ्यो रक्षात्मानं नराधिप ॥
sarvakalyāṇasaṃpanno viśiṣṭa iti niścayaḥ | tasmāttvaṃ pāṇḍuputrebhyo rakṣātmānaṃ narādhipa
"यह निश्चित है कि आप सब प्रकार के कल्याण से सम्पन्न और श्रेष्ठ हैं। इसलिए, हे नरेश्वर, पाण्डुपुत्रों से अपनी रक्षा कीजिए।"
श्लोक 110 (1.153.110)
भ्रातृव्या बलवन्तस्ते पाण्डुपुत्रा नराधिप । पश्चात्तापो यथा न स्यात्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥
bhrātṛvyā balavantaste pāṇḍuputrā narādhipa | paścāttāpo yathā na syāttathā nītirvidhīyatām
"हे नरेश्वर, आपके भतीजे पाण्डुपुत्र बलवान हैं। ऐसी नीति अपनाइए कि बाद में पछताना न पड़े।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 111 (1.153.111)
एवमुक्त्वा संप्रतस्थे कणिकः स्वगृहं ततः । धृतराष्ट्रोऽपि कौरव्यः शोकार्तः समपद्यत ॥
evamuktvā saṃpratasthe kaṇikaḥ svagṛhaṃ tataḥ | dhṛtarāṣṭro'pi kauravyaḥ śokārtaḥ samapadyata
यह कहकर कणिक अपने घर चला गया; और कुरुवंशी धृतराष्ट्र शोक से व्याकुल हो गए।