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आदि पर्व · अध्याय 154

लाक्षागृह-दाह का संक्षेप; दुर्योधन का धृतराष्ट्र से आग्रह

वैशम्पायन पहले लाक्षागृह का पूरा प्रसंग संक्षेप में सुनाते हैं: दुर्योधन और उसके साथी कुन्ती और उसके पुत्रों को जला डालने का निश्चय करते हैं, विदुर षड्यन्त्र भाँपकर पाण्डवों को नाव से निकाल देते हैं, और आग में पाँच पुत्रों सहित एक निषादी और पुरोचन जल मरते हैं, जबकि कौरव पाण्डवों को मरा मानकर उनकी प्रेतक्रिया करते हैं। जनमेजय के अनुरोध पर वे फिर विस्तार से कथा आरम्भ करते हैं। दुर्योधन धृतराष्ट्र से पाण्डवों को वारणावत भेजने का आग्रह करता है; राजा पाण्डु की सज्जनता को याद करके तथा प्रजा, भीष्म, द्रोण, विदुर और कृप के भय से हिचकते हैं, पर दुर्योधन तर्क देता है कि बड़े-बूढ़े उसका विरोध नहीं करेंगे और पिता से अपनी व्यथा मिटाने की विनती करता है।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.154.1)

कणिकस्य मतं श्रुत्वा कार्त्स्न्येन भरतर्षभ । दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः । दुःशासनचतुर्थास्ते मन्त्रयामासुरेकदा ॥

kaṇikasya mataṃ śrutvā kārtsnyena bharatarṣabha | duryodhanaśca karṇaśca śakuniścāpi saubalaḥ | duḥśāsanacaturthāste mantrayāmāsurekadā

हे भरतश्रेष्ठ! कणिक का पूरा मत सुनकर दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि और चौथे दुःशासन — इन्होंने एक बार मिलकर मन्त्रणा की।

श्लोक 2 (1.154.2)

ते कौरव्यमनुज्ञाप्य धृतराष्ट्रं नराधिपम् । दहने तु सपुत्रायाः कुन्त्या बुद्धिमकारयन् ॥

te kauravyamanujñāpya dhṛtarāṣṭraṃ narādhipam | dahane tu saputrāyāḥ kuntyā buddhimakārayan

कुरुवंशी नरेश धृतराष्ट्र की अनुमति लेकर उन्होंने पुत्रों सहित कुन्ती को जला डालने का निश्चय किया।

श्लोक 3 (1.154.3)

तेषामिङ्गितभावज्ञो विदुरस्तत्त्वदर्शिवान् । आकारेण च तं मन्त्रं बुबुधे दुष्टचेतसाम् ॥

teṣāmiṅgitabhāvajño vidurastattvadarśivān | ākāreṇa ca taṃ mantraṃ bubudhe duṣṭacetasām

संकेतों और मन के भावों को पहचानने वाले तत्त्वदर्शी विदुर ने उन दुष्टचित्त लोगों के चेहरे के भाव से ही उस षड्यन्त्र को भाँप लिया।

श्लोक 4 (1.154.4)

ततो विदितवेद्यात्मा पाण्डवानां हिते रतः । पलायने मतिं चक्रे कुन्त्याः पुत्रैः सहानघः ॥

tato viditavedyātmā pāṇḍavānāṃ hite rataḥ | palāyane matiṃ cakre kuntyāḥ putraiḥ sahānaghaḥ

तब जानने योग्य सब कुछ जानने वाले, पाण्डवों के हित में लगे निष्पाप विदुर ने पुत्रों सहित कुन्ती के बच निकलने का उपाय सोचा।

श्लोक 5 (1.154.5)

ततो वातसहां नावं यन्त्रयुक्तां पताकिनीम् । ऊर्मिक्षमां दृढां कृत्वा कुन्तीमिदमुवाच ह ॥

tato vātasahāṃ nāvaṃ yantrayuktāṃ patākinīm | ūrmikṣamāṃ dṛḍhāṃ kṛtvā kuntīmidamuvāca ha

उन्होंने हवा और लहरों को सह सकने वाली, यन्त्रों से युक्त, पताका वाली एक मज़बूत नाव बनवाई और कुन्ती से यह कहा —

विदुर उवाच

श्लोक 6 (1.154.6)

एष जातः कुलस्यास्य कीर्तिवंशप्रणाशनः । धृतराष्ट्रः परीतात्मा धर्मं त्यजति शाश्वतम् ॥

eṣa jātaḥ kulasyāsya kīrtivaṃśapraṇāśanaḥ | dhṛtarāṣṭraḥ parītātmā dharmaṃ tyajati śāśvatam

"यह धृतराष्ट्र इस कुल की कीर्ति और वंश का नाश करने के लिए जन्मा है। इसका मन (लोभ से) घिर गया है और यह सनातन धर्म को छोड़ रहा है।"

श्लोक 7 (1.154.7)

इयं वारिपथे युक्ता तरङ्गपवनक्षमा । नौर्यया मृत्युपाशात्त्वं सपुत्रा मोक्ष्यसे शुभे ॥

iyaṃ vāripathe yuktā taraṅgapavanakṣamā | nauryayā mṛtyupāśāttvaṃ saputrā mokṣyase śubhe

"हे कल्याणी! जलमार्ग पर यह नाव तैयार है, जो लहरों और हवा को सह सकती है। इसके द्वारा तुम पुत्रों सहित मृत्यु के पाश से छूट जाओगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (1.154.8)

तच्छ्रुत्वा व्यथिता कुन्ती पुत्रैः सह यशस्विनी । नावमारुह्य गङ्गायां प्रययौ भरतर्षभ ॥

tacchrutvā vyathitā kuntī putraiḥ saha yaśasvinī | nāvamāruhya gaṅgāyāṃ prayayau bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! यह सुनकर यशस्विनी कुन्ती व्यथित मन से पुत्रों के साथ नाव पर चढ़ीं और गंगा में चल पड़ीं।

श्लोक 9 (1.154.9)

ततो विदुरवाक्येन नावं विक्षिप्य पाण्डवाः । धनं चादाय तैर्दत्तमरिष्टं प्राविशन्वनम् ॥

tato viduravākyena nāvaṃ vikṣipya pāṇḍavāḥ | dhanaṃ cādāya tairdattamariṣṭaṃ prāviśanvanam

फिर विदुर के कहे अनुसार पाण्डवों ने नाव छोड़ दी और उनके लोगों द्वारा दिया गया धन लेकर सकुशल वन में प्रवेश किया।

श्लोक 10 (1.154.10)

निषादी पञ्चपुत्रा तु जातुषे तत्र वेश्मनि । कारणाभ्यागता दग्धा सह पुत्रैरनागसा ॥

niṣādī pañcaputrā tu jātuṣe tatra veśmani | kāraṇābhyāgatā dagdhā saha putrairanāgasā

उस लाख के घर में किसी कारणवश आई हुई पाँच पुत्रों वाली एक निषादी निर्दोष होते हुए भी अपने पुत्रों सहित जल गई।

श्लोक 11 (1.154.11)

स च म्लेच्छाधमः पापो दग्धस्तत्र पुरोचनः । वञ्चिताश्च दुरात्मानो धार्तराष्ट्राः सहानुगाः ॥

sa ca mlecchādhamaḥ pāpo dagdhastatra purocanaḥ | vañcitāśca durātmāno dhārtarāṣṭrāḥ sahānugāḥ

वह पापी, म्लेच्छों में अधम पुरोचन भी वहीं जल मरा, और अनुयायियों सहित दुष्टात्मा धृतराष्ट्रपुत्र ठगे गए।

श्लोक 12 (1.154.12)

अविज्ञाता महात्मानो जनानामक्षतास्तथा । जनन्या सह कौन्तेया मुक्ता विदुरमन्त्रिताः ॥

avijñātā mahātmāno janānāmakṣatāstathā | jananyā saha kaunteyā muktā viduramantritāḥ

विदुर की सलाह पर चलने वाले महात्मा कुन्तीपुत्र लोगों से अनजाने और बिना किसी क्षति के अपनी माता के साथ बच निकले।

श्लोक 13 (1.154.13)

ततस्तस्मिन्पुरे लोका नगरे वारणावते । दृष्ट्वा जतुगृहं दग्धमन्वशोचन्त दुःखिताः ॥

tatastasminpure lokā nagare vāraṇāvate | dṛṣṭvā jatugṛhaṃ dagdhamanvaśocanta duḥkhitāḥ

तब उस वारणावत नगर के लोग लाक्षागृह को जला हुआ देखकर दुःखी होकर शोक करने लगे।

श्लोक 14 (1.154.14)

प्रेषयामासु राजानं यथावृत्तं निवेदितुम् । संवृत्तस्ते महान्कामः पाण्डवान्दग्धवानसि ॥

preṣayāmāsu rājānaṃ yathāvṛttaṃ niveditum | saṃvṛttaste mahānkāmaḥ pāṇḍavāndagdhavānasi

उन्होंने जो हुआ था उसकी सूचना देने के लिए राजा के पास सन्देश भेजा — "तुम्हारी बड़ी कामना पूरी हो गई; तुमने पाण्डवों को जला डाला।

श्लोक 15 (1.154.15)

सकामो भव कौरव्य भुङ्क्ष्व राज्यं सपुत्रकः । तच्छ्रुत्वा धृतराष्ट्रस्तु सहपुत्रेण शोचयन् ॥

sakāmo bhava kauravya bhuṅkṣva rājyaṃ saputrakaḥ | tacchrutvā dhṛtarāṣṭrastu sahaputreṇa śocayan

हे कौरव! अब तुम सफलमनोरथ हो जाओ और पुत्रों सहित राज्य भोगो।" यह सुनकर धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र के साथ शोक प्रकट करते हुए

श्लोक 16 (1.154.16)

प्रेतकार्याणि च तथा चकार सह बान्धवैः । पाण्डवानां तथा क्षत्ता भीष्मश्च कुरुसत्तमः ॥

pretakāryāṇi ca tathā cakāra saha bāndhavaiḥ | pāṇḍavānāṃ tathā kṣattā bhīṣmaśca kurusattamaḥ

बन्धु-बान्धवों के साथ पाण्डवों की प्रेतक्रियाएँ कीं; उसी प्रकार क्षत्ता विदुर और कुरुश्रेष्ठ भीष्म ने भी कीं।

जनमेजय उवाच

श्लोक 17 (1.154.17)

पुनर्विस्तरशः श्रोतुमिच्छामि द्विजसत्तम । दाहं जतुगृहस्यैव पाण्डवानां च मोक्षणम् ॥

punarvistaraśaḥ śrotumicchāmi dvijasattama | dāhaṃ jatugṛhasyaiva pāṇḍavānāṃ ca mokṣaṇam

हे द्विजश्रेष्ठ! मैं लाक्षागृह के दाह और पाण्डवों के बच निकलने की कथा फिर से विस्तार से सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 18 (1.154.18)

सुनृशंसमिदं कर्म तेषां क्रूरोपसंहितम् । कीर्तयस्व यथावृत्तं परं कौतूहलं मम ॥

sunṛśaṃsamidaṃ karma teṣāṃ krūropasaṃhitam | kīrtayasva yathāvṛttaṃ paraṃ kautūhalaṃ mama

उनका वह कर्म अत्यन्त निर्दय था, जो एक क्रूर व्यक्ति की सलाह पर किया गया। जैसा हुआ था, वैसा सुनाइए; मेरी उत्सुकता बहुत बढ़ी हुई है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (1.154.19)

शृणु विस्तरशो राजन्वदतो मे परन्तप । दाहं जतुगृहस्यैतत्पाण्डवानां च मोक्षणम् ॥

śṛṇu vistaraśo rājanvadato me parantapa | dāhaṃ jatugṛhasyaitatpāṇḍavānāṃ ca mokṣaṇam

हे शत्रुओं को तपाने वाले राजन्! लाक्षागृह के इस दाह और पाण्डवों के बच निकलने की कथा मैं विस्तार से सुनाता हूँ, सुनो।

श्लोक 20 (1.154.20)

ततो दुर्योधनो राजा धृतराष्ट्रमभाषत । पाण्डवेभ्यो भयं नः स्यात्तान्विवासयतां भवान् । निपुणेनाभ्युपायेन नगरं वारणावतम् ॥

tato duryodhano rājā dhṛtarāṣṭramabhāṣata | pāṇḍavebhyo bhayaṃ naḥ syāttānvivāsayatāṃ bhavān | nipuṇenābhyupāyena nagaraṃ vāraṇāvatam

तब राजा दुर्योधन ने धृतराष्ट्र से कहा — "हमें पाण्डवों से भय हो सकता है। आप किसी चतुर उपाय से उन्हें वारणावत नगर भेज दीजिए।"

श्लोक 21 (1.154.21)

धृतराष्ट्रस्तु पुत्रेण श्रुत्वा वचनमीरितम् । मुहूर्तमिव संचिन्त्य दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥

dhṛtarāṣṭrastu putreṇa śrutvā vacanamīritam | muhūrtamiva saṃcintya duryodhanamathābravīt

पुत्र के कहे वचन सुनकर धृतराष्ट्र ने क्षण भर विचार किया और फिर दुर्योधन से कहा —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 22 (1.154.22)

धर्मनित्यः सदा पाण्डुस्तथा धर्मपरायणः । सर्वेषु ज्ञातिषु तथा मयि त्वासीद्विशेषतः ॥

dharmanityaḥ sadā pāṇḍustathā dharmaparāyaṇaḥ | sarveṣu jñātiṣu tathā mayi tvāsīdviśeṣataḥ

"पाण्डु सदा धर्म में स्थित और धर्मपरायण था। अपने सब कुटुम्बियों के प्रति उसका ऐसा ही व्यवहार था, और मेरे प्रति तो विशेष रूप से।"

श्लोक 23 (1.154.23)

नासौ किंचिद्विजानाति भोजनादिचिकीर्षितम् । निवेदयति नित्यं हि मम राज्यं धृतव्रतः ॥

nāsau kiṃcidvijānāti bhojanādicikīrṣitam | nivedayati nityaṃ hi mama rājyaṃ dhṛtavrataḥ

"वह भोजन आदि अपनी किसी इच्छा की परवाह नहीं करता था; वह दृढ़व्रती सदा राज्य मुझे ही सौंप देता था।"

श्लोक 24 (1.154.24)

तस्य पुत्रो यथा पाण्डुस्तथा धर्मपरायणः । गुणवान्लोकविख्यातः पौरवाणां सुसंमतः ॥

tasya putro yathā pāṇḍustathā dharmaparāyaṇaḥ | guṇavānlokavikhyātaḥ pauravāṇāṃ susaṃmataḥ

"उसका पुत्र भी पाण्डु के समान ही धर्मपरायण, गुणवान्, लोक में विख्यात और पौरवों में अत्यन्त सम्मानित है।"

श्लोक 25 (1.154.25)

स कथं शक्यतेऽस्माभिरपाकर्तुं बलादितः । पितृपैतामहाद्राज्यात्ससहायो विशेषतः ॥

sa kathaṃ śakyate'smābhirapākartuṃ balāditaḥ | pitṛpaitāmahādrājyātsasahāyo viśeṣataḥ

"हम उसे यहाँ से, उसके बाप-दादा के राज्य से, बलपूर्वक कैसे हटा सकते हैं — विशेषकर तब, जब उसके सहायक भी हैं?"

श्लोक 26 (1.154.26)

भृता हि पाण्डुनाऽमात्या बलं च सततं भृतम् । भृताः पुत्राश्च पौत्राश्च तेषामपि विशेषतः ॥

bhṛtā hi pāṇḍunā'mātyā balaṃ ca satataṃ bhṛtam | bhṛtāḥ putrāśca pautrāśca teṣāmapi viśeṣataḥ

"पाण्डु ने मन्त्रियों का भरण-पोषण किया, सेना का भी सदा पालन किया, और उनके पुत्रों-पौत्रों का भी विशेष रूप से पोषण किया।"

श्लोक 27 (1.154.27)

ते पुरा सत्कृतास्तात पाण्डुना नागरा जनाः । कथं युधिष्ठिरस्यार्थे न नो हन्युः सबान्धवान् ॥

te purā satkṛtāstāta pāṇḍunā nāgarā janāḥ | kathaṃ yudhiṣṭhirasyārthe na no hanyuḥ sabāndhavān

"हे तात! पहले पाण्डु ने नगरवासियों का बड़ा सत्कार किया था। वे युधिष्ठिर के लिए हमें बन्धु-बान्धवों सहित क्यों न मार डालेंगे?"

दुर्योधन उवाच

श्लोक 28 (1.154.28)

एवमेतन्मया तात भावितं दोषमात्मनि । दृष्ट्वा प्रकृतयः सर्वा अर्थमानेन पूजिताः ॥

evametanmayā tāta bhāvitaṃ doṣamātmani | dṛṣṭvā prakṛtayaḥ sarvā arthamānena pūjitāḥ

"हे तात! मैंने भी अपने ऊपर आने वाले इस संकट को पहले ही भाँप लिया था। यह देखकर मैंने सारी प्रजा को धन और मान देकर अपना बना लिया है।"

श्लोक 29 (1.154.29)

ध्रुवमस्मत्सहायास्ते भविष्यन्ति प्रधानतः । अर्थवर्गः सहामात्यो मत्संस्थोऽद्य महीपते ॥

dhruvamasmatsahāyāste bhaviṣyanti pradhānataḥ | arthavargaḥ sahāmātyo matsaṃstho'dya mahīpate

"वे, विशेषकर उनके प्रमुख लोग, निश्चय ही हमारे सहायक होंगे। हे महीपति! कोष और मन्त्री आज मेरे अधीन हैं।"

श्लोक 30 (1.154.30)

स भवान्पाण्डवानाशु विवासयितुमर्हति । मृदुनैवाभ्युपायेन नगरं वारणावतम् ॥

sa bhavānpāṇḍavānāśu vivāsayitumarhati | mṛdunaivābhyupāyena nagaraṃ vāraṇāvatam

"इसलिए आप किसी कोमल उपाय से पाण्डवों को शीघ्र वारणावत नगर भेज दें।"

श्लोक 31 (1.154.31)

यदा प्रतिष्ठितं राज्यं मयि राजन्भविष्यति । तदा कुन्ती सहापत्या पुनरेष्यति भारत ॥

yadā pratiṣṭhitaṃ rājyaṃ mayi rājanbhaviṣyati | tadā kuntī sahāpatyā punareṣyati bhārata

"हे राजन्, हे भारत! जब राज्य मुझ पर दृढ़ता से स्थापित हो जाएगा, तब कुन्ती अपनी सन्तानों के साथ फिर लौट आएगी।"

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 32 (1.154.32)

दुर्योधन ममाप्येतद्धृदि संपरिवर्तते । अभिप्रायस्य पापत्वान्नैवं तु विवृणोम्यहम् ॥

duryodhana mamāpyetaddhṛdi saṃparivartate | abhiprāyasya pāpatvānnaivaṃ tu vivṛṇomyaham

"दुर्योधन! यही बात मेरे हृदय में भी घूमती रहती है, पर यह इरादा पापपूर्ण है, इसलिए मैं इसे प्रकट नहीं करता।"

श्लोक 33 (1.154.33)

न च भीष्मो न च द्रोणो न च क्षत्ता न गौतमः । विवास्यमानान्कौन्तेयाननुमंस्यन्ति कर्हिचित् ॥

na ca bhīṣmo na ca droṇo na ca kṣattā na gautamaḥ | vivāsyamānānkaunteyānanumaṃsyanti karhicit

"न भीष्म, न द्रोण, न क्षत्ता विदुर और न गौतम (कृप) — कोई भी कुन्तीपुत्रों के निर्वासन को कभी स्वीकार नहीं करेगा।"

श्लोक 34 (1.154.34)

समा हि कौरवेयाणां वयं ते चैव पुत्रक । नैते विषममिच्छेयुर्धर्मयुक्ता मनस्विनः ॥

samā hi kauraveyāṇāṃ vayaṃ te caiva putraka | naite viṣamamiccheyurdharmayuktā manasvinaḥ

"हे पुत्र! उन कुरुवंशियों के लिए हम और वे बराबर हैं। वे धर्मनिष्ठ और मनस्वी हैं, कोई अन्याय नहीं चाहेंगे।"

श्लोक 35 (1.154.35)

ते वयं कौरवेयाणामेतेषां च महात्मनाम् । कथं न वध्यतां तात गच्छाम जगतस्तथा ॥

te vayaṃ kauraveyāṇāmeteṣāṃ ca mahātmanām | kathaṃ na vadhyatāṃ tāta gacchāma jagatastathā

"तो फिर, हे तात, हम इन कुरुवंशियों, इन महात्माओं और सारे संसार की दृष्टि में वध के योग्य कैसे न हो जाएँगे?"

दुर्योधन उवाच

श्लोक 36 (1.154.36)

मध्यस्थः सततं भीष्मो द्रोणपुत्रो मयि स्थितः । यतः पुत्रस्ततो द्रोणो भविता नात्र संशयः ॥

madhyasthaḥ satataṃ bhīṣmo droṇaputro mayi sthitaḥ | yataḥ putrastato droṇo bhavitā nātra saṃśayaḥ

"भीष्म सदा तटस्थ रहते हैं; द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) मेरे पक्ष में है। जहाँ पुत्र होगा, वहीं द्रोण होंगे — इसमें कोई सन्देह नहीं।"

श्लोक 37 (1.154.37)

कृपः शारद्वतश्चैव यत एतौ ततो भवेत् । द्रोणं च भागिनेयं च न स त्यक्ष्यति कर्हिचित् ॥

kṛpaḥ śāradvataścaiva yata etau tato bhavet | droṇaṃ ca bhāgineyaṃ ca na sa tyakṣyati karhicit

"और शरद्वान् के पुत्र कृप भी वहीं रहेंगे जहाँ ये दोनों होंगे; वे द्रोण और अपने भानजे को कभी नहीं छोड़ेंगे।"

श्लोक 38 (1.154.38)

क्षत्ताऽर्थबद्धस्त्वस्माकं प्रच्छन्नं संयतः परैः । न चैकः स समर्थोऽस्मान्पाण्डवार्थेऽधिबाधितुम् ॥

kṣattā'rthabaddhastvasmākaṃ pracchannaṃ saṃyataḥ paraiḥ | na caikaḥ sa samartho'smānpāṇḍavārthe'dhibādhitum

"क्षत्ता विदुर धन के कारण हमसे बँधे हैं, यद्यपि भीतर-ही-भीतर वे शत्रुओं से जुड़े हैं। पर वे अकेले पाण्डवों के लिए हमें हानि नहीं पहुँचा सकते।"

श्लोक 39 (1.154.39)

सुविस्रब्धः पाण्डुपुत्रान्सह मात्रा प्रवासय । वारणावतमद्यैव यथा यान्ति तथा कुरु ॥

suvisrabdhaḥ pāṇḍuputrānsaha mātrā pravāsaya | vāraṇāvatamadyaiva yathā yānti tathā kuru

"आप निश्चिन्त होकर पाण्डुपुत्रों को उनकी माता सहित आज ही वारणावत भेज दें। ऐसा कीजिए कि वे चले जाएँ।"

श्लोक 40 (1.154.40)

विनिद्रकरणं घोरं हृदि शल्यमिवार्पितम् । शोकपावकमुद्भूतं कर्मणैतेन नाशय ॥

vinidrakaraṇaṃ ghoraṃ hṛdi śalyamivārpitam | śokapāvakamudbhūtaṃ karmaṇaitena nāśaya

"यह भयंकर बात मेरी नींद उड़ा देती है, हृदय में गड़े काँटे के समान चुभती है। इस कार्य के द्वारा मेरे भीतर भड़की शोक की इस आग को बुझा दीजिए।"

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