आदि पर्व · अध्याय 156
दुर्योधन का पुरोचन को आदेश
पाण्डवों के भेज दिए जाने से प्रसन्न दुर्योधन शकुनि और कर्ण के साथ कुन्ती और उसके पुत्रों को जलाने की योजना बनाता है। वह अपने मन्त्री पुरोचन को एकान्त में ले जाकर आदेश देता है कि गधों से जुते रथ पर शीघ्र वारणावत जाए, वहाँ नगर के छोर पर सन, राल, लाख, घी, तेल आदि ज्वलनशील वस्तुओं से चार शालाओं वाला एक सुन्दर भवन बनवाए, पाण्डवों को उसमें आराम से ठहराए, और जब वे निर्भय होकर सो जाएँ तब उसके द्वार पर आग लगा दे, जिससे कौरवों पर कोई दोष न आए। पुरोचन स्वीकार करके तुरन्त वहाँ जाता है और आज्ञा के अनुसार वह भयानक भवन बनवा देता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.156.1)
धृतराष्ट्रप्रयुक्तेषु पाण्डुपुत्रेषु भारत । दुर्योधनः परं हर्षमगच्छत्स दुरात्मवान् ॥
dhṛtarāṣṭraprayukteṣu pāṇḍuputreṣu bhārata | duryodhanaḥ paraṃ harṣamagacchatsa durātmavān
हे भारत! धृतराष्ट्र द्वारा पाण्डुपुत्रों को भेज दिए जाने पर दुष्टात्मा दुर्योधन को अत्यन्त हर्ष हुआ।
श्लोक 2 (1.156.2)
ततः सुबलपुत्रश्च कर्णदुर्योधनावपि । दहने सहपुत्रायाः कुन्त्या मतिमकुर्वत । मन्त्रयित्वा स तैः सार्धं दुरात्मा धृतराष्ट्रजः ॥
tataḥ subalaputraśca karṇaduryodhanāvapi | dahane sahaputrāyāḥ kuntyā matimakurvata | mantrayitvā sa taiḥ sārdhaṃ durātmā dhṛtarāṣṭrajaḥ
तब सुबलपुत्र शकुनि, कर्ण और दुर्योधन ने पुत्रों सहित कुन्ती को जला देने का निश्चय किया। उनके साथ मन्त्रणा करके वह दुष्ट धृतराष्ट्रपुत्र
श्लोक 3 (1.156.3)
स पुरोचनमेकान्तमानीय भरतर्षभ । गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ सचिवं वाक्यमब्रवीत् ॥
sa purocanamekāntamānīya bharatarṣabha | gṛhītvā dakṣiṇe pāṇau sacivaṃ vākyamabravīt
हे भरतश्रेष्ठ! पुरोचन को एकान्त में ले गया और अपने उस मन्त्री का दाहिना हाथ पकड़कर उससे बोला —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 4 (1.156.4)
ममेयं वसुसंपूर्णा पुरोचन वसुन्धरा । यथैव भविता तात तथा त्वं द्रष्टुमर्हसि ॥
mameyaṃ vasusaṃpūrṇā purocana vasundharā | yathaiva bhavitā tāta tathā tvaṃ draṣṭumarhasi
"पुरोचन! धन से भरी यह पृथ्वी मेरी है। हे तात! जैसे यह मेरी होगी, वैसे ही तुम्हें इसे अपनी समझना चाहिए।"
श्लोक 5 (1.156.5)
न हि मे कश्चिदन्योऽस्ति विश्वासिकतरस्त्वया । सहायो येन सन्धाय मन्त्रयेयं यथा त्वया ॥
na hi me kaścidanyo'sti viśvāsikatarastvayā | sahāyo yena sandhāya mantrayeyaṃ yathā tvayā
"क्योंकि तुमसे बढ़कर विश्वासपात्र मेरा कोई दूसरा नहीं है, कोई ऐसा सहायक नहीं जिसके साथ मिलकर मैं तुम्हारी तरह मन्त्रणा कर सकूँ।"
श्लोक 6 (1.156.6)
संरक्ष तात मन्त्रं च सपत्नांश्च ममोद्धर । निपुणेनाभ्युपायेन यद्ब्रवीमि तथा कुरु ॥
saṃrakṣa tāta mantraṃ ca sapatnāṃśca mamoddhara | nipuṇenābhyupāyena yadbravīmi tathā kuru
"हे तात! इस भेद को गुप्त रखो और मेरे शत्रुओं को उखाड़ फेंको। मैं जो कहता हूँ, उसे किसी चतुर उपाय से करो।"
श्लोक 7 (1.156.7)
पाण्डवा धृतराष्ट्रेण प्रेषिता वारणावतम् । उत्सवे विहरिष्यन्ति धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥
pāṇḍavā dhṛtarāṣṭreṇa preṣitā vāraṇāvatam | utsave vihariṣyanti dhṛtarāṣṭrasya śāsanāt
"धृतराष्ट्र ने पाण्डवों को वारणावत भेजा है; वे धृतराष्ट्र की आज्ञा से वहाँ उत्सव में विहार करेंगे।"
श्लोक 8 (1.156.8)
स त्वं रासभयुक्तेन स्यन्दनेनाशुगामिना । वारणावतमद्यैव यथा यासि तथा कुरु ॥
sa tvaṃ rāsabhayuktena syandanenāśugāminā | vāraṇāvatamadyaiva yathā yāsi tathā kuru
"इसलिए तुम ऐसा करो कि गधों से जुते शीघ्रगामी रथ पर आज ही वारणावत पहुँच जाओ।"
श्लोक 9 (1.156.9)
तत्र गत्वा चतुःशालं गृहं परमसंवृतम् । नगरोपान्तमाश्रित्य कारयेथा महाधनम् ॥
tatra gatvā catuḥśālaṃ gṛhaṃ paramasaṃvṛtam | nagaropāntamāśritya kārayethā mahādhanam
"वहाँ पहुँचकर नगर के छोर पर चारों ओर से अच्छी तरह घिरा हुआ, बहुमूल्य, चार शालाओं वाला एक भवन बनवाना।"
श्लोक 10 (1.156.10)
शणसर्जरसादीनि यानि द्रव्याणि कानिचित् । आग्नेयान्युत सन्तीह तानि तत्र प्रदापय ॥
śaṇasarjarasādīni yāni dravyāṇi kānicit | āgneyānyuta santīha tāni tatra pradāpaya
"सन, राल आदि जो भी आग पकड़ने वाली वस्तुएँ यहाँ हैं, उन सबको वहाँ पहुँचवा देना।"
श्लोक 11 (1.156.11)
बल्वजेन च संमिश्रं मधूच्छिष्टेन चैव हि । सर्पिस्तैलवसाभिश्च लाक्षया चाप्यनल्पया । मृत्तिकां मिश्रयित्वा त्वं लेपं कुड्येषु दापय ॥
balvajena ca saṃmiśraṃ madhūcchiṣṭena caiva hi | sarpistailavasābhiśca lākṣayā cāpyanalpayā | mṛttikāṃ miśrayitvā tvaṃ lepaṃ kuḍyeṣu dāpaya
"बल्वज घास, मोम, घी, तेल, चर्बी और भरपूर लाख में मिट्टी मिलाकर दीवारों पर उसका लेप करवाना।"
श्लोक 12 (1.156.12)
शणं तैलं घृतं चैव जतु दारूणि चैव हि । तस्मिन्वेश्मनि सर्वाणि निक्षिपेथाः समन्ततः ॥
śaṇaṃ tailaṃ ghṛtaṃ caiva jatu dārūṇi caiva hi | tasminveśmani sarvāṇi nikṣipethāḥ samantataḥ
"सन, तेल, घी, लाख और लकड़ी — ये सब उस भवन में चारों ओर रखवा देना।"
श्लोक 13 (1.156.13)
लाक्षाशममधूच्छिष्टवेष्टितानि मृदापि च । लेपयित्वा गुरूण्याशु दारुयन्त्राणि दापय ॥
lākṣāśamamadhūcchiṣṭaveṣṭitāni mṛdāpi ca | lepayitvā gurūṇyāśu dāruyantrāṇi dāpaya
"और लाख तथा मोम से लिपटे, ऊपर से मिट्टी से लीपे हुए भारी लकड़ी के यन्त्र शीघ्र लगवा देना।"
श्लोक 14 (1.156.14)
यथा च तन्न पश्येरन्परीक्षन्तोऽपि पाण्डवाः । आग्नेयमिति तत्कार्यमपि चान्येऽपि मानवाः ॥
yathā ca tanna paśyeranparīkṣanto'pi pāṇḍavāḥ | āgneyamiti tatkāryamapi cānye'pi mānavāḥ
"यह काम ऐसा होना चाहिए कि पाण्डव जाँच करके भी न देख सकें कि यह आग पकड़ने के लिए बना है, और न दूसरे लोग ही।"
श्लोक 15 (1.156.15)
वेश्मन्येवं कृते तत्र कृत्वा तान्परमार्चितान् । वासयेथाः पाण्डवेयान्कुन्तीं च ससुहृज्जनाम् ॥
veśmanyevaṃ kṛte tatra kṛtvā tānparamārcitān | vāsayethāḥ pāṇḍaveyānkuntīṃ ca sasuhṛjjanām
"भवन इस प्रकार तैयार हो जाने पर उनका परम सत्कार करके पाण्डवों को कुन्ती और उनके सुहृदों सहित वहीं ठहराना।"
श्लोक 16 (1.156.16)
आसनानि च दिव्यानि यानानि शयनानि च । विधातव्यानि पाण्डूनां यथा तुष्येच्च मे पिता ॥
āsanāni ca divyāni yānāni śayanāni ca | vidhātavyāni pāṇḍūnāṃ yathā tuṣyecca me pitā
"पाण्डवों के लिए दिव्य आसन, सवारियाँ और शय्याएँ उपलब्ध कराना, जिससे मेरे पिता संतुष्ट हों।"
श्लोक 17 (1.156.17)
यथा च तन्न जानन्ति नगरे वारणावते । यथा रमेरन्विस्रब्धा नगरे वारणावते । तथा सर्वं विधातव्यं यावत्कालस्य पर्ययः ॥
yathā ca tanna jānanti nagare vāraṇāvate | yathā rameranvisrabdhā nagare vāraṇāvate | tathā sarvaṃ vidhātavyaṃ yāvatkālasya paryayaḥ
"ऐसा करना कि वारणावत नगर में किसी को इसका पता न चले; सब प्रबन्ध ऐसा करना कि वे वारणावत में निःशंक होकर रहें, जब तक कि समय न आ जाए।"
श्लोक 18 (1.156.18)
ज्ञात्वा च तान्सुविश्वस्ताञ्शयानानकुतोभयान् । अग्निस्त्वया ततो देयो द्वारतस्तस्य वेश्मनः ॥
jñātvā ca tānsuviśvastāñśayānānakutobhayān | agnistvayā tato deyo dvāratastasya veśmanaḥ
"जब तुम जान लो कि वे पूरी तरह निश्चिन्त होकर निर्भय सो रहे हैं, तब उस भवन के द्वार पर आग लगा देना।"
श्लोक 19 (1.156.19)
दग्धानेवं स्वके गेहे दाहिताः पाण्डवा इति । न गर्हयेयुरस्मान्वै पाण्डवार्थाय कर्हिचित् ॥
dagdhānevaṃ svake gehe dāhitāḥ pāṇḍavā iti | na garhayeyurasmānvai pāṇḍavārthāya karhicit
"जब वे इस प्रकार अपने ही घर में जल जाएँगे, तो कोई भी पाण्डवों के कारण यह कहकर हमारी निन्दा नहीं करेगा कि पाण्डवों को जलवा दिया गया।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (1.156.20)
स तथेति प्रतिज्ञाय कौरवाय पुरोचनः । प्रायाद्रासभयुक्तेन स्यन्दनेनाशुगामिना ॥
sa tatheti pratijñāya kauravāya purocanaḥ | prāyādrāsabhayuktena syandanenāśugāminā
पुरोचन ने दुर्योधन को "ऐसा ही होगा" कहकर वचन दिया और गधों से जुते शीघ्रगामी रथ पर चल पड़ा।
श्लोक 21 (1.156.21)
स गत्वा त्वरितं राजन्दुर्योधनमते स्थितः । यथोक्तं राजपुत्रेण सर्वं चक्रे पुरोचनः ॥
sa gatvā tvaritaṃ rājanduryodhanamate sthitaḥ | yathoktaṃ rājaputreṇa sarvaṃ cakre purocanaḥ
हे राजन्! दुर्योधन के मत पर दृढ़ पुरोचन ने शीघ्र वहाँ जाकर राजकुमार के कहे अनुसार सब कुछ किया।
श्लोक 22 (1.156.22)
तेषां तु पाण्डवेयानां गृहं रौद्रमकल्पयत् ॥
teṣāṃ tu pāṇḍaveyānāṃ gṛhaṃ raudramakalpayat
उसने उन पाण्डुपुत्रों के लिए एक भयानक भवन बनवाया।