आदि पर्व · अध्याय 157
विदुर की गूढ़ चेतावनी
पाण्डव भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोण, कृप, विदुर और अन्य वृद्धजनों से विदा लेकर चल पड़ते हैं, और शोकाकुल नगरवासी उनके पीछे चलते हैं। कुछ ब्राह्मण खुलकर धृतराष्ट्र के अन्याय की निन्दा करते हैं और युधिष्ठिर के साथ जाने का निश्चय करते हैं, पर युधिष्ठिर कहते हैं कि राजा की आज्ञा माननी ही चाहिए और उन्हें घर लौटा देते हैं। विदुर ऐसी गूढ़ भाषा में, जिसे केवल युधिष्ठिर समझते हैं, उन्हें बिना लोहे के शस्त्र, आग और बिल के रास्ते बच निकलने के विषय में सावधान करते हैं; बाद में युधिष्ठिर कुन्ती को वह चेतावनी समझाते हैं। आठवें दिन रोहिणी नक्षत्र में पाण्डव वारणावत पहुँचते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.157.1)
पाण्डवास्तु रथान्युक्तान्सदश्वैरनिलोपमैः । आरोहमाणा भीष्मस्य पादौ जगृहुरार्तवत् ॥
pāṇḍavāstu rathānyuktānsadaśvairanilopamaiḥ | ārohamāṇā bhīṣmasya pādau jagṛhurārtavat
वायु के समान वेगवान उत्तम घोड़ों से जुते रथों पर चढ़ते समय पाण्डवों ने दुःखी होकर भीष्म के चरण पकड़े,
श्लोक 2 (1.157.2)
राज्ञश्च धृतराष्ट्रस्य द्रोणस्य च महात्मनः । अन्येषां चैव वृद्धानां कृपस्य विदुरस्य च ॥
rājñaśca dhṛtarāṣṭrasya droṇasya ca mahātmanaḥ | anyeṣāṃ caiva vṛddhānāṃ kṛpasya vidurasya ca
राजा धृतराष्ट्र, महात्मा द्रोण, अन्य वृद्धजनों तथा कृप और विदुर के भी।
श्लोक 3 (1.157.3)
एवं सर्वान्कुरून्वृद्धानभिवाद्य यतव्रताः । समालिङ्ग्य समानान्वै बालैश्चाप्यभिवादिताः ॥
evaṃ sarvānkurūnvṛddhānabhivādya yatavratāḥ | samāliṅgya samānānvai bālaiścāpyabhivāditāḥ
इस प्रकार सब वृद्ध कुरुवंशियों को प्रणाम करके उन संयमी व्रतधारियों ने अपने समवयस्कों को गले लगाया, और बालकों ने उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 4 (1.157.4)
सर्वा मातॄस्तथाऽऽपृच्छ्य कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् । प्रकृतीरपि सर्वाश्च प्रययुर्वारणावतम् ॥
sarvā mātṝstathā''pṛcchya kṛtvā caiva pradakṣiṇam | prakṛtīrapi sarvāśca prayayurvāraṇāvatam
इसी प्रकार सब माताओं से विदा लेकर, उनकी प्रदक्षिणा करके और सारी प्रजा से भी विदा लेकर वे वारणावत को चल पड़े।
श्लोक 5 (1.157.5)
विदुरश्च महाप्राज्ञस्तथाऽन्ये कुरुपुङ्गवाः । पौराश्च पुरुषव्याघ्रानन्वीयुः शोककर्शिताः ॥
viduraśca mahāprājñastathā'nye kurupuṅgavāḥ | paurāśca puruṣavyāghrānanvīyuḥ śokakarśitāḥ
महाबुद्धिमान विदुर, अन्य कुरुश्रेष्ठ और नगरवासी शोक से व्याकुल होकर उन नरश्रेष्ठों के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 6 (1.157.6)
तत्र केचिद्ब्रुवन्ति स्म ब्राह्मणा निर्भयास्तदा । दीनान्दृष्ट्वा पाण्डुसुतानतीव भृशदुःखिताः ॥
tatra kecidbruvanti sma brāhmaṇā nirbhayāstadā | dīnāndṛṣṭvā pāṇḍusutānatīva bhṛśaduḥkhitāḥ
तब वहाँ कुछ ब्राह्मण पाण्डुपुत्रों को दीन देखकर अत्यन्त दुःखी हुए और निर्भय होकर कहने लगे —
ब्राह्मणा ऊचुः
श्लोक 7 (1.157.7)
विषमं पश्यते राजा सर्वथा स सुमन्दधीः । कौरव्यो धृतराष्ट्रस्तु न च धर्मं प्रपश्यति ॥
viṣamaṃ paśyate rājā sarvathā sa sumandadhīḥ | kauravyo dhṛtarāṣṭrastu na ca dharmaṃ prapaśyati
"यह मन्दबुद्धि कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र सब कुछ पक्षपात की दृष्टि से देखता है और धर्म को नहीं देखता।"
श्लोक 8 (1.157.8)
न हि पापमपापात्मा रोचयिष्यति पाण्डवः । भीमो वा बलिनां श्रेष्ठः कौन्तेयो वा धनञ्जयः ॥
na hi pāpamapāpātmā rocayiṣyati pāṇḍavaḥ | bhīmo vā balināṃ śreṣṭhaḥ kaunteyo vā dhanañjayaḥ
"निष्पाप पाण्डुपुत्र (युधिष्ठिर) कभी पाप में रुचि नहीं लेंगे, न बलवानों में श्रेष्ठ भीम और न कुन्तीपुत्र धनञ्जय।"
श्लोक 9 (1.157.9)
कुत एव महात्मानौ माद्रीपुत्रौ करिष्यतः । तान्राज्यं पितृतः प्राप्तान्धृतराष्ट्रो न मृष्यति ॥
kuta eva mahātmānau mādrīputrau kariṣyataḥ | tānrājyaṃ pitṛtaḥ prāptāndhṛtarāṣṭro na mṛṣyati
"फिर माद्री के दोनों महात्मा पुत्र ऐसा कैसे करेंगे? धृतराष्ट्र यह सहन नहीं कर पाता कि उन्हें पिता से राज्य मिला है।"
श्लोक 10 (1.157.10)
अधर्म्यमिदमत्यन्तं कथं भीष्मोऽनुमन्यते । विवास्यमानानस्थाने नगरे योऽभिमन्यते ॥
adharmyamidamatyantaṃ kathaṃ bhīṣmo'numanyate | vivāsyamānānasthāne nagare yo'bhimanyate
"यह अत्यन्त अधर्म है। भीष्म इसका अनुमोदन कैसे कर रहे हैं, जो उनके अकारण उस नगर में निर्वासित किए जाने को मान रहे हैं?"
श्लोक 11 (1.157.11)
पितेव हि नृपोऽस्माकमभूच्छान्तनवः पुरा । विचित्रवीर्यो राजर्षिः पाण्डुश्च कुरुनन्दनः ॥
piteva hi nṛpo'smākamabhūcchāntanavaḥ purā | vicitravīryo rājarṣiḥ pāṇḍuśca kurunandanaḥ
"पहले शान्तनु के पुत्र राजर्षि विचित्रवीर्य हमारे लिए पिता के समान थे, और कुरुनन्दन पाण्डु भी।"
श्लोक 12 (1.157.12)
स तस्मिन्पुरुषव्याघ्रे देवभावं गते सति । राजपुत्रानिमान्बालान्धृतराष्ट्रो न मृष्यति ॥
sa tasminpuruṣavyāghre devabhāvaṃ gate sati | rājaputrānimānbālāndhṛtarāṣṭro na mṛṣyati
"अब जब वह नरश्रेष्ठ देवलोक को चला गया है, धृतराष्ट्र इन बालक राजकुमारों को सहन नहीं कर पाता।"
श्लोक 13 (1.157.13)
वयमेतदनिच्छन्तः सर्व एव पुरोत्तमात् । गृहान्विहाय गच्छामो यत्र गन्ता युधिष्ठिरः ॥
vayametadanicchantaḥ sarva eva purottamāt | gṛhānvihāya gacchāmo yatra gantā yudhiṣṭhiraḥ
"हम यह नहीं चाहते, इसलिए हम सब इस श्रेष्ठ नगर में अपने घर छोड़कर वहीं चलेंगे जहाँ युधिष्ठिर जाएँगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (1.157.14)
तांस्तथा वादिनः पौरान्दुःखितान्दुःखकर्शितः । उवाच मनसा ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
tāṃstathā vādinaḥ paurānduḥkhitānduḥkhakarśitaḥ | uvāca manasā dhyātvā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
इस प्रकार बोलते हुए उन दुःखी नगरवासियों से, स्वयं भी दुःख से व्याकुल धर्मराज युधिष्ठिर ने मन में विचार करके कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 15 (1.157.15)
पिता मान्यो गुरुः श्रेष्ठो यदाह पृथिवीपतिः । अशङ्कमानैस्तत्कार्यमस्माभिरिति नो व्रतम् ॥
pitā mānyo guruḥ śreṣṭho yadāha pṛthivīpatiḥ | aśaṅkamānaistatkāryamasmābhiriti no vratam
"राजा, पृथ्वीपति, हमारे पिता हैं — माननीय, गुरु और श्रेष्ठ। वे जो कहें, उसे हमें बिना शंका किए करना चाहिए; यही हमारा व्रत है।"
श्लोक 16 (1.157.16)
भवन्तः सुहृदोऽस्माकं यात कृत्वा प्रदक्षिणम् । प्रतिनन्द्य तथाऽऽशीर्भिर्निवर्तध्वं यथागृहम् ॥
bhavantaḥ suhṛdo'smākaṃ yāta kṛtvā pradakṣiṇam | pratinandya tathā''śīrbhirnivartadhvaṃ yathāgṛham
"आप हमारे सुहृद् हैं। हमारी प्रदक्षिणा करके और आशीर्वादों से हमारा अभिनन्दन करके अपने-अपने घर लौट जाइए।"
श्लोक 17 (1.157.17)
यदा तु कार्यमस्माकं भवद्भिरुपपत्स्यते । तदा करिष्यथास्माकं प्रियाणि च हितानि च ॥
yadā tu kāryamasmākaṃ bhavadbhirupapatsyate | tadā kariṣyathāsmākaṃ priyāṇi ca hitāni ca
"जब हमें आपसे कोई कार्य होगा, तब आप हमारे प्रिय और हित के काम करेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (1.157.18)
एवमुक्तास्तदा पौराः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । आशीर्भिश्चाभिनन्द्यैताञ्जग्मुर्नगरमेव हि ॥
evamuktāstadā paurāḥ kṛtvā cāpi pradakṣiṇam | āśīrbhiścābhinandyaitāñjagmurnagarameva hi
ऐसा कहे जाने पर नगरवासी उनकी प्रदक्षिणा करके और आशीर्वादों से उनका अभिनन्दन करके नगर को लौट गए।
श्लोक 19 (1.157.19)
पौरेषु विनिवृत्तेषु विदुरः सर्वधर्मवित् । बोधयन्पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् ॥
paureṣu vinivṛtteṣu viduraḥ sarvadharmavit | bodhayanpāṇḍavaśreṣṭhamidaṃ vacanamabravīt
नगरवासियों के लौट जाने पर सब धर्मों के ज्ञाता विदुर ने पाण्डवों में ज्येष्ठ (युधिष्ठिर) को सावधान करते हुए यह वचन कहा।
श्लोक 20 (1.157.20)
प्राज्ञः प्राज्ञं प्रलापज्ञः प्रलापज्ञमिदं वचः । यो जानाति परप्रज्ञां नीतिशास्त्रानुसारिणीम् । विज्ञायेह तथा कुर्यादापदं निस्तरेद्यथा ॥
prājñaḥ prājñaṃ pralāpajñaḥ pralāpajñamidaṃ vacaḥ | yo jānāti paraprajñāṃ nītiśāstrānusāriṇīm | vijñāyeha tathā kuryādāpadaṃ nistaredyathā
बुद्धिमान ने बुद्धिमान से, गूढ़ भाषा जानने वाले ने गूढ़ भाषा जानने वाले से कहा — "जो इन वचनों को और नीतिशास्त्र के अनुसार रची गई शत्रु की योजना को समझता है, उसे यह जानकर ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे वह संकट से पार हो जाए।
विदुर उवाच
श्लोक 21 (1.157.21)
अलोहं निशितं शस्त्रं शरीरपरिकर्तनम् । यो वेत्ति न तु तं घ्नन्ति प्रतिघातविदं द्विषः ॥
alohaṃ niśitaṃ śastraṃ śarīraparikartanam | yo vetti na tu taṃ ghnanti pratighātavidaṃ dviṣaḥ
एक ऐसा तीखा शस्त्र है जो लोहे का नहीं बना, फिर भी शरीर को काट डालता है। जो उसे जानता है और उससे बचाव का उपाय जानता है, उसे शत्रु नहीं मार सकते।
श्लोक 22 (1.157.22)
कक्षघ्नः शिशिरघ्नश्च महाकक्षे बिलौकसः । न दहेदिति चात्मानं यो रक्षति स जीवति ॥
kakṣaghnaḥ śiśiraghnaśca mahākakṣe bilaukasaḥ | na dahediti cātmānaṃ yo rakṣati sa jīvati
घास-फूस को जलाने वाली और शीत को मिटाने वाली (आग) विशाल वन में भी बिलों में रहने वाले जीवों को नहीं जलाती। जो इस प्रकार अपनी रक्षा करता है, वही जीवित रहता है।
श्लोक 23 (1.157.23)
नाचक्षुर्वेत्ति पन्थानं नाचक्षुर्विन्दते दिशः । नाधृतिर्भूतिमाप्नोति बुध्यस्वैवं प्रबोधितः ॥
nācakṣurvetti panthānaṃ nācakṣurvindate diśaḥ | nādhṛtirbhūtimāpnoti budhyasvaivaṃ prabodhitaḥ
अन्धा मार्ग नहीं जानता, अन्धे को दिशाओं का ज्ञान नहीं होता; धैर्यहीन को समृद्धि नहीं मिलती। मेरे सावधान करने पर इसे भली-भाँति समझ लो।
श्लोक 24 (1.157.24)
अनाप्तैर्दत्तमादत्ते नरः शस्त्रमलोहजम् । श्वाविच्छरणमासाद्य प्रमुच्येत हुताशनात् ॥
anāptairdattamādatte naraḥ śastramalohajam | śvāviccharaṇamāsādya pramucyeta hutāśanāt
जो मनुष्य अविश्वसनीय लोगों द्वारा दिए गए बिना लोहे के शस्त्र को स्वयं अपने हाथ में ले लेता है, वह साही की भाँति बिल की शरण लेकर आग से छूट जाता है।
श्लोक 25 (1.157.25)
चरन्मार्गान्विजानाति नक्षत्रैर्विन्दते दिशः । आत्मना चात्मनः पञ्च पीडयन्नानुपीड्यते ॥
caranmārgānvijānāti nakṣatrairvindate diśaḥ | ātmanā cātmanaḥ pañca pīḍayannānupīḍyate
घूमते-फिरते मनुष्य मार्गों को जान लेता है, नक्षत्रों से दिशाएँ पहचान लेता है। जो स्वयं अपनी पाँचों (इन्द्रियों) को वश में रखता है, वह पीड़ित नहीं होता।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (1.157.26)
एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराजो युधिष्ठिरः । विदुरं विदुषां श्रेष्ठं ज्ञातमित्येव पाण्डवः ॥
evamuktaḥ pratyuvāca dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | viduraṃ viduṣāṃ śreṣṭhaṃ jñātamityeva pāṇḍavaḥ
ऐसा कहे जाने पर पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने विद्वानों में श्रेष्ठ विदुर को उत्तर दिया — "मैंने समझ लिया।"
श्लोक 27 (1.157.27)
अनुशिक्ष्यानुगम्यैतान्कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् । पाण्डवानभ्यनुज्ञाय विदुरः प्रययौ गृहान् ॥
anuśikṣyānugamyaitānkṛtvā caiva pradakṣiṇam | pāṇḍavānabhyanujñāya viduraḥ prayayau gṛhān
उन्हें उपदेश देकर, कुछ दूर उनके साथ जाकर और उनकी प्रदक्षिणा करके विदुर पाण्डवों से विदा लेकर अपने घर चले गए।
श्लोक 28 (1.157.28)
निवृत्ते विदुरे चापि भीष्मे पौरजने तथा । अजातशत्रुमासाद्य कुन्ती वचनमब्रवीत् ॥
nivṛtte vidure cāpi bhīṣme paurajane tathā | ajātaśatrumāsādya kuntī vacanamabravīt
विदुर, भीष्म और नगरवासियों के लौट जाने पर कुन्ती ने अजातशत्रु (युधिष्ठिर) के पास जाकर कहा —
कुन्त्युवाच
श्लोक 29 (1.157.29)
क्षत्ता यदब्रवीद्वाक्यं जनमध्येऽब्रुवन्निव । त्वया च स तथेत्युक्तो जानीमो न च तद्वयम् ॥
kṣattā yadabravīdvākyaṃ janamadhye'bruvanniva | tvayā ca sa tathetyukto jānīmo na ca tadvayam
"क्षत्ता (विदुर) ने लोगों के बीच, मानो कुछ कहे बिना ही, जो बात कही, और जिस पर तुमने 'ऐसा ही' कहा — उसे हम नहीं समझ पाए।"
श्लोक 30 (1.157.30)
यदीदं शक्यमस्माभिर्ज्ञातुं नैव च दोषवत् । श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं संवादं तव तस्य च ॥
yadīdaṃ śakyamasmābhirjñātuṃ naiva ca doṣavat | śrotumicchāmi tatsarvaṃ saṃvādaṃ tava tasya ca
"यदि हम उसे जान सकते हों और उसमें कोई दोष न हो, तो मैं तुम्हारे और उनके बीच हुई सारी बातचीत सुनना चाहती हूँ।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 31 (1.157.31)
विषादग्नेश्च बोद्धव्यमिति मां विदुरोऽब्रवीत् । पन्थानो वेदितव्याश्च नक्षत्रैश्च तथा दिशः । कुड्याश्च विदिताः कार्याः स्याच्छुद्धिरिति चाब्रवीत् ॥
viṣādagneśca boddhavyamiti māṃ viduro'bravīt | panthāno veditavyāśca nakṣatraiśca tathā diśaḥ | kuḍyāśca viditāḥ kāryāḥ syācchuddhiriti cābravīt
"विदुर ने मुझसे कहा कि विष और आग से सावधान रहना है, मार्गों को जान लेना है और नक्षत्रों से दिशाएँ पहचाननी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दीवारों की परख कर लेनी चाहिए, जिससे हम सुरक्षित रहें।"
श्लोक 32 (1.157.32)
जितेन्द्रियश्च वसुधां प्राप्स्यतीति च मेऽब्रवीत् । विज्ञातमिति तत्सर्वं प्रत्युक्तो विदुरो मया ॥
jitendriyaśca vasudhāṃ prāpsyatīti ca me'bravīt | vijñātamiti tatsarvaṃ pratyukto viduro mayā
"उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि जो इन्द्रियों को जीत लेता है, वह पृथ्वी को प्राप्त करता है। मैंने विदुर को उत्तर दिया — 'मैंने सब समझ लिया।'"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (1.157.33)
अष्टमेऽहनि रोहिण्यां प्रयाताः फाल्गुनस्य ते । वारणावतमासाद्य ददृशुर्नागरं जनम् ॥
aṣṭame'hani rohiṇyāṃ prayātāḥ phālgunasya te | vāraṇāvatamāsādya dadṛśurnāgaraṃ janam
फाल्गुन मास के आठवें दिन रोहिणी नक्षत्र में वे चले, और वारणावत पहुँचकर उन्होंने वहाँ के नगरवासियों को देखा।