आदि पर्व · अध्याय 158
पाण्डवों का वारणावत-आगमन और लाक्षागृह की पहचान
वारणावत के हज़ारों लोग पाण्डवों के स्वागत के लिए उमड़ पड़ते हैं; नगर में उनका सत्कार होता है और पुरोचन उन्हें ठहराता है। दस दिन बाद वह उन्हें 'शिव' नामक भवन में ले जाता है। युधिष्ठिर उसमें चर्बी, लाख और घी की गन्ध पाकर भीम से कहते हैं कि यह घर जलाने के लिए ही बना है, जैसा विदुर ने चेताया था। भीम चाहते हैं कि डरकर भागने के बजाय हस्तिनापुर लौटकर कौरवों के साथ ही रहा जाए; पर युधिष्ठिर निश्चय करते हैं कि सन्देह प्रकट किए बिना यहीं रहें, शिकार के बहाने वन के मार्ग जान लें और भागने के लिए एक गुप्त सुरंग खोदें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.158.1)
ततः सर्वाः प्रकृतयो नगराद्वारणावतात् । सर्वमङ्गलसंयुक्ता यथाशास्त्रमतन्द्रिताः ॥
tataḥ sarvāḥ prakṛtayo nagarādvāraṇāvatāt | sarvamaṅgalasaṃyuktā yathāśāstramatandritāḥ
तब वारणावत नगर की सारी प्रजा, शास्त्र के अनुसार सब मंगल-द्रव्य लेकर, बिना किसी आलस्य के,
श्लोक 2 (1.158.2)
श्रुत्वाऽगतान्पाण्डुपुत्रान्नानायानैः सहस्रशः । अभिजग्मुर्नरश्रेष्ठाञ्श्रुत्वैव परया मुदा ॥
śrutvā'gatānpāṇḍuputrānnānāyānaiḥ sahasraśaḥ | abhijagmurnaraśreṣṭhāñśrutvaiva parayā mudā
पाण्डुपुत्रों के आगमन का समाचार सुनते ही हज़ारों की संख्या में भाँति-भाँति के वाहनों पर सवार होकर परम आनन्द से उन नरश्रेष्ठों की अगवानी करने निकल पड़ी।
श्लोक 3 (1.158.3)
ते समासाद्य कौन्तेयान्वारणावतका जनाः । कृत्वा जयाशिषः सर्वे परिवार्योपतस्थिरे ॥
te samāsādya kaunteyānvāraṇāvatakā janāḥ | kṛtvā jayāśiṣaḥ sarve parivāryopatasthire
कुन्तीपुत्रों के पास पहुँचकर वारणावत के सब लोगों ने उन्हें विजय के आशीर्वाद दिए और उन्हें घेरकर सेवा में खड़े हो गए।
श्लोक 4 (1.158.4)
तैर्वृतः पुरुषव्याघ्रो धर्मराजो युधिष्ठिरः । विबभौ देवसङ्काशो वज्रपाणिरिवामरैः ॥
tairvṛtaḥ puruṣavyāghro dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | vibabhau devasaṅkāśo vajrapāṇirivāmaraiḥ
उनसे घिरे हुए पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर देवताओं के बीच वज्रधारी इन्द्र के समान देवतुल्य शोभा पा रहे थे।
श्लोक 5 (1.158.5)
सत्कृताश्चैव पौरैस्ते पौरान्सत्कृत्य चानघ । अलङ्कृतं जनाकीर्णं विविशुर्वारणावतम् ॥
satkṛtāścaiva pauraiste paurānsatkṛtya cānagha | alaṅkṛtaṃ janākīrṇaṃ viviśurvāraṇāvatam
हे निष्पाप! नगरवासियों से सम्मान पाकर और बदले में उनका सम्मान करके उन्होंने सजे हुए, लोगों से भरे वारणावत में प्रवेश किया।
श्लोक 6 (1.158.6)
ते प्रविश्य पुरीं वीरास्तूर्णं जग्मुरथो गृहान् । ब्राह्मणानां महीपाल रतानां स्वेषु कर्मसु ॥
te praviśya purīṃ vīrāstūrṇaṃ jagmuratho gṛhān | brāhmaṇānāṃ mahīpāla ratānāṃ sveṣu karmasu
हे राजन्! नगर में प्रवेश करके वे वीर तुरन्त अपने-अपने कर्मों में लगे ब्राह्मणों के घरों में गए,
श्लोक 7 (1.158.7)
नगराधिकृतानां च गृहाणि रथिनां वराः । उपतस्थुर्नरश्रेष्ठा वैश्यशूद्रगृहाण्यपि ॥
nagarādhikṛtānāṃ ca gṛhāṇi rathināṃ varāḥ | upatasthurnaraśreṣṭhā vaiśyaśūdragṛhāṇyapi
फिर नगर के अधिकारियों के घरों में; रथियों में श्रेष्ठ वे नरश्रेष्ठ वैश्यों और शूद्रों के घरों में भी पहुँचे।
श्लोक 8 (1.158.8)
अर्चिताश्च नरैः पौरैः पाण्डवा भरतर्षभ । जग्मुरावसथं पश्चात्पुरोचनपुरःसराः ॥
arcitāśca naraiḥ pauraiḥ pāṇḍavā bharatarṣabha | jagmurāvasathaṃ paścātpurocanapuraḥsarāḥ
हे भरतश्रेष्ठ! नगर के लोगों से पूजित होकर पाण्डव फिर पुरोचन को आगे करके अपने निवास-स्थान पर गए।
श्लोक 9 (1.158.9)
तेभ्यो भक्ष्याणि पानानि शयनानि शुभानि च । आसनानि च मुख्यानि प्रददौ स पुरोचनः ॥
tebhyo bhakṣyāṇi pānāni śayanāni śubhāni ca | āsanāni ca mukhyāni pradadau sa purocanaḥ
पुरोचन ने उन्हें खाने-पीने की वस्तुएँ, सुन्दर शय्याएँ और उत्तम आसन दिए।
श्लोक 10 (1.158.10)
तत्र ते सत्कृतास्तेन सुमहार्हपरिच्छदाः । उपास्यमानाः पुरुषैरूषुः पुरनिवासिभिः ॥
tatra te satkṛtāstena sumahārhaparicchadāḥ | upāsyamānāḥ puruṣairūṣuḥ puranivāsibhiḥ
वहाँ उसके द्वारा सत्कृत होकर, बहुमूल्य साज-सामान के साथ, नगरवासियों की सेवा पाते हुए वे रहने लगे।
श्लोक 11 (1.158.11)
दशरात्रोषितानां तु तत्र तेषां पुरोचनः । निवेदयामास गृहं शिवाख्यमशिवं तदा ॥
daśarātroṣitānāṃ tu tatra teṣāṃ purocanaḥ | nivedayāmāsa gṛhaṃ śivākhyamaśivaṃ tadā
दस रातें वहाँ बिताने के बाद पुरोचन ने उन्हें 'शिव' (मंगलमय) नाम का वह भवन दिखाया, जो वास्तव में अमंगलकारी था।
श्लोक 12 (1.158.12)
तत्र ते पुरुषव्याघ्रा विविशुः सपरिच्छदाः । पुरोचनस्य वचनात्कैलासमिव गुह्यकाः ॥
tatra te puruṣavyāghrā viviśuḥ saparicchadāḥ | purocanasya vacanātkailāsamiva guhyakāḥ
पुरोचन के कहने पर वे पुरुषसिंह अपने साज-सामान सहित उसमें वैसे ही जा बसे, जैसे गुह्यक कैलास पर्वत में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 13 (1.158.13)
तच्चागारमभिप्रेक्ष्य सर्वधर्मभृतां वरः । उवाचाग्नेयमित्येवं भीमसेनं युधिष्ठिरः ॥
taccāgāramabhiprekṣya sarvadharmabhṛtāṃ varaḥ | uvācāgneyamityevaṃ bhīmasenaṃ yudhiṣṭhiraḥ
उस भवन को भली-भाँति देखकर समस्त धर्मात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा— "यह तो आग में जलाने के लिए बना है।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 14 (1.158.14)
जिघ्राणोऽस्य वसागन्धं सर्पिर्जतुविमिश्रितम् । कृतं हि व्यक्तमाग्नेयमिदं वेश्म परन्तप ॥
jighrāṇo'sya vasāgandhaṃ sarpirjatuvimiśritam | kṛtaṃ hi vyaktamāgneyamidaṃ veśma parantapa
"मुझे इसमें घी और लाख मिली चर्बी की गन्ध आ रही है। हे परन्तप! स्पष्ट है कि यह घर आग में जलाने के लिए ही बनाया गया है।
श्लोक 15 (1.158.15)
शणसर्जरसं व्यक्तमानीय गृहकर्मणि । मुञ्जबल्वजवंशादिद्रव्यं सर्वं घृतोक्षितम् ॥
śaṇasarjarasaṃ vyaktamānīya gṛhakarmaṇi | muñjabalvajavaṃśādidravyaṃ sarvaṃ ghṛtokṣitam
साफ़ दिखता है कि इसके निर्माण में सन और राल लगाई गई है; मूँज, बल्वज घास, बाँस आदि सारी सामग्री घी में भिगोई गई है।
श्लोक 16 (1.158.16)
तृणबल्वजकार्पासवंशदारुकटान्यपि । आग्नेयान्यत्र क्षिप्तानि परितो वेश्मनस्तथा ॥
tṛṇabalvajakārpāsavaṃśadārukaṭānyapi | āgneyānyatra kṣiptāni parito veśmanastathā
घास, बल्वज, कपास, बाँस, लकड़ी और चटाइयाँ— आग पकड़ने वाली ये सब चीज़ें यहाँ घर के चारों ओर डाली गई हैं।
श्लोक 17 (1.158.17)
शिल्पिभिः सुकृतं ह्याप्तैर्विनीतैर्वेश्मकर्मणि । विश्वस्तं मामयं पापो दग्धुकामः पुरोचनः ॥
śilpibhiḥ sukṛtaṃ hyāptairvinītairveśmakarmaṇi | viśvastaṃ māmayaṃ pāpo dagdhukāmaḥ purocanaḥ
भवन-निर्माण में कुशल, भरोसेमन्द कारीगरों ने इसे बड़ी चतुराई से बनाया है। यह पापी पुरोचन मुझ विश्वास करने वाले को जला डालना चाहता है।
श्लोक 18 (1.158.18)
तथा हि वर्तते मन्दः सुयोधनवशे स्थितः । इमां तु तां महाबुद्धिर्विदुरो दृष्टवांस्तथा ॥
tathā hi vartate mandaḥ suyodhanavaśe sthitaḥ | imāṃ tu tāṃ mahābuddhirviduro dṛṣṭavāṃstathā
क्योंकि यह मूर्ख दुर्योधन के वश में रहकर ऐसा ही आचरण करता है। किन्तु महाबुद्धिमान विदुर ने इसी संकट को पहले ही देख लिया था;
श्लोक 19 (1.158.19)
आपदं तेन मां पार्थ स संबोधितवान्पुरा । ते वयं बोधितास्तेन नित्यमस्मद्धितैषिणा ॥
āpadaṃ tena māṃ pārtha sa saṃbodhitavānpurā | te vayaṃ bodhitāstena nityamasmaddhitaiṣiṇā
इसीलिए, हे पार्थ, उन्होंने मुझे पहले ही इसके बारे में सचेत कर दिया था। सदा हमारा हित चाहने वाले उन्होंने हमें सावधान किया—
श्लोक 20 (1.158.20)
पित्रा कनीयसा स्नेहाद्बुद्धिमन्तोऽशिवं गृहम् । अनार्यैः सुकृतं गूढैर्दुर्योधनवशानुगैः ॥
pitrā kanīyasā snehādbuddhimanto'śivaṃ gṛham | anāryaiḥ sukṛtaṃ gūḍhairduryodhanavaśānugaiḥ
हमारे छोटे चाचा ने स्नेहवश; इसलिए हम समझदार लोग जानते हैं कि यह घर अमंगलकारी है, जिसे दुर्योधन के अधीन चलने वाले नीच लोगों ने छिपे ढंग से बड़ी चतुराई से बनाया है।"
भीमसेन उवाच
श्लोक 21 (1.158.21)
यदीदं गृहमाग्नेयं विहितं मन्यते भवान् । तत्रैव साधु गच्छामो यत्र पूर्वोषिता वयम् ॥
yadīdaṃ gṛhamāgneyaṃ vihitaṃ manyate bhavān | tatraiva sādhu gacchāmo yatra pūrvoṣitā vayam
"यदि आप मानते हैं कि यह घर आग लगाने के लिए तैयार किया गया है, तो अच्छा यही है कि हम वहीं लौट चलें जहाँ पहले रहते थे।
श्लोक 22 (1.158.22)
दर्शयित्वा पृथग्गन्तुं न कार्यं प्रतिभाति मे । अशुभं वा शुभं वा स्यात्तैर्वसाम सहैव तु ॥
darśayitvā pṛthaggantuṃ na kāryaṃ pratibhāti me | aśubhaṃ vā śubhaṃ vā syāttairvasāma sahaiva tu
विरोध प्रकट करके फिर अलग चले जाना मुझे उचित नहीं लगता। भला हो या बुरा, हमें उन्हीं के साथ रहना चाहिए।
श्लोक 23 (1.158.23)
अद्यप्रभृति चास्मासु गतेषु भयविह्वलः । रूढमूलो भवेद्राज्ये धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः ॥
adyaprabhṛti cāsmāsu gateṣu bhayavihvalaḥ | rūḍhamūlo bhavedrājye dhārtarāṣṭro janeśvaraḥ
यदि आज से हम भय से घबराकर चले गए, तो धृतराष्ट्र का पुत्र राजा बनकर राज्य में अपनी जड़ें गहरी जमा लेगा।
श्लोक 24 (1.158.24)
तदीयं तु भवेद्राज्यं तदीयाश्च जना इमे । तस्मात्सहैव वत्स्यामो गलन्यस्तपदा वयम् ॥
tadīyaṃ tu bhavedrājyaṃ tadīyāśca janā ime | tasmātsahaiva vatsyāmo galanyastapadā vayam
तब राज्य उसका हो जाएगा और ये सब लोग भी उसी के हो जाएँगे। इसलिए हम उन्हीं के साथ रहें— उनकी गर्दन पर पाँव रखे हुए।
श्लोक 25 (1.158.25)
अस्माकं कालमासाद्य राज्यमाच्छिद्य शत्रुतः । अर्थं पैतृकमस्माकं सुखं भोक्ष्याम शाश्वतम् ॥
asmākaṃ kālamāsādya rājyamācchidya śatrutaḥ | arthaṃ paitṛkamasmākaṃ sukhaṃ bhokṣyāma śāśvatam
जब हमारा समय आएगा, तब हम शत्रु से राज्य छीनकर अपने पिता की सम्पत्ति का सदा सुखपूर्वक उपभोग करेंगे।
श्लोक 26 (1.158.26)
धृतराष्ट्रवचोऽस्माभिः किमर्थमनुपाल्यते । तेभ्यो भित्त्वाऽन्यथागन्तुं दौर्बल्यं ते कुतो नृप ॥
dhṛtarāṣṭravaco'smābhiḥ kimarthamanupālyate | tebhyo bhittvā'nyathāgantuṃ daurbalyaṃ te kuto nṛpa
हम धृतराष्ट्र की आज्ञा का पालन क्यों करते रहें? हे राजन्, उनसे नाता तोड़कर कहीं और चले जाने की यह दुर्बलता आपमें कहाँ से आ गई?
श्लोक 27 (1.158.27)
आपत्सु रक्षिताऽस्माकं विदुरोऽस्ति महामतिः । मध्यस्थ एव गाङ्गेयो राज्यभोगपराङ्मुखः ॥
āpatsu rakṣitā'smākaṃ viduro'sti mahāmatiḥ | madhyastha eva gāṅgeyo rājyabhogaparāṅmukhaḥ
संकट में हमारी रक्षा करने वाले महाबुद्धिमान विदुर हैं; गंगापुत्र भीष्म तटस्थ हैं और राज्य-भोग से विमुख हैं।
श्लोक 28 (1.158.28)
बाह्लीकप्रमुखा वृद्धा मध्यस्था एव सर्वदा । अस्मदीयो भवेद्द्रोणः फल्गुनप्रेमसंयुतः ॥
bāhlīkapramukhā vṛddhā madhyasthā eva sarvadā | asmadīyo bhaveddroṇaḥ phalgunapremasaṃyutaḥ
बाह्लीक आदि वृद्धजन सदा तटस्थ ही रहते हैं; और अर्जुन के प्रेम से बँधे द्रोण हमारे पक्ष में रहेंगे।
श्लोक 29 (1.158.29)
तस्मात्सहैव वस्तव्यं न गन्तव्यं कथं नृप । अथवास्मासु ते कुर्युः किमशक्ताः पराक्रमैः ॥
tasmātsahaiva vastavyaṃ na gantavyaṃ kathaṃ nṛpa | athavāsmāsu te kuryuḥ kimaśaktāḥ parākramaiḥ
इसलिए हमें उन्हीं के साथ रहना चाहिए; हे राजन्, हम क्यों जाएँ? और फिर वे हमारा क्या बिगाड़ लेंगे, जब पराक्रम में वे हमारे सामने असमर्थ हैं?
श्लोक 30 (1.158.30)
क्षुद्राः कपटिनो धूर्ता जाग्रत्सु मनुजेश्वर । किं न कुर्युः पुरा मह्यं किं न दत्तं महाविषम् ॥
kṣudrāḥ kapaṭino dhūrtā jāgratsu manujeśvara | kiṃ na kuryuḥ purā mahyaṃ kiṃ na dattaṃ mahāviṣam
हे नरेश्वर, वे क्षुद्र, कपटी और धूर्त हैं; हमारे जागते रहते भी वे क्या नहीं करेंगे? पहले उन्होंने मेरे साथ क्या नहीं किया? क्या मुझे भयंकर विष नहीं दिया गया?
श्लोक 31 (1.158.31)
आशीविषैर्महाघोरैः सर्पैस्तैः किं न दंशितः । प्रमाणकोट्यां संगृह्य निद्रापरवशे मयि ॥
āśīviṣairmahāghoraiḥ sarpaistaiḥ kiṃ na daṃśitaḥ | pramāṇakoṭyāṃ saṃgṛhya nidrāparavaśe mayi
जब मैं नींद के वश में था, तब क्या उन्होंने प्रमाणकोटि में मुझे बाँधकर भयंकर विषैले सर्पों से नहीं डसवाया?
श्लोक 32 (1.158.32)
सर्पैर्दृष्टिविषैर्घोरैर्गङ्गायां शूलसन्ततौ । किं तैर्न पातितो भूप तदा किं मृतवानहम् ॥
sarpairdṛṣṭiviṣairghorairgaṅgāyāṃ śūlasantatau | kiṃ tairna pātito bhūpa tadā kiṃ mṛtavānaham
हे भूपाल, क्या उन्होंने मुझे गंगा में, दृष्टि से ही विष फैलाने वाले भयानक सर्पों और नुकीले शूलों के बीच नहीं गिराया? क्या तब मैं मर गया?
श्लोक 33 (1.158.33)
आपत्सु तासु घोरासु दुष्प्रयुक्तासु पापिभिः । अस्मानरक्षद्यो देवो जगद्यस्य वशे स्थितम् ॥
āpatsu tāsu ghorāsu duṣprayuktāsu pāpibhiḥ | asmānarakṣadyo devo jagadyasya vaśe sthitam
पापियों द्वारा रचे गए उन भयंकर संकटों में जिस देव ने हमारी रक्षा की, जिसके वश में यह जगत् स्थित है,
श्लोक 34 (1.158.34)
चराचरात्मकं सोऽद्य यातः कुत्र नृपोत्तम । यावत्सोढव्यमस्माभिस्तावत्सोढास्मि यत्नतः ॥
carācarātmakaṃ so'dya yātaḥ kutra nṛpottama | yāvatsoḍhavyamasmābhistāvatsoḍhāsmi yatnataḥ
वह चराचर का आत्मा आज कहाँ चला गया, हे नृपश्रेष्ठ? जब तक हमें सहना है, तब तक मैं पूरे यत्न से सहता रहूँगा।
श्लोक 35 (1.158.35)
यदा न शक्ष्यतेऽस्माभिस्तदा पश्याम नो हितम् । किं द्रष्टव्यमिहास्माभिर्विगृह्य तरसा बलात् ॥
yadā na śakṣyate'smābhistadā paśyāma no hitam | kiṃ draṣṭavyamihāsmābhirvigṛhya tarasā balāt
जब सहा न जा सकेगा, तब हम अपना हित देखेंगे। तब हमें और क्या सोचना है— वेग और बल से युद्ध छेड़ देंगे।
श्लोक 36 (1.158.36)
सान्त्ववादेन दानेन भेदेनापि यतामहे । अर्धराज्यस्य संप्राप्त्यै ततो दण्डः प्रशस्यते ॥
sāntvavādena dānena bhedenāpi yatāmahe | ardharājyasya saṃprāptyai tato daṇḍaḥ praśasyate
आधा राज्य पाने के लिए हम साम, दान और भेद का भी प्रयत्न करेंगे; उसके बाद दण्ड ही उचित माना गया है।
श्लोक 37 (1.158.37)
तस्मात्सहैव वस्तव्यं तन्मनोर्पितशल्यवत् । दर्शयित्वा पृथक् क्वापि न गन्तव्यं सुभीतवत् ॥
tasmātsahaiva vastavyaṃ tanmanorpitaśalyavat | darśayitvā pṛthak kvāpi na gantavyaṃ subhītavat
इसलिए हमें उनके मन में चुभे काँटे की तरह उन्हीं के साथ रहना चाहिए। विरोध प्रकट करके डरपोकों की भाँति कहीं अलग नहीं जाना चाहिए।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 38 (1.158.38)
इह यत्तैर्निराकारैर्वस्तव्यमिति रोचये । अप्रमत्तैर्विचिन्वद्भिर्गतिमिष्टां ध्रुवामितः ॥
iha yattairnirākārairvastavyamiti rocaye | apramattairvicinvadbhirgatimiṣṭāṃ dhruvāmitaḥ
"मुझे यही ठीक लगता है कि हम सावधान रहकर और अपने मन का भाव प्रकट किए बिना यहीं रहें, और सजग रहते हुए यहाँ से निकलने का कोई निश्चित मार्ग खोजते रहें।
श्लोक 39 (1.158.39)
यदि विन्देत चाकारमस्माकं स पुरोचनः । क्षिप्रकारी ततो भूत्वा प्रसह्यापि दहेत्ततः ॥
yadi vindeta cākāramasmākaṃ sa purocanaḥ | kṣiprakārī tato bhūtvā prasahyāpi dahettataḥ
यदि पुरोचन ने हमारे चेहरे के भावों से हमारा आशय भाँप लिया, तो वह तुरन्त कार्रवाई करके बलपूर्वक भी आग लगा देगा।
श्लोक 40 (1.158.40)
नायं बिभेत्युपक्रोशादधर्माद्वा पुरोचनः । तथा हि वर्तते मन्दः सुयोधनवशे स्थितः ॥
nāyaṃ bibhetyupakrośādadharmādvā purocanaḥ | tathā hi vartate mandaḥ suyodhanavaśe sthitaḥ
यह पुरोचन न लोकनिन्दा से डरता है, न अधर्म से; क्योंकि यह मूर्ख दुर्योधन के वश में रहकर वैसा ही आचरण करता है।
श्लोक 41 (1.158.41)
अपि चायं प्रदग्धेषु भीष्मोऽस्मासु पितामहः । कोपं कुर्यात्किमर्थं वा कौरवान्कोपयेत सः ॥
api cāyaṃ pradagdheṣu bhīṣmo'smāsu pitāmahaḥ | kopaṃ kuryātkimarthaṃ vā kauravānkopayeta saḥ
और यदि हम जल भी गए, तो पितामह भीष्म क्रोध क्यों करेंगे, या कौरवों को क्रोधित क्यों करेंगे?
श्लोक 42 (1.158.42)
अथवापीह दग्धेषु भीष्मोऽस्माकं पितामहः । धर्म इत्येव कुप्येरन्ये चान्ये कुरुपुङ्गवाः ॥
athavāpīha dagdheṣu bhīṣmo'smākaṃ pitāmahaḥ | dharma ityeva kupyeranye cānye kurupuṅgavāḥ
अथवा यदि हम यहाँ जल गए, तो पितामह भीष्म और अन्य कुरुश्रेष्ठ केवल धर्म के नाते क्रोध करेंगे।
श्लोक 43 (1.158.43)
उपपन्नं तु दग्धेषु कुलवंशानुकीर्तिताः । कुप्येरन्यदि धर्मज्ञास्तथान्ये कुरुपुङ्गवाः ॥
upapannaṃ tu dagdheṣu kulavaṃśānukīrtitāḥ | kupyeranyadi dharmajñāstathānye kurupuṅgavāḥ
यदि हम जल गए, तो कुल और वंश के लिए प्रसिद्ध धर्मज्ञ लोग और अन्य कुरुश्रेष्ठ क्रोध करें, यह स्वाभाविक ही है।
श्लोक 44 (1.158.44)
वयं तु यदि दाहस्य बिभ्यतः प्रद्रवेमहि । स्पशैर्नो घातयेत्सर्वान्राज्यलुब्धः सुयोधनः ॥
vayaṃ tu yadi dāhasya bibhyataḥ pradravemahi | spaśairno ghātayetsarvānrājyalubdhaḥ suyodhanaḥ
किन्तु यदि हम आग से डरकर भाग खड़े हुए, तो राज्य का लोभी दुर्योधन अपने गुप्तचरों से हम सबको मरवा डालेगा।
श्लोक 45 (1.158.45)
अपदस्थान्पदे तिष्ठन्नपक्षान्पक्षसंस्थितः । हीनकोशान्महाकोशः प्रयोगैर्घातयेद्ध्रुवम् ॥
apadasthānpade tiṣṭhannapakṣānpakṣasaṃsthitaḥ | hīnakośānmahākośaḥ prayogairghātayeddhruvam
वह पद पर है, हम पदहीन हैं; उसके पास पक्ष है, हमारा कोई सहायक नहीं; उसका कोष भरा है, हमारा खाली है— वह अपने उपायों से निश्चय ही हमें मरवा देगा।
श्लोक 46 (1.158.46)
तदस्माभिरिमं पापं तं च पापं सुयोधनम् । वञ्चयद्भिर्निवस्तव्यं छन्नं वीर क्वचित्क्वचित् ॥
tadasmābhirimaṃ pāpaṃ taṃ ca pāpaṃ suyodhanam | vañcayadbhirnivastavyaṃ channaṃ vīra kvacitkvacit
इसलिए, हे वीर, हमें इस पापी को और उस पापी दुर्योधन को भी धोखे में रखकर कभी यहाँ, कभी वहाँ छिपकर रहना होगा।
श्लोक 47 (1.158.47)
ते वयं मृगयाशीलाश्चराम वसुधामिमाम् । तथा नो विदिता मार्गा भविष्यन्ति पलायतां ॥
te vayaṃ mṛgayāśīlāścarāma vasudhāmimām | tathā no viditā mārgā bhaviṣyanti palāyatāṃ
हम शिकार के शौकीन बनकर इस भूमि पर घूमते रहें; इस तरह भागते समय हमें रास्ते मालूम रहेंगे।
श्लोक 48 (1.158.48)
भौमं च बिलमद्यैव करवाम सुसंवृतम् । गूढोद्गतान्न नस्तत्र हुताशः संप्रधक्ष्यति ॥
bhaumaṃ ca bilamadyaiva karavāma susaṃvṛtam | gūḍhodgatānna nastatra hutāśaḥ saṃpradhakṣyati
और आज ही धरती में एक भली-भाँति ढका हुआ बिल बनाएँ; उसमें छिपकर और उसी से निकलकर हम आग से नहीं जलेंगे।
श्लोक 49 (1.158.49)
द्रवतोऽत्र यथा चास्मान्न बुध्येत पुरोचनः । पौरो वापि जनः कश्चित्तथा कार्यमतन्द्रितैः ॥
dravato'tra yathā cāsmānna budhyeta purocanaḥ | pauro vāpi janaḥ kaścittathā kāryamatandritaiḥ
हमें बिना आलस्य के ऐसा उपाय करना चाहिए कि उस बिल से भागते हुए हमें न पुरोचन जान पाए, न कोई नगरवासी।"