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आदि पर्व · अध्याय 159

विदुर का खनक और गुप्त सुरंग

विदुर का भेजा हुआ एक कुशल खनक, जो उनका मित्र है, गुप्त रूप से पाण्डवों के पास आता है। वह विदुर द्वारा युधिष्ठिर से म्लेच्छ भाषा में कही गई बात याद दिलाकर अपना विश्वास दिलाता है और बताता है कि कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात पुरोचन उनके भवन के द्वार पर आग लगाएगा। युधिष्ठिर उसे विदुर का विश्वस्त मानकर बचाने की प्रार्थना करते हैं। खाई साफ़ करने के बहाने खनक एक बड़ी सुरंग खोदता है, जिसका किवाड़दार, छिपा हुआ मुँह भवन के बीच में है। पाण्डव रात को शस्त्र लेकर वहीं सोते हैं और दिन में शिकार करते हैं; विश्वास और सन्तोष का दिखावा करके वे पुरोचन को छलते हैं, और खनक के सिवा नगर में किसी को इसका पता नहीं चलता।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.159.1)

विदुरस्य सुहृत्कश्चित्खनकः कुशलः क्वचित् । विविक्ते पाण्डवान्राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥

vidurasya suhṛtkaścitkhanakaḥ kuśalaḥ kvacit | vivikte pāṇḍavānrājannidaṃ vacanamabravīt

हे राजन्! विदुर का एक मित्र, जो कुशल खनक (भूमि खोदने वाला) था, कहीं से आया और एकान्त में पाण्डवों से यह बोला—

खनक उवाच

श्लोक 2 (1.159.2)

प्रहितो विदुरेणास्मि खनकः कुशलो ह्यहम् । पाण्डवानां प्रियं कार्यमिति किं करवाणि वः ॥

prahito vidureṇāsmi khanakaḥ kuśalo hyaham | pāṇḍavānāṃ priyaṃ kāryamiti kiṃ karavāṇi vaḥ

"मुझे विदुर ने भेजा है; मैं कुशल खनक हूँ। उन्होंने कहा है कि पाण्डवों का प्रिय कार्य करना— अतः बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ?

श्लोक 3 (1.159.3)

प्रच्छन्नं विदुरेणोक्तं प्रियं यन्म्लेच्छभाषया । त्वया च तत्तथेत्युक्तमेतद्विश्वासकारणम् ॥

pracchannaṃ vidureṇoktaṃ priyaṃ yanmlecchabhāṣayā | tvayā ca tattathetyuktametadviśvāsakāraṇam

विदुर ने आपसे म्लेच्छ भाषा में गुप्त रूप से जो हितकर बात कही थी, और उत्तर में आपने 'ऐसा ही हो' कहा था— यही मेरे विश्वास का प्रमाण है।

श्लोक 4 (1.159.4)

कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रावस्यां पुरोचनः । भवनस्य तव द्वारि प्रदास्यति हुताशनम् ॥

kṛṣṇapakṣe caturdaśyāṃ rātrāvasyāṃ purocanaḥ | bhavanasya tava dvāri pradāsyati hutāśanam

कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात को पुरोचन आपके भवन के द्वार पर आग लगा देगा।

श्लोक 5 (1.159.5)

मात्रा सह प्रदग्धव्याः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः । इति व्यवसितं तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥

mātrā saha pradagdhavyāḥ pāṇḍavāḥ puruṣarṣabhāḥ | iti vyavasitaṃ tasya dhārtarāṣṭrasya durmateḥ

'पुरुषश्रेष्ठ पाण्डवों को उनकी माता सहित जला देना है'— उस दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र का यही निश्चय है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 6 (1.159.6)

उवाच तं सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अभिजानामि सौम्य त्वां सुहृदं विदुरस्य वै ॥

uvāca taṃ satyadhṛtiḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | abhijānāmi saumya tvāṃ suhṛdaṃ vidurasya vai

सत्य में दृढ़ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने उससे कहा— "हे सौम्य, मैं तुम्हें विदुर का मित्र जानता हूँ,

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 7 (1.159.7)

शुचिमाप्तं प्रियं चैव सदा च दृढभक्तिकम् । न विद्यते कवेः किंचिदविज्ञातं प्रयोजनम् ॥

śucimāptaṃ priyaṃ caiva sadā ca dṛḍhabhaktikam | na vidyate kaveḥ kiṃcidavijñātaṃ prayojanam

पवित्र, विश्वसनीय, उनका प्रिय और सदा दृढ़ निष्ठा वाला। उन ज्ञानी विदुर का कोई प्रयोजन तुमसे छिपा नहीं है।

श्लोक 8 (1.159.8)

यथा तस्य तथा नस्त्वं निर्विशेषा वयं त्वयि । भवतश्च यथा तस्य पालयास्मान्यथा कविः ॥

yathā tasya tathā nastvaṃ nirviśeṣā vayaṃ tvayi | bhavataśca yathā tasya pālayāsmānyathā kaviḥ

जैसे तुम उनके हो, वैसे ही हमारे भी हो; हम तुममें और उनमें कोई भेद नहीं करते। जैसे हम उनके हैं, वैसे ही तुम्हारे भी हैं। ज्ञानी विदुर की भाँति तुम हमारी रक्षा करो।

श्लोक 9 (1.159.9)

इदं शरणमाग्नेयं मदर्थमिति मे मतिः । पुरोचनेन विहितं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ॥

idaṃ śaraṇamāgneyaṃ madarthamiti me matiḥ | purocanena vihitaṃ dhārtarāṣṭrasya śāsanāt

मेरा विचार है कि यह घर मुझे जलाने के लिए ही आग पकड़ने वाली सामग्री से बनाया गया है; पुरोचन ने दुर्योधन की आज्ञा से इसे बनवाया है।

श्लोक 10 (1.159.10)

स पापः कोशवांश्चैव ससहायश्च दुर्मतिः । अस्मानपि च पापात्मा नित्यकालं प्रबाधते ॥

sa pāpaḥ kośavāṃścaiva sasahāyaśca durmatiḥ | asmānapi ca pāpātmā nityakālaṃ prabādhate

उस पापी, दुर्बुद्धि के पास धन भी है और सहायक भी, और वह दुष्टात्मा हमें सदा सताता रहता है।

श्लोक 11 (1.159.11)

स भवान्मोक्षयत्वस्मान्यत्नेनास्माद्धुताशनात् । अस्मास्विह हि दग्धेषु सकामः स्यात्सुयोधनः ॥

sa bhavānmokṣayatvasmānyatnenāsmāddhutāśanāt | asmāsviha hi dagdheṣu sakāmaḥ syātsuyodhanaḥ

अतः तुम पूरे यत्न से हमें इस आग से बचाओ; क्योंकि यदि हम यहाँ जल गए तो दुर्योधन की कामना पूरी हो जाएगी।

श्लोक 12 (1.159.12)

समृद्धमायुधागारमिदं तस्य दुरात्मनः । वप्रान्तं निष्प्रतीकारमाश्रित्येदं कृतं महत् ॥

samṛddhamāyudhāgāramidaṃ tasya durātmanaḥ | vaprāntaṃ niṣpratīkāramāśrityedaṃ kṛtaṃ mahat

यहाँ उस दुरात्मा का भरा-पूरा शस्त्रागार है। यह विशाल भवन परकोटे से सटाकर बनाया गया है, जिससे बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं।

श्लोक 13 (1.159.13)

इदं तदशुभं नूनं तस्य कर्म चिकीर्षितम् । प्रागेव विदुरो वेद तेनास्मानन्वबोधयत् ॥

idaṃ tadaśubhaṃ nūnaṃ tasya karma cikīrṣitam | prāgeva viduro veda tenāsmānanvabodhayat

निश्चय ही यही वह अशुभ कर्म है जो वह करना चाहता था। विदुर इसे पहले से जानते थे, इसीलिए उन्होंने हमें सचेत किया।

श्लोक 14 (1.159.14)

सेयमापदनुप्राप्ता क्षत्ता यां दृष्टवान्पुरा । पुरोचनस्याविदितानस्मांस्त्वं प्रतिमोचय ॥

seyamāpadanuprāptā kṣattā yāṃ dṛṣṭavānpurā | purocanasyāviditānasmāṃstvaṃ pratimocaya

वही संकट अब आ पहुँचा है जिसे विदुर ने बहुत पहले देख लिया था। पुरोचन को पता चले बिना तुम हमें इससे छुड़ाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (1.159.15)

स तथेति प्रतिश्रुत्य खनको यत्नमास्थितः । परिखामुत्किरन्नाम चकार च महाबिलम् ॥

sa tatheti pratiśrutya khanako yatnamāsthitaḥ | parikhāmutkirannāma cakāra ca mahābilam

"ऐसा ही होगा"— यह वचन देकर खनक काम में जुट गया। खाई की सफ़ाई के बहाने मिट्टी निकालते हुए उसने एक बड़ी सुरंग बना दी।

श्लोक 16 (1.159.16)

चक्रे च वेश्मनस्तस्य मध्ये नातिमहद्बिलम् । कपाटयुक्तमज्ञातं समं भूम्याश्च भारत ॥

cakre ca veśmanastasya madhye nātimahadbilam | kapāṭayuktamajñātaṃ samaṃ bhūmyāśca bhārata

हे भारत! भवन के बीचोंबीच उसने एक बहुत बड़ा नहीं, किवाड़ लगा हुआ, भूमि के बराबर समतल और किसी को न दिखने वाला बिल बनाया।

श्लोक 17 (1.159.17)

पुरोचनभयादेव व्यदधात्संवृतं मुखम् । स तस्य तु गृहद्वारि वसत्यशुभधीः सदा । तत्र ते सायुधाः सर्वे वसन्ति स्म क्षपां नृप ॥

purocanabhayādeva vyadadhātsaṃvṛtaṃ mukham | sa tasya tu gṛhadvāri vasatyaśubhadhīḥ sadā | tatra te sāyudhāḥ sarve vasanti sma kṣapāṃ nṛpa

पुरोचन के डर से उसने उसका मुँह ढककर रखा, क्योंकि वह दुर्बुद्धि सदा उस घर के द्वार पर ही रहता था। हे राजन्! वहाँ सब पाण्डव रात को शस्त्र लिए हुए रहते थे।

श्लोक 18 (1.159.18)

दिवा चरन्ति मृगयां पाण्डवेया वनाद्वनम् । विश्वस्तवदविश्वस्ता वञ्चयन्तः पुरोचनम् ॥

divā caranti mṛgayāṃ pāṇḍaveyā vanādvanam | viśvastavadaviśvastā vañcayantaḥ purocanam

दिन में पाण्डव एक वन से दूसरे वन में शिकार खेलते फिरते; भीतर से अविश्वासी होकर भी विश्वस्त-से दिखते हुए वे पुरोचन को छलते रहे।

श्लोक 19 (1.159.19)

अतुष्टास्तुष्टवद्राजन्नूषुः परमविस्मिताः ॥

atuṣṭāstuṣṭavadrājannūṣuḥ paramavismitāḥ

हे राजन्! भीतर से असन्तुष्ट होते हुए भी सन्तुष्ट-से दिखते हुए वे अत्यन्त विस्मय में वहाँ रहते रहे।

श्लोक 20 (1.159.20)

न चैनानन्वबुध्यन्त नरा नगरवासिनः । अन्यत्र विदुरामात्यात्तस्मात्खनकसत्तमात् ॥

na cainānanvabudhyanta narā nagaravāsinaḥ | anyatra vidurāmātyāttasmātkhanakasattamāt

विदुर के उस विश्वस्त सहायक, श्रेष्ठ खनक को छोड़कर नगर के किसी भी व्यक्ति को उनकी इस योजना का पता नहीं चला।

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