आदि पर्व · अध्याय 162
कौरवों द्वारा पाण्डवों का शोक
प्रातःकाल वारणावत के लोग लाक्षागृह को राख हुआ पाते हैं, जिसमें पुरोचन तथा एक निषाद-स्त्री और उसके पाँच पुत्र जले पड़े हैं, और समझते हैं कि पाण्डव और कुन्ती मर गए; वे दुर्योधन को दोषी ठहराकर धृतराष्ट्र को समाचार भेजते हैं। मन में प्रसन्न पर ऊपर से शोकाकुल राजा अन्त्येष्टि का आदेश देते हैं और कौरव गंगा पर जलांजलि देने जाते हैं। भीष्म देर तक विलाप करते हैं, तब विदुर चुपके से उन्हें बताते हैं कि उन्होंने सुरंग से पाण्डवों को निकाल दिया था और वे जीवित हैं। भीष्म मन ही मन हर्षित होते हैं, जबकि नगर में लोग इसी संशय में रहते हैं कि वे जीवित हैं या नहीं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.162.1)
अथ रात्र्यां व्यतीतायामशेषो नागरो जनः । तत्राजगाम त्वरितो दिदृक्षुः पाण्डुनन्दनान् ॥
atha rātryāṃ vyatītāyāmaśeṣo nāgaro janaḥ | tatrājagāma tvarito didṛkṣuḥ pāṇḍunandanān
जब रात बीत गई, तब नगर के सारे लोग पाण्डु के पुत्रों को देखने की उत्सुकता से उतावले होकर वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 2 (1.162.2)
निर्वापयन्तो ज्वलनं ते जना ददृशुस्ततः । जातुषं तद्गृहं दग्धममात्यं च पुरोचनम् ॥
nirvāpayanto jvalanaṃ te janā dadṛśustataḥ | jātuṣaṃ tadgṛhaṃ dagdhamamātyaṃ ca purocanam
आग बुझाते हुए उन लोगों ने देखा कि लाख का वह घर जलकर नष्ट हो गया है, और उसके साथ मन्त्री पुरोचन भी जल गया है।
श्लोक 3 (1.162.3)
नूनं दुर्योधनेनेदं विहितं पापकर्मणा । पाण्डवानां विनाशायेत्येवं ते चुक्रुशुर्जनाः ॥
nūnaṃ duryodhanenedaṃ vihitaṃ pāpakarmaṇā | pāṇḍavānāṃ vināśāyetyevaṃ te cukruśurjanāḥ
"निश्चय ही पापी दुर्योधन ने यह पाण्डवों के विनाश के लिए रचा था!" — ऐसा कहकर लोग ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे।
श्लोक 4 (1.162.4)
विदिते धृतराष्ट्रस्य धार्तराष्ट्रो न संशयः । दग्धवान्पाण्डुदायादान्न ह्येतत्प्रतिषिद्धवान् ॥
vidite dhṛtarāṣṭrasya dhārtarāṣṭro na saṃśayaḥ | dagdhavānpāṇḍudāyādānna hyetatpratiṣiddhavān
"इसमें कोई संदेह नहीं कि धृतराष्ट्र की जानकारी में ही उनके पुत्र ने पाण्डु के उत्तराधिकारियों को जला डाला, क्योंकि उन्होंने उसे रोका नहीं।
श्लोक 5 (1.162.5)
नूनं शान्तनवोऽपीह न धर्ममनुवर्तते । द्रोणश्च विदुरश्चैव कृपश्चान्ये च कौरवाः ॥
nūnaṃ śāntanavo'pīha na dharmamanuvartate | droṇaśca viduraścaiva kṛpaścānye ca kauravāḥ
निश्चय ही यहाँ शान्तनु के पुत्र भी धर्म का पालन नहीं करते, और न द्रोण, न विदुर, न कृप और न अन्य कौरव ही।
श्लोक 6 (1.162.6)
नावेक्षन्ते ह तं धर्मं धर्मात्मानोऽप्यहो विधेः । श्रुतवन्तोऽपि विद्वांसो धनवद्वशगा अहो ॥
nāvekṣante ha taṃ dharmaṃ dharmātmāno'pyaho vidheḥ | śrutavanto'pi vidvāṃso dhanavadvaśagā aho
हाय रे विधाता! धर्मात्मा होकर भी वे उस धर्म की ओर नहीं देखते। हाय, शास्त्रज्ञ और विद्वान होकर भी वे धनवानों के वश में हैं।
श्लोक 7 (1.162.7)
साधूननाथान्धर्मिष्ठान्सत्यव्रतपरायणान् । नावेक्षन्ते महान्तोऽपि दैवं तेषां परायणम् ॥
sādhūnanāthāndharmiṣṭhānsatyavrataparāyaṇān | nāvekṣante mahānto'pi daivaṃ teṣāṃ parāyaṇam
जो सज्जन, अनाथ, परम धर्मनिष्ठ और सत्यव्रत में तत्पर हैं, उनकी ओर बड़े लोग भी ध्यान नहीं देते; उनका सहारा केवल दैव है।
श्लोक 8 (1.162.8)
ते वयं धृतराष्ट्राय प्रेषयामो दुरात्मने । संवृत्तस्ते परः कामः पाण्डवान्दग्धवानसि ॥
te vayaṃ dhṛtarāṣṭrāya preṣayāmo durātmane | saṃvṛttaste paraḥ kāmaḥ pāṇḍavāndagdhavānasi
हम दुष्टात्मा धृतराष्ट्र को संदेश भेजेंगे — 'तुम्हारी सबसे बड़ी कामना पूरी हुई; तुमने पाण्डवों को जला डाला।'"
श्लोक 9 (1.162.9)
ततो व्यपोहमानास्ते पाण्डवार्थे हुताशनम् । निषादीं ददृशुर्दग्धां पञ्चपुत्रामनागसम् ॥
tato vyapohamānāste pāṇḍavārthe hutāśanam | niṣādīṃ dadṛśurdagdhāṃ pañcaputrāmanāgasam
फिर पाण्डवों को खोजते हुए जब वे आग हटा रहे थे, तब उन्होंने उस निर्दोष निषाद-स्त्री को उसके पाँच पुत्रों सहित जली हुई देखा।
श्लोक 10 (1.162.10)
इतः पश्यत कुन्तीयं दग्धा शेते तपस्विनी । पुत्रैः सहैव वार्ष्णेयी हन्तेत्याहुः स्म नागराः ॥
itaḥ paśyata kuntīyaṃ dagdhā śete tapasvinī | putraiḥ sahaiva vārṣṇeyī hantetyāhuḥ sma nāgarāḥ
"इधर देखो! यह तपस्विनी वृष्णिकुल की कुन्ती अपने पुत्रों के साथ जली पड़ी है। हाय!" — नगरवासियों ने कहा।
श्लोक 11 (1.162.11)
खनकेन तु तेनैव वेश्म शोधयता बिलम् । पांसुभिः पिहितं तच्च पुरुषैस्तैर्न लक्षितम् ॥
khanakena tu tenaiva veśma śodhayatā bilam | pāṃsubhiḥ pihitaṃ tacca puruṣaistairna lakṣitam
किन्तु उसी खनक ने घर की सफ़ाई करते समय जिस सुरंग को मिट्टी से ढक दिया था, उस पर उन लोगों की दृष्टि नहीं पड़ी।
श्लोक 12 (1.162.12)
ततस्ते प्रेषयामासुर्धृतराष्ट्राय नागराः । पाण्डवानग्निना दग्धानमात्यं च पुरोचनम् ॥
tataste preṣayāmāsurdhṛtarāṣṭrāya nāgarāḥ | pāṇḍavānagninā dagdhānamātyaṃ ca purocanam
तब नगरवासियों ने धृतराष्ट्र के पास यह समाचार भेजा कि पाण्डव आग में जल गए हैं और मन्त्री पुरोचन भी।
श्लोक 13 (1.162.13)
श्रुत्वा तु धृतराष्ट्रस्तद्राजा सुमहदप्रियम् । विनाशं पाण्डुपुत्राणां विललाप सुदुःखितः ॥
śrutvā tu dhṛtarāṣṭrastadrājā sumahadapriyam | vināśaṃ pāṇḍuputrāṇāṃ vilalāpa suduḥkhitaḥ
पाण्डु के पुत्रों के विनाश का वह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर राजा धृतराष्ट्र बड़े दुःख के साथ विलाप करने लगे।
श्लोक 14 (1.162.14)
अन्तर्हृष्टमनाश्चासौ बहिर्दुःखसमन्वितः । अन्तःशीतो बहिश्चोष्णो ग्रीष्मेऽगाधह्रदो यथा ॥
antarhṛṣṭamanāścāsau bahirduḥkhasamanvitaḥ | antaḥśīto bahiścoṣṇo grīṣme'gādhahrado yathā
भीतर से उनका मन प्रसन्न था, पर बाहर से वे दुःख में डूबे दिखते थे — जैसे ग्रीष्म ऋतु में गहरा सरोवर भीतर से शीतल और ऊपर से गर्म होता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 15 (1.162.15)
अद्य पाण्डुर्मृतो राजा मम भ्राता महायशाः । तेषु वीरेषु दग्धेषु मात्रा सह विशेषतः ॥
adya pāṇḍurmṛto rājā mama bhrātā mahāyaśāḥ | teṣu vīreṣu dagdheṣu mātrā saha viśeṣataḥ
"आज मेरे महायशस्वी भाई राजा पाण्डु की मृत्यु हुई है, क्योंकि वे वीर जल गए हैं — और सबसे बढ़कर, अपनी माता के साथ।
श्लोक 16 (1.162.16)
गच्छन्तु पुरुषाः शीघ्रं नगरं वारणावतम् । सत्कारयन्तु तान्वीरान्कुन्तीं राजसुतां च ताम् ॥
gacchantu puruṣāḥ śīghraṃ nagaraṃ vāraṇāvatam | satkārayantu tānvīrānkuntīṃ rājasutāṃ ca tām
लोग शीघ्र वारणावत नगर जाएँ और उन वीरों का तथा राजकुमारी कुन्ती का सम्मानपूर्वक अन्त्य-संस्कार करें।
श्लोक 17 (1.162.17)
ये च तत्र मृतास्तेषां सुहृदः सन्ति तानपि । कारयन्तु च कुल्यानि शुभ्राणि च बृहन्ति च ॥
ye ca tatra mṛtāsteṣāṃ suhṛdaḥ santi tānapi | kārayantu ca kulyāni śubhrāṇi ca bṛhanti ca
वहाँ जो मरे हैं, उनके लिए और उनके जो सुहृद् हैं उनके लिए भी, उनकी अस्थियों पर उज्ज्वल और विशाल स्मारक बनवाए जाएँ।
श्लोक 18 (1.162.18)
मम दग्धा महात्मानः कुलवंशविवर्धनाः ॥
mama dagdhā mahātmānaḥ kulavaṃśavivardhanāḥ
मेरे वे महात्मा, जो हमारे कुल और वंश को बढ़ाने वाले थे, जलकर मर गए।
श्लोक 19 (1.162.19)
एवं गते मया शक्यं यद्यत्कारयितुं हितम् । पाण्डवानां च कुन्त्याश्च तत्सर्वं क्रियतां धनैः ॥
evaṃ gate mayā śakyaṃ yadyatkārayituṃ hitam | pāṇḍavānāṃ ca kuntyāśca tatsarvaṃ kriyatāṃ dhanaiḥ
अब जब ऐसा हो ही गया है, तो पाण्डवों और कुन्ती के हित में जो कुछ मैं करवा सकता हूँ, वह सब धन लगाकर किया जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (1.162.20)
समेताश्च ततः सर्वे भीष्मेण सह कौरवाः । धृतराष्ट्रः सपुत्रश्च गङ्गामभिमुखा ययुः ॥
sametāśca tataḥ sarve bhīṣmeṇa saha kauravāḥ | dhṛtarāṣṭraḥ saputraśca gaṅgāmabhimukhā yayuḥ
तब सब कौरव भीष्म के साथ एकत्र हुए, और पुत्रों सहित धृतराष्ट्र भी; वे सब गंगा की ओर चले,
श्लोक 21 (1.162.21)
एकवस्त्रा निरानन्दा निराभरणवेष्टनाः । उदकं कर्तुकामा वै पाण्डवानां महात्मनाम् ॥
ekavastrā nirānandā nirābharaṇaveṣṭanāḥ | udakaṃ kartukāmā vai pāṇḍavānāṃ mahātmanām
एक-एक वस्त्र पहने, आनन्दहीन, आभूषणों और पगड़ियों को त्यागकर — महात्मा पाण्डवों को जलांजलि देने की इच्छा से।
श्लोक 22 (1.162.22)
एवं गत्वा ततश्चक्रे ज्ञातिभिः परिवारितः । उदकं पाण्डुपुत्राणां धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥
evaṃ gatvā tataścakre jñātibhiḥ parivāritaḥ | udakaṃ pāṇḍuputrāṇāṃ dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ
वहाँ जाकर अपने बन्धु-बान्धवों से घिरे अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र ने पाण्डु के पुत्रों को जलांजलि दी।
श्लोक 23 (1.162.23)
रुरुदुः सहिताः सर्वे भृशं शोकपरायणाः । हा युधिष्ठिर कौरव्य हा भीम इति चापरे ॥
ruruduḥ sahitāḥ sarve bhṛśaṃ śokaparāyaṇāḥ | hā yudhiṣṭhira kauravya hā bhīma iti cāpare
सब एक साथ शोक में डूबकर फूट-फूटकर रोने लगे। कोई पुकारता — "हा कुरुनन्दन युधिष्ठिर!" तो कोई — "हा भीम!"
श्लोक 24 (1.162.24)
हा फल्गुनेति चाप्यन्ये हा यमाविति चापरे । कुन्तीमार्ताश्च शोचन्त उदकं चक्रिरे जनाः ॥
hā phalguneti cāpyanye hā yamāviti cāpare | kuntīmārtāśca śocanta udakaṃ cakrire janāḥ
कोई "हा फाल्गुन!" कहता, तो कोई "हा नकुल-सहदेव!" और कुन्ती के लिए भी व्याकुल होकर शोक करते हुए लोगों ने जलांजलि दी।
श्लोक 25 (1.162.25)
अन्ये पौरजनाश्चैवमन्वशोचन्त पाण्डवान् । विदुरस्त्वल्पशश्चक्रे शोकं वेद परं हि सः ॥
anye paurajanāścaivamanvaśocanta pāṇḍavān | vidurastvalpaśaścakre śokaṃ veda paraṃ hi saḥ
अन्य पुरवासी भी इसी प्रकार पाण्डवों के लिए शोक करते रहे। पर विदुर ने थोड़ा ही शोक किया, क्योंकि वे वास्तविक बात जानते थे।
श्लोक 26 (1.162.26)
विदुरो धृतराष्ट्रस्य जानन्सर्वं मनोगतम् । तेनायं विधिना सृष्टः कुटिलः कपटाशयः ॥
viduro dhṛtarāṣṭrasya jānansarvaṃ manogatam | tenāyaṃ vidhinā sṛṣṭaḥ kuṭilaḥ kapaṭāśayaḥ
धृतराष्ट्र के मन की सारी बात जानने वाले विदुर ने सोचा — "विधाता ने इस व्यक्ति को कुटिल और कपटी हृदय वाला ही रचा है।"
श्लोक 27 (1.162.27)
इत्येवं चिन्तयन्राजन्विदुरो विदुषां वरः । लोकानां दर्शयन्दुःखं दुःखितैः सह बान्धवैः ॥
ityevaṃ cintayanrājanviduro viduṣāṃ varaḥ | lokānāṃ darśayanduḥkhaṃ duḥkhitaiḥ saha bāndhavaiḥ
हे राजन्, ऐसा सोचते हुए विद्वानों में श्रेष्ठ विदुर दुःखी बन्धुओं के साथ लोगों के सामने दुःख प्रकट करते रहे;
श्लोक 28 (1.162.28)
मनसाऽचिन्तयत्पार्थान्कियद्दूरं गता इति । सहिताः पाण्डवाः पुत्रा इति चिन्तापरोऽभवत् ॥
manasā'cintayatpārthānkiyaddūraṃ gatā iti | sahitāḥ pāṇḍavāḥ putrā iti cintāparo'bhavat
पर मन ही मन वे पार्थों के बारे में सोचते रहे — "वे कितनी दूर पहुँचे होंगे? क्या पाण्डु के पुत्र साथ-साथ हैं?" — इसी चिन्ता में वे डूबे रहे।
श्लोक 29 (1.162.29)
ततः प्रव्यथितो भीष्मः पाण्डुराजसुतान्मृतान् । सह मात्रेति तच्छ्रुत्वा विललाप रुरोद च ॥
tataḥ pravyathito bhīṣmaḥ pāṇḍurājasutānmṛtān | saha mātreti tacchrutvā vilalāpa ruroda ca
तब यह सुनकर कि राजा पाण्डु के पुत्र अपनी माता के साथ मर गए हैं, भीष्म अत्यन्त व्यथित होकर विलाप करने और रोने लगे।
भीष्म उवाच
श्लोक 30 (1.162.30)
हा युधिष्ठिर हा भीम हा धनञ्जय हा यमौ । हा पृथे सह पुत्रैस्त्वमेकरात्रेण स्वर्गता ॥
hā yudhiṣṭhira hā bhīma hā dhanañjaya hā yamau | hā pṛthe saha putraistvamekarātreṇa svargatā
"हा युधिष्ठिर! हा भीम! हा धनंजय! हा नकुल-सहदेव! हा पृथा, तुम एक ही रात में अपने पुत्रों के साथ स्वर्ग चली गईं!
श्लोक 31 (1.162.31)
मात्रा सह कुमारास्ते सर्वे तत्रैव संस्थिताः । न हि तौ नोत्सहेयातां भीमसेनधनञ्जयौ ॥
mātrā saha kumārāste sarve tatraiva saṃsthitāḥ | na hi tau notsaheyātāṃ bhīmasenadhanañjayau
वे सब कुमार अपनी माता के साथ वहीं समाप्त हो गए! पर भीमसेन और धनंजय तो ऐसे थे कि वे निश्चय ही
श्लोक 32 (1.162.32)
तरसा वेगितात्मानौ निर्भेत्तुमपि मन्दरम् । परासुत्वं न पश्यामि पृथायाः सह पाण्डवैः ॥
tarasā vegitātmānau nirbhettumapi mandaram | parāsutvaṃ na paśyāmi pṛthāyāḥ saha pāṇḍavaiḥ
अपने वेग और प्रचण्ड बल से मन्दराचल को भी तोड़ सकते थे। पाण्डवों के साथ पृथा का प्राणहीन होना मेरी समझ में नहीं आता।
श्लोक 33 (1.162.33)
सर्वथा विकृतं तत्तु यदि ते निधनं गताः । धर्मराजः स निर्दिष्टो ननु विप्रैर्युधिष्ठिरः ॥
sarvathā vikṛtaṃ tattu yadi te nidhanaṃ gatāḥ | dharmarājaḥ sa nirdiṣṭo nanu viprairyudhiṣṭhiraḥ
यदि वे सचमुच मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं तो सब कुछ उलट गया है। क्या ब्राह्मणों ने युधिष्ठिर को धर्मराज नहीं बताया था?
श्लोक 34 (1.162.34)
पृथिव्यां च रथिश्रेष्ठो भविता स धनञ्जयः । सत्यव्रतो धर्मदत्तः सत्यवाक्छुभलक्षणः ॥
pṛthivyāṃ ca rathiśreṣṭho bhavitā sa dhanañjayaḥ | satyavrato dharmadattaḥ satyavākchubhalakṣaṇaḥ
और धनंजय को पृथ्वी पर रथियों में श्रेष्ठ होना था। सत्यव्रती, धर्म के दिए हुए, सत्यवादी और शुभ लक्षणों वाले —
श्लोक 35 (1.162.35)
कथं कालवशं प्राप्तः पाण्डवेयो युधिष्ठिरः । आत्मानमुपमां कृत्वा परेषां वर्तते तु यः ॥
kathaṃ kālavaśaṃ prāptaḥ pāṇḍaveyo yudhiṣṭhiraḥ | ātmānamupamāṃ kṛtvā pareṣāṃ vartate tu yaḥ
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर काल के वश में कैसे हो गए — वे, जो दूसरों के साथ अपने ही समान व्यवहार करते हैं?
श्लोक 36 (1.162.36)
मात्रा सहैव कौरव्यः कथं कालवशं गतः । पालितः सुचिरं कालं फलकाले यथा द्रुमः ॥
mātrā sahaiva kauravyaḥ kathaṃ kālavaśaṃ gataḥ | pālitaḥ suciraṃ kālaṃ phalakāle yathā drumaḥ
वह कुरुवंशी अपनी माता के साथ काल के वश में कैसे चला गया? जैसे लम्बे समय तक पाला-पोसा गया वृक्ष फल आने के समय
श्लोक 37 (1.162.37)
भग्नः स्याद्वायुवेगेन तथा राजा युधिष्ठिरः । यौवराज्येऽभिषिक्तेन पितुर्येनाहृतं यशः ॥
bhagnaḥ syādvāyuvegena tathā rājā yudhiṣṭhiraḥ | yauvarājye'bhiṣiktena pituryenāhṛtaṃ yaśaḥ
आँधी के वेग से टूट जाए, वैसे ही राजा युधिष्ठिर टूट गए — वे, जिन्होंने युवराज-पद पर अभिषिक्त होकर अपने पिता का
श्लोक 38 (1.162.38)
आत्मनश्च पितुश्चैव सत्यधर्मप्रवृत्तिभिः । यच्च सा वनवासेन तन्माता दुःखभागिनी ॥
ātmanaśca pituścaiva satyadharmapravṛttibhiḥ | yacca sā vanavāsena tanmātā duḥkhabhāginī
और सत्य तथा धर्म के आचरण से अपना भी यश बढ़ाया; और जैसे वनवास में उनकी माता उनके दुःख में भागीदार रहीं,
श्लोक 39 (1.162.39)
कालेन सह संमग्नो धिक्कृतान्तमनर्थकम् । यच्च सा वनवासेन तन्माता दुःखभागिनी ॥
kālena saha saṃmagno dhikkṛtāntamanarthakam | yacca sā vanavāsena tanmātā duḥkhabhāginī
वैसे ही वे काल के साथ डूब गए। धिक्कार है इस निरर्थक विधाता को! और जैसे वनवास में उनकी माता उनके दुःख में भागीदार रहीं,
श्लोक 40 (1.162.40)
पुत्रगृध्नुतया कुन्ती न भर्तारं मृतात्वनु । अल्पकालं कुले जाता भर्तुः प्रीतिमवाप या ॥
putragṛdhnutayā kuntī na bhartāraṃ mṛtātvanu | alpakālaṃ kule jātā bhartuḥ prītimavāpa yā
वैसे ही कुन्ती — जिसने पुत्रों के मोह के कारण पति के पीछे प्राण नहीं त्यागे, और जो उत्तम कुल में जन्म लेकर थोड़े ही समय पति का प्रेम पा सकी —
श्लोक 41 (1.162.41)
दग्धाऽद्य सह पुत्रैः सा असंपूर्णमनोरथा । मृतो भीम इति श्रुत्वा मनो न श्रद्दधाति मे ॥
dagdhā'dya saha putraiḥ sā asaṃpūrṇamanorathā | mṛto bhīma iti śrutvā mano na śraddadhāti me
आज अपने पुत्रों के साथ जल गई, उसके मनोरथ अधूरे रह गए। भीम मर गया — यह सुनकर मेरा मन विश्वास नहीं करता।
श्लोक 42 (1.162.42)
एतच्च चिन्तयानस्य व्यथितं बहुधा मनः । अवधूय च मे देहं हृदयेन विदीर्यते ॥
etacca cintayānasya vyathitaṃ bahudhā manaḥ | avadhūya ca me dehaṃ hṛdayena vidīryate
यह सोचते-सोचते मेरा मन अनेक प्रकार से व्यथित है; मेरा शरीर काँप उठता है और हृदय फटा जाता है।
श्लोक 43 (1.162.43)
पीनस्कन्धश्चारुबाहुर्मेरुकूटसमो युवा । मृतो भीम इति श्रुत्वा मनो न श्रद्दधाति मे ॥
pīnaskandhaścārubāhurmerukūṭasamo yuvā | mṛto bhīma iti śrutvā mano na śraddadhāti me
पुष्ट कंधों वाला, सुन्दर भुजाओं वाला, मेरु के शिखर-सा युवक — भीम मर गया, यह सुनकर मेरा मन विश्वास नहीं करता।
श्लोक 44 (1.162.44)
अतित्यागी च योधी च क्षिप्रहस्तो दृढायुधः । प्रपत्तिमाँल्लब्धलक्षो रथयानविशारदः ॥
atityāgī ca yodhī ca kṣiprahasto dṛḍhāyudhaḥ | prapattimām̐llabdhalakṣo rathayānaviśāradaḥ
परम त्यागी, योद्धा, फुर्तीले हाथों वाला, दृढ़ आयुधों वाला, सूझ-बूझ वाला, अचूक लक्ष्य वाला, रथ चलाने में निपुण,
श्लोक 45 (1.162.45)
दूरपाती त्वसंभ्रान्तो महावीर्यो महास्त्रवान् । अदीनात्मा नरश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥
dūrapātī tvasaṃbhrānto mahāvīryo mahāstravān | adīnātmā naraśreṣṭhaḥ śreṣṭhaḥ sarvadhanuṣmatām
दूर तक मार करने वाला, कभी न घबराने वाला, महापराक्रमी, महान अस्त्रों का स्वामी, उदार-हृदय, नरश्रेष्ठ और सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ;
श्लोक 46 (1.162.46)
येन प्राच्याश्च सौवीरा दाक्षिणात्याश्च निर्जिताः । ख्यापितं येन शूरेण त्रिषु लोकेषु पौरुषम् ॥
yena prācyāśca sauvīrā dākṣiṇātyāśca nirjitāḥ | khyāpitaṃ yena śūreṇa triṣu lokeṣu pauruṣam
जिस शूरवीर ने पूर्व के लोगों, सौवीरों और दक्षिण के लोगों को जीता, और तीनों लोकों में अपना पौरुष विख्यात किया;
श्लोक 47 (1.162.47)
यस्मिञ्जाते विशोकाऽभूत्कुन्ती पाण्डुश्च वीर्यवान् । पुरन्दरसमो जिष्णुः कथं कालवशं गतः ॥
yasmiñjāte viśokā'bhūtkuntī pāṇḍuśca vīryavān | purandarasamo jiṣṇuḥ kathaṃ kālavaśaṃ gataḥ
जिसके जन्म लेने पर कुन्ती और पराक्रमी पाण्डु शोक से मुक्त हो गए — वह इन्द्र के समान जिष्णु काल के वश में कैसे हो गया?
श्लोक 48 (1.162.48)
कथं तावृषभस्कन्धौ सिंहविक्रान्तगामिनौ । मर्त्यधर्ममनुप्राप्तौ यमावरिनिबर्हणौ ॥
kathaṃ tāvṛṣabhaskandhau siṃhavikrāntagāminau | martyadharmamanuprāptau yamāvarinibarhaṇau
साँड़ जैसे कंधों वाले, सिंह की-सी चाल वाले, शत्रुओं का संहार करने वाले वे दोनों जुड़वाँ भाई मनुष्यों की गति को कैसे प्राप्त हो गए?
श्लोक 49 (1.162.49)
वत्सा गताः क्व मां वृद्धं विहाय भृशमातुरम् । हा स्नुषे मम वार्ष्णेयि निधाय हृदि मे शुचम् ॥
vatsā gatāḥ kva māṃ vṛddhaṃ vihāya bhṛśamāturam | hā snuṣe mama vārṣṇeyi nidhāya hṛdi me śucam
बच्चो, मुझ बूढ़े को इस तरह व्याकुल छोड़कर तुम कहाँ चले गए? हा मेरी वृष्णिकुल की पुत्रवधू, तुमने मेरे हृदय में शोक रख दिया!
श्लोक 50 (1.162.50)
वारणावतयात्रायां के स्युर्वै शकुनाः पथि । एवमल्पायुषो लोके भविष्यन्ति पृथासुताः ॥
vāraṇāvatayātrāyāṃ ke syurvai śakunāḥ pathi | evamalpāyuṣo loke bhaviṣyanti pṛthāsutāḥ
वारणावत की यात्रा में मार्ग में कैसे शकुन हुए होंगे, कि पृथा के पुत्र इस संसार में इतने अल्पायु निकले?
श्लोक 51 (1.162.51)
संशप्ता इति कैर्यूयं वत्सान्दर्शय मे पृथे । ममैव नाथा मन्नाथा मम नेत्राणि पाण्डवाः ॥
saṃśaptā iti kairyūyaṃ vatsāndarśaya me pṛthe | mamaiva nāthā mannāthā mama netrāṇi pāṇḍavāḥ
किसने तुम्हें शाप दिया था? पृथा, मुझे मेरे बच्चे दिखाओ! पाण्डव ही मेरे रक्षक थे, मेरे स्वामी थे, मेरी आँखें थे।
श्लोक 52 (1.162.52)
हा पाण्डवा मे हे वत्सा हा सिंहशिशवो मम । मातङ्गा हा ममोत्तुङ्गा हा ममानन्दवर्धनाः ॥
hā pāṇḍavā me he vatsā hā siṃhaśiśavo mama | mātaṅgā hā mamottuṅgā hā mamānandavardhanāḥ
हा मेरे पाण्डवो! हा मेरे बच्चो! हा मेरे सिंह-शावको! हा मेरे ऊँचे गजराजो! हा मेरा आनन्द बढ़ाने वालो!
श्लोक 53 (1.162.53)
मम हीनस्य युष्माभिः सर्वलोकास्तमोवृताः । कदा द्रष्टाऽस्मि कौन्तेयांस्तरुणादित्यवर्चसः ॥
mama hīnasya yuṣmābhiḥ sarvalokāstamovṛtāḥ | kadā draṣṭā'smi kaunteyāṃstaruṇādityavarcasaḥ
तुम्हारे बिना मेरे लिए सारे लोक अन्धकार से ढक गए हैं। उदय होते सूर्य के समान तेजस्वी कुन्ती-पुत्रों को मैं कब देखूँगा?
श्लोक 54 (1.162.54)
अदृष्ट्वा वो महाबाहून्पुत्रवन्मम नन्दनाः । क्व गतिर्मे क्व गच्छामि कुतो द्रक्ष्यामि मे शिशून् ॥
adṛṣṭvā vo mahābāhūnputravanmama nandanāḥ | kva gatirme kva gacchāmi kuto drakṣyāmi me śiśūn
हे महाबाहुओ, तुम जो मेरे अपने पुत्रों की तरह मुझे आनन्द देते थे, तुम्हें न देखकर मेरा क्या सहारा है? मैं कहाँ जाऊँ? अपने बच्चों को कहाँ देखूँ?
श्लोक 55 (1.162.55)
हा युधिष्ठिर हा भीम हा हा फल्गुन हा यमौ । मा गच्छत निवर्तध्वं मयि कोपं विमुञ्चत ॥
hā yudhiṣṭhira hā bhīma hā hā phalguna hā yamau | mā gacchata nivartadhvaṃ mayi kopaṃ vimuñcata
हा युधिष्ठिर! हा भीम! हा, हा फाल्गुन! हा नकुल-सहदेव! मत जाओ, लौट आओ! मुझ पर से अपना क्रोध छोड़ दो!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 56 (1.162.56)
श्रुत्वा तत्क्रन्दितं तस्य तिलोदं च प्रसिञ्चतः । देशं कालं समाज्ञाय विदुरः प्रत्यभाषत ॥
śrutvā tatkranditaṃ tasya tilodaṃ ca prasiñcataḥ | deśaṃ kālaṃ samājñāya viduraḥ pratyabhāṣata
तिल-मिश्रित जल अर्पित करते हुए भीष्म का यह क्रन्दन सुनकर विदुर ने देश और काल का विचार करके उत्तर दिया —
विदुर उवाच
श्लोक 57 (1.162.57)
मा शोचीस्त्वं नरव्याघ्र जहि शोकं महाधृते । न तेषां विद्यते मृत्युः प्राप्तकालं कृतं मया ॥
mā śocīstvaṃ naravyāghra jahi śokaṃ mahādhṛte | na teṣāṃ vidyate mṛtyuḥ prāptakālaṃ kṛtaṃ mayā
"हे नरश्रेष्ठ, शोक मत कीजिए; हे महाधैर्यवान्, शोक त्याग दीजिए। उनकी मृत्यु नहीं हुई है। समय आने पर जो करना था, वह मैंने कर दिया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 58 (1.162.58)
एतच्च तेभ्य उदकं विप्रसिञ्च न भारत । क्षत्तेदमब्रवीद्भीष्मं कौरवाणामशृण्वताम् ॥
etacca tebhya udakaṃ viprasiñca na bhārata | kṣattedamabravīdbhīṣmaṃ kauravāṇāmaśṛṇvatām
हे भारत, उनके लिए यह जल अर्पित मत कीजिए।" — क्षत्ता विदुर ने यह बात भीष्म से ऐसे कही कि कौरव न सुन सकें।
श्लोक 59 (1.162.59)
क्षत्तारमुपसंगम्य बाष्पोत्पीडकलस्वरः । मन्दंमन्दमुवाचेदं विदुरं संगमे नृप ॥
kṣattāramupasaṃgamya bāṣpotpīḍakalasvaraḥ | mandaṃmandamuvācedaṃ viduraṃ saṃgame nṛpa
हे राजन्, तब भीष्म ने क्षत्ता विदुर के पास जाकर, आँसुओं से रुँधे स्वर में, उस भेंट में बहुत धीरे-धीरे उनसे यह कहा —
भीष्म उवाच
श्लोक 60 (1.162.60)
कथं ते तात जीवन्ति पाण्डोः पुत्रा महाबलाः । कथमस्मत्कृते पक्षः पाण्डोर्न हि निपातितः ॥
kathaṃ te tāta jīvanti pāṇḍoḥ putrā mahābalāḥ | kathamasmatkṛte pakṣaḥ pāṇḍorna hi nipātitaḥ
"तात, पाण्डु के महाबली पुत्र कैसे जीवित हैं? हमारे कारण पाण्डु का पक्ष कैसे नष्ट होने से बच गया?
श्लोक 61 (1.162.61)
कथं मत्प्रमुखाः सर्वे प्रमुक्ता महतो भयात् । जननी गरुडेनेव कुरवस्ते समुद्धृताः ॥
kathaṃ matpramukhāḥ sarve pramuktā mahato bhayāt | jananī garuḍeneva kuravaste samuddhṛtāḥ
मुझे लेकर हम सब इस महान भय से कैसे छूट गए? जैसे गरुड़ ने अपनी माता का उद्धार किया था, वैसे ही तुमने कुरुओं का उद्धार कर दिया।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 62 (1.162.62)
एवमुक्तस्तु कौरव्य कौरवाणामशृण्वताम् । आचचक्षे स धर्मात्मा भीष्मायाद्भुतकर्मणे ॥
evamuktastu kauravya kauravāṇāmaśṛṇvatām | ācacakṣe sa dharmātmā bhīṣmāyādbhutakarmaṇe
हे कुरुनन्दन, ऐसा पूछे जाने पर धर्मात्मा विदुर ने अद्भुत कर्म करने वाले भीष्म को सारी बात इस प्रकार बताई कि कौरव न सुन सकें।
विदुर उवाच
श्लोक 63 (1.162.63)
धृतराष्ट्रस्य शकुने राज्ञो दुर्योधनस्य च । विनाशे पाण्डुपुत्राणां कृतो मतिविनिश्चयः ॥
dhṛtarāṣṭrasya śakune rājño duryodhanasya ca | vināśe pāṇḍuputrāṇāṃ kṛto mativiniścayaḥ
"धृतराष्ट्र, शकुनि और राजा दुर्योधन ने पाण्डु के पुत्रों के विनाश का पक्का निश्चय कर लिया था।
श्लोक 64 (1.162.64)
तत्राहमपि च ज्ञात्वा तस्य पापस्य निश्चयम् । तं जिघांसुरहं चापि तेषामनुमते स्थितः ॥
tatrāhamapi ca jñātvā tasya pāpasya niścayam | taṃ jighāṃsurahaṃ cāpi teṣāmanumate sthitaḥ
उस पापपूर्ण निश्चय को जानकर मैं भी, उसे विफल करने की इच्छा रखते हुए, ऊपर से उनकी सहमति में बना रहा।
श्लोक 65 (1.162.65)
ततो जतुगृहं गत्वा दहनेऽस्मिन्नियोजिते । पृथायाश्च सपुत्राया धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ॥
tato jatugṛhaṃ gatvā dahane'sminniyojite | pṛthāyāśca saputrāyā dhārtarāṣṭrasya śāsanāt
फिर जब दुर्योधन की आज्ञा से लाक्षागृह में पुत्रों सहित पृथा को जलाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी,
श्लोक 66 (1.162.66)
ततः खनकमाहूय सुरङ्गं वै बिलं तदा । सुगूढं कारयित्वा ते कुन्त्या पाण्डुसुतास्तदा ॥
tataḥ khanakamāhūya suraṅgaṃ vai bilaṃ tadā | sugūḍhaṃ kārayitvā te kuntyā pāṇḍusutāstadā
तब मैंने एक खनक को बुलाकर वहाँ एक सुगुप्त सुरंग खुदवाई, और उसके द्वारा पाण्डु के पुत्रों को कुन्ती के साथ
श्लोक 67 (1.162.67)
निष्क्रामिता मया पूर्वं मा स्म शोके मनः कृथाः । ततस्तु नावमारोप्य सहपुत्रां पृथामहम् ॥
niṣkrāmitā mayā pūrvaṃ mā sma śoke manaḥ kṛthāḥ | tatastu nāvamāropya sahaputrāṃ pṛthāmaham
मैंने पहले ही बाहर निकाल दिया। आप मन में शोक न कीजिए। फिर मैंने पुत्रों सहित पृथा को नाव पर चढ़ाया,
श्लोक 68 (1.162.68)
दत्त्वाऽभयं सपुत्रायै कुन्त्यै गृहमदाहयम् । तस्मात्ते मा स्म भूद्दुःखं मुक्ताः पापात्तु पाण्डवाः ॥
dattvā'bhayaṃ saputrāyai kuntyai gṛhamadāhayam | tasmātte mā sma bhūdduḥkhaṃ muktāḥ pāpāttu pāṇḍavāḥ
पुत्रों सहित कुन्ती को अभय दिया और घर जलवा दिया। इसलिए आप दुःख न कीजिए; पाण्डव उस पाप से बच निकले हैं।
श्लोक 69 (1.162.69)
निर्गताः पाण्डवा राजन्मात्रा सह परन्तपाः । अग्निदाहान्महाघोरान्मया तस्मादुपायतः ॥
nirgatāḥ pāṇḍavā rājanmātrā saha parantapāḥ | agnidāhānmahāghorānmayā tasmādupāyataḥ
हे राजन्, शत्रुओं को तपाने वाले पाण्डव अपनी माता के साथ उस महाभयानक अग्निदाह से मेरे उपाय द्वारा निकल गए हैं।
श्लोक 70 (1.162.70)
मा स्म शोकमिमं कार्षीर्जीवन्त्येव च पाण्डवाः । प्रच्छन्ना विचरिष्यन्ति यावत्कालस्य पर्ययः ॥
mā sma śokamimaṃ kārṣīrjīvantyeva ca pāṇḍavāḥ | pracchannā vicariṣyanti yāvatkālasya paryayaḥ
आप यह शोक न कीजिए; पाण्डव जीवित ही हैं। जब तक समय का चक्र नहीं बदलता, वे छिपकर विचरण करेंगे।
श्लोक 71 (1.162.71)
तस्मिन्युधिष्ठिरं काले द्रक्ष्यन्ति भुवि मानवाः । विमलं कृष्णपक्षान्ते जगच्चन्द्रमिवोदितम् ॥
tasminyudhiṣṭhiraṃ kāle drakṣyanti bhuvi mānavāḥ | vimalaṃ kṛṣṇapakṣānte jagaccandramivoditam
उस समय पृथ्वी के लोग युधिष्ठिर को वैसे ही देखेंगे जैसे कृष्णपक्ष के अन्त में संसार के ऊपर उदित निर्मल चन्द्रमा को।
श्लोक 72 (1.162.72)
न तस्य नाशं पश्यामि यस्य भ्राता धनञ्जयः । भीमसेनश्च दुर्धर्षौ माद्रीपुत्रौ च तौ यमौ ॥
na tasya nāśaṃ paśyāmi yasya bhrātā dhanañjayaḥ | bhīmasenaśca durdharṣau mādrīputrau ca tau yamau
जिसके भाई धनंजय और भीमसेन हों, और माद्री के दोनों अजेय जुड़वाँ पुत्र हों, उसका विनाश मुझे दिखाई नहीं देता।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 73 (1.162.73)
ततः संहृष्टसर्वाङ्गो भीष्मो विदुरमब्रवीत् । दिष्ट्यादिष्ट्येति संहृष्टः पूजयानो महामतिम् ॥
tataḥ saṃhṛṣṭasarvāṅgo bhīṣmo viduramabravīt | diṣṭyādiṣṭyeti saṃhṛṣṭaḥ pūjayāno mahāmatim
तब रोम-रोम से हर्षित भीष्म ने प्रसन्न होकर "बड़े सौभाग्य की बात है, बड़े सौभाग्य की बात है" कहते हुए परम बुद्धिमान विदुर का सम्मान किया और उनसे कहा —
भीष्म उवाच
श्लोक 74 (1.162.74)
युक्तं चैवानुरूपं च कृतं तात शुभं त्वया । वयं विमोक्षिता दुःखात्पाण्डुपक्षो न नाशितः ॥
yuktaṃ caivānurūpaṃ ca kṛtaṃ tāta śubhaṃ tvayā | vayaṃ vimokṣitā duḥkhātpāṇḍupakṣo na nāśitaḥ
"तात, तुमने जो किया वह उचित, योग्य और शुभ है। हम दुःख से छूट गए और पाण्डु का पक्ष नष्ट नहीं हुआ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 75 (1.162.75)
एवमुक्त्वा विवेशाथ पुरं जनशताकुलम् । कुरुभिः सहितो राजन्नागरैश्च पितामहः ॥
evamuktvā viveśātha puraṃ janaśatākulam | kurubhiḥ sahito rājannāgaraiśca pitāmahaḥ
हे राजन्, ऐसा कहकर पितामह भीष्म कौरवों और नगरवासियों के साथ सैकड़ों लोगों से भरे नगर में लौट आए।
श्लोक 76 (1.162.76)
अथाम्बिकेयः सामात्यः सकर्णः सहसौबलः । सात्मजः पार्थनाशस्य स्मरंस्तथ्यं जहर्ष च ॥
athāmbikeyaḥ sāmātyaḥ sakarṇaḥ sahasaubalaḥ | sātmajaḥ pārthanāśasya smaraṃstathyaṃ jaharṣa ca
तब अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र अपने मन्त्रियों, कर्ण, सुबल-पुत्र शकुनि और अपने पुत्रों के साथ, पार्थों के विनाश को सच मानकर हर्षित हुए।
श्लोक 77 (1.162.77)
भीष्मश्च राजन्दुर्धर्षो विदुरश्च महामतिः । जहृषाते स्मरन्तौ तौ जातुषाग्नेर्विमोचनम् ॥
bhīṣmaśca rājandurdharṣo viduraśca mahāmatiḥ | jahṛṣāte smarantau tau jātuṣāgnervimocanam
और हे राजन्, अजेय भीष्म तथा परम बुद्धिमान विदुर — दोनों लाक्षागृह की आग से हुए छुटकारे को स्मरण करके प्रसन्न हुए।
श्लोक 78 (1.162.78)
सत्यशीलगुणाचारै रागैर्जानपदोद्भवैः । द्रोणादयश्च धर्मैस्तु तेषां तान्मोचितान्विदुः ॥
satyaśīlaguṇācārai rāgairjānapadodbhavaiḥ | droṇādayaśca dharmaistu teṣāṃ tānmocitānviduḥ
द्रोण आदि ने पाण्डवों के सत्य, शील, गुण और आचरण से, जनपदवासियों के उनके प्रति प्रेम से तथा उनके धर्म से यह समझ लिया कि वे बचा लिए गए हैं।
श्लोक 79 (1.162.79)
शौर्यलावण्यमाहात्म्यै रूपैः प्राणबलैरपि । स्वस्थान्पार्थानमन्यन्त पौरजानपदास्तथा ॥
śauryalāvaṇyamāhātmyai rūpaiḥ prāṇabalairapi | svasthānpārthānamanyanta paurajānapadāstathā
नगर और जनपद के लोग भी उनके शौर्य, लावण्य, महिमा, रूप और प्राणबल को ध्यान में रखकर यही मानते रहे कि पार्थ सकुशल हैं।
श्लोक 80 (1.162.80)
अन्ये जनाः प्राकृताश्च स्त्रियश्च बहुलास्तदा । शङ्कमाना वदन्ति स्म दग्धा जीवन्ति वा न वा ॥
anye janāḥ prākṛtāśca striyaśca bahulāstadā | śaṅkamānā vadanti sma dagdhā jīvanti vā na vā
पर दूसरे साधारण लोग और बहुत-सी स्त्रियाँ संशय में पड़कर कहती रहीं — "क्या वे जल गए? वे जीवित हैं या नहीं?"