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आदि पर्व · अध्याय 163

सोए हुए परिजनों की रखवाली करते भीम

माता और भाइयों को उठाए भीम वृक्षों को तोड़ते हुए वन में तेज़ी से बढ़ते हैं, और रात होते-होते वे एक भयानक, जलहीन वन-प्रदेश में पहुँचकर आगे चलने में असमर्थ हो जाते हैं। प्यास से व्याकुल कुन्ती सोने देने की विनती करती हैं, और भीम सबको एक बरगद के नीचे उतारकर कमलों वाले सरोवर से जल लाने जाते हैं। लौटकर सबको नंगी धरती पर सोया देख वे उनकी दुर्दशा पर विलाप करते हैं, सोचते हैं कि जिनके बन्धु निष्ठावान होते हैं वे सुरक्षित रहते हैं, और दुर्योधन पर क्रोध करते हैं, जिसे केवल युधिष्ठिर के कारण वे छोड़ देते हैं। पास ही एक नगर देखकर वे जागकर सबकी रखवाली करने का निश्चय करते हैं।

अध्याय 162अध्याय-सूचीअध्याय 164

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.163.1)

तेन विक्रममाणेन ऊरुवेगसमीरितम् । वनं सवृक्षविटपं व्याघूर्णितमिवाभवत् ॥

tena vikramamāṇena ūruvegasamīritam | vanaṃ savṛkṣaviṭapaṃ vyāghūrṇitamivābhavat

उनके आगे बढ़ते समय उनकी जाँघों के वेग से हिलाया गया वह वन अपने वृक्षों और डालियों सहित मानो चक्कर खाने लगा।

श्लोक 2 (1.163.2)

जङ्घावातो ववौ चास्य शुचिशुक्रागमे यथा । आवर्जितलतावृक्षं मार्गं चक्रे महाबलः ॥

jaṅghāvāto vavau cāsya śuciśukrāgame yathā | āvarjitalatāvṛkṣaṃ mārgaṃ cakre mahābalaḥ

उनकी पिंडलियों से उठी हवा ऐसे चली जैसे ज्येष्ठ और आषाढ़ के सन्धि-काल में चलती है; और उस महाबली ने लताओं और वृक्षों को झुकाते हुए मार्ग बना लिया।

श्लोक 3 (1.163.3)

स मृद्नन्पुष्पितांश्चैव फलितांश्च वनस्पतीन् । अवरुज्य ययौ गुल्मान्पथस्तस्य समीपजान् ॥

sa mṛdnanpuṣpitāṃścaiva phalitāṃśca vanaspatīn | avarujya yayau gulmānpathastasya samīpajān

फूलों और फलों से लदे वृक्षों को रौंदते हुए, और अपने मार्ग के पास उगी झाड़ियों को तोड़ते हुए वे आगे बढ़ते गए।

श्लोक 4 (1.163.4)

स रोषित इव क्रुद्धो वने भञ्जन्महाद्रुमान् । त्रिप्रस्रुतमदः शुष्मी षष्टिवर्षो मतङ्गराट् ॥

sa roṣita iva kruddho vane bhañjanmahādrumān | triprasrutamadaḥ śuṣmī ṣaṣṭivarṣo mataṅgarāṭ

जैसे क्रोध में भरा, बलशाली, साठ वर्ष का गजराज, जिसके तीन स्थानों से मद बह रहा हो, वैसे ही वे वन के बड़े-बड़े वृक्षों को तोड़ते चले।

श्लोक 5 (1.163.5)

गच्छतस्तस्य वेगेन तार्क्ष्यमारुतरंहसः । भीमस्य पाण्डुपुत्राणां मूर्च्छेव समजायत ॥

gacchatastasya vegena tārkṣyamārutaraṃhasaḥ | bhīmasya pāṇḍuputrāṇāṃ mūrccheva samajāyata

गरुड़ और वायु के समान वेग से जाते हुए भीम की तेज़ी से पाण्डु के पुत्रों को मानो मूर्च्छा-सी आने लगी।

श्लोक 6 (1.163.6)

असकृच्चापि संतीर्य दूरपारं भुजप्लवैः । पथि प्रच्छन्नमासेदुर्धार्तराष्ट्रभयात्तदा ॥

asakṛccāpi saṃtīrya dūrapāraṃ bhujaplavaiḥ | pathi pracchannamāsedurdhārtarāṣṭrabhayāttadā

बार-बार दूर किनारों वाले जलों को भुजाओं से तैरकर पार करते हुए, धृतराष्ट्र के पुत्र के भय से वे तब मार्ग में छिपते हुए चलते रहे।

श्लोक 7 (1.163.7)

कृच्छ्रेण मातरं चैव सुकुमारीं यशस्विनीम् । अवहत्स तु पृष्ठेन रोधःसु विषमेषु च ॥

kṛcchreṇa mātaraṃ caiva sukumārīṃ yaśasvinīm | avahatsa tu pṛṣṭhena rodhaḥsu viṣameṣu ca

अपनी सुकुमार और यशस्विनी माता को भी वे बड़ी कठिनाई से ऊबड़-खाबड़ नदी-तटों पर अपनी पीठ पर उठाए चले।

श्लोक 8 (1.163.8)

अगमच्च वनोद्देशमल्पमूलफलोदकम् । क्रूरपक्षिमृगं घोरं सायाह्ने भरतर्षभ ॥

agamacca vanoddeśamalpamūlaphalodakam | krūrapakṣimṛgaṃ ghoraṃ sāyāhne bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, सन्ध्या के समय वे वन के एक ऐसे भाग में पहुँचे जहाँ कन्द-मूल, फल और जल बहुत कम थे, और जो क्रूर पक्षियों और पशुओं से भरा भयानक स्थान था।

श्लोक 9 (1.163.9)

घोरा समभवत्सन्ध्या दारुणा मृगपक्षिणः । अप्रकाशा दिशः सर्वा वातैरासन्ननार्तवैः ॥

ghorā samabhavatsandhyā dāruṇā mṛgapakṣiṇaḥ | aprakāśā diśaḥ sarvā vātairāsannanārtavaiḥ

सन्ध्या भयानक हो उठी, पशु-पक्षी भयावह हो गए, और बेमौसम की आँधियों से सारी दिशाएँ अन्धकारमय हो गईं,

श्लोक 10 (1.163.10)

शीर्णपर्णफलै राजन्बहुगुल्मक्षुपद्रुमैः । भग्नावभुग्नभूयिष्ठैर्नानाद्रुमसमाकुलैः ॥

śīrṇaparṇaphalai rājanbahugulmakṣupadrumaiḥ | bhagnāvabhugnabhūyiṣṭhairnānādrumasamākulaiḥ

और हे राजन्, वह स्थान झड़े हुए पत्तों और फलों वाले वृक्षों से, बहुत-सी झाड़ियों और पौधों से — जिनमें अधिकांश टूटे और झुके हुए थे — और नाना प्रकार के वृक्षों से भरा था।

श्लोक 11 (1.163.11)

ते श्रमेण च कौरव्यास्तृष्णया च प्रपीडिताः । नाशक्नुवंस्तदा गन्तुं निद्रया च प्रवृद्धया ॥

te śrameṇa ca kauravyāstṛṣṇayā ca prapīḍitāḥ | nāśaknuvaṃstadā gantuṃ nidrayā ca pravṛddhayā

थकान और प्यास से पीड़ित वे कुरुवंशी अब आगे नहीं जा सके, क्योंकि नींद भी उन पर भारी होती जा रही थी।

श्लोक 12 (1.163.12)

न्यविशन्त हि ते सर्वे निरास्वादे महावने । रात्र्यामेव गतास्तूर्णं चतुर्विंशतियोजनम् । ततस्तृषा परिक्लान्ता कुन्ती वचनमब्रवीत् ॥

nyaviśanta hi te sarve nirāsvāde mahāvane | rātryāmeva gatāstūrṇaṃ caturviṃśatiyojanam | tatastṛṣā pariklāntā kuntī vacanamabravīt

वे सब उस अन्न-जल से रहित महावन में बैठ गए; उस एक ही रात में वे शीघ्रता से चौबीस योजन चल चुके थे। तब प्यास से थकी हुई कुन्ती बोलीं —

श्लोक 13 (1.163.13)

माता सती पाण्डवानां पञ्चानां मध्यतः स्थिता । तृष्णया हि परीताऽहमनाथेव महावने ॥

mātā satī pāṇḍavānāṃ pañcānāṃ madhyataḥ sthitā | tṛṣṇayā hi parītā'hamanātheva mahāvane

पाँचों पाण्डवों की माता, उनके बीच खड़ी होकर — "इस महावन में अनाथ स्त्री की तरह मैं प्यास से व्याकुल हूँ।

कुन्त्युवाच

श्लोक 14 (1.163.14)

इतः परं तु शक्ताहं गन्तुं च न पदात्पदम् । शयिष्ये वृक्षमूलेऽत्र धार्तराष्ट्रा हरन्तु माम् ॥

itaḥ paraṃ tu śaktāhaṃ gantuṃ ca na padātpadam | śayiṣye vṛkṣamūle'tra dhārtarāṣṭrā harantu mām

अब यहाँ से आगे मैं एक पग भी नहीं चल सकती। मैं यहीं इस वृक्ष की जड़ में लेट जाऊँगी; धृतराष्ट्र के पुत्र मुझे उठा ले जाएँ तो ले जाएँ!

श्लोक 15 (1.163.15)

शृणु भीम वचो मह्यं तव बाहुबलात्पुरः । स्थातुं न शक्ताः कौरव्याः किं बिभेषि पृथासुत ॥

śṛṇu bhīma vaco mahyaṃ tava bāhubalātpuraḥ | sthātuṃ na śaktāḥ kauravyāḥ kiṃ bibheṣi pṛthāsuta

भीम, मेरी बात सुनो। तुम्हारे बाहुबल के सामने कौरव टिक नहीं सकते। हे पृथापुत्र, तुम क्यों डरते हो?

श्लोक 16 (1.163.16)

अन्यो रथो न मेऽस्तीह भीमसेनादृते भुवि । धार्तराष्ट्राद्वृथा भीरुर्न मां स्वप्तुमिहेच्छसि ॥

anyo ratho na me'stīha bhīmasenādṛte bhuvi | dhārtarāṣṭrādvṛthā bhīrurna māṃ svaptumihecchasi

भीमसेन के सिवा इस पृथ्वी पर मेरा और कोई वाहन नहीं है। धृतराष्ट्र के पुत्र के व्यर्थ भय से तुम मुझे यहाँ सोने नहीं देना चाहते।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (1.163.17)

भीमपृष्ठस्थिता चेत्थं दूयमानेन चेतसा । निश्यध्वनि रुदन्ती सा निद्रावशमुपागता ॥

bhīmapṛṣṭhasthitā cetthaṃ dūyamānena cetasā | niśyadhvani rudantī sā nidrāvaśamupāgatā

भीम की पीठ पर बैठी, दुःखी मन से ऐसा कहते हुए वे रात में मार्ग पर रोती रहीं और फिर नींद के वश में हो गईं।

श्लोक 18 (1.163.18)

तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्य मातृस्नेहात्प्रजल्पितम् । कारुण्येन मनस्तप्तं गमनायोपचक्रमे ॥

tacchrutvā bhīmasenasya mātṛsnehātprajalpitam | kāruṇyena manastaptaṃ gamanāyopacakrame

माता के स्नेह से कहे गए वे वचन सुनकर भीमसेन का मन करुणा से तप उठा, और वे आगे चल पड़े।

श्लोक 19 (1.163.19)

ततो भीमो वनं घोरं प्रविश्य विजनं महत् । न्यग्रोधं विपुलच्छायं रमणीयं ददर्श ह ॥

tato bhīmo vanaṃ ghoraṃ praviśya vijanaṃ mahat | nyagrodhaṃ vipulacchāyaṃ ramaṇīyaṃ dadarśa ha

तब भीम ने एक भयानक, विशाल और निर्जन वन में प्रवेश किया और वहाँ घनी छाया वाला एक सुन्दर बरगद देखा।

श्लोक 20 (1.163.20)

तत्र निक्षिप्य तान्सर्वानुवाच भरतर्षभः । पानीयं मृगयामीह तावद्विश्रम्यतामिह ॥

tatra nikṣipya tānsarvānuvāca bharatarṣabhaḥ | pānīyaṃ mṛgayāmīha tāvadviśramyatāmiha

उन सबको वहाँ उतारकर भरतश्रेष्ठ ने कहा — "मैं यहाँ पानी ढूँढ़ता हूँ, तब तक तुम लोग यहीं विश्राम करो।"

भीम उवाच

श्लोक 21 (1.163.21)

एते रुवन्ति मधुरं सारसा जलचारिणः । ध्रुवमत्र जलस्थानं महच्चेति मतिर्मम ॥

ete ruvanti madhuraṃ sārasā jalacāriṇaḥ | dhruvamatra jalasthānaṃ mahacceti matirmama

"जल में विचरने वाले ये सारस मधुर स्वर में बोल रहे हैं। मुझे लगता है कि यहाँ निश्चय ही कोई जलाशय है, और वह भी बड़ा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (1.163.22)

अनुज्ञातः स गच्छेति भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत । जगाम तत्र यत्र स्म सारसा जलचारिणः ॥

anujñātaḥ sa gaccheti bhrātrā jyeṣṭhena bhārata | jagāma tatra yatra sma sārasā jalacāriṇaḥ

हे भारत, बड़े भाई ने "जाओ" कहकर अनुमति दी, तो वे वहाँ गए जहाँ जलचारी सारस थे।

श्लोक 23 (1.163.23)

अपश्यत्पद्मिनीखण्डमण्डितं स सरोवरम् । स तत्र पीत्वा पानीयं स्नात्वा च भरतर्षभ ॥

apaśyatpadminīkhaṇḍamaṇḍitaṃ sa sarovaram | sa tatra pītvā pānīyaṃ snātvā ca bharatarṣabha

उन्होंने कमलों के झुंडों से सजा एक सरोवर देखा। हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ उन्होंने पानी पिया और स्नान किया,

श्लोक 24 (1.163.24)

तेषामर्थे च जग्राह भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलः । उत्तरीयेण पानीयमानयामास भारत ॥

teṣāmarthe ca jagrāha bhrātṝṇāṃ bhrātṛvatsalaḥ | uttarīyeṇa pānīyamānayāmāsa bhārata

और भाइयों से प्रेम करने वाले उन्होंने उनके लिए भी जल लिया, और हे भारत, उसे अपने उत्तरीय वस्त्र में भरकर ले आए।

श्लोक 25 (1.163.25)

पङ्कजानामनेकैश्च पत्रैर्बद्ध्वा पृथक्पृथक् । गव्यूतिमात्रादागत्य त्वरितो मातरं प्रति । शोकदुःखपरीतात्मा निशश्वासोरगो यथा ॥

paṅkajānāmanekaiśca patrairbaddhvā pṛthakpṛthak | gavyūtimātrādāgatya tvarito mātaraṃ prati | śokaduḥkhaparītātmā niśaśvāsorago yathā

कमल के अनेक पत्तों में अलग-अलग बाँधकर वे एक गव्यूति की दूरी से शीघ्र अपनी माता के पास लौटे, और शोक तथा दुःख से भरकर साँप की तरह लम्बी साँसें लेने लगे।

श्लोक 26 (1.163.26)

स सुप्तां मातरं भ्रातॄन्निद्राविद्रावितौजसः । महारौद्रे वने घोरे वृक्षमूले सुशीतले ॥

sa suptāṃ mātaraṃ bhrātṝnnidrāvidrāvitaujasaḥ | mahāraudre vane ghore vṛkṣamūle suśītale

उस महाभयानक, घोर वन में, वृक्ष की शीतल जड़ के पास उन्होंने अपनी माता को सोते देखा, और अपने भाइयों को भी, जिनका बल नींद ने हर लिया था,

श्लोक 27 (1.163.27)

विक्षिप्तकरपादांश्च दीर्घोच्छ्वासान्महाबलान् । ऊर्ध्ववक्त्रान्महाकायान्पञ्चेन्द्रानिव भूपते ॥

vikṣiptakarapādāṃśca dīrghocchvāsānmahābalān | ūrdhvavaktrānmahākāyānpañcendrāniva bhūpate

हाथ-पैर फैलाए, लम्बी साँसें लेते हुए, वे महाबली, विशालकाय भाई, हे राजन्, पाँच इन्द्रों की तरह मुँह ऊपर किए पड़े थे,

श्लोक 28 (1.163.28)

अज्ञातवृक्षनित्यस्थप्रेतराक्षससाध्वसान् । दृष्ट्वा वै भृशशोकार्तो विललापानिलात्मजः ॥

ajñātavṛkṣanityasthapretarākṣasasādhvasān | dṛṣṭvā vai bhṛśaśokārto vilalāpānilātmajaḥ

वृक्षों में सदा रहने वाले प्रेतों और राक्षसों के भय से अनजान। उन्हें इस दशा में देखकर पवनपुत्र अत्यन्त शोक से व्याकुल होकर विलाप करने लगे।

श्लोक 29 (1.163.29)

भृशं शोकपरीतात्मा विललाप वृकोदरः ॥

bhṛśaṃ śokaparītātmā vilalāpa vṛkodaraḥ

शोक से अत्यन्त व्याकुल होकर वृकोदर विलाप करने लगे —

भीम उवाच

श्लोक 30 (1.163.30)

अतः कष्टतरं किं नु द्रष्टव्यं हि भविष्यति । यत्पश्यामि महीसुप्तान्भ्रातॄनद्य सुमन्दभाक् ॥

ataḥ kaṣṭataraṃ kiṃ nu draṣṭavyaṃ hi bhaviṣyati | yatpaśyāmi mahīsuptānbhrātṝnadya sumandabhāk

"इससे अधिक कष्टदायक दृश्य और क्या होगा, कि मुझ अभागे को आज अपने भाई धरती पर सोते हुए दिखाई दे रहे हैं?

श्लोक 31 (1.163.31)

शयनेषु परार्ध्येषु ये पुरा वारणावते । नाधिजग्मुस्तदा निद्रां तेऽद्य सुप्ता महीतले ॥

śayaneṣu parārdhyeṣu ye purā vāraṇāvate | nādhijagmustadā nidrāṃ te'dya suptā mahītale

जिन्हें पहले वारणावत में बहुमूल्य शय्याओं पर भी नींद नहीं आती थी, वे आज धरती पर सो रहे हैं।

श्लोक 32 (1.163.32)

स्वसारं वसुदेवस्य शत्रुसङ्घावमर्दिनः । कुन्तिराजसुतां कुन्तीं सर्वलक्षणपूजिताम् ॥

svasāraṃ vasudevasya śatrusaṅghāvamardinaḥ | kuntirājasutāṃ kuntīṃ sarvalakṣaṇapūjitām

शत्रुसमूहों का मर्दन करने वाले वसुदेव की बहन, कुन्तिराज की पुत्री कुन्ती, जो सब शुभ लक्षणों के कारण पूजित हैं,

श्लोक 33 (1.163.33)

स्नुषां विचित्रवीर्यस्य भार्यां पाण्डोर्महात्मनः । तथैव चास्मज्जननीं पुण्डरीकोदरप्रभाम् ॥

snuṣāṃ vicitravīryasya bhāryāṃ pāṇḍormahātmanaḥ | tathaiva cāsmajjananīṃ puṇḍarīkodaraprabhām

विचित्रवीर्य की पुत्रवधू, महात्मा पाण्डु की पत्नी, और हमारी माता, जिनकी कान्ति कमल के भीतरी भाग के समान है,

श्लोक 34 (1.163.34)

सुकुमारतरामेनां महार्हशयनोचिताम् । शयानां पश्यताऽद्येह पृथिव्यामतथोचिताम् ॥

sukumāratarāmenāṃ mahārhaśayanocitām | śayānāṃ paśyatā'dyeha pṛthivyāmatathocitām

जो अत्यन्त सुकुमार और बहुमूल्य शय्याओं की अभ्यस्त हैं — देखो, वे आज यहाँ धरती पर पड़ी हैं, जो उनके योग्य नहीं।

श्लोक 35 (1.163.35)

धर्मादिन्द्राच्च वाताच्च सुषुवे या सुतानिमान् । सेयं भूमौ परिश्रान्ता शेते प्रासादशायिनी ॥

dharmādindrācca vātācca suṣuve yā sutānimān | seyaṃ bhūmau pariśrāntā śete prāsādaśāyinī

जिन्होंने धर्म, इन्द्र और वायु से ये पुत्र उत्पन्न किए, और जो महलों में सोती थीं, वही आज थककर धरती पर सो रही हैं।

श्लोक 36 (1.163.36)

किं नु दुःखतरं शक्यं मया द्रष्टुमतः परम् । योऽहमद्य नरव्याघ्रान्सुप्तान्पश्यामि भूतले ॥

kiṃ nu duḥkhataraṃ śakyaṃ mayā draṣṭumataḥ param | yo'hamadya naravyāghrānsuptānpaśyāmi bhūtale

इससे अधिक दुःखद दृश्य मैं और क्या देख सकता हूँ, कि आज इन नरश्रेष्ठों को धरती पर सोते देख रहा हूँ?

श्लोक 37 (1.163.37)

त्रिषु लोकेषु यो राज्यं धर्मनित्योऽर्हते नृपः । सोऽयं भूमौ परिश्रान्तः शेते प्राकृतवत्कथम् ॥

triṣu lokeṣu yo rājyaṃ dharmanityo'rhate nṛpaḥ | so'yaṃ bhūmau pariśrāntaḥ śete prākṛtavatkatham

जो धर्मपरायण राजा तीनों लोकों के राज्य के योग्य हैं, वे साधारण मनुष्य की भाँति थककर धरती पर कैसे सो रहे हैं?

श्लोक 38 (1.163.38)

अयं नीलाम्बुदश्यामो नरेष्वप्रतिमोऽर्जुनः । शेते प्राकृतवद्भूमौ ततो दुःखतरं नु किम् ॥

ayaṃ nīlāmbudaśyāmo nareṣvapratimo'rjunaḥ | śete prākṛtavadbhūmau tato duḥkhataraṃ nu kim

नीले मेघ के समान श्याम, मनुष्यों में अद्वितीय यह अर्जुन साधारण मनुष्य की तरह धरती पर सो रहा है। इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?

श्लोक 39 (1.163.39)

अश्विनाविव देवानां याविमौ रूपसंपदा । तौ प्राकृतवदद्येमौ प्रसुप्तौ धरणीतले ॥

aśvināviva devānāṃ yāvimau rūpasaṃpadā | tau prākṛtavadadyemau prasuptau dharaṇītale

जो दोनों रूप-सम्पदा में देवताओं के बीच अश्विनीकुमारों के समान हैं, वे आज साधारण मनुष्यों की तरह धरती पर सो रहे हैं।

श्लोक 40 (1.163.40)

ज्ञातयो यस्य नैव स्युर्विषमाः कुलपांसनाः । स जीवेत सुखं लोके ग्रामद्रुम इवैकजः ॥

jñātayo yasya naiva syurviṣamāḥ kulapāṃsanāḥ | sa jīveta sukhaṃ loke grāmadruma ivaikajaḥ

जिसके कुल को कलंकित करने वाले विरोधी बन्धु-बान्धव न हों, वह संसार में गाँव के अकेले वृक्ष की तरह सुख से जीता है।

श्लोक 41 (1.163.41)

एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत्पर्णफलान्वितः । चैत्यो भवति निर्ज्ञातिरध्वनीनैश्च पूजितः ॥

eko vṛkṣo hi yo grāme bhavetparṇaphalānvitaḥ | caityo bhavati nirjñātiradhvanīnaiśca pūjitaḥ

क्योंकि गाँव में अकेला वृक्ष, यदि पत्तों और फलों से युक्त हो, तो बिना किसी सगे के भी चैत्य-वृक्ष बन जाता है और राहगीर उसकी पूजा करते हैं।

श्लोक 42 (1.163.42)

येषां च बहवः शूरा ज्ञातयो धर्ममाश्रिताः । ते जीवन्ति सुखं लोके भवन्ति च निरामयाः ॥

yeṣāṃ ca bahavaḥ śūrā jñātayo dharmamāśritāḥ | te jīvanti sukhaṃ loke bhavanti ca nirāmayāḥ

और जिनके बहुत-से शूरवीर, धर्मनिष्ठ बन्धु-बान्धव हों, वे संसार में सुख से जीते हैं और निरापद रहते हैं।

श्लोक 43 (1.163.43)

बलवन्तः समृद्धार्था मित्रबान्धवनन्दनाः । जीवन्त्यन्योन्यमाश्रित्य द्रुमाः काननजा इव ॥

balavantaḥ samṛddhārthā mitrabāndhavanandanāḥ | jīvantyanyonyamāśritya drumāḥ kānanajā iva

बलवान, समृद्ध और मित्रों तथा बन्धुओं को आनन्द देने वाले वे, वन में उगे वृक्षों की तरह एक-दूसरे के सहारे जीते हैं।

श्लोक 44 (1.163.44)

वयं तु धृतराष्ट्रेण दुष्पुत्रेण दुरात्मना । राज्यलुब्धेन मूर्खेण दुर्मन्त्रिसहितेन वै ॥

vayaṃ tu dhṛtarāṣṭreṇa duṣputreṇa durātmanā | rājyalubdhena mūrkheṇa durmantrisahitena vai

पर हमें — धृतराष्ट्र ने, जो दुष्ट पुत्र के पिता और स्वयं दुरात्मा हैं, राज्य के लोभी, मूर्ख और कुमन्त्रियों से घिरे हुए,

श्लोक 45 (1.163.45)

दुष्टेनाधर्मशीलेन स्वार्थनिष्ठैकबुद्धिना । विवासिता न दग्धाश्च क्षत्तुर्बुद्धिपराक्रमात् ॥

duṣṭenādharmaśīlena svārthaniṣṭhaikabuddhinā | vivāsitā na dagdhāśca kṣatturbuddhiparākramāt

दुष्ट, अधर्मी स्वभाव वाले और केवल अपने स्वार्थ में बुद्धि लगाए रहने वाले — निर्वासित कर दिया गया है; और हम जलने से बचे, तो केवल क्षत्ता विदुर की बुद्धि और उद्यम से।

श्लोक 46 (1.163.46)

तस्मान्मुक्ता वयं दाहादिमं वृक्षमुपाश्रिताः । कां दिशं प्रतिपत्स्यामः प्राप्ताः क्लेशमनुत्तमम् ॥

tasmānmuktā vayaṃ dāhādimaṃ vṛkṣamupāśritāḥ | kāṃ diśaṃ pratipatsyāmaḥ prāptāḥ kleśamanuttamam

इस प्रकार आग से बचकर हमने इस वृक्ष का आश्रय लिया है। इस घोर संकट में पड़कर अब हम किस दिशा में जाएँ?

श्लोक 47 (1.163.47)

सकामो भव दुर्बुद्धे धार्तराष्ट्राल्पदर्शन । नूनं देवाः प्रसन्नास्ते नानुज्ञां मे युधिष्ठिरः ॥

sakāmo bhava durbuddhe dhārtarāṣṭrālpadarśana | nūnaṃ devāḥ prasannāste nānujñāṃ me yudhiṣṭhiraḥ

हे दुर्बुद्धि, अदूरदर्शी धृतराष्ट्र-पुत्र, ले, तेरी कामना पूरी हो! निश्चय ही देवता तुझ पर प्रसन्न हैं, क्योंकि युधिष्ठिर मुझे

श्लोक 48 (1.163.48)

प्रयच्छति वधे तुभ्यं तेन जीवसि दुर्मते । नन्वद्य ससुतामात्यं सकर्णानुजसौबलम् ॥

prayacchati vadhe tubhyaṃ tena jīvasi durmate | nanvadya sasutāmātyaṃ sakarṇānujasaubalam

तेरे वध की अनुमति नहीं देते; इसी कारण, हे दुर्मति, तू जीवित है। नहीं तो आज ही मैं तुझे पुत्रों और मन्त्रियों सहित, कर्ण, तेरे छोटे भाइयों और शकुनि के साथ,

श्लोक 49 (1.163.49)

गत्वा क्रोधसमाविष्टः प्रेषयिष्ये यमक्षयम् । किं नु शक्यं मया कर्तुं यत्ते न क्रुध्यते नृपः ॥

gatvā krodhasamāviṣṭaḥ preṣayiṣye yamakṣayam | kiṃ nu śakyaṃ mayā kartuṃ yatte na krudhyate nṛpaḥ

क्रोध में भरकर जाकर यमलोक भेज देता। पर मैं क्या कर सकता हूँ, जब राजा तुझ पर क्रोध ही नहीं करते —

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 50 (1.163.50)

धर्मात्मा पाण्डवश्रेष्ठः पापाचार युधिष्ठिरः । एवमुक्त्वा महाबाहुः क्रोधसन्दीप्तमानसः ॥

dharmātmā pāṇḍavaśreṣṭhaḥ pāpācāra yudhiṣṭhiraḥ | evamuktvā mahābāhuḥ krodhasandīptamānasaḥ

धर्मात्मा, पाण्डवों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर, हे पापाचारी!" ऐसा कहकर क्रोध से जलते मन वाले महाबाहु भीम

श्लोक 51 (1.163.51)

करं करेण निष्पिष्य निःश्वसन्दीनमानसः । पुनर्दीनमना भूत्वा शान्तार्चिरिव पावकः ॥

karaṃ kareṇa niṣpiṣya niḥśvasandīnamānasaḥ | punardīnamanā bhūtvā śāntārciriva pāvakaḥ

हाथ से हाथ मलते हुए, दुःखी मन से लम्बी साँसें लेने लगे। फिर बुझी लपटों वाली आग की तरह उदास होकर

श्लोक 52 (1.163.52)

भ्रातॄन्महीतले सुप्तानवैक्षत वृकोदरः । विश्वस्तानिव संविष्टान्पृथग्जनसमानिव ॥

bhrātṝnmahītale suptānavaikṣata vṛkodaraḥ | viśvastāniva saṃviṣṭānpṛthagjanasamāniva

वृकोदर ने धरती पर सोए अपने भाइयों को देखा, जो साधारण लोगों की तरह निश्चिन्त होकर पड़े थे।

भीम उवाच

श्लोक 53 (1.163.53)

नातिदूरेण नगरं वनादस्माद्धि लक्षये । जागर्तव्ये स्वपन्तीमे हन्त जागर्म्यहं स्वयम् ॥

nātidūreṇa nagaraṃ vanādasmāddhi lakṣaye | jāgartavye svapantīme hanta jāgarmyahaṃ svayam

"मुझे इस वन से थोड़ी ही दूर पर एक नगर दिखाई देता है। जब जागना आवश्यक है, तब ये सो रहे हैं; अच्छा, मैं स्वयं जागूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 54 (1.163.54)

पास्यन्तीमे जलं पश्चात्प्रतिबुद्धा जितक्लमाः । इति भीमो व्यवस्यैव जजागार स्वयं तदा ॥

pāsyantīme jalaṃ paścātpratibuddhā jitaklamāḥ | iti bhīmo vyavasyaiva jajāgāra svayaṃ tadā

जागने पर जब इनकी थकान दूर हो जाएगी, तब ये पानी पी लेंगे।" — ऐसा निश्चय करके भीम तब स्वयं जागते रहे।

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