आदि पर्व · अध्याय 164
हिडिम्बा का भीम पर मोहित होना
जब पाण्डव और कुन्ती वन में सो रहे होते हैं और भीम पहरा दे रहे होते हैं, तब नरभक्षी राक्षस हिडिम्ब मनुष्य के मांस की गन्ध पाकर अपनी बहन हिडिम्बा को उन्हें मारने भेजता है। भीम को देखते ही वह उन पर मोहित हो जाती है, सुन्दर मानवी रूप धारण करती है, उन्हें अपने भाई से सावधान करती है और उनसे अपना पति बनने की प्रार्थना करती है, साथ ही उन्हें आकाश-मार्ग से ले जाने का प्रस्ताव रखती है। भीम सोती हुई माता और भाइयों को छोड़ने से, और बड़े भाई से पहले विवाह करने से इनकार करते हैं, और उससे कहते हैं कि चाहे तो चली जाए या अपने भाई को भेज दे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.164.1)
तत्र तेषु शयानेषु हिडिम्बो नाम राक्षसः । अविदूरे वनात्तस्माच्छालवृक्षं समाश्रितः ॥
tatra teṣu śayāneṣu hiḍimbo nāma rākṣasaḥ | avidūre vanāttasmācchālavṛkṣaṃ samāśritaḥ
जब वे वहाँ सो रहे थे, तब उस वन से थोड़ी ही दूर हिडिम्ब नाम का एक राक्षस एक शाल वृक्ष का आश्रय लिए बैठा था।
श्लोक 2 (1.164.2)
क्रूरो मानुषमांसादो महावीर्यपराक्रमः । प्रावृड्जलधरश्यामः पिङ्गाक्षो दारुणाकृतिः ॥
krūro mānuṣamāṃsādo mahāvīryaparākramaḥ | prāvṛḍjaladharaśyāmaḥ piṅgākṣo dāruṇākṛtiḥ
वह क्रूर था, मनुष्यों का मांस खाने वाला, महाबली और महापराक्रमी; वर्षा ऋतु के मेघ के समान काला, पीली आँखों वाला और भयानक आकृति का।
श्लोक 3 (1.164.3)
दंष्ट्राकरालवदनः करालो भीमदर्शनः । लम्बस्फिग्लम्बजठरो रक्तश्मश्रुशिरोरुहः ॥
daṃṣṭrākarālavadanaḥ karālo bhīmadarśanaḥ | lambasphiglambajaṭharo raktaśmaśruśiroruhaḥ
दाढ़ों से उसका मुख विकराल था; वह भयंकर और देखने में डरावना था, उसके नितम्ब और पेट लटके हुए थे, और दाढ़ी-मूँछ तथा सिर के बाल लाल थे।
श्लोक 4 (1.164.4)
महावृक्षगलस्कन्धः शङ्कुकर्णो विभीषणः । यदृच्छया तानपश्यत्पाण्डुपुत्रान्महारथान् ॥
mahāvṛkṣagalaskandhaḥ śaṅkukarṇo vibhīṣaṇaḥ | yadṛcchayā tānapaśyatpāṇḍuputrānmahārathān
उसकी गर्दन और कंधे विशाल वृक्ष के समान थे, कान खूँटों जैसे नुकीले थे, और वह अत्यन्त डरावना था। संयोगवश उसकी दृष्टि महारथी पाण्डुपुत्रों पर पड़ी।
श्लोक 5 (1.164.5)
विरूपरूपः पिङ्गाक्षः करालो घोरदर्शनः । पिशितेप्सुः क्षुधार्तश्च जिघ्रन्गन्धं यदृच्छया ॥
virūparūpaḥ piṅgākṣaḥ karālo ghoradarśanaḥ | piśitepsuḥ kṣudhārtaśca jighrangandhaṃ yadṛcchayā
विकृत रूप वाला, पीली आँखों वाला, विकराल और देखने में भयावह वह राक्षस भूख से व्याकुल और मांस का लोभी था; संयोगवश उसे उनकी गन्ध मिल गई।
श्लोक 6 (1.164.6)
ऊर्ध्वाङ्गुलिः स कण्डूयन्धुन्वन्रूक्षाञ्शिरोरुहान् । जृम्भमाणो महावक्त्रः पुनःपुनरवेक्ष्य च ॥
ūrdhvāṅguliḥ sa kaṇḍūyandhunvanrūkṣāñśiroruhān | jṛmbhamāṇo mahāvaktraḥ punaḥpunaravekṣya ca
उँगलियाँ ऊपर उठाकर, शरीर खुजलाते हुए, अपने रूखे बालों को झटकते हुए और अपने विशाल मुख से जम्हाई लेते हुए वह बार-बार इधर-उधर देखने लगा।
श्लोक 7 (1.164.7)
हृष्टो मानुषमांसस्य महाकायो महाबलः । आघ्राय मानुषं गन्धं भगिनीमिदमब्रवीत् ॥
hṛṣṭo mānuṣamāṃsasya mahākāyo mahābalaḥ | āghrāya mānuṣaṃ gandhaṃ bhaginīmidamabravīt
मनुष्य के मांस की गन्ध से प्रसन्न होकर उस विशालकाय, महाबली राक्षस ने मनुष्य की गन्ध सूँघी और अपनी बहन से यह कहा —
हिडिम्ब उवाच
श्लोक 8 (1.164.8)
उपपन्नं चिरस्याद्य भक्ष्यं मम मनःप्रियम् । जिघ्रतः प्रस्रुता स्नेहाज्जिह्वा पर्येति मे मुखात् ॥
upapannaṃ cirasyādya bhakṣyaṃ mama manaḥpriyam | jighrataḥ prasrutā snehājjihvā paryeti me mukhāt
"बहुत दिनों के बाद आज मेरे मन को प्रिय भोजन मिला है। इसकी गन्ध सूँघते ही लालसा से मेरी जीभ से लार टपक रही है और वह मुँह के चारों ओर फिर रही है।
श्लोक 9 (1.164.9)
अष्टौ दंष्ट्राः सुतीक्ष्णाग्राश्चिरस्यापातदुःसहाः । देहेषु मज्जयिष्यामि स्निग्धेषु पिशितेषु च ॥
aṣṭau daṃṣṭrāḥ sutīkṣṇāgrāścirasyāpātaduḥsahāḥ | deheṣu majjayiṣyāmi snigdheṣu piśiteṣu ca
आज बहुत समय बाद मैं अपनी आठों तीखी नोकों वाली दाढ़ें, जिनका प्रहार असहनीय है, शरीरों और कोमल मांस में गड़ाऊँगा।
श्लोक 10 (1.164.10)
आक्रम्य मानुषं कण्ठमाच्छिद्य धमनीमपि । उष्णं नवं प्रपास्यामि फेनिलं रुधिरं बहु ॥
ākramya mānuṣaṃ kaṇṭhamācchidya dhamanīmapi | uṣṇaṃ navaṃ prapāsyāmi phenilaṃ rudhiraṃ bahu
मनुष्य के गले को दबोचकर और उसकी नाड़ी काटकर मैं गरम, ताज़ा, झागदार रक्त भरपेट पिऊँगा।
श्लोक 11 (1.164.11)
गच्छ जानीहि के त्वेते शेरते वनमाश्रिताः । मानुषो बलवान्गन्धो घ्राणं तर्पयतीव मे ॥
gaccha jānīhi ke tvete śerate vanamāśritāḥ | mānuṣo balavāngandho ghrāṇaṃ tarpayatīva me
जाओ, पता लगाओ कि ये कौन हैं जो वन में आकर सो रहे हैं। मनुष्यों की तीव्र गन्ध मानो मेरी नासिका को तृप्त कर रही है।
श्लोक 12 (1.164.12)
हत्वैतान्मानुषान्सर्वानानयस्व ममान्तिकम् । अस्मद्विषयसुप्तेभ्यो नैतेभ्यो भयमस्ति ते ॥
hatvaitānmānuṣānsarvānānayasva mamāntikam | asmadviṣayasuptebhyo naitebhyo bhayamasti te
इन सब मनुष्यों को मारकर मेरे पास ले आओ। ये हमारे ही क्षेत्र में सो रहे हैं; तुम्हें इनसे कोई भय नहीं है।
श्लोक 13 (1.164.13)
एषामुत्कृत्य मांसानि मानुषाणां यथेष्टतः । भक्षयिष्याव सहितौ कुरु पूर्णं वचो मम ॥
eṣāmutkṛtya māṃsāni mānuṣāṇāṃ yatheṣṭataḥ | bhakṣayiṣyāva sahitau kuru pūrṇaṃ vaco mama
इन मनुष्यों का मांस काट-काटकर हम दोनों साथ मिलकर जितना चाहें खाएँगे। मेरी बात को पूरा करो।
श्लोक 14 (1.164.14)
भक्षयित्वा च मांसानि मानुषाणां प्रकामतः । नृत्याव सहितावावां दत्ततालावनेकशः ॥
bhakṣayitvā ca māṃsāni mānuṣāṇāṃ prakāmataḥ | nṛtyāva sahitāvāvāṃ dattatālāvanekaśaḥ
और इन मनुष्यों का मांस मनचाहा खा लेने के बाद हम दोनों साथ मिलकर बार-बार ताल देते हुए नाचेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (1.164.15)
एवमुक्ता हिडिम्बा तु हिडिम्बेन महावने । भ्रातुर्वचनमाज्ञाय त्वरमाणेव राक्षसी ॥
evamuktā hiḍimbā tu hiḍimbena mahāvane | bhrāturvacanamājñāya tvaramāṇeva rākṣasī
उस महावन में हिडिम्ब के ऐसा कहने पर राक्षसी हिडिम्बा अपने भाई की आज्ञा समझकर मानो बड़ी उतावली में,
श्लोक 16 (1.164.16)
आप्लुत्याप्लुत्य च तरूनगच्छत्पाण्डवान्प्रति । जगाम तत्र यत्र स्म शेरते पाण्डवा वने ॥
āplutyāplutya ca tarūnagacchatpāṇḍavānprati | jagāma tatra yatra sma śerate pāṇḍavā vane
एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर उछलती-कूदती पाण्डवों की ओर चल पड़ी, और वहाँ जा पहुँची जहाँ पाण्डव वन में सो रहे थे।
श्लोक 17 (1.164.17)
ददर्श तत्र सा गत्वा पाण्डवान्पृथया सह । शयानान्भीमसेनं च जाग्रतं त्वपराजितम् ॥
dadarśa tatra sā gatvā pāṇḍavānpṛthayā saha | śayānānbhīmasenaṃ ca jāgrataṃ tvaparājitam
वहाँ पहुँचकर उसने पृथा के साथ सोए हुए पाण्डवों को देखा, और अपराजित भीमसेन को जागते हुए पाया।
श्लोक 18 (1.164.18)
उपास्यमानान्भीमेन रूपयौवनशालिनः । सुकुमारांश्च पार्थान्सा व्यायामेन च कर्शितान् ॥
upāsyamānānbhīmena rūpayauvanaśālinaḥ | sukumārāṃśca pārthānsā vyāyāmena ca karśitān
उसने रूप और यौवन से सम्पन्न, सुकुमार किन्तु परिश्रम से थके हुए पृथापुत्रों को देखा, जिनकी रखवाली भीम कर रहे थे,
श्लोक 19 (1.164.19)
दुःखेन संप्रयुक्तांश्च सहज्येष्ठान्प्रमाथिनः । रौद्री सती राजपुत्रं दर्शनीयप्रदर्शनम् ॥
duḥkhena saṃprayuktāṃśca sahajyeṣṭhānpramāthinaḥ | raudrī satī rājaputraṃ darśanīyapradarśanam
दुःख से घिरे हुए, अपने ज्येष्ठ भ्राता के साथ, शत्रुओं का संहार करने वाले; और उस भयंकर राक्षसी ने देखने में अत्यन्त सुन्दर उस राजकुमार को देखा।
श्लोक 20 (1.164.20)
दृष्ट्वैव भीमसेनं सा सालस्कन्धमिवोद्यतम् । राक्षसी कामयामास रूपेणाप्रतिमं भुवि ॥
dṛṣṭvaiva bhīmasenaṃ sā sālaskandhamivodyatam | rākṣasī kāmayāmāsa rūpeṇāpratimaṃ bhuvi
शाल वृक्ष के तने के समान ऊँचे, रूप में पृथ्वी पर अनुपम भीमसेन को देखते ही वह राक्षसी उन पर मोहित हो गई और उन्हें चाहने लगी।
श्लोक 21 (1.164.21)
अन्तर्गतेन मनसा चिन्तयामास राक्षसी । अयं श्यामो महाबाहुः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः ॥
antargatena manasā cintayāmāsa rākṣasī | ayaṃ śyāmo mahābāhuḥ siṃhaskandho mahādyutiḥ
राक्षसी मन ही मन सोचने लगी — "यह तरुण, विशाल भुजाओं वाला, सिंह के समान कंधों वाला, महातेजस्वी पुरुष,
राक्षस्युवाच
श्लोक 22 (1.164.22)
कम्बुग्रीवः पुष्कराक्षो भर्ता युक्तो भवेन्मम । नाहं भ्रातृवचो जातु कुर्यां क्रूरमसांप्रतम् ॥
kambugrīvaḥ puṣkarākṣo bhartā yukto bhavenmama | nāhaṃ bhrātṛvaco jātu kuryāṃ krūramasāṃpratam
शंख जैसी ग्रीवा और कमल जैसे नेत्रों वाला — मेरे लिए योग्य पति होगा। मैं अपने भाई की यह क्रूर और अनुचित बात कभी नहीं मानूँगी।
श्लोक 23 (1.164.23)
पतिस्नेहोऽतिबलवान्न तथा भ्रातृसौहृदम् । मुहूर्तमिव तृप्तिश्च भवेद्भ्रातुर्ममैव च ॥
patisneho'tibalavānna tathā bhrātṛsauhṛdam | muhūrtamiva tṛptiśca bhavedbhrāturmamaiva ca
पति का प्रेम अत्यन्त बलवान होता है, भाई का स्नेह वैसा नहीं होता। इन्हें मार देने से तो मेरे भाई को और मुझे केवल क्षण भर की तृप्ति मिलेगी;
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (1.164.24)
हतैरेतैरहत्वा तु मोदिष्ये शाश्वतीः समाः । निश्चित्येत्थं हिडिम्बा सा भीमं दृष्ट्वा महाभुजम् ॥
hatairetairahatvā tu modiṣye śāśvatīḥ samāḥ | niścityetthaṃ hiḍimbā sā bhīmaṃ dṛṣṭvā mahābhujam
पर इसे न मारकर मैं अनन्त वर्षों तक आनन्द मनाऊँगी।" ऐसा निश्चय करके हिडिम्बा ने महाबाहु भीम को देखा,
श्लोक 25 (1.164.25)
उत्सृज्य राक्षसं रूपं मानुषं रूपमास्थिता । सा कामरूपिणी रूपं कृत्वा मदनमोहिता ॥
utsṛjya rākṣasaṃ rūpaṃ mānuṣaṃ rūpamāsthitā | sā kāmarūpiṇī rūpaṃ kṛtvā madanamohitā
अपना राक्षसी रूप त्यागकर मानवी रूप धारण कर लिया। इच्छानुसार रूप धारण करने वाली वह कामदेव से मोहित होकर (सुन्दर) रूप बनाकर
श्लोक 26 (1.164.26)
उपतस्थे महात्मानं भीमसेनमनिन्दिता । इङ्गिताकारकुशला सोपासर्पच्छनैः शनैः ॥
upatasthe mahātmānaṃ bhīmasenamaninditā | iṅgitākārakuśalā sopāsarpacchanaiḥ śanaiḥ
निर्दोष रूप में महात्मा भीमसेन के पास आ खड़ी हुई। संकेतों और भाव-भंगिमाओं में कुशल वह धीरे-धीरे उनके समीप सरकने लगी,
श्लोक 27 (1.164.27)
विनम्यमानेव लता दिव्याभरणभूषिता । शनैः शनैश्च तां भीमः समीपमुपसर्पतीम् ॥
vinamyamāneva latā divyābharaṇabhūṣitā | śanaiḥ śanaiśca tāṃ bhīmaḥ samīpamupasarpatīm
झुकती हुई लता के समान, दिव्य आभूषणों से सजी हुई। धीरे-धीरे अपने समीप आती हुई उस स्त्री को भीम ने
श्लोक 28 (1.164.28)
हर्षमाणां तदाऽपश्यत्तन्वीं पीनपयोधराम् । चन्द्राननां पद्मनेत्रां नीलकुञ्चितमूर्धजाम् ॥
harṣamāṇāṃ tadā'paśyattanvīṃ pīnapayodharām | candrānanāṃ padmanetrāṃ nīlakuñcitamūrdhajām
तब देखा — वह हर्ष से भरी थी, छरहरी और उन्नत स्तनों वाली, चन्द्रमुखी और कमलनयनी, और उसके केश काले और घुँघराले थे;
श्लोक 29 (1.164.29)
कृष्णां सुपाण्डुरैर्दन्तैर्बिम्बोष्ठीं चारुदर्शनाम् । दृष्ट्वा तां रूपसंपन्नां भीमो विस्मयमागतः ॥
kṛṣṇāṃ supāṇḍurairdantairbimboṣṭhīṃ cārudarśanām | dṛṣṭvā tāṃ rūpasaṃpannāṃ bhīmo vismayamāgataḥ
साँवले रंग की, अत्यन्त उजले दाँतों और बिम्बफल जैसे लाल होंठों वाली, देखने में मनोहर। ऐसी रूपवती को देखकर भीम विस्मय में पड़ गए।
श्लोक 30 (1.164.30)
उपचारगुणैर्युक्तां ललितैर्हाससंमितैः । समीपमुपसंप्राप्य भीमं साथ वरानना ॥
upacāraguṇairyuktāṃ lalitairhāsasaṃmitaiḥ | samīpamupasaṃprāpya bhīmaṃ sātha varānanā
शिष्ट व्यवहार के गुणों से युक्त, हास-विलास से भरी मनोहर चेष्टाओं वाली वह सुमुखी तब भीम के समीप आ पहुँची,
श्लोक 31 (1.164.31)
वचो वचनवेलायां भीमं प्रोवाच भामिनी । लज्जया नम्यमानेव सर्वाभरणभूषिता ॥
vaco vacanavelāyāṃ bhīmaṃ provāca bhāminī | lajjayā namyamāneva sarvābharaṇabhūṣitā
और बोलने का अवसर आने पर उस सुन्दरी ने भीम से बात की। लज्जा से मानो झुकी हुई, सब आभूषणों से विभूषित,
श्लोक 32 (1.164.32)
स्मितपूर्वमिदं वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत् । कुतस्त्वमसि संप्राप्तः कश्चासि पुरुषर्षभ ॥
smitapūrvamidaṃ vākyaṃ bhīmasenamathābravīt | kutastvamasi saṃprāptaḥ kaścāsi puruṣarṣabha
उसने पहले मुस्कराकर भीमसेन से यह कहा — "हे पुरुषश्रेष्ठ! तुम कहाँ से आए हो और कौन हो?
राक्षस्युवाच
श्लोक 33 (1.164.33)
क इमे शेरते चेह पुरुषा देवरूपिणः । केयं वै बृहती श्यामा सुकुमारी तवानघ ॥
ka ime śerate ceha puruṣā devarūpiṇaḥ | keyaṃ vai bṛhatī śyāmā sukumārī tavānagha
और देवताओं जैसे रूप वाले ये पुरुष कौन हैं जो यहाँ सो रहे हैं? हे निष्पाप! यह ऊँचे कद की, साँवली, सुकुमार स्त्री कौन है, जो तुम्हारी अपनी है,
श्लोक 34 (1.164.34)
शेते वनमिदं प्राप्य विश्वस्ता स्वगृहे यथा । नेदं जानीथ गहनं वनं राक्षससेवितम् ॥
śete vanamidaṃ prāpya viśvastā svagṛhe yathā | nedaṃ jānītha gahanaṃ vanaṃ rākṣasasevitam
जो इस वन में आकर ऐसे निश्चिन्त सो रही है मानो अपने घर में हो? तुम लोग नहीं जानते कि यह घना वन राक्षसों का निवास है।
श्लोक 35 (1.164.35)
वसति ह्यत्र पापात्मा हिडिम्बो नाम राक्षसः ॥
vasati hyatra pāpātmā hiḍimbo nāma rākṣasaḥ
यहाँ हिडिम्ब नाम का एक पापात्मा राक्षस रहता है।
श्लोक 36 (1.164.36)
तेनाहं प्रेषिता भ्रात्रा दुष्टभावेन रक्षसा । बिभक्षयिषता मांसं युष्माकममरोपमाः ॥
tenāhaṃ preṣitā bhrātrā duṣṭabhāvena rakṣasā | bibhakṣayiṣatā māṃsaṃ yuṣmākamamaropamāḥ
उसी दुष्ट-भाव वाले राक्षस, मेरे भाई ने मुझे यहाँ भेजा है; हे देवतुल्य पुरुषो! वह तुम्हारा मांस खाना चाहता है।
श्लोक 37 (1.164.37)
साऽहं त्वामभिसंप्रेक्ष्य देवगर्भसमप्रभम् । नान्यं भर्तारमिच्छामि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
sā'haṃ tvāmabhisaṃprekṣya devagarbhasamaprabham | nānyaṃ bhartāramicchāmi satyametadbravīmi te
किन्तु देवपुत्र के समान तेजस्वी तुम्हें देखकर अब मैं किसी और को पति नहीं बनाना चाहती। मैं तुमसे यह सच कहती हूँ।
श्लोक 38 (1.164.38)
एतद्विज्ञाय धर्मज्ञ युक्तं मयि समाचर । कामोपहतचित्तां हि भजमानां भजस्व माम् ॥
etadvijñāya dharmajña yuktaṃ mayi samācara | kāmopahatacittāṃ hi bhajamānāṃ bhajasva mām
हे धर्मज्ञ! यह जानकर मेरे साथ उचित व्यवहार करो। मेरा मन काम से व्याकुल है और मैं तुम्हें चाहती हूँ; तुम मुझे स्वीकार करो।
श्लोक 39 (1.164.39)
त्रास्यामि त्वां महाबाहो राक्षसात्पुरुषादकात् । वत्स्यावो गिरिदुर्गेषु भर्ता भव ममानघ ॥
trāsyāmi tvāṃ mahābāho rākṣasātpuruṣādakāt | vatsyāvo giridurgeṣu bhartā bhava mamānagha
हे महाबाहु! मैं तुम्हें उस नरभक्षी राक्षस से बचा लूँगी। हम दोनों पर्वतों के दुर्गम स्थानों में रहेंगे; हे निष्पाप! तुम मेरे पति बनो।
श्लोक 40 (1.164.40)
इच्छामि वीर भद्रं ते मा मे प्राणान्विहासिषः । त्वया ह्यहं परित्यक्ता न जीवेयमरिन्दम ॥
icchāmi vīra bhadraṃ te mā me prāṇānvihāsiṣaḥ | tvayā hyahaṃ parityaktā na jīveyamarindama
हे वीर! मैं तुम्हें चाहती हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; मेरे प्राण न जाने दो। हे शत्रुदमन! तुम्हारे त्याग देने पर मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।
श्लोक 41 (1.164.41)
अन्तरिक्षचरी ह्यस्मि कामतो विचरामि च । अतुलामाप्नुहि प्रीतिं तत्र तत्र मया सह ॥
antarikṣacarī hyasmi kāmato vicarāmi ca | atulāmāpnuhi prītiṃ tatra tatra mayā saha
मैं आकाश में विचरने वाली हूँ और अपनी इच्छा से जहाँ चाहूँ घूम सकती हूँ। मेरे साथ जहाँ-तहाँ अनुपम आनन्द का अनुभव करो।"
भीमसेन उवाच
श्लोक 42 (1.164.42)
एष ज्येष्ठो मम भ्राता मान्यः परमको गुरुः । अनिविष्टो हि तन्नाहं परिविद्यां कथंचन ॥
eṣa jyeṣṭho mama bhrātā mānyaḥ paramako guruḥ | aniviṣṭo hi tannāhaṃ parividyāṃ kathaṃcana
"ये मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं, आदरणीय और मेरे परम गुरु। इनका अभी विवाह नहीं हुआ है, इसलिए मैं किसी भी प्रकार इनसे पहले विवाह नहीं कर सकता।
श्लोक 43 (1.164.43)
मातरं भ्रातरं ज्येष्ठं कनिष्ठानपरानपि । परित्यजेत कोन्वद्य प्रभवन्निह राक्षसि ॥
mātaraṃ bhrātaraṃ jyeṣṭhaṃ kaniṣṭhānaparānapi | parityajeta konvadya prabhavanniha rākṣasi
हे राक्षसी! कौन ऐसा पुरुष होगा जो सामर्थ्य रहते हुए यहाँ अपनी माता, बड़े भाई और छोटे भाइयों को छोड़ दे?
श्लोक 44 (1.164.44)
को हि सुप्तानिमान्भ्रातॄन्दत्त्वा राक्षसभोजनम् । मातरं च नरो गच्छेत्कामार्त इव मद्विधः ॥
ko hi suptānimānbhrātṝndattvā rākṣasabhojanam | mātaraṃ ca naro gacchetkāmārta iva madvidhaḥ
मुझ जैसा कौन मनुष्य इन सोए हुए भाइयों और माता को राक्षस का भोजन बनने के लिए छोड़कर कामातुर व्यक्ति की तरह चला जाएगा?"
राक्षस्युवाच
श्लोक 45 (1.164.45)
एकं त्वां मोक्षयिष्यामि सह मात्रा परन्तप । सोदरानुत्सृजैनांस्त्वमारोह जघनं मम ॥
ekaṃ tvāṃ mokṣayiṣyāmi saha mātrā parantapa | sodarānutsṛjaināṃstvamāroha jaghanaṃ mama
"हे परन्तप! मैं केवल तुम्हें और तुम्हारी माता को बचा लूँगी। अपने इन भाइयों को छोड़ दो और मेरी कमर पर चढ़ जाओ।"
भीम उवाच
श्लोक 46 (1.164.46)
नाहं जीवितुमाशंसे भ्रातॄनुत्सृज्य राक्षसि । यथाश्रद्धं व्रजैका हि विप्रियं मे प्रभाषसे ॥
nāhaṃ jīvitumāśaṃse bhrātṝnutsṛjya rākṣasi | yathāśraddhaṃ vrajaikā hi vipriyaṃ me prabhāṣase
"हे राक्षसी! भाइयों को छोड़कर मैं जीना नहीं चाहता। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, अकेली चली जाओ; तुम मुझसे अप्रिय बात कह रही हो।"
राक्षस्युवाच
श्लोक 47 (1.164.47)
यत्ते प्रियं तत्करिष्ये सर्वानेतान्प्रबोधय । मोक्षयिष्याम्यहं कामं राक्षसात्पुरुषादकात् ॥
yatte priyaṃ tatkariṣye sarvānetānprabodhaya | mokṣayiṣyāmyahaṃ kāmaṃ rākṣasātpuruṣādakāt
"जो तुम्हें प्रिय हो, वही करूँगी। इन सबको जगा दो; मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम सबको उस नरभक्षी राक्षस से बचा लूँगी।"
भीमसेन उवाच
श्लोक 48 (1.164.48)
सुखसुप्तान्वने भ्रातॄन्मातरं चैव राक्षसि । न भयाद्बोधयिष्यामि भ्रातुस्तव दुरात्मनः ॥
sukhasuptānvane bhrātṝnmātaraṃ caiva rākṣasi | na bhayādbodhayiṣyāmi bhrātustava durātmanaḥ
"हे राक्षसी! तुम्हारे दुष्ट भाई के डर से मैं वन में सुख से सो रहे अपने भाइयों और माता को नहीं जगाऊँगा।
श्लोक 49 (1.164.49)
न हि मे राक्षसा भीरु सोढुं शक्ताः पराक्रमम् । न मनुष्या न गन्धर्वा न यक्षाश्चारुलोचने ॥
na hi me rākṣasā bhīru soḍhuṃ śaktāḥ parākramam | na manuṣyā na gandharvā na yakṣāścārulocane
हे भीरु! हे सुन्दर नेत्रों वाली! मेरे पराक्रम को न राक्षस सह सकते हैं, न मनुष्य, न गन्धर्व और न यक्ष।
श्लोक 50 (1.164.50)
गच्छ वा तिष्ठ वा भद्रे यद्वापीच्छसि तत्कुरु । तं वा प्रेषय तन्वङ्गि भ्रातरं पुरुषादकम् ॥
gaccha vā tiṣṭha vā bhadre yadvāpīcchasi tatkuru | taṃ vā preṣaya tanvaṅgi bhrātaraṃ puruṣādakam
हे भद्रे! चाहे जाओ या ठहरो, या जो चाहो वह करो; अथवा, हे कोमलांगी, अपने उस नरभक्षी भाई को भेज दो।"