Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 168

भीम और हिडिम्बा; पाण्डवों के पास व्यास का आगमन

कुन्ती को उठाकर हिडिम्बा पाण्डवों को ऋषि शालिहोत्र के सरोवर पर ले जाती है, जहाँ वह उनके लिए पत्तों की कुटियाँ बनाती है और शालिहोत्र अपने मानसिक संकल्प से उन्हें भोजन देते हैं। कुन्ती धर्म के लिए भीम से हिडिम्बा को पुत्र देने को कहती हैं; भीम शर्तों के साथ मान जाते हैं, और हिडिम्बा दिन में उन्हें पर्वतों, वनों और तटों पर घुमाती और हर रात लौटा लाती है। फिर व्यास आते हैं; वे बताते हैं कि यह निर्वासन पूर्वकर्मों का फल है, युधिष्ठिर के राज्य और भीम तथा हिडिम्बा (जिसे वे कमलपालिका कहते हैं) से पुत्र के जन्म की भविष्यवाणी करते हैं, प्रतीक्षा करने को कहकर चले जाते हैं।

अध्याय 167अध्याय-सूचीअध्याय 169

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.168.1)

युधिष्ठिरवचः श्रुत्वा कुन्तीमङ्गेऽधिरोप्य सा । भीमार्जुनान्तरगता यमाभ्यां च पुरस्कृता ॥

yudhiṣṭhiravacaḥ śrutvā kuntīmaṅge'dhiropya sā | bhīmārjunāntaragatā yamābhyāṃ ca puraskṛtā

युधिष्ठिर की बात सुनकर हिडिम्बा ने कुन्ती को गोद में उठा लिया। भीम और अर्जुन के बीच चलती हुई, नकुल-सहदेव को आगे किए,

श्लोक 2 (1.168.2)

तिर्यग्युधिष्ठिरे याति हिडिम्बा भीमगामिनी । शालिहोत्रसरो रम्यमाससाद जलार्थिनी ॥

tiryagyudhiṣṭhire yāti hiḍimbā bhīmagāminī | śālihotrasaro ramyamāsasāda jalārthinī

युधिष्ठिर के बगल में चलते हुए, भीम के पीछे-पीछे चलने वाली हिडिम्बा जल की खोज में शालिहोत्र के रमणीय सरोवर पर जा पहुँची।

श्लोक 3 (1.168.3)

वनस्पतितलं गत्वा परिमृज्य गृहं यथा । पाण्डवानां च वासं सा कृत्वा पर्णमयं तथा ॥

vanaspatitalaṃ gatvā parimṛjya gṛhaṃ yathā | pāṇḍavānāṃ ca vāsaṃ sā kṛtvā parṇamayaṃ tathā

उस विशाल वृक्ष के नीचे जाकर उसने घर की भाँति भूमि को झाड़-बुहारकर साफ़ किया, पाण्डवों के लिए पत्तों की कुटिया बनाई,

श्लोक 4 (1.168.4)

आत्मनश्च तथा कुन्त्या एकोद्देशे चकार सा । पाण्डवास्तु ततः स्नात्वा शुद्धाः सन्ध्यामुपास्य च ॥

ātmanaśca tathā kuntyā ekoddeśe cakāra sā | pāṇḍavāstu tataḥ snātvā śuddhāḥ sandhyāmupāsya ca

और उसी स्थान पर अपने और कुन्ती के लिए भी कुटिया बनाई। तब पाण्डवों ने स्नान किया और शुद्ध होकर सन्ध्योपासना की।

श्लोक 5 (1.168.5)

तृषिताः क्षुत्पिपासार्ता जलमात्रेण वर्तयन् । शालिहोत्रस्ततो ज्ञात्वा क्षुधार्तान्पाण्डवांस्तदा ॥

tṛṣitāḥ kṣutpipāsārtā jalamātreṇa vartayan | śālihotrastato jñātvā kṣudhārtānpāṇḍavāṃstadā

प्यासे और भूख-प्यास से पीड़ित वे केवल जल के सहारे थे। तब शालिहोत्र ने पाण्डवों को भूख से व्याकुल जानकर

श्लोक 6 (1.168.6)

मनसा चिन्तयामास पानीयं भोजनं महत् । ततस्ते पाण्डवाः सर्वे विश्रान्ताः पृथया सह ॥

manasā cintayāmāsa pānīyaṃ bhojanaṃ mahat | tataste pāṇḍavāḥ sarve viśrāntāḥ pṛthayā saha

मन के संकल्प से ही पेय और भरपूर भोजन प्रस्तुत कर दिया। तब विश्राम कर चुके सब पाण्डव पृथा के साथ

श्लोक 7 (1.168.7)

यथा जतुगृहे वृत्तं राक्षसेन कृतं च यत् । कृत्वा कथा बहुविधाः कथान्ते पाण्डुनन्दनम् ॥

yathā jatugṛhe vṛttaṃ rākṣasena kṛtaṃ ca yat | kṛtvā kathā bahuvidhāḥ kathānte pāṇḍunandanam

लाक्षागृह में जो हुआ था और राक्षस ने जो किया था, उसके विषय में तरह-तरह की बातें करने लगे। बातचीत समाप्त होने पर

श्लोक 8 (1.168.8)

कुन्ती राजसुता वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत् । यथा पाण्डुस्तथा मान्यस्तव ज्येष्ठो युधिष्ठिरः ॥

kuntī rājasutā vākyaṃ bhīmasenamathābravīt | yathā pāṇḍustathā mānyastava jyeṣṭho yudhiṣṭhiraḥ

राजकुमारी कुन्ती ने पाण्डुनन्दन भीमसेन से कहा — "तुम्हारे बड़े भाई युधिष्ठिर तुम्हारे लिए पाण्डु के समान ही माननीय हैं।

कुन्त्युवाच

श्लोक 9 (1.168.9)

अहं धर्मविदाऽनेन मान्या गुरुतरा तव । तस्मात्पाण्डुहितार्थं मे युवराज हितं कुरु ॥

ahaṃ dharmavidā'nena mānyā gurutarā tava | tasmātpāṇḍuhitārthaṃ me yuvarāja hitaṃ kuru

और यह धर्मज्ञ भी मानता है कि मैं तुम्हारे लिए उनसे भी अधिक माननीय गुरुजन हूँ। इसलिए हे युवराज, पाण्डु के हित के लिए मेरा भी हित करो।

श्लोक 10 (1.168.10)

निकृता धार्तराष्ट्रेण पापेनाकृतबुद्धिना । दुष्कृतस्य प्रतीकारं न पश्यामि वृकोदर ॥

nikṛtā dhārtarāṣṭreṇa pāpenākṛtabuddhinā | duṣkṛtasya pratīkāraṃ na paśyāmi vṛkodara

हे वृकोदर, धृतराष्ट्र के पापी और अविवेकी पुत्र ने हमारे साथ छल किया है, और उस दुष्कर्म का प्रतिकार मुझे दिखाई नहीं देता।

श्लोक 11 (1.168.11)

तस्मात्कतिपयाहेन योगक्षेमं भविष्यति । क्षेमं दुर्गमिमं वासं वत्स्याम हि यथा वयम् ॥

tasmātkatipayāhena yogakṣemaṃ bhaviṣyati | kṣemaṃ durgamimaṃ vāsaṃ vatsyāma hi yathā vayam

इसलिए यदि हम इसी प्रकार इस सुरक्षित और दुर्गम स्थान में रहें, तो कुछ ही दिनों में हमारा योगक्षेम बन जाएगा।

श्लोक 12 (1.168.12)

इदमन्यन्महद्दुःखं धर्मकृच्छ्रं वृकोदर । दृष्ट्वैव त्वां महाप्राज्ञ अनङ्गाभिप्रचोदिता ॥

idamanyanmahadduḥkhaṃ dharmakṛcchraṃ vṛkodara | dṛṣṭvaiva tvāṃ mahāprājña anaṅgābhipracoditā

हे वृकोदर, यह एक और बड़ा दुःख है, धर्म का कठिन संकट। हे महाप्राज्ञ, तुम्हें देखते ही काम से प्रेरित होकर

श्लोक 13 (1.168.13)

युधिष्ठिरं च मां चैव वरयामास धर्मतः । धर्मार्थं देहि पुत्रं त्वं स नः श्रेयः करिष्यति ॥

yudhiṣṭhiraṃ ca māṃ caiva varayāmāsa dharmataḥ | dharmārthaṃ dehi putraṃ tvaṃ sa naḥ śreyaḥ kariṣyati

उसने धर्मपूर्वक युधिष्ठिर से और मुझसे तुम्हें माँगा है। धर्म के लिए उसे एक पुत्र दो; वह हमारा कल्याण करेगा।

श्लोक 14 (1.168.14)

प्रतिवाक्यं तु नेच्छामि आवयोर्वचनं कुरु । तथेति तत्प्रतिज्ञाय भीमसेनोऽब्रवीदिदम् ॥

prativākyaṃ tu necchāmi āvayorvacanaṃ kuru | tatheti tatpratijñāya bhīmaseno'bravīdidam

मुझे कोई प्रत्युत्तर नहीं चाहिए; हम दोनों की बात मानो।" भीमसेन ने "ऐसा ही होगा" कहकर वचन दिया और यह कहा —

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (1.168.15)

शासनं ते करिष्यामि वेदशासनमित्यपि । समक्षं भ्रातृमध्ये तु तां चोवाच स राक्षसीम् ॥

śāsanaṃ te kariṣyāmi vedaśāsanamityapi | samakṣaṃ bhrātṛmadhye tu tāṃ covāca sa rākṣasīm

"मैं आपकी आज्ञा का पालन वेद की आज्ञा के समान करूँगा।" फिर भाइयों के बीच सबके सामने उन्होंने उस राक्षसी से कहा —

भीमसेन उवाच

श्लोक 16 (1.168.16)

शृणु राक्षसि सत्येन समयं ते वदाम्यहम् । यावत्कालेन भवति पुत्रस्योत्पादनं शुभे ॥

śṛṇu rākṣasi satyena samayaṃ te vadāmyaham | yāvatkālena bhavati putrasyotpādanaṃ śubhe

हे राक्षसी, सुनो, मैं सत्यपूर्वक तुम्हें अपनी शर्त बताता हूँ। हे शुभे, जब तक पुत्र उत्पन्न होने में समय लगे,

श्लोक 17 (1.168.17)

तावत्कालं चरिष्यामि त्वया सह सुमध्यमे । विशेषतो मत्सकाशे मा प्रकाशय नीचताम् ॥

tāvatkālaṃ cariṣyāmi tvayā saha sumadhyame | viśeṣato matsakāśe mā prakāśaya nīcatām

तब तक, हे सुमध्यमे, मैं तुम्हारे साथ विचरूँगा। पर विशेष रूप से मेरे सामने कभी कोई नीचता प्रकट मत करना;

श्लोक 18 (1.168.18)

उत्तमस्त्रीगुणोपेता भजेथा वरवर्णिनि । सा तथेति प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तथा ॥

uttamastrīguṇopetā bhajethā varavarṇini | sā tatheti pratijñāya hiḍimbā rākṣasī tathā

उत्तम स्त्रियों के गुणों से युक्त होकर, हे सुन्दरी, मेरा संग करना।" राक्षसी हिडिम्बा ने "ऐसा ही होगा" कहकर प्रतिज्ञा की,

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (1.168.19)

गताऽहनि निवेशेषु भोज्यं राजार्हमानयत् । सा कदाचिद्विहारार्थं हिडिम्बा कामरूपिणी ॥

gatā'hani niveśeṣu bhojyaṃ rājārhamānayat | sā kadācidvihārārthaṃ hiḍimbā kāmarūpiṇī

और दिन ढलने पर उनके निवास में राजाओं के योग्य भोजन ले आई। एक बार इच्छानुसार रूप धारण करने वाली हिडिम्बा विहार के लिए

श्लोक 20 (1.168.20)

भीमसेनमुपादाय ऊर्ध्वमाचक्रमे तदा । शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च ॥

bhīmasenamupādāya ūrdhvamācakrame tadā | śailaśṛṅgeṣu ramyeṣu devatāyataneṣu ca

भीमसेन को लेकर आकाश में ऊपर उड़ चली। रमणीय पर्वत-शिखरों पर और देवमन्दिरों में,

श्लोक 21 (1.168.21)

मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वेषु । कृत्वा सा परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता ॥

mṛgapakṣivighuṣṭeṣu ramaṇīyeṣu sarveṣu | kṛtvā sā paramaṃ rūpaṃ sarvābharaṇabhūṣitā

पशु-पक्षियों के कलरव से गूँजते सब रमणीय स्थानों में, परम सुन्दर रूप धारण करके, सब आभूषणों से सजी हुई

श्लोक 22 (1.168.22)

संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम् । तथैव वनदुर्गेषु पर्वतद्रुमसानुषु ॥

saṃjalpantī sumadhuraṃ ramayāmāsa pāṇḍavam | tathaiva vanadurgeṣu parvatadrumasānuṣu

मीठी-मीठी बातें करती हुई वह पाण्डव को आनन्द देती रही। इसी प्रकार वन के दुर्गम स्थलों में और वृक्षों से भरी पर्वत-ढलानों पर,

श्लोक 23 (1.168.23)

सरस्सु रमणीयेषु पद्मोत्पलवनेषु च । नदीद्वीपप्रदेशेषु वैडूर्यसिकतेषु च ॥

sarassu ramaṇīyeṣu padmotpalavaneṣu ca | nadīdvīpapradeśeṣu vaiḍūryasikateṣu ca

रमणीय सरोवरों पर, कमल और उत्पल के वनों में, नदियों के द्वीपों पर और वैदूर्य जैसी बालू वाले तटों पर,

श्लोक 24 (1.168.24)

देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु । सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च ॥

devāraṇyeṣu puṇyeṣu tathā parvatasānuṣu | sutīrthavanatoyāsu tathā girinadīṣu ca

देवताओं के पवित्र वनों में और पर्वतों की चोटियों पर, सुन्दर घाटों और वनों वाली जलधाराओं तथा पहाड़ी नदियों के किनारे,

श्लोक 25 (1.168.25)

सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमयुतेषु च । गुह्यकानां निवासेषु कुलपर्वतसानुषु ॥

sāgarasya pradeśeṣu maṇihemayuteṣu ca | guhyakānāṃ nivāseṣu kulaparvatasānuṣu

मणियों और सोने से भरे समुद्र-तट के प्रदेशों में, गुह्यकों के निवासों में और कुलपर्वतों की ढलानों पर,

श्लोक 26 (1.168.26)

सर्वर्तुफलवृक्षेषु मानसेषु वनेषु च । बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम् ॥

sarvartuphalavṛkṣeṣu mānaseṣu vaneṣu ca | bibhratī paramaṃ rūpaṃ ramayāmāsa pāṇḍavam

सब ऋतुओं में फल देने वाले वृक्षों के बीच और मानस के वनों में, परम सुन्दर रूप धारण करके वह पाण्डव को आनन्द देती रही।

श्लोक 27 (1.168.27)

यथा सुमोदते स्वर्गे सुकृत्यप्सरसा सह । सुतरां परमप्रीतस्तथा रेमे महाद्युतिः ॥

yathā sumodate svarge sukṛtyapsarasā saha | sutarāṃ paramaprītastathā reme mahādyutiḥ

जैसे पुण्यात्मा स्वर्ग में अप्सरा के साथ आनन्द मनाता है, वैसे ही अत्यन्त प्रसन्न होकर तेजस्वी भीम ने रमण किया।

श्लोक 28 (1.168.28)

शुभं हि जघनं तस्याः सुवर्णमणिमेखलम् । न ततर्प तदा मृद्नन्भीमसेनो मुहुर्मुहुः ॥

śubhaṃ hi jaghanaṃ tasyāḥ suvarṇamaṇimekhalam | na tatarpa tadā mṛdnanbhīmaseno muhurmuhuḥ

उसका सोने और मणियों की करधनी से सजा सुन्दर जघन बार-बार सहलाते हुए भी भीमसेन तृप्त न होते थे।

श्लोक 29 (1.168.29)

रमयन्ती ततो भीमं तत्रतत्र मनोजवा । सा रेमे तेन संहर्षात्तृप्यन्ती च मुहुर्मुहुः ॥

ramayantī tato bhīmaṃ tatratatra manojavā | sā reme tena saṃharṣāttṛpyantī ca muhurmuhuḥ

मन के वेग से चलने वाली वह जहाँ-तहाँ भीम को आनन्द देती, और स्वयं भी हर्षपूर्वक उनके साथ रमण करती हुई बार-बार तृप्त होती।

श्लोक 30 (1.168.30)

अहस्सु रमयन्ती सा निशाकालेषु पाण्डवम् । आनीय वै स्वके गेहे दर्शयामास मातरम् ॥

ahassu ramayantī sā niśākāleṣu pāṇḍavam | ānīya vai svake gehe darśayāmāsa mātaram

इस प्रकार दिन में वह पाण्डव को आनन्द देती, और रात होने पर उन्हें अपने निवास पर लाकर माता को सौंप देती।

श्लोक 31 (1.168.31)

भ्रातृभिः सहितो नित्यं स्वपते पाण्डवस्तथा । कुन्त्याः परिचरन्ती सा तस्याः पार्श्वेऽवसन्निशाम् ॥

bhrātṛbhiḥ sahito nityaṃ svapate pāṇḍavastathā | kuntyāḥ paricarantī sā tasyāḥ pārśve'vasanniśām

पाण्डव प्रतिदिन रात को भाइयों के साथ सोते थे, और वह कुन्ती की सेवा करती हुई रात भर उनके पास रहती थी।

श्लोक 32 (1.168.32)

कामांश्च मुखवासादीनानयिष्यति भोजनम् । तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामाजगाम महाव्रतः ॥

kāmāṃśca mukhavāsādīnānayiṣyati bhojanam | tasyāṃ rātryāṃ vyatītāyāmājagāma mahāvrataḥ

वह उनकी इच्छा की वस्तुएँ — मुखवास आदि — और भोजन ले आती थी। वह रात बीतने पर वहाँ महान् व्रतधारी

श्लोक 33 (1.168.33)

पाराशर्यो महाप्राज्ञो दिव्यदर्शी महातपाः । तेऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं शुभम् । तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे सस्नुषा चैव माधवी ॥

pārāśaryo mahāprājño divyadarśī mahātapāḥ | te'bhivādya mahātmānaṃ kṛṣṇadvaipāyanaṃ śubham | tasthuḥ prāñjalayaḥ sarve sasnuṣā caiva mādhavī

दिव्यदृष्टि वाले, महातपस्वी, परम बुद्धिमान पराशरपुत्र (व्यास) आए। उन सबने महात्मा कृष्णद्वैपायन को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गए; पुत्रवधू के साथ माधवी (कुन्ती) भी।

व्यास उवाच

श्लोक 34 (1.168.34)

मयेदं मनसा पूर्वं विदितं भरतर्षभाः । यथा स्थितैरधर्मेण धार्तराष्ट्रैर्विवासिताः ॥

mayedaṃ manasā pūrvaṃ viditaṃ bharatarṣabhāḥ | yathā sthitairadharmeṇa dhārtarāṣṭrairvivāsitāḥ

हे भरतश्रेष्ठो, मैंने पहले ही मन से जान लिया था कि अधर्म पर टिके धृतराष्ट्र-पुत्रों ने किस प्रकार तुम्हें निर्वासित किया है।

श्लोक 35 (1.168.35)

तद्विदित्वाऽस्मि संप्राप्तश्चिकीर्षुर्वै परं हितम् । न विषादो हि वः कार्यः सर्वमेतत्सुखाय वः ॥

tadviditvā'smi saṃprāptaścikīrṣurvai paraṃ hitam | na viṣādo hi vaḥ kāryaḥ sarvametatsukhāya vaḥ

यह जानकर तुम्हारा परम हित करने की इच्छा से मैं आया हूँ। तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिए; यह सब तुम्हारे सुख के लिए है।

श्लोक 36 (1.168.36)

सुहृद्वियोजनं कर्म पुराकृतमरिन्दमाः । तस्य सिद्धिरियं प्राप्ता मा शोचत परन्तपाः ॥

suhṛdviyojanaṃ karma purākṛtamarindamāḥ | tasya siddhiriyaṃ prāptā mā śocata parantapāḥ

हे शत्रुदमनो, पूर्वकाल में किया गया कोई कर्म ही तुम्हें मित्रों से अलग करने वाला है; यह उसी का फल मिला है। हे परन्तपो, शोक मत करो।

श्लोक 37 (1.168.37)

समाप्ते दुष्कृते चैव यूयं ते वै न संशयः । स्वराष्ट्रे विहरिष्यन्तो भविष्यथ सबान्धवाः ॥

samāpte duṣkṛte caiva yūyaṃ te vai na saṃśayaḥ | svarāṣṭre vihariṣyanto bhaviṣyatha sabāndhavāḥ

जब वह दुष्कर्म समाप्त हो जाएगा, तब निःसन्देह तुम अपने बन्धुओं के साथ अपने राज्य में सुख से विहार करोगे।

श्लोक 38 (1.168.38)

दीनतो बालतश्चैव स्नेहं कुर्वन्ति बान्धवाः । तस्मादभ्यधिकः स्नेहो युष्मासु मम संप्रति ॥

dīnato bālataścaiva snehaṃ kurvanti bāndhavāḥ | tasmādabhyadhikaḥ sneho yuṣmāsu mama saṃprati

बन्धु-बान्धव दीनता और बालपन के कारण अधिक स्नेह करते हैं; इसलिए इस समय तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह और भी अधिक है।

श्लोक 39 (1.168.39)

स्नेहपूर्वं चिकीर्षामि हितं यत्तन्निबोधत । वसतेह प्रतिच्छन्ना ममागमनकाङ्क्षिणः ॥

snehapūrvaṃ cikīrṣāmi hitaṃ yattannibodhata | vasateha praticchannā mamāgamanakāṅkṣiṇaḥ

स्नेहवश मैं तुम्हारा हित करना चाहता हूँ; वह क्या है, सुनो। मेरे लौटने की प्रतीक्षा करते हुए तुम यहाँ छिपकर रहो।

श्लोक 40 (1.168.40)

एतद्वै शालिहोत्रस्य तपसा निर्मितं सरः । रमणीयमिदं तोयं क्षुत्पिपासाश्रमापहम् ॥

etadvai śālihotrasya tapasā nirmitaṃ saraḥ | ramaṇīyamidaṃ toyaṃ kṣutpipāsāśramāpaham

यह सरोवर शालिहोत्र की तपस्या से बना है। इसका जल रमणीय है और भूख, प्यास तथा थकान को दूर करता है।

श्लोक 41 (1.168.41)

कार्यार्थिनस्तु षण्मासान्विहरध्वं यथासुखम् ॥

kāryārthinastu ṣaṇmāsānviharadhvaṃ yathāsukham

तुम्हें अपना प्रयोजन सिद्ध करना है, इसलिए छह महीने तक यहाँ सुखपूर्वक रहो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 42 (1.168.42)

एवं स तान्समाश्वास्य व्यासः पार्थानरिन्दमान् । स्नेहाच्च संपरिष्वज्य कुन्तीमाश्वासयत्प्रभुः ॥

evaṃ sa tānsamāśvāsya vyāsaḥ pārthānarindamān | snehācca saṃpariṣvajya kuntīmāśvāsayatprabhuḥ

इस प्रकार शत्रुदमन पार्थों को आश्वासन देकर प्रभु व्यास ने स्नेह से कुन्ती को गले लगाया और उन्हें सान्त्वना दी।

श्लोक 43 (1.168.43)

स्नुषे मा रोद मा रोदेत्येवं व्यासोऽब्रवीद्वचः । जीवपुत्रे सुतस्तेऽयं धर्मनित्यो युधिष्ठिरः ॥

snuṣe mā roda mā rodetyevaṃ vyāso'bravīdvacaḥ | jīvaputre sutaste'yaṃ dharmanityo yudhiṣṭhiraḥ

व्यास ने कहा — "बहू, मत रोओ, मत रोओ। हे जीवित पुत्रों वाली, तुम्हारा यह सदा धर्मपरायण पुत्र युधिष्ठिर

व्यास उवाच

श्लोक 44 (1.168.44)

पृथिव्यां पार्थिवान्सर्वान्प्रशासिष्यति धर्मराट् । धर्मेण जित्वा पृथिवीमखिलां धर्मकृद्वशी ॥

pṛthivyāṃ pārthivānsarvānpraśāsiṣyati dharmarāṭ | dharmeṇa jitvā pṛthivīmakhilāṃ dharmakṛdvaśī

धर्मराज बनकर पृथ्वी के सब राजाओं पर शासन करेगा। धर्म से सारी पृथ्वी जीतकर यह धर्मात्मा और जितेन्द्रिय

श्लोक 45 (1.168.45)

स्थापयित्वा वशे सर्वां सपर्वतवनां शुभाम् । भीमसेनार्जुनबलाद्भोक्ष्यत्ययमसंशयम् ॥

sthāpayitvā vaśe sarvāṃ saparvatavanāṃ śubhām | bhīmasenārjunabalādbhokṣyatyayamasaṃśayam

पर्वतों और वनों सहित इस सुन्दर सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने वश में करके भीमसेन और अर्जुन के बल से निःसन्देह उसका उपभोग करेगा।

श्लोक 46 (1.168.46)

पुत्रास्तव च माद्र्याश्च पञ्चैते लोकविश्रुताः । स्वराष्ट्रे विहरिष्यन्ति सुखं सुमनसस्तदा ॥

putrāstava ca mādryāśca pañcaite lokaviśrutāḥ | svarāṣṭre vihariṣyanti sukhaṃ sumanasastadā

तुम्हारे और माद्री के ये पाँचों लोकविख्यात पुत्र तब अपने राज्य में प्रसन्न मन से सुखपूर्वक विहार करेंगे।

श्लोक 47 (1.168.47)

यक्ष्यन्ति च नरव्याघ्रा विजित्य पृथिवीमिमाम् । राजसूयाश्वमेधाद्यैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥

yakṣyanti ca naravyāghrā vijitya pṛthivīmimām | rājasūyāśvamedhādyaiḥ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ

ये पुरुषसिंह इस पृथ्वी को जीतकर राजसूय, अश्वमेध आदि प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करेंगे।

श्लोक 48 (1.168.48)

अनुगृह्य सुहृद्वर्गं धनेन च सुखेन च । पितृपैतामहं राज्यमाहरिष्यन्ति ते सुताः ॥

anugṛhya suhṛdvargaṃ dhanena ca sukhena ca | pitṛpaitāmahaṃ rājyamāhariṣyanti te sutāḥ

मित्रों और हितैषियों को धन और सुख से अनुगृहीत करते हुए तुम्हारे पुत्र अपने बाप-दादाओं का राज्य फिर से प्राप्त करेंगे।

श्लोक 49 (1.168.49)

स्नुषा कमलपत्राक्षी नाम्ना कमलपालिका । वशवर्तिनी तु भीमस्य पुत्रमेषा जनिष्यति ॥

snuṣā kamalapatrākṣī nāmnā kamalapālikā | vaśavartinī tu bhīmasya putrameṣā janiṣyati

कमल जैसे नेत्रों वाली तुम्हारी पुत्रवधू, जिसका नाम कमलपालिका है, भीम के वश में रहकर उनके पुत्र को जन्म देगी।

श्लोक 50 (1.168.50)

तेन पुत्रेण कृच्छ्रेषु भविष्यथ च तारिताः । इह मासं प्रतीक्षध्वमागमिष्याम्यहं पुनः ॥

tena putreṇa kṛcchreṣu bhaviṣyatha ca tāritāḥ | iha māsaṃ pratīkṣadhvamāgamiṣyāmyahaṃ punaḥ

वह पुत्र तुम्हें संकटों से पार लगाएगा। यहाँ एक महीने तक प्रतीक्षा करो; मैं फिर आऊँगा।

श्लोक 51 (1.168.51)

देशकालौ विदित्वैवं यास्यध्वं परमां मुदम् ॥

deśakālau viditvaivaṃ yāsyadhvaṃ paramāṃ mudam

इस प्रकार देश और काल को जानकर तुम परम आनन्द प्राप्त करोगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 52 (1.168.52)

स तैः प्राञ्जलिभिः सर्वैस्तथेत्युक्तो जनाधिप । जगाम भगवान्व्यासो यथागतमृषिः प्रभुः ॥

sa taiḥ prāñjalibhiḥ sarvaistathetyukto janādhipa | jagāma bhagavānvyāso yathāgatamṛṣiḥ prabhuḥ

हे जनाधिप, जब सबने हाथ जोड़कर "ऐसा ही हो" कहा, तब भगवान् व्यास मुनि जैसे आए थे, वैसे ही लौट गए।

अध्याय 167अध्याय-सूचीअध्याय 169