आदि पर्व · अध्याय 167
भीम के लिए हिडिम्बा की याचना
हिडिम्बा पाण्डवों के पीछे आकर भीम से अपना प्रेम प्रकट करती है। भीम उसे मारने को उद्यत होते हैं, पर युधिष्ठिर स्त्री-वध से रोक देते हैं। तब वह कुन्ती से विनती करती है कि आपत्ति में प्राण बचाने वाला हर उपाय धर्मसम्मत है, परिवार की सेवा करने और उन्हें पीठ पर ढोने का वचन देती है, और ऋषि शालिहोत्र के बनाए सरोवर और वृक्ष के पास व्यास के आगमन की भविष्यवाणी करती है। कुन्ती उसकी बात को धर्मयुक्त मानती हैं, और युधिष्ठिर शर्तों के साथ सम्बन्ध की अनुमति देते हैं: वह दिन में भीम के साथ रहे, हर रात उन्हें लौटा लाए, और यह गर्भ ठहरने तक ही चले।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.167.1)
सा तानेवापतत्तूर्णं भगिनी तस्य रक्षसः । अब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान्प्रति ॥
sā tānevāpatattūrṇaṃ bhaginī tasya rakṣasaḥ | abruvāṇā hiḍimbā tu rākṣasī pāṇḍavānprati
उस राक्षस की बहन राक्षसी हिडिम्बा तेज़ी से उनके पीछे आई, पर पाण्डवों से कुछ नहीं बोली।
श्लोक 2 (1.167.2)
अभिवाद्य ततः कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम् । अभिपूज्य ततः सर्वान्भीमसेनमभाषत ॥
abhivādya tataḥ kuntīṃ dharmarājaṃ ca pāṇḍavam | abhipūjya tataḥ sarvānbhīmasenamabhāṣata
उसने कुन्ती और धर्मराज युधिष्ठिर को प्रणाम किया, फिर सबका सम्मान करके भीमसेन से कहा —
हिडिम्बोवाच
श्लोक 3 (1.167.3)
अहं ते दर्शनादेव मन्मथस्य वशं गता । क्रूरं भ्रातृवचो हित्वा सा त्वामेवानुरुन्धती ॥
ahaṃ te darśanādeva manmathasya vaśaṃ gatā | krūraṃ bhrātṛvaco hitvā sā tvāmevānurundhatī
तुम्हें देखते ही मैं कामदेव के वश में हो गई। भाई की क्रूर आज्ञा छोड़कर मैं केवल तुम्हारी ही अनुरागिनी हो गई।
श्लोक 4 (1.167.4)
राक्षसे रौद्रसङ्काशे तवापश्यं विचेष्टितम् । अहं शुश्रूषुरिच्छेयं तव गात्रं निषेवितुम् ॥
rākṣase raudrasaṅkāśe tavāpaśyaṃ viceṣṭitam | ahaṃ śuśrūṣuriccheyaṃ tava gātraṃ niṣevitum
उस भयानक राक्षस के साथ तुम्हारा पराक्रम मैंने देखा है। मैं तुम्हारी सेवा करना और तुम्हारा संग पाना चाहती हूँ।
भीमसेन उवाच
श्लोक 5 (1.167.5)
स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् । हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम् ॥
smaranti vairaṃ rakṣāṃsi māyāmāśritya mohinīm | hiḍimbe vraja panthānaṃ tvamimaṃ bhrātṛsevitam
राक्षस वैर को याद रखते हैं और मोह में डालने वाली माया का सहारा लेते हैं। हिडिम्बे, तू भी उसी मार्ग पर जा, जिस पर तेरा भाई गया है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 6 (1.167.6)
क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वधीः । शरीरगुप्त्यभ्यधिकं धर्मं गोपाय पाण्डव ॥
kruddho'pi puruṣavyāghra bhīma mā sma striyaṃ vadhīḥ | śarīraguptyabhyadhikaṃ dharmaṃ gopāya pāṇḍava
हे पुरुषसिंह भीम, क्रोध में होने पर भी स्त्री का वध मत करो। हे पाण्डुनन्दन, शरीर की रक्षा से भी बढ़कर धर्म की रक्षा करो।
श्लोक 7 (1.167.7)
वधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महाबलम् । रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्धा करिष्यति ॥
vadhābhiprāyamāyāntamavadhīstvaṃ mahābalam | rakṣasastasya bhaginī kiṃ naḥ kruddhā kariṣyati
जो महाबली हमें मारने के इरादे से आया था, उसे तुमने मार डाला। उस राक्षस की बहन क्रुद्ध होकर भी हमारा क्या बिगाड़ लेगी?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (1.167.8)
हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः । युधिष्ठिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ॥
hiḍimbā tu tataḥ kuntīmabhivādya kṛtāñjaliḥ | yudhiṣṭhiraṃ tu kaunteyamidaṃ vacanamabravīt
तब हिडिम्बा ने हाथ जोड़कर कुन्ती को प्रणाम किया और कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से यह वचन कहा —
हिडिम्बोवाच
श्लोक 9 (1.167.9)
आर्ये जानासि यद्दुःखमिह स्त्रीणामनङ्गजम् । तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृते शुभे ॥
ārye jānāsi yadduḥkhamiha strīṇāmanaṅgajam | tadidaṃ māmanuprāptaṃ bhīmasenakṛte śubhe
हे आर्ये, तुम जानती हो कि इस संसार में स्त्रियों को काम से उपजा कैसा दुःख होता है। हे शुभे, भीमसेन के कारण वही दुःख मुझ पर आ पड़ा है।
श्लोक 10 (1.167.10)
सोढं तत्परमं दुःखं मया कालप्रतीक्षया । सोऽयमभ्यागतः कालो भविता मे सुखोदयः ॥
soḍhaṃ tatparamaṃ duḥkhaṃ mayā kālapratīkṣayā | so'yamabhyāgataḥ kālo bhavitā me sukhodayaḥ
उचित समय की प्रतीक्षा में मैंने वह घोर दुःख सहा है। अब वह समय आ गया है, जो मेरे सुख का उदय करेगा।
श्लोक 11 (1.167.11)
मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्मं स्वजनं तथा । वृतोऽयं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे ॥
mayā hyutsṛjya suhṛdaḥ svadharmaṃ svajanaṃ tathā | vṛto'yaṃ puruṣavyāghrastava putraḥ patiḥ śubhe
हे शुभे, अपने मित्रों, अपने धर्म और अपने स्वजनों को छोड़कर मैंने तुम्हारे इस पुरुषसिंह पुत्र को पति के रूप में वरा है।
श्लोक 12 (1.167.12)
वीरेणाऽहं तथाऽनेन त्वया चापि यशस्विनी । प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
vīreṇā'haṃ tathā'nena tvayā cāpi yaśasvinī | pratyākhyātā na jīvāmi satyametadbravīmi te
हे यशस्विनी, यदि यह वीर और तुम भी मुझे ठुकरा दोगे, तो मैं जीवित नहीं रहूँगी। यह मैं तुमसे सच कहती हूँ।
श्लोक 13 (1.167.13)
यदर्हसि कृपां कर्तुं मयि त्वं वरवर्णिनि । मत्वा मूढेति तन्मां त्वं भक्ता वाऽनुगतेति वा ॥
yadarhasi kṛpāṃ kartuṃ mayi tvaṃ varavarṇini | matvā mūḍheti tanmāṃ tvaṃ bhaktā vā'nugateti vā
हे सुन्दरी, इसलिए मुझ पर कृपा करो, जैसा तुम्हें उचित है — चाहे मुझे नासमझ मानकर, चाहे अपनी भक्त और अनुगामिनी मानकर।
श्लोक 14 (1.167.14)
भर्त्राऽनेन महाभागे संयोजय सुतेन ह । समुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम् । पुनश्चैवानयिष्यामि विस्रम्भं कुरु मे शुभे ॥
bhartrā'nena mahābhāge saṃyojaya sutena ha | samupādāya gaccheyaṃ yatheṣṭaṃ devarūpiṇam | punaścaivānayiṣyāmi visrambhaṃ kuru me śubhe
हे महाभागे, अपने इस पुत्र को पति के रूप में मुझसे मिला दो। मैं इस देवरूप को लेकर इच्छानुसार जाऊँगी, और फिर इसे वापस ले आऊँगी। हे शुभे, मुझ पर विश्वास करो।
श्लोक 15 (1.167.15)
अहं हि समये लप्स्ये प्राग्भ्रातुरपवर्जनात् । ततः सोऽभ्यपतद्रात्रौ भीमसेनजिघांसया ॥
ahaṃ hi samaye lapsye prāgbhrāturapavarjanāt | tataḥ so'bhyapatadrātrau bhīmasenajighāṃsayā
मैं भाई से नाता तोड़ने से पहले ही उचित समझौते से इसे पाना चाहती थी। तभी वह रात में भीमसेन को मारने की इच्छा से उस पर टूट पड़ा।
श्लोक 16 (1.167.16)
यथायथा विक्रमते यथारिमधितिष्ठति । तथातथा समासाद्य पाण्डवं काममोहिता ॥
yathāyathā vikramate yathārimadhitiṣṭhati | tathātathā samāsādya pāṇḍavaṃ kāmamohitā
और जैसे-जैसे भीम पराक्रम दिखाते और शत्रु पर हावी होते गए, वैसे-वैसे काम से मोहित मैं इस पाण्डव की ओर खिंचती गई।
श्लोक 17 (1.167.17)
न यातुधान्यहं त्वार्ये न चास्मि रजनीचरी । ईशा रक्षस्स्वसा ह्यस्मि राज्ञि सालकटङ्कटी ॥
na yātudhānyahaṃ tvārye na cāsmi rajanīcarī | īśā rakṣassvasā hyasmi rājñi sālakaṭaṅkaṭī
हे आर्ये, मैं कोई यातुधानी नहीं हूँ, न रात में घूमने वाली निशाचरी। हे रानी, मैं स्वयं स्वामिनी हूँ, राक्षसराज की बहन, सालकटंकट कुल की।
श्लोक 18 (1.167.18)
पुत्रेण तव संयुक्ता युवतिर्देववर्णिनी । सर्वान्वोऽहमुपस्थास्ये पुरस्कृत्य वृकोदरम् ॥
putreṇa tava saṃyuktā yuvatirdevavarṇinī | sarvānvo'hamupasthāsye puraskṛtya vṛkodaram
तुम्हारे पुत्र से जुड़कर, देवियों-सी रूपवती युवती के रूप में, मैं वृकोदर को आगे रखकर तुम सबकी सेवा करूँगी।
श्लोक 19 (1.167.19)
अप्रमत्ता प्रमत्तेषु शुश्रूषुरसकृत्त्वहम् । वृजिने तारयिष्यामि दासीवच्च नरर्षभाः ॥
apramattā pramatteṣu śuśrūṣurasakṛttvaham | vṛjine tārayiṣyāmi dāsīvacca nararṣabhāḥ
जब तुम असावधान रहोगे, तब मैं सावधान रहकर बार-बार तुम्हारी सेवा करूँगी। हे नरश्रेष्ठो, संकट में मैं दासी की भाँति तुम्हें पार लगाऊँगी।
श्लोक 20 (1.167.20)
पृष्ठेन वो वहिष्यामि विमानं सुकृतानिव । यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम् ॥
pṛṣṭhena vo vahiṣyāmi vimānaṃ sukṛtāniva | yūyaṃ prasādaṃ kuruta bhīmaseno bhajeta mām
जैसे विमान पुण्यात्माओं को ले जाता है, वैसे ही मैं तुम्हें अपनी पीठ पर ढोऊँगी। तुम लोग मुझ पर कृपा करो, जिससे भीमसेन मुझे अपना लें।
श्लोक 21 (1.167.21)
एवं ब्रुवन्ती ह तथा प्रत्याख्याता क्रियां प्रति । भूम्यां दुष्कृतिनो लोकान्गमिष्येऽहं न संशयः ॥
evaṃ bruvantī ha tathā pratyākhyātā kriyāṃ prati | bhūmyāṃ duṣkṛtino lokāngamiṣye'haṃ na saṃśayaḥ
यदि इस प्रकार विनती करने पर भी मुझे ठुकरा दिया गया, तो निःसन्देह मैं पृथ्वी पर पाप करने वालों के लोकों में जाऊँगी।
श्लोक 22 (1.167.22)
अहं हि मनसा ध्यात्वा सर्वं वेत्स्यामि सर्वदा । आपन्निस्तरणे प्राणान्धारयिष्ये न केनचित् ॥
ahaṃ hi manasā dhyātvā sarvaṃ vetsyāmi sarvadā | āpannistaraṇe prāṇāndhārayiṣye na kenacit
मैं मन में ध्यान करके सदा सब कुछ जान लूँगी। इस संकट से उबरे बिना मैं किसी भी प्रकार अपने प्राण नहीं रखूँगी।
श्लोक 23 (1.167.23)
सर्वमावृत्य कर्तव्यं धर्मं समनुपश्यता । आपत्सु यो धारयति स वै धर्मविदुत्तमः ॥
sarvamāvṛtya kartavyaṃ dharmaṃ samanupaśyatā | āpatsu yo dhārayati sa vai dharmaviduttamaḥ
धर्म पर दृष्टि रखने वाले को सब कुछ एक ओर रखकर करने योग्य कार्य करना चाहिए। जो आपत्ति के समय धर्म को धारण करता है, वही धर्मज्ञों में श्रेष्ठ है।
श्लोक 24 (1.167.24)
व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते । पुण्यात्प्राणान्धारयति पुण्यं वै प्राणधारणम् ॥
vyasanaṃ hyeva dharmasya dharmiṇāmāpaducyate | puṇyātprāṇāndhārayati puṇyaṃ vai prāṇadhāraṇam
धर्मात्माओं के लिए आपत्ति ही धर्म का संकट कही जाती है। पुण्य के लिए ही मनुष्य प्राण धारण करता है, और प्राणों की रक्षा करना भी पुण्य है।
श्लोक 25 (1.167.25)
येन केनाचरेद्धर्मं तस्मिन्गर्हा न विद्यते । महतोऽत्र स्त्रियं कामाद्बाधितां त्राहि मामपि ॥
yena kenācareddharmaṃ tasmingarhā na vidyate | mahato'tra striyaṃ kāmādbādhitāṃ trāhi māmapi
जिस किसी उपाय से भी धर्म का आचरण किया जाए, उसमें कोई निन्दा नहीं। इसलिए यहाँ प्रबल काम से पीड़ित मुझ स्त्री की भी रक्षा करो।
श्लोक 26 (1.167.26)
धर्मार्थकाममोक्षेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । तत्तु धर्ममिति प्राहुर्मुनयो धर्मवत्सलाः ॥
dharmārthakāmamokṣeṣu dayāṃ kurvanti sādhavaḥ | tattu dharmamiti prāhurmunayo dharmavatsalāḥ
सज्जन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — सभी विषयों में दया करते हैं; और धर्मप्रेमी मुनि उसी को धर्म कहते हैं।
श्लोक 27 (1.167.27)
दिव्यज्ञानेन जानामि व्यतीतानागतानहम् । तस्माद्वक्ष्यामि वः श्रेय आसन्नं सर उत्तमम् ॥
divyajñānena jānāmi vyatītānāgatānaham | tasmādvakṣyāmi vaḥ śreya āsannaṃ sara uttamam
दिव्य ज्ञान से मैं भूत और भविष्य की बातें जानती हूँ। इसलिए मैं तुम्हारे हित की बात बताती हूँ: पास ही एक उत्तम सरोवर है।
श्लोक 28 (1.167.28)
अद्यासाद्य सरः स्नात्वा विश्रम्य च वनस्पतौ । श्वः प्रभाते महद्भूतं प्रादुर्भूतं जगत्पतिम् ॥
adyāsādya saraḥ snātvā viśramya ca vanaspatau | śvaḥ prabhāte mahadbhūtaṃ prādurbhūtaṃ jagatpatim
आज उस सरोवर पर पहुँचकर स्नान करो और उस विशाल वृक्ष के नीचे विश्राम करो। कल प्रातःकाल तुम एक महान् विभूति, प्रकट हुए जगत्पति,
श्लोक 29 (1.167.29)
व्यासं कमलपत्राक्षं दृष्ट्वा शोकं विहास्यथ । धार्तराष्ट्राद्विवासं च दहनं वारणावते ॥
vyāsaṃ kamalapatrākṣaṃ dṛṣṭvā śokaṃ vihāsyatha | dhārtarāṣṭrādvivāsaṃ ca dahanaṃ vāraṇāvate
कमलनयन व्यास के दर्शन करोगे, और तब तुम्हारा शोक दूर हो जाएगा। धृतराष्ट्र के पुत्र द्वारा तुम्हारा निर्वासन, वारणावत का अग्निकाण्ड,
श्लोक 30 (1.167.30)
त्राणं च विदुरात्तुभ्यं विदितं ज्ञानचक्षुषा । आवासे शालिहोत्रस्य स वो वासं विधास्यति ॥
trāṇaṃ ca vidurāttubhyaṃ viditaṃ jñānacakṣuṣā | āvāse śālihotrasya sa vo vāsaṃ vidhāsyati
और विदुर के द्वारा तुम्हारी रक्षा — यह सब मैंने ज्ञान-दृष्टि से जान लिया है। शालिहोत्र के आश्रम में वे तुम्हारे निवास की व्यवस्था करेंगे।
श्लोक 31 (1.167.31)
वर्षवातातपसहो ह्ययं पुण्यो वनस्पतिः । पीतमात्रे तु पानीये क्षुत्पिपासे विनश्यतः ॥
varṣavātātapasaho hyayaṃ puṇyo vanaspatiḥ | pītamātre tu pānīye kṣutpipāse vinaśyataḥ
यह पवित्र वृक्ष वर्षा, आँधी और धूप को सह लेता है, और वहाँ का जल पीते ही भूख-प्यास मिट जाती है।
श्लोक 32 (1.167.32)
तपसा शालिहोत्रेण सरो वृक्षश्च निर्मितः । कादम्बाः सारसा हंसाः कुरर्यः कुररैः सह ॥
tapasā śālihotreṇa saro vṛkṣaśca nirmitaḥ | kādambāḥ sārasā haṃsāḥ kuraryaḥ kuraraiḥ saha
शालिहोत्र ने अपनी तपस्या से यह सरोवर और वृक्ष बनाए हैं। कादम्ब, सारस, हंस, और कुररों के साथ कुररियाँ
श्लोक 33 (1.167.33)
रुवन्ति मधुरं गीतं गान्धर्वस्वनमिश्रितम् । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा कुन्ती वचनमब्रवीत् ॥
ruvanti madhuraṃ gītaṃ gāndharvasvanamiśritam | tasyāstadvacanaṃ śrutvā kuntī vacanamabravīt
…वहाँ गन्धर्वों के स्वर से मिला हुआ मधुर गान करते हैं।" उसकी यह बात सुनकर कुन्ती ने
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (1.167.34)
युधिष्ठिरं महाप्राज्ञं सर्वधर्मविशारदम् । त्वं हि धर्मभृतां श्रेष्ठो मयोक्तं शृणु भारत ॥
yudhiṣṭhiraṃ mahāprājñaṃ sarvadharmaviśāradam | tvaṃ hi dharmabhṛtāṃ śreṣṭho mayoktaṃ śṛṇu bhārata
सब धर्मों के ज्ञाता, परम बुद्धिमान युधिष्ठिर से कहा — "हे भारत, तुम धर्मात्माओं में श्रेष्ठ हो; मेरी बात सुनो।
कुन्त्युवाच
श्लोक 35 (1.167.35)
राक्षस्येषा हि वाक्येन धर्मं वदति साधु वै । भावेन दुष्टा भीमं वै किं करिष्यति राक्षसी ॥
rākṣasyeṣā hi vākyena dharmaṃ vadati sādhu vai | bhāvena duṣṭā bhīmaṃ vai kiṃ kariṣyati rākṣasī
यह राक्षसी अपने वचनों में धर्म की ठीक बात कह रही है। और मन से दुष्ट भी हो, तो यह राक्षसी भीम का क्या बिगाड़ लेगी?
श्लोक 36 (1.167.36)
भजतां पाण्डवं वीरमपत्यार्थं यदीच्छसि । एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वं हिडिम्बे नात्र संशयः ॥
bhajatāṃ pāṇḍavaṃ vīramapatyārthaṃ yadīcchasi | evametadyathā''ttha tvaṃ hiḍimbe nātra saṃśayaḥ
यदि तुम सन्तान चाहते हो, तो यह वीर पाण्डव को प्राप्त करे।" युधिष्ठिर ने कहा — "हिडिम्बे, जैसा तुम कहती हो, वैसा ही है; इसमें कोई सन्देह नहीं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 37 (1.167.37)
स्थातव्यं तु त्वया धर्मे यथा ब्रूयां सुमध्यमे । नित्यं कृताह्निका स्नाता कृतशौचा सुरूपिणी ॥
sthātavyaṃ tu tvayā dharme yathā brūyāṃ sumadhyame | nityaṃ kṛtāhnikā snātā kṛtaśaucā surūpiṇī
पर हे सुमध्यमे, जैसा मैं कहूँ, उसके अनुसार तुम्हें धर्म में स्थित रहना होगा। प्रतिदिन नित्यकर्म करके, स्नान करके और शुद्ध होकर, हे सुरूपिणी,
श्लोक 38 (1.167.38)
स्नातं कृताह्निकं भद्रे कृतकौतुकमङ्गलम् । भीमसेनं भजेथास्त्वमुदिते वै दिवाकरे ॥
snātaṃ kṛtāhnikaṃ bhadre kṛtakautukamaṅgalam | bhīmasenaṃ bhajethāstvamudite vai divākare
हे भद्रे, जब भीमसेन स्नान, नित्यकर्म और मांगलिक विधि कर लें, तब सूर्योदय के बाद तुम उनका संग करना।
श्लोक 39 (1.167.39)
अहस्सु विहरानेन यथाकामं मनोजवा । अयं त्वानयितव्यस्ते भीमसेनः सदा निशि ॥
ahassu viharānena yathākāmaṃ manojavā | ayaṃ tvānayitavyaste bhīmasenaḥ sadā niśi
दिन में मन के वेग से चलने वाली तुम इनके साथ इच्छानुसार विहार करो; पर रात को भीमसेन को सदा वापस ले आना।
श्लोक 40 (1.167.40)
प्राक्सन्ध्यातो विमोक्तव्यो रक्षितव्यश्च नित्यशः । एवं रमस्व भीमेन यावद्गर्भस्य वेदनम् ॥
prāksandhyāto vimoktavyo rakṣitavyaśca nityaśaḥ | evaṃ ramasva bhīmena yāvadgarbhasya vedanam
सन्ध्या से पहले ही इन्हें छोड़ देना और सदा इनकी रक्षा करना। जब तक गर्भ का पता न चले, तब तक इसी प्रकार भीम के साथ रमण करना।
श्लोक 41 (1.167.41)
एष ते समयो भद्रे शुश्रूषा चाप्रमत्तया । नित्यानुकूलया भूत्वा कर्तव्यं शोभनं त्वया ॥
eṣa te samayo bhadre śuśrūṣā cāpramattayā | nityānukūlayā bhūtvā kartavyaṃ śobhanaṃ tvayā
हे भद्रे, यही तुम्हारी शर्त है — सावधानी से सेवा करना, सदा अनुकूल रहना और जो शोभन हो वही करना।"