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आदि पर्व · अध्याय 178

नगरवासियों को बक का शव मिलता है

बक की मृत्यु के बाद उसके भयभीत परिजन और अन्य राक्षस भीम की शरण में आते हैं, और भीम उनसे प्रतिज्ञा कराते हैं कि वे फिर कभी मनुष्यों की हिंसा नहीं करेंगे। भीम शव को नगर-द्वार तक घसीट ले जाते हैं, चुपचाप ब्राह्मण के घर लौटकर माता और भाइयों को रात के युद्ध का वृत्तान्त सुनाते हैं। भोर होने पर नगरवासी उस विशाल शव को देखते हैं; जिस ब्राह्मण की बारी थी, वह केवल इतना बताता है कि एक मन्त्रसिद्ध ब्राह्मण बक के पास अन्न ले गया था। पूरा नगर ब्राह्मणों के सम्मान में उत्सव मनाता है, और पाण्डव ब्रह्मचारी वेश में एकचक्रा में चुपचाप रहते रहते हैं।

अध्याय 177अध्याय-सूचीअध्याय 179

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.178.1)

ततः स भग्नपार्श्वाङ्गो नदित्वा भैरवं रवम् । शैलराजप्रतीकाशो गतासुरभवद्बकः ॥

tataḥ sa bhagnapārśvāṅgo naditvā bhairavaṃ ravam | śailarājapratīkāśo gatāsurabhavadbakaḥ

तब पसलियाँ और अंग टूट जाने पर बक ने भयंकर गर्जना की, और पर्वतराज के समान विशाल वह राक्षस प्राणहीन हो गया।

श्लोक 2 (1.178.2)

तेन शब्देन वित्रस्तो जनस्तस्याथ रक्षसः । निष्पपात गृहाद्राजन्सहैव परिचारिभिः ॥

tena śabdena vitrasto janastasyātha rakṣasaḥ | niṣpapāta gṛhādrājansahaiva paricāribhiḥ

हे राजन्, उस शब्द से भयभीत होकर उस राक्षस के परिजन अपने सेवकों के साथ घर से निकल पड़े।

श्लोक 3 (1.178.3)

बकानुजस्तदा राजन्भीमं शरणमेयिवान् । ततस्तु निहतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रं महाबलम् । राक्षसाः परमत्रस्ता भीमं शरणमाययुः ॥

bakānujastadā rājanbhīmaṃ śaraṇameyivān | tatastu nihataṃ dṛṣṭvā rākṣasendraṃ mahābalam | rākṣasāḥ paramatrastā bhīmaṃ śaraṇamāyayuḥ

हे राजन्, तब बक का छोटा भाई भीम की शरण में आया; और महाबली राक्षसराज को मरा देखकर अत्यन्त भयभीत राक्षस भी भीम की शरण में आ गए।

श्लोक 4 (1.178.4)

तान्भीतान्विगतज्ञानान्भीमः प्रहरतां वरः । सांत्वयामास बलवान्समये च न्यवेशयत् ॥

tānbhītānvigatajñānānbhīmaḥ praharatāṃ varaḥ | sāṃtvayāmāsa balavānsamaye ca nyaveśayat

प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ, बलवान् भीम ने भय से सुध-बुध खो बैठे उन राक्षसों को ढाढ़स बँधाया और उन्हें एक प्रतिज्ञा में बाँध दिया —

श्लोक 5 (1.178.5)

न हिंस्या मानुषा भूयो युष्माभिरिति कर्हिचित् । हिंसतां हि वधः शीघ्रमेवमेव भवेदिति ॥

na hiṃsyā mānuṣā bhūyo yuṣmābhiriti karhicit | hiṃsatāṃ hi vadhaḥ śīghramevameva bhavediti

"तुम लोग अब कभी भी मनुष्यों की हिंसा न करना। जो हिंसा करेगा, उसका वध शीघ्र ही इसी प्रकार होगा।"

श्लोक 6 (1.178.6)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तानि रक्षांसि भारत । एवमस्त्विति तं प्राहुर्जगृहुः समयं च तम् ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā tāni rakṣāṃsi bhārata | evamastviti taṃ prāhurjagṛhuḥ samayaṃ ca tam

हे भारत, उनकी यह बात सुनकर उन राक्षसों ने उनसे कहा — "ऐसा ही हो," और उस प्रतिज्ञा को स्वीकार कर लिया।

श्लोक 7 (1.178.7)

सगणस्तु बकभ्राता प्राणमत्पाण्डवं तदा । ततः प्रभृति रक्षांसि तत्र सौम्यानि भारत । नगरे प्रत्यदृश्यन्त नरैर्नगरवासिभिः ॥

sagaṇastu bakabhrātā prāṇamatpāṇḍavaṃ tadā | tataḥ prabhṛti rakṣāṃsi tatra saumyāni bhārata | nagare pratyadṛśyanta narairnagaravāsibhiḥ

बक का भाई अपने दल सहित पाण्डव के आगे नतमस्तक हो गया। हे भारत, तब से नगरवासियों ने उस नगर में राक्षसों को केवल शान्त रूप में ही देखा।

श्लोक 8 (1.178.8)

ततो भीमस्तमादाय गतासुं पुरुषादकम् । निष्कर्णनेत्रं निर्जिह्वं निःसंज्ञं कण्ठपीडनात् । कुर्वन्बहुविधां चेष्टां पुरद्वारमकर्षत ॥

tato bhīmastamādāya gatāsuṃ puruṣādakam | niṣkarṇanetraṃ nirjihvaṃ niḥsaṃjñaṃ kaṇṭhapīḍanāt | kurvanbahuvidhāṃ ceṣṭāṃ puradvāramakarṣata

तब भीम उस प्राणहीन नरभक्षी को — जिसके कान, आँखें और जीभ नष्ट हो चुकी थीं और जो गला घुटने से संज्ञाहीन था — उठाकर, बड़े प्रयत्न से नगर-द्वार तक घसीट ले गए।

श्लोक 9 (1.178.9)

द्वारदेशे विनिक्षिप्य पुरमागात्स मारुतिः । स एव राक्षसो नूनं पुनरायाति नः पुरीम् ॥

dvāradeśe vinikṣipya puramāgātsa mārutiḥ | sa eva rākṣaso nūnaṃ punarāyāti naḥ purīm

उसे द्वार पर डालकर पवनपुत्र नगर में चले गए। "निश्चय ही वही राक्षस फिर हमारी नगरी में आ रहा है!" —

श्लोक 10 (1.178.10)

सबालवृद्धाः पुरुषा इति भीताः प्रदुद्रुवुः । ततो भीमो बकं हत्वा गत्वा ब्राह्मणवेश्म तत् ॥

sabālavṛddhāḥ puruṣā iti bhītāḥ pradudruvuḥ | tato bhīmo bakaṃ hatvā gatvā brāhmaṇaveśma tat

— ऐसा कहकर बालकों और वृद्धों सहित लोग डरकर भाग खड़े हुए। उधर बक को मारकर भीम उस ब्राह्मण के घर गए,

श्लोक 11 (1.178.11)

बलीवर्दौ च शकटं ब्राह्मणाय न्यवेदयत् । तूष्णीमन्तर्गृहं गच्छेत्यभिधाय द्विजोत्तमम् ॥

balīvardau ca śakaṭaṃ brāhmaṇāya nyavedayat | tūṣṇīmantargṛhaṃ gacchetyabhidhāya dvijottamam

और दोनों बैल तथा गाड़ी ब्राह्मण को सौंप दी। उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से यह कहकर कि "चुपचाप घर के भीतर चले जाइए,"

श्लोक 12 (1.178.12)

मातृभ्रातृसमक्षं च गत्वा शयनमेव च । आचचक्षेऽथ तत्सर्वं रात्रौ युद्धमभूद्यथा ॥

mātṛbhrātṛsamakṣaṃ ca gatvā śayanameva ca | ācacakṣe'tha tatsarvaṃ rātrau yuddhamabhūdyathā

वे माता और भाइयों के सामने गए, अपनी शय्या पर पहुँचे, और फिर उन्हें सब कुछ बताया कि रात में युद्ध किस प्रकार हुआ।

श्लोक 13 (1.178.13)

ततो नरा विनिष्क्रान्ता नगरात्कल्यमेव तु । ददृशुर्निहतं भूमौ राक्षसं रुधिरोक्षितम् ॥

tato narā viniṣkrāntā nagarātkalyameva tu | dadṛśurnihataṃ bhūmau rākṣasaṃ rudhirokṣitam

भोर होते ही लोग नगर से बाहर निकले और उन्होंने उस राक्षस को खून से लथपथ, मरा हुआ भूमि पर पड़ा देखा।

श्लोक 14 (1.178.14)

तमद्रिकूटसदृशं विनिकीर्णं भयानकम् । दृष्ट्वा संहृष्टरोमाणो बभूवुस्तत्र नागराः ॥

tamadrikūṭasadṛśaṃ vinikīrṇaṃ bhayānakam | dṛṣṭvā saṃhṛṣṭaromāṇo babhūvustatra nāgarāḥ

पर्वत-शिखर के समान उस भयानक, फैले पड़े राक्षस को देखकर वहाँ के नागरिकों के रोंगटे खड़े हो गए।

श्लोक 15 (1.178.15)

एकचक्रां ततो गत्वा प्रवृत्तिं प्रददुः पुरे । ततः सहस्रशो राजन्नरा नगरवासिनः ॥

ekacakrāṃ tato gatvā pravṛttiṃ pradaduḥ pure | tataḥ sahasraśo rājannarā nagaravāsinaḥ

फिर उन्होंने एकचक्रा में जाकर नगर में यह समाचार फैलाया; तब, हे राजन्, हज़ारों नगरवासी

श्लोक 16 (1.178.16)

तत्राजग्मुर्बकं द्रष्टुं सस्त्रीवृद्धकुमारकाः । ततस्ते विस्मिताः सर्वे कर्म दृष्ट्वाऽतिमानुषम् । दैवतान्यर्चयाञ्चक्रुः प्रार्थितानि पुरा भयात् ॥

tatrājagmurbakaṃ draṣṭuṃ sastrīvṛddhakumārakāḥ | tataste vismitāḥ sarve karma dṛṣṭvā'timānuṣam | daivatānyarcayāñcakruḥ prārthitāni purā bhayāt

स्त्रियों, वृद्धों और बच्चों के साथ बक को देखने वहाँ आए। उस अलौकिक कर्म को देखकर सब विस्मित हो गए, और उन्होंने उन देवताओं की पूजा की जिनसे वे पहले भय के कारण प्रार्थना करते रहे थे।

श्लोक 17 (1.178.17)

ततः प्रगणयामासुः कस्य वारोऽद्य भोजने । ज्ञात्वा चागम्य तं विप्रं पप्रच्छुः सर्व एव ते ॥

tataḥ pragaṇayāmāsuḥ kasya vāro'dya bhojane | jñātvā cāgamya taṃ vipraṃ papracchuḥ sarva eva te

फिर उन्होंने गिनती की कि आज भोजन पहुँचाने की बारी किसकी थी; यह जानकर वे सब उस ब्राह्मण के पास आए और उससे पूछने लगे।

श्लोक 18 (1.178.18)

एवं पृष्टः स बहुशो रक्षमाणश्च पाण्डवान् । उवाच नागरान्सर्वानिदं विप्रर्षभस्तदा ॥

evaṃ pṛṣṭaḥ sa bahuśo rakṣamāṇaśca pāṇḍavān | uvāca nāgarānsarvānidaṃ viprarṣabhastadā

इस प्रकार बार-बार पूछे जाने पर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने पाण्डवों की रक्षा करते हुए सब नगरवासियों से यह कहा —

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 19 (1.178.19)

आज्ञापितं मामशने रुदन्तं सह बन्धुभिः । ददर्श ब्राह्मणः कश्चिन्मन्त्रसिद्धो महामनाः ॥

ājñāpitaṃ māmaśane rudantaṃ saha bandhubhiḥ | dadarśa brāhmaṇaḥ kaścinmantrasiddho mahāmanāḥ

"जब मुझे राक्षस का भोजन पहुँचाने का आदेश मिला था और मैं अपने परिजनों के साथ रो रहा था, तब मन्त्रसिद्ध एक महामना ब्राह्मण ने मुझे देखा।

श्लोक 20 (1.178.20)

परिपृच्छ्य स मां पूर्वं परिक्लेशं पुरस्य च । अब्रवीद्ब्राह्मणश्रेष्ठो विश्वास्य प्रहसन्निव ॥

paripṛcchya sa māṃ pūrvaṃ parikleśaṃ purasya ca | abravīdbrāhmaṇaśreṣṭho viśvāsya prahasanniva

उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने पहले मुझसे नगर के कष्ट के बारे में पूछा, फिर मुझे आश्वस्त करते हुए मानो मुस्कराकर कहा —

श्लोक 21 (1.178.21)

प्रापयिष्याम्यहं तस्मा अन्नमेतद्दुरात्मने । मन्निमित्तं भयं चापि न कार्यमिति चाब्रवीत् ॥

prāpayiṣyāmyahaṃ tasmā annametaddurātmane | mannimittaṃ bhayaṃ cāpi na kāryamiti cābravīt

'यह अन्न मैं स्वयं उस दुरात्मा तक पहुँचा दूँगा; और मेरे कारण तुम कोई भय मत करो।'

श्लोक 22 (1.178.22)

स तदन्नमुपादाय गतो बकवनं प्रति । तेन नूनं भवेदेतत्कर्म लोकहितं कृतम् ॥

sa tadannamupādāya gato bakavanaṃ prati | tena nūnaṃ bhavedetatkarma lokahitaṃ kṛtam

वह उस अन्न को लेकर बकवन की ओर गया। निश्चय ही लोक के हित का यह कर्म उसी ने किया होगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (1.178.23)

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च सुविस्मिताः । वैश्याः शूद्राश्च मुदिताश्चक्रुर्ब्रह्ममहं तदा ॥

tataste brāhmaṇāḥ sarve kṣatriyāśca suvismitāḥ | vaiśyāḥ śūdrāśca muditāścakrurbrahmamahaṃ tadā

तब अत्यन्त विस्मित सभी ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने, और आनन्दित वैश्यों और शूद्रों ने मिलकर ब्राह्मणों के सम्मान में उत्सव (ब्रह्ममह) मनाया।

श्लोक 24 (1.178.24)

ततो जानपदाः सर्वे आजग्मुर्नगरं प्रति । तमद्भुततमं द्रष्टुं पार्थास्तत्रैव चावसन् ॥

tato jānapadāḥ sarve ājagmurnagaraṃ prati | tamadbhutatamaṃ draṣṭuṃ pārthāstatraiva cāvasan

फिर उस परम अद्भुत घटना को देखने देहात के सब लोग नगर में आए, और पृथा के पुत्र वहीं रहते रहे।

श्लोक 25 (1.178.25)

वेत्रकीयगृहे सर्वे परिवार्य वृकोदरम् । विस्मयादभ्यगच्छन्त भीमं भीमपराक्रमम् ॥

vetrakīyagṛhe sarve parivārya vṛkodaram | vismayādabhyagacchanta bhīmaṃ bhīmaparākramam

वेत्रकीय गृह में सब लोग वृकोदर को घेरकर विस्मय के साथ भयंकर पराक्रमी भीम के पास आए।

श्लोक 26 (1.178.26)

न वै न संभवेत्सर्वं ब्राह्मणेषु महात्मसु । इति सत्कृत्य तं पौराः परिवव्रुः समन्ततः ॥

na vai na saṃbhavetsarvaṃ brāhmaṇeṣu mahātmasu | iti satkṛtya taṃ paurāḥ parivavruḥ samantataḥ

"महात्मा ब्राह्मणों के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है" — ऐसा कहकर नगरवासियों ने उनका सत्कार किया और चारों ओर से उन्हें घेर लिया।

पौरा ऊचुः

श्लोक 27 (1.178.27)

अयं त्राता हि खेदानां पितेव परमार्थतः । अस्य शुश्रूषवः पादौ परिचर्य उपास्महे ॥

ayaṃ trātā hi khedānāṃ piteva paramārthataḥ | asya śuśrūṣavaḥ pādau paricarya upāsmahe

"वास्तव में यही हमारे कष्टों से उबारने वाला है, पिता के समान। आइए, हम इसके चरणों की सेवा करते हुए इसकी उपासना करें।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (1.178.28)

पशुमद्दधिमच्चास्य वारं भक्तमुपाहरन् । तस्मिन्हते ते पुरुषा भीताः समनुबोधनाः ॥

paśumaddadhimaccāsya vāraṃ bhaktamupāharan | tasminhate te puruṣā bhītāḥ samanubodhanāḥ

वे बारी-बारी से उनके लिए मांस और दही से युक्त भोजन लाने लगे। बक के मारे जाने पर वे लोग, जो पहले भय में जीते थे, अब निश्चिन्त और सचेत हो उठे।

श्लोक 29 (1.178.29)

ततः संप्राद्रवन्पार्थाः सह मात्रा परन्तपाः । आगच्छन्नेकचक्रां ते पाण्डवाः संशितव्रताः ॥

tataḥ saṃprādravanpārthāḥ saha mātrā parantapāḥ | āgacchannekacakrāṃ te pāṇḍavāḥ saṃśitavratāḥ

शत्रुओं को तपाने वाले वे पृथापुत्र अपनी माता के साथ शीघ्रता से चले आए थे; कठोर व्रत वाले वे पाण्डव एकचक्रा पहुँचे थे,

श्लोक 30 (1.178.30)

वैदिकाध्ययने युक्ता जटिला ब्रह्मचारिणः । अवसंस्ते च तत्रापि ब्राह्मणस्य निवेशने । मात्रा सहैकचक्रायां दीर्घकालं सहोषिताः ॥

vaidikādhyayane yuktā jaṭilā brahmacāriṇaḥ | avasaṃste ca tatrāpi brāhmaṇasya niveśane | mātrā sahaikacakrāyāṃ dīrghakālaṃ sahoṣitāḥ

और वेदाध्ययन में लगे, जटाधारी ब्रह्मचारियों के रूप में वे वहाँ भी उस ब्राह्मण के घर में रहे; माता के साथ उन्होंने एकचक्रा में बहुत समय तक निवास किया।

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