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आदि पर्व · अध्याय 177

भीम और बक का युद्ध

युधिष्ठिर माता का तर्क स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि यह बात नगरवासियों से छिपी रहे। भीम ब्राह्मण और नगरवासियों से भरपेट भोजन करके अन्न से भरी गाड़ी लेकर बक के भयानक वृक्ष के पास पहुँचते हैं और राक्षस की भेंट स्वयं खाने बैठ जाते हैं; बक की धमकियों और प्रहारों की परवाह किए बिना वे भोजन पूरा करते हैं। फिर वृक्षों, चट्टानों और हाथों से भीषण युद्ध होता है जो चारों ओर दो योजन तक की भूमि उजाड़ देता है; अन्त में भीम बक को दबोचकर उसकी पीठ अपने घुटने पर तोड़ देते हैं, और राक्षस के मुँह से रक्त बहने लगता है।

अध्याय 176अध्याय-सूचीअध्याय 178

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (1.177.1)

उपपन्नमिदं मातस्त्वया यद्बुद्धिपूर्वकम् । आर्तस्य ब्राह्मणस्यैतदनुक्रोशादिदं कृतम् ॥

upapannamidaṃ mātastvayā yadbuddhipūrvakam | ārtasya brāhmaṇasyaitadanukrośādidaṃ kṛtam

"माता! आपने जो सोच-समझकर किया है, वह उचित है; दुःखी ब्राह्मण पर करुणा करके ही आपने यह किया है।

श्लोक 2 (1.177.2)

ध्रुवमेष्यति भीमोऽयं निहत्य पुरुषादकम् । सर्वथा ब्राह्मणस्यार्थे यदनुक्रोशवत्यसि ॥

dhruvameṣyati bhīmo'yaṃ nihatya puruṣādakam | sarvathā brāhmaṇasyārthe yadanukrośavatyasi

निश्चय ही यह भीम उस नरभक्षी को मारकर लौट आएगा, क्योंकि आप हर प्रकार से ब्राह्मण के हित के लिए करुणा से भरी हैं।

श्लोक 3 (1.177.3)

यथा त्विदं न विन्देयुर्नरा नगरवासिनः । तथाऽयं ब्राह्मणो वाच्यः परिग्राह्यश्च यत्नतः ॥

yathā tvidaṃ na vindeyurnarā nagaravāsinaḥ | tathā'yaṃ brāhmaṇo vācyaḥ parigrāhyaśca yatnataḥ

पर ब्राह्मण से बात करके उसे सावधानी से इस पर दृढ़ रखना चाहिए, ताकि नगर के निवासी इस बात को न जान पाएँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (1.177.4)

युधिष्ठिरेण संमन्त्र्य ब्राह्मणार्थमरिन्दम । कुन्ती प्रविश्य तान्सर्वान्मन्त्रयामास भारत ॥

yudhiṣṭhireṇa saṃmantrya brāhmaṇārthamarindama | kuntī praviśya tānsarvānmantrayāmāsa bhārata

हे शत्रुदमन भारत! ब्राह्मण के विषय में युधिष्ठिर से परामर्श करके कुन्ती ने भीतर जाकर उन सबसे मन्त्रणा की।

श्लोक 5 (1.177.5)

अथ रात्र्यां व्यतीतायां भीमसेनो महाबलः । ब्राह्मणं समुपागम्य वचश्चेदमुवाच ह ॥

atha rātryāṃ vyatītāyāṃ bhīmaseno mahābalaḥ | brāhmaṇaṃ samupāgamya vacaścedamuvāca ha

फिर रात बीतने पर महाबली भीमसेन ब्राह्मण के पास गए और यह बात कही:

भीम उवाच

श्लोक 6 (1.177.6)

आपदस्त्वां विमोक्ष्येऽहं सपुत्रं ब्राह्मण प्रियम् । मा भैषी राक्षसात्तस्मान्मां ददातु बलिं भवान् ॥

āpadastvāṃ vimokṣye'haṃ saputraṃ brāhmaṇa priyam | mā bhaiṣī rākṣasāttasmānmāṃ dadātu baliṃ bhavān

"हे ब्राह्मण! मैं आपको आपके प्रिय पुत्र सहित इस विपत्ति से छुड़ाऊँगा। उस राक्षस से मत डरिए; भेंट के रूप में आप मुझे दे दीजिए।

श्लोक 7 (1.177.7)

इह मामाशितं कर्तुं प्रयतस्व सकृद्गृहे । अथात्मानं प्रदास्यामि तस्मै घोराय रक्षसे ॥

iha māmāśitaṃ kartuṃ prayatasva sakṛdgṛhe | athātmānaṃ pradāsyāmi tasmai ghorāya rakṣase

बस एक बार यहाँ घर पर मुझे भरपेट भोजन कराने का प्रयत्न कीजिए; फिर मैं स्वयं को उस भयंकर राक्षस को सौंप दूँगा।

श्लोक 8 (1.177.8)

त्वरध्वं किं विलम्बध्वे मा चिरं कुरुतानघाः । व्यवस्येयं मनः प्राणैर्युष्मान्रक्षितुमद्य वै ॥

tvaradhvaṃ kiṃ vilambadhve mā ciraṃ kurutānaghāḥ | vyavasyeyaṃ manaḥ prāṇairyuṣmānrakṣitumadya vai

शीघ्रता कीजिए! देर क्यों कर रहे हैं? हे निष्पाप जनो, विलम्ब मत कीजिए। आज मैंने अपने प्राणों से आप सबकी रक्षा करने का निश्चय किया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (1.177.9)

एवमुक्तः स भीमेन ब्राह्मणो भरतर्षभ । सुहृदां तत्समाख्याय ददावन्नं सुसंस्कृतम् ॥

evamuktaḥ sa bhīmena brāhmaṇo bharatarṣabha | suhṛdāṃ tatsamākhyāya dadāvannaṃ susaṃskṛtam

हे भरतश्रेष्ठ! भीम के ऐसा कहने पर ब्राह्मण ने अपने मित्रों को यह बात बताई और उसे भली-भाँति तैयार किया हुआ भोजन दिया।

श्लोक 10 (1.177.10)

पिशितोदनमाजह्रुरथास्मै पुरवासिनः । सघृतं सोपदंशं च सूपैर्नानाविधैः सह ॥

piśitodanamājahrurathāsmai puravāsinaḥ | saghṛtaṃ sopadaṃśaṃ ca sūpairnānāvidhaiḥ saha

तब नगरवासी उसके लिए घी और व्यंजनों के साथ मांस-भात तथा अनेक प्रकार की दालें ले आए।

श्लोक 11 (1.177.11)

तदाऽशित्वा भीमसेनो मांसानि विविधानि च । मोदकानि च मुख्यानि चित्रोदनचयान्बहून् ॥

tadā'śitvā bhīmaseno māṃsāni vividhāni ca | modakāni ca mukhyāni citrodanacayānbahūn

भीमसेन ने वह सब खाया, साथ ही अनेक प्रकार के मांस, उत्तम लड्डू और रंग-बिरंगे भात के ढेर भी।

श्लोक 12 (1.177.12)

ततोऽपिबद्दधिघटान्सुबहून्द्रोणसंमितान् । तस्य भुक्तवतः पौरा यथावत्समुपार्जितान् ॥

tato'pibaddadhighaṭānsubahūndroṇasaṃmitān | tasya bhuktavataḥ paurā yathāvatsamupārjitān

फिर उसने द्रोण-भर माप वाले दही के बहुत-से घड़े पी डाले। जब वह खा चुका, तब नगरवासियों ने, जैसा उचित था,

श्लोक 13 (1.177.13)

उपजह्रुर्भृतं भागं समृद्धमनसस्तदा । ततो रात्र्यां व्यतीतायां सव्यञ्जनदधिप्लुतम् ॥

upajahrurbhṛtaṃ bhāgaṃ samṛddhamanasastadā | tato rātryāṃ vyatītāyāṃ savyañjanadadhiplutam

प्रसन्न मन से अपना विधिवत् जुटाया हुआ भाग आगे लाकर रखा। फिर रात बीतने पर

श्लोक 14 (1.177.14)

समारुह्यान्नसंपूर्णं शकटं स वृकोदरः । प्रययौ तूर्यनिर्घोषैः पौरैश्च परिवारितः ॥

samāruhyānnasaṃpūrṇaṃ śakaṭaṃ sa vṛkodaraḥ | prayayau tūryanirghoṣaiḥ pauraiśca parivāritaḥ

वृकोदर व्यंजनों से युक्त, दही से तर, अन्न से भरी गाड़ी पर चढ़कर तुरही की ध्वनि के बीच नगरवासियों से घिरा हुआ चल पड़ा।

पौरा ऊचुः

श्लोक 15 (1.177.15)

आत्मानमेषोऽन्नभूतो राक्षसाय प्रदास्यति । तरुणोऽप्रतिरूपश्च दृढ औदरिको युवा ॥

ātmānameṣo'nnabhūto rākṣasāya pradāsyati | taruṇo'pratirūpaśca dṛḍha audariko yuvā

"यह स्वयं भोजन बनकर अपने को राक्षस को सौंप देगा: ऐसा तरुण, ऐसा अनुपम, ऐसा हृष्ट-पुष्ट, भारी भोजन करने वाला युवक!"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (1.177.16)

वाग्भिरेवंप्रकाराभिः स्तूयमानो वृकोदरः । चुचोद स बलीवर्दौ युक्तौ सर्वाङ्गकालकौ ॥

vāgbhirevaṃprakārābhiḥ stūyamāno vṛkodaraḥ | cucoda sa balīvardau yuktau sarvāṅgakālakau

ऐसे वचनों से प्रशंसित होते हुए वृकोदर ने गाड़ी में जुते, सर्वांग काले दो बैलों को हाँका।

श्लोक 17 (1.177.17)

वादित्राणां प्रवादेन ततस्तं पुरुषादकम् । अभ्यगच्छत्सुसंहृष्टः सर्वत्र मनुजैर्वृतः ॥

vāditrāṇāṃ pravādena tatastaṃ puruṣādakam | abhyagacchatsusaṃhṛṣṭaḥ sarvatra manujairvṛtaḥ

बाजों की ध्वनि के बीच, अत्यन्त प्रसन्न होकर और चारों ओर से लोगों से घिरा हुआ वह उस नरभक्षी की ओर बढ़ा।

श्लोक 18 (1.177.18)

संप्राप्य स च तं देशमेकाकी समुपाययौ । पुरुषादभयाद्भीतस्तत्रैवासीज्जनव्रजः ॥

saṃprāpya sa ca taṃ deśamekākī samupāyayau | puruṣādabhayādbhītastatraivāsījjanavrajaḥ

उस स्थान पर पहुँचकर वह अकेला आगे गया; नरभक्षी के भय से डरी हुई भीड़ वहीं रुक गई।

श्लोक 19 (1.177.19)

स गत्वा दूरमध्वानं दक्षिणामभितो दिशम् । यथोपदिष्टमुद्देशे ददर्श विपुलं द्रुमम् ॥

sa gatvā dūramadhvānaṃ dakṣiṇāmabhito diśam | yathopadiṣṭamuddeśe dadarśa vipulaṃ drumam

दक्षिण दिशा की ओर बहुत दूर जाकर उसने बताए हुए स्थान पर एक विशाल वृक्ष देखा,

श्लोक 20 (1.177.20)

केशमज्जास्थिमेदोभिर्बाहूरुचरणैरपि । आर्द्रैः शुष्कैश्च संकीर्णमभितोऽथ वनस्पतिम् ॥

keśamajjāsthimedobhirbāhūrucaraṇairapi | ārdraiḥ śuṣkaiśca saṃkīrṇamabhito'tha vanaspatim

उस महावृक्ष के चारों ओर बाल, मज्जा, हड्डियाँ, चर्बी, भुजाएँ, जाँघें और पैर बिखरे पड़े थे, कुछ गीले और कुछ सूखे;

श्लोक 21 (1.177.21)

गृध्रकङ्कबलच्छन्नं गोमायुगणसेवितम् । उग्रगन्धमचक्षुष्यं श्मशानमिव दारुणम् ॥

gṛdhrakaṅkabalacchannaṃ gomāyugaṇasevitam | ugragandhamacakṣuṣyaṃ śmaśānamiva dāruṇam

वह गिद्धों, कंकों और कौओं से ढका था, सियारों के झुंड वहाँ घूमते थे; वह दुर्गन्धयुक्त, देखने में असह्य और श्मशान के समान भयानक था।

श्लोक 22 (1.177.22)

तं प्रविश्य महावृक्षं चिन्तयामास वीर्यवान् । यावन्न पश्यते रक्षो बकाभिख्यं बलोत्तरम् ॥

taṃ praviśya mahāvṛkṣaṃ cintayāmāsa vīryavān | yāvanna paśyate rakṣo bakābhikhyaṃ balottaram

उस महावृक्ष के नीचे पहुँचकर उस पराक्रमी ने सोचा: "जब तक बक नाम का वह अत्यन्त बलशाली राक्षस मुझे नहीं देखता,

श्लोक 23 (1.177.23)

आचितं विविधैर्भोज्यैरन्नैरुच्चावचैरिदम् । शकटं सूपसंपूर्णं यावद्द्रक्ष्यति राक्षसः ॥

ācitaṃ vividhairbhojyairannairuccāvacairidam | śakaṭaṃ sūpasaṃpūrṇaṃ yāvaddrakṣyati rākṣasaḥ

जब तक वह राक्षस अनेक प्रकार के छोटे-बड़े भोज्य पदार्थों से लदी, दालों से भरी इस गाड़ी को नहीं देख लेता,

श्लोक 24 (1.177.24)

तावदेवेह भोक्ष्येऽहं दुर्लभं हि पुनर्भवेत् । विप्रकीर्येत सर्वं हि प्रयुद्धे मयि रक्षसा ॥

tāvadeveha bhokṣye'haṃ durlabhaṃ hi punarbhavet | viprakīryeta sarvaṃ hi prayuddhe mayi rakṣasā

तब तक मैं यहीं भोजन कर लूँ, क्योंकि यह फिर मिलना कठिन होगा। राक्षस के साथ मेरा युद्ध छिड़ते ही सब कुछ बिखर जाएगा,

श्लोक 25 (1.177.25)

अभोज्यं हि शवस्पर्शे निगृहीते बके भवेत् । स त्वेवं भीमकर्मा तु भीमसेनोऽभिलक्ष्य च ॥

abhojyaṃ hi śavasparśe nigṛhīte bake bhavet | sa tvevaṃ bhīmakarmā tu bhīmaseno'bhilakṣya ca

और बक के पकड़े जाने पर शव के स्पर्श से यह अन्न खाने योग्य नहीं रहेगा।" ऐसा विचार करके भयंकर कर्म करने वाले भीमसेन

श्लोक 26 (1.177.26)

उपविश्य विविक्तेऽन्नं भुङ्क्ते स्म परमं परः । तं ततः सर्वतोऽपश्यन्द्रुमानारुह्य नागराः ॥

upaviśya vivikte'nnaṃ bhuṅkte sma paramaṃ paraḥ | taṃ tataḥ sarvato'paśyandrumānāruhya nāgarāḥ

एकान्त स्थान में बैठ गए और वह श्रेष्ठ वीर उस उत्तम अन्न को खाने लगा। तब पेड़ों पर चढ़े हुए नगरवासियों ने चारों ओर से उसे देखा,

श्लोक 27 (1.177.27)

नारक्षो बलिमश्नीयादेवं बहु च मानवाः । भुङ्क्ते ब्राह्मणरूपेण बकोऽयमिति चाब्रुवन् ॥

nārakṣo balimaśnīyādevaṃ bahu ca mānavāḥ | bhuṅkte brāhmaṇarūpeṇa bako'yamiti cābruvan

और बहुत-से लोग कहने लगे, "राक्षस के सिवा कोई इस प्रकार भेंट नहीं खा सकता। यह बक ही है, जो ब्राह्मण के रूप में खा रहा है!"

श्लोक 28 (1.177.28)

स तं हसति तेजस्वी तदन्नमुपभुज्य च । आसाद्य तु वनं तस्य रक्षसः पाण्डवो बली । आजुहाव ततो नाम्ना तदन्नमुपपादयन् ॥

sa taṃ hasati tejasvī tadannamupabhujya ca | āsādya tu vanaṃ tasya rakṣasaḥ pāṇḍavo balī | ājuhāva tato nāmnā tadannamupapādayan

वह तेजस्वी अन्न खाते हुए उन पर हँसता रहा। उस राक्षस के वन में पहुँचकर बलवान पाण्डुपुत्र ने अन्न खाते-खाते उसे नाम लेकर पुकारा।

श्लोक 29 (1.177.29)

ततः स राक्षसः क्रुद्धो भीमस्य वचनात्तदा । आजगाम सुसंक्रुद्धो यत्र भीमो व्यवस्थितः ॥

tataḥ sa rākṣasaḥ kruddho bhīmasya vacanāttadā | ājagāma susaṃkruddho yatra bhīmo vyavasthitaḥ

तब भीम की बात सुनकर वह राक्षस अत्यन्त क्रोधित होकर वहाँ आया जहाँ भीम बैठा था।

श्लोक 30 (1.177.30)

महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम् । लोहिताक्षः करालश्च लोहितश्मश्रुमूर्धजः ॥

mahākāyo mahāvego dārayanniva medinīm | lohitākṣaḥ karālaśca lohitaśmaśrumūrdhajaḥ

विशाल शरीर वाला, महावेगशाली, मानो धरती को फाड़ता हुआ, लाल आँखों वाला, विकराल, लाल दाढ़ी और केशों वाला,

श्लोक 31 (1.177.31)

आकर्णाद्भिन्नवक्त्रश्च शङ्कुकर्णो विभीषणः । त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा संदश्य दशनच्छदम् ॥

ākarṇādbhinnavaktraśca śaṅkukarṇo vibhīṣaṇaḥ | triśikhāṃ bhrukuṭiṃ kṛtvā saṃdaśya daśanacchadam

कानों तक फटे मुँह वाला, खूँटे जैसे कानों वाला, भयावह; उसने भौंहें तानकर माथे पर तीन रेखाएँ खींचीं और होंठ चबाया।

श्लोक 32 (1.177.32)

भुञ्जानमन्नं तं दृष्ट्वा भीमसेनं स राक्षसः । विवृत्य नयने क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥

bhuñjānamannaṃ taṃ dṛṣṭvā bhīmasenaṃ sa rākṣasaḥ | vivṛtya nayane kruddha idaṃ vacanamabravīt

भीमसेन को अन्न खाते देखकर उस राक्षस ने आँखें फाड़कर क्रोध से यह वचन कहा:

बक उवाच

श्लोक 33 (1.177.33)

कोऽयमन्नमिदं भुङ्क्ते मदर्थमुपकल्पितम् । पश्यतो मम दुर्बुद्धिर्यियासुर्यमसादनम् ॥

ko'yamannamidaṃ bhuṅkte madarthamupakalpitam | paśyato mama durbuddhiryiyāsuryamasādanam

"यह कौन दुर्बुद्धि है जो मेरे लिए तैयार किया गया यह अन्न मेरी आँखों के सामने खा रहा है? लगता है यह यमलोक जाना चाहता है!"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (1.177.34)

भीमसेनस्ततः श्रुत्वा प्रहसन्निव भारत । राक्षसं तमनादृत्य भुङ्क्त एव पराङ्मुखः ॥

bhīmasenastataḥ śrutvā prahasanniva bhārata | rākṣasaṃ tamanādṛtya bhuṅkta eva parāṅmukhaḥ

हे भारत! यह सुनकर भीमसेन मानो हँस पड़ा और उस राक्षस की उपेक्षा करके मुँह फेरकर खाता ही रहा।

श्लोक 35 (1.177.35)

रवं स भैरवं कृत्वा समुद्यम्य करावुभौ । अभ्यद्रवद्भीमसेनं जिघांसुः पुरुषादकः ॥

ravaṃ sa bhairavaṃ kṛtvā samudyamya karāvubhau | abhyadravadbhīmasenaṃ jighāṃsuḥ puruṣādakaḥ

भयानक गर्जना करके और दोनों हाथ उठाकर वह नरभक्षी भीमसेन को मारने की इच्छा से उस पर झपटा।

श्लोक 36 (1.177.36)

तथापि परिभूयैनं प्रेक्षमाणो वृकोदरः । राक्षसं भुङ्क्त एवान्नं पाण्डवः परवीरहा ॥

tathāpi paribhūyainaṃ prekṣamāṇo vṛkodaraḥ | rākṣasaṃ bhuṅkta evānnaṃ pāṇḍavaḥ paravīrahā

फिर भी शत्रुवीरों का संहारक पाण्डुपुत्र वृकोदर राक्षस को तिरस्कार से देखते हुए अन्न खाता ही रहा।

श्लोक 37 (1.177.37)

अमर्षेण तु संपूर्णः कुन्तीपुत्रं वृकोदरम् । जघान पृष्ठे पाणिभ्यामुभाभ्यां पृष्ठतः स्थितः ॥

amarṣeṇa tu saṃpūrṇaḥ kuntīputraṃ vṛkodaram | jaghāna pṛṣṭhe pāṇibhyāmubhābhyāṃ pṛṣṭhataḥ sthitaḥ

क्रोध से भरकर उस राक्षस ने पीछे खड़े होकर कुन्तीपुत्र वृकोदर की पीठ पर दोनों हाथों से प्रहार किया।

श्लोक 38 (1.177.38)

तथा बलवता भीमः पाणिभ्यां भृशमाहतः । नैवावलोकयामास राक्षसं भुङ्क्त एव सः ॥

tathā balavatā bhīmaḥ pāṇibhyāṃ bhṛśamāhataḥ | naivāvalokayāmāsa rākṣasaṃ bhuṅkta eva saḥ

उस बलवान के दोनों हाथों से ज़ोर से मार खाकर भी भीम ने राक्षस की ओर देखा तक नहीं, और खाता ही रहा।

श्लोक 39 (1.177.39)

ततः स भूयः संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षसः । ताडयिष्यंस्तदा भीमं पुनरभ्यद्रवद्बली ॥

tataḥ sa bhūyaḥ saṃkruddho vṛkṣamādāya rākṣasaḥ | tāḍayiṣyaṃstadā bhīmaṃ punarabhyadravadbalī

तब वह बलवान राक्षस और भी क्रुद्ध होकर एक वृक्ष उठाकर भीम को उससे मारने के लिए फिर उस पर दौड़ा।

श्लोक 40 (1.177.40)

क्षिप्तं क्रुद्धेन तं वृक्षं प्रतिजग्राह वीर्यवान् । सव्येन पाणिना भीमो दक्षिणेनाप्यभुङ्क्त ह ॥

kṣiptaṃ kruddhena taṃ vṛkṣaṃ pratijagrāha vīryavān | savyena pāṇinā bhīmo dakṣiṇenāpyabhuṅkta ha

क्रोध में फेंके गए उस वृक्ष को पराक्रमी भीम ने बाएँ हाथ से पकड़ लिया और दाहिने हाथ से खाता रहा।

श्लोक 41 (1.177.41)

शकटान्नं ततो भुक्त्वा रक्षसः पाणिना सह । गृह्णन्नेव तदा वृक्षं निःशेषं पर्वतोपमम् ॥

śakaṭānnaṃ tato bhuktvā rakṣasaḥ pāṇinā saha | gṛhṇanneva tadā vṛkṣaṃ niḥśeṣaṃ parvatopamam

इस प्रकार राक्षस के हाथों की मार सहते हुए गाड़ी का अन्न खाते-खाते, और पर्वत जैसे उस पूरे वृक्ष को पकड़े हुए ही,

श्लोक 42 (1.177.42)

भीमसेनो हसन्नेव भुक्त्वा त्यक्त्वा च राक्षसम् । पीत्वा दधिघटान्पूर्णान्घृतकुम्भाञ्शतं शतम् ॥

bhīmaseno hasanneva bhuktvā tyaktvā ca rākṣasam | pītvā dadhighaṭānpūrṇānghṛtakumbhāñśataṃ śatam

भीमसेन ने हँसते-हँसते भोजन समाप्त किया और राक्षस को एक ओर छोड़ दिया; फिर उसने दही के भरे घड़े और घी के सैकड़ों-सैकड़ों कलश पी डाले,

श्लोक 43 (1.177.43)

वार्युपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थौ गिरिरिवापरः । भ्रामयन्तं महावृक्षमायान्तं भीमदर्शनम् ॥

vāryupaspṛśya saṃhṛṣṭastasthau giririvāparaḥ | bhrāmayantaṃ mahāvṛkṣamāyāntaṃ bhīmadarśanam

जल से आचमन किया और प्रसन्न होकर दूसरे पर्वत के समान खड़ा हो गया। विशाल वृक्ष घुमाते हुए आते उस भयानक रूप वाले राक्षस को

श्लोक 44 (1.177.44)

दृष्ट्वोत्थायाहवे वीरः सिंहनादं व्यनादयत् । भुजवेगं तथाऽऽस्फोटं क्ष्वेलितं च महास्वनम् ॥

dṛṣṭvotthāyāhave vīraḥ siṃhanādaṃ vyanādayat | bhujavegaṃ tathā''sphoṭaṃ kṣvelitaṃ ca mahāsvanam

देखकर वह वीर युद्ध के लिए उठा और सिंहनाद किया। उसने बड़े वेग से भुजाओं पर ताल ठोकी और ज़ोर की ललकार भरी;

श्लोक 45 (1.177.45)

कृत्वाऽऽह्वयत संक्रुद्धो भीमसेनोऽथ राक्षसम् । उवाचाशनिशब्देन ध्वनिना भीषयन्निव ॥

kṛtvā''hvayata saṃkruddho bhīmaseno'tha rākṣasam | uvācāśaniśabdena dhvaninā bhīṣayanniva

इस प्रकार क्रुद्ध भीमसेन ने राक्षस को ललकारा और वज्र जैसे गर्जन भरे स्वर में, मानो उसे डराते हुए, कहा:

भीम उवाच

श्लोक 46 (1.177.46)

बहुकालं सुपुष्टं ते शरीरं राक्षसाधम । द्विपच्चतुष्पन्मांसैश्च बहुभिश्चौदनैरपि ॥

bahukālaṃ supuṣṭaṃ te śarīraṃ rākṣasādhama | dvipaccatuṣpanmāṃsaiśca bahubhiścaudanairapi

"अरे नीच राक्षस! बहुत समय से तेरा शरीर दो पैरों और चार पैरों वाले प्राणियों के मांस से और ढेरों भात से खूब पला है।

श्लोक 47 (1.177.47)

मद्बाहुबलमाश्रित्य न त्वं भूयस्त्वशिष्यसि । अद्य मद्बाहुनिष्पिष्टो गमिष्यसि यमालयम् ॥

madbāhubalamāśritya na tvaṃ bhūyastvaśiṣyasi | adya madbāhuniṣpiṣṭo gamiṣyasi yamālayam

अब मेरी भुजाओं के बल से टकराकर तू फिर नहीं खा पाएगा। आज मेरी भुजाओं से पिसकर तू यमलोक जाएगा।

श्लोक 48 (1.177.48)

अद्यप्रभृति स्वप्स्यन्ति वेत्रकीयनिवासिनः । निरुद्विग्नाः पुरस्यास्य कण्टके सूद्धृते मया ॥

adyaprabhṛti svapsyanti vetrakīyanivāsinaḥ | nirudvignāḥ purasyāsya kaṇṭake sūddhṛte mayā

आज से वेत्रकीय के निवासी निश्चिन्त होकर सोएँगे, जब मैं इस नगर का काँटा उखाड़ फेंकूँगा।

श्लोक 49 (1.177.49)

अद्य युद्धे शरीरं ते कङ्कगोमायुवायसाः । मया हतस्य खादन्तु विकर्षन्तु च भूतले ॥

adya yuddhe śarīraṃ te kaṅkagomāyuvāyasāḥ | mayā hatasya khādantu vikarṣantu ca bhūtale

आज युद्ध में मेरे हाथों मारे जाने पर तेरे शरीर को कंक, सियार और कौए खाएँ और धरती पर घसीटें।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 50 (1.177.50)

एवमुक्त्वा सुसंक्रुद्धः पार्थो बकजिघांसया । उपाधावद्बकश्चापि पार्थं पार्थिवसत्तम ॥

evamuktvā susaṃkruddhaḥ pārtho bakajighāṃsayā | upādhāvadbakaścāpi pārthaṃ pārthivasattama

हे राजश्रेष्ठ! ऐसा कहकर अत्यन्त क्रुद्ध पार्थ बक को मारने की इच्छा से उसकी ओर दौड़ा, और बक भी पार्थ की ओर लपका,

श्लोक 51 (1.177.51)

महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम् । पिशङ्गरूपः पिङ्गाक्षो भीमसेनमभिद्रवत् ॥

mahākāyo mahāvego dārayanniva medinīm | piśaṅgarūpaḥ piṅgākṣo bhīmasenamabhidravat

विशाल शरीर वाला, वेगवान, मानो धरती को फाड़ता हुआ; पिंगल वर्ण और पीली आँखों वाला वह भीमसेन पर टूट पड़ा।

श्लोक 52 (1.177.52)

त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा संदश्य दशनच्छदम् । भृशं स भूयः संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षसः ॥

triśikhāṃ bhrukuṭīṃ kṛtvā saṃdaśya daśanacchadam | bhṛśaṃ sa bhūyaḥ saṃkruddho vṛkṣamādāya rākṣasaḥ

भौंहें तानकर तीन रेखाएँ बनाते हुए और होंठ चबाते हुए वह राक्षस और भी अधिक क्रोधित होकर एक वृक्ष उठाकर

श्लोक 53 (1.177.53)

ताडयिष्यंस्तदा भीमं तरसाऽभ्यद्रवद्बली । क्रुद्धेनाभिहतं वृक्षं प्रतिजग्राह लीलया ॥

tāḍayiṣyaṃstadā bhīmaṃ tarasā'bhyadravadbalī | kruddhenābhihataṃ vṛkṣaṃ pratijagrāha līlayā

भीम को मारने के लिए वह बलवान तेज़ी से दौड़ा। क्रोध में चलाए गए उस वृक्ष को भीम ने खेल-खेल में पकड़ लिया,

श्लोक 54 (1.177.54)

सव्येन पाणिना भीमः प्रहसन्निव भारत । ततः स पुनरुद्यम्य वृक्षान्बहुविधान्बली ॥

savyena pāṇinā bhīmaḥ prahasanniva bhārata | tataḥ sa punarudyamya vṛkṣānbahuvidhānbalī

हे भारत, बाएँ हाथ से, मानो हँसते हुए। तब बलवान बक ने फिर अनेक प्रकार के वृक्ष उठाकर

श्लोक 55 (1.177.55)

प्राहिणोद्भीमसेनाय बकोऽपि बलवान्रणे । सर्वानपोहयद्वृक्षान्स्वस्य हस्तस्य शाखया ॥

prāhiṇodbhīmasenāya bako'pi balavānraṇe | sarvānapohayadvṛkṣānsvasya hastasya śākhayā

युद्ध में बलवान उसने उन्हें भीमसेन पर फेंका; पर भीम ने अपने हाथ में पकड़ी शाखा से उन सब वृक्षों को हटा दिया।

श्लोक 56 (1.177.56)

तद्वृक्षयुद्धमभवद्वृक्षषण्डविनाशनम् । महत्सुघोरं राजेन्द्र बकपाण्डवयोस्तदा ॥

tadvṛkṣayuddhamabhavadvṛkṣaṣaṇḍavināśanam | mahatsughoraṃ rājendra bakapāṇḍavayostadā

हे राजेन्द्र! तब बक और पाण्डुपुत्र के बीच वृक्षों से अत्यन्त भयंकर महायुद्ध हुआ, जिसमें वृक्षों के झुरमुट के झुरमुट नष्ट हो गए।

श्लोक 57 (1.177.57)

नाम विश्राव्य स बकः समभिद्रुत्य पाण्डवम् । समयुध्यत तीव्रेण वेगेन पुरुषादकः ॥

nāma viśrāvya sa bakaḥ samabhidrutya pāṇḍavam | samayudhyata tīvreṇa vegena puruṣādakaḥ

अपना नाम सुनाकर वह नरभक्षी बक पाण्डुपुत्र पर झपटा और तीव्र वेग से लड़ने लगा।

श्लोक 58 (1.177.58)

तयोर्वेगेन महता पृथिवी समकम्पत । पादपांश्च महामात्रांश्चूर्णयामासतुः क्षणात् ॥

tayorvegena mahatā pṛthivī samakampata | pādapāṃśca mahāmātrāṃścūrṇayāmāsatuḥ kṣaṇāt

उनके प्रचण्ड वेग से पृथ्वी काँप उठी, और उन्होंने क्षण भर में विशाल वृक्षों को चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 59 (1.177.59)

द्रुतमागत्य पाणिभ्यां गृहीत्वा चैनमाक्षिपत् । आक्षिप्तो भीमसेनश्च पुनरेवोत्थितो हसन् ॥

drutamāgatya pāṇibhyāṃ gṛhītvā cainamākṣipat | ākṣipto bhīmasenaśca punarevotthito hasan

बक ने झपटकर दोनों हाथों से उसे पकड़ा और पटक दिया; पर पटका गया भीमसेन हँसता हुआ फिर उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 60 (1.177.60)

आलिङ्ग्यापि बकं भीमो न्यहनद्वसुधातले । भीमो विसर्जयित्वैनं समाश्वसिहि राक्षस ॥

āliṅgyāpi bakaṃ bhīmo nyahanadvasudhātale | bhīmo visarjayitvainaṃ samāśvasihi rākṣasa

फिर भीम ने बक को जकड़कर धरती पर दे मारा; फिर उसे छोड़ते हुए बोला: "राक्षस, ज़रा साँस ले ले!"

श्लोक 61 (1.177.61)

इत्युक्त्वा पुनरास्फोट्य उत्तिष्ठेति च सोऽब्रवीत् । समुत्पत्य ततः क्रुद्धो रूपं कृत्वा महत्तरम् ॥

ityuktvā punarāsphoṭya uttiṣṭheti ca so'bravīt | samutpatya tataḥ kruddho rūpaṃ kṛtvā mahattaram

ऐसा कहकर उसने फिर ताल ठोकी और कहा, "उठ!" तब राक्षस क्रोध से उछलकर खड़ा हुआ और उसने अपना रूप और भी विशाल बना लिया,

श्लोक 62 (1.177.62)

विरूपः सहसा तस्थौ तर्जयित्वा वृकोदरम् । अहसद्भीमसेनोऽपि राक्षसं भीमदर्शनम् ॥

virūpaḥ sahasā tasthau tarjayitvā vṛkodaram | ahasadbhīmaseno'pi rākṣasaṃ bhīmadarśanam

और विकराल रूप में सहसा वृकोदर को धमकाता हुआ खड़ा हो गया। भीमसेन उस भयानक दिखने वाले राक्षस पर हँस पड़ा।

श्लोक 63 (1.177.63)

असौ गृहीत्वा पाणिभ्यां पृष्ठतश्च व्यवस्थितः । जानुभ्यां पीडयित्वाथ पातयामास भूतले ॥

asau gṛhītvā pāṇibhyāṃ pṛṣṭhataśca vyavasthitaḥ | jānubhyāṃ pīḍayitvātha pātayāmāsa bhūtale

उसके पीछे खड़े होकर भीम ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, घुटनों से दबाया और धरती पर पटक दिया।

श्लोक 64 (1.177.64)

पुनः क्रुद्धो विसृज्यैनं राक्षसं क्रोधजीवितम् । स्वां कटीमीषदुन्नम्य बाहू तस्य परामृशत् ॥

punaḥ kruddho visṛjyainaṃ rākṣasaṃ krodhajīvitam | svāṃ kaṭīmīṣadunnamya bāhū tasya parāmṛśat

फिर क्रोध में उसने उस क्रोध पर ही जीने वाले राक्षस को छोड़ दिया, और अपनी कमर थोड़ी झुकाकर उसकी भुजाएँ पकड़ लीं।

श्लोक 65 (1.177.65)

तस्य बाहू समादाय त्वरमाणो वृकोदरः । उत्क्षिप्य चावधूयैनं पातयन्बलवान्भुवि ॥

tasya bāhū samādāya tvaramāṇo vṛkodaraḥ | utkṣipya cāvadhūyainaṃ pātayanbalavānbhuvi

उसकी भुजाएँ पकड़कर वृकोदर ने फुर्ती से उसे ऊपर उठाया, झकझोरा और पूरे बल से धरती पर पटक दिया।

श्लोक 66 (1.177.66)

तं तु वामेन पादेन क्रुद्धो भीमपराक्रमः । उरस्येनं समाजघ्ने भीमस्तु पतितं भुवि ॥

taṃ tu vāmena pādena kruddho bhīmaparākramaḥ | urasyenaṃ samājaghne bhīmastu patitaṃ bhuvi

धरती पर गिरे हुए उस राक्षस की छाती पर भयंकर पराक्रमी भीम ने क्रोध में बाएँ पैर से प्रहार किया।

श्लोक 67 (1.177.67)

व्यात्ताननेन घोरेण लम्बजिह्वेन रक्षसा । तेनाभिद्रुत्य भीमेन भीमो मूर्ध्नि समाहतः ॥

vyāttānanena ghoreṇa lambajihvena rakṣasā | tenābhidrutya bhīmena bhīmo mūrdhni samāhataḥ

तब मुँह फाड़े और जीभ लटकाए उस भयंकर राक्षस ने झपटकर भीम के सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 68 (1.177.68)

एवं निहन्यमानः स राक्षसेन बलीयसा । रोषेण महताऽऽविष्टो भीमो भीमपराक्रमः ॥

evaṃ nihanyamānaḥ sa rākṣasena balīyasā | roṣeṇa mahatā''viṣṭo bhīmo bhīmaparākramaḥ

उस बलवान राक्षस से इस प्रकार मार खाकर भयंकर पराक्रमी भीम महान क्रोध से भर उठा।

श्लोक 69 (1.177.69)

गृहीत्वा मध्यमुत्क्षिप्य बली जग्राह राक्षसम् । तावन्योन्यं पीडयन्तौ पुरुषादवृकोदरौ ॥

gṛhītvā madhyamutkṣipya balī jagrāha rākṣasam | tāvanyonyaṃ pīḍayantau puruṣādavṛkodarau

बलवान भीम ने उसे बीच से पकड़कर ऊपर उठाया और जकड़ लिया। तब एक-दूसरे को दबाते हुए वे दोनों, नरभक्षी और वृकोदर,

श्लोक 70 (1.177.70)

मत्ताविव महानागावन्योन्यं विचकर्षतुः ॥

mattāviva mahānāgāvanyonyaṃ vicakarṣatuḥ

मदमत्त महागजों की भाँति एक-दूसरे को खींचने लगे।

श्लोक 71 (1.177.71)

बाहुविक्षेपशब्दैश्च भीमराक्षसयोस्तदा । वेत्रकीयपुरी सर्वा वित्रस्ता समपद्यत ॥

bāhuvikṣepaśabdaiśca bhīmarākṣasayostadā | vetrakīyapurī sarvā vitrastā samapadyata

भीम और राक्षस की भुजाओं के प्रहारों के शब्द से सारी वेत्रकीय नगरी भयभीत हो उठी।

श्लोक 72 (1.177.72)

तयोर्वेगेन महता तत्र भूमिरकम्पत । पादपान्वीरुधश्चैव चूर्णयामासतू रयात् ॥

tayorvegena mahatā tatra bhūmirakampata | pādapānvīrudhaścaiva cūrṇayāmāsatū rayāt

उनके प्रचण्ड वेग से वहाँ की भूमि काँप उठी, और उन्होंने अपने वेग से वृक्षों और लताओं को चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 73 (1.177.73)

समागतौ च तौ वीरावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ । गिरिभिर्गिरिशृङ्गैश्च पाषाणैः पर्वतच्युतैः ॥

samāgatau ca tau vīrāvanyonyavadhakāṅkṣiṇau | giribhirgiriśṛṅgaiśca pāṣāṇaiḥ parvatacyutaiḥ

एक-दूसरे का वध चाहने वाले वे दोनों वीर भिड़ गए। पहाड़ियों, पर्वत-शिखरों और पर्वतों से गिरी चट्टानों से

श्लोक 74 (1.177.74)

अन्योन्यं ताडयन्तौ तौ चूर्णयामासतुस्तदा । आयामविस्तराभ्यां च परितो योजनद्वयम् ॥

anyonyaṃ tāḍayantau tau cūrṇayāmāsatustadā | āyāmavistarābhyāṃ ca parito yojanadvayam

एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए उन्होंने उन्हें चूर-चूर कर डाला। लम्बाई-चौड़ाई में चारों ओर दो योजन तक

श्लोक 75 (1.177.75)

निर्महीरुहपाषाणतृणकुञ्जलतावलिम् । चक्रतुर्युद्धदुर्मत्तौ कूर्मपृष्ठोपमां महीम् ॥

nirmahīruhapāṣāṇatṛṇakuñjalatāvalim | cakraturyuddhadurmattau kūrmapṛṣṭhopamāṃ mahīm

युद्ध के उन्माद में डूबे उन दोनों ने धरती को कछुए की पीठ जैसी बना दिया, जहाँ न वृक्ष रहे, न चट्टानें, न घास, न झाड़ियाँ और न लताओं के जाल।

श्लोक 76 (1.177.76)

मुहूर्तमेवं संयुध्य समं रक्षःकुरूद्वहौ । ततो रक्षोविनाशाय मतिं कृत्वा कुरूत्तमः ॥

muhūrtamevaṃ saṃyudhya samaṃ rakṣaḥkurūdvahau | tato rakṣovināśāya matiṃ kṛtvā kurūttamaḥ

इस प्रकार राक्षस और कुरुकुल-धुरन्धर कुछ देर तक बराबरी से लड़ते रहे; फिर कुरुश्रेष्ठ ने राक्षस का विनाश करने का निश्चय किया।

श्लोक 77 (1.177.77)

दन्तान्कटकटीकृत्य दष्ट्वा च दशनच्छदम् । नेत्रे संवृत्य विकटं तिर्यक्प्रैक्षत राक्षसम् ॥

dantānkaṭakaṭīkṛtya daṣṭvā ca daśanacchadam | netre saṃvṛtya vikaṭaṃ tiryakpraikṣata rākṣasam

दाँत किटकिटाते और होंठ चबाते हुए उसने भयानक ढंग से आँखें घुमाईं और तिरछी नज़र से राक्षस को घूरा।

श्लोक 78 (1.177.78)

अथ तं लोलयित्वा तु भीमसेनो महाबलः । अगृह्णात्परिरभ्यैनं बाहुभ्यां परिरभ्य च ॥

atha taṃ lolayitvā tu bhīmaseno mahābalaḥ | agṛhṇātparirabhyainaṃ bāhubhyāṃ parirabhya ca

तब महाबली भीमसेन ने उसे झकझोरकर पकड़ लिया और दोनों भुजाओं में कसकर जकड़ लिया।

श्लोक 79 (1.177.79)

जानुभ्यां पार्श्वयोः कुक्षौ पृष्ठे वक्षसि जघ्निवान् । भग्नोरुबाहुहृच्चैव विस्रंसद्देहबन्धनः ॥

jānubhyāṃ pārśvayoḥ kukṣau pṛṣṭhe vakṣasi jaghnivān | bhagnorubāhuhṛccaiva visraṃsaddehabandhanaḥ

उसने घुटनों से उसकी पसलियों, पेट, पीठ और छाती पर प्रहार किया। जाँघें, भुजाएँ और हृदय टूट जाने से, शरीर के जोड़ ढीले पड़ने लगे,

श्लोक 80 (1.177.80)

प्रस्वेददीर्घनिश्वासो निर्यञ्जीवाक्षितारकः । अजाण्डास्फोटनं कुर्वन्नाक्रोशंश्च श्वसञ्छनैः ॥

prasvedadīrghaniśvāso niryañjīvākṣitārakaḥ | ajāṇḍāsphoṭanaṃ kurvannākrośaṃśca śvasañchanaiḥ

पसीने से तर, लम्बी-लम्बी साँसें लेता हुआ, प्राण और आँखों की पुतलियाँ बाहर निकलती हुईं, चटकने-फटने की-सी आवाज़ करता, चीखता और धीरे-धीरे साँस लेता हुआ,

श्लोक 81 (1.177.81)

भूमौ निपत्य विलुठन्दण्डाहत इवोरगः । विस्फुरन्तं महाकायं परितो विचकर्ष ह ॥

bhūmau nipatya viluṭhandaṇḍāhata ivoragaḥ | visphurantaṃ mahākāyaṃ parito vicakarṣa ha

वह धरती पर गिरकर डंडे से मारे गए साँप की तरह छटपटाने लगा। भीम ने उस विशाल, तड़पते शरीर को चारों ओर घसीटा।

श्लोक 82 (1.177.82)

विकृष्यमाणो वेगेन पाण्डवेन बलीयसा । समयुज्यत तीव्रेण श्रमेण पुरुषादकः ॥

vikṛṣyamāṇo vegena pāṇḍavena balīyasā | samayujyata tīvreṇa śrameṇa puruṣādakaḥ

बलवान पाण्डुपुत्र द्वारा वेग से घसीटे जाने पर वह नरभक्षी भारी थकान से चूर हो गया।

श्लोक 83 (1.177.83)

हीयमानबलं रक्षः समीक्ष्य पुरुषर्षभः । निष्पिष्य भूमौ जानुभ्यां समाजघ्ने वृकोदरः ॥

hīyamānabalaṃ rakṣaḥ samīkṣya puruṣarṣabhaḥ | niṣpiṣya bhūmau jānubhyāṃ samājaghne vṛkodaraḥ

राक्षस का बल घटता देखकर पुरुषश्रेष्ठ वृकोदर ने उसे घुटनों से धरती पर दबाकर उस पर प्रहार किया।

श्लोक 84 (1.177.84)

ततोऽस्य जानुना पृष्ठमवपीड्य बलादिव । बाहुना परिजग्राह दक्षिणेन शिरोधराम् ॥

tato'sya jānunā pṛṣṭhamavapīḍya balādiva | bāhunā parijagrāha dakṣiṇena śirodharām

फिर उसने एक घुटने से उसकी पीठ को ज़ोर से दबाया और दाहिनी भुजा से उसकी गर्दन जकड़ ली।

श्लोक 85 (1.177.85)

सव्येन च कटीदेशे गृह्य वाससि पाण्डवः । जानुन्यारोप्य तत्पृष्ठं महाशब्दं बभञ्ज ह ॥

savyena ca kaṭīdeśe gṛhya vāsasi pāṇḍavaḥ | jānunyāropya tatpṛṣṭhaṃ mahāśabdaṃ babhañja ha

बाएँ हाथ से उसकी कमर का वस्त्र पकड़कर पाण्डुपुत्र ने उसकी पीठ अपने घुटने पर रखी और भारी आवाज़ के साथ उसे तोड़ डाला।

श्लोक 86 (1.177.86)

ततोऽस्य रुधिरं वक्त्रात्प्रादुरासीद्विशांपते । भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षसः ॥

tato'sya rudhiraṃ vaktrātprādurāsīdviśāṃpate | bhajyamānasya bhīmena tasya ghorasya rakṣasaḥ

हे प्रजानाथ! तब भीम द्वारा तोड़े जाते उस भयंकर राक्षस के मुँह से रक्त बहने लगा।

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