आदि पर्व · अध्याय 18
समुद्र-मन्थन
अनन्त मन्दर पर्वत को उखाड़ते हैं, कच्छपराज उसे अपनी पीठ पर धारण करते हैं, और वासुकि को रस्सी बनाकर देवता और असुर समुद्र का मन्थन करते हैं। सबसे पहले हालाहल विष निकलता है, जिसे शिव पीकर नीलकण्ठ कहलाते हैं। मन्थन चलता रहता है; पर्वत पर आग और वर्षा होती है, जल दूध और घी बन जाता है, और थके हुए मथने वालों को विष्णु फिर से बल देते हैं। समुद्र से चन्द्रमा, श्री, सुरा, श्वेत अश्व, कौस्तुभ मणि और अमृत लिए धन्वन्तरि प्रकट होते हैं; जब दानव अमृत पर अधिकार जताते हैं, तब नारायण मोहिनी का रूप धरकर अमृत केवल देवताओं को देते हैं।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (1.18.1)
ततोऽभ्रशिखराकारैर्गिरिशृङ्गैरलंकृतम् । मन्दरं पर्वतवरं लताजालसमाकुलम् ॥
tato'bhraśikharākārairgiriśṛṅgairalaṃkṛtam | mandaraṃ parvatavaraṃ latājālasamākulam
तब वे मन्दर पर्वत के पास गए — जो पर्वतों में श्रेष्ठ है, बादलों के शिखरों जैसे शृंगों से सुशोभित और लताओं के जाल से भरा है,
श्लोक 2 (1.18.2)
नानाविहंगसंघुष्टं नानादंष्ट्रिसमाकुलम् । किंनरैरप्सरोभिश्च देवैरपि च सेवितम् ॥
nānāvihaṃgasaṃghuṣṭaṃ nānādaṃṣṭrisamākulam | kiṃnarairapsarobhiśca devairapi ca sevitam
जो अनेक प्रकार के पक्षियों के कलरव से गूँजता है, अनेक प्रकार के दाढ़ों वाले पशुओं से भरा है, और किन्नरों, अप्सराओं तथा देवताओं से भी सेवित है।
श्लोक 3 (1.18.3)
एकादश सहस्राणि योजनानां समुच्छ्रितम् । अधोभूमेः सहस्रेषु तावत्स्वेव प्रतिष्ठितम् ॥
ekādaśa sahasrāṇi yojanānāṃ samucchritam | adhobhūmeḥ sahasreṣu tāvatsveva pratiṣṭhitam
वह ग्यारह हज़ार योजन ऊँचा है और भूमि के नीचे भी उतने ही हज़ार योजन तक जमा हुआ है।
श्लोक 4 (1.18.4)
तमुद्धर्तुमशक्ता वै सर्वे देवगणास्तदा । विष्णुमासीनमभ्येत्य ब्रह्माणं चेदमब्रुवन् ॥
tamuddhartumaśaktā vai sarve devagaṇāstadā | viṣṇumāsīnamabhyetya brahmāṇaṃ cedamabruvan
जब सब देवगण उसे उखाड़ने में असमर्थ रहे, तब वे वहाँ बैठे विष्णु और ब्रह्मा के पास जाकर बोले —
श्लोक 5 (1.18.5)
भवन्तावत्र कुरुतां बुद्धिं नैःश्रेयसीं पराम् । मन्दरोद्धरणे यत्नः क्रियतां च हिताय नः ॥
bhavantāvatra kurutāṃ buddhiṃ naiḥśreyasīṃ parām | mandaroddharaṇe yatnaḥ kriyatāṃ ca hitāya naḥ
'आप दोनों इस विषय में परम कल्याणकारी उपाय सोचें। हमारे हित के लिए मन्दर को उखाड़ने का यत्न किया जाए।'
श्लोक 6 (1.18.6)
तथेति चाब्रवीद्विष्णुर्ब्रह्मणा सह भार्गव । अचोदयदमेयात्मा फणीन्द्रं पद्मलोचनः ॥
tatheti cābravīdviṣṇurbrahmaṇā saha bhārgava | acodayadameyātmā phaṇīndraṃ padmalocanaḥ
हे भार्गव, ब्रह्मा के साथ विष्णु ने कहा — 'ऐसा ही हो।' और अपरिमेय आत्मा वाले कमलनयन विष्णु ने नागराज को प्रेरित किया।
श्लोक 7 (1.18.7)
ततोऽनन्तः समुत्थाय ब्रह्मणा परिचोदितः । नारायणेन चाप्युक्तस्तस्मिन्कर्मणि वीर्यवान् ॥
tato'nantaḥ samutthāya brahmaṇā paricoditaḥ | nārāyaṇena cāpyuktastasminkarmaṇi vīryavān
तब ब्रह्मा द्वारा प्रेरित और नारायण द्वारा उस कार्य के लिए आदेशित पराक्रमी अनन्त उठ खड़े हुए।
श्लोक 8 (1.18.8)
अथ पर्वतराजानं तमनन्तो महाबलः । उज्जहार बलाद्ब्रह्मन्सवनं सवनौकसम् ॥
atha parvatarājānaṃ tamananto mahābalaḥ | ujjahāra balādbrahmansavanaṃ savanaukasam
हे ब्रह्मन्, तब महाबली अनन्त ने उस पर्वतराज को उसके वनों और वनवासी प्राणियों सहित बलपूर्वक उखाड़ लिया।
श्लोक 9 (1.18.9)
ततस्तेन सुराः सार्धं समुद्रमुपतस्थिरे । तमूचुरमृतस्यार्थे निर्मथिष्यामहे जलम् ॥
tatastena surāḥ sārdhaṃ samudramupatasthire | tamūcuramṛtasyārthe nirmathiṣyāmahe jalam
तब देवता उसके साथ समुद्र के पास पहुँचे और उससे बोले — 'हम अमृत के लिए तुम्हारे जल का मन्थन करेंगे।'
श्लोक 10 (1.18.10)
अपांपतिरथोवाच ममाप्यंशो भवेत्ततः । सोढाऽस्मि विपुलं मर्दं मन्दरभ्रमणादिति ॥
apāṃpatirathovāca mamāpyaṃśo bhavettataḥ | soḍhā'smi vipulaṃ mardaṃ mandarabhramaṇāditi
तब जल के स्वामी ने कहा — 'तो उसमें मेरा भी भाग हो। मन्दर के घूमने से होने वाला भारी मर्दन मैं सह लूँगा।'
श्लोक 11 (1.18.11)
ऊचुश्च कूर्मराजानमकूपारे सुरासुराः । अधिष्ठानं गिरेरस्य भवान्भवितुमर्हति ॥
ūcuśca kūrmarājānamakūpāre surāsurāḥ | adhiṣṭhānaṃ girerasya bhavānbhavitumarhati
और समुद्र में देवताओं तथा असुरों ने कच्छपराज से कहा — 'आप इस पर्वत का आधार बनें।'
श्लोक 12 (1.18.12)
कूर्मेण तु तथेत्युक्त्वा पृष्ठमस्य समर्पितम् । तं शैलं तस्य पृष्ठस्थं वज्रेणेन्द्रोऽभ्यपीडयत् ॥
kūrmeṇa tu tathetyuktvā pṛṣṭhamasya samarpitam | taṃ śailaṃ tasya pṛṣṭhasthaṃ vajreṇendro'bhyapīḍayat
कच्छप ने 'ऐसा ही हो' कहकर अपनी पीठ अर्पित कर दी, और उस पीठ पर टिके पर्वत को इन्द्र ने वज्र से दबाए रखा।
श्लोक 13 (1.18.13)
मन्थानं मन्दरं कृत्वा तथा योक्त्रं च वासुकिम् । देवा मथितुमारब्धाः समुद्रं निधिमम्भसाम् । अमृतार्थे पुरा ब्रह्मंस्तथैवासुरदानवाः ॥
manthānaṃ mandaraṃ kṛtvā tathā yoktraṃ ca vāsukim | devā mathitumārabdhāḥ samudraṃ nidhimambhasām | amṛtārthe purā brahmaṃstathaivāsuradānavāḥ
हे ब्रह्मन्, प्राचीन काल में मन्दर को मथानी और वासुकि को रस्सी बनाकर देवताओं ने अमृत के लिए जलनिधि समुद्र को मथना आरम्भ किया, और वैसे ही असुरों और दानवों ने भी।
श्लोक 14 (1.18.14)
एकमन्तमुपाश्लिष्टा नागराज्ञो महासुराः ॥
ekamantamupāśliṣṭā nāgarājño mahāsurāḥ
महान असुरों ने नागराज का एक छोर पकड़ा,
श्लोक 15 (1.18.15)
विबुधाः सहिताः सर्वे यतः पुच्छं ततः स्थिताः । अनन्तो भगवान्देवो यतो नारायणः स्थितः ॥
vibudhāḥ sahitāḥ sarve yataḥ pucchaṃ tataḥ sthitāḥ | ananto bhagavāndevo yato nārāyaṇaḥ sthitaḥ
और सब देवता मिलकर पूँछ की ओर खड़े हुए। भगवान अनन्त देव वहीं खड़े थे जहाँ नारायण थे।
श्लोक 16 (1.18.16)
वासुकेरग्रमाश्लिष्टा नागराज्ञो महासुराः । शिर उत्क्षिप्य नागस्य पुनः पुनरवाक्षिपन् ॥
vāsukeragramāśliṣṭā nāgarājño mahāsurāḥ | śira utkṣipya nāgasya punaḥ punaravākṣipan
महान असुरों ने वासुकि का अगला भाग पकड़ रखा था; वे नाग का सिर उठा-उठाकर बार-बार पटकते रहे।
श्लोक 17 (1.18.17)
वासुकेरथ नागस्य सहसा क्षिप्यतोऽसुरैः । सधूमाः सार्चिषो वाता निष्पेतुरसकृन्मुखात् ॥
vāsukeratha nāgasya sahasā kṣipyato'suraiḥ | sadhūmāḥ sārciṣo vātā niṣpeturasakṛnmukhāt
असुरों द्वारा वेग से खींचे-झटके जाते हुए नाग वासुकि के मुख से बार-बार धुएँ और लपटों से भरी हवाएँ निकलने लगीं।
श्लोक 18 (1.18.18)
वासुकेर्मथ्यमानस्य निःसृतेन विषेण च । अभवन्मिश्रितं तोयं तदा भार्गवनन्दन ॥
vāsukermathyamānasya niḥsṛtena viṣeṇa ca | abhavanmiśritaṃ toyaṃ tadā bhārgavanandana
हे भार्गवनन्दन, मथे जाते हुए वासुकि से निकले विष से तब समुद्र का जल मिश्रित हो गया।
श्लोक 19 (1.18.19)
मथनान्मन्दरेणाथ देवदानवबाहुभिः । विषं तीक्ष्णं समुद्भूतं हालाहलमिति श्रुतम् ॥
mathanānmandareṇātha devadānavabāhubhiḥ | viṣaṃ tīkṣṇaṃ samudbhūtaṃ hālāhalamiti śrutam
मन्दर और देवताओं-दानवों की भुजाओं द्वारा किए गए मन्थन से एक तीक्ष्ण विष उत्पन्न हुआ, जो हालाहल नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 20 (1.18.20)
देवाश्च दानवाश्चैव दग्धाश्चैव विषेण ह । अपाक्रामंस्ततो भीता विषादमगमंस्तदा ॥
devāśca dānavāścaiva dagdhāścaiva viṣeṇa ha | apākrāmaṃstato bhītā viṣādamagamaṃstadā
देवता और दानव दोनों उस विष से झुलस गए; वे भयभीत होकर पीछे हट गए और विषाद में डूब गए।
श्लोक 21 (1.18.21)
ब्रह्माणमब्रुवन्देवाः समेत्य मुनिपुंगवैः । मथ्यमानेऽमृते जातं विषं कालानलप्रभम् ॥
brahmāṇamabruvandevāḥ sametya munipuṃgavaiḥ | mathyamāne'mṛte jātaṃ viṣaṃ kālānalaprabham
श्रेष्ठ मुनियों के साथ देवता ब्रह्मा के पास गए और बोले — 'अमृत-मन्थन के समय कालाग्नि के समान दहकता विष उत्पन्न हुआ है।
श्लोक 22 (1.18.22)
तेनैव तापिता लोकास्तस्य प्रतिकुरुष्व ह । एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा दध्यौ लोकेश्वरं हरम् ॥
tenaiva tāpitā lokāstasya pratikuruṣva ha | evamuktastadā brahmā dadhyau lokeśvaraṃ haram
उसी से सारे लोक संतप्त हो रहे हैं; उसका प्रतिकार कीजिए।' ऐसा कहे जाने पर ब्रह्मा ने लोकेश्वर हर का ध्यान किया —
श्लोक 23 (1.18.23)
त्र्यक्षं त्रिशूलिनं रुद्रं देवदेवमुमापतिम् । तदाऽथ चिन्तितो देवस्तज्ज्ञात्वा द्रुतमाययौ ॥
tryakṣaṃ triśūlinaṃ rudraṃ devadevamumāpatim | tadā'tha cintito devastajjñātvā drutamāyayau
तीन नेत्रों वाले, त्रिशूलधारी, देवाधिदेव, उमापति रुद्र का। इस प्रकार स्मरण किए जाने पर वे देव सब जानकर तुरन्त आ पहुँचे।
श्लोक 24 (1.18.24)
तस्याथ देवस्तत्सर्वमाचचक्षे प्रजापतिः । तच्छ्रुत्वा देवदेवेशो लोकस्यास्य हितेप्सया ॥
tasyātha devastatsarvamācacakṣe prajāpatiḥ | tacchrutvā devadeveśo lokasyāsya hitepsayā
तब प्रजापति ब्रह्मा ने उन्हें सारी बात बताई। यह सुनकर देवाधिदेव ने इस लोक के हित की इच्छा से
श्लोक 25 (1.18.25)
अपिबत्तद्विषं रुद्रः कालानलसमप्रभम् । कण्ठे स्थापितवान्देवो लोकानां हितकाम्यया ॥
apibattadviṣaṃ rudraḥ kālānalasamaprabham | kaṇṭhe sthāpitavāndevo lokānāṃ hitakāmyayā
कालाग्नि के समान प्रभा वाले उस विष को रुद्र ने पी लिया, और लोकों के कल्याण की कामना से उसे अपने कण्ठ में ही रोक लिया।
श्लोक 26 (1.18.26)
यस्मात्तु नीलता कण्ठे नीलकण्ठस्ततः स्मृतः । पीतमात्रे विषे तत्र रुद्रेणामिततेजसा ॥
yasmāttu nīlatā kaṇṭhe nīlakaṇṭhastataḥ smṛtaḥ | pītamātre viṣe tatra rudreṇāmitatejasā
क्योंकि उनके कण्ठ में नीलापन आ गया, इसलिए वे तभी से नीलकण्ठ कहलाते हैं। अपरिमित तेज वाले रुद्र के विष पी लेने पर
श्लोक 27 (1.18.27)
देवाः प्रीताः पुनर्जग्मुश्चक्रुर्वै कर्म तत्तथा । मथ्यमानेऽमृतस्यार्थे भूयो वै देवदानवैः ॥
devāḥ prītāḥ punarjagmuścakrurvai karma tattathā | mathyamāne'mṛtasyārthe bhūyo vai devadānavaiḥ
देवता प्रसन्न होकर लौटे और उस काम में फिर से लग गए; अमृत के लिए देवताओं और दानवों ने फिर मन्थन आरम्भ किया।
श्लोक 28 (1.18.28)
वासुकेरथ नागस्य सहसा क्षिप्यतोऽसुरैः । सधूमाः सार्चिषो वाता निष्पेतुरसकृन्मुखात् ॥
vāsukeratha nāgasya sahasā kṣipyato'suraiḥ | sadhūmāḥ sārciṣo vātā niṣpeturasakṛnmukhāt
असुरों द्वारा वेग से खींचे-झटके जाते हुए नाग वासुकि के मुख से बार-बार धुएँ और लपटों से भरी हवाएँ निकलने लगीं।
श्लोक 29 (1.18.29)
ते धूमसङ्घाः संभूता मेघसङ्घाः सविद्युतः । अभ्यवर्षन्सुरगणाञ्श्रमसंतापकर्शितान् ॥
te dhūmasaṅghāḥ saṃbhūtā meghasaṅghāḥ savidyutaḥ | abhyavarṣansuragaṇāñśramasaṃtāpakarśitān
वे धुएँ के समूह बिजली से युक्त मेघों के समूह बन गए, और परिश्रम तथा ताप से थके देवगणों पर बरसने लगे।
श्लोक 30 (1.18.30)
तस्माच्च गिरिकूटाग्रात्प्रच्युताः पुष्पवृष्टयः । सुरासुरगणान्सर्वान्समन्तात्समवाकिरन् ॥
tasmācca girikūṭāgrātpracyutāḥ puṣpavṛṣṭayaḥ | surāsuragaṇānsarvānsamantātsamavākiran
और उस पर्वत के शिखर से पुष्पों की वर्षा होने लगी, जिसने चारों ओर से सभी देवताओं और असुरों को ढक दिया।
श्लोक 31 (1.18.31)
बभूवात्र महान्नादो महामेघरवोपमः । उदधेर्मथ्यमानस्य मन्दरेण सुरासुरैः ॥
babhūvātra mahānnādo mahāmegharavopamaḥ | udadhermathyamānasya mandareṇa surāsuraiḥ
जब देवता और असुर मन्दर से समुद्र को मथ रहे थे, तब वहाँ महामेघों की गर्जना के समान भारी नाद उठा।
श्लोक 32 (1.18.32)
तत्र नानाजलचरा विनिष्पिष्टा महाद्रिणा । विलयं समुपाजग्मुः शतशो लवणाम्भसि ॥
tatra nānājalacarā viniṣpiṣṭā mahādriṇā | vilayaṃ samupājagmuḥ śataśo lavaṇāmbhasi
वहाँ अनेक प्रकार के जलचर उस महान पर्वत से पिसकर सैकड़ों की संख्या में खारे जल में नष्ट हो गए।
श्लोक 33 (1.18.33)
वारुणानि च भूतानि विविधानि महीधरः । पातालतलवासीनि विलयं समुपानयत् ॥
vāruṇāni ca bhūtāni vividhāni mahīdharaḥ | pātālatalavāsīni vilayaṃ samupānayat
और उस पर्वत ने पाताल-तल में रहने वाले वरुण-लोक के नाना प्रकार के प्राणियों का विनाश कर दिया।
श्लोक 34 (1.18.34)
तस्मिंश्च भ्राम्यमाणेऽद्रौ संघृष्यन्तः परस्परम् । न्यपतन्पतगोपेताः पर्वताग्रान्महाद्रुमाः ॥
tasmiṃśca bhrāmyamāṇe'drau saṃghṛṣyantaḥ parasparam | nyapatanpatagopetāḥ parvatāgrānmahādrumāḥ
पर्वत के घूमने पर बड़े-बड़े वृक्ष, उन पर बैठे पक्षियों सहित, आपस में रगड़ खाकर उसकी चोटियों से गिरने लगे।
श्लोक 35 (1.18.35)
तेषां संघर्षजश्चाग्निरर्चिर्भिः प्रज्वलन्मुहुः । विद्युद्भिरिव नीलाभ्रमावृणोन्मन्दरं गिरिम् ॥
teṣāṃ saṃgharṣajaścāgnirarcirbhiḥ prajvalanmuhuḥ | vidyudbhiriva nīlābhramāvṛṇonmandaraṃ girim
उनकी रगड़ से उत्पन्न अग्नि बार-बार लपटों से धधकती हुई मन्दर पर्वत को ऐसे घेरने लगी, जैसे बिजलियाँ काले बादल को घेर लेती हैं।
श्लोक 36 (1.18.36)
ददाह कुञ्जरांस्तत्र सिंहांश्चैव विनिर्गतान् । विगतासूनि सर्वाणि सत्त्वानि विविधानि च ॥
dadāha kuñjarāṃstatra siṃhāṃścaiva vinirgatān | vigatāsūni sarvāṇi sattvāni vividhāni ca
उसने वहाँ के हाथियों और बाहर निकले सिंहों को जला डाला; नाना प्रकार के सभी प्राणी प्राणहीन हो गए।
श्लोक 37 (1.18.37)
तमग्निममरश्रेष्ठः प्रदहन्तमितस्ततः । वारिणा मेघजेनेन्द्रः शमयामास सर्वशः ॥
tamagnimamaraśreṣṭhaḥ pradahantamitastataḥ | vāriṇā meghajenendraḥ śamayāmāsa sarvaśaḥ
देवश्रेष्ठ इन्द्र ने इधर-उधर सब कुछ जलाती उस अग्नि को मेघों के जल से सब ओर से शान्त कर दिया।
श्लोक 38 (1.18.38)
ततो नानाविधास्तत्र सुस्रुवुः सागराम्भसि । महाद्रुमाणां निर्यासा बहवश्चौषधीरसाः ॥
tato nānāvidhāstatra susruvuḥ sāgarāmbhasi | mahādrumāṇāṃ niryāsā bahavaścauṣadhīrasāḥ
तब बड़े-बड़े वृक्षों के नाना प्रकार के निर्यास और औषधियों के प्रचुर रस समुद्र के जल में बह आए।
श्लोक 39 (1.18.39)
तेषाममृतवीर्याणां रसानां पयसैव च । अमरत्वं सुरा जग्मुः काञ्चनस्य च निःस्रवात् ॥
teṣāmamṛtavīryāṇāṃ rasānāṃ payasaiva ca | amaratvaṃ surā jagmuḥ kāñcanasya ca niḥsravāt
अमृत के समान शक्ति वाले उन रसों के दूध-जैसे सार से और स्वर्ण के स्राव से देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया।
श्लोक 40 (1.18.40)
ततस्तस्य समुद्रस्य तज्जातमुदकं पयः । रसोत्तमैर्विमिश्रं च ततः क्षीरादभूद्धृतम् ॥
tatastasya samudrasya tajjātamudakaṃ payaḥ | rasottamairvimiśraṃ ca tataḥ kṣīrādabhūddhṛtam
तब उन उत्तम रसों से मिलकर समुद्र का वह जल दूध बन गया, और उस दूध से घी उत्पन्न हुआ।
श्लोक 41 (1.18.41)
ततो ब्रह्माणमासीनं देवा वरदमब्रुवन् । श्रान्ताः स्म सुभृशं ब्रह्मन्नोद्भवत्यमृतं च तत् ॥
tato brahmāṇamāsīnaṃ devā varadamabruvan | śrāntāḥ sma subhṛśaṃ brahmannodbhavatyamṛtaṃ ca tat
तब देवताओं ने वहाँ बैठे वरदायक ब्रह्मा से कहा — 'हे ब्रह्मन्, हम बहुत थक गए हैं, फिर भी वह अमृत प्रकट नहीं हो रहा।
श्लोक 42 (1.18.42)
ऋते नारायणं देवं सर्वेऽन्ये देवदानवाः । चिरारब्धमिदं चापि सागरस्यापि मन्थनम् ॥
ṛte nārāyaṇaṃ devaṃ sarve'nye devadānavāḥ | cirārabdhamidaṃ cāpi sāgarasyāpi manthanam
भगवान नारायण को छोड़कर हम सब देवता और दानव थक चुके हैं, और समुद्र का यह मन्थन बहुत पहले से चल रहा है।
श्लोक 43 (1.18.43)
ग्लानिरस्मान्समाविष्टा न चात्रामृतमुत्थितम् । देवानां वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
glānirasmānsamāviṣṭā na cātrāmṛtamutthitam | devānāṃ vacanaṃ śrutvā brahmā lokapitāmahaḥ
हम पर थकान छा गई है, और यहाँ अब तक अमृत नहीं निकला।' देवताओं के वचन सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा ने
श्लोक 44 (1.18.44)
ततो नारायणं देवं वचनं चेदमब्रवीत् । विधत्स्वैषां बलं विष्णो भवानत्र परायणम् ॥
tato nārāyaṇaṃ devaṃ vacanaṃ cedamabravīt | vidhatsvaiṣāṃ balaṃ viṣṇo bhavānatra parāyaṇam
तब भगवान नारायण से यह वचन कहा — 'हे विष्णु, इन्हें बल दीजिए; यहाँ आप ही इनके आश्रय हैं।'
विष्णुरुवाच
श्लोक 45 (1.18.45)
बलं ददामि सर्वेषां कर्मैतद्ये समास्थिताः । क्षोभ्यतां कलशः सर्वैर्मन्दरः परिवर्त्यताम् ॥
balaṃ dadāmi sarveṣāṃ karmaitadye samāsthitāḥ | kṣobhyatāṃ kalaśaḥ sarvairmandaraḥ parivartyatām
जो इस कार्य में लगे हैं, उन सबको मैं बल देता हूँ। सब मिलकर कलश-रूपी समुद्र को क्षुब्ध करें और मन्दर को घुमाएँ।
सौतिरुवाच
श्लोक 46 (1.18.46)
नारायणवचः श्रुत्वा बलिनस्ते महोदधेः । तत्पयः सहिता भूयश्चक्रिरे भृशमाकुलम् ॥
nārāyaṇavacaḥ śrutvā balinaste mahodadheḥ | tatpayaḥ sahitā bhūyaścakrire bhṛśamākulam
नारायण के वचन सुनकर वे बलवान हो गए और मिलकर महासागर के उस दुग्ध-जल को फिर से अत्यन्त विक्षुब्ध करने लगे।
श्लोक 47 (1.18.47)
तत्र पूर्वं विषं जातं तद्ब्रह्मवचनाच्छिवः । प्राग्रसल्लोकरक्षार्थं ततो ज्येष्ठा समुत्थिता । कृष्णरूपधरा देवी सर्वाभरणभूषिता ॥
tatra pūrvaṃ viṣaṃ jātaṃ tadbrahmavacanācchivaḥ | prāgrasallokarakṣārthaṃ tato jyeṣṭhā samutthitā | kṛṣṇarūpadharā devī sarvābharaṇabhūṣitā
वहाँ सबसे पहले विष उत्पन्न हुआ था, जिसे ब्रह्मा के कहने पर शिव ने लोक-रक्षा के लिए निगल लिया था। फिर ज्येष्ठा प्रकट हुई — श्याम रूप वाली, सब आभूषणों से विभूषित देवी।
श्लोक 48 (1.18.48)
ततः शतसहस्रांशुर्मथ्यमानात्तु सागरात् । प्रसन्नात्मा समुत्पन्नः सोमः शीतांशुरुज्ज्वलः ॥
tataḥ śatasahasrāṃśurmathyamānāttu sāgarāt | prasannātmā samutpannaḥ somaḥ śītāṃśurujjvalaḥ
तब मथे जाते हुए सागर से शतसहस्र किरणों वाला, प्रसन्न स्वरूप, उज्ज्वल शीतांशु चन्द्रमा उत्पन्न हुआ।
श्लोक 49 (1.18.49)
श्रीरनन्तरमुत्पन्ना घृतात्पाण्डुरवासिनी । सुरा देवी समुत्पन्ना तुरगः पाण्डुरस्तथा ॥
śrīranantaramutpannā ghṛtātpāṇḍuravāsinī | surā devī samutpannā turagaḥ pāṇḍurastathā
उसके बाद घी से श्वेत वस्त्रों वाली श्री उत्पन्न हुईं; फिर सुरा देवी प्रकट हुईं, और वैसे ही श्वेत अश्व भी।
श्लोक 50 (1.18.50)
कौस्तुभस्तु मणिर्दिव्य उत्पन्नो घृतसंभवः । मरीचिविकचः श्रीमान्नारायणउरोगतः ॥
kaustubhastu maṇirdivya utpanno ghṛtasaṃbhavaḥ | marīcivikacaḥ śrīmānnārāyaṇaurogataḥ
और घी से उत्पन्न दिव्य कौस्तुभ मणि प्रकट हुई — किरणों से दीप्त, शोभायुक्त, जो नारायण के वक्षःस्थल पर विराजती है।
श्लोक 51 (1.18.51)
श्रीः सुरा चैव सोमश्च तुरगश्च मनोजवः । पारिजातश्च तत्रैव सुरभिश्च महामुने । जज्ञाते तौ तदा ब्रह्मन्सर्वकामफलप्रदौ ॥
śrīḥ surā caiva somaśca turagaśca manojavaḥ | pārijātaśca tatraiva surabhiśca mahāmune | jajñāte tau tadā brahmansarvakāmaphalapradau
श्री, सुरा, सोम और मन के समान वेगवान अश्व; और हे महामुने, वहीं पारिजात और सुरभि भी उत्पन्न हुए — हे ब्रह्मन्, वे दोनों समस्त कामनाओं का फल देने वाले थे।
श्लोक 52 (1.18.52)
ततो जज्ञे महाकायश्चतुर्दन्तो महागजः । कपिला कामवृक्षश्च कौस्तुभश्चाप्सरोगणः । यतो देवास्ततो जग्मुरादित्यपथमाश्रिताः ॥
tato jajñe mahākāyaścaturdanto mahāgajaḥ | kapilā kāmavṛkṣaśca kaustubhaścāpsarogaṇaḥ | yato devāstato jagmurādityapathamāśritāḥ
फिर विशालकाय, चार दाँतों वाला महागज उत्पन्न हुआ, तथा कपिला गौ, कल्पवृक्ष, कौस्तुभ और अप्सराओं का समूह। ये सब सूर्य के मार्ग से होकर वहाँ चले गए जहाँ देवता थे।
श्लोक 53 (1.18.53)
धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत । श्वेतं कमण्डलुं बिभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति ॥
dhanvantaristato devo vapuṣmānudatiṣṭhata | śvetaṃ kamaṇḍaluṃ bibhradamṛtaṃ yatra tiṣṭhati
तब देहधारी देव धन्वन्तरि प्रकट हुए, जिनके हाथ में श्वेत कमण्डलु था, जिसमें अमृत भरा था।
श्लोक 54 (1.18.54)
एतदत्यद्भुतं दृष्ट्वा दानवानां समुत्थितः । अमृतार्थे महान्नादो ममेदमिति जल्पताम् ॥
etadatyadbhutaṃ dṛṣṭvā dānavānāṃ samutthitaḥ | amṛtārthe mahānnādo mamedamiti jalpatām
यह अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखकर दानवों में अमृत के लिए 'यह मेरा है' चिल्लाते हुए बड़ा कोलाहल मच गया।
श्लोक 55 (1.18.55)
ततो नारायणो मायां मोहिनीं समुपाश्रितः । स्त्रीरूपमद्भुतं कृत्वा दानवानभिसंश्रितः ॥
tato nārāyaṇo māyāṃ mohinīṃ samupāśritaḥ | strīrūpamadbhutaṃ kṛtvā dānavānabhisaṃśritaḥ
तब नारायण ने मोहिनी माया का आश्रय लिया और अद्भुत स्त्री-रूप धारण करके दानवों के बीच जा पहुँचे।
श्लोक 56 (1.18.56)
ततस्तदमृतं तस्यै ददुस्ते मूढचेतसः । स्त्रियै दानवदैतेयाः सर्वे तद्गतमानसाः ॥
tatastadamṛtaṃ tasyai daduste mūḍhacetasaḥ | striyai dānavadaiteyāḥ sarve tadgatamānasāḥ
तब मोहित बुद्धि वाले सभी दानवों और दैत्यों ने, जिनका मन पूरी तरह उसी में लगा था, वह अमृत उस स्त्री को दे दिया।
श्लोक 57 (1.18.57)
सा तु नारायणी माया धारयन्ती कमण्डलुम् । आस्यमानेषु दैत्येषु पङ्क्त्या च प्रति दानवैः ॥
sā tu nārāyaṇī māyā dhārayantī kamaṇḍalum | āsyamāneṣu daityeṣu paṅktyā ca prati dānavaiḥ
और नारायण की वह माया, कमण्डलु लिए हुए, जब दैत्य दानवों के साथ पंक्ति में बैठे थे,
श्लोक 58 (1.18.58)
देवानपाययद्देवी न दैत्यांस्ते च चुक्रुशुः ॥
devānapāyayaddevī na daityāṃste ca cukruśuḥ
देवताओं को अमृत पिलाने लगी, दैत्यों को नहीं; इस पर वे चिल्ला उठे।