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आदि पर्व · अध्याय 184

व्यास द्वारा द्रौपदी के पूर्वजन्म का वृत्तान्त

पाण्डवों के गुप्तवास के समय व्यास उनसे मिलने आते हैं और उनके आचरण का कुशल-क्षेम पूछकर एक कथा सुनाते हैं—एक ऋषि-कन्या को अपने पूर्व कर्मों के कारण पति नहीं मिला; उसने तप से शिव को प्रसन्न किया, और क्योंकि उसने पाँच बार पति माँगा, शिव ने उसे पाँच पति होने का वर दिया। वही कन्या द्रुपद के कुल में कृष्णा के रूप में जन्मी है और पाण्डवों की पत्नी होनी नियत है। व्यास उन्हें पाञ्चाल नगर में जाकर रहने को कहते हैं और विदा हो जाते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.184.1)

वसत्सु तेषु प्रच्छन्नं पाण्डवेषु महात्मसु । आजगामाथ तान्द्रष्टुं व्यासः सत्यवतीसुतः ॥

vasatsu teṣu pracchannaṃ pāṇḍaveṣu mahātmasu | ājagāmātha tāndraṣṭuṃ vyāsaḥ satyavatīsutaḥ

जब महात्मा पाण्डव वहाँ छिपकर रह रहे थे, तब सत्यवतीनन्दन व्यास उनसे मिलने आए।

श्लोक 2 (1.184.2)

तमागतमभिप्रेक्ष्य प्रत्युद्गम्य परन्तपाः । प्रणिपत्याभिवाद्यैनं तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥

tamāgatamabhiprekṣya pratyudgamya parantapāḥ | praṇipatyābhivādyainaṃ tasthuḥ prāñjalayastadā

उन्हें आया देख शत्रुओं को तपाने वाले वे पाण्डव आगे बढ़कर उनसे मिले, प्रणाम और अभिवादन करके हाथ जोड़े खड़े रहे।

श्लोक 3 (1.184.3)

समनुज्ञाप्य तान्सर्वानासीनान्मुनिरब्रवीत् । प्रच्छन्नं पूजितः पार्थैः प्रीतिपूर्वमिदं वचः ॥

samanujñāpya tānsarvānāsīnānmunirabravīt | pracchannaṃ pūjitaḥ pārthaiḥ prītipūrvamidaṃ vacaḥ

पार्थों द्वारा गुप्त रूप से पूजित होकर मुनि ने उन सबको बैठने की अनुमति दी, और उनके बैठ जाने पर प्रेमपूर्वक यह कहा—

व्यास उवाच

श्लोक 4 (1.184.4)

अपि धर्मेण वर्तध्वं शास्त्रेण च परन्तपाः । अपि विप्रेषु पूजा वः पूजार्हेषु न हीयते ॥

api dharmeṇa vartadhvaṃ śāstreṇa ca parantapāḥ | api vipreṣu pūjā vaḥ pūjārheṣu na hīyate

हे परन्तपो, क्या तुम धर्म और शास्त्र के अनुसार आचरण करते हो? क्या पूजा के योग्य ब्राह्मणों का सम्मान तुमसे कभी छूटता तो नहीं?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (1.184.5)

अथ धर्मार्थवद्वाक्यमुक्त्वा स भगवानृषिः । विचित्राश्च कथास्तास्ताः पुनरेवेदमब्रवीत् ॥

atha dharmārthavadvākyamuktvā sa bhagavānṛṣiḥ | vicitrāśca kathāstāstāḥ punarevedamabravīt

फिर उन भगवान ऋषि ने धर्म और अर्थ से भरी बातें कहकर तथा भाँति-भाँति की विचित्र कथाएँ सुनाकर आगे यह कहा—

व्यास उवाच

श्लोक 6 (1.184.6)

आसीत्तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः । विलग्नमध्या सुश्रोणी सुभ्रूः सर्वगुणान्विता ॥

āsīttapovane kācidṛṣeḥ kanyā mahātmanaḥ | vilagnamadhyā suśroṇī subhrūḥ sarvaguṇānvitā

किसी तपोवन में एक महात्मा ऋषि की कन्या रहती थी। उसकी कमर पतली थी, नितम्ब सुन्दर थे, भौंहें मनोहर थीं, और वह सब गुणों से सम्पन्न थी।

श्लोक 7 (1.184.7)

कर्मभिः स्वकृतैः सा तु दुर्भगा समपद्यत । नाध्यगच्छत्पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ॥

karmabhiḥ svakṛtaiḥ sā tu durbhagā samapadyata | nādhyagacchatpatiṃ sā tu kanyā rūpavatī satī

किन्तु अपने ही किए कर्मों के कारण वह अभागिनी हो गई; रूपवती और सती होते हुए भी उस कन्या को पति नहीं मिला।

श्लोक 8 (1.184.8)

तपस्तप्तुमथारेभे पत्यर्थमसुखा ततः । तोषयामास तपसा सा किलोग्रेण शङ्करम् ॥

tapastaptumathārebhe patyarthamasukhā tataḥ | toṣayāmāsa tapasā sā kilogreṇa śaṅkaram

तब दुःखी होकर उसने पति पाने के लिए तप आरम्भ किया, और कहते हैं कि अपनी उग्र तपस्या से उसने शंकर को प्रसन्न कर लिया।

श्लोक 9 (1.184.9)

तस्याः स भगवांस्तुष्टस्तामुवाच यशस्विनीम् । वरं वरय भद्रं ते वरदोऽस्मीति शङ्करः ॥

tasyāḥ sa bhagavāṃstuṣṭastāmuvāca yaśasvinīm | varaṃ varaya bhadraṃ te varado'smīti śaṅkaraḥ

भगवान शंकर ने उससे प्रसन्न होकर उस यशस्विनी से कहा—"तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो; मैं वर देने वाला हूँ।"

श्लोक 10 (1.184.10)

अथेश्वरमुवाचेदमात्मनः सा वचो हितम् । पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनःपुनः ॥

atheśvaramuvācedamātmanaḥ sā vaco hitam | patiṃ sarvaguṇopetamicchāmīti punaḥpunaḥ

तब उसने ईश्वर से अपने हित की यह बात बार-बार कही—"मैं सब गुणों से युक्त पति चाहती हूँ।"

श्लोक 11 (1.184.11)

तामथ प्रत्युवाचेदमीशानो वदतां वरः । पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति भारताः ॥

tāmatha pratyuvācedamīśāno vadatāṃ varaḥ | pañca te patayo bhadre bhaviṣyantīti bhāratāḥ

तब वक्ताओं में श्रेष्ठ ईशान ने उससे कहा—"भद्रे, भरतवंश के पाँच पुरुष तुम्हारे पति होंगे।"

श्लोक 12 (1.184.12)

एवमुक्ता ततः कन्या देवं वरदमब्रवीत् । एकमिच्छाम्यहं देव त्वत्प्रसादात्पतिं प्रभो ॥

evamuktā tataḥ kanyā devaṃ varadamabravīt | ekamicchāmyahaṃ deva tvatprasādātpatiṃ prabho

यह सुनकर उस कन्या ने वरदाता देव से कहा—"हे देव, हे प्रभो, आपकी कृपा से मैं केवल एक ही पति चाहती हूँ।"

श्लोक 13 (1.184.13)

पुनरेवाब्रवीद्देव इदं वचनमुत्तमम् । पञ्चकृत्वस्त्वया ह्युक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः ॥

punarevābravīddeva idaṃ vacanamuttamam | pañcakṛtvastvayā hyuktaḥ patiṃ dehītyahaṃ punaḥ

तब देव ने फिर यह उत्तम वचन कहा—"तुमने मुझसे पाँच बार कहा था—'मुझे पति दीजिए'।

श्लोक 14 (1.184.14)

देहमन्यं गतायास्ते यथोक्तं तद्भविष्यति । द्रुपदस्य कुले जज्ञे सा कन्या देवरूपिणी ॥

dehamanyaṃ gatāyāste yathoktaṃ tadbhaviṣyati | drupadasya kule jajñe sā kanyā devarūpiṇī

दूसरा शरीर पाने पर वैसा ही होगा, जैसा मैंने कहा है।" वही देवरूपिणी कन्या अब द्रुपद के कुल में जन्मी है।

श्लोक 15 (1.184.15)

निर्दिष्टा भवतां पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता । पाञ्चालनगरे तस्मान्निवसध्वं महाबलाः । सुखिनस्तामनुप्राप्य भविष्यथ न संशयः ॥

nirdiṣṭā bhavatāṃ patnī kṛṣṇā pārṣatyaninditā | pāñcālanagare tasmānnivasadhvaṃ mahābalāḥ | sukhinastāmanuprāpya bhaviṣyatha na saṃśayaḥ

प्रशंसनीय पार्षती कृष्णा तुम्हारी पत्नी होने के लिए नियत है। इसलिए हे महाबलियो, पाञ्चाल नगर में जाकर रहो; उसे पाकर तुम सुखी होगे, इसमें सन्देह नहीं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (1.184.16)

एवमुक्त्वा महाभागः पाण्डवान्स पितामहः । पार्थानामन्त्र्य कुन्तीं च प्रातिष्ठत महातपाः ॥

evamuktvā mahābhāgaḥ pāṇḍavānsa pitāmahaḥ | pārthānāmantrya kuntīṃ ca prātiṣṭhata mahātapāḥ

पाण्डवों से ऐसा कहकर उनके महाभाग पितामह, महान तपस्वी व्यास, पार्थों और कुन्ती से विदा लेकर चले गए।

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