आदि पर्व · अध्याय 189
वसिष्ठ द्वारा संवरण के लिए तपती की प्राप्ति
तपती के आकाश में चले जाने पर संवरण फिर गिर पड़ता है; उसका मन्त्री उसे होश में लाता है, और राजा सेना को लौटाकर पर्वत पर खड़ा होकर सूर्य की उपासना करता है तथा अपने पुरोहित वसिष्ठ का स्मरण करता है। बारहवें दिन वसिष्ठ आते हैं, सूर्य के पास जाकर स्तुति करते हैं और राजा के लिए तपती को माँगते हैं; सूर्य उसे दे देते हैं और संवरण पर्वत पर ही उससे विवाह करता है। जब राजा बारह वर्ष तक उसके साथ वहीं रहता है, तब उसके राज्य में वर्षा नहीं होती और प्रजा भूख से मरने लगती है; अन्त में वसिष्ठ दम्पति को नगर लौटा लाते हैं और वर्षा फिर होने लगती है। गन्धर्व अर्जुन से कहता है कि तपती से ही कुरु का जन्म हुआ, इसी कारण अर्जुन तापत्य कहलाते हैं।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 1 (1.189.1)
एवमुक्त्वा ततस्तूर्णं जगामोर्ध्वमनिन्दिता । तपतीतपतीत्येव विललापातुरो नृपः ॥
evamuktvā tatastūrṇaṃ jagāmordhvamaninditā | tapatītapatītyeva vilalāpāturo nṛpaḥ
यह कहकर वह अनिन्द्य सुन्दरी तुरन्त ऊपर चली गई, और पीड़ित राजा "तपती! तपती!" पुकारते हुए विलाप करने लगा।
श्लोक 2 (1.189.2)
प्रास्खलच्चासकृद्राजा पुनरुत्थाय धावति । धावमानस्तु तपतीमदृष्ट्वैव महीपतिः । स तु राजा पुनर्भूमौ तत्रैव निपपात ह ॥
prāskhalaccāsakṛdrājā punarutthāya dhāvati | dhāvamānastu tapatīmadṛṣṭvaiva mahīpatiḥ | sa tu rājā punarbhūmau tatraiva nipapāta ha
राजा बार-बार लड़खड़ाता और फिर उठकर दौड़ता; पर दौड़ते हुए भी वह पृथ्वीपति तपती को न देख सका, और वहीं फिर भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 3 (1.189.3)
अन्वेषमाणः सबलस्तं राजानं नृपोत्तमम् । अमात्यः सानुयात्रश्च तं ददर्श महावने ॥
anveṣamāṇaḥ sabalastaṃ rājānaṃ nṛpottamam | amātyaḥ sānuyātraśca taṃ dadarśa mahāvane
सेना और अनुचरों के साथ उस श्रेष्ठ राजा को खोजते हुए उसके मन्त्री ने उसे उस विशाल वन में देखा,
श्लोक 4 (1.189.4)
क्षितौ निपतितं काले शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् । तं हि दृष्ट्वा महेष्वासं निरस्तं पतितं भुवि ॥
kṣitau nipatitaṃ kāle śakradhvajamivocchritam | taṃ hi dṛṣṭvā maheṣvāsaṃ nirastaṃ patitaṃ bhuvi
भूमि पर पड़ा हुआ, मानो समय आने पर उतारा गया इन्द्र का ऊँचा ध्वज हो। उस महाधनुर्धर को धरती पर गिरा पड़ा देखकर
श्लोक 5 (1.189.5)
बभूव सोऽस्य सचिवः संप्रदीप्त इवाग्निना । त्वरया चोपसङ्गम्य स्नेहादागतसंभ्रमः ॥
babhūva so'sya sacivaḥ saṃpradīpta ivāgninā | tvarayā copasaṅgamya snehādāgatasaṃbhramaḥ
उसका वह मन्त्री मानो आग से जल उठा। स्नेह के कारण घबराया हुआ वह शीघ्रता से उसके पास पहुँचा
श्लोक 6 (1.189.6)
तं समुत्थापयामास नृपतिं काममोहितम् । भूतलाद्भूमिपालेशं पितेव पतितं सुतम् ॥
taṃ samutthāpayāmāsa nṛpatiṃ kāmamohitam | bhūtalādbhūmipāleśaṃ piteva patitaṃ sutam
और काम से मोहित उस राजा को, राजाओं के स्वामी को, धरती से ऐसे उठाया जैसे पिता गिरे हुए पुत्र को उठाता है।
श्लोक 7 (1.189.7)
प्रज्ञया वयसा चैव वृद्धः कीर्त्या नयेन च । अमात्यस्तं समुत्थाप्य बभूव विगतज्वरः ॥
prajñayā vayasā caiva vṛddhaḥ kīrtyā nayena ca | amātyastaṃ samutthāpya babhūva vigatajvaraḥ
बुद्धि, आयु, यश और नीति में बढ़ा-चढ़ा वह मन्त्री उसे उठाकर निश्चिन्त हो गया।
श्लोक 8 (1.189.8)
उवाच चैनं कल्याण्या वाचा मधुरयोत्थितम् । मा भैर्मनुजशार्दूल भद्रमस्तु तवानघ ॥
uvāca cainaṃ kalyāṇyā vācā madhurayotthitam | mā bhairmanujaśārdūla bhadramastu tavānagha
और उठ खड़े हुए राजा से उसने कल्याणकारी मधुर वाणी में कहा: "हे नरश्रेष्ठ, डरो मत; हे निष्पाप, तुम्हारा कल्याण हो।"
श्लोक 9 (1.189.9)
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तं तर्कयामास वै नृपम् । पतितं पातनं सङ्ख्ये शात्रवाणां महीतले ॥
kṣutpipāsāpariśrāntaṃ tarkayāmāsa vai nṛpam | patitaṃ pātanaṃ saṅkhye śātravāṇāṃ mahītale
उसने अनुमान किया कि युद्ध में शत्रुओं को गिराने वाला वह राजा भूख-प्यास से थककर धरती पर गिर पड़ा है।
श्लोक 10 (1.189.10)
वारिणा च सुशीतेन शिरस्तस्याभ्यषेचयत् । अस्पृशन्मुकुटं राज्ञः पुण्डरीकसुगन्धिना ॥
vāriṇā ca suśītena śirastasyābhyaṣecayat | aspṛśanmukuṭaṃ rājñaḥ puṇḍarīkasugandhinā
उसने कमल की सुगन्ध वाले अत्यन्त शीतल जल से राजा के सिर पर छींटे दिए, पर उसके मुकुट को नहीं छुआ।
श्लोक 11 (1.189.11)
ततः प्रत्यागतप्राणस्तद्बलं बलवान्नृपः । सर्वं विसर्जयामास तमेकं सचिवं विना ॥
tataḥ pratyāgataprāṇastadbalaṃ balavānnṛpaḥ | sarvaṃ visarjayāmāsa tamekaṃ sacivaṃ vinā
तब प्राण लौट आने पर उस बलवान राजा ने उस एक मन्त्री को छोड़कर अपनी सारी सेना को विदा कर दिया।
श्लोक 12 (1.189.12)
ततस्तस्याज्ञया राज्ञो विप्रतस्थे महद्बलम् । स तु राजा गिरिप्रस्थे तस्मिन्पुनरुपाविशत् ॥
tatastasyājñayā rājño vipratasthe mahadbalam | sa tu rājā giriprasthe tasminpunarupāviśat
राजा की आज्ञा से वह विशाल सेना चली गई, और राजा फिर उसी पर्वत की समतल भूमि पर बैठ गया।
श्लोक 13 (1.189.13)
ततस्तस्मिन् गिरिवरे शुचिर्भूत्वा कृताञ्जलिः । आरिराधयिषुः सूर्यं तस्थावूर्ध्वमुखः क्षितौ ॥
tatastasmin girivare śucirbhūtvā kṛtāñjaliḥ | ārirādhayiṣuḥ sūryaṃ tasthāvūrdhvamukhaḥ kṣitau
तब उस श्रेष्ठ पर्वत पर पवित्र होकर, हाथ जोड़कर, सूर्य को प्रसन्न करने की इच्छा से वह मुख ऊपर किए धरती पर खड़ा रहा।
श्लोक 14 (1.189.14)
जगाम मनसा चैव वसिष्ठमृषिसत्तमम् । पुरोहितममित्रघ्नं तदा संवरणो नृपः ॥
jagāma manasā caiva vasiṣṭhamṛṣisattamam | purohitamamitraghnaṃ tadā saṃvaraṇo nṛpaḥ
और राजा संवरण ने तब मन ही मन ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ का स्मरण किया, जो शत्रुओं का नाश करने वाले उनके पुरोहित थे।
श्लोक 15 (1.189.15)
नक्तन्दिनमथैकत्र स्थिते तस्मिञ्जनाधिपे । अथाजगाम विप्रर्षिस्तदा द्वादशमेऽहनि ॥
naktandinamathaikatra sthite tasmiñjanādhipe | athājagāma viprarṣistadā dvādaśame'hani
जब वह नरेश रात-दिन एक ही स्थान पर खड़ा रहा, तब बारहवें दिन वे ब्रह्मर्षि वहाँ आए।
श्लोक 16 (1.189.16)
स विदित्वैव नृपतिं तपत्या हृतमानसम् । दिव्येन विधिना ज्ञात्वा भावितात्मा महानृषिः ॥
sa viditvaiva nṛpatiṃ tapatyā hṛtamānasam | divyena vidhinā jñātvā bhāvitātmā mahānṛṣiḥ
उन शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षि ने दिव्य विधि से तुरन्त जान लिया कि राजा का मन तपती ने हर लिया है।
श्लोक 17 (1.189.17)
तथा तु नियतात्मानं तं नृपं मुनिसत्तमः । आबभाषे स धर्मात्मा तस्यैवार्थचिकीर्षया ॥
tathā tu niyatātmānaṃ taṃ nṛpaṃ munisattamaḥ | ābabhāṣe sa dharmātmā tasyaivārthacikīrṣayā
तब उन धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ ने, राजा का ही प्रयोजन सिद्ध करने की इच्छा से, इस प्रकार संयम में स्थित उस राजा से बात की।
श्लोक 18 (1.189.18)
स तस्य मनुजेन्द्रस्य पश्यतो भगवानृषिः । ऊर्ध्वमाचक्रमे द्रष्टुं भास्करं भास्करद्युतिः ॥
sa tasya manujendrasya paśyato bhagavānṛṣiḥ | ūrdhvamācakrame draṣṭuṃ bhāskaraṃ bhāskaradyutiḥ
फिर उस नरेश के देखते-देखते सूर्य के समान तेजस्वी वे भगवान् ऋषि सूर्य के दर्शन के लिए ऊपर उठ गए।
श्लोक 19 (1.189.19)
योजनानां तु नियुतं क्षणाद्गत्वा तपोधनः । सहस्रांशुं ततो विप्रः कृताञ्जलिरुपस्थितः । वसिष्ठोऽहमिति प्रीत्या स चात्मानं न्यवेदयत् ॥
yojanānāṃ tu niyutaṃ kṣaṇādgatvā tapodhanaḥ | sahasrāṃśuṃ tato vipraḥ kṛtāñjalirupasthitaḥ | vasiṣṭho'hamiti prītyā sa cātmānaṃ nyavedayat
तपस्या के धनी वे विप्र क्षणभर में एक लाख योजन जाकर हाथ जोड़े सहस्र किरणों वाले सूर्य के सामने उपस्थित हुए और प्रेमपूर्वक अपना परिचय दिया: "मैं वसिष्ठ हूँ।"
श्लोक 20 (1.189.20)
तमुवाच महातेजा विवस्वान्मुनिसत्तमम् । महर्षे स्वागतं तेऽस्तु कथयस्व यथेप्सितम् ॥
tamuvāca mahātejā vivasvānmunisattamam | maharṣe svāgataṃ te'stu kathayasva yathepsitam
महातेजस्वी विवस्वान् ने उन मुनिश्रेष्ठ से कहा: "हे महर्षे, तुम्हारा स्वागत है; जो चाहते हो, कहो।
सूर्य उवाच
श्लोक 21 (1.189.21)
यदिच्छसि महाभाग मत्तः प्रवदतां वर । तत्ते दद्यामभिप्रेतं यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम् ॥
yadicchasi mahābhāga mattaḥ pravadatāṃ vara | tatte dadyāmabhipretaṃ yadyapi syātsudurlabham
"हे महाभाग, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, वह मनचाही वस्तु मैं तुम्हें दूँगा, भले ही वह अत्यन्त दुर्लभ हो।"
गन्धर्व उवाच
श्लोक 22 (1.189.22)
एवमुक्तः स तेनर्षिर्वसिष्ठः संस्तुवन्गिरा । प्रणिपत्य विवस्वन्तं भानुमन्तमथाब्रवीत् ॥
evamuktaḥ sa tenarṣirvasiṣṭhaḥ saṃstuvangirā | praṇipatya vivasvantaṃ bhānumantamathābravīt
उनके ऐसा कहने पर ऋषि वसिष्ठ ने वाणी से उनकी स्तुति करते हुए तेजस्वी विवस्वान् को प्रणाम किया और बोले।
श्लोक 23 (1.189.23)
योजनानां चतुष्षष्टिं निमेषात्त्रिशतं तथा । अश्वैर्गच्छति नित्यं यस्तत्पार्श्वस्थोऽब्रवीदिदम् ॥
yojanānāṃ catuṣṣaṣṭiṃ nimeṣāttriśataṃ tathā | aśvairgacchati nityaṃ yastatpārśvastho'bravīdidam
जो अपने घोड़ों के साथ सदा एक निमेष में तीन सौ चौंसठ योजन चलते हैं, उनके पास खड़े होकर उन्होंने यह कहा:
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 24 (1.189.24)
अजाय लोकत्रयपावनाय । भूतात्मने गोपतये वृषाय । सूर्याय सर्गप्रलयालयाय । नमो महाकारुणिकोत्तमाय ॥
ajāya lokatrayapāvanāya | bhūtātmane gopataye vṛṣāya | sūryāya sargapralayālayāya | namo mahākāruṇikottamāya
"अजन्मा, तीनों लोकों को पवित्र करने वाले, समस्त प्राणियों की आत्मा, किरणों के स्वामी, धर्मरूप वृष, सृष्टि और प्रलय के आधार सूर्य को, परम करुणामय श्रेष्ठ देव को नमस्कार है।
श्लोक 25 (1.189.25)
विवस्वते ज्ञानभृतेऽन्तरात्मने । जगत्प्रदीपाय जगद्धितैषिणे । स्वयंभुवे दीप्तसहस्रचक्षुषे । सुरोत्तमायामिततेजसे नमः ॥
vivasvate jñānabhṛte'ntarātmane | jagatpradīpāya jagaddhitaiṣiṇe | svayaṃbhuve dīptasahasracakṣuṣe | surottamāyāmitatejase namaḥ
"ज्ञान को धारण करने वाले अन्तरात्मा विवस्वान् को, जगत् के दीपक और जगत् का हित चाहने वाले को, स्वयम्भू और सहस्र दीप्त नेत्रों वाले को, अपार तेज वाले देवश्रेष्ठ को नमस्कार है।
श्लोक 26 (1.189.26)
नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे । जगत्प्रसूतिस्थितिनाशहेतवे । त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे । विरिञ्चनारायणशङ्करात्मने ॥
namaḥ savitre jagadekacakṣuṣe | jagatprasūtisthitināśahetave | trayīmayāya triguṇātmadhāriṇe | viriñcanārāyaṇaśaṅkarātmane
"जगत् के एकमात्र नेत्र सविता को नमस्कार है, जो जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के कारण हैं, जो तीनों वेदों से बने हैं, जो त्रिगुणात्मक स्वरूप धारण करते हैं, और जो ब्रह्मा, नारायण और शंकर के स्वरूप हैं।"
सूर्य उवाच
श्लोक 27 (1.189.27)
संस्तुतो वरदः सोऽहं वरं वरय सुव्रत । स्तुतिस्त्वयोक्ता भक्तानां जप्येयं वरदोऽस्म्यहम् ॥
saṃstuto varadaḥ so'haṃ varaṃ varaya suvrata | stutistvayoktā bhaktānāṃ japyeyaṃ varado'smyaham
"इस प्रकार स्तुति किए जाने पर मैं वर देने को उद्यत हूँ; हे सुव्रत, वर माँगो। तुम्हारी कही यह स्तुति भक्तों के जपने योग्य है; मैं वर देने वाला हूँ।"
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 28 (1.189.28)
यैषा ते तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता । तां त्वां संवरणस्यार्थे वरयामि विभावसो ॥
yaiṣā te tapatī nāma sāvitryavarajā sutā | tāṃ tvāṃ saṃvaraṇasyārthe varayāmi vibhāvaso
"हे विभावसु, आपकी यह तपती नाम की पुत्री, जो सावित्री की छोटी बहन है, उसे मैं संवरण के लिए आपसे माँगता हूँ।
श्लोक 29 (1.189.29)
स हि राजा बृहत्कीर्तिर्धर्मार्थविदुदारधीः । युक्तः संवरणो भर्ता दुहितुस्ते विहङ्गम ॥
sa hi rājā bṛhatkīrtirdharmārthavidudāradhīḥ | yuktaḥ saṃvaraṇo bhartā duhituste vihaṅgama
"हे आकाशगामी, वह राजा संवरण महान् यशस्वी, धर्म और अर्थ का ज्ञाता तथा उदार बुद्धि वाला है; वह आपकी पुत्री के योग्य पति है।"
गन्धर्व उवाच
श्लोक 30 (1.189.30)
इत्युक्तः स तदा तेन ददानीत्येव निश्चितः । प्रत्यभाषत तं विप्रं प्रतिनन्द्य दिवाकरः ॥
ityuktaḥ sa tadā tena dadānītyeva niścitaḥ | pratyabhāṣata taṃ vipraṃ pratinandya divākaraḥ
उनके ऐसा कहने पर दिवाकर ने "मैं दूँगा" ऐसा निश्चय करके उन विप्र का अभिनन्दन किया और उत्तर दिया:
सूर्य उवाच
श्लोक 31 (1.189.31)
वरः संवरणो राज्ञां त्वमृषीणां वरो मुने । तपती योषितां श्रेष्ठा किमन्यत्रापवर्जनात् ॥
varaḥ saṃvaraṇo rājñāṃ tvamṛṣīṇāṃ varo mune | tapatī yoṣitāṃ śreṣṭhā kimanyatrāpavarjanāt
"हे मुने, संवरण राजाओं में श्रेष्ठ है और तुम ऋषियों में श्रेष्ठ हो; तपती स्त्रियों में श्रेष्ठ है। तो उसे दे देने के सिवा और क्या किया जा सकता है?"
गन्धर्व उवाच
श्लोक 32 (1.189.32)
ततः सर्वानवद्याङ्गीं तपतीं तपनः स्वयम् । ददौ संवरणस्यार्थे वसिष्ठाय महात्मने ॥
tataḥ sarvānavadyāṅgīṃ tapatīṃ tapanaḥ svayam | dadau saṃvaraṇasyārthe vasiṣṭhāya mahātmane
तब तपन (सूर्य) ने स्वयं सर्वांगसुन्दरी तपती को संवरण के लिए महात्मा वसिष्ठ को सौंप दिया।
श्लोक 33 (1.189.33)
प्रतिजग्राह तां कन्यां महर्षिस्तपतीं तदा । वसिष्ठोऽथ विसृष्टस्तु पुनरेवाजगाम ह ॥
pratijagrāha tāṃ kanyāṃ maharṣistapatīṃ tadā | vasiṣṭho'tha visṛṣṭastu punarevājagāma ha
महर्षि वसिष्ठ ने तब उस कन्या तपती को स्वीकार किया, और विदा पाकर वे फिर वहीं लौट आए
श्लोक 34 (1.189.34)
यत्र विख्यातकीर्तिः स कुरूणामृषभोऽभवत् । स राजा मन्मथाविष्टस्तद्गतेनान्तरात्मना ॥
yatra vikhyātakīrtiḥ sa kurūṇāmṛṣabho'bhavat | sa rājā manmathāviṣṭastadgatenāntarātmanā
जहाँ कुरुओं में श्रेष्ठ वह विख्यात कीर्ति वाला राजा था। काम से आविष्ट, उसी में मन लगाए वह राजा
श्लोक 35 (1.189.35)
दृष्ट्वा च देवकन्यां तां तपतीं चारुहासिनीम् । वसिष्ठेन सहायान्तीं संहृष्टोऽभ्यधिकं बभौ ॥
dṛṣṭvā ca devakanyāṃ tāṃ tapatīṃ cāruhāsinīm | vasiṣṭhena sahāyāntīṃ saṃhṛṣṭo'bhyadhikaṃ babhau
मनोहर मुस्कान वाली देवकन्या तपती को वसिष्ठ के साथ आते देखकर अत्यन्त हर्षित हुआ और और भी अधिक शोभा पाने लगा।
श्लोक 36 (1.189.36)
रुरुचे साऽधिकं सुभ्रूरापतन्ती नभस्तलात् । सौदामनीव विभ्रष्टा द्योतयन्ती दिशस्त्विषा ॥
ruruce sā'dhikaṃ subhrūrāpatantī nabhastalāt | saudāmanīva vibhraṣṭā dyotayantī diśastviṣā
आकाश से उतरती हुई वह सुन्दर भौंहों वाली और भी अधिक शोभित हुई, मानो आकाश से छिटकी बिजली अपनी कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित कर रही हो।
श्लोक 37 (1.189.37)
कृच्छ्राद्द्वादशरात्रे तु तस्य राज्ञः समाहिते । आजगाम विशुद्धात्मा वसिष्ठो भगवानृषिः ॥
kṛcchrāddvādaśarātre tu tasya rājñaḥ samāhite | ājagāma viśuddhātmā vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ
राजा की बारह रातों की कठिन, एकाग्र साधना पूरी होने पर ही शुद्धात्मा भगवान् ऋषि वसिष्ठ आए थे।
श्लोक 38 (1.189.38)
तपसाऽऽराध्य वरदं देवं गोपतिमीश्वरम् । लेभे संवरणो भार्यां वसिष्ठस्यैव तेजसा ॥
tapasā''rādhya varadaṃ devaṃ gopatimīśvaram | lebhe saṃvaraṇo bhāryāṃ vasiṣṭhasyaiva tejasā
वर देने वाले, किरणों के स्वामी, ईश्वर सूर्यदेव को तपस्या से प्रसन्न करके संवरण ने वसिष्ठ के ही तेज से पत्नी प्राप्त की।
श्लोक 39 (1.189.39)
ततस्तस्मिन्गिरिश्रेष्ठे देवगन्धर्वसेविते । जग्राह विधिवत्पाणिं तपत्याः स नरर्षभः ॥
tatastasmingiriśreṣṭhe devagandharvasevite | jagrāha vidhivatpāṇiṃ tapatyāḥ sa nararṣabhaḥ
तब देवताओं और गन्धर्वों से सेवित उस श्रेष्ठ पर्वत पर उस नरश्रेष्ठ ने विधिपूर्वक तपती का पाणिग्रहण किया।
श्लोक 40 (1.189.40)
वसिष्ठेनाभ्यनुज्ञातस्तस्मिन्नेव धराधरे । सोऽकामयत राजर्षिर्विहर्तुं सह भार्यया ॥
vasiṣṭhenābhyanujñātastasminneva dharādhare | so'kāmayata rājarṣirvihartuṃ saha bhāryayā
वसिष्ठ की अनुमति पाकर उस राजर्षि ने उसी पर्वत पर अपनी पत्नी के साथ विहार करना चाहा।
श्लोक 41 (1.189.41)
ततः पुरे च राष्ट्रे च वनेषूपवनेषु च । आदिदेश महीपालस्तमेव सचिवं तदा ॥
tataḥ pure ca rāṣṭre ca vaneṣūpavaneṣu ca | ādideśa mahīpālastameva sacivaṃ tadā
तब उस राजा ने नगर, राष्ट्र, वनों और उपवनों का भार उसी मन्त्री को सौंप दिया।
श्लोक 42 (1.189.42)
नृपतिं त्वभ्यनुज्ञाप्य वसिष्ठोऽथापचक्रमे । सोऽथ राजा गिरौ तस्मिन्विजहारामरो यथा ॥
nṛpatiṃ tvabhyanujñāpya vasiṣṭho'thāpacakrame | so'tha rājā girau tasminvijahārāmaro yathā
राजा से विदा लेकर वसिष्ठ चले गए, और वह राजा उस पर्वत पर देवता की भाँति विहार करने लगा।
श्लोक 43 (1.189.43)
ततो द्वादशवर्षाणि काननेषु वनेषु च । रेमे तस्मिन्गिरौ राजा तयैव सह भार्यया ॥
tato dvādaśavarṣāṇi kānaneṣu vaneṣu ca | reme tasmingirau rājā tayaiva saha bhāryayā
फिर बारह वर्षों तक वह राजा उस पर्वत के काननों और वनों में अपनी उसी पत्नी के साथ रमण करता रहा।
श्लोक 44 (1.189.44)
तस्य राज्ञः पुरे तस्मिन्समा द्वादश सत्तम । न ववर्ष सहस्राक्षो राष्ट्रे चैवास्य भारत ॥
tasya rājñaḥ pure tasminsamā dvādaśa sattama | na vavarṣa sahasrākṣo rāṣṭre caivāsya bhārata
हे सज्जनश्रेष्ठ, हे भारत, बारह वर्षों तक सहस्राक्ष इन्द्र ने उस राजा के नगर में और उसके राष्ट्र में वर्षा नहीं की।
श्लोक 45 (1.189.45)
ततस्तस्यामनावृष्ट्यां प्रवृत्तायामरिन्दम । प्रजाः क्षयमुपाजग्मुः सर्वाः सस्थाणुजङ्गमाः ॥
tatastasyāmanāvṛṣṭyāṃ pravṛttāyāmarindama | prajāḥ kṣayamupājagmuḥ sarvāḥ sasthāṇujaṅgamāḥ
हे शत्रुदमन, उस अनावृष्टि के आरम्भ होने पर स्थावर-जंगम सहित सारी प्रजा नष्ट होने लगी।
श्लोक 46 (1.189.46)
तस्मिंस्तथाविधे काले वर्तमाने सुदारुणे । नावश्यायः पपातोर्व्यां ततः सस्यानि नाऽरुहन् ॥
tasmiṃstathāvidhe kāle vartamāne sudāruṇe | nāvaśyāyaḥ papātorvyāṃ tataḥ sasyāni nā'ruhan
उस अत्यन्त भयंकर समय में धरती पर ओस तक नहीं गिरी, इसलिए फसलें नहीं उगीं।
श्लोक 47 (1.189.47)
ततो विभ्रान्तमनसो जनाः क्षुद्भयपीडिताः । गृहाणि संपरित्यज्य बभ्रमुः प्रदिशो दिशः ॥
tato vibhrāntamanaso janāḥ kṣudbhayapīḍitāḥ | gṛhāṇi saṃparityajya babhramuḥ pradiśo diśaḥ
तब भूख के भय से पीड़ित और व्याकुल मन वाले लोग अपने घर छोड़कर दिशाओं-विदिशाओं में भटकने लगे।
श्लोक 48 (1.189.48)
ततस्तस्मिन्पुरे राष्ट्रे त्यक्तदारपरिग्रहाः । परस्परममर्यादाः क्षुधार्ता जघ्निरे जनाः ॥
tatastasminpure rāṣṭre tyaktadāraparigrahāḥ | parasparamamaryādāḥ kṣudhārtā jaghnire janāḥ
तब उस नगर और राष्ट्र में लोग पत्नी और परिवार को त्यागकर, सारी मर्यादा भूलकर, भूख से व्याकुल हो एक-दूसरे को मारने लगे।
श्लोक 49 (1.189.49)
तत्क्षुधार्तैर्निरानन्दैः शवभूतैस्तथा नरैः । अभवत्प्रेतराजस्य पुरं प्रेतैरिवावृतम् ॥
tatkṣudhārtairnirānandaiḥ śavabhūtaistathā naraiḥ | abhavatpretarājasya puraṃ pretairivāvṛtam
भूखे, आनन्दहीन और शव जैसे बने लोगों से वह नगर प्रेतराज यम की उस नगरी के समान हो गया जो प्रेतों से भरी हो।
श्लोक 50 (1.189.50)
ततस्तत्तादृशं दृष्ट्वा स एव भगवानृषिः । अभ्याद्रवत धर्मात्मा वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥
tatastattādṛśaṃ dṛṣṭvā sa eva bhagavānṛṣiḥ | abhyādravata dharmātmā vasiṣṭho munisattamaḥ
उसकी ऐसी दशा देखकर वही धर्मात्मा भगवान् ऋषि, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, वहाँ दौड़े आए।
श्लोक 51 (1.189.51)
तं च पार्थिवशार्दूलमानयामास तत्पुरम् । तपत्या सहितं राजन्वर्षे द्वादशमे गते । ततः प्रवृष्टस्तत्रासीद्यथापूर्वं सुरारिहा ॥
taṃ ca pārthivaśārdūlamānayāmāsa tatpuram | tapatyā sahitaṃ rājanvarṣe dvādaśame gate | tataḥ pravṛṣṭastatrāsīdyathāpūrvaṃ surārihā
हे राजन्, बारहवाँ वर्ष बीत जाने पर वे उस राजसिंह को तपती सहित उस नगर में ले आए। तब देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाले इन्द्र ने वहाँ पहले की भाँति वर्षा की।
श्लोक 52 (1.189.52)
तस्मिन्नृपतिशार्दूले प्रविष्टे नगरं पुनः । प्रववर्ष सहस्राक्षः सस्यानि जनयन्प्रभुः ॥
tasminnṛpatiśārdūle praviṣṭe nagaraṃ punaḥ | pravavarṣa sahasrākṣaḥ sasyāni janayanprabhuḥ
उस राजसिंह के फिर से नगर में प्रवेश करते ही सहस्र नेत्रों वाले प्रभु इन्द्र ने फसलें उपजाते हुए वर्षा की।
श्लोक 53 (1.189.53)
ततः सराष्ट्रं मुमुदे तत्पुरं परया मुदा । तेन पार्थिवमुख्येन भावितं भावितात्मना ॥
tataḥ sarāṣṭraṃ mumude tatpuraṃ parayā mudā | tena pārthivamukhyena bhāvitaṃ bhāvitātmanā
तब राष्ट्र सहित वह नगर परम आनन्द से भर उठा, जिसे उस शुद्धात्मा श्रेष्ठ राजा ने फिर से समृद्ध कर दिया था।
श्लोक 54 (1.189.54)
ततो द्वादश वर्षाणि पुनरीजे नराधिपः । तपत्या सहितः पत्न्या यथा शच्या मरुत्पतिः ॥
tato dvādaśa varṣāṇi punarīje narādhipaḥ | tapatyā sahitaḥ patnyā yathā śacyā marutpatiḥ
फिर बारह वर्षों तक वह नरेश अपनी पत्नी तपती के साथ यज्ञ करता रहा, जैसे मरुतों के स्वामी इन्द्र शची के साथ करते हैं।
श्लोक 55 (1.189.55)
एवमासीन्महाभागा तपती नाम पौर्विकी । तव वैवस्वती पार्थ तापत्यस्त्वं यया मतः ॥
evamāsīnmahābhāgā tapatī nāma paurvikī | tava vaivasvatī pārtha tāpatyastvaṃ yayā mataḥ
हे पार्थ, ऐसी थीं प्राचीन काल की महाभागा तपती, विवस्वान् की पुत्री और तुम्हारी पूर्वजा, जिनके कारण तुम तापत्य माने जाते हो।
श्लोक 56 (1.189.56)
तस्यां संजनयामास कुरुं संवरणो नृपः । तपत्यां तपतां श्रेष्ठ तापत्यस्त्वं ततोऽर्जुन ॥
tasyāṃ saṃjanayāmāsa kuruṃ saṃvaraṇo nṛpaḥ | tapatyāṃ tapatāṃ śreṣṭha tāpatyastvaṃ tato'rjuna
राजा संवरण ने तपती से कुरु को उत्पन्न किया; इसलिए हे तेजस्वियों में श्रेष्ठ अर्जुन, तुम तापत्य हो।