आदि पर्व · अध्याय 188
तपती का संवरण को उत्तर
गन्धर्व कथा आगे कहता है: तपती के अदृश्य होते ही राजा संवरण मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है, तब वह फिर प्रकट होकर उसे उठने को कहती है। प्रेम में जलता राजा उससे गान्धर्व विवाह द्वारा अपना पति स्वीकार करने की याचना करता है। तपती उत्तर देती है कि पिता के जीवित रहते वह अपनी स्वामिनी नहीं है; वह बताती है कि वह सावित्री की छोटी बहन, सूर्य की पुत्री तपती है, और राजा से कहती है कि प्रणाम, तप और नियम द्वारा उसके पिता से उसे माँगे।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 1 (1.188.1)
अथ तस्यामदृश्यायां नृपतिः काममोहितः । पातनः शत्रुसङ्घानां पपात धरणीतले ॥
atha tasyāmadṛśyāyāṃ nṛpatiḥ kāmamohitaḥ | pātanaḥ śatrusaṅghānāṃ papāta dharaṇītale
तब उसके अदृश्य हो जाने पर शत्रुओं के समूहों को धराशायी करने वाला वह राजा काम से मोहित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 2 (1.188.2)
तस्मिन्निपतिते भूमावथ सा चारुहासिनी । पुनः पीनायतश्रोणी दर्शयामास तं नृपम् ॥
tasminnipatite bhūmāvatha sā cāruhāsinī | punaḥ pīnāyataśroṇī darśayāmāsa taṃ nṛpam
उसके भूमि पर गिर जाने पर वह मनोहर मुस्कान और भरे-पूरे विशाल नितम्बों वाली सुन्दरी फिर से राजा के सामने प्रकट हुई।
श्लोक 3 (1.188.3)
अथाबभाषे कल्याणी वाचा मधुरया नृपम् । तं कुरूणां कुलकरं कामाभिहतचेतसम् ॥
athābabhāṣe kalyāṇī vācā madhurayā nṛpam | taṃ kurūṇāṃ kulakaraṃ kāmābhihatacetasam
तब उस कल्याणी ने कुरुवंश के प्रवर्तक उस राजा से, जिसका चित्त काम से आहत था, मधुर वाणी में बात की।
श्लोक 4 (1.188.4)
उवाच मधुरं वाक्यं तपती हसतीव सा । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते न त्वमर्हस्यरिन्दम ॥
uvāca madhuraṃ vākyaṃ tapatī hasatīva sā | uttiṣṭhottiṣṭha bhadraṃ te na tvamarhasyarindama
तपती ने मानो हँसते हुए ये मधुर वचन कहे: "उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो! हे शत्रुदमन, यह तुम्हें शोभा नहीं देता
श्लोक 5 (1.188.5)
मोहं नृपतिशार्दूल गन्तुमाविष्कृतः क्षितौ । एवमुक्तोऽथ नृपतिर्वाचा मधुरया तदा ॥
mohaṃ nṛpatiśārdūla gantumāviṣkṛtaḥ kṣitau | evamukto'tha nṛpatirvācā madhurayā tadā
"हे नृपश्रेष्ठ, कि पृथ्वी पर विख्यात होकर तुम इस प्रकार मूर्च्छित हो जाओ।" उस मधुर वाणी में ऐसा कहे जाने पर राजा ने तब
श्लोक 6 (1.188.6)
ददर्श विपुलश्रोणीं तामेवाभिमुखे स्थिताम् । अथ तामसितापाङ्गीमाबभाषे स पार्थिवः ॥
dadarśa vipulaśroṇīṃ tāmevābhimukhe sthitām | atha tāmasitāpāṅgīmābabhāṣe sa pārthivaḥ
उसी विशाल नितम्बों वाली को अपने सामने खड़ी देखा। तब वह राजा उस श्यामल कटाक्षों वाली से बोला,
श्लोक 7 (1.188.7)
मन्मथाग्निपरीतात्मा सन्दिग्धाक्षरया गिरा । साधु त्वमसितापाङ्गि कामार्तं मत्तकाशिनि ॥
manmathāgniparītātmā sandigdhākṣarayā girā | sādhu tvamasitāpāṅgi kāmārtaṃ mattakāśini
काम की अग्नि से घिरे मन से, लड़खड़ाते अक्षरों वाली वाणी में: "हे श्यामल कटाक्षों वाली, हे मदभरी सुन्दरी, मुझ कामपीड़ित पर कृपा करो;
संवरण उवाच
श्लोक 8 (1.188.8)
भजस्व भजमानं मां प्राणा हि प्रजहन्ति माम् । त्वदर्थं हि विशालाक्षि मामयं निशितैः शरैः ॥
bhajasva bhajamānaṃ māṃ prāṇā hi prajahanti mām | tvadarthaṃ hi viśālākṣi māmayaṃ niśitaiḥ śaraiḥ
"मुझ प्रेम करने वाले को अपना लो, क्योंकि मेरे प्राण मुझे छोड़ रहे हैं। हे विशाललोचने, तुम्हारे कारण यह कामदेव अपने तीखे बाणों से
श्लोक 9 (1.188.9)
कामः कमलगर्भाभे प्रतिविध्यन्न शाम्यति । दष्टमेवमनाक्रन्दे भद्रे काममहाहिना ॥
kāmaḥ kamalagarbhābhe pratividhyanna śāmyati | daṣṭamevamanākrande bhadre kāmamahāhinā
"हे कमल के भीतरी भाग-सी आभा वाली, मुझे निरन्तर बेध रहा है और थमता नहीं। हे भद्रे, इस असहाय दशा में मुझे काम रूपी महासर्प ने डस लिया है।
श्लोक 10 (1.188.10)
सा त्वं पीनायतश्रोणी मामाप्नुहि वरानने । त्वदधीना हि मे प्राणाः किन्नरोद्गीतभाषिणि ॥
sā tvaṃ pīnāyataśroṇī māmāpnuhi varānane | tvadadhīnā hi me prāṇāḥ kinnarodgītabhāṣiṇi
"इसलिए हे भरे नितम्बों वाली, हे सुमुखि, मुझे अपना लो; हे किन्नरों के गीत-सी वाणी वाली, मेरे प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं।
श्लोक 11 (1.188.11)
चारुसर्वानवद्याङ्गि पद्मेन्दुप्रतिमानने । न ह्यहं त्वदृते भीरु शक्ष्यामि खलु जीवितुम् ॥
cārusarvānavadyāṅgi padmendupratimānane | na hyahaṃ tvadṛte bhīru śakṣyāmi khalu jīvitum
"हे सर्वांगसुन्दरी, हे निर्दोष अंगों वाली, कमल और चन्द्रमा जैसे मुख वाली भीरु, तुम्हारे बिना मैं निश्चय ही जीवित नहीं रह सकूँगा।
श्लोक 12 (1.188.12)
कामः कमलपत्राक्षि प्रतिविध्यति मामयम् । तस्मात्कुरु विशालाक्षि मय्यनुक्रोशमङ्गने ॥
kāmaḥ kamalapatrākṣi pratividhyati māmayam | tasmātkuru viśālākṣi mayyanukrośamaṅgane
"हे कमलदललोचने, यह कामदेव मुझे बेध रहा है; इसलिए हे विशालाक्षि, हे अंगने, मुझ पर दया करो।
श्लोक 13 (1.188.13)
भक्तं मामसितापाङ्गि न परित्यक्तुमर्हसि । त्वं हि मां प्रीतियोगेन त्रातुमर्हसि भामिनि ॥
bhaktaṃ māmasitāpāṅgi na parityaktumarhasi | tvaṃ hi māṃ prītiyogena trātumarhasi bhāmini
"हे श्यामल नयनों वाली, मुझ भक्त को त्यागना तुम्हें उचित नहीं; हे भामिनि, तुम ही अपने प्रेम से मेरी रक्षा कर सकती हो।
श्लोक 14 (1.188.14)
त्वद्दर्शनकृतस्नेहं मनश्चलति मे भृशम् । न त्वां दृष्ट्वा पुनश्चान्यां द्रष्टुं कल्याणि रोचते ॥
tvaddarśanakṛtasnehaṃ manaścalati me bhṛśam | na tvāṃ dṛṣṭvā punaścānyāṃ draṣṭuṃ kalyāṇi rocate
"तुम्हें देखकर उपजे प्रेम से मेरा मन बहुत डोल रहा है। हे कल्याणि, तुम्हें देख लेने के बाद अब किसी और को देखना मुझे अच्छा नहीं लगता।
श्लोक 15 (1.188.15)
प्रसीद वशगोऽहं ते भक्तं मां भज भामिनि । दृष्ट्वैव त्वां वरारोहे मन्मथो भृशमङ्गने ॥
prasīda vaśago'haṃ te bhaktaṃ māṃ bhaja bhāmini | dṛṣṭvaiva tvāṃ varārohe manmatho bhṛśamaṅgane
"प्रसन्न हो जाओ, मैं तुम्हारे वश में हूँ; हे भामिनि, मुझ भक्त को अपना लो। हे वरारोहे, तुम्हें देखते ही कामदेव ने, हे अंगने,
श्लोक 16 (1.188.16)
अन्तर्गतं विशालाक्षि विध्यति स्म पतत्त्रिभिः । मन्मथाग्निसमुद्भूतं दाहं कमललोचने ॥
antargataṃ viśālākṣi vidhyati sma patattribhiḥ | manmathāgnisamudbhūtaṃ dāhaṃ kamalalocane
"हे विशालाक्षि, अपने बाणों से मेरे अन्तर्मन को बुरी तरह बेध डाला है। हे कमललोचने, कामाग्नि से उपजी इस जलन को
श्लोक 17 (1.188.17)
प्रीतिसंयोगयुक्ताभिरद्भिः प्रह्लादयस्व मे । पुष्पायुधं दुराधर्षं प्रचण्डशरकार्मुकम् ॥
prītisaṃyogayuktābhiradbhiḥ prahlādayasva me | puṣpāyudhaṃ durādharṣaṃ pracaṇḍaśarakārmukam
"प्रेम-मिलन के जल से मेरे लिए शीतल कर दो। जिसे रोकना कठिन है, जिसके बाण और धनुष प्रचण्ड हैं, उस पुष्पधन्वा कामदेव को,
श्लोक 18 (1.188.18)
त्वद्दर्शनसमुद्भूतं विध्यन्तं दुःसहैः शरैः । उपशामय कल्याणि आत्मदानेन भामिनि ॥
tvaddarśanasamudbhūtaṃ vidhyantaṃ duḥsahaiḥ śaraiḥ | upaśāmaya kalyāṇi ātmadānena bhāmini
"जो तुम्हारे दर्शन से उत्पन्न हुआ है और असह्य बाणों से मुझे बेध रहा है, हे कल्याणि, हे भामिनि, स्वयं को मुझे सौंपकर शान्त कर दो।
श्लोक 19 (1.188.19)
गान्धर्वेण विवाहेन मामुपैहि वराङ्गने । विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते ॥
gāndharveṇa vivāhena māmupaihi varāṅgane | vivāhānāṃ hi rambhoru gāndharvaḥ śreṣṭha ucyate
"हे वरांगने, गान्धर्व विवाह द्वारा मुझे प्राप्त हो जाओ; क्योंकि हे रम्भोरु, विवाहों में गान्धर्व विवाह श्रेष्ठ कहा गया है।"
तपत्युवाच
श्लोक 20 (1.188.20)
नाहमीशाऽऽत्मनो राजन्कन्या पितृमती ह्यहम् । मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्याचस्व पितरं मम ॥
nāhamīśā''tmano rājankanyā pitṛmatī hyaham | mayi cedasti te prītiryācasva pitaraṃ mama
"हे राजन्, मैं अपनी स्वामिनी नहीं हूँ; मैं ऐसी कन्या हूँ जिसके पिता जीवित हैं। यदि तुम्हें मुझसे प्रेम है तो मेरे पिता से मुझे माँग लो।
श्लोक 21 (1.188.21)
यथा हि ते मया प्राणाः संभृताश्च नरेश्वर । दर्शनादेव भूयस्त्वं तथा प्राणान्ममाहरः ॥
yathā hi te mayā prāṇāḥ saṃbhṛtāśca nareśvara | darśanādeva bhūyastvaṃ tathā prāṇānmamāharaḥ
"हे नरेश्वर, जैसे मैंने तुम्हारे प्राण हर लिये हैं, वैसे ही तुमने केवल दर्शन से मेरे प्राण उससे भी अधिक हर लिये हैं।
श्लोक 22 (1.188.22)
न चाहमीशा देहस्य तस्मान्नृपतिसत्तम । समीपं नोपगच्छामि न स्वतन्त्रा हि योषितः ॥
na cāhamīśā dehasya tasmānnṛpatisattama | samīpaṃ nopagacchāmi na svatantrā hi yoṣitaḥ
"किन्तु मैं अपने शरीर की स्वामिनी नहीं हूँ; इसीलिए हे नृपश्रेष्ठ, मैं तुम्हारे पास नहीं आती, क्योंकि स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होतीं।
श्लोक 23 (1.188.23)
का हि सर्वेषु लोकेषु विश्रुताभिजनं नृपम् । कन्या नाभिलषेन्नाथं भर्तारं भक्तवत्सलम् ॥
kā hi sarveṣu lokeṣu viśrutābhijanaṃ nṛpam | kanyā nābhilaṣennāthaṃ bhartāraṃ bhaktavatsalam
"भला सारे लोकों में कौन-सी कन्या ऐसे राजा को अपना स्वामी और पति बनाना न चाहेगी, जिसका कुल विख्यात हो और जो अपने भक्तों पर स्नेह रखता हो?
श्लोक 24 (1.188.24)
तस्मादेवं गते काले याचस्व पितरं मम । आदित्यं प्रणिपातेन तपसा नियमेन च ॥
tasmādevaṃ gate kāle yācasva pitaraṃ mama | ādityaṃ praṇipātena tapasā niyamena ca
"इसलिए ऐसी स्थिति में तुम प्रणाम, तपस्या और नियम-पालन द्वारा मेरे पिता आदित्य से मुझे माँगो।
श्लोक 25 (1.188.25)
स चेत्कामयते दातुं तव मामरिसूदन । भविष्याम्यद्य ते राजन्सततं वशवर्तिनी ॥
sa cetkāmayate dātuṃ tava māmarisūdana | bhaviṣyāmyadya te rājansatataṃ vaśavartinī
"हे शत्रुसूदन, यदि वे मुझे तुम्हें देना चाहें तो हे राजन्, आज से मैं सदा तुम्हारे वश में रहूँगी।
श्लोक 26 (1.188.26)
अहं हि तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता । अस्य लोकप्रदीपस्य सवितुः क्षत्रियर्षभ ॥
ahaṃ hi tapatī nāma sāvitryavarajā sutā | asya lokapradīpasya savituḥ kṣatriyarṣabha
"हे क्षत्रियश्रेष्ठ, मेरा नाम तपती है; मैं सावित्री की छोटी बहन और जगत् को प्रकाशित करने वाले इन सविता देव की पुत्री हूँ।"