आदि पर्व · अध्याय 187
सूर्यपुत्री तपती और राजा संवरण
अर्जुन पूछते हैं कि गन्धर्व ने उन्हें "तापत्य" क्यों कहा, और गन्धर्व सूर्य की पुत्री तथा सावित्री की छोटी बहन तपती की कथा आरम्भ करता है, जिसके योग्य कोई पति उसके पिता को नहीं मिला, जब तक कि कुरुवंशी राजा संवरण ने भक्तिपूर्ण उपासना से उन्हें प्रसन्न नहीं कर दिया। पर्वत पर शिकार खेलते हुए संवरण का घोड़ा मर जाता है और वे तपती को अकेली खड़ी देखते हैं; उसके रूप पर मुग्ध होकर वे उससे परिचय पूछते हैं, किन्तु वह बादलों में बिजली की तरह अन्तर्धान हो जाती है, और राजा वन में उसे खोजते-विलाप करते अन्त में निश्चेष्ट खड़े रह जाते हैं।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (1.187.1)
तापत्य इति यद्वाक्यमुक्तवानसि मामिह । तदहं ज्ञातुमिच्छामि तापत्यार्थं विनिश्चितम् ॥
tāpatya iti yadvākyamuktavānasi māmiha | tadahaṃ jñātumicchāmi tāpatyārthaṃ viniścitam
तुमने अभी मुझे "तापत्य" कहकर पुकारा। मैं "तापत्य" शब्द का निश्चित अर्थ जानना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (1.187.2)
तपती नाम का चैषा तापत्या यत्कृते वयम् । कौन्तेया हि वयं साधो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥
tapatī nāma kā caiṣā tāpatyā yatkṛte vayam | kaunteyā hi vayaṃ sādho tattvamicchāmi veditum
यह तपती कौन है, जिसके कारण हम "तापत्य" कहलाते हैं? हे साधु, हम तो कुन्ती के पुत्र हैं; मैं इसका तत्त्व जानना चाहता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (1.187.3)
एवमुक्तः स गन्धर्वः कुन्तीपुत्रं धनञ्जयम् । विश्रुतं त्रिषु लोकेषु श्रावयामास वै कथाम् ॥
evamuktaḥ sa gandharvaḥ kuntīputraṃ dhanañjayam | viśrutaṃ triṣu lokeṣu śrāvayāmāsa vai kathām
ऐसा कहे जाने पर उस गन्धर्व ने तीनों लोकों में विख्यात कुन्तीपुत्र धनञ्जय को वह कथा सुनाई।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 4 (1.187.4)
हन्त ते कथयिष्यामि कथामेतां मनोरमाम् । यथावदखिलां पार्थ सर्वबुद्धिमतां वर ॥
hanta te kathayiṣyāmi kathāmetāṃ manoramām | yathāvadakhilāṃ pārtha sarvabuddhimatāṃ vara
अच्छा, हे पार्थ, हे सब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, मैं तुम्हें यह मनोहर कथा पूरी-की-पूरी, जैसी घटी थी वैसी ही, सुनाता हूँ।
श्लोक 5 (1.187.5)
उक्तवानस्मि येन त्वां तापत्य इति यद्वचः । तत्तेऽहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना भव ॥
uktavānasmi yena tvāṃ tāpatya iti yadvacaḥ | tatte'haṃ kathayiṣyāmi śṛṇuṣvaikamanā bhava
मैंने तुम्हें "तापत्य" कहकर जिस कारण पुकारा, वह मैं बताता हूँ; एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 6 (1.187.6)
य एष दिवि धिष्ण्येन नाकं व्याप्नोति तेजसा । एतस्य तपती नाम बभूव सदृशी सुता ॥
ya eṣa divi dhiṣṇyena nākaṃ vyāpnoti tejasā | etasya tapatī nāma babhūva sadṛśī sutā
जो आकाश में अपने स्थान से अपने तेज द्वारा समूचे स्वर्ग को व्याप्त करते हैं, उन (सूर्य) की तपती नाम की एक पुत्री थी, जो उन्हीं के समान थी।
श्लोक 7 (1.187.7)
विवस्वतो वै देवस्य सावित्र्यवरजा विभो । विश्रुता त्रिषु लोकेषु तपती तपसा युता ॥
vivasvato vai devasya sāvitryavarajā vibho | viśrutā triṣu lokeṣu tapatī tapasā yutā
हे प्रभो, वह विवस्वान देव की पुत्री और सावित्री की छोटी बहन थी, तपस्या से युक्त और तीनों लोकों में "तपती" नाम से विख्यात।
श्लोक 8 (1.187.8)
न देवी नासुरी चैव न यक्षी न च राक्षसी । नाप्सरा न च गन्धर्वी तथा रूपेण काचन ॥
na devī nāsurī caiva na yakṣī na ca rākṣasī | nāpsarā na ca gandharvī tathā rūpeṇa kācana
रूप में उसके समान न कोई देवी थी, न असुर-कन्या, न यक्षी, न राक्षसी, न अप्सरा और न गन्धर्वी।
श्लोक 9 (1.187.9)
सुविभक्तानवद्याङ्गी स्वसितायतलोचना । स्वाचारा चैव साध्वी च सुवेषा चैव भामिनी ॥
suvibhaktānavadyāṅgī svasitāyatalocanā | svācārā caiva sādhvī ca suveṣā caiva bhāminī
उसके अङ्ग सुडौल और निर्दोष थे, नेत्र बड़े और सुन्दर काले थे; वह सदाचारिणी, साध्वी, सुन्दर वेशभूषा वाली और रूपवती थी।
श्लोक 10 (1.187.10)
न तस्याः सदृशं कंचित्त्रिषु लोकेषु भारत । भर्तारं सविता मेने रूपशीलगुणश्रुतैः ॥
na tasyāḥ sadṛśaṃ kaṃcittriṣu lokeṣu bhārata | bhartāraṃ savitā mene rūpaśīlaguṇaśrutaiḥ
हे भारत, तीनों लोकों में सविता को रूप, शील, गुण और विद्या में कोई ऐसा पुरुष नहीं सूझा जो उसके योग्य पति हो।
श्लोक 11 (1.187.11)
संप्राप्तयौवनां पश्यन्देयां दुहितरं तु ताम् । द्व्यष्टवर्षां तु तां श्यामां सविता रूपशालिनीम् । नोपलेभे ततः शान्तिं संप्रदानं विचिन्तयन् ॥
saṃprāptayauvanāṃ paśyandeyāṃ duhitaraṃ tu tām | dvyaṣṭavarṣāṃ tu tāṃ śyāmāṃ savitā rūpaśālinīm | nopalebhe tataḥ śāntiṃ saṃpradānaṃ vicintayan
अपनी पुत्री को युवावस्था में पहुँची और विवाह योग्य देखकर — सोलह वर्ष की उस श्यामा और रूपवती कन्या को देखकर — सविता उसके दान की चिन्ता में शान्ति न पा सके।
श्लोक 12 (1.187.12)
अथर्क्षपुत्रः कौन्तेय कुरूणामृषभो बली । सूर्यमाराधयामास नृपः संवरणस्तदा ॥
atharkṣaputraḥ kaunteya kurūṇāmṛṣabho balī | sūryamārādhayāmāsa nṛpaḥ saṃvaraṇastadā
हे कौन्तेय, उस समय ऋक्ष के पुत्र, कुरुवंश में श्रेष्ठ, बलवान राजा संवरण सूर्य की आराधना कर रहे थे।
श्लोक 13 (1.187.13)
अर्घ्यमाल्योपहाराद्यैर्गन्धैश्च नियतः शुचिः । नियमैरुपवासैश्च तपोभिर्विविधैरपि ॥
arghyamālyopahārādyairgandhaiśca niyataḥ śuciḥ | niyamairupavāsaiśca tapobhirvividhairapi
अर्घ्य, माला, उपहार और सुगन्धों से, संयमित और पवित्र रहकर, नियमों, उपवासों और विविध तपस्याओं से,
श्लोक 14 (1.187.14)
शुश्रूषुरनहंवादी शुचिः पौरवनन्दन । अंशुमन्तं समुद्यन्तं पूजयामास भक्तिमान् ॥
śuśrūṣuranahaṃvādī śuciḥ pauravanandana | aṃśumantaṃ samudyantaṃ pūjayāmāsa bhaktimān
सेवापरायण, अहंकाररहित और पवित्र रहकर, हे पौरवनन्दन, वे भक्तिपूर्वक उदय होते अंशुमाली सूर्य की पूजा करते थे।
श्लोक 15 (1.187.15)
ततः कृतज्ञं धर्मज्ञं रूपेणासदृशं भुवि । तपत्याः सदृशं मेने सूर्यः संवरणं पतिम् ॥
tataḥ kṛtajñaṃ dharmajñaṃ rūpeṇāsadṛśaṃ bhuvi | tapatyāḥ sadṛśaṃ mene sūryaḥ saṃvaraṇaṃ patim
तब सूर्य ने कृतज्ञ, धर्मज्ञ और पृथ्वी पर रूप में अनुपम संवरण को तपती के योग्य पति माना।
श्लोक 16 (1.187.16)
दातुमैच्छत्ततः कन्यां तस्मै संवरणाय ताम् । नृपोत्तमाय कौरव्य विश्रुताभिजनाय च ॥
dātumaicchattataḥ kanyāṃ tasmai saṃvaraṇāya tām | nṛpottamāya kauravya viśrutābhijanāya ca
हे कौरव्य, तब उन्होंने वह कन्या उन नृपश्रेष्ठ और प्रसिद्ध कुल वाले संवरण को देनी चाही।
श्लोक 17 (1.187.17)
यथा हि दिवि दीप्तांशुः प्रभासयति तेजसा । तथा भुवि महीपालो दीप्त्या संवरणोऽभवत् ॥
yathā hi divi dīptāṃśuḥ prabhāsayati tejasā | tathā bhuvi mahīpālo dīptyā saṃvaraṇo'bhavat
जैसे आकाश में प्रखर किरणों वाला सूर्य अपने तेज से सब कुछ प्रकाशित करता है, वैसे ही पृथ्वी पर राजा संवरण अपनी दीप्ति से प्रकाशित थे।
श्लोक 18 (1.187.18)
यथाऽर्चयन्ति चादित्यमुद्यन्तं ब्रह्मवादिनः । तथा संवरणं पार्थ ब्राह्मणावरजाः प्रजाः ॥
yathā'rcayanti cādityamudyantaṃ brahmavādinaḥ | tathā saṃvaraṇaṃ pārtha brāhmaṇāvarajāḥ prajāḥ
हे पार्थ, जैसे ब्रह्मवादी उदय होते सूर्य की पूजा करते हैं, वैसे ही ब्राह्मणों से लेकर सारी प्रजा संवरण का आदर करती थी।
श्लोक 19 (1.187.19)
स सोममति कान्तत्वादादित्यमति तेजसा । बभूव नृपतिः श्रीमान्सुहृदां दुर्हृदामपि ॥
sa somamati kāntatvādādityamati tejasā | babhūva nṛpatiḥ śrīmānsuhṛdāṃ durhṛdāmapi
कान्ति में चन्द्रमा से और तेज में सूर्य से बढ़कर वह श्रीमान राजा मित्रों और शत्रुओं — दोनों के लिए वैसा ही था।
श्लोक 20 (1.187.20)
एवंगुणस्य नृपतेस्तथावृत्तस्य कौरव । तस्मै दातुं मनश्चक्रे तपतीं तपनः स्वयम् ॥
evaṃguṇasya nṛpatestathāvṛttasya kaurava | tasmai dātuṃ manaścakre tapatīṃ tapanaḥ svayam
हे कौरव, ऐसे गुणों और आचरण वाले उस राजा को सूर्य ने स्वयं तपती देने का निश्चय किया।
श्लोक 21 (1.187.21)
स कदाचिदथो राजा श्रीमानमितविक्रमः । चचार मृगयां पार्थ पर्वतोपवने किल ॥
sa kadācidatho rājā śrīmānamitavikramaḥ | cacāra mṛgayāṃ pārtha parvatopavane kila
हे पार्थ, कहते हैं कि एक दिन वह अपार पराक्रमी श्रीमान राजा पर्वत के उपवन में शिकार खेलने गया।
श्लोक 22 (1.187.22)
चरतो मृगयां तस्य क्षुत्पिपासासमन्वितः । ममार राज्ञः कौन्तेय गिरावप्रतिमो हयः ॥
carato mṛgayāṃ tasya kṣutpipāsāsamanvitaḥ | mamāra rājñaḥ kaunteya girāvapratimo hayaḥ
हे कौन्तेय, शिकार में घूमते हुए राजा का अनुपम घोड़ा भूख-प्यास से व्याकुल होकर पर्वत पर मर गया।
श्लोक 23 (1.187.23)
स मृताश्वश्चरन्पार्थ पद्भ्यामेव गिरौ नृपः । ददर्शासदृशीं लोके कन्यामायतलोचनाम् ॥
sa mṛtāśvaścaranpārtha padbhyāmeva girau nṛpaḥ | dadarśāsadṛśīṃ loke kanyāmāyatalocanām
हे पार्थ, घोड़ा मर जाने पर राजा पैदल ही पर्वत पर घूमने लगा, और उसने बड़ी-बड़ी आँखों वाली एक कन्या देखी, जिसके समान संसार में कोई न था।
श्लोक 24 (1.187.24)
स एव एकामासाद्य कन्यां परबलार्दनः । तस्थौ नृपतिशार्दूलः पश्यन्नविचलेक्षणः ॥
sa eva ekāmāsādya kanyāṃ parabalārdanaḥ | tasthau nṛpatiśārdūlaḥ paśyannavicalekṣaṇaḥ
शत्रुसेना का संहार करने वाला वह राजसिंह अकेले ही उस अकेली कन्या के पास पहुँचकर अपलक नेत्रों से उसे देखता हुआ खड़ा रह गया।
श्लोक 25 (1.187.25)
स हि तां तर्कयामास रूपतो नृपतिः श्रियम् । पुनः संतर्कयामास रवेर्भ्रष्टामिव प्रभाम् ॥
sa hi tāṃ tarkayāmāsa rūpato nṛpatiḥ śriyam | punaḥ saṃtarkayāmāsa raverbhraṣṭāmiva prabhām
उसके रूप को देखकर राजा ने उसे साक्षात् लक्ष्मी समझा; फिर उसे सूर्य से गिरी हुई प्रभा-सी माना।
श्लोक 26 (1.187.26)
वपुषा वर्चसा चैव शिखामिव विभावसोः । प्रसन्नत्वेन कान्त्या च चन्द्ररेखामिवामलाम् ॥
vapuṣā varcasā caiva śikhāmiva vibhāvasoḥ | prasannatvena kāntyā ca candrarekhāmivāmalām
शरीर और तेज में वह अग्नि की शिखा-सी थी, और प्रसन्नता तथा कान्ति में निर्मल चन्द्रकला-सी।
श्लोक 27 (1.187.27)
गिरिपृष्ठे तु सा यस्मिन्स्थिता स्वसितलोचना । विभ्राजमाना शुशुभे प्रतिमेव हिरण्मयी ॥
giripṛṣṭhe tu sā yasminsthitā svasitalocanā | vibhrājamānā śuśubhe pratimeva hiraṇmayī
पर्वत की जिस पीठ पर वह सुन्दर काले नेत्रों वाली खड़ी थी, वहाँ वह स्वर्ण-प्रतिमा-सी दमकती हुई शोभा पा रही थी।
श्लोक 28 (1.187.28)
तस्या रूपेण स गिरिर्वेषेण च विशेषतः । ससवृक्षक्षुपलतो हिरण्मय इवाभवत् ॥
tasyā rūpeṇa sa girirveṣeṇa ca viśeṣataḥ | sasavṛkṣakṣupalato hiraṇmaya ivābhavat
उसके रूप से, और विशेषकर उसकी वेशभूषा से, वह पर्वत अपने वृक्षों, झाड़ियों और लताओं सहित मानो सोने का हो गया।
श्लोक 29 (1.187.29)
अवमेने च तां दृष्ट्वा सर्वलोकेषु योषितः । अवाप्तं चात्मनो मेने स राजा चक्षुषः फलं ॥
avamene ca tāṃ dṛṣṭvā sarvalokeṣu yoṣitaḥ | avāptaṃ cātmano mene sa rājā cakṣuṣaḥ phalaṃ
उसे देखकर राजा ने सब लोकों की स्त्रियों को तुच्छ समझा और माना कि आज उसकी आँखों को उनका फल मिल गया।
श्लोक 30 (1.187.30)
जन्मप्रभृति यत्किंचिद्दृष्टवान्स महीपतिः । रूपं न सदृशं तस्यास्तर्कयामास किंचन ॥
janmaprabhṛti yatkiṃciddṛṣṭavānsa mahīpatiḥ | rūpaṃ na sadṛśaṃ tasyāstarkayāmāsa kiṃcana
जन्म से लेकर अब तक राजा ने जो कुछ देखा था, उसमें उसे उसके समान कोई रूप नहीं सूझा।
श्लोक 31 (1.187.31)
तया बद्धमनश्चक्षुः पाशैर्गुणमयैस्तदा । न चचाल ततो देशाद्बुबुधे न च किंचन ॥
tayā baddhamanaścakṣuḥ pāśairguṇamayaistadā | na cacāla tato deśādbubudhe na ca kiṃcana
उसके गुणों की डोरियों से मन और नेत्र बँध जाने के कारण वह उस स्थान से हिला तक नहीं, और उसे किसी बात का भान न रहा।
श्लोक 32 (1.187.32)
अस्या नूनं विशालाक्ष्याः सदेवासुरमानुषम् । लोकं निर्मथ्य धात्रेदं रूपमाविष्कृतं कृतम् ॥
asyā nūnaṃ viśālākṣyāḥ sadevāsuramānuṣam | lokaṃ nirmathya dhātredaṃ rūpamāviṣkṛtaṃ kṛtam
"निश्चय ही विधाता ने देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित इस समूचे जगत् को मथकर इस विशालाक्षी का यह रूप प्रकट किया है।"
श्लोक 33 (1.187.33)
एवं संतर्कयामास रूपद्रविणसंपदा । कन्यामसदृशीं लोके नृपः संवरणस्तदा ॥
evaṃ saṃtarkayāmāsa rūpadraviṇasaṃpadā | kanyāmasadṛśīṃ loke nṛpaḥ saṃvaraṇastadā
रूप-सम्पदा में संसार में अनुपम उस कन्या के विषय में राजा संवरण ने तब इस प्रकार विचार किया।
श्लोक 34 (1.187.34)
तां च दृष्ट्वैव कल्याणीं कल्याणाभिजनो नृपः । जगाम मनसा चिन्तां कामबाणेन पीडितः ॥
tāṃ ca dṛṣṭvaiva kalyāṇīṃ kalyāṇābhijano nṛpaḥ | jagāma manasā cintāṃ kāmabāṇena pīḍitaḥ
उस कल्याणी को देखते ही उत्तम कुल वाला राजा काम के बाण से पीड़ित होकर मन-ही-मन चिन्ता में पड़ गया।
श्लोक 35 (1.187.35)
दह्यमानः स तीव्रेण नृपतिर्मन्मथाग्निना । अप्रगल्भां प्रगल्भस्तां तदोवाच मनोहराम् ॥
dahyamānaḥ sa tīvreṇa nṛpatirmanmathāgninā | apragalbhāṃ pragalbhastāṃ tadovāca manoharām
काम की तीव्र अग्नि में जलते हुए उस प्रगल्भ राजा ने तब उस संकोचशील मनोहारिणी से कहा —
संवरण उवाच
श्लोक 36 (1.187.36)
काऽसि कस्यासि रम्भोरु किमर्थं चेह तिष्ठसि । कथं च निर्जनेऽरण्ये चरस्येका शुचिस्मिते ॥
kā'si kasyāsi rambhoru kimarthaṃ ceha tiṣṭhasi | kathaṃ ca nirjane'raṇye carasyekā śucismite
हे सुन्दरी, तुम कौन हो, किसकी हो, और यहाँ किसलिए खड़ी हो? हे पवित्र मुस्कान वाली, इस निर्जन वन में तुम अकेली कैसे घूम रही हो?
श्लोक 37 (1.187.37)
त्वं हि सर्वानवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता । विभूषणमिवैतेषां भूषणानामभीप्सितम् ॥
tvaṃ hi sarvānavadyāṅgī sarvābharaṇabhūṣitā | vibhūṣaṇamivaiteṣāṃ bhūṣaṇānāmabhīpsitam
तुम्हारा प्रत्येक अङ्ग निर्दोष है और तुम सब आभूषणों से सजी हो; तुम तो इन आभूषणों का भी मनचाहा आभूषण हो।
श्लोक 38 (1.187.38)
न देवीं नासुरीं चैव न यक्षीं न च राक्षसीम् । न च भोगवतीं मन्ये न गन्धर्वीं न मानुषीम् ॥
na devīṃ nāsurīṃ caiva na yakṣīṃ na ca rākṣasīm | na ca bhogavatīṃ manye na gandharvīṃ na mānuṣīm
मैं तुम्हें न देवी मानता हूँ, न असुर-कन्या, न यक्षी, न राक्षसी, न नागकन्या, न गन्धर्वी और न मानवी।
श्लोक 39 (1.187.39)
या हि दृष्टा मया काश्चिच्छ्रुता वाऽपि वराङ्गनाः । न तासां सदृशीं मन्ये त्वामहं मत्तकाशिनि ॥
yā hi dṛṣṭā mayā kāścicchrutā vā'pi varāṅganāḥ | na tāsāṃ sadṛśīṃ manye tvāmahaṃ mattakāśini
हे मदमाती सुन्दरी, मैंने जितनी भी सुन्दरियाँ देखी या सुनी हैं, उनमें से किसी को मैं तुम्हारे समान नहीं मानता।
श्लोक 40 (1.187.40)
दृष्ट्वैव चारुवदने चन्द्रात्कान्ततरं तव । वदनं पद्मपत्राक्षं मां मथ्नातीव मन्मथः ॥
dṛṣṭvaiva cāruvadane candrātkāntataraṃ tava | vadanaṃ padmapatrākṣaṃ māṃ mathnātīva manmathaḥ
हे सुमुखी, चन्द्रमा से भी अधिक कमनीय, कमल-दल जैसे नेत्रों वाले तुम्हारे मुख को देखते ही कामदेव मानो मुझे मथे डाल रहा है।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 41 (1.187.41)
एवं तां स महीपालो बभाषे न तु सा तदा । कामार्तं निर्जनेऽरण्ये प्रत्यभाषत किंचन ॥
evaṃ tāṃ sa mahīpālo babhāṣe na tu sā tadā | kāmārtaṃ nirjane'raṇye pratyabhāṣata kiṃcana
राजा ने उससे इस प्रकार कहा, किन्तु उस निर्जन वन में उसने काम से पीड़ित उस राजा को कुछ भी उत्तर नहीं दिया।
श्लोक 42 (1.187.42)
ततो लालप्यमानस्य पार्थिवस्यायतेक्षणा । सौदामिनीव चाभ्रेषु तत्रैवान्तरधीयत ॥
tato lālapyamānasya pārthivasyāyatekṣaṇā | saudāminīva cābhreṣu tatraivāntaradhīyata
फिर, जब राजा बार-बार अनुनय कर रहा था, वह विशाल नेत्रों वाली बादलों में बिजली की तरह वहीं अन्तर्धान हो गई।
श्लोक 43 (1.187.43)
तामन्वेष्टुं स नृपतिः परिचक्राम सर्वतः । वनं वनजपत्राक्षीं भ्रमन्नुन्मत्तवत्तदा ॥
tāmanveṣṭuṃ sa nṛpatiḥ paricakrāma sarvataḥ | vanaṃ vanajapatrākṣīṃ bhramannunmattavattadā
उस कमलनयनी को खोजने के लिए राजा उन्मत्त-सा भटकता हुआ वन में चारों ओर घूमने लगा।
श्लोक 44 (1.187.44)
अपश्यमानः स तु तां बहु तत्र विलप्य च । निश्चेष्टः पार्थिवश्रेष्ठो मुहूर्तं स व्यतिष्ठत ॥
apaśyamānaḥ sa tu tāṃ bahu tatra vilapya ca | niśceṣṭaḥ pārthivaśreṣṭho muhūrtaṃ sa vyatiṣṭhata
उसे न पाकर और वहाँ बहुत विलाप करके वह राजश्रेष्ठ कुछ देर तक निश्चेष्ट खड़ा रहा।