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आदि पर्व · अध्याय 186

अर्जुन द्वारा गन्धर्व अङ्गारपर्ण की पराजय

पाञ्चाल की ओर उत्तर दिशा में यात्रा करते हुए पाण्डव और कुन्ती आधी रात को गङ्गा पर पहुँचते हैं, जहाँ अपनी स्त्रियों के साथ क्रीडा कर रहा गन्धर्व अङ्गारपर्ण उन्हें रोकता है और कहता है कि रात की घड़ियाँ उस जैसे प्राणियों की हैं। अर्जुन उत्तर देते हैं कि गङ्गा पर किसी का स्वामित्व नहीं है, आग्नेय अस्त्र से गन्धर्व का रथ जला देते हैं और उसे घसीटकर युधिष्ठिर के सामने ले आते हैं, जो उसकी पत्नी कुम्भीनसी की प्रार्थना पर उसे छोड़ देते हैं। अपना नाम चित्ररथ रखकर गन्धर्व अर्जुन को चाक्षुषी विद्या देता है और आग्नेय अस्त्र के बदले दिव्य घोड़े देने का वचन देता है; फिर बताता है कि वह उन पर इसलिए आक्रमण कर सका कि वे बिना पुरोहित के यात्रा कर रहे थे, और उन्हें योग्य पुरोहित रखने का परामर्श देता है।

अध्याय 185अध्याय-सूचीअध्याय 187

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.186.1)

ते प्रतस्थुः पुरस्कृत्य मातरं पुरुषर्षभाः । समैरुदङ्मुखैर्मार्गैर्यथोद्दिष्टं च भारत ॥

te pratasthuḥ puraskṛtya mātaraṃ puruṣarṣabhāḥ | samairudaṅmukhairmārgairyathoddiṣṭaṃ ca bhārata

तब वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव माता को आगे करके, बताए गए मार्ग के अनुसार, उत्तर की ओर जाने वाले समतल रास्तों से चल पड़े, हे भारत।

श्लोक 2 (1.186.2)

अहोरात्रेणाभ्यगच्छन्पाञ्चालनगरं प्रति । अभ्याजग्मुर्लोकनदीं गङ्गां भागीरथीं प्रति ॥

ahorātreṇābhyagacchanpāñcālanagaraṃ prati | abhyājagmurlokanadīṃ gaṅgāṃ bhāgīrathīṃ prati

दिन-रात चलते हुए वे पाञ्चालों के नगर की ओर बढ़े और लोकों की नदी, भागीरथी गङ्गा के तट पर आ पहुँचे।

श्लोक 3 (1.186.3)

चन्द्रास्तमयवेलायामर्धरात्रसमागमे । वारि चैवानुमज्जन्तस्तीर्थं सोमाश्रयायणम् ॥

candrāstamayavelāyāmardharātrasamāgame | vāri caivānumajjantastīrthaṃ somāśrayāyaṇam

चन्द्रमा के अस्त होने की बेला में, आधी रात के समय, जल में उतरते हुए, सोमाश्रयायण नामक तीर्थ पर —

श्लोक 4 (1.186.4)

आसेदुः पुरुषव्याघ्रा गङ्गायां पाण्डुनन्दनाः । उल्मुकं तु समुद्यम्य तेषामग्रे धनञ्जयः ॥

āseduḥ puruṣavyāghrā gaṅgāyāṃ pāṇḍunandanāḥ | ulmukaṃ tu samudyamya teṣāmagre dhanañjayaḥ

— पाण्डु के वे पुरुषसिंह पुत्र गङ्गा पर आ पहुँचे। धनञ्जय एक जलती मशाल उठाकर उनके आगे-आगे चल रहे थे,

श्लोक 5 (1.186.5)

प्रकाशार्थं ययौ तत्र रक्षार्थं च महारथः । तत्र गङ्गाजले रम्ये विविक्ते क्रीडयन् स्त्रियः ॥

prakāśārthaṃ yayau tatra rakṣārthaṃ ca mahārathaḥ | tatra gaṅgājale ramye vivikte krīḍayan striyaḥ

वे महारथी प्रकाश करने और रक्षा के लिए आगे चल रहे थे। वहाँ गङ्गा के रमणीय जल में, एकान्त स्थान पर, स्त्रियों के साथ क्रीडा करते हुए

श्लोक 6 (1.186.6)

शब्दं तेषां स शुश्राव नदीं समुपसर्पताम् । तेन शब्देन चाविष्टश्चुक्रोध बलवद्बली ॥

śabdaṃ teṣāṃ sa śuśrāva nadīṃ samupasarpatām | tena śabdena cāviṣṭaścukrodha balavadbalī

उस (गन्धर्व) ने नदी की ओर आते हुए उनका शब्द सुना, और उस शब्द से उत्तेजित होकर वह बलवान अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा।

श्लोक 7 (1.186.7)

स दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सह मात्रा परन्तपान् । विष्फारयन्धनुर्घोरमिदं वचनमब्रवीत् ॥

sa dṛṣṭvā pāṇḍavāṃstatra saha mātrā parantapān | viṣphārayandhanurghoramidaṃ vacanamabravīt

वहाँ माता के साथ उन शत्रुतापन पाण्डवों को देखकर वह अपने भयंकर धनुष की टंकार करता हुआ ये वचन बोला —

गन्धर्व उवाच

श्लोक 8 (1.186.8)

सन्ध्या संरज्यते घोरा पूर्वरात्रागमेषु या । अशीतिभिर्लवैर्हीनं तन्मुहूर्तं प्रचक्षते ॥

sandhyā saṃrajyate ghorā pūrvarātrāgameṣu yā | aśītibhirlavairhīnaṃ tanmuhūrtaṃ pracakṣate

रात्रि के आरम्भ में जो भयानक सन्ध्या लाल हो उठती है, उसके बाद का अस्सी लव कम एक मुहूर्त का समय —

श्लोक 9 (1.186.9)

विहितं कामचाराणां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । शेषमन्यन्मनुष्याणां कर्मचारेषु वै स्मृतम् ॥

vihitaṃ kāmacārāṇāṃ yakṣagandharvarakṣasām | śeṣamanyanmanuṣyāṇāṃ karmacāreṣu vai smṛtam

वह समय इच्छानुसार विचरने वाले यक्षों, गन्धर्वों और राक्षसों के लिए नियत है; शेष समय मनुष्यों के काम-काज और आने-जाने के लिए माना गया है।

श्लोक 10 (1.186.10)

लोभात्प्रचारं चरतस्तासु वेलासु वै नरान् । उपक्रान्ता निगृह्णीमो राक्षसैः सह बालिशान् ॥

lobhātpracāraṃ caratastāsu velāsu vai narān | upakrāntā nigṛhṇīmo rākṣasaiḥ saha bāliśān

जो मनुष्य लोभवश उन घड़ियों में घूमते-फिरते हैं, उन मूर्खों पर हम राक्षसों के साथ टूट पड़ते हैं और उन्हें पकड़ लेते हैं।

श्लोक 11 (1.186.11)

अतो रात्रौ प्राप्नुवतो जलं ब्रह्मविदो जनाः । गर्हयन्ति नरान्सर्वान्बलस्थान्नृपतीनपि ॥

ato rātrau prāpnuvato jalaṃ brahmavido janāḥ | garhayanti narānsarvānbalasthānnṛpatīnapi

इसीलिए ब्रह्मज्ञानी लोग रात में जल के पास आने वाले सभी मनुष्यों की निन्दा करते हैं, चाहे वे अपने बल पर टिके राजा ही क्यों न हों।

श्लोक 12 (1.186.12)

आराच्च तिष्ठतास्माकं समीपं नोपसर्पत । कस्मान्मां नाभिजानीत प्राप्तं भागीरथीजलम् ॥

ārācca tiṣṭhatāsmākaṃ samīpaṃ nopasarpata | kasmānmāṃ nābhijānīta prāptaṃ bhāgīrathījalam

हमसे दूर ठहरो, पास मत आओ। क्या तुम नहीं पहचानते कि मैं भागीरथी के जल पर आया हुआ हूँ?

श्लोक 13 (1.186.13)

अङ्गारपर्णं गन्धर्वं वित्त मां स्वबलाश्रयम् । अहं हि मानी चेर्ष्युश्च कुबेरस्य प्रियः सखा ॥

aṅgāraparṇaṃ gandharvaṃ vitta māṃ svabalāśrayam | ahaṃ hi mānī cerṣyuśca kuberasya priyaḥ sakhā

मुझे अपने ही बल पर भरोसा रखने वाला अङ्गारपर्ण गन्धर्व जानो। मैं अभिमानी और ईर्ष्यालु हूँ, कुबेर का प्रिय सखा हूँ।

श्लोक 14 (1.186.14)

अङ्गारपर्णमित्येवं ख्यातं चेदं वनं मम । अनुगङ्गं चरन्कामांश्चित्रं यत्र रमाम्यहम् ॥

aṅgāraparṇamityevaṃ khyātaṃ cedaṃ vanaṃ mama | anugaṅgaṃ carankāmāṃścitraṃ yatra ramāmyaham

मेरा यह वन भी "अङ्गारपर्ण" नाम से ही प्रसिद्ध है। यहाँ गङ्गा के किनारे-किनारे इच्छानुसार विचरता हुआ मैं भाँति-भाँति से रमण करता हूँ।

श्लोक 15 (1.186.15)

न कौणपाः शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषाः । कुबेरस्य यथोष्णीषं किं मां समुपसर्पथ ॥

na kauṇapāḥ śṛṅgiṇo vā na devā na ca mānuṣāḥ | kuberasya yathoṣṇīṣaṃ kiṃ māṃ samupasarpatha

न शव-भक्षी राक्षस, न अभिचार करने वाले, न देवता और न मनुष्य यहाँ आते हैं; यह स्थान कुबेर के मुकुट के समान है। फिर तुम मेरे पास क्यों चले आ रहे हो?

अर्जुन उवाच

श्लोक 16 (1.186.16)

समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां च दुर्मते । रात्रावहनि सन्ध्यायां कस्य क्लृप्तः परिग्रहः ॥

samudre himavatpārśve nadyāmasyāṃ ca durmate | rātrāvahani sandhyāyāṃ kasya klṛptaḥ parigrahaḥ

अरे दुर्बुद्धि! समुद्र पर, हिमालय की तलहटी पर और इस नदी पर — रात हो, दिन हो या सन्ध्या — किसका स्वामित्व कभी निश्चित किया गया है?

श्लोक 17 (1.186.17)

भुक्तो वाऽप्यथ वाऽभुक्तो रात्रावहनि खेचर । न कालनियमो ह्यस्ति गङ्गां प्राप्य सरिद्वरां ॥

bhukto vā'pyatha vā'bhukto rātrāvahani khecara | na kālaniyamo hyasti gaṅgāṃ prāpya saridvarāṃ

हे आकाशचारी! भोजन किया हो या न किया हो, रात हो या दिन, नदियों में श्रेष्ठ गङ्गा के पास पहुँच जाने पर समय का कोई नियम नहीं रहता।

श्लोक 18 (1.186.18)

वयं च शक्तिसम्पन्ना अकाले त्वामधृष्णुम । अशक्ता हि रणे क्रूर युष्मानर्चन्ति मानवाः ॥

vayaṃ ca śaktisampannā akāle tvāmadhṛṣṇuma | aśaktā hi raṇe krūra yuṣmānarcanti mānavāḥ

हम सामर्थ्य से सम्पन्न हैं, इसलिए असमय में भी तुम्हारी अवहेलना करते हैं। हे क्रूर! जो युद्ध में असमर्थ होते हैं, वही मनुष्य तुम लोगों की पूजा करते हैं।

श्लोक 19 (1.186.19)

पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद्विनिःसृता । गङ्गा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा समपद्यत ॥

purā himavataścaiṣā hemaśṛṅgādviniḥsṛtā | gaṅgā gatvā samudrāmbhaḥ saptadhā samapadyata

प्राचीन काल में यह गङ्गा हिमालय के स्वर्णमय शिखर से निकली और समुद्र के जल तक पहुँचकर सात धाराओं में बँट गई —

श्लोक 20 (1.186.20)

गङ्गां च यमुनां चैव प्लक्षजातां सरस्वतीम् । रथस्थां सरयूं चैव गोमतीं गण्डकीं तथा ॥

gaṅgāṃ ca yamunāṃ caiva plakṣajātāṃ sarasvatīm | rathasthāṃ sarayūṃ caiva gomatīṃ gaṇḍakīṃ tathā

गङ्गा और यमुना, प्लक्ष से उत्पन्न सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी।

श्लोक 21 (1.186.21)

अपर्युषितपापास्ते नदीः सप्त पिबन्ति ये । इयं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः ॥

aparyuṣitapāpāste nadīḥ sapta pibanti ye | iyaṃ bhūtvā caikavaprā śucirākāśagā punaḥ

जो इन सात नदियों का जल पीते हैं, उनके पाप रात भर भी नहीं टिकते। फिर यही पवित्र नदी, आकाश ही जिसका एकमात्र तट है, आकाश में बहती है।

श्लोक 22 (1.186.22)

देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम् । तथा पितॄन्वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः । गङ्गा भवति वै प्राप्य कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥

deveṣu gaṅgā gandharva prāpnotyalakanandatām | tathā pitṝnvaitaraṇī dustarā pāpakarmabhiḥ | gaṅgā bhavati vai prāpya kṛṣṇadvaipāyano'bravīt

हे गन्धर्व! देवताओं के बीच पहुँचकर गङ्गा अलकनन्दा बन जाती है, और पितरों के बीच वैतरणी, जिसे पापकर्मी कठिनाई से पार कर पाते हैं — ऐसा कृष्णद्वैपायन ने कहा है।

श्लोक 23 (1.186.23)

असम्बाधा देवनदी स्वर्गसंपादनी शुभा । कथमिच्छसि तां रोद्धुं नैष धर्मः सनातनः ॥

asambādhā devanadī svargasaṃpādanī śubhā | kathamicchasi tāṃ roddhuṃ naiṣa dharmaḥ sanātanaḥ

देवनदी गङ्गा सबके लिए खुली है, कल्याणमयी है और स्वर्ग प्रदान करने वाली है। तुम उसे कैसे रोकना चाहते हो? यह सनातन धर्म नहीं है।

श्लोक 24 (1.186.24)

अनिवार्यमसम्बाधं तव वाचा कथं वयम् । न स्पृशेम यथाकामं पुण्यं भागीरथीजलम् ॥

anivāryamasambādhaṃ tava vācā kathaṃ vayam | na spṛśema yathākāmaṃ puṇyaṃ bhāgīrathījalam

जिसे कोई रोक नहीं सकता और जो सबके लिए खुला है, उस भागीरथी के पवित्र जल को हम तुम्हारे कहने भर से इच्छानुसार क्यों न छुएँ?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (1.186.25)

अङ्गारपर्णस्तच्छ्रुत्वा क्रुद्ध आनाम्य कार्मुकम् । मुमोच बाणान्निशितानहीनाशीविषानिव ॥

aṅgāraparṇastacchrutvā kruddha ānāmya kārmukam | mumoca bāṇānniśitānahīnāśīviṣāniva

यह सुनकर अङ्गारपर्ण ने क्रोध में भरकर धनुष झुकाया और विषैले सर्पों के समान तीखे बाण छोड़े।

श्लोक 26 (1.186.26)

उल्मुकं भ्रामयंस्तूर्णं पाण्डवश्चर्म चोत्तरम् । व्यपोहत शरांस्तस्य सर्वानेव धनञ्जयः ॥

ulmukaṃ bhrāmayaṃstūrṇaṃ pāṇḍavaścarma cottaram | vyapohata śarāṃstasya sarvāneva dhanañjayaḥ

पाण्डुपुत्र धनञ्जय ने मशाल और अपनी उत्तम ढाल को तेज़ी से घुमाते हुए उसके सभी बाणों को रोक दिया।

अर्जुन उवाच

श्लोक 27 (1.186.27)

बिभीषिका वै गन्धर्व नास्त्रज्ञेषु प्रयुज्यते । अस्त्रज्ञेषु प्रयुक्तेयं फेनवत्प्रविलीयते ॥

bibhīṣikā vai gandharva nāstrajñeṣu prayujyate | astrajñeṣu prayukteyaṃ phenavatpravilīyate

हे गन्धर्व! ऐसे डराने वाले दाँव अस्त्रविद्या जानने वालों पर नहीं चलते; अस्त्रज्ञों पर चलाए जाएँ तो वे फेन की तरह विलीन हो जाते हैं।

श्लोक 28 (1.186.28)

मानुषानति गन्धर्वान्सर्वान् गन्धर्व लक्षये । तस्मादस्त्रेण दिव्येन योत्स्येऽहं न तु मायया ॥

mānuṣānati gandharvānsarvān gandharva lakṣaye | tasmādastreṇa divyena yotsye'haṃ na tu māyayā

हे गन्धर्व! मैं देखता हूँ कि सब गन्धर्व मनुष्यों से बढ़कर हैं; इसलिए मैं तुमसे दिव्य अस्त्र से युद्ध करूँगा, माया से नहीं।

श्लोक 29 (1.186.29)

पुराऽस्त्रमिदमाग्नेयं प्रादात्किल बृहस्पतिः । भरद्वाजाय गन्धर्व गुरुर्मान्यः शतक्रतोः ॥

purā'stramidamāgneyaṃ prādātkila bṛhaspatiḥ | bharadvājāya gandharva gururmānyaḥ śatakratoḥ

हे गन्धर्व! प्राचीन काल में शतक्रतु इन्द्र के माननीय गुरु बृहस्पति ने यह आग्नेय अस्त्र भरद्वाज को दिया था।

श्लोक 30 (1.186.30)

भरद्वाजादग्निवेश्यो अग्निवेश्याद्गुरुर्मम । साध्विदं मह्यमददद्द्रोणो ब्राह्मणसत्तमः ॥

bharadvājādagniveśyo agniveśyādgururmama | sādhvidaṃ mahyamadadaddroṇo brāhmaṇasattamaḥ

भरद्वाज से यह अग्निवेश्य को मिला, अग्निवेश्य से मेरे गुरु, ब्राह्मणश्रेष्ठ द्रोण को, और उन्होंने इसे विधिपूर्वक मुझे प्रदान किया।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (1.186.31)

इत्युक्त्वा पाण्डवः क्रुद्धो गन्धर्वाय मुमोच ह । प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेयं ददाहास्य रथं तु तत् ॥

ityuktvā pāṇḍavaḥ kruddho gandharvāya mumoca ha | pradīptamastramāgneyaṃ dadāhāsya rathaṃ tu tat

यह कहकर पाण्डुपुत्र ने क्रोध में भरकर गन्धर्व पर प्रज्वलित आग्नेय अस्त्र छोड़ा, और उसने उसका रथ जला डाला।

श्लोक 32 (1.186.32)

विरथं विप्लुतं तं तु स गन्धर्वं महाबलः । अस्त्रतेजःप्रमूढं च प्रपतन्तमवाङ्मुखम् ॥

virathaṃ viplutaṃ taṃ tu sa gandharvaṃ mahābalaḥ | astratejaḥpramūḍhaṃ ca prapatantamavāṅmukham

रथ से वंचित होकर नीचे गिरते, अस्त्र के तेज से मूर्च्छित और औंधे मुँह गिरते उस गन्धर्व को महाबली

श्लोक 33 (1.186.33)

शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनञ्जयः । भ्रातॄन्प्रति चकर्षाथ सोऽस्त्रपातादचेतसम् ॥

śiroruheṣu jagrāha mālyavatsu dhanañjayaḥ | bhrātṝnprati cakarṣātha so'strapātādacetasam

धनञ्जय ने उसके माला-सज्जित केशों से पकड़ लिया और अस्त्र के प्रहार से अचेत उस गन्धर्व को घसीटकर भाइयों की ओर ले आए।

श्लोक 34 (1.186.34)

युधिष्ठिरं तस्य भार्या प्रपेदे शरणार्थिनी । नाम्ना कुम्भीनसी नाम पतित्राणमभीप्सती ॥

yudhiṣṭhiraṃ tasya bhāryā prapede śaraṇārthinī | nāmnā kumbhīnasī nāma patitrāṇamabhīpsatī

तब कुम्भीनसी नाम की उसकी पत्नी अपने पति के प्राण बचाने की इच्छा से शरण माँगती हुई युधिष्ठिर के पास पहुँची।

गन्धर्व्युवाच

श्लोक 35 (1.186.35)

त्रायस्व मां महाभाग पतिं चेमं विमुञ्च मे । गन्धर्वी शरणं प्राप्ता नाम्ना कुम्भीनसी प्रभो ॥

trāyasva māṃ mahābhāga patiṃ cemaṃ vimuñca me | gandharvī śaraṇaṃ prāptā nāmnā kumbhīnasī prabho

हे महाभाग, मेरी रक्षा कीजिए और मेरे इस पति को छोड़ दीजिए। हे प्रभो, मैं कुम्भीनसी नाम की गन्धर्वी आपकी शरण में आई हूँ।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 36 (1.186.36)

युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम् । को निहन्याद्रिपुं तात मुञ्चेमं रिपुसूदन ॥

yuddhe jitaṃ yaśohīnaṃ strīnāthamaparākramam | ko nihanyādripuṃ tāta muñcemaṃ ripusūdana

युद्ध में हारे हुए, यशहीन, पराक्रमहीन और स्त्री के संरक्षण में आए शत्रु को कौन मारेगा? हे तात, हे शत्रुसूदन, इसे छोड़ दो।

अर्जुन उवाच

श्लोक 37 (1.186.37)

जीवितं प्रतिपद्यस्व गच्छ गन्धर्व मा शुचः । प्रदिशत्यभयं तेऽद्य कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥

jīvitaṃ pratipadyasva gaccha gandharva mā śucaḥ | pradiśatyabhayaṃ te'dya kururājo yudhiṣṭhiraḥ

हे गन्धर्व, अपना जीवन वापस लो, जाओ और शोक मत करो। आज कुरुराज युधिष्ठिर तुम्हें अभयदान देते हैं।

गन्धर्व उवाच

श्लोक 38 (1.186.38)

जितोऽहं पूर्वकं नाम मुञ्चाम्यङ्गारपर्णताम् । यशोहीनं न च श्लाघ्यं स्वं नाम जनसंसदि ॥

jito'haṃ pūrvakaṃ nāma muñcāmyaṅgāraparṇatām | yaśohīnaṃ na ca ślāghyaṃ svaṃ nāma janasaṃsadi

मैं हार गया हूँ। अपना पहला नाम "अङ्गारपर्ण" मैं छोड़ता हूँ; यशहीन नाम लोगों की सभा में सराहने योग्य नहीं रहता।

श्लोक 39 (1.186.39)

साध्विमं लब्धवाँल्लाभं योऽहं दिव्यास्त्रधारिणम् । गान्धर्व्या माययेच्छामि संयोजयितुमर्जुनम् ॥

sādhvimaṃ labdhavām̐llābhaṃ yo'haṃ divyāstradhāriṇam | gāndharvyā māyayecchāmi saṃyojayitumarjunam

मुझे यह बड़ा अच्छा लाभ हुआ है, क्योंकि अब मैं दिव्य अस्त्रधारी अर्जुन को गन्धर्वों की माया-विद्या से युक्त करना चाहता हूँ।

श्लोक 40 (1.186.40)

अस्त्राग्निना विचित्रोऽयं दग्धो मे रथ उत्तमः । सोऽहं चित्ररथो भूत्वा नाम्ना दग्धरथोऽभवं ॥

astrāgninā vicitro'yaṃ dagdho me ratha uttamaḥ | so'haṃ citraratho bhūtvā nāmnā dagdharatho'bhavaṃ

अस्त्र की अग्नि से मेरा यह विचित्र और उत्तम रथ जल गया। जो मैं "चित्ररथ" था, वही अब नाम से "दग्धरथ" हो गया हूँ।

श्लोक 41 (1.186.41)

संभृता चैव विद्येयं तपसेह मया पुरा । निवेदयिष्ये तामद्य प्राणदाय महात्मने ॥

saṃbhṛtā caiva vidyeyaṃ tapaseha mayā purā | nivedayiṣye tāmadya prāṇadāya mahātmane

यह विद्या मैंने बहुत पहले यहीं तपस्या से अर्जित की थी; आज मैं इसे अपने प्राणदाता महात्मा को अर्पित करूँगा।

श्लोक 42 (1.186.42)

संस्तम्भयित्वा तरसा जितं शरणमागतम् । यो रिपुं योजयेत्प्राणैः कल्याणं किं न सोऽर्हति ॥

saṃstambhayitvā tarasā jitaṃ śaraṇamāgatam | yo ripuṃ yojayetprāṇaiḥ kalyāṇaṃ kiṃ na so'rhati

जो बलपूर्वक शत्रु को स्तब्ध कर दे और फिर पराजित होकर शरण में आए उस शत्रु को प्राण लौटा दे, वह किस कल्याण का अधिकारी नहीं है?

श्लोक 43 (1.186.43)

चाक्षुषी नाम विद्येयं यां सोमाय ददौ मनुः । ददौ स विश्वावसवे मम विश्वावसुर्ददौ ॥

cākṣuṣī nāma vidyeyaṃ yāṃ somāya dadau manuḥ | dadau sa viśvāvasave mama viśvāvasurdadau

यह विद्या "चाक्षुषी" कहलाती है। मनु ने इसे सोम को दिया, सोम ने विश्वावसु को, और विश्वावसु ने मुझे।

श्लोक 44 (1.186.44)

सेयं कापुरुषं प्राप्ता गुरुदत्ता प्रणश्यति । आगमोऽस्या मया प्रोक्तो वीर्यं प्रतिनिबोध मे ॥

seyaṃ kāpuruṣaṃ prāptā gurudattā praṇaśyati | āgamo'syā mayā prokto vīryaṃ pratinibodha me

गुरु से मिली यह विद्या यदि किसी कायर के हाथ लगे तो नष्ट हो जाती है। मैंने इसकी परम्परा बता दी; अब मुझसे इसका प्रभाव भी जान लो।

श्लोक 45 (1.186.45)

यच्चक्षुषा द्रष्टुमिच्छेत्त्रिषु लोकेषु किंचन । तत्पश्येद्यादृशं चेच्छेत्तादृशं द्रष्टुमर्हति ॥

yaccakṣuṣā draṣṭumicchettriṣu lokeṣu kiṃcana | tatpaśyedyādṛśaṃ cecchettādṛśaṃ draṣṭumarhati

तीनों लोकों में जो कुछ भी आँख से देखना चाहे, वह उसे देख लेता है, और जिस रूप में देखना चाहे, उसी रूप में देख सकता है।

श्लोक 46 (1.186.46)

एकपादेन षण्मासान्स्थितो विद्यां लभेदिमाम् । अनुनेष्याम्यहं विद्यां स्वयं तुभ्यं व्रते कृते ॥

ekapādena ṣaṇmāsānsthito vidyāṃ labhedimām | anuneṣyāmyahaṃ vidyāṃ svayaṃ tubhyaṃ vrate kṛte

छह महीने एक पैर पर खड़ा रहकर मनुष्य यह विद्या पा सकता है; किन्तु मैं तुम्हारे व्रत को पूर्ण हुआ मानकर स्वयं यह विद्या तुम्हें दूँगा।

श्लोक 47 (1.186.47)

विद्यया ह्यनया राजन्वयं नृभ्यो विशेषिताः । अविशिष्टाश्च देवानामनुभावप्रदर्शिनः ॥

vidyayā hyanayā rājanvayaṃ nṛbhyo viśeṣitāḥ | aviśiṣṭāśca devānāmanubhāvapradarśinaḥ

हे राजन्, इसी विद्या के कारण हम मनुष्यों से श्रेष्ठ हैं और देवताओं से कम न होकर उन्हीं जैसा प्रभाव दिखाते हैं।

श्लोक 48 (1.186.48)

गन्धर्वजानामश्वानामहं पुरुषसत्तम । भ्रातृभ्यस्तव तुभ्यं च पृथग्दाता शतं शतं ॥

gandharvajānāmaśvānāmahaṃ puruṣasattama | bhrātṛbhyastava tubhyaṃ ca pṛthagdātā śataṃ śataṃ

हे पुरुषश्रेष्ठ, मैं गन्धर्वलोक में उत्पन्न घोड़े तुम्हें और तुम्हारे प्रत्येक भाई को सौ-सौ दूँगा।

श्लोक 49 (1.186.49)

देवगन्धर्ववाहास्ते दिव्यवर्णा मनोजवाः । क्षीणाक्षीणा भवन्त्येते न हीयन्ते च रंहसः ॥

devagandharvavāhāste divyavarṇā manojavāḥ | kṣīṇākṣīṇā bhavantyete na hīyante ca raṃhasaḥ

ये देवताओं और गन्धर्वों के वाहन हैं, दिव्य रंग वाले और मन के समान वेगवान; ये न क्षीण होते हैं, न बूढ़े, और न इनका वेग घटता है।

श्लोक 50 (1.186.50)

पुरा कृतं महेन्द्रस्य वज्रं वृत्रनिबर्हणम् । दशधा शतधा चैव तच्छीर्णं वृत्रमूर्धनि ॥

purā kṛtaṃ mahendrasya vajraṃ vṛtranibarhaṇam | daśadhā śatadhā caiva tacchīrṇaṃ vṛtramūrdhani

प्राचीन काल में महेन्द्र का वज्र वृत्र के वध के लिए बना था; वह वृत्र के मस्तक पर दस और सौ टुकड़ों में बिखर गया।

श्लोक 51 (1.186.51)

ततो भागीकृतो देवैर्वज्रभाग उपास्यते । लोके यशोधनं किंचित्सैव वज्रतनुः स्मृता ॥

tato bhāgīkṛto devairvajrabhāga upāsyate | loke yaśodhanaṃ kiṃcitsaiva vajratanuḥ smṛtā

तब देवताओं ने उसे भागों में बाँट दिया, और वज्र के वे भाग पूजे जाते हैं; संसार में जो कुछ यश और धन देने वाला है, वह वज्र का ही रूप माना गया है।

श्लोक 52 (1.186.52)

वज्रपाणिर्ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रं वज्ररथं स्मृतम् । वैश्या वै दानवज्राश्च कर्मवज्रा यवीयसः ॥

vajrapāṇirbrāhmaṇaḥ syātkṣatraṃ vajrarathaṃ smṛtam | vaiśyā vai dānavajrāśca karmavajrā yavīyasaḥ

ब्राह्मण का वज्र उसके हाथ में है, क्षत्रिय का वज्र उसका रथ कहा गया है, वैश्यों का वज्र दान है, और सबसे छोटे वर्ण का वज्र उसका कर्म है।

श्लोक 53 (1.186.53)

क्षत्रवज्रस्य भागेन अवध्या वाजिनः स्मृताः । रथाङ्गं वडबा सूते शूराश्चाश्वेषु ये मताः ॥

kṣatravajrasya bhāgena avadhyā vājinaḥ smṛtāḥ | rathāṅgaṃ vaḍabā sūte śūrāścāśveṣu ye matāḥ

क्षत्रिय के वज्र-भाग के कारण घोड़े अवध्य माने गए हैं; घोड़ी रथ के उस अङ्ग को जन्म देती है, और उन्हें भी जो अश्वों में शूर माने जाते हैं।

श्लोक 54 (1.186.54)

कामवर्णाः कामजवाः कामतः समुपस्थिताः । इति गन्धर्वजाः कामं पूरयिष्यन्ति मे हयाः ॥

kāmavarṇāḥ kāmajavāḥ kāmataḥ samupasthitāḥ | iti gandharvajāḥ kāmaṃ pūrayiṣyanti me hayāḥ

इच्छानुसार रंग वाले, इच्छानुसार वेग वाले और इच्छा करते ही उपस्थित हो जाने वाले — ऐसे मेरे गन्धर्वलोक में जन्मे घोड़े तुम्हारी कामना पूरी करेंगे।

अर्जुन उवाच

श्लोक 55 (1.186.55)

यदि प्रीतेन मे दत्तं संशये जीवितस्य वा । विद्या धनं श्रुतं वाऽपि न तद्गन्धर्व रोचये ॥

yadi prītena me dattaṃ saṃśaye jīvitasya vā | vidyā dhanaṃ śrutaṃ vā'pi na tadgandharva rocaye

हे गन्धर्व! चाहे प्रसन्न होकर दिया जाए या प्राण संकट में पड़ने के कारण, विद्या हो, धन हो या शास्त्रज्ञान, वह मुझे नहीं भाता।

गन्धर्व उवाच

श्लोक 56 (1.186.56)

संयोगो वै प्रीतिकरो महत्सु प्रतिदृश्यते । जीवितस्य प्रदानेन प्रीतो विद्यां ददामि ते ॥

saṃyogo vai prītikaro mahatsu pratidṛśyate | jīvitasya pradānena prīto vidyāṃ dadāmi te

महान लोगों के बीच मैत्री का सम्बन्ध प्रीति देने वाला देखा जाता है। तुमने मुझे जीवन दिया है, इससे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें यह विद्या देता हूँ।

श्लोक 57 (1.186.57)

त्वत्तोऽप्यहं ग्रहीष्यामि अस्त्रमाग्नेयमुत्तमम् । तथैव योग्यं बीभत्सो चिराय भरतर्षभ ॥

tvatto'pyahaṃ grahīṣyāmi astramāgneyamuttamam | tathaiva yogyaṃ bībhatso cirāya bharatarṣabha

और मैं भी तुमसे श्रेष्ठ आग्नेय अस्त्र ग्रहण करूँगा। हे बीभत्सु, यह उचित आदान-प्रदान है; हे भरतश्रेष्ठ, यह सम्बन्ध दीर्घकाल तक बना रहे।

अर्जुन उवाच

श्लोक 58 (1.186.58)

त्वत्तोऽस्त्रेण वृणोम्यश्वान्संयोगः शाश्वतोऽस्तु नौ । सखे तद्ब्रूहि गन्धर्व युष्मभ्यो यद्भयं भवेत् ॥

tvatto'streṇa vṛṇomyaśvānsaṃyogaḥ śāśvato'stu nau | sakhe tadbrūhi gandharva yuṣmabhyo yadbhayaṃ bhavet

मैं अपने अस्त्र के बदले तुमसे घोड़े लेना स्वीकार करता हूँ; हमारी मैत्री सदा बनी रहे। और मित्र गन्धर्व, यह बताओ कि हमें तुम लोगों से भय किस कारण हो सकता है।

श्लोक 59 (1.186.59)

कारणं ब्रूहि गन्धर्व किं तद्येन स्म धर्षिताः । यान्तो वेदविदः सर्वे सन्तो रात्रावरिन्दमाः ॥

kāraṇaṃ brūhi gandharva kiṃ tadyena sma dharṣitāḥ | yānto vedavidaḥ sarve santo rātrāvarindamāḥ

हे गन्धर्व, वह कारण बताओ जिससे हम पर आक्रमण हुआ, जबकि हम सब वेदज्ञ और सज्जन हैं, शत्रुओं का दमन करने वाले हैं, और रात में यात्रा कर रहे थे।

गन्धर्व उवाच

श्लोक 60 (1.186.60)

अनग्नयोऽनाहुतयो न च विप्रपुरस्कृताः । यूयं ततो धर्षिताः स्थ मया वै पाण्डुनन्दनाः ॥

anagnayo'nāhutayo na ca viprapuraskṛtāḥ | yūyaṃ tato dharṣitāḥ stha mayā vai pāṇḍunandanāḥ

तुम न अग्निहोत्र की अग्नि रखते हो, न आहुति देते हो, न कोई ब्राह्मण तुम्हारे आगे चलता है; इसी कारण, हे पाण्डुपुत्रो, मैंने तुम पर आक्रमण किया।

श्लोक 61 (1.186.61)

यक्षराक्षसगन्धर्वपिशाचपतगोरगाः । धर्षयन्ति नरव्याघ्र न ब्राह्मणपुरस्कृतान् ॥

yakṣarākṣasagandharvapiśācapatagoragāḥ | dharṣayanti naravyāghra na brāhmaṇapuraskṛtān

हे नरश्रेष्ठ, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग उन पर आक्रमण नहीं करते जिनके आगे ब्राह्मण चलते हैं।

श्लोक 62 (1.186.62)

जानतापि मया तस्मात्तेजश्चाभिजनं च वः । इयमग्निमतां श्रेष्ठ धर्षिता वै पुरागतिः ॥

jānatāpi mayā tasmāttejaścābhijanaṃ ca vaḥ | iyamagnimatāṃ śreṣṭha dharṣitā vai purāgatiḥ

इसलिए, हे अग्निहोत्रियों में श्रेष्ठ, तुम्हारे तेज और कुल को जानते हुए भी मैंने आगे बढ़ते हुए तुम पर आक्रमण किया।

श्लोक 63 (1.186.63)

को हि वस्त्रिषु लोकेषु न वेद भरतर्षभ । स्वैर्गुणैर्विस्तृतं श्रीमद्यशोऽग्र्यं भूरिवर्चसाम् ॥

ko hi vastriṣu lokeṣu na veda bharatarṣabha | svairguṇairvistṛtaṃ śrīmadyaśo'gryaṃ bhūrivarcasām

हे भरतश्रेष्ठ, तीनों लोकों में ऐसा कौन है जो अपने ही गुणों से फैले हुए तुम महातेजस्वियों के श्रेष्ठ और शोभायमान यश को न जानता हो?

श्लोक 64 (1.186.64)

यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचोरगदानवाः । विस्तरं कुरुवंशस्य धीमन्तः कथयन्ति ते ॥

yakṣarākṣasagandharvāḥ piśācoragadānavāḥ | vistaraṃ kuruvaṃśasya dhīmantaḥ kathayanti te

यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पिशाच, नाग और दानव — इनमें जो बुद्धिमान हैं, वे तुम्हारे कुरुवंश की कथा विस्तार से कहते हैं।

श्लोक 65 (1.186.65)

नारदप्रभृतीनां तु देवर्षीणां मया श्रुतम् । गुणान्कथयतां वीर पूर्वेषां तव धीमताम् ॥

nāradaprabhṛtīnāṃ tu devarṣīṇāṃ mayā śrutam | guṇānkathayatāṃ vīra pūrveṣāṃ tava dhīmatām

हे वीर, मैंने नारद आदि देवर्षियों को तुम्हारे बुद्धिमान पूर्वजों के गुणों का वर्णन करते सुना है।

श्लोक 66 (1.186.66)

स्वयं चापि मया दृष्टश्चरता सागराम्बराम् । इमां वसुमतीं कृत्स्नां प्रभावः सुकुलस्य ते ॥

svayaṃ cāpi mayā dṛṣṭaścaratā sāgarāmbarām | imāṃ vasumatīṃ kṛtsnāṃ prabhāvaḥ sukulasya te

और समुद्र रूपी वस्त्र वाली इस समूची पृथ्वी पर विचरते हुए मैंने स्वयं तुम्हारे उत्तम कुल का प्रभाव देखा है।

श्लोक 67 (1.186.67)

वेदे धनुषि चाचार्यमभिजानामि तेऽर्जुन । विश्रुतं त्रिषु लोकेषु भारद्वाजं यशस्विनम् ॥

vede dhanuṣi cācāryamabhijānāmi te'rjuna | viśrutaṃ triṣu lokeṣu bhāradvājaṃ yaśasvinam

हे अर्जुन, वेद और धनुर्विद्या में तुम्हारे आचार्य, तीनों लोकों में विख्यात यशस्वी भरद्वाजपुत्र को मैं जानता हूँ —

श्लोक 68 (1.186.68)

सर्ववेदविदां श्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । द्रोणमिष्वस्त्रकुशलं धनुष्यङ्गिरसां वरम् ॥

sarvavedavidāṃ śreṣṭhaṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam | droṇamiṣvastrakuśalaṃ dhanuṣyaṅgirasāṃ varam

सब वेदज्ञों में श्रेष्ठ, सब शस्त्रधारियों में उत्तम, बाण और अस्त्रों में कुशल, धनुर्विद्या में अङ्गिरावंशियों में श्रेष्ठ द्रोण को।

श्लोक 69 (1.186.69)

धर्मं वायुं च शक्रं च विजानाम्यश्विनौ तथा । पाण्डुं च कुरुशार्दूल षडेतान्कुरुवर्धनान् । पितॄनेतानहं पार्थ देवमानुषसत्तमान् ॥

dharmaṃ vāyuṃ ca śakraṃ ca vijānāmyaśvinau tathā | pāṇḍuṃ ca kuruśārdūla ṣaḍetānkuruvardhanān | pitṝnetānahaṃ pārtha devamānuṣasattamān

हे कुरुश्रेष्ठ पार्थ, धर्म, वायु, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार और पाण्डु — कुरुवंश को बढ़ाने वाले इन छहों को, देवताओं और मनुष्यों में श्रेष्ठ तुम्हारे इन पिताओं को मैं जानता हूँ।

श्लोक 70 (1.186.70)

दिव्यात्मानो महात्मानः सर्वशस्त्रभृतां वराः । भवन्तो भ्रातरः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः ॥

divyātmāno mahātmānaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varāḥ | bhavanto bhrātaraḥ śūrāḥ sarve sucaritavratāḥ

तुम सब भाई दिव्य स्वभाव वाले, महात्मा, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, शूरवीर और उत्तम व्रतों का पालन करने वाले हो।

श्लोक 71 (1.186.71)

उत्तमां च मनोबुद्धिं भवतां भावितात्मनाम् । जानन्नपि च वः पार्थ कृतवानिह धर्षणाम् ॥

uttamāṃ ca manobuddhiṃ bhavatāṃ bhāvitātmanām | jānannapi ca vaḥ pārtha kṛtavāniha dharṣaṇām

हे पार्थ, तुम संयमी पुरुषों के उत्तम मन और बुद्धि को जानते हुए भी मैंने यहाँ तुम पर आक्रमण किया।

श्लोक 72 (1.186.72)

स्त्रीसकाशे च कौरव्य न पुमान्क्षन्तुमर्हति । धर्षणामात्मनः पश्यन्बाहुद्रविणमाश्रितः ॥

strīsakāśe ca kauravya na pumānkṣantumarhati | dharṣaṇāmātmanaḥ paśyanbāhudraviṇamāśritaḥ

हे कौरव्य, अपनी भुजाओं के बल पर भरोसा रखने वाला कोई पुरुष स्त्रियों के सामने अपना अपमान होते देखकर उसे सह नहीं सकता।

श्लोक 73 (1.186.73)

नक्तं च बलमस्माकं भूय एवाभिवर्धते । यतस्ततो मां कौन्तेय सदारं मन्युराविशत् ॥

naktaṃ ca balamasmākaṃ bhūya evābhivardhate | yatastato māṃ kaunteya sadāraṃ manyurāviśat

और रात में हमारा बल और भी बढ़ जाता है; इसीलिए, हे कौन्तेय, पत्नी के साथ रहते हुए मुझ पर क्रोध छा गया।

श्लोक 74 (1.186.74)

सोऽहं त्वयेह विजितः सङ्ख्ये तापत्यवर्धन । येन तेनेह विधिना कीर्त्यमानं निबोध मे ॥

so'haṃ tvayeha vijitaḥ saṅkhye tāpatyavardhana | yena teneha vidhinā kīrtyamānaṃ nibodha me

हे तपती के वंश को बढ़ाने वाले, फिर भी मैं यहाँ युद्ध में तुमसे हार गया। जिस कारण से ऐसा हुआ, वह मैं बताता हूँ, सुनो।

श्लोक 75 (1.186.75)

ब्रह्मचर्यं परो धर्मः स चापि नियतस्त्वयि । यस्मात्तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मिन्विजितस्त्वया ॥

brahmacaryaṃ paro dharmaḥ sa cāpi niyatastvayi | yasmāttasmādahaṃ pārtha raṇe'sminvijitastvayā

ब्रह्मचर्य परम धर्म है और वह तुममें दृढ़ता से स्थित है; इसी कारण, हे पार्थ, इस युद्ध में मैं तुमसे पराजित हुआ।

श्लोक 76 (1.186.76)

यस्तु स्यात्क्षत्रियः कश्चित्कामवृत्तः परन्तप । नक्तं च युधि युध्येत न स जीवेत्कथंचन ॥

yastu syātkṣatriyaḥ kaścitkāmavṛttaḥ parantapa | naktaṃ ca yudhi yudhyeta na sa jīvetkathaṃcana

किन्तु हे परन्तप, कामनाओं के अनुसार जीवन बिताने वाला कोई भी क्षत्रिय यदि रात में युद्ध करे, तो वह किसी प्रकार जीवित नहीं बच सकता।

श्लोक 77 (1.186.77)

यस्तु स्यात्कामवृत्तोऽपि पार्थ ब्रह्मपुरस्कृतः । जयेन्नक्तञ्चरान्सर्वान्स पुरोहितधूर्गतः ॥

yastu syātkāmavṛtto'pi pārtha brahmapuraskṛtaḥ | jayennaktañcarānsarvānsa purohitadhūrgataḥ

परन्तु हे पार्थ, जो कामनाओं के अनुसार जीते हुए भी ब्राह्मण को आगे रखता है और जिसका भार पुरोहित उठाता है, वह सब निशाचरों को जीत सकता है।

श्लोक 78 (1.186.78)

तस्मात्तापत्य यत्किंचिन्नृणां श्रेय इहेप्सितम् । तस्मिन्कर्मणि योक्तव्या दान्तात्मानः पुरोहिताः ॥

tasmāttāpatya yatkiṃcinnṛṇāṃ śreya ihepsitam | tasminkarmaṇi yoktavyā dāntātmānaḥ purohitāḥ

इसलिए हे तापत्य, मनुष्य इस लोक में जो भी कल्याण चाहते हों, उस कार्य में संयमी पुरोहितों को नियुक्त करना चाहिए।

श्लोक 79 (1.186.79)

वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः । धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ॥

vede ṣaḍaṅge niratāḥ śucayaḥ satyavādinaḥ | dharmātmānaḥ kṛtātmānaḥ syurnṛpāṇāṃ purohitāḥ

राजाओं के पुरोहित छहों अङ्गों सहित वेद में लगे रहने वाले, पवित्र, सत्यवादी, धर्मात्मा और आत्मसंयमी होने चाहिए।

श्लोक 80 (1.186.80)

जयश्च नियतो राज्ञः स्वर्गश्च तदनन्तरम् । यस्य स्याद्धर्मविद्वाग्मी पुरोधाः शीलवाञ्शुचिः ॥

jayaśca niyato rājñaḥ svargaśca tadanantaram | yasya syāddharmavidvāgmī purodhāḥ śīlavāñśuciḥ

जिस राजा का पुरोहित धर्मज्ञ, वाक्पटु, शीलवान और पवित्र हो, उसकी विजय निश्चित है और उसके बाद स्वर्ग भी।

श्लोक 81 (1.186.81)

लाभं लब्धुमलब्धं वा लब्धं वा परिरक्षितुम् । पुरोहितं प्रकुर्वीत राजा गुणसमन्वितम् ॥

lābhaṃ labdhumalabdhaṃ vā labdhaṃ vā parirakṣitum | purohitaṃ prakurvīta rājā guṇasamanvitam

जो प्राप्त नहीं हुआ उसे पाने के लिए, या जो प्राप्त हो चुका है उसकी रक्षा के लिए, राजा को गुणवान पुरोहित नियुक्त करना चाहिए।

श्लोक 82 (1.186.82)

पुरोहितमते तिष्ठेद्य इच्छेद्भूतिमात्मनः । प्राप्तुं वसुमतीं सर्वां सर्वशः सागराम्बराम् ॥

purohitamate tiṣṭhedya icchedbhūtimātmanaḥ | prāptuṃ vasumatīṃ sarvāṃ sarvaśaḥ sāgarāmbarām

जो अपना ऐश्वर्य चाहता है और समुद्र रूपी वस्त्र वाली सारी पृथ्वी को सब प्रकार से प्राप्त करना चाहता है, उसे पुरोहित की सम्मति के अनुसार चलना चाहिए।

श्लोक 83 (1.186.83)

न हि केवलशौर्येण तापत्याभिजनेन च । जयेदब्राह्मणः कश्चिद्भूमिं भूमिपतिः क्वचित् ॥

na hi kevalaśauryeṇa tāpatyābhijanena ca | jayedabrāhmaṇaḥ kaścidbhūmiṃ bhūmipatiḥ kvacit

हे तापत्य, कोई भी राजा केवल शौर्य या कुलीनता के बल पर, ब्राह्मण के बिना, कभी पृथ्वी को नहीं जीत सकता।

श्लोक 84 (1.186.84)

तस्मादेवं विजानीहि कुरूणां वंशवर्धन । ब्राह्मणप्रमुखं राज्यं शक्यं पालयितुं चिरम् ॥

tasmādevaṃ vijānīhi kurūṇāṃ vaṃśavardhana | brāhmaṇapramukhaṃ rājyaṃ śakyaṃ pālayituṃ ciram

इसलिए, हे कुरुवंश को बढ़ाने वाले, यह जान लो कि जिस राज्य में ब्राह्मण अग्रणी हों, वही दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

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