आदि पर्व · अध्याय 191
वसिष्ठ की नन्दिनी और विश्वामित्र की पराजय
विश्वामित्र और वसिष्ठ के वैर का कारण पूछने पर गन्धर्व अर्जुन को बताता है कि गाधिपुत्र राजा विश्वामित्र शिकार करते हुए वसिष्ठ के आश्रम पहुँचे और कामधेनु नन्दिनी द्वारा दी गई वस्तुओं से उनका सत्कार हुआ। जब वसिष्ठ ने राज्य के बदले भी गौ देने से मना कर दिया, तब विश्वामित्र उसे बलपूर्वक ले जाने लगे; वसिष्ठ के कहने पर नन्दिनी ने अनेक म्लेच्छ योद्धाओं को उत्पन्न किया जिन्होंने उनकी सेना को खदेड़ दिया, और वसिष्ठ ने अपने दण्ड से सारे दिव्य अस्त्र निष्फल कर दिए। लज्जित विश्वामित्र ने तप को ही परम बल मानकर राज्य त्याग दिया और तपस्या से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (1.191.1)
किंनिमित्तमभूद्वैरं विश्वामित्रवसिष्ठयोः । वसतोराश्रमे दिव्ये शंस नः सर्वमेव तत् ॥
kiṃnimittamabhūdvairaṃ viśvāmitravasiṣṭhayoḥ | vasatorāśrame divye śaṃsa naḥ sarvameva tat
विश्वामित्र और वसिष्ठ, जो दोनों दिव्य आश्रमों में रहते थे, उनके बीच वैर किस कारण हुआ? यह सब हमें बताइए।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 2 (1.191.2)
इदं वासिष्ठमाख्यानं पुराणं परिचक्षते । पार्थ सर्वेषु लोकेषु यथावत्तन्निबोध मे ॥
idaṃ vāsiṣṭhamākhyānaṃ purāṇaṃ paricakṣate | pārtha sarveṣu lokeṣu yathāvattannibodha me
हे पार्थ! वसिष्ठ की यह कथा सभी लोकों में प्राचीन कही जाती है। इसे मुझसे यथावत् सुनो।
श्लोक 3 (1.191.3)
कान्यकुब्जे महानासीत्पार्थिवो भरतर्षभ । गाधीति विश्रुतो लोके कुशिकस्यात्मसंभवः ॥
kānyakubje mahānāsītpārthivo bharatarṣabha | gādhīti viśruto loke kuśikasyātmasaṃbhavaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! कान्यकुब्ज में गाधि नाम से विख्यात एक महान राजा थे, जो कुशिक के पुत्र थे।
श्लोक 4 (1.191.4)
तस्य धर्मात्मनः पुत्रः समृद्धबलवाहनः । विश्वामित्र इति ख्यातो बभूव रिपुमर्दनः ॥
tasya dharmātmanaḥ putraḥ samṛddhabalavāhanaḥ | viśvāmitra iti khyāto babhūva ripumardanaḥ
उस धर्मात्मा राजा के विश्वामित्र नाम से प्रसिद्ध पुत्र हुए, जिनके पास विपुल सेना और वाहन थे और जो शत्रुओं का मर्दन करने वाले थे।
श्लोक 5 (1.191.5)
स चचार सहामात्यो मृगयां गहने वने । मृगान्विध्यन्वराहांश्च रम्येषु मरुधन्वसु ॥
sa cacāra sahāmātyo mṛgayāṃ gahane vane | mṛgānvidhyanvarāhāṃśca ramyeṣu marudhanvasu
वे अपने मन्त्रियों के साथ घने वन में शिकार खेलने निकले और रमणीय मरुभूमियों में हिरनों और सूअरों को बाणों से बेधते हुए घूमते रहे।
श्लोक 6 (1.191.6)
व्यायामकर्शितः सोऽथ मृगलिप्सुः पिपासितः । आजगाम नरश्रेष्ठ वसिष्ठस्याश्रमं प्रति ॥
vyāyāmakarśitaḥ so'tha mṛgalipsuḥ pipāsitaḥ | ājagāma naraśreṣṭha vasiṣṭhasyāśramaṃ prati
हे नरश्रेष्ठ! परिश्रम से थके, शिकार की इच्छा रखते और प्यास से व्याकुल वे वसिष्ठ के आश्रम पहुँचे।
श्लोक 7 (1.191.7)
तमागतमभिप्रेक्ष्य वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः । विश्वामित्रं नरश्रेष्ठं प्रतिजग्राह पूजया ॥
tamāgatamabhiprekṣya vasiṣṭhaḥ śreṣṭhabhāgṛṣiḥ | viśvāmitraṃ naraśreṣṭhaṃ pratijagrāha pūjayā
उन्हें आया देखकर परम सम्मान के अधिकारी ऋषि वसिष्ठ ने नरश्रेष्ठ विश्वामित्र का पूजन करके स्वागत किया।
श्लोक 8 (1.191.8)
पाद्यार्घ्याचमनीयैस्तं स्वागतेन च भारत । तथैव परिजग्राह वन्येन हविषा तदा ॥
pādyārghyācamanīyaistaṃ svāgatena ca bhārata | tathaiva parijagrāha vanyena haviṣā tadā
हे भारत! उन्होंने पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय जल और स्वागत-वचनों से उनका सत्कार किया, और वन में उपजे हविष्य-अन्न से भी उनका आतिथ्य किया।
श्लोक 9 (1.191.9)
तस्याथ कामधुग्धेनुर्वसिष्ठस्य महात्मनः । उक्ता कामान्प्रयच्छेति सा कामान्दुदुहे ततः ॥
tasyātha kāmadhugdhenurvasiṣṭhasya mahātmanaḥ | uktā kāmānprayaccheti sā kāmānduduhe tataḥ
महात्मा वसिष्ठ की एक कामधेनु थी। जब उससे कहा गया, "मनचाही वस्तुएँ दो", तब उसने सब इच्छित वस्तुएँ दुह दीं।
श्लोक 10 (1.191.10)
बाष्पाढ्यस्योदनस्यैव राशयः पर्वतोपमाः । निष्ठानानि च सूपांश्च दधिकुल्यास्तथैव च ॥
bāṣpāḍhyasyodanasyaiva rāśayaḥ parvatopamāḥ | niṣṭhānāni ca sūpāṃśca dadhikulyāstathaiva ca
भाप उठते भात के पर्वत जैसे ढेर, व्यंजन और दालें, तथा दही की नहरें भी;
श्लोक 11 (1.191.11)
कूपांश्च घृतसंपूर्णान्गौड्यान्नानि सहस्रशः । इक्षून्मधूनि लाजांश्च मैरेयांश्च वरासवान् ॥
kūpāṃśca ghṛtasaṃpūrṇāngauḍyānnāni sahasraśaḥ | ikṣūnmadhūni lājāṃśca maireyāṃśca varāsavān
घी से भरे कुएँ, गुड़ से बने हजारों पकवान, ईख, मधु, लावा, मैरेय मदिरा और उत्तम आसव।
श्लोक 12 (1.191.12)
ग्राम्यारण्याश्चौषधीश्च दुदुहे पय एव च । षड्रसं चामृतनिभं रसायनमनुत्तमम् ॥
grāmyāraṇyāścauṣadhīśca duduhe paya eva ca | ṣaḍrasaṃ cāmṛtanibhaṃ rasāyanamanuttamam
उसने ग्राम्य और वन्य ओषधियाँ, दूध, तथा अमृत के समान छहों रसों से युक्त अनुपम रसायन भी दुह दिया।
श्लोक 13 (1.191.13)
भोजनीयानि पेयानि भक्ष्याणि विविधानि च । लेह्यान्यमृतकल्पानि चोष्याणि च तथार्जुन ॥
bhojanīyāni peyāni bhakṣyāṇi vividhāni ca | lehyānyamṛtakalpāni coṣyāṇi ca tathārjuna
हे अर्जुन! खाने योग्य भोजन, पेय, अनेक प्रकार के भक्ष्य पदार्थ, अमृत के समान चाटने योग्य और चूसने योग्य पदार्थ भी;
श्लोक 14 (1.191.14)
रत्नानि च महार्हाणि वासांसि विविधानि च । तैः कामैः सर्वसंपूर्णैः पूजितश्च महीपतिः ॥
ratnāni ca mahārhāṇi vāsāṃsi vividhāni ca | taiḥ kāmaiḥ sarvasaṃpūrṇaiḥ pūjitaśca mahīpatiḥ
बहुमूल्य रत्न और भाँति-भाँति के वस्त्र भी। इन सब परिपूर्ण कामनाओं से सम्मानित होकर वह राजा
श्लोक 15 (1.191.15)
सामात्यः सबलश्चैव तुतोष स भृशं तदा । षडुन्नतां सुपार्श्वोरुं पृथुपञ्चसमावृताम् ॥
sāmātyaḥ sabalaścaiva tutoṣa sa bhṛśaṃ tadā | ṣaḍunnatāṃ supārśvoruṃ pṛthupañcasamāvṛtām
अपने मन्त्रियों और सेना सहित अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ। वह गौ छह अंगों में ऊँची थी, उसके पार्श्व और जाँघें सुन्दर थीं, पाँच अंग चौड़े और सुगठित थे,
श्लोक 16 (1.191.16)
मण्डूकनेत्रां स्वाकारां पीनोधसमनिन्दिताम् । सुवालधिं शङ्कुकर्णां चारुशृङ्गां मनोरमाम् ॥
maṇḍūkanetrāṃ svākārāṃ pīnodhasamaninditām | suvāladhiṃ śaṅkukarṇāṃ cāruśṛṅgāṃ manoramām
मेंढक जैसी आँखों वाली, सुडौल, भरे हुए थनों वाली, निर्दोष, सुन्दर पूँछ, खूँटी जैसे नुकीले कान और मनोहर सींगों वाली, देखने में अत्यन्त रमणीय;
श्लोक 17 (1.191.17)
पुष्टायतशिरोग्रीवां विस्मितः सोऽभिवीक्ष्य ताम् । अभिनन्द्य स तां राजा नन्दिनीं गाधिनन्दनः ॥
puṣṭāyataśirogrīvāṃ vismitaḥ so'bhivīkṣya tām | abhinandya sa tāṃ rājā nandinīṃ gādhinandanaḥ
उसका सिर और गर्दन पुष्ट और लम्बे थे। उसे देखकर विस्मित हुए गाधिनन्दन राजा ने उस नन्दिनी गौ की प्रशंसा की,
श्लोक 18 (1.191.18)
अब्रवीच्च भृशं तुष्टः स राजा तमृषिं तदा । अर्बुदेन गवां ब्रह्मन्मम राज्येन वा पुनः ॥
abravīcca bhṛśaṃ tuṣṭaḥ sa rājā tamṛṣiṃ tadā | arbudena gavāṃ brahmanmama rājyena vā punaḥ
और अत्यन्त प्रसन्न होकर उस राजा ने तब ऋषि से कहा, "हे ब्रह्मन्! दस करोड़ गौओं के बदले, अथवा मेरे राज्य के बदले,
विश्वामित्र उवाच
श्लोक 19 (1.191.19)
नन्दिनीं संप्रयच्छस्व भुङ्क्ष्व राज्यं महामुने । देवतातिथिपित्रर्थं याज्यार्थं च पयस्विनी ॥
nandinīṃ saṃprayacchasva bhuṅkṣva rājyaṃ mahāmune | devatātithipitrarthaṃ yājyārthaṃ ca payasvinī
नन्दिनी मुझे दे दीजिए, हे महामुने, और मेरा राज्य भोगिए।" वसिष्ठ बोले — "यह दुधारू गौ देवताओं, अतिथियों और पितरों के लिए तथा यज्ञों के लिए है;
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 20 (1.191.20)
अदेया नन्दिनीयं वै राज्येनापि तवानघ । रत्नं हि भगवन्नेतद्रत्नहारी च पार्थिवः । क्षत्रियोऽहं भवान्विप्रस्तपःस्वाध्यायसाधनः ॥
adeyā nandinīyaṃ vai rājyenāpi tavānagha | ratnaṃ hi bhagavannetadratnahārī ca pārthivaḥ | kṣatriyo'haṃ bhavānviprastapaḥsvādhyāyasādhanaḥ
हे निष्पाप! तुम्हारे राज्य के बदले भी यह नन्दिनी देने योग्य नहीं है।" विश्वामित्र बोले — "भगवन्! यह गौ एक रत्न है, और रत्नों को लेने वाला राजा होता है। मैं क्षत्रिय हूँ; आप ब्राह्मण हैं, जिनके साधन तप और स्वाध्याय हैं।
विश्वामित्र उवाच
श्लोक 21 (1.191.21)
ब्राह्मणेषु कुतो वीर्यं प्रशान्तेषु धृतात्मसु । अर्बुदेन गवां यस्त्वं न ददासि ममेप्सितम् ॥
brāhmaṇeṣu kuto vīryaṃ praśānteṣu dhṛtātmasu | arbudena gavāṃ yastvaṃ na dadāsi mamepsitam
शान्त और संयमी ब्राह्मणों में पराक्रम कहाँ? जब आप दस करोड़ गौओं के बदले भी मेरी इच्छित वस्तु नहीं देते,
श्लोक 22 (1.191.22)
स्वधर्मं न प्रहास्यामि नेष्यामि च बलेन गाम् । बलस्थश्चासि राजा च बाहुवीर्यश्च क्षत्रियः ॥
svadharmaṃ na prahāsyāmi neṣyāmi ca balena gām | balasthaścāsi rājā ca bāhuvīryaśca kṣatriyaḥ
मैं अपना स्वधर्म नहीं छोड़ूँगा, और बलपूर्वक इस गौ को ले जाऊँगा।" वसिष्ठ बोले — "तुम बल पर टिके हो, राजा हो और भुजाओं के पराक्रम वाले क्षत्रिय हो।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 23 (1.191.23)
यथेच्छसि तथा क्षिप्रं कुरु मा त्वं विचारय । एवमुक्तस्तथा पार्थ विश्वामित्रो बलादिव ॥
yathecchasi tathā kṣipraṃ kuru mā tvaṃ vicāraya | evamuktastathā pārtha viśvāmitro balādiva
जैसा चाहते हो, वैसा शीघ्र करो; सोच-विचार मत करो।" गन्धर्व बोला — हे पार्थ, ऐसा कहे जाने पर विश्वामित्र ने मानो बलपूर्वक
गन्धर्व उवाच
श्लोक 24 (1.191.24)
हंसचन्द्रप्रतीकाशां नन्दिनीं तां जहार गाम् । सा तदा ह्रियमाणा च विश्वामित्रबलैर्बलात् । कशादण्डप्रणुदिता काल्यमाना इतस्ततः ॥
haṃsacandrapratīkāśāṃ nandinīṃ tāṃ jahāra gām | sā tadā hriyamāṇā ca viśvāmitrabalairbalāt | kaśādaṇḍapraṇuditā kālyamānā itastataḥ
हंस और चन्द्रमा के समान उज्ज्वल उस नन्दिनी गौ का हरण कर लिया। तब विश्वामित्र के सैनिक उसे बलपूर्वक खींचकर ले जाने लगे; कोड़ों और डण्डों से हाँकी जाती हुई, इधर-उधर धकेली जाती हुई
श्लोक 25 (1.191.25)
हंभायमाना कल्याणी वसिष्ठस्याथ नन्दिनी । आगम्याभिमुखी पार्थ तस्थौ भगवदुन्मुखी ॥
haṃbhāyamānā kalyāṇī vasiṣṭhasyātha nandinī | āgamyābhimukhī pārtha tasthau bhagavadunmukhī
वसिष्ठ की कल्याणी नन्दिनी रँभाती हुई लौट आई और हे पार्थ, भगवान् वसिष्ठ की ओर मुख उठाकर उनके सामने खड़ी हो गई।
श्लोक 26 (1.191.26)
भृशं च ताड्यमाना वै न जगामाश्रमात्ततः । शृणोमि ते रवं भद्रे विनदन्त्याः पुनः पुनः ॥
bhṛśaṃ ca tāḍyamānā vai na jagāmāśramāttataḥ | śṛṇomi te ravaṃ bhadre vinadantyāḥ punaḥ punaḥ
बहुत पीटी जाने पर भी वह आश्रम से नहीं गई। वसिष्ठ बोले — "हे भद्रे, मैं बार-बार रँभाती हुई तुम्हारी पुकार सुन रहा हूँ।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 27 (1.191.27)
ह्रियसे त्वं बलाद्भद्रे विश्वामित्रेण नन्दिनि । किं कर्तव्यं मया तत्र क्षमावान्ब्राह्मणो ह्यहम् ॥
hriyase tvaṃ balādbhadre viśvāmitreṇa nandini | kiṃ kartavyaṃ mayā tatra kṣamāvānbrāhmaṇo hyaham
"हे भद्रे नन्दिनी, विश्वामित्र तुम्हें बलपूर्वक हर ले जा रहे हैं। इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? मैं तो क्षमाशील ब्राह्मण हूँ।"
गन्धर्व उवाच
श्लोक 28 (1.191.28)
सा भयान्नन्दिनी तेषां बलानां भरतर्षभ । विश्वामित्रभयोद्विग्ना वसिष्ठं समुपागमत् ॥
sā bhayānnandinī teṣāṃ balānāṃ bharatarṣabha | viśvāmitrabhayodvignā vasiṣṭhaṃ samupāgamat
हे भरतश्रेष्ठ! तब उन सैनिकों से भयभीत और विश्वामित्र के डर से व्याकुल होकर नन्दिनी वसिष्ठ के पास आ गई।
गौरुवाच
श्लोक 29 (1.191.29)
कशाग्रदण्डाभिहतां क्रोशन्तीं मामनाथवत् । विश्वामित्रबलैर्घोरैर्भगवन् किमुपेक्षसे ॥
kaśāgradaṇḍābhihatāṃ krośantīṃ māmanāthavat | viśvāmitrabalairghorairbhagavan kimupekṣase
विश्वामित्र के क्रूर सैनिक मुझे कोड़ों और डण्डों से मार रहे हैं और मैं अनाथ की भाँति चिल्ला रही हूँ। भगवन्! आप मेरी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?
गन्धर्व उवाच
श्लोक 30 (1.191.30)
एवं तस्यां तदा पार्थ धर्षितायां महामुनिः । न चुक्षुभे तदा धैर्यान्न चचाल धृतव्रतः ॥
evaṃ tasyāṃ tadā pārtha dharṣitāyāṃ mahāmuniḥ | na cukṣubhe tadā dhairyānna cacāla dhṛtavrataḥ
हे पार्थ, इस प्रकार उसके सताए जाने पर भी वे महामुनि क्षुब्ध नहीं हुए; दृढ़व्रती वसिष्ठ अपने धैर्य से विचलित नहीं हुए।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 31 (1.191.31)
क्षत्रियाणां बलं तेजो ब्राह्मणानां क्षमा बलम् । क्षमा मां भजते यस्माद्गम्यतां यदि रोचते ॥
kṣatriyāṇāṃ balaṃ tejo brāhmaṇānāṃ kṣamā balam | kṣamā māṃ bhajate yasmādgamyatāṃ yadi rocate
क्षत्रियों का बल तेज है, ब्राह्मणों का बल क्षमा है। क्योंकि क्षमा ने मुझे धारण कर रखा है, इसलिए यदि तुम्हें अच्छा लगे तो चली जाओ।
नन्दिन्युवाच
श्लोक 32 (1.191.32)
किं नु त्यक्ताऽस्मि भगवन्यदेवं त्वं प्रभाषसे । अत्यक्ताऽहं त्वया ब्रह्मन्नेतुं शक्या न वै बलात् ॥
kiṃ nu tyaktā'smi bhagavanyadevaṃ tvaṃ prabhāṣase | atyaktā'haṃ tvayā brahmannetuṃ śakyā na vai balāt
भगवन्! क्या आपने मुझे त्याग दिया है, जो आप ऐसा कह रहे हैं? हे ब्रह्मन्, यदि आपने मुझे नहीं त्यागा है, तो मुझे बलपूर्वक नहीं ले जाया जा सकता।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 33 (1.191.33)
न त्वां त्यजामि कल्याणि स्थीयतां यदि शक्यते । दृढेन दाम्ना बद्ध्वैष वत्सस्ते ह्रियते बलात् ॥
na tvāṃ tyajāmi kalyāṇi sthīyatāṃ yadi śakyate | dṛḍhena dāmnā baddhvaiṣa vatsaste hriyate balāt
हे कल्याणी, मैं तुम्हें नहीं त्यागता। यदि रुक सको तो रुको। देखो, तुम्हारा बछड़ा मज़बूत रस्सी से बाँधकर बलपूर्वक ले जाया जा रहा है।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 34 (1.191.34)
स्थीयतामिति तच्छ्रुत्वा वसिष्ठस्य पयस्विनी । ऊर्ध्वाञ्चितशिरोग्रीवा प्रबभौ रौद्रदर्शना ॥
sthīyatāmiti tacchrutvā vasiṣṭhasya payasvinī | ūrdhvāñcitaśirogrīvā prababhau raudradarśanā
वसिष्ठ का "रुको" कहना सुनकर उस दुधारू गौ ने अपना सिर और गर्दन ऊपर उठा ली और वह भयंकर रूप वाली हो गई।
श्लोक 35 (1.191.35)
क्रोधरक्तेक्षणा सा गौर्हंभारवघनस्वना । विश्वामित्रस्य तत्सैन्यं व्यद्रावयत सर्वशः ॥
krodharaktekṣaṇā sā gaurhaṃbhāravaghanasvanā | viśvāmitrasya tatsainyaṃ vyadrāvayata sarvaśaḥ
क्रोध से लाल आँखों वाली, गम्भीर गर्जना करती हुई उस गौ ने विश्वामित्र की सेना को चारों ओर खदेड़ दिया।
श्लोक 36 (1.191.36)
कशाग्रदण्डाभिहता काल्यमाना ततस्ततः । क्रोधरक्तेक्षणा क्रोधं भूय एव समाददे ॥
kaśāgradaṇḍābhihatā kālyamānā tatastataḥ | krodharaktekṣaṇā krodhaṃ bhūya eva samādade
कोड़ों और डण्डों से पीटी जाती और इधर-उधर हाँकी जाती हुई, क्रोध से लाल आँखों वाली उस गौ ने फिर से क्रोध धारण किया।
श्लोक 37 (1.191.37)
आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्बभौ । अङ्गारवर्षं मुञ्चन्ती मुहुर्वालधितो महत् ॥
āditya iva madhyāhne krodhadīptavapurbabhau | aṅgāravarṣaṃ muñcantī muhurvāladhito mahat
क्रोध से दीप्त शरीर वाली वह मध्याह्न के सूर्य के समान चमक उठी और अपनी पूँछ से बार-बार अंगारों की भारी वर्षा करने लगी।
श्लोक 38 (1.191.38)
असृजत्पह्लवान्पुच्छात्प्रस्रवाद्द्राविडाञ्छकान् । योनिदेशाच्च यवनाञ्शकृतः शबरान्बहून् ॥
asṛjatpahlavānpucchātprasravāddrāviḍāñchakān | yonideśācca yavanāñśakṛtaḥ śabarānbahūn
उसने अपनी पूँछ से पह्लवों को, अपने दूध की धार से द्राविडों और शकों को, योनि-प्रदेश से यवनों को और गोबर से बहुत-से शबरों को उत्पन्न किया।
श्लोक 39 (1.191.39)
मूत्रतश्चासृजत्कांश्चिच्छबरांश्चैव पार्श्वतः । पौण्ड्रान्किरातान्यवनान्सिंहलान्बर्बरान्खसान् ॥
mūtrataścāsṛjatkāṃścicchabarāṃścaiva pārśvataḥ | pauṇḍrānkirātānyavanānsiṃhalānbarbarānkhasān
मूत्र से उसने कुछ को और पार्श्वों से शबरों को उत्पन्न किया; और पौण्ड्र, किरात, यवन, सिंहल, बर्बर तथा खस;
श्लोक 40 (1.191.40)
चिबुकांश्च पुलिन्दांश्च चीनान्हूणान्सकेरलान् । ससर्ज फेनतः सा गौर्म्लेच्छान्बहुविधानपि ॥
cibukāṃśca pulindāṃśca cīnānhūṇānsakeralān | sasarja phenataḥ sā gaurmlecchānbahuvidhānapi
चिबुक, पुलिन्द, चीन, हूण और केरल भी। उस गौ ने अपने फेन से अनेक प्रकार के म्लेच्छों को उत्पन्न किया।
श्लोक 41 (1.191.41)
तैर्विसृष्टैर्महासैन्यैर्नानाम्लेच्छगणैस्तदा । नानावरणसंछन्नैर्नानायुधधरैस्तथा ॥
tairvisṛṣṭairmahāsainyairnānāmlecchagaṇaistadā | nānāvaraṇasaṃchannairnānāyudhadharaistathā
उसके द्वारा उत्पन्न उन विशाल सेनाओं से, नाना प्रकार के कवच पहने और नाना प्रकार के शस्त्र धारण किए उन अनेक म्लेच्छ-दलों से,
श्लोक 42 (1.191.42)
अवाकीर्यत संरब्धैर्विश्वामित्रस्य पश्यतः । एकैकश्च तदा योधः पञ्चभिः सप्तभिर्वृतः ॥
avākīryata saṃrabdhairviśvāmitrasya paśyataḥ | ekaikaśca tadā yodhaḥ pañcabhiḥ saptabhirvṛtaḥ
जो क्रोध से भरे थे, विश्वामित्र के देखते-देखते उनकी सेना छा ली गई; उनके एक-एक योद्धा को पाँच-पाँच, सात-सात ने घेर लिया।
श्लोक 43 (1.191.43)
अस्त्रवर्षेण महता वध्यमानं बलं तदा । प्रभग्नं सर्वतस्त्रस्तं विश्वामित्रस्य पश्यतः ॥
astravarṣeṇa mahatā vadhyamānaṃ balaṃ tadā | prabhagnaṃ sarvatastrastaṃ viśvāmitrasya paśyataḥ
अस्त्रों की भारी वर्षा से मारी जाती हुई उनकी सेना विश्वामित्र के देखते-देखते चारों ओर से टूटकर भयभीत हो भाग खड़ी हुई।
श्लोक 44 (1.191.44)
तस्य तच्चतुरङ्गं वै बलं परमदुःसहम् । प्रभग्नं सर्वतो घोरं पयस्विन्या विनिर्जितम् ॥
tasya taccaturaṅgaṃ vai balaṃ paramaduḥsaham | prabhagnaṃ sarvato ghoraṃ payasvinyā vinirjitam
उनकी अत्यन्त दुःसह और भयंकर चतुरंगिणी सेना चारों ओर से छिन्न-भिन्न हो गई और उस दुधारू गौ से पराजित हो गई।
श्लोक 45 (1.191.45)
न च प्राणैर्वियुज्यन्ते केचित्तत्रास्य सैनिकाः । विश्वामित्रस्य संक्रुद्धैर्वासिष्ठैर्भरतर्षभ ॥
na ca prāṇairviyujyante kecittatrāsya sainikāḥ | viśvāmitrasya saṃkruddhairvāsiṣṭhairbharatarṣabha
फिर भी, हे भरतश्रेष्ठ, क्रुद्ध वासिष्ठ योद्धाओं के हाथों विश्वामित्र के किसी भी सैनिक के प्राण नहीं गए।
श्लोक 46 (1.191.46)
सा गौस्तत्सकलं सैन्यं कालयामास दूरतः । विश्वामित्रस्य तत्सैन्यं काल्यमानं त्रियोजनम् ॥
sā gaustatsakalaṃ sainyaṃ kālayāmāsa dūrataḥ | viśvāmitrasya tatsainyaṃ kālyamānaṃ triyojanam
उस गौ ने वह सारी सेना दूर तक खदेड़ दी। तीन योजन तक हाँकी गई
श्लोक 47 (1.191.47)
क्रोशमानं भयोद्विग्नं त्रातारं नाध्यगच्छत । विश्वामित्रस्ततो दृष्ट्वा क्रोधाविष्टः स रोदसी ॥
krośamānaṃ bhayodvignaṃ trātāraṃ nādhyagacchata | viśvāmitrastato dṛṣṭvā krodhāviṣṭaḥ sa rodasī
विश्वामित्र की वह सेना चिल्लाती और भय से व्याकुल होकर कोई रक्षक न पा सकी। तब यह देखकर क्रोध से भरे विश्वामित्र ने आकाश और पृथ्वी को व्याप्त करते हुए
श्लोक 48 (1.191.48)
ववर्ष शरवर्षाणि वसिष्ठे मुनिसत्तमे । घोररूपांश्च नाराचान्क्षुरान्भल्लान्महामुनिः ॥
vavarṣa śaravarṣāṇi vasiṣṭhe munisattame | ghorarūpāṃśca nārācānkṣurānbhallānmahāmuniḥ
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ पर बाणों की वर्षा की — भयानक नाराच, क्षुर और भल्ल बाण। किन्तु उन महामुनि ने
श्लोक 49 (1.191.49)
विश्वामित्रप्रयुक्तांस्तान्वैणवेन व्यमोचयत् । वसिष्ठस्य तदा दृष्ट्वा कर्मकौशलमाहवे ॥
viśvāmitraprayuktāṃstānvaiṇavena vyamocayat | vasiṣṭhasya tadā dṛṣṭvā karmakauśalamāhave
विश्वामित्र द्वारा छोड़े गए उन बाणों को अपने बाँस के दण्ड से हटा दिया। तब युद्ध में वसिष्ठ का यह कौशल देखकर
श्लोक 50 (1.191.50)
विश्वामित्रोऽपि कोपेन भूयः शत्रुनिपातनः । दिव्यास्त्रवर्षं तस्मै स प्राहिणोन्मुनये रुषा ॥
viśvāmitro'pi kopena bhūyaḥ śatrunipātanaḥ | divyāstravarṣaṃ tasmai sa prāhiṇonmunaye ruṣā
शत्रुओं का संहार करने वाले विश्वामित्र ने और भी क्रोधित होकर रोषपूर्वक उन मुनि पर दिव्य अस्त्रों की वर्षा की।
श्लोक 51 (1.191.51)
आग्नेयं वारुणं चैन्द्रं याम्यं वायव्यमेव च । विससर्ज महाभागे वसिष्ठे ब्रह्मणः सुते ॥
āgneyaṃ vāruṇaṃ caindraṃ yāmyaṃ vāyavyameva ca | visasarja mahābhāge vasiṣṭhe brahmaṇaḥ sute
उन्होंने ब्रह्मा के पुत्र महाभाग वसिष्ठ पर आग्नेय, वारुण, ऐन्द्र, याम्य और वायव्य अस्त्र छोड़े।
श्लोक 52 (1.191.52)
अस्त्राणि सर्वतो ज्वालां विसृजन्ति प्रपेदिरे । युगान्तसमये घोराः पतङ्गस्येव रश्मयः ॥
astrāṇi sarvato jvālāṃ visṛjanti prapedire | yugāntasamaye ghorāḥ pataṅgasyeva raśmayaḥ
वे अस्त्र चारों ओर ज्वालाएँ फेंकते हुए आ पहुँचे, युगान्त के समय सूर्य की किरणों के समान भयंकर।
श्लोक 53 (1.191.53)
वसिष्ठोऽपि महातेजा ब्रह्मशक्तिप्रयुक्तया । यष्ट्या निवारयामास सर्वाण्यस्त्राणि स स्मयन् ॥
vasiṣṭho'pi mahātejā brahmaśaktiprayuktayā | yaṣṭyā nivārayāmāsa sarvāṇyastrāṇi sa smayan
परन्तु महातेजस्वी वसिष्ठ ने मुस्कराते हुए ब्रह्मशक्ति से प्रेरित अपने दण्ड से उन सब अस्त्रों को रोक दिया।
श्लोक 54 (1.191.54)
ततस्ते भस्मसाद्भूताः पतन्ति स्म महीतले । अपोह्य दिव्यान्यस्त्राणि वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥
tataste bhasmasādbhūtāḥ patanti sma mahītale | apohya divyānyastrāṇi vasiṣṭho vākyamabravīt
तब वे भस्म होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। दिव्य अस्त्रों को निष्फल करके वसिष्ठ ने यह वचन कहा —
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 55 (1.191.55)
निर्जितोऽसि महाराज दुरात्मन्गाधिनन्दन । यदि तेऽस्ति परं शौर्यं तद्दर्शय मयि स्थिते ॥
nirjito'si mahārāja durātmangādhinandana | yadi te'sti paraṃ śauryaṃ taddarśaya mayi sthite
हे दुष्टात्मा गाधिनन्दन महाराज, तुम पराजित हो चुके हो। यदि तुममें इससे बढ़कर कोई शौर्य है, तो मेरे सामने रहते उसे दिखाओ।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 56 (1.191.56)
विश्वामित्रस्तथा चोक्तो वसिष्ठेन नराधिपः । नोवाच किंचिद्व्रीडाढ्यो विद्रावितमहाबलः ॥
viśvāmitrastathā cokto vasiṣṭhena narādhipaḥ | novāca kiṃcidvrīḍāḍhyo vidrāvitamahābalaḥ
वसिष्ठ के ऐसा कहने पर, जिनकी विशाल सेना खदेड़ दी गई थी, वे राजा विश्वामित्र लज्जा से भरकर कुछ भी न बोले।
श्लोक 57 (1.191.57)
दृष्ट्वा तन्महदाश्चर्यं ब्रह्मतेजोभवं तदा । विश्वामित्रः क्षत्रभावान्निर्विण्णो वाक्यमब्रवीत् । धिग्बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम् ॥
dṛṣṭvā tanmahadāścaryaṃ brahmatejobhavaṃ tadā | viśvāmitraḥ kṣatrabhāvānnirviṇṇo vākyamabravīt | dhigbalaṃ kṣatriyabalaṃ brahmatejobalaṃ balam
ब्राह्मण-तेज से उत्पन्न उस महान आश्चर्य को देखकर अपने क्षत्रिय-भाव से विरक्त हुए विश्वामित्र बोले — "क्षत्रिय-बल को धिक्कार है! ब्रह्मतेज का बल ही सच्चा बल है।
विश्वामित्र उवाच
श्लोक 58 (1.191.58)
बलाबले विनिश्चित्य तप एव परं बलम् । स राज्यं स्फीतमुत्सृज्य तां च दीप्तां नृपश्रियम् ॥
balābale viniścitya tapa eva paraṃ balam | sa rājyaṃ sphītamutsṛjya tāṃ ca dīptāṃ nṛpaśriyam
"बल और अबल का निर्णय करके मैं देखता हूँ कि तप ही परम बल है।" गन्धर्व बोला — अपने समृद्ध राज्य और उस देदीप्यमान राजलक्ष्मी को त्यागकर
गन्धर्व उवाच
श्लोक 59 (1.191.59)
भोगांश्च पृष्ठतः कृत्वा तपस्येव मनो दधे । स गत्वा तपसा सिद्धिं लोकान्विष्टभ्य तेजसा ॥
bhogāṃśca pṛṣṭhataḥ kṛtvā tapasyeva mano dadhe | sa gatvā tapasā siddhiṃ lokānviṣṭabhya tejasā
और भोगों को पीछे छोड़कर उन्होंने अपना मन केवल तप में लगा दिया। तप से सिद्धि प्राप्त करके और अपने तेज से लोकों को स्तब्ध करके
श्लोक 60 (1.191.60)
तताप सर्वान्दीप्तौजा ब्राह्मणत्वमवाप्तवान् । अपिबच्च ततः सोममिन्द्रेण सह कौशिकः ॥
tatāpa sarvāndīptaujā brāhmaṇatvamavāptavān | apibacca tataḥ somamindreṇa saha kauśikaḥ
उस दीप्त तेज वाले ने सबको तपा दिया और ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया। फिर कौशिक (विश्वामित्र) ने इन्द्र के साथ सोमपान किया।
श्लोक 61 (1.191.61)
एवंवीर्यस्तु राजर्षिर्विप्रर्षिः संबभूव ह ॥
evaṃvīryastu rājarṣirviprarṣiḥ saṃbabhūva ha
ऐसे पराक्रमी थे वे राजर्षि, जो ब्रह्मर्षि बन गए।