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आदि पर्व · अध्याय 192

कल्माषपाद का शाप और वसिष्ठ-पुत्रों का संहार

अर्जुन के आग्रह पर गन्धर्व दोनों ऋषियों की कथा आगे सुनाता है। इक्ष्वाकु-वंशी राजा कल्माषपाद एक संकरे मार्ग पर वसिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र शक्ति से मिलता है और मार्ग न छोड़ने पर उन्हें कोड़े से मारता है; शक्ति उसे नरभक्षी होने का शाप देते हैं, और राजा को अपना यजमान बनाना चाहने वाले विश्वामित्र उसमें एक राक्षस का प्रवेश करा देते हैं। राक्षस-ग्रस्त राजा द्वारा मनुष्य-मांस परोसे जाने पर एक ब्राह्मण भी वही शाप दोहराता है; तब कल्माषपाद शक्ति को और विश्वामित्र की प्रेरणा से वसिष्ठ के अन्य सभी पुत्रों को खा जाता है। शोक से व्याकुल वसिष्ठ मेरु से कूदकर, अग्नि में प्रवेश करके और समुद्र में डूबकर प्राण त्यागने का प्रयत्न करते हैं, पर मर नहीं पाते और अपने आश्रम लौट आते हैं।

अध्याय 191अध्याय-सूचीअध्याय 193

अर्जुन उवाच

श्लोक 1 (1.192.1)

ऋष्योस्तु यत्कृते वैरं विश्वामित्रवसिष्ठयोः । बभूव गन्धर्वपते शंस तत्सर्वमेव मे ॥

ṛṣyostu yatkṛte vairaṃ viśvāmitravasiṣṭhayoḥ | babhūva gandharvapate śaṃsa tatsarvameva me

हे गन्धर्वराज! विश्वामित्र और वसिष्ठ, इन दोनों ऋषियों के बीच जिस कारण से वैर हुआ, वह सब मुझे बताओ;

श्लोक 2 (1.192.2)

माहात्म्यं च वसिष्ठस्य ब्राह्मण्यं ब्रह्मतेजसः । विश्वामित्रस्य च तथा क्षत्रस्य च महात्मनः ॥

māhātmyaṃ ca vasiṣṭhasya brāhmaṇyaṃ brahmatejasaḥ | viśvāmitrasya ca tathā kṣatrasya ca mahātmanaḥ

वसिष्ठ की महिमा और ब्रह्मतेज से सम्पन्न उनके ब्राह्मणत्व के विषय में, और इसी प्रकार महात्मा विश्वामित्र तथा उनके क्षत्रियत्व के विषय में भी बताओ।

श्लोक 3 (1.192.3)

न शृण्वानस्त्वहं तृप्तिमुपगच्छामि खेचर । आख्याहि गन्धर्वपते शंस तत्सर्वमेव मे ॥

na śṛṇvānastvahaṃ tṛptimupagacchāmi khecara | ākhyāhi gandharvapate śaṃsa tatsarvameva me

हे आकाशचारी, सुनते-सुनते मैं तृप्त नहीं होता। हे गन्धर्वराज, कहो; वह सब मुझे बताओ।

श्लोक 4 (1.192.4)

माहात्म्यं च वसिष्ठस्य विश्वामित्रस्य भाषसे ॥

māhātmyaṃ ca vasiṣṭhasya viśvāmitrasya bhāṣase

क्योंकि तुम वसिष्ठ और विश्वामित्र की महिमा का वर्णन कर रहे हो।

गन्धर्व उवाच

श्लोक 5 (1.192.5)

इदं वासिष्ठमाख्यानं पुराणं पुण्यमुत्तमम् । पार्थ सर्वेषु लोकेषु विश्रुतं तन्निबोध मे ॥

idaṃ vāsiṣṭhamākhyānaṃ purāṇaṃ puṇyamuttamam | pārtha sarveṣu lokeṣu viśrutaṃ tannibodha me

हे पार्थ! वसिष्ठ की यह कथा प्राचीन, पवित्र और उत्तम है तथा सभी लोकों में प्रसिद्ध है। इसे मुझसे सुनो।

श्लोक 6 (1.192.6)

कल्माषपाद इत्येवं लोके राजा बभूव ह । इक्ष्वाकुवंशजः पार्थ तेजसाऽसदृशो भुवि ॥

kalmāṣapāda ityevaṃ loke rājā babhūva ha | ikṣvākuvaṃśajaḥ pārtha tejasā'sadṛśo bhuvi

हे पार्थ, संसार में कल्माषपाद नाम से एक राजा हुए, जो इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न थे और तेज में पृथ्वी पर अद्वितीय थे।

श्लोक 7 (1.192.7)

स कदाचिद्वनं राजा मृगयां निर्ययौ पुरात् । मृगान्विध्यन्वराहांश्च चचार रिपुमर्दनः ॥

sa kadācidvanaṃ rājā mṛgayāṃ niryayau purāt | mṛgānvidhyanvarāhāṃśca cacāra ripumardanaḥ

एक बार वह राजा शिकार के लिए नगर से वन में निकला, और वह शत्रुमर्दन हिरनों और सूअरों को बेधता हुआ घूमने लगा।

श्लोक 8 (1.192.8)

तस्मिन्वने महाघोरे खड्गांश्च बहुशोऽहनत् । हत्वा च सुचिरं श्रान्तो राजा निववृते ततः ॥

tasminvane mahāghore khaḍgāṃśca bahuśo'hanat | hatvā ca suciraṃ śrānto rājā nivavṛte tataḥ

उस अत्यन्त भयानक वन में उसने बहुत-से गैंडों को मारा, और देर तक शिकार करके थका हुआ राजा वहाँ से लौट पड़ा।

श्लोक 9 (1.192.9)

अकामयत्तं याज्यार्थे विश्वामित्रः प्रतापवान् । स तु राजा महात्मानं वासिष्ठमृषिसत्तमम् ॥

akāmayattaṃ yājyārthe viśvāmitraḥ pratāpavān | sa tu rājā mahātmānaṃ vāsiṣṭhamṛṣisattamam

प्रतापी विश्वामित्र चाहते थे कि यह राजा उनका यजमान बने। तब उस राजा का सामना ऋषिश्रेष्ठ, महात्मा वसिष्ठपुत्र से हुआ।

श्लोक 10 (1.192.10)

तृषार्तश्च क्षुधार्तश्च एकायनगतः पथि । अपश्यदजितः सङ्ख्ये मुनिं प्रतिमुखागतम् ॥

tṛṣārtaśca kṣudhārtaśca ekāyanagataḥ pathi | apaśyadajitaḥ saṅkhye muniṃ pratimukhāgatam

भूख-प्यास से पीड़ित, युद्ध में अजेय वह राजा जब ऐसे संकरे मार्ग पर था जहाँ से एक ही व्यक्ति निकल सकता था, तब उसने मुनि को सामने से आते देखा —

श्लोक 11 (1.192.11)

शक्तिं नाम महाभागं वसिष्ठकुलवर्धनम् । ज्येष्ठं पुत्रं पुत्रशताद्वसिष्ठस्य महात्मनः ॥

śaktiṃ nāma mahābhāgaṃ vasiṣṭhakulavardhanam | jyeṣṭhaṃ putraṃ putraśatādvasiṣṭhasya mahātmanaḥ

महाभाग शक्ति को, जो वसिष्ठ-कुल की वृद्धि करने वाले और महात्मा वसिष्ठ के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे।

श्लोक 12 (1.192.12)

अपगच्छ पथोऽस्माकमित्येवं पार्थिवोऽब्रवीत् । तथा ऋषिरुवाचैनं सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा ॥

apagaccha patho'smākamityevaṃ pārthivo'bravīt | tathā ṛṣiruvācainaṃ sāntvayañślakṣṇayā girā

"हमारे मार्ग से हट जाओ," राजा ने ऐसा कहा। तब ऋषि ने मधुर वाणी से उसे शान्त करते हुए कहा —

शक्तिरुवाच

श्लोक 13 (1.192.13)

मम पन्था महाराज धर्म एष सनातनः । वृद्धभीरुनृपस्नातस्त्रीरोगिवरचक्रिणाम् ॥

mama panthā mahārāja dharma eṣa sanātanaḥ | vṛddhabhīrunṛpasnātastrīrogivaracakriṇām

हे महाराज, यह मार्ग मेरा है; यही सनातन धर्म है। वृद्ध, भयभीत, राजा, स्नातक, स्त्री, रोगी, वर और गाड़ी पर सवार व्यक्ति —

श्लोक 14 (1.192.14)

पन्था देयो नृपैस्तेषामन्यैस्तैस्तस्य भूपतेः । राज्ञा सर्वेषु धर्मेषु देयः पन्था द्विजातये ॥

panthā deyo nṛpaisteṣāmanyaistaistasya bhūpateḥ | rājñā sarveṣu dharmeṣu deyaḥ panthā dvijātaye

इन्हें राजाओं को मार्ग देना चाहिए, और दूसरों को राजा को मार्ग देना चाहिए। किन्तु सभी धर्मों के अनुसार राजा को ब्राह्मण के लिए मार्ग छोड़ना चाहिए।

गन्धर्व उवाच

श्लोक 15 (1.192.15)

एवं परस्परं तौ तु पथोऽर्थं वाक्यमूचतुः । अपसर्पापसर्पेति वागुत्तरमकुर्वताम् ॥

evaṃ parasparaṃ tau tu patho'rthaṃ vākyamūcatuḥ | apasarpāpasarpeti vāguttaramakurvatām

इस प्रकार वे दोनों मार्ग के लिए एक-दूसरे से बोलते रहे और "हटो, हटो" कहकर उत्तर-प्रत्युत्तर करते रहे।

श्लोक 16 (1.192.16)

ऋषिस्तु नापचक्राम तस्मिन्धर्मपथे स्थितः । अपि राजा मुनेर्मार्गात्क्रोधान्नापजगाम ह ॥

ṛṣistu nāpacakrāma tasmindharmapathe sthitaḥ | api rājā munermārgātkrodhānnāpajagāma ha

धर्म-मार्ग पर स्थित ऋषि नहीं हटे; और राजा भी क्रोधवश मुनि के मार्ग से नहीं हटा।

श्लोक 17 (1.192.17)

अमुञ्चन्तं तु पन्थानं तमृषिं नृपसत्तमः । जघान कशया मोहात्तदा राक्षसवन्मुनिम् ॥

amuñcantaṃ tu panthānaṃ tamṛṣiṃ nṛpasattamaḥ | jaghāna kaśayā mohāttadā rākṣasavanmunim

जब ऋषि ने मार्ग नहीं छोड़ा, तब उस नृपश्रेष्ठ ने मोहवश राक्षस की भाँति मुनि पर कोड़े से प्रहार किया।

श्लोक 18 (1.192.18)

कशाप्रहाराभिहतस्ततः स मुनिसत्तमः । तं शशाप नृपश्रेष्ठं वासिष्ठः क्रोधमूर्च्छितः ॥

kaśāprahārābhihatastataḥ sa munisattamaḥ | taṃ śaśāpa nṛpaśreṣṭhaṃ vāsiṣṭhaḥ krodhamūrcchitaḥ

कोड़े की चोट खाकर क्रोध से मूर्च्छित वसिष्ठपुत्र मुनिश्रेष्ठ ने उस नृपश्रेष्ठ को शाप दिया —

शक्तिरुवाच

श्लोक 19 (1.192.19)

हंसि राक्षसवद्यस्माद्राजापशद तापसम् । तस्मात्त्वमद्यप्रभृति पुरुषादो भविष्यसि ॥

haṃsi rākṣasavadyasmādrājāpaśada tāpasam | tasmāttvamadyaprabhṛti puruṣādo bhaviṣyasi

हे राजाओं में नीच! क्योंकि तुम राक्षस की भाँति एक तपस्वी को मारते हो, इसलिए आज से तुम नरभक्षी हो जाओगे।

श्लोक 20 (1.192.20)

मनुष्यपिशिते सक्तश्चरिष्यसि महीमिमाम् । गच्छ राजाधमेत्युक्तः शक्तिना वीर्यशक्तिना ॥

manuṣyapiśite saktaścariṣyasi mahīmimām | gaccha rājādhametyuktaḥ śaktinā vīryaśaktinā

मनुष्य के मांस में आसक्त होकर तुम इस पृथ्वी पर विचरोगे। जाओ, हे अधम राजा!" पराक्रमी शक्ति ने उससे ऐसा कहा।

गन्धर्व उवाच

श्लोक 21 (1.192.21)

ततो याज्यनिमित्तं तु विश्वामित्रवसिष्ठयोः । वैरमासीत्तदा तं तु विश्वामित्रोऽन्वपद्यत ॥

tato yājyanimittaṃ tu viśvāmitravasiṣṭhayoḥ | vairamāsīttadā taṃ tu viśvāmitro'nvapadyata

उस समय यजमान के कारण विश्वामित्र और वसिष्ठ में वैर चल रहा था, और विश्वामित्र उस राजा के पीछे-पीछे आए।

श्लोक 22 (1.192.22)

तयोर्विवदतोरेवं समीपमुपचक्रमे । ऋषिरुग्रतपाः पार्थ विश्वामित्रः प्रतापवान् ॥

tayorvivadatorevaṃ samīpamupacakrame | ṛṣirugratapāḥ pārtha viśvāmitraḥ pratāpavān

हे पार्थ, जब वे दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, तब उग्र तपस्या वाले प्रतापी ऋषि विश्वामित्र समीप आ पहुँचे।

श्लोक 23 (1.192.23)

ततः स बुबुधे पश्चात्तमृषिं नृपसत्तमः । ऋषेः पुत्रं वसिष्ठस्य वसिष्ठमिव तेजसा ॥

tataḥ sa bubudhe paścāttamṛṣiṃ nṛpasattamaḥ | ṛṣeḥ putraṃ vasiṣṭhasya vasiṣṭhamiva tejasā

तब बाद में उस नृपश्रेष्ठ ने जाना कि वह ऋषि वसिष्ठ के पुत्र हैं, जो तेज में स्वयं वसिष्ठ के समान थे।

श्लोक 24 (1.192.24)

अन्तर्धाय तत आत्मानं विश्वामित्रोऽपि भारत । तावुभावतिचक्राम चिकीर्षन्नात्मनः प्रियम् ॥

antardhāya tata ātmānaṃ viśvāmitro'pi bhārata | tāvubhāvaticakrāma cikīrṣannātmanaḥ priyam

हे भारत, विश्वामित्र भी अपने को अदृश्य करके अपना हित साधने की इच्छा से उन दोनों के पास से आगे निकल गए।

श्लोक 25 (1.192.25)

स तु शप्तस्तदा तेन शक्तिना वै नृपोत्तमः । जगाम शरणं शक्तिं प्रसादयितुमर्हयन् ॥

sa tu śaptastadā tena śaktinā vai nṛpottamaḥ | jagāma śaraṇaṃ śaktiṃ prasādayitumarhayan

तब शक्ति द्वारा शापित वह श्रेष्ठ राजा उन्हें प्रसन्न करने के लिए आदरपूर्वक उनकी शरण में गया।

श्लोक 26 (1.192.26)

तस्य भावं विदित्वा स नृपतेः कुरुसत्तम । विश्वामित्रस्ततो रक्ष आदिदेश नृपं प्रति ॥

tasya bhāvaṃ viditvā sa nṛpateḥ kurusattama | viśvāmitrastato rakṣa ādideśa nṛpaṃ prati

हे कुरुश्रेष्ठ, राजा का भाव जानकर विश्वामित्र ने तब एक राक्षस को राजा में प्रवेश करने का आदेश दिया।

श्लोक 27 (1.192.27)

शापात्तस्य तु विप्रर्षेर्विश्वामित्रस्य चाज्ञया । राक्षसः किङ्करो नाम विवेश नृपतिं तदा ॥

śāpāttasya tu viprarṣerviśvāmitrasya cājñayā | rākṣasaḥ kiṅkaro nāma viveśa nṛpatiṃ tadā

उस ब्रह्मर्षि के शाप से और विश्वामित्र की आज्ञा से किंकर नामक राक्षस ने तब राजा में प्रवेश किया।

श्लोक 28 (1.192.28)

रक्षसा तं गृहीतं तु विदित्वा मुनिसत्तमः । विश्वामित्रोऽप्यपाक्रामत्तस्माद्देशादरिन्दम ॥

rakṣasā taṃ gṛhītaṃ tu viditvā munisattamaḥ | viśvāmitro'pyapākrāmattasmāddeśādarindama

हे शत्रुदमन, राजा को राक्षस से ग्रस्त जानकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र भी उस स्थान से चले गए।

श्लोक 29 (1.192.29)

ततः स नृपतिर्विद्वान्रक्षन्नात्मानमात्मना । बलवत्पीड्यमानोऽपि रक्षसान्तर्गतेन ह ॥

tataḥ sa nṛpatirvidvānrakṣannātmānamātmanā | balavatpīḍyamāno'pi rakṣasāntargatena ha

तब वह विद्वान राजा अपने आप को स्वयं सँभालने का यत्न करता रहा, फिर भी भीतर बैठा राक्षस उसे बुरी तरह पीड़ित करता रहा।

श्लोक 30 (1.192.30)

ददर्शाथ द्विजः कश्चिद्राजानं प्रस्थितं वनम् । अयाचत क्षुधापन्नः समांसं भोजनं तदा ॥

dadarśātha dvijaḥ kaścidrājānaṃ prasthitaṃ vanam | ayācata kṣudhāpannaḥ samāṃsaṃ bhojanaṃ tadā

तब किसी ब्राह्मण ने राजा को वन की ओर जाते देखा और भूख से व्याकुल होकर उससे मांस-सहित भोजन माँगा।

श्लोक 31 (1.192.31)

तमुवाचाथ राजर्षिर्द्विजं मित्रसहस्तदा । आस्स्व ब्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्तं प्रतिपालयन् ॥

tamuvācātha rājarṣirdvijaṃ mitrasahastadā | āssva brahmaṃstvamatraiva muhūrtaṃ pratipālayan

तब राजर्षि मित्रसह ने उस ब्राह्मण से कहा, "हे ब्रह्मन्, आप यहीं बैठिए और कुछ देर प्रतीक्षा कीजिए।

श्लोक 32 (1.192.32)

निवृत्तः प्रतिदास्यामि भोजनं ते यथेप्सितम् । इत्युक्त्वा प्रययौ राजा तस्थौ च द्विजसत्तमः ॥

nivṛttaḥ pratidāsyāmi bhojanaṃ te yathepsitam | ityuktvā prayayau rājā tasthau ca dvijasattamaḥ

लौटकर मैं आपको मनचाहा भोजन दूँगा।" यह कहकर राजा चला गया और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वहीं ठहरा रहा।

श्लोक 33 (1.192.33)

ततो राजा परिक्रम्य यथाकामं यथासुखम् । निवृत्तोऽन्तःपुरं पार्थ प्रविवेश महामनाः ॥

tato rājā parikramya yathākāmaṃ yathāsukham | nivṛtto'ntaḥpuraṃ pārtha praviveśa mahāmanāḥ

फिर, हे पार्थ, राजा इच्छानुसार सुखपूर्वक घूमकर लौटा और वह महामना अन्तःपुर में चला गया।

श्लोक 34 (1.192.34)

अन्तर्गतस्तदा राजा श्रुत्वा ब्राह्मणभाषितम् । सोऽन्तःपुरं प्रविश्याथ न सस्मार नराधिपः ॥

antargatastadā rājā śrutvā brāhmaṇabhāṣitam | so'ntaḥpuraṃ praviśyātha na sasmāra narādhipaḥ

ब्राह्मण की बात सुन लेने पर भी राजा भीतर जाकर अन्तःपुर में प्रवेश करने के बाद उसे भूल गया।

श्लोक 35 (1.192.35)

ततोऽर्धरात्र उत्थाय सूदमानाय्य सत्वरम् । उवाच राजा संस्मृत्य ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुतम् ॥

tato'rdharātra utthāya sūdamānāyya satvaram | uvāca rājā saṃsmṛtya brāhmaṇasya pratiśrutam

तब आधी रात को उठकर राजा को ब्राह्मण से किया वचन याद आया; उसने तुरन्त रसोइये को बुलवाया और कहा —

कल्माषपाद उवाच

श्लोक 36 (1.192.36)

गच्छामुष्मिन्वनोद्देशे ब्राह्मणो मां प्रतीक्षते । अन्नार्थी तं त्वमन्नेन समांसेनोपपादय ॥

gacchāmuṣminvanoddeśe brāhmaṇo māṃ pratīkṣate | annārthī taṃ tvamannena samāṃsenopapādaya

जाओ, वन के उस भाग में एक ब्राह्मण मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। वह भोजन चाहता है; उसे मांस-सहित भोजन दो।

गन्धर्व उवाच

श्लोक 37 (1.192.37)

एवमुक्तस्ततः सूदः सोऽनासाद्यामिषं क्वचित् । निवेदयामास तदा तस्मै राज्ञे व्यथान्वितः ॥

evamuktastataḥ sūdaḥ so'nāsādyāmiṣaṃ kvacit | nivedayāmāsa tadā tasmai rājñe vyathānvitaḥ

ऐसा कहे जाने पर रसोइये को कहीं भी मांस नहीं मिला, तब उसने दुःखी होकर राजा को यह बात बताई।

श्लोक 38 (1.192.38)

राजा तु रक्षसाविष्टः सूदमाह गतव्यथः । अप्येनं नरमांसेन भोजयेति पुनः पुनः ॥

rājā tu rakṣasāviṣṭaḥ sūdamāha gatavyathaḥ | apyenaṃ naramāṃsena bhojayeti punaḥ punaḥ

परन्तु राक्षस से आविष्ट राजा ने निश्चिन्त होकर रसोइये से बार-बार कहा, "तो उसे मनुष्य का मांस ही खिला दो।"

श्लोक 39 (1.192.39)

तथेत्युक्त्वा ततः सूदः संस्थानं वध्यघातिनाम् । गत्वाऽऽजहार त्वरितो नरमांसमपेतभीः ॥

tathetyuktvā tataḥ sūdaḥ saṃsthānaṃ vadhyaghātinām | gatvā''jahāra tvarito naramāṃsamapetabhīḥ

"ऐसा ही हो" कहकर रसोइया उस स्थान पर गया जहाँ वध्य लोगों को मारा जाता है, और निडर होकर शीघ्र ही मनुष्य का मांस ले आया।

श्लोक 40 (1.192.40)

एतत्संस्कृत्य विधिवदन्नोपहितमाशु वै । तस्मै प्रादाद्ब्राह्मणाय क्षुधिताय तपस्विने ॥

etatsaṃskṛtya vidhivadannopahitamāśu vai | tasmai prādādbrāhmaṇāya kṣudhitāya tapasvine

उसे विधिपूर्वक पकाकर, अन्न के साथ परोसकर उसने तुरन्त उस भूखे तपस्वी ब्राह्मण को दे दिया।

श्लोक 41 (1.192.41)

स सिद्धचक्षुषा दृष्ट्वा तदन्नं द्विजसत्तमः । अभोज्यमिदमित्याह क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥

sa siddhacakṣuṣā dṛṣṭvā tadannaṃ dvijasattamaḥ | abhojyamidamityāha krodhaparyākulekṣaṇaḥ

उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने अपनी सिद्ध दृष्टि से उस अन्न को देखा और क्रोध से व्याकुल नेत्रों से कहा, "यह खाने योग्य नहीं है।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 42 (1.192.42)

यस्मादभोज्यमन्नं मे ददाति स नृपाधमः । तस्मात्तस्यैव मूढस्य भविष्यत्यत्र लोलुपा ॥

yasmādabhojyamannaṃ me dadāti sa nṛpādhamaḥ | tasmāttasyaiva mūḍhasya bhaviṣyatyatra lolupā

क्योंकि वह अधम राजा मुझे अभक्ष्य अन्न दे रहा है, इसलिए उसी मूर्ख को इसकी लालसा होगी।

श्लोक 43 (1.192.43)

सक्तो मानुषमांसेषु यथोक्तः शक्तिना पुरा । उद्वेजनीयो भूतानां चरिष्यति महीमिमाम् ॥

sakto mānuṣamāṃseṣu yathoktaḥ śaktinā purā | udvejanīyo bhūtānāṃ cariṣyati mahīmimām

जैसा शक्ति ने पहले कहा था, मनुष्य के मांस में आसक्त होकर वह प्राणियों को भयभीत करता हुआ इस पृथ्वी पर विचरेगा।

गन्धर्व उवाच

श्लोक 44 (1.192.44)

द्विरनुव्याहृते राज्ञः स शापो बलवानभूत् । रक्षोबलसमाविष्टो विसंज्ञश्चाभवन्नृपः ॥

dviranuvyāhṛte rājñaḥ sa śāpo balavānabhūt | rakṣobalasamāviṣṭo visaṃjñaścābhavannṛpaḥ

राजा के विषय में दूसरी बार कहे जाने से वह शाप प्रबल हो गया; राक्षस के बल से आविष्ट होकर राजा की चेतना जाती रही।

श्लोक 45 (1.192.45)

ततः स नृपतिश्रेष्ठो रक्षसापहृतेन्द्रियः । उवाच शक्तिं तं दृष्ट्वा न चिरादिव भारत ॥

tataḥ sa nṛpatiśreṣṭho rakṣasāpahṛtendriyaḥ | uvāca śaktiṃ taṃ dṛṣṭvā na cirādiva bhārata

हे भारत, फिर राक्षस द्वारा हर ली गई इन्द्रियों वाले उस श्रेष्ठ राजा ने थोड़े ही समय बाद शक्ति को देखा और उनसे कहा —

कल्माषपाद उवाच

श्लोक 46 (1.192.46)

यस्मादसदृशः शापः प्रयुक्तोऽयं मयि त्वया । तस्मात्त्वत्तः प्रवर्तिष्ये खादितुं पुरुषानहम् ॥

yasmādasadṛśaḥ śāpaḥ prayukto'yaṃ mayi tvayā | tasmāttvattaḥ pravartiṣye khādituṃ puruṣānaham

क्योंकि तुमने मुझ पर यह अनुचित शाप डाला है, इसलिए मनुष्यों को खाने का आरम्भ मैं तुम्हीं से करूँगा।

गन्धर्व उवाच

श्लोक 47 (1.192.47)

एवमुक्त्वा ततः सद्यस्तं प्राणैर्विप्रयोज्य च । शक्तिं तं भक्षयामास व्याघ्रः पशुमिवेप्सितम् ॥

evamuktvā tataḥ sadyastaṃ prāṇairviprayojya ca | śaktiṃ taṃ bhakṣayāmāsa vyāghraḥ paśumivepsitam

ऐसा कहकर उसने तुरन्त उनके प्राण ले लिए और जैसे बाघ मनचाहे पशु को खा जाता है, वैसे ही शक्ति को खा गया।

श्लोक 48 (1.192.48)

शक्तिनं तु मृतं दृष्ट्वा विश्वामित्रः पुनःपुनः । वसिष्ठस्यैव पुत्रेषु तद्रक्षः संदिदेश ह ॥

śaktinaṃ tu mṛtaṃ dṛṣṭvā viśvāmitraḥ punaḥpunaḥ | vasiṣṭhasyaiva putreṣu tadrakṣaḥ saṃdideśa ha

शक्ति को मरा देखकर विश्वामित्र ने बार-बार उस राक्षस को वसिष्ठ के अन्य पुत्रों पर भी लगा दिया।

श्लोक 49 (1.192.49)

स ताञ्शक्त्यवरान्पुत्रान्वसिष्ठस्य महात्मनः । भक्षयामास संक्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥

sa tāñśaktyavarānputrānvasiṣṭhasya mahātmanaḥ | bhakṣayāmāsa saṃkruddhaḥ siṃhaḥ kṣudramṛgāniva

उस क्रुद्ध राक्षस ने महात्मा वसिष्ठ के शक्ति से छोटे उन पुत्रों को ऐसे खा डाला जैसे सिंह छोटे पशुओं को खा जाता है।

श्लोक 50 (1.192.50)

वसिष्ठो घातिताञ्श्रुत्वा विश्वामित्रेण तान्सुतान् । धारयामास तं शोकं महाद्रिरिव मेदिनीम् ॥

vasiṣṭho ghātitāñśrutvā viśvāmitreṇa tānsutān | dhārayāmāsa taṃ śokaṃ mahādririva medinīm

विश्वामित्र के कारण अपने उन पुत्रों के मारे जाने का समाचार सुनकर वसिष्ठ ने उस शोक को वैसे ही धारण किया जैसे महान पर्वत पृथ्वी को धारण करता है।

श्लोक 51 (1.192.51)

चक्रे चात्मविनाशाय बुद्धिं स मुनिसत्तमः । न त्वेव कौशिकोच्छेदं मेने मतिमतां वरः ॥

cakre cātmavināśāya buddhiṃ sa munisattamaḥ | na tveva kauśikocchedaṃ mene matimatāṃ varaḥ

उन मुनिश्रेष्ठ ने आत्मनाश का निश्चय किया, किन्तु बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उन्होंने कौशिकों के विनाश की बात कभी नहीं सोची।

श्लोक 52 (1.192.52)

स मेरुकूटादात्मानं मुमोच भगवानृषिः । गिरेस्तस्य शिलायां तु तूलराशाविवापतत् ॥

sa merukūṭādātmānaṃ mumoca bhagavānṛṣiḥ | girestasya śilāyāṃ tu tūlarāśāvivāpatat

भगवान् ऋषि ने मेरु के शिखर से अपने को नीचे गिरा दिया, किन्तु वे उस पर्वत की शिलाओं पर ऐसे गिरे मानो रुई के ढेर पर गिरे हों।

श्लोक 53 (1.192.53)

न ममार च पातेन स यदा तेन पाण्डव । तदाग्निमिद्धं भगवान्संविवेश महावने ॥

na mamāra ca pātena sa yadā tena pāṇḍava | tadāgnimiddhaṃ bhagavānsaṃviveśa mahāvane

हे पाण्डव, जब उस गिरने से उनकी मृत्यु नहीं हुई, तब भगवान् वसिष्ठ ने महावन में प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश किया।

श्लोक 54 (1.192.54)

तं तदा सुसमिद्धोऽपि न ददाह हुताशनः । दीप्यमानोऽप्यमित्रघ्न शीतोऽग्निरभवत्ततः ॥

taṃ tadā susamiddho'pi na dadāha hutāśanaḥ | dīpyamāno'pyamitraghna śīto'gnirabhavattataḥ

किन्तु भली-भाँति प्रज्वलित होने पर भी अग्नि ने उन्हें नहीं जलाया; हे शत्रुनाशक, धधकती हुई भी वह अग्नि शीतल हो गई।

श्लोक 55 (1.192.55)

स समुद्रमभिप्रेक्ष्य शोकाविष्टो महामुनिः । बद्ध्वा कण्ठे शिलां गुर्वीं निपपात तदाम्भसि ॥

sa samudramabhiprekṣya śokāviṣṭo mahāmuniḥ | baddhvā kaṇṭhe śilāṃ gurvīṃ nipapāta tadāmbhasi

तब शोक से व्याकुल महामुनि ने समुद्र को देखा और गले में भारी शिला बाँधकर जल में कूद पड़े।

श्लोक 56 (1.192.56)

स समुद्रोर्मिवेगेन स्थले न्यस्तो महामुनिः । न ममार यदा विप्रः कथंचित्संशितव्रतः । जगाम स ततः खिन्नः पुनरेवाश्रमं प्रति ॥

sa samudrormivegena sthale nyasto mahāmuniḥ | na mamāra yadā vipraḥ kathaṃcitsaṃśitavrataḥ | jagāma sa tataḥ khinnaḥ punarevāśramaṃ prati

समुद्र की लहरों के वेग ने उन महामुनि को तट पर ला रखा। जब कठोर व्रत वाले वे ब्राह्मण किसी भी प्रकार नहीं मरे, तब वे खिन्न होकर फिर अपने आश्रम को लौट गए।

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