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आदि पर्व · अध्याय 193

वसिष्ठ द्वारा कल्माषपाद की शापमुक्ति

शोक में डूबे वसिष्ठ फिर से प्राण त्यागने का प्रयास करते हैं: वे स्वयं को बाँधकर बाढ़ से भरी नदी में डूबते हैं, जो उनके बन्धन काट देती है और विपाशा कहलाती है; फिर वे हिमालय से निकली एक नदी में कूदते हैं, जो सौ धाराओं में बँटकर उनसे भाग जाती है और शतद्रु कहलाती है। लौटते समय वे अपने पीछे वेदपाठ सुनते हैं और शक्ति की विधवा अदृश्यन्ती से जानते हैं कि यह शक्ति का गर्भस्थ पुत्र है, जो बारह वर्षों से गर्भ में वेदपाठ कर रहा है; तब वे मृत्यु का विचार छोड़ देते हैं। कल्माषपाद के आक्रमण करने पर वसिष्ठ उसे हुंकार से रोकते हैं, मन्त्रपूत जल से उसे शाप से मुक्त करते हैं और उसके साथ अयोध्या लौटते हैं, जहाँ राजा की प्रार्थना पर वे रानी से पुत्र उत्पन्न करते हैं; बारह वर्ष बाद रानी पत्थर से अपना उदर चीरती है और अश्मक का जन्म होता है।

अध्याय 192अध्याय-सूचीअध्याय 194

गन्धर्व उवाच

श्लोक 1 (1.193.1)

ततो दृष्ट्वाश्रमपदं रहितं तैः सुतैर्मुनिः । निर्जगाम सुदुःखार्तः पुनरप्याश्रमात्ततः ॥

tato dṛṣṭvāśramapadaṃ rahitaṃ taiḥ sutairmuniḥ | nirjagāma suduḥkhārtaḥ punarapyāśramāttataḥ

तब अपने उन पुत्रों से सूने आश्रम को देखकर वे मुनि अत्यन्त दुःख से व्याकुल होकर फिर आश्रम से बाहर निकल पड़े।

श्लोक 2 (1.193.2)

सोऽपश्यत्सरितं पूर्णां प्रावृट्काले नवाम्भसा । वृक्षान्बहुविधान्पार्थ हरन्तीं तीरजान्बहून् ॥

so'paśyatsaritaṃ pūrṇāṃ prāvṛṭkāle navāmbhasā | vṛkṣānbahuvidhānpārtha harantīṃ tīrajānbahūn

हे पार्थ! उन्होंने वर्षा ऋतु के नए जल से भरी एक नदी देखी, जो अपने तटों पर उगे अनेक प्रकार के बहुत-से वृक्षों को बहाए लिए जा रही थी।

श्लोक 3 (1.193.3)

अथ चिन्तां समापेदे पुनः कौरवनन्दन । अम्भस्यस्या निमज्जेयमिति दुःखसमन्वितः ॥

atha cintāṃ samāpede punaḥ kauravanandana | ambhasyasyā nimajjeyamiti duḥkhasamanvitaḥ

हे कौरवनन्दन! तब दुःख से भरे हुए वे फिर सोचने लगे — "मैं इसके जल में डूब जाऊँ।"

श्लोक 4 (1.193.4)

ततः पाशैस्तदात्मानं गाढं बद्ध्वा महामुनिः । तस्या जले महानद्या निममज्ज सुदुःखितः ॥

tataḥ pāśaistadātmānaṃ gāḍhaṃ baddhvā mahāmuniḥ | tasyā jale mahānadyā nimamajja suduḥkhitaḥ

तब उन महामुनि ने रस्सियों से अपने को कसकर बाँधा और अत्यन्त दुःखी होकर उस महानदी के जल में डूब गए।

श्लोक 5 (1.193.5)

अथ च्छित्त्वा नदी पाशांस्तस्यारिबलसूदन । स्थलस्थं तमृषिं कृत्वा विपाशं समवासृजत् ॥

atha cchittvā nadī pāśāṃstasyāribalasūdana | sthalasthaṃ tamṛṣiṃ kṛtvā vipāśaṃ samavāsṛjat

परन्तु हे शत्रुसेना-संहारक! उस नदी ने उनके बन्धन काट डाले और उन ऋषि को स्थल पर पहुँचाकर बन्धनमुक्त करके छोड़ दिया।

श्लोक 6 (1.193.6)

उत्ततार ततः पाशैर्विमुक्तः स महानृषिः । विपाशेति च नामास्या नद्याश्चक्रे महानृषिः ॥

uttatāra tataḥ pāśairvimuktaḥ sa mahānṛṣiḥ | vipāśeti ca nāmāsyā nadyāścakre mahānṛṣiḥ

बन्धनों से मुक्त होकर वे महर्षि जल से बाहर निकल आए, और उन्होंने उस नदी का नाम "विपाशा" (पाश से छुड़ाने वाली) रख दिया।

श्लोक 7 (1.193.7)

सा विपाशेति विख्याता नदी लोकेषु भारत । ऋषेस्तस्य नरव्याघ्र वचनात्सत्यवादिनः । उत्तीर्य च तदा राजन्दुःखितो भगवानृषिः ॥

sā vipāśeti vikhyātā nadī lokeṣu bhārata | ṛṣestasya naravyāghra vacanātsatyavādinaḥ | uttīrya ca tadā rājanduḥkhito bhagavānṛṣiḥ

हे भारत, हे नरश्रेष्ठ! उन सत्यवादी ऋषि के वचन से वह नदी लोकों में "विपाशा" नाम से विख्यात हुई। हे राजन्! उससे बाहर निकलकर भी वे भगवान् ऋषि दुःखी ही रहे।

श्लोक 8 (1.193.8)

शोके बुद्धिं तदा चक्रे न चैकत्र व्यतिष्ठत । सोऽगच्छत्पर्वतांश्चैव सरितश्च सरांसि च ॥

śoke buddhiṃ tadā cakre na caikatra vyatiṣṭhata | so'gacchatparvatāṃścaiva saritaśca sarāṃsi ca

वे शोक में ही डूबे रहे और एक स्थान पर टिक न सके; वे पर्वतों, नदियों और सरोवरों में भटकते रहे।

श्लोक 9 (1.193.9)

दृष्ट्वा स पुनरेवर्षिर्नदीं हैमवतीं तदा । चण्डग्राहवतीं भीमां तस्याः स्रोतस्यपातयत् ॥

dṛṣṭvā sa punarevarṣirnadīṃ haimavatīṃ tadā | caṇḍagrāhavatīṃ bhīmāṃ tasyāḥ srotasyapātayat

फिर उन ऋषि ने हिमालय से निकली एक भयानक नदी देखी, जो प्रचण्ड ग्राहों से भरी थी, और उन्होंने स्वयं को उसकी धारा में गिरा दिया।

श्लोक 10 (1.193.10)

सा तमग्निसमं विप्रमनुचिन्त्य सरिद्वरा । शतधा विद्रुता तस्माच्छतद्रुरिति विश्रुता ॥

sā tamagnisamaṃ vipramanucintya saridvarā | śatadhā vidrutā tasmācchatadruriti viśrutā

उस श्रेष्ठ नदी ने उन ब्राह्मण को अग्नि के समान जानकर सौ धाराओं में बँटकर उनसे पलायन किया; इसीलिए वह "शतद्रु" नाम से प्रसिद्ध हुई।

श्लोक 11 (1.193.11)

ततः स्थलगतं दृष्ट्वा तत्राप्यात्मानमात्मना । मर्तुं न शक्यमित्युक्त्वा पुनरेवाश्रमं ययौ ॥

tataḥ sthalagataṃ dṛṣṭvā tatrāpyātmānamātmanā | martuṃ na śakyamityuktvā punarevāśramaṃ yayau

वहाँ भी अपने को स्थल पर पड़ा देखकर उन्होंने कहा — "अपने ही हाथों मरना सम्भव नहीं है," और फिर आश्रम की ओर लौट चले।

श्लोक 12 (1.193.12)

स गत्वा विविधाञ्शैलान्देशान्बहुविधांस्तथा । अदृश्यन्त्याख्यया वध्वाथाश्रमेऽनुसृतोऽभवत् ॥

sa gatvā vividhāñśailāndeśānbahuvidhāṃstathā | adṛśyantyākhyayā vadhvāthāśrame'nusṛto'bhavat

अनेक पर्वतों और बहुत-से देशों में घूमकर जब वे आश्रम की ओर चले, तब अदृश्यन्ती नाम की उनकी पुत्रवधू उनके पीछे-पीछे चल रही थी।

श्लोक 13 (1.193.13)

अथ शुश्राव संगत्या वेदाध्ययननिःस्वनम् । पृष्ठतः परिपूर्णार्थं षड्भिरङ्गैरलङ्कृतम् ॥

atha śuśrāva saṃgatyā vedādhyayananiḥsvanam | pṛṣṭhataḥ paripūrṇārthaṃ ṣaḍbhiraṅgairalaṅkṛtam

तब उन्होंने अपने पीछे निकट से ही वेदपाठ की ध्वनि सुनी, जो अर्थ से परिपूर्ण और छहों वेदांगों से अलंकृत थी।

श्लोक 14 (1.193.14)

अनुव्रजति कोन्वेष मामित्येवाथ सोऽब्रवीत् । अदृश्यन्त्येवमुक्ता वै तं स्नुषा प्रत्यभाषत ॥

anuvrajati konveṣa māmityevātha so'bravīt | adṛśyantyevamuktā vai taṃ snuṣā pratyabhāṣata

उन्होंने पूछा — "यह कौन मेरे पीछे-पीछे आ रहा है?" ऐसा पूछे जाने पर उनकी पुत्रवधू अदृश्यन्ती ने उन्हें उत्तर दिया —

अदृश्यन्त्युवाच

श्लोक 15 (1.193.15)

शक्तेर्भार्या महाभाग तपोयुक्ता तपस्विनम् । अहमेकाकिनी चापि त्वया गच्छामि नापरः ॥

śakterbhāryā mahābhāga tapoyuktā tapasvinam | ahamekākinī cāpi tvayā gacchāmi nāparaḥ

"हे महाभाग! मैं तप में लगी हुई शक्ति की पत्नी हूँ और आप तपस्वी के पीछे चल रही हूँ। मैं अकेली ही आपके साथ जा रही हूँ, और कोई नहीं है।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 16 (1.193.16)

पुत्रि कस्यैष साङ्गस्य वेदस्याध्ययनस्वनः । पुरा साङ्गस्य वेदस्य शक्तेरिव मया श्रुतः ॥

putri kasyaiṣa sāṅgasya vedasyādhyayanasvanaḥ | purā sāṅgasya vedasya śakteriva mayā śrutaḥ

"पुत्री! अंगों सहित वेद के पाठ की यह ध्वनि किसकी है? पहले मैंने अंगों सहित वेद का ऐसा ही पाठ शक्ति के मुख से सुना था।"

अदृश्यन्त्युवाच

श्लोक 17 (1.193.17)

अयं कुक्षौ समुत्पन्नः शक्तेर्गर्भः सुतस्य ते । समा द्वादश तस्येह वेदानभ्यस्यतो मुने ॥

ayaṃ kukṣau samutpannaḥ śaktergarbhaḥ sutasya te | samā dvādaśa tasyeha vedānabhyasyato mune

"हे मुने! यह आपके पुत्र शक्ति का गर्भ है, जो मेरी कोख में उत्पन्न हुआ है। यह बारह वर्षों से यहाँ वेदों का अभ्यास कर रहा है।"

गन्धर्व उवाच

श्लोक 18 (1.193.18)

एवमुक्तस्तया हृष्टो वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः । अस्ति सन्तानमित्युक्त्वा मृत्योः पार्थ न्यवर्तत ॥

evamuktastayā hṛṣṭo vasiṣṭhaḥ śreṣṭhabhāgṛṣiḥ | asti santānamityuktvā mṛtyoḥ pārtha nyavartata

उसके ऐसा कहने पर श्रेष्ठ ऋषि वसिष्ठ हर्षित हो उठे, और हे पार्थ, "वंश की सन्तान है" यह कहकर वे मृत्यु के संकल्प से लौट आए।

श्लोक 19 (1.193.19)

ततः प्रतिनिवृत्तः स तया वध्वा सहानघ । कल्माषपादमासीनं ददर्श विजने वने ॥

tataḥ pratinivṛttaḥ sa tayā vadhvā sahānagha | kalmāṣapādamāsīnaṃ dadarśa vijane vane

हे निष्पाप! फिर अपनी पुत्रवधू के साथ लौटते हुए उन्होंने निर्जन वन में बैठे कल्माषपाद को देखा।

श्लोक 20 (1.193.20)

स तु दृष्ट्वैव तं राजा क्रुद्ध उत्थाय भारत । आविष्टो रक्षसोग्रेण इयेषात्तुं तदा मुनिम् ॥

sa tu dṛṣṭvaiva taṃ rājā kruddha utthāya bhārata | āviṣṭo rakṣasogreṇa iyeṣāttuṃ tadā munim

हे भारत! उग्र राक्षस से आविष्ट वह राजा उन्हें देखते ही क्रोध से उठ खड़ा हुआ और उसने उसी समय मुनि को खा जाना चाहा।

श्लोक 21 (1.193.21)

अदृश्यन्ती तु तं दृष्ट्वा क्रूरकर्माणमग्रतः । भयसंविग्नया वाचा वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥

adṛśyantī tu taṃ dṛṣṭvā krūrakarmāṇamagrataḥ | bhayasaṃvignayā vācā vasiṣṭhamidamabravīt

उस क्रूरकर्मा को सामने देखकर अदृश्यन्ती ने भय से काँपती वाणी में वसिष्ठ से यह कहा —

अदृश्यन्त्युवाच

श्लोक 22 (1.193.22)

असौ मृत्युरिवोग्रेण दण्डेन भगवन्नितः । प्रगृहीतेन काष्ठेन राक्षसोऽभ्येति दारुणः ॥

asau mṛtyurivogreṇa daṇḍena bhagavannitaḥ | pragṛhītena kāṣṭhena rākṣaso'bhyeti dāruṇaḥ

"भगवन्! देखिए, वह भयानक राक्षस हाथ में काठ का डंडा लिए, उग्र दण्डधारी मृत्यु के समान इधर ही आ रहा है।

श्लोक 23 (1.193.23)

तं निवारयितुं शक्तो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन । त्वदृतेऽद्य महाभाग सर्ववेदविदां वर ॥

taṃ nivārayituṃ śakto nānyo'sti bhuvi kaścana | tvadṛte'dya mahābhāga sarvavedavidāṃ vara

हे महाभाग, हे समस्त वेदज्ञों में श्रेष्ठ! आज आपके सिवा पृथ्वी पर और कोई उसे रोकने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 24 (1.193.24)

पाहि मां भगवन्पापादस्माद्दारुणदर्शनात् । राक्षसोऽयमिहात्तुं वै नूनमावां समीहते ॥

pāhi māṃ bhagavanpāpādasmāddāruṇadarśanāt | rākṣaso'yamihāttuṃ vai nūnamāvāṃ samīhate

भगवन्! इस भयानक दिखने वाले पापी से मेरी रक्षा कीजिए। निश्चय ही यह राक्षस यहाँ हम दोनों को खा जाना चाहता है।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 25 (1.193.25)

माभैः पुत्रि न भेतव्यं राक्षसात्तु कथंचन । नैतद्रक्षो भयं यस्मात्पश्यसि त्वमुपस्थितम् ॥

mābhaiḥ putri na bhetavyaṃ rākṣasāttu kathaṃcana | naitadrakṣo bhayaṃ yasmātpaśyasi tvamupasthitam

"पुत्री! डरो मत; तुम्हें राक्षस से किसी प्रकार भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। जिसे तुम सामने खड़ा देख रही हो, वह भय देने वाला राक्षस नहीं है।

श्लोक 26 (1.193.26)

राजा कल्माषपादोऽयं वीर्यवान्प्रथितो भुवि । स एषोऽस्मिन्वनोद्देशे निवसत्यतिभीषणः ॥

rājā kalmāṣapādo'yaṃ vīryavānprathito bhuvi | sa eṣo'sminvanoddeśe nivasatyatibhīṣaṇaḥ

यह पृथ्वी पर विख्यात पराक्रमी राजा कल्माषपाद है। वही अत्यन्त भयानक रूप में वन के इस भाग में रहता है।"

गन्धर्व उवाच

श्लोक 27 (1.193.27)

तमापतन्तं संप्रेक्ष्य वसिष्ठो भगवानृषिः । वारयामास तेजस्वी हुङ्कारेणैव भारत ॥

tamāpatantaṃ saṃprekṣya vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ | vārayāmāsa tejasvī huṅkāreṇaiva bhārata

हे भारत! उसे झपटते देखकर तेजस्वी भगवान् ऋषि वसिष्ठ ने केवल हुंकार से ही उसे रोक दिया।

श्लोक 28 (1.193.28)

मन्त्रपूतेन च पुनः स तमभ्युक्ष्य वारिणा । मोक्षयामास वै शापात्तस्माद्योगान्नराधिपम् ॥

mantrapūtena ca punaḥ sa tamabhyukṣya vāriṇā | mokṣayāmāsa vai śāpāttasmādyogānnarādhipam

फिर मन्त्रों से पवित्र किए हुए जल के छींटे देकर उन्होंने उस नरेश को उस शाप और उसकी पकड़ से मुक्त कर दिया।

श्लोक 29 (1.193.29)

स हि द्वादश वर्षाणि वासिष्ठस्यैव तेजसा । ग्रस्त आसीद्ग्रहेणेव पर्वकाले दिवाकरः ॥

sa hi dvādaśa varṣāṇi vāsiṣṭhasyaiva tejasā | grasta āsīdgraheṇeva parvakāle divākaraḥ

बारह वर्षों तक वह वसिष्ठ-पुत्र के तेज से उसी प्रकार ग्रस्त रहा था, जैसे पर्व के समय सूर्य राहु से ग्रस्त हो जाता है।

श्लोक 30 (1.193.30)

रक्षसा विप्रमुक्तोऽथ स नृपस्तद्वनं महत् । तेजसा रञ्जयामास सन्ध्याभ्रमिव भास्करः ॥

rakṣasā vipramukto'tha sa nṛpastadvanaṃ mahat | tejasā rañjayāmāsa sandhyābhramiva bhāskaraḥ

राक्षस से छूटकर उस राजा ने अपने तेज से उस विशाल वन को वैसे ही रँग दिया, जैसे सूर्य सन्ध्या के बादलों को रँग देता है।

श्लोक 31 (1.193.31)

प्रतिलभ्य ततः संज्ञामभिवाद्य कृताञ्जलिः । उवाच नृपतिः काले वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥

pratilabhya tataḥ saṃjñāmabhivādya kṛtāñjaliḥ | uvāca nṛpatiḥ kāle vasiṣṭhamṛṣisattamam

फिर होश में आकर राजा ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उचित समय पर ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ से कहा —

राजोवाच

श्लोक 32 (1.193.32)

सौदासोऽहं महाभाग याज्यस्ते मुनिसत्तम । अस्मिन्काले यदिष्टं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ॥

saudāso'haṃ mahābhāga yājyaste munisattama | asminkāle yadiṣṭaṃ te brūhi kiṃ karavāṇi te

"हे महाभाग, हे मुनिश्रेष्ठ! मैं सौदास हूँ, आपका यजमान। इस समय आपकी जो इच्छा हो, बताइए; मैं आपके लिए क्या करूँ?"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 33 (1.193.33)

वृत्तमेतद्यथाकालं गच्छ राज्यं प्रशाधि वै । ब्राह्मणं तु मनुष्येन्द्र माऽवमंस्थाः कदाचन ॥

vṛttametadyathākālaṃ gaccha rājyaṃ praśādhi vai | brāhmaṇaṃ tu manuṣyendra mā'vamaṃsthāḥ kadācana

"जो हुआ, वह समय के अनुसार हो गया। जाओ, अपने राज्य का शासन करो। किन्तु हे नरेन्द्र! कभी किसी ब्राह्मण का अपमान न करना।"

राजोवाच

श्लोक 34 (1.193.34)

नावमंस्ये महाभाग कदाचिद्ब्राह्मणर्षभान् । त्वन्निदेशे स्थितः सम्यक् पूजयिष्याम्यहं द्विजान् ॥

nāvamaṃsye mahābhāga kadācidbrāhmaṇarṣabhān | tvannideśe sthitaḥ samyak pūjayiṣyāmyahaṃ dvijān

"हे महाभाग! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणों का कभी अपमान नहीं करूँगा। आपकी आज्ञा में भली-भाँति स्थित रहकर मैं द्विजों का पूजन करूँगा।

श्लोक 35 (1.193.35)

इक्ष्वाकूणां च येनाहमनृणः स्यां द्विजोत्तम । तत्त्वत्तः प्राप्तुमिच्छामि सर्ववेदविदां वर ॥

ikṣvākūṇāṃ ca yenāhamanṛṇaḥ syāṃ dvijottama | tattvattaḥ prāptumicchāmi sarvavedavidāṃ vara

हे द्विजश्रेष्ठ, हे समस्त वेदज्ञों में उत्तम! जिससे मैं इक्ष्वाकुओं के ऋण से मुक्त हो सकूँ, वह मैं आपसे पाना चाहता हूँ।

श्लोक 36 (1.193.36)

अपत्यायेप्सिताय त्वं महिषीं गन्तुमर्हसि । शीलरूपगुणोपेतामिक्ष्वाकुकुलवृद्धये ॥

apatyāyepsitāya tvaṃ mahiṣīṃ gantumarhasi | śīlarūpaguṇopetāmikṣvākukulavṛddhaye

मेरी अभीष्ट सन्तान के लिए आप शील, रूप और गुणों से सम्पन्न मेरी महारानी के पास जाने की कृपा करें, जिससे इक्ष्वाकु-कुल की वृद्धि हो।"

गन्धर्व उवाच

श्लोक 37 (1.193.37)

ददानीत्येव तं तत्र राजानं प्रत्युवाच ह । वसिष्ठः परमेष्वासं सत्यसन्धो द्विजोत्तमः ॥

dadānītyeva taṃ tatra rājānaṃ pratyuvāca ha | vasiṣṭhaḥ parameṣvāsaṃ satyasandho dvijottamaḥ

सत्यप्रतिज्ञ द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठ ने वहीं उस महान् धनुर्धर राजा को उत्तर दिया — "मैं यह दूँगा।"

श्लोक 38 (1.193.38)

ततः प्रतिययौ काले वसिष्ठः सह तेन वै । ख्यातां पुरीमिमां लोकेष्वयोध्यां मनुजेश्वर ॥

tataḥ pratiyayau kāle vasiṣṭhaḥ saha tena vai | khyātāṃ purīmimāṃ lokeṣvayodhyāṃ manujeśvara

हे मनुजेश्वर! फिर उचित समय पर वसिष्ठ उसके साथ लोकों में विख्यात इस अयोध्या नगरी को लौटे।

श्लोक 39 (1.193.39)

तं प्रजाः प्रतिमोदन्त्यः सर्वाः प्रत्युद्गतास्तदा । विपाप्मानं महात्मानं दिवौकस इवेश्वरम् ॥

taṃ prajāḥ pratimodantyaḥ sarvāḥ pratyudgatāstadā | vipāpmānaṃ mahātmānaṃ divaukasa iveśvaram

तब उसकी सारी प्रजा आनन्दित होकर उस पापमुक्त महात्मा राजा की अगवानी के लिए वैसे ही निकल आई, जैसे देवता अपने स्वामी की अगवानी करते हैं।

श्लोक 40 (1.193.40)

सुचिराय मनुष्येन्द्रो नगरीं पुण्यलक्षणाम् । विवेश सहितस्तेन वसिष्ठेन महर्षिणा ॥

sucirāya manuṣyendro nagarīṃ puṇyalakṣaṇām | viveśa sahitastena vasiṣṭhena maharṣiṇā

बहुत समय के बाद वह नरेन्द्र महर्षि वसिष्ठ के साथ अपनी पुण्य-लक्षणों वाली नगरी में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 41 (1.193.41)

ददृशुस्तं महीपालमयोध्यावासिनो जनाः । पुरोहितेन सहितं दिवाकरमिवोदितम् ॥

dadṛśustaṃ mahīpālamayodhyāvāsino janāḥ | purohitena sahitaṃ divākaramivoditam

अयोध्यावासियों ने अपने पुरोहित के साथ आए उस राजा को उदित सूर्य के समान देखा।

श्लोक 42 (1.193.42)

स च तां पूरयामास लक्ष्म्या लक्ष्मीवतां वरः । अयोध्यां व्योम शीतांशुः शरत्काल इवोदितः ॥

sa ca tāṃ pūrayāmāsa lakṣmyā lakṣmīvatāṃ varaḥ | ayodhyāṃ vyoma śītāṃśuḥ śaratkāla ivoditaḥ

समृद्धिशालियों में श्रेष्ठ उस राजा ने अयोध्या को अपनी शोभा से वैसे ही भर दिया, जैसे शरद् ऋतु में उदित चन्द्रमा आकाश को भर देता है।

श्लोक 43 (1.193.43)

संसिक्तमृष्टपन्थानं पताकाध्वजशोभितम् । मनः प्रह्लादयामास तस्य तत्पुरमुत्तमम् ॥

saṃsiktamṛṣṭapanthānaṃ patākādhvajaśobhitam | manaḥ prahlādayāmāsa tasya tatpuramuttamam

छिड़काव करके बुहारी गई सड़कों और पताकाओं तथा ध्वजाओं से सजी उस उत्तम नगरी ने उसके मन को आनन्दित कर दिया।

श्लोक 44 (1.193.44)

तुष्टपुष्टजनाकीर्णा सा पुरी कुरुनन्दन । अशोभत तदा तेन शक्रेणेवामरावती ॥

tuṣṭapuṣṭajanākīrṇā sā purī kurunandana | aśobhata tadā tena śakreṇevāmarāvatī

हे कुरुनन्दन! सन्तुष्ट और हृष्ट-पुष्ट लोगों से भरी वह नगरी उस समय उस राजा से वैसे ही सुशोभित हुई, जैसे इन्द्र से अमरावती।

श्लोक 45 (1.193.45)

ततः प्रविष्टे राजर्षौ तस्मिंस्तत्पुरमुत्तमम् । राज्ञस्तस्याज्ञया देवी वसिष्ठमुपचक्रमे ॥

tataḥ praviṣṭe rājarṣau tasmiṃstatpuramuttamam | rājñastasyājñayā devī vasiṣṭhamupacakrame

जब वह राजर्षि उस उत्तम नगरी में प्रविष्ट हो गया, तब राजा की आज्ञा से महारानी वसिष्ठ के पास गई।

श्लोक 46 (1.193.46)

ऋतावथ महर्षिस्तु संबभूव तया सह । देव्या दिव्येन विधिना वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः ॥

ṛtāvatha maharṣistu saṃbabhūva tayā saha | devyā divyena vidhinā vasiṣṭhaḥ śreṣṭhabhāgṛṣiḥ

तब ऋतुकाल में श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ ने दिव्य विधि से उस रानी के साथ समागम किया।

श्लोक 47 (1.193.47)

ततस्तस्यां समुत्पन्ने गर्भे स मुनिसत्तमः । राज्ञाभिवादितस्तेन जगाम मुनिराश्रमम् ॥

tatastasyāṃ samutpanne garbhe sa munisattamaḥ | rājñābhivāditastena jagāma munirāśramam

जब रानी के गर्भ ठहर गया, तब राजा से प्रणाम पाकर वे मुनिश्रेष्ठ अपने आश्रम को चले गए।

श्लोक 48 (1.193.48)

दीर्घकालेन सा गर्भं सुषुवे न तु तं यदा । तदा देव्यश्मना कुक्षिं निर्बिभेद यशस्विनी ॥

dīrghakālena sā garbhaṃ suṣuve na tu taṃ yadā | tadā devyaśmanā kukṣiṃ nirbibheda yaśasvinī

बहुत समय बीत जाने पर भी जब वह उस गर्भ को जन्म न दे सकी, तब उस यशस्विनी रानी ने पत्थर से अपना उदर चीर डाला।

श्लोक 49 (1.193.49)

ततो द्वादशमे वर्षे स जज्ञे पुरुषर्षभः । अश्मको नाम राजर्षिः पौदन्यं यो न्यवेशयत् ॥

tato dvādaśame varṣe sa jajñe puruṣarṣabhaḥ | aśmako nāma rājarṣiḥ paudanyaṃ yo nyaveśayat

तब बारहवें वर्ष में वह पुरुषश्रेष्ठ उत्पन्न हुआ — अश्मक नाम का राजर्षि, जिसने पौदन्य नगर बसाया।

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