आदि पर्व · अध्याय 194
पराशर का जन्म और भृगुवंशियों का संहार
अदृश्यन्ती शक्ति के पुत्र को जन्म देती है, जिसका नाम पराशर पड़ता है, क्योंकि उसने गर्भ में रहते ही वसिष्ठ को मृत्यु से रोका था। जब माता उसे बताती है कि वसिष्ठ उसके पितामह हैं और उसके पिता को राक्षस खा गया, तब पराशर सब लोकों के विनाश का निश्चय करता है, और वसिष्ठ एक कथा सुनाकर उसे रोकते हैं। राजा कृतवीर्य ने अपने पुरोहित भृगुवंशियों को प्रचुर धन दिया था; जब उसके वंशजों को धन की आवश्यकता पड़ी और एक घर में भृगुओं का गड़ा धन मिला, तो उन्होंने गर्भस्थ शिशुओं तक भृगुओं का संहार कर डाला। एक भृगु-पत्नी ने अपने गर्भ को जाँघ में छिपा लिया; जब क्षत्रिय उसे मारने आए, तो वह बालक जाँघ फाड़कर निकला और उन्हें अंधा कर दिया, और वे उस ब्राह्मणी से दृष्टि लौटाने की याचना करने लगे।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 1 (1.194.1)
आश्रमस्था ततः पुत्रमदृश्यन्ती व्यजायत । शक्तेः कुलकरं राजन् द्वितीयमिव शक्तिनम् ॥
āśramasthā tataḥ putramadṛśyantī vyajāyata | śakteḥ kulakaraṃ rājan dvitīyamiva śaktinam
तब हे राजन्! आश्रम में रहती हुई अदृश्यन्ती ने एक पुत्र को जन्म दिया, जो शक्ति के कुल को आगे बढ़ाने वाला और मानो दूसरा शक्ति ही था।
श्लोक 2 (1.194.2)
जातकर्मादिकास्तस्य क्रियाः स मुनिसत्तमः । पौत्रस्य भरतश्रेष्ठ चकार भगवान्स्वयम् ॥
jātakarmādikāstasya kriyāḥ sa munisattamaḥ | pautrasya bharataśreṣṭha cakāra bhagavānsvayam
हे भरतश्रेष्ठ! उस पौत्र के जातकर्म आदि संस्कार मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठ ने स्वयं किए।
श्लोक 3 (1.194.3)
परासुः स यतस्तेन वसिष्ठः स्थापितो मुनिः । गर्भस्थेन ततो लोके पराशर इति स्मृतः ॥
parāsuḥ sa yatastena vasiṣṭhaḥ sthāpito muniḥ | garbhasthena tato loke parāśara iti smṛtaḥ
क्योंकि गर्भ में रहते हुए ही उसने प्राण त्यागने को उद्यत मुनि वसिष्ठ को जीवन में रोक रखा था, इसलिए वह संसार में पराशर नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 4 (1.194.4)
अमन्यत स धर्मात्मा वसिष्ठं पितरं मुनिः । जन्मप्रभृति तस्मिंस्तु पितरीवान्ववर्तत ॥
amanyata sa dharmātmā vasiṣṭhaṃ pitaraṃ muniḥ | janmaprabhṛti tasmiṃstu pitarīvānvavartata
वे धर्मात्मा मुनि वसिष्ठ को ही अपना पिता मानते थे, और जन्म से ही उनके प्रति पिता जैसा व्यवहार करते थे।
श्लोक 5 (1.194.5)
स तात इति विप्रर्षिं वसिष्ठं प्रत्यभाषत । मातुः समक्षं कौन्तेय अदृश्यन्त्याः परन्तप ॥
sa tāta iti viprarṣiṃ vasiṣṭhaṃ pratyabhāṣata | mātuḥ samakṣaṃ kaunteya adṛśyantyāḥ parantapa
हे कुन्तीनन्दन, हे परन्तप! वे अपनी माता अदृश्यन्ती के सामने ही ब्रह्मर्षि वसिष्ठ को "तात" कहकर पुकारते थे।
श्लोक 6 (1.194.6)
तातेति परिपूर्णार्थं तस्य तन्मधुरं वचः । अदृश्यन्त्यश्रुपूर्णाक्षी शृण्वती तमुवाच ह ॥
tāteti paripūrṇārthaṃ tasya tanmadhuraṃ vacaḥ | adṛśyantyaśrupūrṇākṣī śṛṇvatī tamuvāca ha
उसके मुख से पूरे भाव के साथ निकले उस मधुर "तात" शब्द को सुनकर अदृश्यन्ती की आँखें आँसुओं से भर आईं, और उसने उससे कहा —
अदृश्यन्त्युवाच
श्लोक 7 (1.194.7)
मा तात ताततातेति ब्रूह्येनं पितरं पितुः । रक्षसा भक्षितस्तात तव तातो वनान्तरे ॥
mā tāta tātatāteti brūhyenaṃ pitaraṃ pituḥ | rakṣasā bhakṣitastāta tava tāto vanāntare
"बेटा! इन्हें 'तात, तात, तात' मत कहो; इन्हें अपने पिता का पिता कहो। बेटा, तुम्हारे पिता को तो वन के भीतर एक राक्षस ने खा लिया था।
श्लोक 8 (1.194.8)
मन्यसे यं तु तातेति नैष तातस्तवानघ । आर्य एष पिता तस्य पितुस्तव यशस्विनः ॥
manyase yaṃ tu tāteti naiṣa tātastavānagha | ārya eṣa pitā tasya pitustava yaśasvinaḥ
हे निष्पाप! जिन्हें तुम पिता मानते हो, वे तुम्हारे पिता नहीं हैं। ये आर्य तो तुम्हारे यशस्वी पिता के पिता हैं।"
गन्धर्व उवाच
श्लोक 9 (1.194.9)
स एवमुक्तो दुःखार्तः सत्यवागृषिसत्तमः । सर्वलोकविनाशाय मतिं चक्रे महामनाः ॥
sa evamukto duḥkhārtaḥ satyavāgṛṣisattamaḥ | sarvalokavināśāya matiṃ cakre mahāmanāḥ
यह सुनकर वे सत्यवादी, महामना ऋषिश्रेष्ठ दुःख से व्याकुल हो उठे और उन्होंने समस्त लोकों का विनाश करने का निश्चय कर लिया।
श्लोक 10 (1.194.10)
तं तथा निश्चितात्मानं स महात्मा महातपाः । ऋषिर्ब्रह्मविदां श्रेष्ठो मैत्रावरुणिरन्त्यधीः । वसिष्ठो वारयामास हेतुना येन तच्छृणु ॥
taṃ tathā niścitātmānaṃ sa mahātmā mahātapāḥ | ṛṣirbrahmavidāṃ śreṣṭho maitrāvaruṇirantyadhīḥ | vasiṣṭho vārayāmāsa hetunā yena tacchṛṇu
जब उन्होंने ऐसा निश्चय कर लिया, तब मित्र और वरुण के पुत्र, ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, परम सिद्धान्त में स्थिर बुद्धि वाले महातपस्वी महात्मा वसिष्ठ ने एक कारण बताकर उन्हें रोका। वह कारण सुनो।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 11 (1.194.11)
कृतवीर्य इति ख्यातो बभूव पृथिवीपतिः । याज्यो वेदविदां लोके भृगूणां पार्थिवर्षभः ॥
kṛtavīrya iti khyāto babhūva pṛthivīpatiḥ | yājyo vedavidāṃ loke bhṛgūṇāṃ pārthivarṣabhaḥ
पृथ्वी पर कृतवीर्य नाम से विख्यात एक राजा था। वह नृपश्रेष्ठ संसार में वेदज्ञ भृगुवंशियों का यजमान था।
श्लोक 12 (1.194.12)
स तानग्रभुजस्तात धान्येन च धनेन च । सोमान्ते तर्पयामास विपुलेन विशांपतिः ॥
sa tānagrabhujastāta dhānyena ca dhanena ca | somānte tarpayāmāsa vipulena viśāṃpatiḥ
बेटा! उस प्रजापालक राजा ने सोमयज्ञ के अन्त में उन अग्रभोजी ब्राह्मणों को प्रचुर अन्न और धन से तृप्त किया।
श्लोक 13 (1.194.13)
तस्मिन्नृपतिशार्दूले स्वर्यातेऽथ कथंचन । बभूव तत्कुलेयानां द्रव्यकार्यमुपस्थितम् ॥
tasminnṛpatiśārdūle svaryāte'tha kathaṃcana | babhūva tatkuleyānāṃ dravyakāryamupasthitam
जब वह नृपश्रेष्ठ स्वर्ग चला गया, तब किसी प्रकार उसके कुल वालों को धन की आवश्यकता आ पड़ी।
श्लोक 14 (1.194.14)
भृगूणां तु धनं ज्ञात्वा राजानः सर्व एव ते । याचिष्णवोऽभिजग्मुस्तांस्ततो भार्गवसत्तमान् ॥
bhṛgūṇāṃ tu dhanaṃ jñātvā rājānaḥ sarva eva te | yāciṣṇavo'bhijagmustāṃstato bhārgavasattamān
भृगुवंशियों के धन के विषय में जानकर वे सभी राजा याचना करने के लिए उन श्रेष्ठ भार्गवों के पास पहुँचे।
श्लोक 15 (1.194.15)
भूमौ तु निददुः केचिद्भृगवो धनमक्षयम् । ददुः केचिद्द्विजातिभ्यो ज्ञात्वा क्षत्रियतो भयम् ॥
bhūmau tu nidaduḥ kecidbhṛgavo dhanamakṣayam | daduḥ keciddvijātibhyo jñātvā kṣatriyato bhayam
कुछ भृगुवंशियों ने अपना अक्षय धन भूमि में गाड़ दिया; कुछ ने क्षत्रियों से भय जानकर उसे ब्राह्मणों को दे दिया।
श्लोक 16 (1.194.16)
भृगवस्तु ददुः केचित्तेषां वित्तं यथेप्सितम् । क्षत्रियाणां तदा तात कारणान्तरदर्शनात् ॥
bhṛgavastu daduḥ kecitteṣāṃ vittaṃ yathepsitam | kṣatriyāṇāṃ tadā tāta kāraṇāntaradarśanāt
और बेटा, कुछ भृगुवंशियों ने किसी दूसरे परिणाम को देखते हुए क्षत्रियों को उनकी इच्छा के अनुसार धन दे दिया।
श्लोक 17 (1.194.17)
ततो महीतलं तात क्षत्रियेण यदृच्छया । खनताऽधिगतं वित्तं केनचिद्भृगुवेश्मनि । तद्वित्तं ददृशुः सर्वे समेताः क्षत्रियर्षभाः ॥
tato mahītalaṃ tāta kṣatriyeṇa yadṛcchayā | khanatā'dhigataṃ vittaṃ kenacidbhṛguveśmani | tadvittaṃ dadṛśuḥ sarve sametāḥ kṣatriyarṣabhāḥ
तब बेटा, किसी क्षत्रिय को एक भृगुवंशी के घर में भूमि खोदते हुए संयोग से धन मिल गया, और सभी श्रेष्ठ क्षत्रियों ने एकत्र होकर वह धन देखा।
श्लोक 18 (1.194.18)
अवमन्य ततः क्रोधाद्भृगूंस्ताञ्छरणागतान् । निजघ्नुः परमेष्वासाः सर्वांस्तान्निशितैः शरैः । आगर्भादवकृन्तन्तश्चेरुः सर्वां वसुन्धराम् ॥
avamanya tataḥ krodhādbhṛgūṃstāñcharaṇāgatān | nijaghnuḥ parameṣvāsāḥ sarvāṃstānniśitaiḥ śaraiḥ | āgarbhādavakṛntantaśceruḥ sarvāṃ vasundharām
तब क्रोध में आकर उन महाधनुर्धरों ने शरण में आए उन भृगुवंशियों का तिरस्कार करके उन सबको तीखे बाणों से मार डाला, और गर्भ तक के शिशुओं को काटते हुए वे सारी पृथ्वी पर घूमते रहे।
श्लोक 19 (1.194.19)
तत उच्छिद्यमानेषु भृगुष्वेवं भयात्तदा । भृगुपत्न्यो गिरिं दुर्गं हिमवन्तं प्रपेदिरे ॥
tata ucchidyamāneṣu bhṛguṣvevaṃ bhayāttadā | bhṛgupatnyo giriṃ durgaṃ himavantaṃ prapedire
जब भृगुवंशियों का इस प्रकार उच्छेद हो रहा था, तब भृगु-पत्नियाँ भय से दुर्गम हिमालय पर्वत की शरण में चली गईं।
श्लोक 20 (1.194.20)
तासामन्यतमा गर्भं भयाद्दध्रे महौजसम् । ऊरुणैकेन वामोरूर्भर्तुः कुलविवृद्धये ॥
tāsāmanyatamā garbhaṃ bhayāddadhre mahaujasam | ūruṇaikena vāmorūrbhartuḥ kulavivṛddhaye
उनमें से एक सुन्दर जंघाओं वाली स्त्री ने भय के कारण अपने पति के कुल की वृद्धि के लिए अपने महातेजस्वी गर्भ को एक जाँघ में धारण कर लिया।
श्लोक 21 (1.194.21)
तं गर्भमुपलभ्याशु ब्राह्मण्येका भयार्दिता । गत्वा वै कथयामास क्षत्रियाणामुपह्वरे ॥
taṃ garbhamupalabhyāśu brāhmaṇyekā bhayārditā | gatvā vai kathayāmāsa kṣatriyāṇāmupahvare
उस गर्भ का पता लगते ही भय से पीड़ित एक ब्राह्मणी ने शीघ्र जाकर क्षत्रियों को एकान्त में यह बात बता दी।
श्लोक 22 (1.194.22)
ततस्ते क्षत्रिया जग्मुस्तं गर्भं हन्तुमुद्यताः । ददृशुर्ब्राह्मणीं तेऽथ दीप्यमानां स्वतेजसा ॥
tataste kṣatriyā jagmustaṃ garbhaṃ hantumudyatāḥ | dadṛśurbrāhmaṇīṃ te'tha dīpyamānāṃ svatejasā
तब वे क्षत्रिय उस गर्भ को मारने के लिए उद्यत होकर गए, और उन्होंने उस ब्राह्मणी को अपने तेज से दमकती हुई देखा।
श्लोक 23 (1.194.23)
अथ गर्भः स भित्त्वोरुं ब्राह्मण्या निर्जगाम ह । मुष्णन्दृष्टीः क्षत्रियाणां मध्याह्न इव भास्करः । ततश्चक्षुर्विहीनास्ते गिरिदुर्गेषु बभ्रमुः ॥
atha garbhaḥ sa bhittvoruṃ brāhmaṇyā nirjagāma ha | muṣṇandṛṣṭīḥ kṣatriyāṇāṃ madhyāhna iva bhāskaraḥ | tataścakṣurvihīnāste giridurgeṣu babhramuḥ
तब वह बालक ब्राह्मणी की जाँघ फाड़कर बाहर निकला और मध्याह्न के सूर्य के समान क्षत्रियों की दृष्टि हर ली; तब नेत्रहीन होकर वे दुर्गम पहाड़ों में भटकने लगे।
श्लोक 24 (1.194.24)
ततस्ते मोघसङ्कल्पा भयार्ताः क्षत्रियाः पुनः । ब्राह्मणीं शरणं जग्मुर्दृष्ट्यर्थं तामनिन्दिताम् ॥
tataste moghasaṅkalpā bhayārtāḥ kṣatriyāḥ punaḥ | brāhmaṇīṃ śaraṇaṃ jagmurdṛṣṭyarthaṃ tāmaninditām
तब अपने संकल्प में विफल और भय से व्याकुल वे क्षत्रिय अपनी दृष्टि पाने के लिए फिर उस निर्दोष ब्राह्मणी की शरण में गए।
श्लोक 25 (1.194.25)
ऊचुश्चैनां महाभागां क्षत्रियास्ते विचेतसः । ज्योतिःप्रहीणा दुःखार्ताः शान्तार्चिष इवाग्नयः ॥
ūcuścaināṃ mahābhāgāṃ kṣatriyāste vicetasaḥ | jyotiḥprahīṇā duḥkhārtāḥ śāntārciṣa ivāgnayaḥ
ज्योति से रहित, दुःख से पीड़ित और बुझी लपटों वाली अग्नियों के समान हतबुद्धि वे क्षत्रिय उस महाभागा से बोले —
क्षत्रिया ऊचुः
श्लोक 26 (1.194.26)
भगवत्याः प्रसादेन गच्छेत्क्षत्रमनामयम् । उपारम्य च गच्छेम सहिताः पापकर्मणः ॥
bhagavatyāḥ prasādena gacchetkṣatramanāmayam | upāramya ca gacchema sahitāḥ pāpakarmaṇaḥ
"देवी! आपकी कृपा से क्षत्रिय-वर्ग फिर से नीरोग हो जाए। हम सब इस पापकर्म से विरत होकर साथ-साथ लौट जाएँगे।
श्लोक 27 (1.194.27)
सपुत्रा त्वं प्रसादं नः कर्तुमर्हसि शोभने । पुनर्दृष्टिप्रदानेन राज्ञः संत्रातुमर्हसि ॥
saputrā tvaṃ prasādaṃ naḥ kartumarhasi śobhane | punardṛṣṭipradānena rājñaḥ saṃtrātumarhasi
हे कल्याणी! आप अपने पुत्र सहित हम पर कृपा करें; हमें फिर से दृष्टि देकर हम राजाओं की रक्षा करें।"