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आदि पर्व · अध्याय 195

और्व का जन्म

पराशर को कथा सुनाते हुए वसिष्ठ बताते हैं कि उस ब्राह्मणी ने अंधे हुए क्षत्रियों से कहा कि उनकी दृष्टि उसने नहीं, बल्कि उसकी जाँघ से उत्पन्न उस पुत्र ने हरी है, जिसमें गर्भ में ही सम्पूर्ण वेद प्रविष्ट हो गया था और जो अपने बन्धुओं के वध से क्रुद्ध है। उनके प्रार्थना करने पर उसने उनकी दृष्टि लौटा दी; ऊरु (जाँघ) से जन्म लेने के कारण वह और्व कहलाया। किन्तु और्व ने समस्त लोकों के विनाश का निश्चय किया और अपने तप से उन्हें तपाने लगा, तब पितर पितृलोक से आए और बोले कि उन्होंने स्वयं क्षत्रियों के हाथों मृत्यु चाही थी — आत्मघात से शुभ लोक नहीं मिलते, इसलिए उन्हें भड़काने के लिए धन गाड़ा गया था — और उससे क्रोध त्यागने का आग्रह किया।

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ब्राह्मण्युवाच

श्लोक 1 (1.195.1)

नाहं गृह्णामि वस्ताता दृष्टीर्नास्मि रुषान्विता । अयं तु भार्गवो नूनमूरुजः कुपितोऽद्य वः ॥

nāhaṃ gṛhṇāmi vastātā dṛṣṭīrnāsmi ruṣānvitā | ayaṃ tu bhārgavo nūnamūrujaḥ kupito'dya vaḥ

"बेटो! मैंने तुम्हारी दृष्टि नहीं ली है, और न मैं क्रोध से भरी हूँ। किन्तु जाँघ से उत्पन्न यह भार्गव निश्चय ही आज तुम पर कुपित है।

श्लोक 2 (1.195.2)

तेन चक्षूंषि वस्ताता व्यक्तं कोपान्महात्मना । स्मरता निहतान्बन्धूनादत्तानि न संशयः ॥

tena cakṣūṃṣi vastātā vyaktaṃ kopānmahātmanā | smaratā nihatānbandhūnādattāni na saṃśayaḥ

बेटो! स्पष्ट है कि मारे गए बन्धुओं को स्मरण करते हुए उसी महात्मा ने क्रोध से तुम्हारे नेत्र छीन लिए हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 3 (1.195.3)

गर्भानपि यदा यूयं भृगूणां घ्नत पुत्रकाः । तदायमूरुणा गर्भो मया वर्षशतं धृतः ॥

garbhānapi yadā yūyaṃ bhṛgūṇāṃ ghnata putrakāḥ | tadāyamūruṇā garbho mayā varṣaśataṃ dhṛtaḥ

पुत्रो! जब तुम भृगुवंशियों के गर्भस्थ शिशुओं को भी मार रहे थे, तब मैंने इस गर्भ को सौ वर्षों तक अपनी जाँघ में धारण किया।

श्लोक 4 (1.195.4)

षडङ्गश्चाखिलो वेद इमं गर्भस्थमेव ह । विवेश भृगुवंशस्य भूयः प्रियचिकीर्षया ॥

ṣaḍaṅgaścākhilo veda imaṃ garbhasthameva ha | viveśa bhṛguvaṃśasya bhūyaḥ priyacikīrṣayā

भृगुवंश का फिर से हित करने की इच्छा से छहों अंगों सहित सम्पूर्ण वेद इसके गर्भ में रहते हुए ही इसमें प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 5 (1.195.5)

सोऽयं पितृवधाद्व्यक्तं क्रोधाद्वो हन्तुमिच्छति । तेजसा तस्य दिव्येन चक्षूंषि मुषितानि वः ॥

so'yaṃ pitṛvadhādvyaktaṃ krodhādvo hantumicchati | tejasā tasya divyena cakṣūṃṣi muṣitāni vaḥ

स्पष्ट है कि पितरों के वध के कारण यही क्रोध से तुम्हें मार डालना चाहता है; इसी के दिव्य तेज से तुम्हारे नेत्र हर लिए गए हैं।

श्लोक 6 (1.195.6)

तमेव यूयं याचध्वमौर्वं मम सुतोत्तमम् । अयं वः प्रणिपातेन तुष्टो दृष्टीः प्रदास्यति ॥

tameva yūyaṃ yācadhvamaurvaṃ mama sutottamam | ayaṃ vaḥ praṇipātena tuṣṭo dṛṣṭīḥ pradāsyati

इसलिए तुम मेरे इस उत्तम पुत्र और्व से ही याचना करो। तुम्हारे प्रणाम से प्रसन्न होकर यह तुम्हें दृष्टि लौटा देगा।"

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 7 (1.195.7)

एवमुक्तास्ततः सर्वे राजानस्ते तमूरुजम् । ऊचुः प्रसीदेति तदा प्रसादं च चकार सः ॥

evamuktāstataḥ sarve rājānaste tamūrujam | ūcuḥ prasīdeti tadā prasādaṃ ca cakāra saḥ

ऐसा कहे जाने पर उन सब राजाओं ने तब उस ऊरुज से कहा — "प्रसन्न होइए," और उसने उन पर कृपा की।

श्लोक 8 (1.195.8)

अनेनैव च विख्यातो नाम्ना लोकेषु सत्तमः । स और्व इति विप्रर्षिरूरुं भित्त्वा व्यजायत ॥

anenaiva ca vikhyāto nāmnā lokeṣu sattamaḥ | sa aurva iti viprarṣirūruṃ bhittvā vyajāyata

इसी नाम से वह सत्पुरुष ब्रह्मर्षि लोकों में विख्यात हुआ — और्व, क्योंकि वह ऊरु (जाँघ) को फाड़कर उत्पन्न हुआ था।

श्लोक 9 (1.195.9)

चक्षूंषि प्रतिलभ्याथ प्रतिजग्मुस्ततो नृपाः । भार्गवस्तु मुनिर्मेने सर्वलोकपराभवम् ॥

cakṣūṃṣi pratilabhyātha pratijagmustato nṛpāḥ | bhārgavastu munirmene sarvalokaparābhavam

दृष्टि वापस पाकर वे राजा लौट गए। किन्तु भार्गव मुनि ने सब लोकों के पराभव का विचार किया।

श्लोक 10 (1.195.10)

स चक्रे तात लोकानां विनाशाय मतिं तदा । सर्वेषामेव कार्त्स्न्येन मनः प्रवणमात्मनः ॥

sa cakre tāta lokānāṃ vināśāya matiṃ tadā | sarveṣāmeva kārtsnyena manaḥ pravaṇamātmanaḥ

बेटा! उसने तब लोकों के विनाश का निश्चय किया; उसने अपना सम्पूर्ण मन सबके पूर्ण विनाश की ओर लगा दिया।

श्लोक 11 (1.195.11)

इच्छन्नपचितिं कर्तुं भृगूणां भृगुनन्दनः । सर्वलोकविनाशाय तपसा महतैधितः ॥

icchannapacitiṃ kartuṃ bhṛgūṇāṃ bhṛgunandanaḥ | sarvalokavināśāya tapasā mahataidhitaḥ

भृगुवंशियों का प्रतिशोध लेने की इच्छा से वह भृगुनन्दन समस्त लोकों के विनाश के लिए महान तप से बल बढ़ाता गया।

श्लोक 12 (1.195.12)

तापयामास ताँल्लोकान्सदेवासुरमानुषान् । तपसोग्रेण महता नन्दयिष्यन्पितामहान् ॥

tāpayāmāsa tām̐llokānsadevāsuramānuṣān | tapasogreṇa mahatā nandayiṣyanpitāmahān

अपने पितामहों को प्रसन्न करने के लिए उसने अपने उग्र और महान तप से देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित उन लोकों को तपाना आरम्भ किया।

श्लोक 13 (1.195.13)

ततस्तं पितरस्तात विज्ञाय कुलनन्दनम् । पितृलोकादुपागम्य सर्व ऊचुरिदं वचः ॥

tatastaṃ pitarastāta vijñāya kulanandanam | pitṛlokādupāgamya sarva ūcuridaṃ vacaḥ

तब बेटा, अपने कुल को आनन्द देने वाले उस और्व को पहचानकर सब पितर पितृलोक से आए और यह वचन बोले —

पितर ऊचुः

श्लोक 14 (1.195.14)

और्व दृष्टः प्रभावस्ते तपसोग्रस्य पुत्रक । प्रसादं कुरु लोकानां नियच्छ क्रोधमात्मनः ॥

aurva dṛṣṭaḥ prabhāvaste tapasograsya putraka | prasādaṃ kuru lokānāṃ niyaccha krodhamātmanaḥ

"पुत्र और्व! हमने तुम्हारे उग्र तप का प्रभाव देख लिया। लोकों पर कृपा करो; अपने क्रोध को रोको।

श्लोक 15 (1.195.15)

नानीशैर्हि तदा तात भृगुभिर्भावितात्मभिः । वधो ह्युपेक्षितः सर्वैः क्षत्रियाणां विहिंसताम् ॥

nānīśairhi tadā tāta bhṛgubhirbhāvitātmabhiḥ | vadho hyupekṣitaḥ sarvaiḥ kṣatriyāṇāṃ vihiṃsatām

बेटा! उस समय हम सब आत्मसंयमी भृगुवंशियों ने असमर्थता के कारण उन हिंसक क्षत्रियों के हाथों हुए वध की उपेक्षा नहीं की थी।

श्लोक 16 (1.195.16)

आयुषा विप्रकृष्टेन यदा नः खेद आविशत् । तदाऽस्माभिर्वधस्तात क्षत्रियैरीप्सितः स्वयम् ॥

āyuṣā viprakṛṣṭena yadā naḥ kheda āviśat | tadā'smābhirvadhastāta kṣatriyairīpsitaḥ svayam

बेटा! जब बहुत लम्बी आयु से हम थक गए, तब हमने स्वयं ही क्षत्रियों के हाथों अपना वध चाहा।

श्लोक 17 (1.195.17)

निखातं यच्च वै वित्तं केनचिद्भृगुवेश्मनि । वैरायैव तदा न्यस्तं क्षत्रियान्कोपयिष्णुभिः ॥

nikhātaṃ yacca vai vittaṃ kenacidbhṛguveśmani | vairāyaiva tadā nyastaṃ kṣatriyānkopayiṣṇubhiḥ

और भृगु के घर में जो धन गाड़ा गया था, वह क्षत्रियों को क्रुद्ध करने की इच्छा रखने वालों ने केवल वैर उत्पन्न करने के लिए ही वहाँ रखा था।

श्लोक 18 (1.195.18)

किं हि वित्तेन नः कार्यं स्वर्गेप्सूनां द्विजोत्तम । यदस्माकं धनाध्यक्षः प्रभूतं धनमाहरत् ॥

kiṃ hi vittena naḥ kāryaṃ svargepsūnāṃ dvijottama | yadasmākaṃ dhanādhyakṣaḥ prabhūtaṃ dhanamāharat

हे द्विजश्रेष्ठ! स्वर्ग की कामना करने वाले हमें धन से क्या प्रयोजन, जबकि स्वयं धनाध्यक्ष कुबेर हमारे लिए प्रचुर धन ले आए थे?

श्लोक 19 (1.195.19)

यदा तु मृत्युरादातुं न नः शक्नोति सर्वशः । तदाऽस्माभिरयं दृष्ट उपायस्तात संमतः ॥

yadā tu mṛtyurādātuṃ na naḥ śaknoti sarvaśaḥ | tadā'smābhirayaṃ dṛṣṭa upāyastāta saṃmataḥ

बेटा! जब मृत्यु किसी भी प्रकार हमें नहीं ले जा सकी, तब हमने यही उपाय उचित ठहराया।

श्लोक 20 (1.195.20)

आत्महा च पुमांस्तात न लोकाँल्लभते शुभान् । ततोऽस्माभिः समीक्ष्यैवं नात्मनात्मा निपातितः ॥

ātmahā ca pumāṃstāta na lokām̐llabhate śubhān | tato'smābhiḥ samīkṣyaivaṃ nātmanātmā nipātitaḥ

बेटा! आत्मघात करने वाला मनुष्य शुभ लोकों को प्राप्त नहीं करता। इसलिए यह सोच-विचारकर हमने अपने हाथों अपने प्राण नहीं लिए।

श्लोक 21 (1.195.21)

न चैतन्नः प्रियं तात यदिदं कर्तुमिच्छसि । नियच्छेदं मनः पापात्सर्वलोकपराभवात् ॥

na caitannaḥ priyaṃ tāta yadidaṃ kartumicchasi | niyacchedaṃ manaḥ pāpātsarvalokaparābhavāt

बेटा! तुम जो करना चाहते हो, वह भी हमें प्रिय नहीं है। समस्त लोकों के विनाश रूपी इस पाप से अपने मन को रोको।

श्लोक 22 (1.195.22)

मा वधीः क्षत्रियांस्तात न लोकान्सप्त पुत्रक । दूषयन्तं तपस्तेजः क्रोधमुत्पतितं जहि ॥

mā vadhīḥ kṣatriyāṃstāta na lokānsapta putraka | dūṣayantaṃ tapastejaḥ krodhamutpatitaṃ jahi

बेटा! न क्षत्रियों का वध करो, न सातों लोकों का। तप के तेज को दूषित करने वाले इस उमड़े हुए क्रोध को ही नष्ट करो।"

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