आदि पर्व · अध्याय 196
और्व का क्रोधाग्नि समुद्र में छोड़ना
और्व पितरों को उत्तर देते हैं कि क्रोध में की गई प्रतिज्ञा को छोड़ने से उनका ही नाश होगा, और दुष्टों को रोकने के लिए उचित क्रोध आवश्यक है: जो पाप को रोक सकता है पर नहीं रोकता, वह भी उसका भागी होता है, और भृगुओं के संहार के समय सारे लोक देखते रहे। फिर भी वे पितरों की बात नहीं टालते और पूछते हैं कि अपनी क्रोधाग्नि का क्या करें। पितर उसे जल में छोड़ने को कहते हैं, जिस पर लोक टिके हैं; और्व उसे समुद्र में छोड़ देते हैं, जहाँ वह विशाल अश्वमुख बनकर जल पीती रहती है। अंत में वसिष्ठ पराशर से आग्रह करते हैं कि वे भी लोकों का विनाश न करें।
और्व उवाच
श्लोक 1 (1.196.1)
उक्तवानस्मि यां क्रोधात्प्रतिज्ञां पितरस्तदा । सर्वलोकविनाशाय न सा मे वितथा भवेत् ॥
uktavānasmi yāṃ krodhātpratijñāṃ pitarastadā | sarvalokavināśāya na sā me vitathā bhavet
"हे पितरो! उस समय मैंने क्रोध में समस्त लोकों के विनाश की जो प्रतिज्ञा की थी, वह झूठी नहीं होनी चाहिए।
श्लोक 2 (1.196.2)
वृथारोषप्रतिज्ञो वै नाहं जीवितुमुत्सहे । अनिस्तीर्णो हि मां रोषो दहेदग्निरिवारणिम् ॥
vṛthāroṣapratijño vai nāhaṃ jīvitumutsahe | anistīrṇo hi māṃ roṣo dahedagnirivāraṇim
क्रोध में की गई प्रतिज्ञा व्यर्थ होने पर मैं जीवित नहीं रह सकता। यदि मेरा रोष अपना कार्य पूरा न करे, तो वह मुझे वैसे ही जला डालेगा जैसे अग्नि अरणि को जला देती है।
श्लोक 3 (1.196.3)
यो हि कारणतः क्रोधं संजातं क्षन्तुमर्हति । नालं स मनुजः सम्यक् त्रिवर्गं परिरक्षितुम् ॥
yo hi kāraṇataḥ krodhaṃ saṃjātaṃ kṣantumarhati | nālaṃ sa manujaḥ samyak trivargaṃ parirakṣitum
जो मनुष्य उचित कारण से उत्पन्न क्रोध को भी क्षमा कर देता है, वह धर्म, अर्थ और काम — इन तीनों की भली-भाँति रक्षा करने में समर्थ नहीं होता।
श्लोक 4 (1.196.4)
अशिष्टानां नियन्ता हि शिष्टानां परिरक्षिता । स्थाने रोषः प्रयुक्तः स्यान्नृपैः सर्वजिगीषुभिः ॥
aśiṣṭānāṃ niyantā hi śiṣṭānāṃ parirakṣitā | sthāne roṣaḥ prayuktaḥ syānnṛpaiḥ sarvajigīṣubhiḥ
सबको जीतने की इच्छा रखने वाले राजाओं द्वारा उचित अवसर पर प्रयुक्त रोष दुष्टों को रोकता और सज्जनों की रक्षा करता है।
श्लोक 5 (1.196.5)
अश्रौषमहमूरुस्थो गर्भशय्यागतस्तदा । आरावं मातृवर्गस्य भृगूणां क्षत्रियैर्वधे ॥
aśrauṣamahamūrustho garbhaśayyāgatastadā | ārāvaṃ mātṛvargasya bhṛgūṇāṃ kṣatriyairvadhe
जाँघ में गर्भ-शय्या पर पड़े हुए मैंने उस समय क्षत्रियों द्वारा भृगुओं के वध के समय अपनी माताओं का करुण क्रन्दन सुना था।
श्लोक 6 (1.196.6)
सामरैर्हि यदा लोके भृगूणां क्षत्रियाधमैः । आगर्भोत्सादनं क्षान्तं तदा मां मन्युराविशत् ॥
sāmarairhi yadā loke bhṛgūṇāṃ kṣatriyādhamaiḥ | āgarbhotsādanaṃ kṣāntaṃ tadā māṃ manyurāviśat
जब देवताओं सहित सारे संसार ने उन अधम क्षत्रियों द्वारा गर्भ तक के भृगुओं का संहार चुपचाप सह लिया, तब मुझमें क्रोध भर गया।
श्लोक 7 (1.196.7)
प्रकीर्णकेशाः किल मे मातरः पितरस्तथा । भयात्सर्वेषु लोकेषु नाधिजग्मुः परायणम् ॥
prakīrṇakeśāḥ kila me mātaraḥ pitarastathā | bhayātsarveṣu lokeṣu nādhijagmuḥ parāyaṇam
कहते हैं, मेरी माताएँ बाल बिखेरे हुए, और मेरे पितर भी, भय के कारण समस्त लोकों में कहीं शरण न पा सके।
श्लोक 8 (1.196.8)
तान्भृगूणां यदा दारान्कश्चिन्नाभ्युपपद्यत । माता तदा दधारेयमूरुणैकेन मां शुभा ॥
tānbhṛgūṇāṃ yadā dārānkaścinnābhyupapadyata | mātā tadā dadhāreyamūruṇaikena māṃ śubhā
जब भृगुओं की उन पत्नियों को किसी ने आश्रय नहीं दिया, तब मेरी इस कल्याणमयी माता ने मुझे अपनी एक जाँघ में धारण किया।
श्लोक 9 (1.196.9)
प्रतिषेद्धा हि पापस्य यदा लोकेषु विद्यते । तदा सर्वेषु लोकेषु पापकृन्नोपपद्यते ॥
pratiṣeddhā hi pāpasya yadā lokeṣu vidyate | tadā sarveṣu lokeṣu pāpakṛnnopapadyate
जब संसार में पाप को रोकने वाला कोई होता है, तब किसी भी लोक में पापी उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 10 (1.196.10)
यदा तु प्रतिषेद्धारं पापो न लभते क्वचित् । तिष्ठन्ति बहवो लोकास्तदा पापेषु कर्मसु ॥
yadā tu pratiṣeddhāraṃ pāpo na labhate kvacit | tiṣṭhanti bahavo lokāstadā pāpeṣu karmasu
किन्तु जब पाप को कहीं कोई रोकने वाला नहीं मिलता, तब बहुत-से लोग पापकर्मों में लगे रहते हैं।
श्लोक 11 (1.196.11)
जानन्नपि च यः पापं शक्तिमान्न नियच्छति । ईशः सन्सोऽपि तेनैव कर्मणा संप्रयुज्यते ॥
jānannapi ca yaḥ pāpaṃ śaktimānna niyacchati | īśaḥ sanso'pi tenaiva karmaṇā saṃprayujyate
और जो सामर्थ्यवान् होकर, पाप को जानते हुए भी उसे नहीं रोकता, वह स्वामी होते हुए भी उसी कर्म का भागी हो जाता है।
श्लोक 12 (1.196.12)
राजभिश्चेश्वरैश्चैव यदि वै पितरो मम । शक्तैर्न शकितास्त्रातुमिष्टं मत्वेह जीवितम् ॥
rājabhiśceśvaraiścaiva yadi vai pitaro mama | śaktairna śakitāstrātumiṣṭaṃ matveha jīvitam
यदि राजा और समर्थ स्वामी, सामर्थ्यवान् होते हुए भी, यहाँ अपने जीवन को प्रिय मानकर मेरे पितरों की रक्षा न कर सके,
श्लोक 13 (1.196.13)
अत एषामहं क्रुद्धो लोकानामीश्वरो ह्यहम् । भवतां च वचो नालमहं समभिवर्तितुम् ॥
ata eṣāmahaṃ kruddho lokānāmīśvaro hyaham | bhavatāṃ ca vaco nālamahaṃ samabhivartitum
तो इसी कारण मैं इन लोकों पर क्रुद्ध हूँ, क्योंकि मैं इनका स्वामी हूँ। फिर भी आपके वचन का उल्लंघन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ।
श्लोक 14 (1.196.14)
ममापि चेद्भवेदेवमीश्वरस्य सतो महत् । उपेक्षमाणस्य पुनर्लोकानां किल्बिषाद्भयम् ॥
mamāpi cedbhavedevamīśvarasya sato mahat | upekṣamāṇasya punarlokānāṃ kilbiṣādbhayam
और यदि मैं समर्थ होकर भी फिर उपेक्षा करूँ, तो मुझे भी लोकों के पाप से महान भय होगा।
श्लोक 15 (1.196.15)
यश्चायं मन्युजो मेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति । दहेदेष च मामेव निगृहीतः स्वतेजसा ॥
yaścāyaṃ manyujo me'gnirlokānādātumicchati | dahedeṣa ca māmeva nigṛhītaḥ svatejasā
और मेरे क्रोध से उत्पन्न यह अग्नि, जो लोकों को ग्रस लेना चाहती है, यदि रोकी गई तो अपने ही तेज से मुझे ही जला डालेगी।
श्लोक 16 (1.196.16)
भवतां च विजानामि सर्वलोकहितेप्सुताम् । तस्माद्विधद्ध्वं यच्छ्रेयो लोकानां मम चेश्वराः ॥
bhavatāṃ ca vijānāmi sarvalokahitepsutām | tasmādvidhaddhvaṃ yacchreyo lokānāṃ mama ceśvarāḥ
मैं जानता हूँ कि आप सब लोकों का हित चाहते हैं। इसलिए हे स्वामियो! जो लोकों के लिए और मेरे लिए कल्याणकारी हो, वही विधान कीजिए।"
पितर ऊचुः
श्लोक 17 (1.196.17)
य एष मन्युजस्तेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति । अप्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोका ह्यप्सु प्रतिष्ठिताः ॥
ya eṣa manyujaste'gnirlokānādātumicchati | apsu taṃ muñca bhadraṃ te lokā hyapsu pratiṣṭhitāḥ
"तुम्हारे क्रोध से उत्पन्न यह अग्नि, जो लोकों को ग्रस लेना चाहती है, इसे जल में छोड़ दो; तुम्हारा कल्याण हो, क्योंकि लोक जल पर ही प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 18 (1.196.18)
आपोमयाः सर्वरसाः सर्वमापोमयं जगत् । तस्मादप्सु विमुञ्चेमं क्रोधाग्निं द्विजसत्तम ॥
āpomayāḥ sarvarasāḥ sarvamāpomayaṃ jagat | tasmādapsu vimuñcemaṃ krodhāgniṃ dvijasattama
सारे रस जलमय हैं, सम्पूर्ण जगत् जलमय है। इसलिए हे द्विजश्रेष्ठ! इस क्रोधाग्नि को जल में छोड़ दो।
श्लोक 19 (1.196.19)
अयं तिष्ठतु ते विप्र यदीच्छसि महोदधौ । मन्युजोऽग्निर्दहन्नापो लोका ह्यापोमयाः स्मृताः ॥
ayaṃ tiṣṭhatu te vipra yadīcchasi mahodadhau | manyujo'gnirdahannāpo lokā hyāpomayāḥ smṛtāḥ
हे विप्र! यदि तुम चाहो तो तुम्हारी यह क्रोधजन्य अग्नि जल को जलाती हुई महासागर में स्थित रहे; क्योंकि लोकों को जलमय कहा गया है।
श्लोक 20 (1.196.20)
एवं प्रतिज्ञा सत्येयं तवानघ भविष्यति । न चैवं सामरा लोका गमिष्यन्ति पराभवम् ॥
evaṃ pratijñā satyeyaṃ tavānagha bhaviṣyati | na caivaṃ sāmarā lokā gamiṣyanti parābhavam
हे निष्पाप! इस प्रकार तुम्हारी यह प्रतिज्ञा सत्य हो जाएगी, और देवताओं सहित लोकों का विनाश भी नहीं होगा।"
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 21 (1.196.21)
ततस्तं क्रोधजं तात और्वोऽग्निं वरुणालये । उत्ससर्ज स चैवाप उपयुङ्क्ते महोदधौ ॥
tatastaṃ krodhajaṃ tāta aurvo'gniṃ varuṇālaye | utsasarja sa caivāpa upayuṅkte mahodadhau
तब बेटा, और्व ने अपने क्रोध से उत्पन्न उस अग्नि को वरुण के निवास समुद्र में छोड़ दिया, और वह महासागर में जल का भक्षण करती है।
श्लोक 22 (1.196.22)
महद्धयशिरो भूत्वा यत्तद्वेदविदो विदुः । तमग्निमुद्गिरद्वक्त्रात्पिबत्यापो महोदधौ ॥
mahaddhayaśiro bhūtvā yattadvedavido viduḥ | tamagnimudgiradvaktrātpibatyāpo mahodadhau
वेदवेत्ता जिसे जानते हैं, वह विशाल अश्वमुख बनकर वह अपने मुख से अग्नि उगलती हुई महासागर में जल पीती रहती है।
श्लोक 23 (1.196.23)
तस्मात्त्वमपि भद्रं ते न लोकान्हन्तुमर्हसि । पराशर पराँल्लोकाञ्जानञ्ज्ञानवतां वर ॥
tasmāttvamapi bhadraṃ te na lokānhantumarhasi | parāśara parām̐llokāñjānañjñānavatāṃ vara
इसलिए हे पराशर, हे ज्ञानियों में श्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो; तुम परलोकों को जानते हो, अतः तुम्हें भी लोकों का विनाश नहीं करना चाहिए।