आदि पर्व · अध्याय 197
पराशर का राक्षस-सत्र
गन्धर्व पराशर की कथा आगे सुनाता है। वसिष्ठ के समझाने पर लोकों के विनाश से अपना क्रोध रोककर पराशर एक ऐसा सत्र करते हैं जिसमें बूढ़े-बालक सभी राक्षस जलने लगते हैं, और वसिष्ठ उन्हें नहीं रोकते। राक्षसों की रक्षा के लिए अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु आते हैं; राक्षसों के मूलपुरुष पुलस्त्य पराशर से कहते हैं कि शक्ति की मृत्यु उनके अपने शाप से हुई, विश्वामित्र तो निमित्त-मात्र थे, और इन बेचारे राक्षसों का संहार अब रुकना चाहिए। पराशर सत्र समाप्त करके उसकी अग्नि को हिमालय के उत्तर में एक विशाल वन में छोड़ देते हैं, जहाँ वह आज भी जलती है।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 1 (1.197.1)
एवमुक्तः स विप्रर्षिर्वसिष्ठेन महात्मना । न्ययच्छदात्मनः क्रोधं सर्वलोकपराभवात् ॥
evamuktaḥ sa viprarṣirvasiṣṭhena mahātmanā | nyayacchadātmanaḥ krodhaṃ sarvalokaparābhavāt
महात्मा वसिष्ठ के ऐसा कहने पर उस ब्रह्मर्षि ने अपने क्रोध को रोक लिया, जो सारे लोकों का विनाश कर देता।
श्लोक 2 (1.197.2)
ईजे च स महातेजाः सर्ववेदविदां वरः । ऋषी राक्षससत्रेण शाक्तेयोऽथ पराशरः ॥
īje ca sa mahātejāḥ sarvavedavidāṃ varaḥ | ṛṣī rākṣasasatreṇa śākteyo'tha parāśaraḥ
तब सब वेदज्ञों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी शक्तिपुत्र ऋषि पराशर ने राक्षसों के संहार के लिए राक्षस-सत्र नामक यज्ञ किया।
श्लोक 3 (1.197.3)
ततो वृद्धांश्च बालांश्च राक्षसान्स महामुनिः । ददाह वितते यज्ञे शक्तेर्वधमनुस्मरन् ॥
tato vṛddhāṃśca bālāṃśca rākṣasānsa mahāmuniḥ | dadāha vitate yajñe śaktervadhamanusmaran
शक्ति के वध का स्मरण करते हुए उस महामुनि ने उस विस्तृत यज्ञ में बूढ़े और बालक, सभी राक्षसों को जला डाला।
श्लोक 4 (1.197.4)
न हि तं वारयामास वसिष्ठो रक्षसां वधात् । द्वितीयामस्य मा भाङ्क्षं प्रतिज्ञामिति निश्चयात् ॥
na hi taṃ vārayāmāsa vasiṣṭho rakṣasāṃ vadhāt | dvitīyāmasya mā bhāṅkṣaṃ pratijñāmiti niścayāt
वसिष्ठ ने उसे राक्षसों के वध से नहीं रोका, क्योंकि उन्होंने निश्चय कर लिया था कि 'मैं इसकी इस दूसरी प्रतिज्ञा को भंग नहीं करूँगा।'
श्लोक 5 (1.197.5)
त्रयाणां पावकानां च सत्रे तस्मिन्महामुनिः । आसीत्पुरस्ताद्दीप्तानां चतुर्थ इव पावकः ॥
trayāṇāṃ pāvakānāṃ ca satre tasminmahāmuniḥ | āsītpurastāddīptānāṃ caturtha iva pāvakaḥ
उस सत्र में वह महामुनि तीनों प्रज्वलित अग्नियों के सामने चौथी अग्नि के समान विराजमान था।
श्लोक 6 (1.197.6)
तेन यज्ञेन शुभ्रेण हूयमानेन शक्तितः । तद्विदीपितमाकाशं सूर्येणेव घनात्यये ॥
tena yajñena śubhreṇa hūyamānena śaktitaḥ | tadvidīpitamākāśaṃ sūryeṇeva ghanātyaye
पूरी शक्ति से आहुतियाँ दिए जाते उस उज्ज्वल यज्ञ से आकाश वैसे ही दीप्त हो उठा जैसे वर्षा बीतने पर सूर्य से होता है।
श्लोक 7 (1.197.7)
तं वसिष्ठादयः सर्वे मुनयस्तत्र मेनिरे । तेजसा दीप्यमानं वै द्वितीयमिव भास्करम् ॥
taṃ vasiṣṭhādayaḥ sarve munayastatra menire | tejasā dīpyamānaṃ vai dvitīyamiva bhāskaram
वसिष्ठ आदि वहाँ उपस्थित सभी मुनियों ने तेज से दमकते हुए उसे दूसरा सूर्य ही माना।
श्लोक 8 (1.197.8)
ततः परमदुष्प्रापमन्यैर्ऋषिरुदारधीः । समापिपयिषुः सत्रं तमत्रिः समुपागमत् ॥
tataḥ paramaduṣprāpamanyairṛṣirudāradhīḥ | samāpipayiṣuḥ satraṃ tamatriḥ samupāgamat
तब उदार बुद्धि वाले ऋषि अत्रि उस सत्र को समाप्त कराने की इच्छा से उसके पास आए, जो दूसरों के लिए अत्यन्त दुष्कर था।
श्लोक 9 (1.197.9)
तथा पुलस्त्यः पुलहः क्रतुश्चैव महाक्रतुः । तत्राजग्मुरमित्रघ्न रक्षसां जीवितेप्सया ॥
tathā pulastyaḥ pulahaḥ kratuścaiva mahākratuḥ | tatrājagmuramitraghna rakṣasāṃ jīvitepsayā
हे शत्रुनाशक! इसी प्रकार पुलस्त्य, पुलह और महान् क्रतु भी राक्षसों के प्राण बचाने की इच्छा से वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 10 (1.197.10)
पुलस्त्यस्तु वधात्तेषां रक्षसां भरतर्षभ । उवाचेदं वचः पार्थ पराशरमरिन्दमम् ॥
pulastyastu vadhātteṣāṃ rakṣasāṃ bharatarṣabha | uvācedaṃ vacaḥ pārtha parāśaramarindamam
हे भरतश्रेष्ठ पार्थ! तब उन राक्षसों के वध के कारण पुलस्त्य ने शत्रुदमन पराशर से यह वचन कहा—
पुलस्त्य उवाच
श्लोक 11 (1.197.11)
कच्चित्तातापविघ्नं ते कच्चिन्नन्दसि पुत्रक । अजानतामदोषाणां सर्वेषां रक्षसां वधात् ॥
kaccittātāpavighnaṃ te kaccinnandasi putraka | ajānatāmadoṣāṇāṃ sarveṣāṃ rakṣasāṃ vadhāt
तात! तुम्हारे यज्ञ में कोई विघ्न तो नहीं है? पुत्र! क्या तुम्हें इन सब निरपराध राक्षसों के वध में आनन्द मिल रहा है, जो इस विषय में कुछ जानते भी नहीं थे?
श्लोक 12 (1.197.12)
प्रजोच्छेदमिमं मह्यं न हि कर्तुं त्वमर्हसि । नैष तात द्विजातीनां धर्मो दृष्टस्तपस्विनाम् ॥
prajocchedamimaṃ mahyaṃ na hi kartuṃ tvamarhasi | naiṣa tāta dvijātīnāṃ dharmo dṛṣṭastapasvinām
तुम्हें मेरी सन्तान का ऐसा विनाश नहीं करना चाहिए। तात! तपस्वी ब्राह्मणों का यह धर्म नहीं देखा गया।
श्लोक 13 (1.197.13)
शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर । अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन्कुरुषे त्वं पराशर ॥
śama eva paro dharmastamācara parāśara | adharmiṣṭhaṃ variṣṭhaḥ sankuruṣe tvaṃ parāśara
शान्ति ही परम धर्म है; पराशर, उसी का आचरण करो। श्रेष्ठ होकर भी, पराशर, तुम अत्यन्त अधर्म का काम कर रहे हो।
श्लोक 14 (1.197.14)
शक्तिं चापि हि धर्मज्ञं नातिक्रान्तुमिहार्हसि । प्रजायाश्च ममोच्छेदं न चैवं कर्तुमर्हसि ॥
śaktiṃ cāpi hi dharmajñaṃ nātikrāntumihārhasi | prajāyāśca mamocchedaṃ na caivaṃ kartumarhasi
धर्मज्ञ शक्ति की मर्यादा का भी तुम्हें उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और न इस प्रकार मेरी सन्तान का उच्छेद करना चाहिए।
श्लोक 15 (1.197.15)
शापाद्धि शक्तेर्वासिष्ठ तदा तदुपपादितम् । आत्मजेन स दोषेण शक्तिर्नीत इतो दिवम् ॥
śāpāddhi śaktervāsiṣṭha tadā tadupapāditam | ātmajena sa doṣeṇa śaktirnīta ito divam
हे वासिष्ठ! वह घटना तब शक्ति के अपने ही शाप से घटी थी; अपने ही दोष से शक्ति यहाँ से स्वर्ग को ले जाए गए।
श्लोक 16 (1.197.16)
न हि तं राक्षसः कश्चिच्छक्तो भक्षयितुं मुने । वासिष्ठो भक्षितश्चासीत्कौशिकोत्सृष्टरक्षसा । शापं न कुर्वन्ति तदा न च त्राणपरायणाः ॥
na hi taṃ rākṣasaḥ kaścicchakto bhakṣayituṃ mune | vāsiṣṭho bhakṣitaścāsītkauśikotsṛṣṭarakṣasā | śāpaṃ na kurvanti tadā na ca trāṇaparāyaṇāḥ
हे मुनि! कोई भी राक्षस उन्हें खा जाने में समर्थ न था। वसिष्ठ का वह पुत्र कौशिक (विश्वामित्र) के छोड़े हुए राक्षस द्वारा खाया गया। ऐसे लोग उस समय न शाप देते हैं, न अपनी रक्षा में ही लगते हैं;
श्लोक 17 (1.197.17)
क्षमावन्तोऽदहन्देहं देहमन्यद्भवत्विति । आत्मनैवात्मनस्तेन दृष्टो मृत्युस्तदाऽभवत् ॥
kṣamāvanto'dahandehaṃ dehamanyadbhavatviti | ātmanaivātmanastena dṛṣṭo mṛtyustadā'bhavat
क्षमाशील होने के कारण वे 'दूसरा शरीर मिल जाए' यह सोचकर अपने शरीर को जल जाने देते हैं। इस प्रकार उन्होंने स्वयं ही तब अपनी मृत्यु को स्वीकार किया।
श्लोक 18 (1.197.18)
निमित्तभूतस्तत्रासीद्विश्वामित्रः पराशर । राजा कल्माषपादश्च दिवमारुह्य मोदते ॥
nimittabhūtastatrāsīdviśvāmitraḥ parāśara | rājā kalmāṣapādaśca divamāruhya modate
पराशर! उसमें विश्वामित्र तो निमित्त-मात्र थे; और राजा कल्माषपाद भी स्वर्ग में पहुँचकर आनन्द कर रहे हैं।
श्लोक 19 (1.197.19)
ये च शक्त्यवराः पुत्रा वसिष्ठस्य महामुने । ते च सर्वे मुदा युक्ता मोदन्ते सहिताः सुरैः ॥
ye ca śaktyavarāḥ putrā vasiṣṭhasya mahāmune | te ca sarve mudā yuktā modante sahitāḥ suraiḥ
हे महामुनि! वसिष्ठ के जो पुत्र शक्ति से छोटे थे, वे सब भी देवताओं के साथ प्रसन्नतापूर्वक आनन्द कर रहे हैं।
श्लोक 20 (1.197.20)
सर्वमेतद्वसिष्ठस्य विदितं वै महामुने । रक्षसां च समुच्छेद एष तात तपस्विनाम् ॥
sarvametadvasiṣṭhasya viditaṃ vai mahāmune | rakṣasāṃ ca samuccheda eṣa tāta tapasvinām
हे महामुनि! यह सब वसिष्ठ को ज्ञात है। और तात, इन बेचारे राक्षसों का जो यह संहार हो रहा है,
श्लोक 21 (1.197.21)
निमित्तभूतस्त्वं चात्र क्रतौ वासिष्ठनन्दन । तत्सत्रं मुञ्च भद्रं ते समाप्तमिदमस्तु ते ॥
nimittabhūtastvaṃ cātra kratau vāsiṣṭhanandana | tatsatraṃ muñca bhadraṃ te samāptamidamastu te
हे वसिष्ठवंशनन्दन! उसमें, इस यज्ञ में, तुम भी केवल निमित्त बने हो। इस सत्र को छोड़ दो; तुम्हारा कल्याण हो; यह यहीं समाप्त हो जाए।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 22 (1.197.22)
एवमुक्तः पुलस्त्येन वसिष्ठेन च धीमता । तदा समापयामास सत्रं शाक्तो महामुनिः ॥
evamuktaḥ pulastyena vasiṣṭhena ca dhīmatā | tadā samāpayāmāsa satraṃ śākto mahāmuniḥ
पुलस्त्य और बुद्धिमान वसिष्ठ के ऐसा कहने पर शक्तिपुत्र महामुनि ने तब उस सत्र को समाप्त कर दिया।
श्लोक 23 (1.197.23)
सर्वराक्षससत्राय संभृतं पावकं तदा । उत्तरे हिमवत्पार्श्वे उत्ससर्ज महावने ॥
sarvarākṣasasatrāya saṃbhṛtaṃ pāvakaṃ tadā | uttare himavatpārśve utsasarja mahāvane
समस्त राक्षसों के संहार के लिए जो अग्नि उन्होंने संचित की थी, उसे उन्होंने तब हिमालय के उत्तरी पार्श्व में एक विशाल वन में छोड़ दिया।
श्लोक 24 (1.197.24)
स तत्राद्यापि रक्षांसि वृक्षानश्मन एव च । भक्षयन्दृश्यते वह्निः सदा पर्वणि पर्वणि ॥
sa tatrādyāpi rakṣāṃsi vṛkṣānaśmana eva ca | bhakṣayandṛśyate vahniḥ sadā parvaṇi parvaṇi
वह अग्नि आज भी वहाँ प्रत्येक पर्व पर राक्षसों, वृक्षों और पत्थरों तक को भस्म करती हुई दिखाई देती है।