आदि पर्व · अध्याय 198
ब्राह्मणी का कल्माषपाद को शाप
गन्धर्व बताता है कि पराशर ने विश्वामित्र के विरुद्ध फिर जो अग्नि संचित की, उसे स्कन्द ने निगल लिया। तब अर्जुन पूछते हैं कि राजा कल्माषपाद ने अपनी रानी को वसिष्ठ के पास क्यों नियुक्त किया, और गन्धर्व इसका कारण बताता है। शक्ति के शाप से वन में भटकते राजा ने पत्नी के साथ मिले एक ब्राह्मण को पकड़कर खा लिया; ब्राह्मणी ने उसे शाप दिया कि ऋतुकाल में अपनी पत्नी के पास जाते ही वह मर जाएगा, कहा कि वसिष्ठ से ही उसका वंश चलेगा, और अग्नि में प्रवेश कर गई। बहुत समय बाद शाप से मुक्त होने पर रानी मदयन्ती ने उसे वह शाप याद दिलाया, और इसी कारण राजा ने वसिष्ठ को रानी के लिए नियुक्त किया।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 1 (1.198.1)
पुनश्चैव महातेजा विश्वामित्रजिघांसया । अग्निं संभृतवान्घोरं शाक्तेयः सुमहातपाः ॥
punaścaiva mahātejā viśvāmitrajighāṃsayā | agniṃ saṃbhṛtavānghoraṃ śākteyaḥ sumahātapāḥ
फिर महातपस्वी, महातेजस्वी शक्तिपुत्र ने विश्वामित्र को मारने की इच्छा से एक भयंकर अग्नि संचित की।
श्लोक 2 (1.198.2)
वासिष्ठसंभृतश्चाग्निर्विश्वामित्रहितैषिणा । तेजसा वह्नितुल्येन ग्रस्तः स्कन्देन धीमता ॥
vāsiṣṭhasaṃbhṛtaścāgnirviśvāmitrahitaiṣiṇā | tejasā vahnitulyena grastaḥ skandena dhīmatā
किन्तु वसिष्ठवंशी द्वारा संचित उस अग्नि को विश्वामित्र के हितैषी बुद्धिमान स्कन्द ने अपने अग्नि-समान तेज से निगल लिया।
अर्जुन उवाच
श्लोक 3 (1.198.3)
राज्ञा कल्माषपादेन गुरौ ब्रह्मविदां वरे । कारणं किं पुरस्कृत्य भार्या वै सन्नियोजिता ॥
rājñā kalmāṣapādena gurau brahmavidāṃ vare | kāraṇaṃ kiṃ puraskṛtya bhāryā vai sanniyojitā
राजा कल्माषपाद ने ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ अपने गुरु के पास अपनी पत्नी को किस कारण से नियुक्त किया?
श्लोक 4 (1.198.4)
जानता वै परं धर्मं वसिष्ठेन महात्मना । अगम्यागमनं कस्मात्कृतं तेन महर्षिणा ॥
jānatā vai paraṃ dharmaṃ vasiṣṭhena mahātmanā | agamyāgamanaṃ kasmātkṛtaṃ tena maharṣiṇā
और परम धर्म को जानने वाले महात्मा महर्षि वसिष्ठ ने अगम्य स्त्री से समागम क्यों किया?
श्लोक 5 (1.198.5)
अधर्मिष्ठं वसिष्ठेन कृतं चापि पुरा सखे । एतन्मे संशयं सर्वं छेत्तुमर्हसि पृच्छतः ॥
adharmiṣṭhaṃ vasiṣṭhena kṛtaṃ cāpi purā sakhe | etanme saṃśayaṃ sarvaṃ chettumarhasi pṛcchataḥ
मित्र! प्राचीन काल में वसिष्ठ का यह कार्य अत्यन्त अधर्मपूर्ण लगता है। मैं पूछ रहा हूँ, मेरे इस सारे संशय को दूर करो।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 6 (1.198.6)
धनञ्जय निबोधेयं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । वसिष्ठं प्रति दुर्धर्ष तथा मित्रसहं नृपम् ॥
dhanañjaya nibodheyaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | vasiṣṭhaṃ prati durdharṣa tathā mitrasahaṃ nṛpam
हे दुर्धर्ष धनंजय! वसिष्ठ और राजा मित्रसह के विषय में तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, उसे सुनो।
श्लोक 7 (1.198.7)
कथितं ते मया सर्वं यथा शप्तः स पार्थिवः । शक्तिना भरतश्रेष्ठ वासिष्ठेन महात्मना ॥
kathitaṃ te mayā sarvaṃ yathā śaptaḥ sa pārthivaḥ | śaktinā bharataśreṣṭha vāsiṣṭhena mahātmanā
हे भरतश्रेष्ठ! वसिष्ठ के महात्मा पुत्र शक्ति ने उस राजा को कैसे शाप दिया, यह सब मैं तुम्हें बता चुका हूँ।
श्लोक 8 (1.198.8)
स तु शापवशं प्राप्तः क्रोधपर्याकुलेक्षणः । निर्जगाम पुराद्राजा सहदारः परन्तपः ॥
sa tu śāpavaśaṃ prāptaḥ krodhaparyākulekṣaṇaḥ | nirjagāma purādrājā sahadāraḥ parantapaḥ
शाप के वश में पड़कर, क्रोध से व्याकुल नेत्रों वाला वह शत्रुतापन राजा अपनी पत्नी के साथ नगर से निकल गया।
श्लोक 9 (1.198.9)
अरण्यं निर्जनं गत्वा सदारः परिचक्रमे । नानामृगगणाकीर्णं नानासत्त्वसमाकुलम् ॥
araṇyaṃ nirjanaṃ gatvā sadāraḥ paricakrame | nānāmṛgagaṇākīrṇaṃ nānāsattvasamākulam
निर्जन वन में जाकर वह पत्नी के साथ घूमने लगा—वह वन जो नाना प्रकार के मृगों के झुंडों से भरा और अनेक प्राणियों से व्याप्त था,
श्लोक 10 (1.198.10)
नानागुल्मलताच्छन्नं नानाद्रुमसमावृतम् । अरण्यं घोरसन्नादं शापग्रस्तः परिभ्रमन् ॥
nānāgulmalatācchannaṃ nānādrumasamāvṛtam | araṇyaṃ ghorasannādaṃ śāpagrastaḥ paribhraman
अनेक झाड़ियों और लताओं से ढँका, अनेक वृक्षों से घिरा और भयानक शब्दों से गूँजता हुआ था। शाप से ग्रस्त वह उसी वन में भटकता रहा।
श्लोक 11 (1.198.11)
स कदाचित्क्षुधाविष्टो मृगयन्भक्ष्यमात्मनः । ददर्श सुपरिक्लिष्टः कस्मिंश्चिन्निर्जने वने ॥
sa kadācitkṣudhāviṣṭo mṛgayanbhakṣyamātmanaḥ | dadarśa suparikliṣṭaḥ kasmiṃścinnirjane vane
एक दिन भूख से व्याकुल होकर अपने लिए भोजन खोजते हुए, अत्यन्त क्लेश में पड़े उस राजा ने वन के किसी निर्जन भाग में
श्लोक 12 (1.198.12)
ब्राह्मणं ब्राह्मणीं चैव मिथुनायोपसंगतौ । तौ तं वीक्ष्य सुवित्रस्तावकृतार्थौ प्रधावितौ ॥
brāhmaṇaṃ brāhmaṇīṃ caiva mithunāyopasaṃgatau | tau taṃ vīkṣya suvitrastāvakṛtārthau pradhāvitau
एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी को देखा, जो मैथुन के लिए एक-दूसरे से मिले थे। उसे देखकर वे दोनों अत्यन्त भयभीत हो, अपनी इच्छा अधूरी छोड़कर भाग चले।
श्लोक 13 (1.198.13)
तयोः प्रद्रवतोर्विप्रं जग्राह नृपतिर्बलात् । दृष्ट्वा गृहीतं भर्तारमथ ब्राह्मण्यभाषत ॥
tayoḥ pradravatorvipraṃ jagrāha nṛpatirbalāt | dṛṣṭvā gṛhītaṃ bhartāramatha brāhmaṇyabhāṣata
उनके भागते समय राजा ने बलपूर्वक ब्राह्मण को पकड़ लिया। पति को पकड़ा गया देखकर ब्राह्मणी बोली—
ब्राह्मण्युवाच
श्लोक 14 (1.198.14)
शृणु राजन्मम वचो यत्त्वां वक्ष्यामि सुव्रत । आदित्यवंशप्रभवस्त्वं हि लोके परिश्रुतः ॥
śṛṇu rājanmama vaco yattvāṃ vakṣyāmi suvrata | ādityavaṃśaprabhavastvaṃ hi loke pariśrutaḥ
हे सुव्रत राजन्! मैं तुमसे जो कहने जा रही हूँ, मेरी वह बात सुनो। तुम सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हो और संसार में प्रसिद्ध हो;
श्लोक 15 (1.198.15)
अप्रमत्तः स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतः । शापोपहत दुर्धर्ष न पापं कर्तुमर्हसि ॥
apramattaḥ sthito dharme guruśuśrūṣaṇe rataḥ | śāpopahata durdharṣa na pāpaṃ kartumarhasi
तुम सावधान होकर धर्म में स्थित रहते हो और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते हो। हे दुर्धर्ष! शाप से पीड़ित होने पर भी तुम्हें पाप नहीं करना चाहिए।
श्लोक 16 (1.198.16)
ऋतुकाले तु संप्राप्ते भर्तृव्यसनकर्शिता । अकृतार्था ह्यहं भर्त्रा प्रसवार्थं समागता ॥
ṛtukāle tu saṃprāpte bhartṛvyasanakarśitā | akṛtārthā hyahaṃ bhartrā prasavārthaṃ samāgatā
मेरा ऋतुकाल आया है, और पति के लिए आतुर मैं सन्तान के लिए उनसे मिली थी; मेरी कामना अभी अधूरी है।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 17 (1.198.17)
प्रसीद नृपतिश्रेष्ठ भर्ताऽयं मे विसृज्यताम् । एवं विक्रोशमानायास्तस्यास्तु स नृशंसवत् ॥
prasīda nṛpatiśreṣṭha bhartā'yaṃ me visṛjyatām | evaṃ vikrośamānāyāstasyāstu sa nṛśaṃsavat
"हे नृपश्रेष्ठ! प्रसन्न होइए, मेरे इस पति को छोड़ दीजिए।" वह इस प्रकार पुकारती ही रही, पर उस राजा ने निर्दय मनुष्य की भाँति
श्लोक 18 (1.198.18)
भर्तारं भक्षयामास व्याघ्रो मृगमिवेप्सितम् । तस्याः क्रोधाभिभूताया यान्यश्रूण्यपतन्भुवि ॥
bhartāraṃ bhakṣayāmāsa vyāghro mṛgamivepsitam | tasyāḥ krodhābhibhūtāyā yānyaśrūṇyapatanbhuvi
उसके पति को वैसे ही खा डाला जैसे बाघ अपने मनचाहे मृग को खा जाता है। क्रोध से अभिभूत उस ब्राह्मणी के जो आँसू धरती पर गिरे,
श्लोक 19 (1.198.19)
सोऽग्निः समभवद्दीप्तस्तं च देशं व्यदीपयत् । ततः सा शोकसंतप्ता भर्तृव्यसनकर्शिता ॥
so'gniḥ samabhavaddīptastaṃ ca deśaṃ vyadīpayat | tataḥ sā śokasaṃtaptā bhartṛvyasanakarśitā
वे प्रज्वलित अग्नि बन गए और उस सारे स्थान को जलाने लगे। तब शोक से सन्तप्त, पति के संकट से व्यथित
श्लोक 20 (1.198.20)
कल्माषपादं राजर्षिमशपद्ब्राह्मणी रुषा । यस्मान्ममाकृतार्थायास्त्वया क्षुद्र नृशंसवत् ॥
kalmāṣapādaṃ rājarṣimaśapadbrāhmaṇī ruṣā | yasmānmamākṛtārthāyāstvayā kṣudra nṛśaṃsavat
उस ब्राह्मणी ने रोष में आकर राजर्षि कल्माषपाद को शाप दिया— "अरे नीच! क्योंकि तुमने निर्दयता से, मेरी कामना पूरी होने से पहले ही,
ब्राह्मण्युवाच
श्लोक 21 (1.198.21)
प्रेक्षन्त्या भक्षितो मेऽद्य प्रियो भर्ता महायशाः । तस्मात्त्वमपि दुर्बुद्धे मच्छापपरिविक्षतः ॥
prekṣantyā bhakṣito me'dya priyo bhartā mahāyaśāḥ | tasmāttvamapi durbuddhe macchāpaparivikṣataḥ
आज मेरे देखते-देखते मेरे प्रिय, यशस्वी पति को खा डाला, इसलिए हे दुर्बुद्धि! मेरे शाप से आहत होकर तुम भी
गन्धर्व उवाच
श्लोक 22 (1.198.22)
पत्नीमृतावनुप्राप्य सद्यस्त्यक्ष्यसि जीवितम् । तेन प्रसाद्यमाना सा प्रसादमकरोत्तदा । यस्य चर्षेर्वसिष्ठस्य त्वया पुत्रा विनाशिताः ॥
patnīmṛtāvanuprāpya sadyastyakṣyasi jīvitam | tena prasādyamānā sā prasādamakarottadā | yasya carṣervasiṣṭhasya tvayā putrā vināśitāḥ
"ऋतुकाल में अपनी पत्नी के पास जाते ही तुरन्त प्राण त्याग दोगे।" (राजा के मनाने पर उसने तब कुछ अनुग्रह किया।) "जिन महर्षि वसिष्ठ के पुत्रों को तुमने नष्ट किया है,
ब्राह्मण्युवाच
श्लोक 23 (1.198.23)
तेन संगम्य ते भार्या तनयं जनयिष्यति । स ते वंशकरः पुत्रो भविष्यति नृपाधम ॥
tena saṃgamya te bhāryā tanayaṃ janayiṣyati | sa te vaṃśakaraḥ putro bhaviṣyati nṛpādhama
उन्हीं से समागम करके तुम्हारी पत्नी पुत्र को जन्म देगी। हे नृपाधम! वही पुत्र तुम्हारे वंश को चलाने वाला होगा।
गन्धर्व उवाच
श्लोक 24 (1.198.24)
एवं शप्त्वा तु राजानं सा तमाङ्गिरसी शुभा । तस्यैव सन्निधौ दीप्तं प्रविवेश हुताशनम् ॥
evaṃ śaptvā tu rājānaṃ sā tamāṅgirasī śubhā | tasyaiva sannidhau dīptaṃ praviveśa hutāśanam
इस प्रकार राजा को शाप देकर वह शुभलक्षणा आंगिरसी उसी के सामने प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गई।
श्लोक 25 (1.198.25)
वसिष्ठश्च महाभागः सर्वमेतदवैक्षत । ज्ञानयोगेन महता तपसा च परन्तप ॥
vasiṣṭhaśca mahābhāgaḥ sarvametadavaikṣata | jñānayogena mahatā tapasā ca parantapa
हे परंतप! महाभाग वसिष्ठ ने अपने महान् ज्ञानयोग और तप से यह सब देख लिया।
श्लोक 26 (1.198.26)
मुक्तशापश्च राजर्षिः कालेन महता ततः । ऋतुकालेऽभिपतितो मदयन्त्या निवारितः ॥
muktaśāpaśca rājarṣiḥ kālena mahatā tataḥ | ṛtukāle'bhipatito madayantyā nivāritaḥ
बहुत समय के बाद वह राजर्षि शाप से मुक्त हुआ। ऋतुकाल में जब वह रानी के पास गया, तो मदयन्ती ने उसे रोक दिया।
श्लोक 27 (1.198.27)
न हि सस्मार स नृपस्तं शापं काममोहितः । देव्याः सोऽथ वचः श्रुत्वा संभ्रान्तो नृपसत्तमः ॥
na hi sasmāra sa nṛpastaṃ śāpaṃ kāmamohitaḥ | devyāḥ so'tha vacaḥ śrutvā saṃbhrānto nṛpasattamaḥ
क्योंकि काम से मोहित उस राजा को वह शाप स्मरण नहीं रहा था। रानी की बात सुनकर वह नृपश्रेष्ठ घबरा गया;
श्लोक 28 (1.198.28)
तं शापमनुसंस्मृत्य पर्यतप्यद्भृशं तदा । एतस्मात्कारणाद्राजा वसिष्ठं सन्ययोजयत् । स्वदारेषु नरश्रेष्ठ शापदोषसमन्वितः ॥
taṃ śāpamanusaṃsmṛtya paryatapyadbhṛśaṃ tadā | etasmātkāraṇādrājā vasiṣṭhaṃ sanyayojayat | svadāreṣu naraśreṣṭha śāpadoṣasamanvitaḥ
उस शाप को याद करके वह तब अत्यन्त सन्तप्त हुआ। हे नरश्रेष्ठ! इसी कारण शाप-दोष से युक्त राजा ने अपनी पत्नी के लिए वसिष्ठ को नियुक्त किया।