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आदि पर्व · अध्याय 20

कद्रू और विनता की बाज़ी

मन्थन की कथा पूरी करके सौति बताते हैं कि कद्रू और विनता उच्चैःश्रवा घोड़े के रंग पर विवाद करती हैं और अपनी स्वतन्त्रता की बाज़ी लगाती हैं। कद्रू अपने सहस्र सर्प-पुत्रों को घोड़े की पूँछ में काले बाल बन जाने की आज्ञा देती है और जो नहीं मानते उन्हें जनमेजय के सर्पसत्र में जलने का शाप देती है। सर्पों की अधिकता और उनके तीव्र विष को देखकर ब्रह्मा इस शाप का अनुमोदन करते हैं, कश्यप को सान्त्वना देते हैं और उन्हें विष हरने वाली विद्या प्रदान करते हैं। कर्कोटक काले बाल बनकर घोड़े की पूँछ में छिपने को तैयार हो जाता है।

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.20.1)

एतत्ते कथितं सर्वममृतं मथितं यथा । यत्र सोऽश्वः समुत्पन्नः श्रीमानतुलविक्रमः ॥

etatte kathitaṃ sarvamamṛtaṃ mathitaṃ yathā | yatra so'śvaḥ samutpannaḥ śrīmānatulavikramaḥ

इस प्रकार मैंने तुम्हें वह सारा वृत्तान्त सुना दिया कि अमृत का मन्थन कैसे हुआ, जिसमें वह अतुल पराक्रमी, शोभायमान अश्व उत्पन्न हुआ था।

श्लोक 2 (1.20.2)

तं निशाम्य तदा कद्रूर्विनतामिदमब्रवीत् । उच्चैःश्रवा हि किंवर्णो भद्रे प्रब्रूहि मा चिरम् ॥

taṃ niśāmya tadā kadrūrvinatāmidamabravīt | uccaiḥśravā hi kiṃvarṇo bhadre prabrūhi mā ciram

उस अश्व को देखकर कद्रू ने तब विनता से कहा — "भद्रे, शीघ्र बताओ, उच्चैःश्रवा किस रंग का है?"

विनतोवाच

श्लोक 3 (1.20.3)

श्वेत एवाश्वराजोऽयं किं वा त्वं मन्यसे शुभे । ब्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततोऽत्र विपणावहे ॥

śveta evāśvarājo'yaṃ kiṃ vā tvaṃ manyase śubhe | brūhi varṇaṃ tvamapyasya tato'tra vipaṇāvahe

यह अश्वराज तो श्वेत ही है। अथवा, शुभे, तुम क्या समझती हो? तुम भी इसका रंग बताओ, फिर हम इस पर बाज़ी लगाएँ।

कद्रूरुवाच

श्लोक 4 (1.20.4)

कृष्णवालमहं मन्ये हयमेनं शुचिस्मिते । एहि सार्धं मया दीव्य दासीभावाय भामिनि ॥

kṛṣṇavālamahaṃ manye hayamenaṃ śucismite | ehi sārdhaṃ mayā dīvya dāsībhāvāya bhāmini

हे मधुर मुस्कान वाली, मैं समझती हूँ कि इस घोड़े की पूँछ काली है। आओ भामिनि, दासी बनने की शर्त पर मेरे साथ बाज़ी लगाओ।

सौतिरुवाच

श्लोक 5 (1.20.5)

एवं ते समयं कृत्वा दासीभावाय वै मिथः । जग्मतुः स्वगृहानेव श्वो द्रक्ष्याव इति स्म ह ॥

evaṃ te samayaṃ kṛtvā dāsībhāvāya vai mithaḥ | jagmatuḥ svagṛhāneva śvo drakṣyāva iti sma ha

इस प्रकार दासी बनने की शर्त पर आपस में समझौता करके वे दोनों यह कहती हुई अपने-अपने घर चली गईं कि "कल देखेंगी।"

श्लोक 6 (1.20.6)

ततः पुत्रसहस्रं तु कद्रूर्जिह्मं चिकीर्षती । आज्ञापयामास तदा वाला भूत्वाऽञ्जनप्रभाः ॥

tataḥ putrasahasraṃ tu kadrūrjihmaṃ cikīrṣatī | ājñāpayāmāsa tadā vālā bhūtvā'ñjanaprabhāḥ

तब छल करने की इच्छा से कद्रू ने अपने सहस्र पुत्रों को आज्ञा दी कि वे अंजन जैसी काली आभा वाले बाल बन जाएँ

श्लोक 7 (1.20.7)

आविशध्वं हयं क्षिप्रं दासी न स्यामहं यथा । नावपद्यन्त ये वाक्यं ताञ्शशाप भुजंगमान् ॥

āviśadhvaṃ hayaṃ kṣipraṃ dāsī na syāmahaṃ yathā | nāvapadyanta ye vākyaṃ tāñśaśāpa bhujaṃgamān

"और शीघ्र ही उस घोड़े में प्रवेश कर जाओ, जिससे मैं दासी न बनूँ।" जिन सर्पों ने उसकी बात नहीं मानी, उन्हें उसने शाप दिया —

श्लोक 8 (1.20.8)

सर्पसत्रे वर्तमाने पावको वः प्रधक्ष्यति । जनमेजयस्य राजर्षेः पाण्डवेयस्य धीमतः ॥

sarpasatre vartamāne pāvako vaḥ pradhakṣyati | janamejayasya rājarṣeḥ pāṇḍaveyasya dhīmataḥ

"पाण्डववंशी बुद्धिमान राजर्षि जनमेजय के सर्पसत्र में अग्नि तुम्हें जला डालेगी।"

श्लोक 9 (1.20.9)

शापमेनं तु शुश्राव स्वयमेव पितामहः । अतिक्रूरं समुत्सृष्टं कद्र्वा दैवादतीव हि ॥

śāpamenaṃ tu śuśrāva svayameva pitāmahaḥ | atikrūraṃ samutsṛṣṭaṃ kadrvā daivādatīva hi

पितामह ब्रह्मा ने स्वयं यह शाप सुना, जिसे कद्रू ने मानो दैववश अत्यन्त क्रूरता से दिया था।

श्लोक 10 (1.20.10)

सार्धं देवगणैः सर्वैर्वाचं तामन्वमोदत । बहुत्वं प्रेक्ष्य सर्पाणां प्रजानां हितकाम्यया ॥

sārdhaṃ devagaṇaiḥ sarvairvācaṃ tāmanvamodata | bahutvaṃ prekṣya sarpāṇāṃ prajānāṃ hitakāmyayā

समस्त देवगणों के साथ उन्होंने उस वचन का अनुमोदन किया, क्योंकि उन्होंने सर्पों की बहुत बड़ी संख्या देखी थी और वे प्रजा का हित चाहते थे।

श्लोक 11 (1.20.11)

तिग्मवीर्यविषा ह्येते दन्दशूका महाबलाः । तेषां तीक्ष्णविषत्वाद्धि प्रजानां च हिताय च ॥

tigmavīryaviṣā hyete dandaśūkā mahābalāḥ | teṣāṃ tīkṣṇaviṣatvāddhi prajānāṃ ca hitāya ca

क्योंकि ये डसने वाले सर्प प्रचण्ड पराक्रम और तीव्र विष वाले हैं; उनके तीखे विष के कारण और प्रजा के हित के लिए भी,

श्लोक 12 (1.20.12)

युक्तं मात्रा कृतं तेषां परपीडोपसर्पिणाम् । अन्येषामपि सत्त्वानां नित्यं दोषपरास्तु ये ॥

yuktaṃ mātrā kṛtaṃ teṣāṃ parapīḍopasarpiṇām | anyeṣāmapi sattvānāṃ nityaṃ doṣaparāstu ye

दूसरों को पीड़ा देने के लिए रेंगने वाले उन सर्पों के साथ माता ने जो किया, वह उचित ही था। अन्य प्राणियों में भी जो सदा दोष करने में लगे रहते हैं,

श्लोक 13 (1.20.13)

तेषां प्राणान्तिको दण्डो दैवेन विनिपात्यते । एवं संभाष्य देवस्तु पूज्य कद्रूं च तां तदा ॥

teṣāṃ prāṇāntiko daṇḍo daivena vinipātyate | evaṃ saṃbhāṣya devastu pūjya kadrūṃ ca tāṃ tadā

उन पर दैव प्राणान्तक दण्ड गिराता है। ऐसा कहकर देव ब्रह्मा ने तब कद्रू का सम्मान किया

श्लोक 14 (1.20.14)

आहूय कश्यपं देव इदं वचनमब्रवीत् । यदेते दन्दशूकाश्च सर्पा जातास्त्वयानघ ॥

āhūya kaśyapaṃ deva idaṃ vacanamabravīt | yadete dandaśūkāśca sarpā jātāstvayānagha

और कश्यप को बुलाकर उन देव ने यह वचन कहा — "हे निष्पाप, तुमसे उत्पन्न ये डसने वाले सर्प,

श्लोक 15 (1.20.15)

विषोल्बणा महाभोगा मात्रा शप्ताः परंतप । तत्र मन्युस्त्वया तात न कर्तव्यः कथंचन ॥

viṣolbaṇā mahābhogā mātrā śaptāḥ paraṃtapa | tatra manyustvayā tāta na kartavyaḥ kathaṃcana

जो उग्र विष और विशाल शरीर वाले हैं, हे परंतप, अपनी माता द्वारा शापित हुए हैं। तात, इस पर तुम किसी प्रकार भी क्रोध न करना।

श्लोक 16 (1.20.16)

दृष्टं पुरातनं ह्येतद्यज्ञे सर्पविनाशनम् । इत्युक्त्वा सृष्टिकृद्देवस्तं प्रसाद्य प्रजापतिम् । प्रादाद्विषहरीं विद्यां कश्यपाय महात्मने ॥

dṛṣṭaṃ purātanaṃ hyetadyajñe sarpavināśanam | ityuktvā sṛṣṭikṛddevastaṃ prasādya prajāpatim | prādādviṣaharīṃ vidyāṃ kaśyapāya mahātmane

यज्ञ में सर्पों का यह विनाश बहुत पहले से देखा हुआ है।" यह कहकर सृष्टिकर्ता देव ने उन प्रजापति को प्रसन्न किया और महात्मा कश्यप को विष हरने वाली विद्या प्रदान की।

श्लोक 17 (1.20.17)

एवं शप्तेषु नागेषु कद्र्वातु द्विजसत्तम । उद्विग्नः शापतस्तस्याः कद्रूं कर्कोटकोऽब्रवीत् ॥

evaṃ śapteṣu nāgeṣu kadrvātu dvijasattama | udvignaḥ śāpatastasyāḥ kadrūṃ karkoṭako'bravīt

हे द्विजश्रेष्ठ, जब कद्रू ने नागों को इस प्रकार शाप दे दिया, तब उसके शाप से उद्विग्न होकर कर्कोटक ने कद्रू से कहा।

श्लोक 18 (1.20.18)

मातरं परमप्रीतस्तथा भुजगसत्तमः । आविश्य वाजिनं मुख्यं बालो भूत्वाञ्जनप्रभः ॥

mātaraṃ paramaprītastathā bhujagasattamaḥ | āviśya vājinaṃ mukhyaṃ bālo bhūtvāñjanaprabhaḥ

उस श्रेष्ठ सर्प ने अत्यन्त प्रेम से अपनी माता से कहा — "मैं अंजन जैसी काली आभा वाला बाल बनकर उस श्रेष्ठ अश्व में प्रवेश करूँगा

श्लोक 19 (1.20.19)

दर्शयिष्यामि तत्राहमात्मानं काममाश्वस । एवमस्त्विति सा पुत्रं प्रत्युवाच यशस्विनी ॥

darśayiṣyāmi tatrāhamātmānaṃ kāmamāśvasa | evamastviti sā putraṃ pratyuvāca yaśasvinī

और वहाँ स्वयं को दिखाऊँगा। तुम निश्चिन्त रहो।" उस यशस्विनी ने अपने पुत्र को उत्तर दिया — "ऐसा ही हो।"

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