आदि पर्व · अध्याय 200
द्रुपद का प्रण और द्रौपदी का रंगभूमि में आगमन
पांचाल जाते हुए मार्ग में पाण्डवों को व्यास के दर्शन होते हैं; फिर वे एक कुम्हार की शाला में ठहरकर भिक्षा पर रहते हैं और कोई उन्हें पहचान नहीं पाता। मन ही मन द्रौपदी को अर्जुन को देकर भीष्म और द्रोण के विरुद्ध बलवान दामाद पाने की इच्छा रखने वाले द्रुपद एक कठोर धनुष और आकाश में टँगा यन्त्र तथा स्वर्ण-लक्ष्य बनवाकर स्वयंवर की घोषणा करते हैं। राजा, ऋषि, कर्ण सहित कौरव और वासुदेव सहित यादव एक भव्य रंगभूमि में एकत्र होते हैं; पाण्डव ब्राह्मणों के बीच बैठते हैं। सोलहवें दिन द्रौपदी को स्नान कराकर, सजाकर शोभायात्रा के साथ लाया जाता है, और धृष्टद्युम्न घोषणा करता है कि जो यन्त्र के छिद्र से पाँच बाणों द्वारा लक्ष्य बेधेगा, वही उसकी बहन को पाएगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.200.1)
ततस्ते नरशार्दूला भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः । तं ब्राह्मणं पुरस्कृत्य पाञ्चाल्याश्च स्वयंवरम् । प्रययुर्द्रौपदीं द्रष्टुं तं च देशं महोत्सवम् ॥
tataste naraśārdūlā bhrātaraḥ pañca pāṇḍavāḥ | taṃ brāhmaṇaṃ puraskṛtya pāñcālyāśca svayaṃvaram | prayayurdraupadīṃ draṣṭuṃ taṃ ca deśaṃ mahotsavam
तब वे नरश्रेष्ठ पाँचों पाण्डव भाई उस ब्राह्मण (धौम्य) को आगे करके पांचाल-राजकुमारी के स्वयंवर की ओर, द्रौपदी को और उस महोत्सव वाले देश को देखने चल पड़े।
श्लोक 2 (1.200.2)
ततस्ते तं महात्मानं शुद्धात्मानमकल्मषम् । ददृशुः पाण्डवा वीराः पथि द्वैपायनं तदा ॥
tataste taṃ mahātmānaṃ śuddhātmānamakalmaṣam | dadṛśuḥ pāṇḍavā vīrāḥ pathi dvaipāyanaṃ tadā
तब मार्ग में उन वीर पाण्डवों ने शुद्धात्मा, निष्पाप महात्मा द्वैपायन (व्यास) के दर्शन किए।
श्लोक 3 (1.200.3)
तस्मै यथावत्सत्कारं कृत्वा तेन च सत्कृताः । कथान्ते चाभ्यनुज्ञाताः प्रययुर्द्रुपदक्षयम् ॥
tasmai yathāvatsatkāraṃ kṛtvā tena ca satkṛtāḥ | kathānte cābhyanujñātāḥ prayayurdrupadakṣayam
उन्होंने यथोचित रीति से उनका सत्कार किया और उनसे सत्कार पाया; वार्तालाप समाप्त होने पर उनकी आज्ञा लेकर वे द्रुपद के निवास की ओर चल पड़े।
श्लोक 4 (1.200.4)
पश्यन्तो रमणीयानि वनानि च सरांसि च । तत्रतत्र वसन्तश्च शनैर्जग्मुर्महारथाः ॥
paśyanto ramaṇīyāni vanāni ca sarāṃsi ca | tatratatra vasantaśca śanairjagmurmahārathāḥ
रमणीय वनों और सरोवरों को देखते हुए, जहाँ-तहाँ ठहरते हुए वे महारथी धीरे-धीरे आगे बढ़े।
श्लोक 5 (1.200.5)
स्वाध्यायवन्तः शुचयो मधुराः प्रियवादिनः । आनुपूर्व्येण संप्राप्ताः पाञ्चालान्पाण्डुनन्दनाः ॥
svādhyāyavantaḥ śucayo madhurāḥ priyavādinaḥ | ānupūrvyeṇa saṃprāptāḥ pāñcālānpāṇḍunandanāḥ
स्वाध्याय में लगे, पवित्र, मधुर स्वभाव वाले और प्रिय बोलने वाले पाण्डुपुत्र क्रमशः पांचाल देश में पहुँच गए।
श्लोक 6 (1.200.6)
ते तु दृष्ट्वा पुरं तच्च स्कन्धावारं च पाण्डवाः । कुम्भकारस्य शालायां निवासं चक्रिरे तदा ॥
te tu dṛṣṭvā puraṃ tacca skandhāvāraṃ ca pāṇḍavāḥ | kumbhakārasya śālāyāṃ nivāsaṃ cakrire tadā
नगर और छावनी को देखकर पाण्डवों ने एक कुम्हार की शाला में निवास किया।
श्लोक 7 (1.200.7)
तत्र भैक्षं समाजह्रुर्ब्राह्मणीं वृत्तिमाश्रिताः । तान्संप्राप्तांस्तथा वीराञ्जज्ञिरे न नराः क्वचित् ॥
tatra bhaikṣaṃ samājahrurbrāhmaṇīṃ vṛttimāśritāḥ | tānsaṃprāptāṃstathā vīrāñjajñire na narāḥ kvacit
वहाँ वे ब्राह्मणों की वृत्ति अपनाकर भिक्षा लाते थे; इस प्रकार आए हुए उन वीरों को कहीं किसी ने नहीं पहचाना।
श्लोक 8 (1.200.8)
यज्ञसेनस्तु पाञ्चालो भीष्मद्रोणकृतागसम् । ज्ञात्वाऽऽत्मानं तदारेभे त्राणायात्मक्रियां क्षमाम् ॥
yajñasenastu pāñcālo bhīṣmadroṇakṛtāgasam | jñātvā''tmānaṃ tadārebhe trāṇāyātmakriyāṃ kṣamām
पांचालराज यज्ञसेन (द्रुपद) यह जानकर कि उसने भीष्म और द्रोण का अपराध किया है, अपनी रक्षा के लिए समुचित उपाय करने लगा था।
श्लोक 9 (1.200.9)
अवाप्य धृष्टद्युम्नं हि न स द्रोणमचिन्तयत् । स तु वैरप्रसङ्गाच्च भीष्माद्भयमचिन्तयत् ॥
avāpya dhṛṣṭadyumnaṃ hi na sa droṇamacintayat | sa tu vairaprasaṅgācca bhīṣmādbhayamacintayat
धृष्टद्युम्न को पा लेने पर उसे द्रोण की चिन्ता नहीं रही; किन्तु वैर के कारण वह भीष्म से भय की बात सोचता रहता था।
श्लोक 10 (1.200.10)
कन्यादानात्तु शरणं सोऽमन्यत महीपतिः । यज्ञसेनस्य कामस्तु पाण्डवाय किरीटिने ॥
kanyādānāttu śaraṇaṃ so'manyata mahīpatiḥ | yajñasenasya kāmastu pāṇḍavāya kirīṭine
उस राजा ने कन्यादान में ही अपनी शरण मानी। यज्ञसेन की इच्छा थी कि किरीटधारी पाण्डव अर्जुन को
श्लोक 11 (1.200.11)
दास्यामि कृष्णामिति वै न चैनं विवृणोति सः । जामातृबलसंयोगं मेने हि बलवत्तरम् ॥
dāsyāmi kṛṣṇāmiti vai na cainaṃ vivṛṇoti saḥ | jāmātṛbalasaṃyogaṃ mene hi balavattaram
'मैं कृष्णा उसी को दूँगा'—किन्तु वह इसे प्रकट नहीं करता था। क्योंकि वह दामाद के बल के साथ गठबन्धन को ही अधिक प्रबल मानता था।
श्लोक 12 (1.200.12)
सोऽन्वेषमाणः कौन्तेयान्पाञ्चालो जनमेजय । दृढं धनुरथानम्यं कारयामास भारत ॥
so'nveṣamāṇaḥ kaunteyānpāñcālo janamejaya | dṛḍhaṃ dhanurathānamyaṃ kārayāmāsa bhārata
हे जनमेजय! कुन्तीपुत्रों को खोजते हुए पांचालराज ने, हे भारत, एक ऐसा दृढ़ धनुष बनवाया जिसे झुकाया न जा सके।
श्लोक 13 (1.200.13)
वैयाघ्रपद्यस्योग्रं वै सृञ्जयस्य महीपतिः । तद्धनुः किन्धुरं नाम देवदत्तमुपानयत् ॥
vaiyāghrapadyasyograṃ vai sṛñjayasya mahīpatiḥ | taddhanuḥ kindhuraṃ nāma devadattamupānayat
राजा ने व्याघ्रपाद के वंशज सृंजय का वह भयंकर, देवताओं का दिया हुआ किन्धुर नामक धनुष मँगवाया।
श्लोक 14 (1.200.14)
आयसी तस्य च ज्याऽऽसीत्प्रतिबद्धा महाबला । न तु ज्यां प्रसहेदन्यस्तद्धनुःप्रवरं महत् ॥
āyasī tasya ca jyā''sītpratibaddhā mahābalā | na tu jyāṃ prasahedanyastaddhanuḥpravaraṃ mahat
उसकी प्रत्यंचा लोहे की थी, उसमें बँधी हुई और अत्यन्त प्रबल; उस महान् श्रेष्ठ धनुष की प्रत्यंचा को कोई दूसरा सँभाल नहीं सकता था।
श्लोक 15 (1.200.15)
शङ्करेण वरं दत्तं प्रीतेन च महात्मना । तन्निष्फलं स्यान्न तु मे इति प्रामाण्यमागतः ॥
śaṅkareṇa varaṃ dattaṃ prītena ca mahātmanā | tanniṣphalaṃ syānna tu me iti prāmāṇyamāgataḥ
'प्रसन्न होकर महात्मा शंकर ने जो वर दिया है, वह मेरे लिए निष्फल नहीं होना चाहिए'—इसी पर उसने भरोसा किया।
श्लोक 16 (1.200.16)
मया कर्तव्यमधुना दुष्करं लक्ष्यवेधनम् । इति निश्चित्य मनसा कारितं लक्ष्यमुत्तमम् ॥
mayā kartavyamadhunā duṣkaraṃ lakṣyavedhanam | iti niścitya manasā kāritaṃ lakṣyamuttamam
'अब मुझे कठिन लक्ष्यवेध की व्यवस्था करनी चाहिए'—मन में ऐसा निश्चय करके उसने एक उत्तम लक्ष्य बनवाया।
श्लोक 17 (1.200.17)
यन्त्रं वैहायसं चापि कारयामास कृत्रिमम् । तेन यन्त्रेण सहितं राजँल्लक्ष्यं च काञ्चनम् ॥
yantraṃ vaihāyasaṃ cāpi kārayāmāsa kṛtrimam | tena yantreṇa sahitaṃ rājam̐llakṣyaṃ ca kāñcanam
उसने आकाश में टँगा हुआ एक कृत्रिम यन्त्र भी बनवाया, और हे राजन्, उस यन्त्र के साथ एक स्वर्णिम लक्ष्य भी।
द्रुपद उवाच
श्लोक 18 (1.200.18)
इदं सज्यं धनुः कृत्वा सज्जैरेभिश्च सायकैः । अतीत्य लक्ष्यं यो वेद्धा स लब्धा मत्सुतामिति ॥
idaṃ sajyaṃ dhanuḥ kṛtvā sajjairebhiśca sāyakaiḥ | atītya lakṣyaṃ yo veddhā sa labdhā matsutāmiti
जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर इन तैयार बाणों से यन्त्र को पार करते हुए लक्ष्य को बेध देगा, वही मेरी पुत्री को प्राप्त करेगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (1.200.19)
इति स द्रुपदो राजा स्वयंवरमघोषयत् । तच्छ्रुत्वा पार्थिवाः सर्वे समीयुस्तत्र भारत ॥
iti sa drupado rājā svayaṃvaramaghoṣayat | tacchrutvā pārthivāḥ sarve samīyustatra bhārata
इस प्रकार राजा द्रुपद ने स्वयंवर की घोषणा की। हे भारत! यह सुनकर सब राजा वहाँ एकत्र हुए,
श्लोक 20 (1.200.20)
ऋषयश्च महात्मानः स्वयंवरदिदृक्षवः । दुर्योधनपुरोगाश्च सकर्णाः कुरवो नृप ॥
ṛṣayaśca mahātmānaḥ svayaṃvaradidṛkṣavaḥ | duryodhanapurogāśca sakarṇāḥ kuravo nṛpa
स्वयंवर देखने के इच्छुक महात्मा ऋषि भी, और हे नृप, कर्ण के साथ दुर्योधन आदि कौरव भी;
श्लोक 21 (1.200.21)
यादवा वासुदेवेन सार्धमन्धकवृष्णयः । ततोऽर्चिता राजगणा द्रुपदेन महात्मना ॥
yādavā vāsudevena sārdhamandhakavṛṣṇayaḥ | tato'rcitā rājagaṇā drupadena mahātmanā
वासुदेव (श्रीकृष्ण) के साथ यादव, अन्धक और वृष्णि भी आए। तब महात्मा द्रुपद द्वारा सम्मानित वे राजसमूह
श्लोक 22 (1.200.22)
उपोपविष्टा मञ्चेषु द्रष्टुकामाः स्वयंवरम् । ब्राह्मणाश्च महाभागा देशेभ्यः समुपागमन् ॥
upopaviṣṭā mañceṣu draṣṭukāmāḥ svayaṃvaram | brāhmaṇāśca mahābhāgā deśebhyaḥ samupāgaman
स्वयंवर देखने की इच्छा से मंचों पर बैठ गए। अनेक देशों से महाभाग ब्राह्मण भी आए।
श्लोक 23 (1.200.23)
ब्राह्मणैरेव सहिताः पाण्डवाः समुपाविशन् । त्रयस्त्रिंशत्सुराः सर्वे विमानैर्व्योम्न्यवस्थिताः ॥
brāhmaṇaireva sahitāḥ pāṇḍavāḥ samupāviśan | trayastriṃśatsurāḥ sarve vimānairvyomnyavasthitāḥ
पाण्डव ब्राह्मणों के साथ ही बैठ गए। तैंतीसों देवता अपने विमानों पर आकाश में स्थित थे।
श्लोक 24 (1.200.24)
ततः पौरजनाः सर्वे सागरोद्धूतनिःस्वनाः । शिंशुमारशिरः प्राप्य न्यविशंस्ते स्म पार्थिवाः ॥
tataḥ paurajanāḥ sarve sāgaroddhūtaniḥsvanāḥ | śiṃśumāraśiraḥ prāpya nyaviśaṃste sma pārthivāḥ
तब सागर की उमड़ती लहरों जैसा कोलाहल करते सब नगरवासी और वे राजा शिंशुमार के शिरोभाग, अर्थात् ईशान दिशा की ओर पहुँचकर बैठ गए।
श्लोक 25 (1.200.25)
प्रागुत्तरेण नगराद्भूमिभागे समे शुभे । समाजवाटः शुशुभे भवनैः सर्वतो वृतः ॥
prāguttareṇa nagarādbhūmibhāge same śubhe | samājavāṭaḥ śuśubhe bhavanaiḥ sarvato vṛtaḥ
नगर के ईशान कोण में समतल और शुभ भूमि पर वह सभा-मण्डप चारों ओर भवनों से घिरा हुआ शोभा पा रहा था।
श्लोक 26 (1.200.26)
प्राकारपरिखोपेतो द्वारतोरणमण्डितः । वितानेन विचित्रेण सर्वतः समलङ्कृतः ॥
prākāraparikhopeto dvāratoraṇamaṇḍitaḥ | vitānena vicitreṇa sarvataḥ samalaṅkṛtaḥ
वह परकोटे और खाई से युक्त, द्वारों और तोरणों से सुशोभित तथा रंग-बिरंगे वितान से चारों ओर अलंकृत था।
श्लोक 27 (1.200.27)
तूर्यौघशतसङ्कीर्णः परार्ध्यागुरुधूपितः । चन्दनोदकसिक्तश्च माल्यदामोपशोभितः ॥
tūryaughaśatasaṅkīrṇaḥ parārdhyāgurudhūpitaḥ | candanodakasiktaśca mālyadāmopaśobhitaḥ
वह सैकड़ों वाद्यों के स्वर से भरा था, बहुमूल्य अगुरु के धूप से सुगन्धित, चन्दन-जल से सिंचित और मालाओं से सुशोभित था।
श्लोक 28 (1.200.28)
कैलासशिखरप्रख्यैर्नभस्तलविलेखिभिः । सर्वतः संवृतः शुभ्रैः प्रासादैः सुकृतोच्छ्रयैः ॥
kailāsaśikharaprakhyairnabhastalavilekhibhiḥ | sarvataḥ saṃvṛtaḥ śubhraiḥ prāsādaiḥ sukṛtocchrayaiḥ
वह चारों ओर कैलास-शिखर के समान, आकाश को छूते हुए, सुन्दर ढंग से बने ऊँचे और उज्ज्वल प्रासादों से घिरा था,
श्लोक 29 (1.200.29)
सुवर्णजालसंवीतैर्मणिकुट्टिमभूषणैः । सुखारोहणसोपानैर्महासनपरिच्छदैः ॥
suvarṇajālasaṃvītairmaṇikuṭṭimabhūṣaṇaiḥ | sukhārohaṇasopānairmahāsanaparicchadaiḥ
जिनमें सोने की जालियाँ थीं, मणियों से जड़े फर्श थे, सरलता से चढ़ी जा सकने वाली सीढ़ियाँ थीं और बड़े-बड़े आसन व साज-सज्जा थी;
श्लोक 30 (1.200.30)
स्रग्दामसमवच्छन्नैरगुरूत्तमवासितैः । हंसांशुवर्णैर्बहुभिरायोजनसुगन्धिभिः ॥
sragdāmasamavacchannairagurūttamavāsitaiḥ | haṃsāṃśuvarṇairbahubhirāyojanasugandhibhiḥ
जो मालाओं से ढँके, उत्तम अगुरु से सुवासित, हंस के समान श्वेत कान्ति वाले, संख्या में अनेक थे और जिनकी सुगन्ध एक योजन तक फैलती थी;
श्लोक 31 (1.200.31)
असंबाधशतद्वारैः शयनासनशोभितैः । बहुधातुपिनद्धाङ्गैर्हिमवच्छिखरैरिव ॥
asaṃbādhaśatadvāraiḥ śayanāsanaśobhitaiḥ | bahudhātupinaddhāṅgairhimavacchikharairiva
जिनमें सैकड़ों खुले द्वार थे, जो शय्याओं और आसनों से सुशोभित थे, और अनेक धातुओं से मढ़े हुए वे हिमालय के शिखरों जैसे लगते थे।
श्लोक 32 (1.200.32)
तत्र नानाप्रकारेषु विमानेषु स्वलङ्कृताः । स्पर्धमानास्तदाऽन्योन्यं निषेदुः सर्वपार्थिवाः ॥
tatra nānāprakāreṣu vimāneṣu svalaṅkṛtāḥ | spardhamānāstadā'nyonyaṃ niṣeduḥ sarvapārthivāḥ
वहाँ अनेक प्रकार के भवनों में सुसज्जित होकर सब राजा एक-दूसरे से होड़ करते हुए बैठ गए।
श्लोक 33 (1.200.33)
तत्रोपविष्टान्ददृशुर्महासत्त्वान्पृथग्जनाः । राजसिंहान्महाभागान्कृष्णागुरुविभूषितान् ॥
tatropaviṣṭāndadṛśurmahāsattvānpṛthagjanāḥ | rājasiṃhānmahābhāgānkṛṣṇāguruvibhūṣitān
साधारण जनों ने वहाँ बैठे उन महान् सत्त्व वाले, महाभाग, काले अगुरु से विभूषित राजसिंहों को देखा,
श्लोक 34 (1.200.34)
महाप्रसादान्ब्रह्मण्यान्स्वराष्ट्रपरिरक्षिणः । प्रियान्सर्वस्य लोकस्य सुकृतैः कर्मभिः शुभैः ॥
mahāprasādānbrahmaṇyānsvarāṣṭraparirakṣiṇaḥ | priyānsarvasya lokasya sukṛtaiḥ karmabhiḥ śubhaiḥ
जो अत्यन्त कृपालु, ब्राह्मणों के भक्त, अपने राज्य के रक्षक और अपने शुभ सत्कर्मों के कारण सारे संसार के प्रिय थे।
श्लोक 35 (1.200.35)
मञ्चेषु च परार्द्ध्येषु पौरजानपदा जनाः । कृष्णादर्शनसिद्ध्यर्थं सर्वतः समुपाविशन् ॥
mañceṣu ca parārddhyeṣu paurajānapadā janāḥ | kṛṣṇādarśanasiddhyarthaṃ sarvataḥ samupāviśan
बहुमूल्य मंचों पर नगर और जनपद के लोग कृष्णा के दर्शन की कामना पूरी करने के लिए चारों ओर बैठ गए।
श्लोक 36 (1.200.36)
ब्राह्मणैस्ते च सहिताः पाण्डवाः समुपाविशन् । ऋद्धिं पञ्चालराजस्य पश्यन्तस्तामनुत्तमाम् ॥
brāhmaṇaiste ca sahitāḥ pāṇḍavāḥ samupāviśan | ṛddhiṃ pañcālarājasya paśyantastāmanuttamām
और पाण्डव ब्राह्मणों के साथ बैठे पांचालराज की उस अनुपम समृद्धि को देख रहे थे।
श्लोक 37 (1.200.37)
ततः समाजो ववृधे स राजन्दिवसान्बहून् । रत्नप्रदानबहुलः शोभितो नटनर्तकैः ॥
tataḥ samājo vavṛdhe sa rājandivasānbahūn | ratnapradānabahulaḥ śobhito naṭanartakaiḥ
हे राजन्! तब वह समारोह बहुत दिनों तक बढ़ता रहा; उसमें रत्नों का प्रचुर दान होता था और नट-नर्तक उसकी शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 38 (1.200.38)
वर्तमाने समाजे तु रमणीयेऽह्नि षोडशे । मैत्रे मुहूर्ते तस्याश्च राजदाराः पुराविदः । पुत्रवत्यः सुवसनाः प्रतिकर्मोपचक्रमुः ॥
vartamāne samāje tu ramaṇīye'hni ṣoḍaśe | maitre muhūrte tasyāśca rājadārāḥ purāvidaḥ | putravatyaḥ suvasanāḥ pratikarmopacakramuḥ
उस रमणीय समारोह के सोलहवें दिन, मैत्र मुहूर्त में, प्राचीन रीतियों को जानने वाली, पुत्रवती और सुन्दर वस्त्र पहने राजमहिलाओं ने उसका शृंगार आरम्भ किया।
श्लोक 39 (1.200.39)
वैडूर्यमयपीठे तु निविष्टां द्रौपदीं तदा । सतूर्यं स्नापयाञ्चक्रुः स्वर्णकुम्भस्थितैर्जलैः ॥
vaiḍūryamayapīṭhe tu niviṣṭāṃ draupadīṃ tadā | satūryaṃ snāpayāñcakruḥ svarṇakumbhasthitairjalaiḥ
उन्होंने द्रौपदी को वैदूर्य के आसन पर बिठाकर वाद्यों की ध्वनि के साथ सोने के कलशों में रखे जल से स्नान कराया।
श्लोक 40 (1.200.40)
तां निवृत्ताभिषेकां च दुकूलद्वयधारिणीम् । निन्युर्मणिस्तम्भवतीं वेदिं वै सुपरिष्कृताम् ॥
tāṃ nivṛttābhiṣekāṃ ca dukūladvayadhāriṇīm | ninyurmaṇistambhavatīṃ vediṃ vai supariṣkṛtām
स्नान पूरा होने पर दो रेशमी वस्त्र धारण किए हुए उसे वे मणि-स्तम्भों वाली, भली-भाँति सजी वेदी पर ले गईं।
श्लोक 41 (1.200.41)
निवेश्य प्राङ्मुखीं हृष्टां विस्मिताक्ष्यः प्रसाधिकाः । केनालङ्करणेनेमामित्यन्योन्यं व्यलोकयन् ॥
niveśya prāṅmukhīṃ hṛṣṭāṃ vismitākṣyaḥ prasādhikāḥ | kenālaṅkaraṇenemāmityanyonyaṃ vyalokayan
उसे प्रसन्नचित्त पूर्वमुखी बिठाकर शृंगार करने वाली स्त्रियाँ विस्मित आँखों से एक-दूसरे को देखने लगीं कि 'इसे किस आभूषण से सजाएँ?'
श्लोक 42 (1.200.42)
धूपोष्मणा च केशानामार्द्रभावं व्यपोहयन् । बबन्धुरस्या धम्मिल्लं माल्यैः सुरभिगन्धिभिः ॥
dhūpoṣmaṇā ca keśānāmārdrabhāvaṃ vyapohayan | babandhurasyā dhammillaṃ mālyaiḥ surabhigandhibhiḥ
धूप की गरमी से उन्होंने उसके केशों का गीलापन दूर किया और सुगन्धित मालाओं से उसका जूड़ा बाँधा।
श्लोक 43 (1.200.43)
दूर्वामधूकरचितं माल्यं तस्या ददुः करे । चक्रुश्च कृष्णागरुणा पत्रभङ्गं कुचद्वये ॥
dūrvāmadhūkaracitaṃ mālyaṃ tasyā daduḥ kare | cakruśca kṛṣṇāgaruṇā patrabhaṅgaṃ kucadvaye
उन्होंने उसके हाथ में दूर्वा और महुए के फूलों से गुँथी माला दी, और काले अगुरु से उसके वक्ष पर पत्र-रचना की।
श्लोक 44 (1.200.44)
रेजे सा चक्रवाकाङ्का स्वर्णदीर्घा सरिद्वरा । अलकैः कुटिलैस्तस्या मुखं विकसितं बभौ ॥
reje sā cakravākāṅkā svarṇadīrghā saridvarā | alakaiḥ kuṭilaistasyā mukhaṃ vikasitaṃ babhau
वह चक्रवाक-चिह्नों से युक्त, सुनहरी, लम्बी श्रेष्ठ नदी के समान शोभित हुई; घुँघराले केशों से घिरा उसका मुख खिले फूल जैसा चमक उठा।
श्लोक 45 (1.200.45)
आसक्तभृङ्गं कुसुमं शशिबिम्बं जिगाय तत् । कालाञ्जनं नयनयोराचारार्थं समादधुः ॥
āsaktabhṛṅgaṃ kusumaṃ śaśibimbaṃ jigāya tat | kālāñjanaṃ nayanayorācārārthaṃ samādadhuḥ
भ्रमरों से घिरे फूल जैसा वह मुख चन्द्रबिम्ब को भी जीत गया। रीति के अनुसार उन्होंने उसकी आँखों में काला अंजन लगाया।
श्लोक 46 (1.200.46)
भूषणै रत्नखचितैरलंचक्रुर्यथोचितम् । माता च तस्याः पृषती हरितालमनश्शिलाम् ॥
bhūṣaṇai ratnakhacitairalaṃcakruryathocitam | mātā ca tasyāḥ pṛṣatī haritālamanaśśilām
रत्नजड़ित आभूषणों से उन्होंने उसे यथोचित रूप से सजाया। और उसकी माता पृषती ने हरताल और मैनसिल
श्लोक 47 (1.200.47)
अङ्गुलीभ्यामुपादाय तिलकं विदधे मुखे । अलङ्कृतां वधूं दृष्ट्वा योषितो मुदमाययुः ॥
aṅgulībhyāmupādāya tilakaṃ vidadhe mukhe | alaṅkṛtāṃ vadhūṃ dṛṣṭvā yoṣito mudamāyayuḥ
अँगुलियों से लेकर उसके मुख पर तिलक लगाया। सजी हुई वधू को देखकर स्त्रियाँ आनन्दित हो उठीं।
श्लोक 48 (1.200.48)
माता न मुमुदे तस्याः पतिः कीदृग्भविष्यति । सौविदल्लाः समागम्य द्रुपदस्याज्ञया ततः ॥
mātā na mumude tasyāḥ patiḥ kīdṛgbhaviṣyati | sauvidallāḥ samāgamya drupadasyājñayā tataḥ
पर उसकी माता प्रसन्न नहीं हुई—'इसका पति कैसा होगा?' तब द्रुपद की आज्ञा से अन्तःपुर के कंचुकी एकत्र हुए
श्लोक 49 (1.200.49)
एनामारोपयामासुः करिणीं कुथभूषिताम् । ततोऽवाद्यन्त वाद्यानि मङ्गलानि दिवि स्पृशन् ॥
enāmāropayāmāsuḥ kariṇīṃ kuthabhūṣitām | tato'vādyanta vādyāni maṅgalāni divi spṛśan
और उन्होंने उसे झूल से सजी एक हथिनी पर बिठाया। तब आकाश को छूते हुए मंगल-वाद्य बज उठे।
श्लोक 50 (1.200.50)
विलासिनीजनाश्चापि प्रवरं करिणीशतम् । माङ्गल्यगीतं गायन्त्यः पार्श्वयोरुभयोर्ययुः ॥
vilāsinījanāścāpi pravaraṃ kariṇīśatam | māṅgalyagītaṃ gāyantyaḥ pārśvayorubhayoryayuḥ
विलासिनी स्त्रियाँ भी सौ उत्तम हथिनियों पर सवार होकर मंगलगीत गाती हुई उसके दोनों ओर चलीं।
श्लोक 51 (1.200.51)
जनापसरणे व्यग्राः प्रतिहार्यः पुरा ययुः । कोलाहलो महानासीत्तस्मिन्पुरवरे तदा ॥
janāpasaraṇe vyagrāḥ pratihāryaḥ purā yayuḥ | kolāhalo mahānāsīttasminpuravare tadā
भीड़ हटाने में लगी प्रतिहारिणियाँ आगे-आगे चलीं। उस श्रेष्ठ नगर में तब बड़ा कोलाहल मच गया।
श्लोक 52 (1.200.52)
धृष्टद्युम्नो ययावग्रे हयमारुह्य भारत । द्रुपदो रङ्गदेशे तु बलेन महता युतः ॥
dhṛṣṭadyumno yayāvagre hayamāruhya bhārata | drupado raṅgadeśe tu balena mahatā yutaḥ
हे भारत! धृष्टद्युम्न घोड़े पर सवार होकर आगे चला; और द्रुपद रंगभूमि में विशाल सेना के साथ
श्लोक 53 (1.200.53)
तस्थौ व्यूह्य महानीकं पालितं दृढधन्विभिः । आप्लुताङ्गीं सुवसनां सर्वाभरणभूषिताम् ॥
tasthau vyūhya mahānīkaṃ pālitaṃ dṛḍhadhanvibhiḥ | āplutāṅgīṃ suvasanāṃ sarvābharaṇabhūṣitām
दृढ़ धनुर्धरों से रक्षित बड़ी सेना को व्यूह में खड़ा करके स्थित रहा। स्नान की हुई, सुन्दर वस्त्र पहने, सब आभूषणों से विभूषित,
श्लोक 54 (1.200.54)
मालां च समुपादाय काञ्चनीं समलङ्कृताम् । आगतां ददृशुः सर्वे रङ्गभूमिमलङ्कृताम् ॥
mālāṃ ca samupādāya kāñcanīṃ samalaṅkṛtām | āgatāṃ dadṛśuḥ sarve raṅgabhūmimalaṅkṛtām
सोने की सुसज्जित माला लिए हुए उस अलंकृत कन्या को सबने रंगभूमि में आते देखा।
श्लोक 55 (1.200.55)
अवतीर्णा ततो रङ्गं द्रौपदी भरतर्षभ । तस्थौ प्रमुदितान्सर्वान्नृपतीन्रङ्गमण्डले । प्रेक्षन्ती व्रीडितापाङ्गी द्रष्टृणां सुमनोहरा ॥
avatīrṇā tato raṅgaṃ draupadī bharatarṣabha | tasthau pramuditānsarvānnṛpatīnraṅgamaṇḍale | prekṣantī vrīḍitāpāṅgī draṣṭṛṇāṃ sumanoharā
हे भरतश्रेष्ठ! तब द्रौपदी रंगभूमि में उतरी। वह रंगमण्डल में खड़ी होकर लज्जा भरी तिरछी चितवन से उन सब प्रसन्न राजाओं को देखने लगी; देखने वालों को वह अत्यन्त मनोहर लगी।
श्लोक 56 (1.200.56)
पुरोहितः सोमकानां मन्त्रविद्ब्राह्मणः शुचिः । परिस्तीर्य जुहावाग्निमाज्येन विधिवत्तदा ॥
purohitaḥ somakānāṃ mantravidbrāhmaṇaḥ śuciḥ | paristīrya juhāvāgnimājyena vidhivattadā
सोमकों के पुरोहित, मन्त्रवेत्ता, पवित्र ब्राह्मण ने कुश बिछाकर विधिपूर्वक अग्नि में घी की आहुति दी।
श्लोक 57 (1.200.57)
संतर्पयित्वा ज्वलनं ब्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च । वारयामास सर्वाणि वादित्राणि समन्ततः ॥
saṃtarpayitvā jvalanaṃ brāhmaṇānsvasti vācya ca | vārayāmāsa sarvāṇi vāditrāṇi samantataḥ
अग्नि को तृप्त करके और ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर उसने चारों ओर के सब वाद्य बन्द करा दिए।
श्लोक 58 (1.200.58)
निःशब्दे तु कृते तस्मिन्धृष्टद्युम्नो विशांपते । कृष्णामादाय विधिवन्मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ॥
niḥśabde tu kṛte tasmindhṛṣṭadyumno viśāṃpate | kṛṣṇāmādāya vidhivanmeghadundubhiniḥsvanaḥ
हे प्रजानाथ! सब ओर सन्नाटा छा जाने पर मेघ और दुन्दुभि के समान स्वर वाला धृष्टद्युम्न विधिपूर्वक कृष्णा को साथ लेकर
श्लोक 59 (1.200.59)
रङ्गमध्यं गतस्तत्र मेघगम्भीरया गिरा । वाक्यमुच्चैर्जगादेदं श्लक्ष्णमर्थवदुत्तमम् ॥
raṅgamadhyaṃ gatastatra meghagambhīrayā girā | vākyamuccairjagādedaṃ ślakṣṇamarthavaduttamam
रंगभूमि के मध्य में गया, और वहाँ मेघ के समान गम्भीर वाणी में ऊँचे स्वर से यह मधुर, सार्थक और उत्तम वचन बोला—
धृष्टद्युम्न उवाच
श्लोक 60 (1.200.60)
इदं धनुर्लक्ष्यमिमे च बाणाः । शृण्वन्तु मे भूपतयः समेताः । छिद्रेण यन्त्रस्य समर्पयध्वं । शरैः शितैर्व्योमचरैर्दशार्धैः ॥
idaṃ dhanurlakṣyamime ca bāṇāḥ | śṛṇvantu me bhūpatayaḥ sametāḥ | chidreṇa yantrasya samarpayadhvaṃ | śaraiḥ śitairvyomacarairdaśārdhaiḥ
यह धनुष है, यह लक्ष्य है और ये बाण हैं। हे यहाँ एकत्र हुए राजाओ, मेरी बात सुनो—यन्त्र के छिद्र में से आकाश में उड़ने वाले पाँच तीखे बाणों द्वारा लक्ष्य को बेधो।
श्लोक 61 (1.200.61)
एतन्महत्कर्म करोति यो वै । कुलेन रूपेण बलेन युक्तः । तस्याद्य भार्या भगिनी ममेयं । कृष्णा भवित्री न मृषा ब्रवीमि ॥
etanmahatkarma karoti yo vai | kulena rūpeṇa balena yuktaḥ | tasyādya bhāryā bhaginī mameyaṃ | kṛṣṇā bhavitrī na mṛṣā bravīmi
जो कुल, रूप और बल से युक्त होकर यह महान् कार्य करेगा, आज मेरी यह बहन कृष्णा उसी की पत्नी होगी। मैं झूठ नहीं कहता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 62 (1.200.62)
तानेवमुक्त्वा द्रुपदस्य पुत्रः । पश्चादिदं तां भगिनीमुवाच । नाम्ना च गोत्रेण च कर्मणा च । संकीर्तयन्भूमिपतीन्समेतान् ॥
tānevamuktvā drupadasya putraḥ | paścādidaṃ tāṃ bhaginīmuvāca | nāmnā ca gotreṇa ca karmaṇā ca | saṃkīrtayanbhūmipatīnsametān
उनसे ऐसा कहकर द्रुपदपुत्र ने फिर अपनी बहन से बात की, और एकत्र हुए राजाओं का नाम, गोत्र और कर्म के साथ परिचय दिया।