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आदि पर्व · अध्याय 202

राजाओं का धनुष चढ़ाने में असफल होना

द्रौपदी के लिए स्वयंवर में आए राजा आपस में होड़ करते हुए उठ खड़े होते हैं, और देवता, ऋषि तथा गन्धर्व आकाश में एकत्र होकर देखते हैं। श्रीकृष्ण ब्राह्मणों के बीच छिपे पाण्डवों को पहचान लेते हैं और बलराम को उनकी ओर संकेत करते हैं। एक-एक कर राजा उस विशाल धनुष को चढ़ाने में असफल होते हैं: शिशुपाल, जरासन्ध और शल्य धनुष की चोट खाकर अपने राज्यों को लौट जाते हैं, दुर्योधन पीठ के बल गिर पड़ता है, और कर्ण भी बाल-भर से चूक जाता है, जिससे सब राजा निराश हो जाते हैं। तब अर्जुन धनुष चढ़ाने का निश्चय करते हैं, और परिणाम के प्रति आश्वस्त श्रीकृष्ण आनन्द से बलराम का हाथ दबाते हैं।

अध्याय 201अध्याय-सूचीअध्याय 203

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.202.1)

तेऽलङ्कृताः कुण्डलिनो युवानः । परस्परं स्पर्धमाना नरेन्द्राः । अस्त्रं बलं चात्मनि मन्यमानाः । सर्वे समुत्पेतुरुदायुधास्ते ॥

te'laṅkṛtāḥ kuṇḍalino yuvānaḥ | parasparaṃ spardhamānā narendrāḥ | astraṃ balaṃ cātmani manyamānāḥ | sarve samutpeturudāyudhāste

आभूषणों और कुण्डलों से सजे वे युवा राजा, एक-दूसरे से होड़ करते हुए और अपने-आपको अस्त्र-विद्या तथा बल में श्रेष्ठ मानते हुए, सब-के-सब शस्त्र उठाकर उठ खड़े हुए।

श्लोक 2 (1.202.2)

रूपेण वीर्येण कुलेन चैव । शीलेन वित्तेन च यौवनेन । समिद्धदर्पा मदवेगभिन्ना । मत्ता यथा हैमवता गजेन्द्राः ॥

rūpeṇa vīryeṇa kulena caiva | śīlena vittena ca yauvanena | samiddhadarpā madavegabhinnā | mattā yathā haimavatā gajendrāḥ

रूप, पराक्रम, कुल, शील, धन और यौवन के गर्व से फूले हुए वे मद के वेग से उन्मत्त हिमालय के गजराजों जैसे लग रहे थे।

श्लोक 3 (1.202.3)

परस्परं स्पर्धया प्रेक्षमाणाः । सङ्कल्पजेनाभिपरिप्लुताङ्गाः । कृष्णा ममैवेत्यभिभाषमाणा । नृपाः समुत्पेतुरथासनेभ्यः ॥

parasparaṃ spardhayā prekṣamāṇāḥ | saṅkalpajenābhipariplutāṅgāḥ | kṛṣṇā mamaivetyabhibhāṣamāṇā | nṛpāḥ samutpeturathāsanebhyaḥ

होड़ में एक-दूसरे को देखते हुए, संकल्प से उपजी कामना में डूबे हुए, "कृष्णा तो मेरी ही है!" ऐसा कहते हुए राजा अपने आसनों से उठ खड़े हुए।

श्लोक 4 (1.202.4)

ते क्षत्रिया रङ्गगताः समेता । जिगीषमाणा द्रुपदात्मजां ताम् । चकाशिरे पर्वतराजकन्या- । मुमां यथा देवगणाः समेताः ॥

te kṣatriyā raṅgagatāḥ sametā | jigīṣamāṇā drupadātmajāṃ tām | cakāśire parvatarājakanyā- | mumāṃ yathā devagaṇāḥ sametāḥ

रंगभूमि में एकत्र, द्रुपदकुमारी को जीतने के इच्छुक वे क्षत्रिय ऐसे शोभित हुए, जैसे पर्वतराज की पुत्री उमा के लिए एकत्र हुए देवगण।

श्लोक 5 (1.202.5)

कन्दर्पबाणाभिनिपीडिताङ्गाः । कृष्णागतैस्ते हृदयैर्नरेन्द्राः । रङ्गावतीर्णा द्रुपदात्मजार्थं । द्वेषं प्रचक्रुः सुहृदोऽपि तत्र ॥

kandarpabāṇābhinipīḍitāṅgāḥ | kṛṣṇāgataiste hṛdayairnarendrāḥ | raṅgāvatīrṇā drupadātmajārthaṃ | dveṣaṃ pracakruḥ suhṛdo'pi tatra

कामदेव के बाणों से पीड़ित अंगों वाले और कृष्णा में मन लगाए वे राजा, जो द्रुपदकुमारी के लिए रंगभूमि में उतरे थे, वहाँ अपने मित्रों से भी द्वेष करने लगे।

श्लोक 6 (1.202.6)

अथाययुर्देवगणा विमानै । रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च । साध्याश्च सर्वे मरुतस्तथैव । यमं पुरस्कृत्य धनेश्वरं च ॥

athāyayurdevagaṇā vimānai | rudrādityā vasavo'thāśvinau ca | sādhyāśca sarve marutastathaiva | yamaṃ puraskṛtya dhaneśvaraṃ ca

तब देवगण अपने विमानों में आए — रुद्र, आदित्य, वसु और दोनों अश्विनीकुमार, सभी साध्य और मरुद्गण भी, यम और धनपति कुबेर को आगे करके।

श्लोक 7 (1.202.7)

दैत्याः सुपर्णाश्च महोरगाश्च । देवर्षयो गुह्यकाश्चारणाश्च । विश्वावसुर्नारदपर्वतौ च । गन्धर्वमुख्याः सहसाऽप्सरोभिः ॥

daityāḥ suparṇāśca mahoragāśca | devarṣayo guhyakāścāraṇāśca | viśvāvasurnāradaparvatau ca | gandharvamukhyāḥ sahasā'psarobhiḥ

दैत्य, सुपर्ण और महानाग, देवर्षि, गुह्यक और चारण, विश्वावसु, नारद और पर्वत, तथा अप्सराओं के साथ प्रमुख गन्धर्व भी शीघ्र आ पहुँचे।

श्लोक 8 (1.202.8)

हलायुधस्तत्र जनार्दनश्च । वृष्ण्यन्धकाश्चैव यथाप्रधानम् । प्रेक्षां स्म चक्रुर्यदुपुङ्गवास्ते । स्थिताश्च कृष्णस्य मते महान्तः ॥

halāyudhastatra janārdanaśca | vṛṣṇyandhakāścaiva yathāpradhānam | prekṣāṃ sma cakruryadupuṅgavāste | sthitāśca kṛṣṇasya mate mahāntaḥ

वहाँ हलधर और जनार्दन थे, और अपनी-अपनी प्रधानता के क्रम से वृष्णि और अन्धक भी। श्रीकृष्ण के मत पर चलने वाले वे महान यदुश्रेष्ठ दर्शक बनकर देख रहे थे।

श्लोक 9 (1.202.9)

दृष्ट्वा तु तान्मत्तगजेन्द्ररूपा- । न्पञ्चाभिपद्मानिव वारणेन्द्रान् । भस्मावृताङ्गानिव हव्यवाहान् । कृष्णः प्रदध्यौ यदुवीरमुख्यः ॥

dṛṣṭvā tu tānmattagajendrarūpā- | npañcābhipadmāniva vāraṇendrān | bhasmāvṛtāṅgāniva havyavāhān | kṛṣṇaḥ pradadhyau yaduvīramukhyaḥ

मतवाले गजराजों जैसे, सर्वांगसुन्दर महागजों जैसे, और राख से ढकी अग्नि जैसे उन पाँचों को देखकर यदुवीरों में प्रमुख श्रीकृष्ण विचार में पड़ गए।

श्लोक 10 (1.202.10)

शशंस रामाय युधिष्ठिरं स । भीमं सजिष्णुं च यमौ च वीरौ । शनैःशनैस्तान्प्रसमीक्ष्य रामो । जनार्दनं प्रीतमना ददर्श ह ॥

śaśaṃsa rāmāya yudhiṣṭhiraṃ sa | bhīmaṃ sajiṣṇuṃ ca yamau ca vīrau | śanaiḥśanaistānprasamīkṣya rāmo | janārdanaṃ prītamanā dadarśa ha

उन्होंने बलराम को युधिष्ठिर, अर्जुन सहित भीम और दोनों वीर जुड़वाँ भाइयों को दिखाया। बलराम ने धीरे-धीरे उन्हें निहारकर प्रसन्न मन से जनार्दन की ओर देखा।

श्लोक 11 (1.202.11)

अन्ये तु वीरा नृपपुत्रपौत्राः । कृष्णागतैर्नेत्रमनःस्वभावैः । व्यायच्छमाना ददृशुर्न तान्वै । सन्दष्टदन्तच्छदताम्रनेत्राः ॥

anye tu vīrā nṛpaputrapautrāḥ | kṛṣṇāgatairnetramanaḥsvabhāvaiḥ | vyāyacchamānā dadṛśurna tānvai | sandaṣṭadantacchadatāmranetrāḥ

परन्तु अन्य वीर राजपुत्र और राजपौत्र, जिनके नेत्र, मन और भाव कृष्णा में ही लगे थे, उत्कण्ठा से छटपटाते हुए पाण्डवों को देख ही न सके; वे होंठ चबा रहे थे और उनकी आँखें लाल हो गई थीं।

श्लोक 12 (1.202.12)

तथैव पार्थाः पृथुबाहवस्ते । वीरौ यमौ चैव महानुभावौ । तां द्रौपदीं प्रेक्ष्य तदा स्म सर्वे । कन्दर्पबाणाभिहता बभूवुः ॥

tathaiva pārthāḥ pṛthubāhavaste | vīrau yamau caiva mahānubhāvau | tāṃ draupadīṃ prekṣya tadā sma sarve | kandarpabāṇābhihatā babhūvuḥ

उसी प्रकार विशाल भुजाओं वाले पृथापुत्र और महानुभाव वीर जुड़वाँ भाई भी, सब-के-सब, द्रौपदी को देखकर कामदेव के बाणों से आहत हो गए।

श्लोक 13 (1.202.13)

देवर्षिगन्धर्वसमाकुलं त- । त्सुपर्णनागासुरसिद्धजुष्टम् । दिव्येन गन्धेन समाकुलं च । दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणम् ॥

devarṣigandharvasamākulaṃ ta- | tsuparṇanāgāsurasiddhajuṣṭam | divyena gandhena samākulaṃ ca | divyaiśca puṣpairavakīryamāṇam

वह आकाश देवर्षियों और गन्धर्वों से भरा था, सुपर्ण, नाग, असुर और सिद्ध वहाँ विचर रहे थे; वह दिव्य सुगन्ध से व्याप्त था और उस पर दिव्य पुष्प बरस रहे थे।

श्लोक 14 (1.202.14)

महास्वनैर्दुन्दुभिनादितैश्च । बभूव तत्सङ्कुलमन्तरिक्षम् । विमानसंबाधमभूत्समन्ता- । त्सवेणुवीणापणवानुनादम् ॥

mahāsvanairdundubhināditaiśca | babhūva tatsaṅkulamantarikṣam | vimānasaṃbādhamabhūtsamantā- | tsaveṇuvīṇāpaṇavānunādam

महान ध्वनियों और दुन्दुभियों के नाद से आकाश गूँज उठा; चारों ओर विमानों की भीड़ लग गई और बाँसुरी, वीणा तथा पणव की ध्वनि गूँजने लगी,

श्लोक 15 (1.202.15)

समाजवाटोपरि संस्थितानां । मेघैः समन्तादिव गर्जमानैः । ततस्तु ते राजगणाः क्रमेण । कृष्णानिमित्तं कृतविक्रमाश्च । सकर्णदुर्योधनशाल्वशल्य- । द्रौणायनिक्राथसुनीथवक्राः ॥

samājavāṭopari saṃsthitānāṃ | meghaiḥ samantādiva garjamānaiḥ | tatastu te rājagaṇāḥ krameṇa | kṛṣṇānimittaṃ kṛtavikramāśca | sakarṇaduryodhanaśālvaśalya- | drauṇāyanikrāthasunīthavakrāḥ

मानो सभा-मण्डप के ऊपर स्थित लोगों के चारों ओर मेघ गरज रहे हों। तब राजाओं के समूह बारी-बारी से कृष्णा के लिए पराक्रम दिखाने लगे — कर्ण, दुर्योधन, शाल्व और शल्य, द्रोणपुत्र, क्राथ, सुनीथ और वक्र,

श्लोक 16 (1.202.16)

कलिङ्गवङ्गाधिपपाण्ड्यपौण्ड्रा । विदेहराजो यवनाधिपश्च । अन्ये च नानानृपपुत्रपौत्रा । राष्ट्राधिपाः पङ्कजपत्रनेत्राः ॥

kaliṅgavaṅgādhipapāṇḍyapauṇḍrā | videharājo yavanādhipaśca | anye ca nānānṛpaputrapautrā | rāṣṭrādhipāḥ paṅkajapatranetrāḥ

कलिंग और वंग के अधिपति, पाण्ड्य और पौण्ड्र, विदेहराज और यवनों के स्वामी, तथा अनेक राजाओं के अन्य पुत्र-पौत्र, कमलदल जैसे नेत्रों वाले राष्ट्राधिपति,

श्लोक 17 (1.202.17)

किरीटहाराङ्गदचक्रवालै- । र्विभूषिताङ्गाः पृथुबाहवस्ते । अनुक्रमं विक्रमसत्वयुक्ता । बलेन वीर्येण च नर्दमानाः ॥

kirīṭahārāṅgadacakravālai- | rvibhūṣitāṅgāḥ pṛthubāhavaste | anukramaṃ vikramasatvayuktā | balena vīryeṇa ca nardamānāḥ

मुकुट, हार, बाजूबन्द और कंकणों से सजे अंगों वाले, विशाल भुजाओं वाले, पराक्रम और साहस से युक्त, बल और वीर्य से बारी-बारी गर्जना करते हुए —

श्लोक 18 (1.202.18)

तत्कार्मुकं संहननोपपन्नं । सज्यं न शेकुर्मनसाऽपि कर्तुम् । ते विक्रमन्तः स्फुरता दृढेन । विक्षिप्यमाणा धनुषा नरेन्द्राः ॥

tatkārmukaṃ saṃhananopapannaṃ | sajyaṃ na śekurmanasā'pi kartum | te vikramantaḥ sphuratā dṛḍhena | vikṣipyamāṇā dhanuṣā narendrāḥ

उस अत्यन्त सुदृढ़ धनुष पर मन से भी डोरी न चढ़ा सके। पराक्रम करते हुए वे राजा उस फड़कते हुए दृढ़ धनुष से इधर-उधर फेंक दिए गए;

श्लोक 19 (1.202.19)

विचेष्टमाना धरणीतलस्था । यथाबलं शैक्ष्यगुणक्रमाश्च । गतौजसः स्रस्तकिरीटहारा । विनिःश्वसन्तः शमयांबभूवुः ॥

viceṣṭamānā dharaṇītalasthā | yathābalaṃ śaikṣyaguṇakramāśca | gataujasaḥ srastakirīṭahārā | viniḥśvasantaḥ śamayāṃbabhūvuḥ

अपने-अपने बल, शिक्षा और कौशल के अनुसार धरती पर छटपटाते हुए, तेजहीन होकर, खिसके हुए मुकुटों और हारों के साथ, लम्बी साँसें लेते हुए वे शान्त हो गए।

श्लोक 20 (1.202.20)

हहाकृतं तद्धनुषा दृढेन । विस्रस्तहाराङ्गदचक्रवालम् । कृष्णानिमित्तं विनिवृत्तकामं । राज्ञां तदा मण्डलमार्तमासीत् ॥

hahākṛtaṃ taddhanuṣā dṛḍhena | visrastahārāṅgadacakravālam | kṛṣṇānimittaṃ vinivṛttakāmaṃ | rājñāṃ tadā maṇḍalamārtamāsīt

उस दृढ़ धनुष के कारण हाहाकार करता हुआ, खिसके हुए हारों, बाजूबन्दों और कंकणों वाला, कृष्णा की कामना छोड़ चुका राजाओं का वह मण्डल उस समय दुःखी हो उठा।

श्लोक 21 (1.202.21)

एवं तेषु निवृत्तेषु क्षत्रियेषु समन्ततः । चेदीनामधिपो वीरो बलवानन्तकोपमः ॥

evaṃ teṣu nivṛtteṣu kṣatriyeṣu samantataḥ | cedīnāmadhipo vīro balavānantakopamaḥ

जब चारों ओर के क्षत्रिय इस प्रकार पीछे हट गए, तब चेदियों का अधिपति, जो वीर, बलवान और यमराज के समान था —

श्लोक 22 (1.202.22)

दमघोषात्मजो धीमाञ्शिशुपालो महाद्युतिः । धनुषोऽभ्याशमागम्य तस्थौ राज्ञां समक्षतः ॥

damaghoṣātmajo dhīmāñśiśupālo mahādyutiḥ | dhanuṣo'bhyāśamāgamya tasthau rājñāṃ samakṣataḥ

दमघोष का पुत्र, बुद्धिमान और महातेजस्वी शिशुपाल — धनुष के पास आकर राजाओं के सामने खड़ा हो गया।

श्लोक 23 (1.202.23)

तदप्यारोप्यमाणं तु माषमात्रेऽभ्यताडयत् । धनुषा पीड्यमानस्तु जानुभ्यामगमन्महीम् ॥

tadapyāropyamāṇaṃ tu māṣamātre'bhyatāḍayat | dhanuṣā pīḍyamānastu jānubhyāmagamanmahīm

जब वह उस पर डोरी चढ़ा रहा था, तब उड़द के दाने भर की कसर रह जाने पर धनुष ने उसे चोट मारी; धनुष से दबकर वह घुटनों के बल धरती पर गिर पड़ा।

श्लोक 24 (1.202.24)

तत उत्थाय राजा स स्वराष्ट्राण्यभिजग्मिवान् । ततो राजा जरासन्धो महावीर्यो महाबलः ॥

tata utthāya rājā sa svarāṣṭrāṇyabhijagmivān | tato rājā jarāsandho mahāvīryo mahābalaḥ

वहाँ से उठकर वह राजा अपने राज्य को चला गया। तब महापराक्रमी और महाबली राजा जरासन्ध,

श्लोक 25 (1.202.25)

कम्बुग्रीवः पृथुव्यंसो मत्तवारणविक्रमः । मत्तवारणताम्राक्षो मत्तवारणवेगवान् ॥

kambugrīvaḥ pṛthuvyaṃso mattavāraṇavikramaḥ | mattavāraṇatāmrākṣo mattavāraṇavegavān

जिसकी ग्रीवा शंख जैसी और कन्धे चौड़े थे, जिसकी चाल, लाल आँखें और वेग मतवाले हाथी जैसे थे,

श्लोक 26 (1.202.26)

धनुषोऽभ्याशमागत्य तस्थौ गिरिरिवाचलः । धनुरारोप्यमाणं तु सर्षमात्रेऽभ्यताडयत् ॥

dhanuṣo'bhyāśamāgatya tasthau giririvācalaḥ | dhanurāropyamāṇaṃ tu sarṣamātre'bhyatāḍayat

धनुष के पास आकर पर्वत की भाँति अचल खड़ा हो गया। जब वह उस पर डोरी चढ़ा रहा था, तब सरसों के दाने भर की कसर रह जाने पर धनुष ने उसे चोट मारी।

श्लोक 27 (1.202.27)

ततः शल्यो महावीर्यो मद्रराजो महाबलः । धनुरारोप्यमाणं तु मुद्गमात्रेऽभ्यताडयत् ॥

tataḥ śalyo mahāvīryo madrarājo mahābalaḥ | dhanurāropyamāṇaṃ tu mudgamātre'bhyatāḍayat

तब महापराक्रमी, महाबली मद्रराज शल्य आए; जब वे धनुष पर डोरी चढ़ा रहे थे, तब मूँग के दाने भर की कसर रह जाने पर धनुष ने उन्हें चोट मारी।

श्लोक 28 (1.202.28)

तदैवागात्स्वयं राज्यं पश्चादनवलोकयन् । इदं धनुर्वरं कोऽद्य सज्यं कुर्वीत पार्थिवः ॥

tadaivāgātsvayaṃ rājyaṃ paścādanavalokayan | idaṃ dhanurvaraṃ ko'dya sajyaṃ kurvīta pārthivaḥ

वे पीछे देखे बिना तुरन्त अपने राज्य को चले गए। "आज कौन राजा इस श्रेष्ठ धनुष पर डोरी चढ़ा सकेगा?" —

श्लोक 29 (1.202.29)

इति निश्चित्य मनसा भूय एव स्थितस्तदा । ततो दुर्योधनो राजा धार्तराष्ट्रः परन्तपः ॥

iti niścitya manasā bhūya eva sthitastadā | tato duryodhano rājā dhārtarāṣṭraḥ parantapaḥ

मन में ऐसा निश्चय करके वह फिर वहीं खड़ा रहा। तब शत्रुओं को तपाने वाले धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन,

श्लोक 30 (1.202.30)

मानी दृढास्त्रसंपन्नः सर्वैश्च नृपलक्षणैः । उत्थितः सहसा तत्र भ्रातृमध्ये महाबलः ॥

mānī dṛḍhāstrasaṃpannaḥ sarvaiśca nṛpalakṣaṇaiḥ | utthitaḥ sahasā tatra bhrātṛmadhye mahābalaḥ

जो अभिमानी, दृढ़ अस्त्रों में निपुण और सभी राजलक्षणों से सम्पन्न थे, वहाँ अपने भाइयों के बीच से सहसा उठ खड़े हुए, वे महाबली थे।

श्लोक 31 (1.202.31)

विलोक्य द्रौपदीं हृष्टो धनुषोऽभ्याशमागमत् । स बभौ धनुरादाय शक्रश्चापधरो यथा ॥

vilokya draupadīṃ hṛṣṭo dhanuṣo'bhyāśamāgamat | sa babhau dhanurādāya śakraścāpadharo yathā

द्रौपदी को देखकर प्रसन्न होकर वे धनुष के पास गए। धनुष उठाकर वे धनुर्धारी इन्द्र के समान शोभित हुए।

श्लोक 32 (1.202.32)

धनुरारोपयामास तिलमात्रेऽभ्यताडयत् । आरोप्यमाणं तद्राजा धनुषा बलिना तदा ॥

dhanurāropayāmāsa tilamātre'bhyatāḍayat | āropyamāṇaṃ tadrājā dhanuṣā balinā tadā

उन्होंने धनुष पर डोरी चढ़ानी आरम्भ की, पर तिल भर की कसर रह जाने पर धनुष ने उन्हें चोट मारी। जब राजा उस पर डोरी चढ़ा रहे थे, तब उस बलशाली धनुष से

श्लोक 33 (1.202.33)

उत्तानशय्यमपतदङ्गुल्यन्तरताडितः । स ययौ ताडितस्तेन व्रीडन्निव नराधिपः ॥

uttānaśayyamapatadaṅgulyantaratāḍitaḥ | sa yayau tāḍitastena vrīḍanniva narādhipaḥ

अंगुल भर के अन्तर पर चोट खाकर वे पीठ के बल गिर पड़े। उससे आहत होकर वे राजा मानो लज्जित-से होकर चले गए।

श्लोक 34 (1.202.34)

ततो वैकर्तनः कर्णो वृषा वै सूतनन्दनः । धनुरभ्याशमागम्य तोलयामास तद्धनुः ॥

tato vaikartanaḥ karṇo vṛṣā vai sūtanandanaḥ | dhanurabhyāśamāgamya tolayāmāsa taddhanuḥ

तब सूतपुत्र वैकर्तन कर्ण, जिन्हें वृषा भी कहते हैं, धनुष के पास आए और उसे हाथों में तौलने लगे।

श्लोक 35 (1.202.35)

तं चाप्यारोप्यमाणं तद्रोममात्रेऽभ्यताडयत् । त्रैलोक्यविजयी कर्णः सत्वे त्रैलोक्यविश्रुतः ॥

taṃ cāpyāropyamāṇaṃ tadromamātre'bhyatāḍayat | trailokyavijayī karṇaḥ satve trailokyaviśrutaḥ

जब वे उस पर डोरी चढ़ा रहे थे, तब बाल भर की कसर रह जाने पर धनुष ने उन्हें चोट मारी — उन कर्ण को, जो तीनों लोकों के विजेता और अपने बल के लिए तीनों लोकों में विख्यात थे।

श्लोक 36 (1.202.36)

धनुषा सोऽपि निर्धूत इति सर्वे भयाकुलाः । एवं कर्णे विनिर्धूते धनुषा च नृपोत्तमाः ॥

dhanuṣā so'pi nirdhūta iti sarve bhayākulāḥ | evaṃ karṇe vinirdhūte dhanuṣā ca nṛpottamāḥ

"उन्हें भी धनुष ने झटक दिया!" — यह देखकर सब भय से व्याकुल हो गए। इस प्रकार कर्ण के धनुष द्वारा झटक दिए जाने पर श्रेष्ठ राजा

श्लोक 37 (1.202.37)

चक्षुर्भिरपि नापश्यन्विनम्रमुखपङ्कजाः । दृष्ट्वा कर्णं विनिर्धूतं लोके वीरा नृपोत्तमाः ॥

cakṣurbhirapi nāpaśyanvinamramukhapaṅkajāḥ | dṛṣṭvā karṇaṃ vinirdhūtaṃ loke vīrā nṛpottamāḥ

आँख उठाकर देख भी न सके; उनके कमल-जैसे मुख झुक गए। कर्ण को झटका गया देखकर संसार के श्रेष्ठ वीर राजा

श्लोक 38 (1.202.38)

निराशा धनुरुद्धारे द्रौपदीसंगमेऽपि च ॥

nirāśā dhanuruddhāre draupadīsaṃgame'pi ca

धनुष उठाने और द्रौपदी को पाने, दोनों की आशा छोड़ बैठे।

श्लोक 39 (1.202.39)

तस्मिंस्तु संभ्रान्तजने समाजे । निक्षिप्तवादेषु जनाधिपेषु । कुन्तीसुतो जिष्णुरियेष कर्तुं । सज्यं धनुस्तत्सशरं च वीरः ॥

tasmiṃstu saṃbhrāntajane samāje | nikṣiptavādeṣu janādhipeṣu | kuntīsuto jiṣṇuriyeṣa kartuṃ | sajyaṃ dhanustatsaśaraṃ ca vīraḥ

जब उस सभा में लोग घबराए हुए थे और राजाओं ने अपनी डींगें छोड़ दी थीं, तब कुन्तीपुत्र वीर अर्जुन ने उस धनुष पर डोरी चढ़ाकर बाण सन्धान करने की इच्छा की।

श्लोक 40 (1.202.40)

ततो वरिष्ठः सुरदानवाना- । मुदारधीर्वृष्णिकुलप्रवीरः । जहर्ष रामेण स पीड्य हस्तं । हस्तंगतां पाण्डुसुतस्य मत्वा ॥

tato variṣṭhaḥ suradānavānā- | mudāradhīrvṛṣṇikulapravīraḥ | jaharṣa rāmeṇa sa pīḍya hastaṃ | hastaṃgatāṃ pāṇḍusutasya matvā

तब देवताओं और दानवों में श्रेष्ठ, उदार बुद्धि वाले वृष्णिकुल के वीर श्रीकृष्ण हर्षित हुए और द्रौपदी को पाण्डुपुत्र के हाथ में आई हुई मानकर उन्होंने बलराम का हाथ दबाया।

श्लोक 41 (1.202.41)

न जज्ञिरेऽन्ये नृपविप्रमुख्याः । संछन्नरूपानथ पाण्डुपुत्रान् । विना हि लोके च यदुप्रवीरौ । धौम्यं हि धर्मं सह सोदरांश्च ॥

na jajñire'nye nṛpavipramukhyāḥ | saṃchannarūpānatha pāṇḍuputrān | vinā hi loke ca yadupravīrau | dhaumyaṃ hi dharmaṃ saha sodarāṃśca

अन्य प्रमुख राजा और ब्राह्मण छिपे वेश वाले पाण्डुपुत्रों को — धौम्य को, धर्मपुत्र युधिष्ठिर और उनके भाइयों को — पहचान न सके; संसार में केवल यदुकुल के उन दोनों वीरों ने ही उन्हें पहचाना।

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