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आदि पर्व · अध्याय 205

अर्जुन और भीम द्वारा राजाओं का प्रतिरोध

जब क्रुद्ध राजा ब्राह्मणों पर टूट पड़ते हैं, तब अर्जुन कर्ण से युद्ध करते हैं, और अन्त में कर्ण ब्राह्मण-तेज को अजेय मानकर युद्ध छोड़ देता है; उधर भीम शल्य को उठाकर पटक देते हैं, पर उसके प्राण नहीं लेते। इस पाठ में युधिष्ठिर दुर्योधन को और सहदेव दुःशासन को भी परास्त करते हैं, और कौरव लौट जाते हैं। राजा उन दोनों ब्राह्मणों का पता लगाकर फिर लड़ने का निश्चय करते हैं, पर श्रीकृष्ण उन्हें कुन्तीपुत्र समझकर राजाओं को समझाते हैं कि कन्या धर्मपूर्वक जीती गई है। भीम और अर्जुन द्रौपदी को लेकर कुम्हार के घर पहुँचते हैं, जहाँ कुन्ती उनके लिए चिन्तित बैठी थीं।

अध्याय 204अध्याय-सूचीअध्याय 206

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.205.1)

अजिनानि विधुन्वन्तः करकाश्च द्विजर्षभाः । ऊचुस्ते भीर्न कर्तव्या वयं योत्स्यामहे परान् ॥

ajināni vidhunvantaḥ karakāśca dvijarṣabhāḥ | ūcuste bhīrna kartavyā vayaṃ yotsyāmahe parān

श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने मृगचर्म और कमण्डलु हिलाते हुए बोले — "डरने की कोई बात नहीं; हम शत्रुओं से लड़ेंगे।"

श्लोक 2 (1.205.2)

तानेवं वदतो विप्रानर्जुनः प्रहसन्निव । उवाच प्रेक्षका भूत्वा यूयं तिष्ठत पार्श्वतः ॥

tānevaṃ vadato viprānarjunaḥ prahasanniva | uvāca prekṣakā bhūtvā yūyaṃ tiṣṭhata pārśvataḥ

ब्राह्मणों को ऐसा कहते देख अर्जुन मानो हँसते हुए बोले — "आप लोग दर्शक बनकर एक ओर खड़े रहिए।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 3 (1.205.3)

अहमेनानजिह्माग्रैः शतशो विकिरञ्छरैः । वारयिष्यामि संक्रुद्धान्मन्त्रैराशीविषानिव ॥

ahamenānajihmāgraiḥ śataśo vikirañcharaiḥ | vārayiṣyāmi saṃkruddhānmantrairāśīviṣāniva

"मैं सीधी नोक वाले सैकड़ों बाण बरसाकर इन क्रुद्ध राजाओं को वैसे ही रोक दूँगा, जैसे मन्त्रों से विषैले सर्पों को रोका जाता है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (1.205.4)

इति तद्धनुरानम्य शुल्कावाप्तं महाबलः । भ्रात्रा भीमेन सहितस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥

iti taddhanurānamya śulkāvāptaṃ mahābalaḥ | bhrātrā bhīmena sahitastasthau giririvācalaḥ

यह कहकर महाबली अर्जुन ने शुल्क में जीते हुए उस धनुष को झुकाया और अपने भाई भीम के साथ पर्वत की भाँति अचल खड़े हो गए।

श्लोक 5 (1.205.5)

ततः कर्णमुखान्दृष्ट्वा क्षत्रियान्युद्धदुर्मदान् । संपेततुरभीतौ तौ गजौ प्रतिगजानिव ॥

tataḥ karṇamukhāndṛṣṭvā kṣatriyānyuddhadurmadān | saṃpetaturabhītau tau gajau pratigajāniva

तब कर्ण आदि युद्धोन्मत्त क्षत्रियों को देखकर वे दोनों निर्भय भाई उन पर ऐसे टूट पड़े, जैसे हाथी प्रतिद्वन्द्वी हाथियों पर झपटते हैं।

श्लोक 6 (1.205.6)

ऊचुश्च वाचः परुषास्ते राजानो युयुत्सवः । आहवे हि द्विजस्यापि वधो दृष्टो युयुत्सतः ॥

ūcuśca vācaḥ paruṣāste rājāno yuyutsavaḥ | āhave hi dvijasyāpi vadho dṛṣṭo yuyutsataḥ

युद्ध के इच्छुक उन राजाओं ने कठोर वचन कहे — "युद्ध में लड़ने को उद्यत ब्राह्मण का भी वध होते देखा गया है।"

श्लोक 7 (1.205.7)

इत्येवमुक्त्वा राजानः सहसा दुद्रुवुर्द्विजान् । ततः कर्णो महातेजा जिष्णुं प्रति ययौ रणे ॥

ityevamuktvā rājānaḥ sahasā dudruvurdvijān | tataḥ karṇo mahātejā jiṣṇuṃ prati yayau raṇe

ऐसा कहकर राजा सहसा उन ब्राह्मणों पर टूट पड़े। तब महातेजस्वी कर्ण युद्ध में अर्जुन की ओर बढ़ा,

श्लोक 8 (1.205.8)

युद्धार्थी वासिताहेतोर्गजः प्रतिगजं यथा । भीमसेनं ययौ शल्यो मद्राणामीश्वरो बली ॥

yuddhārthī vāsitāhetorgajaḥ pratigajaṃ yathā | bhīmasenaṃ yayau śalyo madrāṇāmīśvaro balī

युद्ध की इच्छा से, जैसे हथिनी के लिए एक हाथी दूसरे हाथी की ओर बढ़ता है। मद्रदेश के बलवान स्वामी शल्य भीमसेन की ओर बढ़े।

श्लोक 9 (1.205.9)

दुर्योधनादयः सर्वे ब्राह्मणैः सह संगताः । मृदुपूर्वमयत्नेन प्रत्ययुध्यंस्तदाऽऽहवे ॥

duryodhanādayaḥ sarve brāhmaṇaiḥ saha saṃgatāḥ | mṛdupūrvamayatnena pratyayudhyaṃstadā''have

दुर्योधन आदि सभी ब्राह्मणों से भिड़ गए और उस युद्ध में बिना विशेष प्रयत्न के, नरमी से उनका सामना करते रहे।

श्लोक 10 (1.205.10)

ततोऽर्जुनः प्रत्यविध्यदापतन्तं शितैः शरैः । कर्णं वैकर्तनं श्रीमान्विकृष्य बलवद्धनुः ॥

tato'rjunaḥ pratyavidhyadāpatantaṃ śitaiḥ śaraiḥ | karṇaṃ vaikartanaṃ śrīmānvikṛṣya balavaddhanuḥ

तब तेजस्वी अर्जुन ने अपना बलशाली धनुष खींचकर सामने आते हुए वैकर्तन कर्ण को तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 11 (1.205.11)

तेषां शराणां वेगेन शितानां तिग्मतेजसाम् । विमुह्यमानो राधेयो यत्नात्तमनुधावति ॥

teṣāṃ śarāṇāṃ vegena śitānāṃ tigmatejasām | vimuhyamāno rādheyo yatnāttamanudhāvati

उन तीखे, प्रचण्ड तेज वाले बाणों के वेग से मूर्च्छित-सा होता हुआ राधापुत्र कर्ण बड़े यत्न से अर्जुन का पीछा करता रहा।

श्लोक 12 (1.205.12)

तावुभावप्यनिर्देश्यौ लाघवाज्जयतां वरौ । अयुध्येतां सुसंरब्धावन्योन्यविजिगीषिणौ ॥

tāvubhāvapyanirdeśyau lāghavājjayatāṃ varau | ayudhyetāṃ susaṃrabdhāvanyonyavijigīṣiṇau

विजयी वीरों में श्रेष्ठ वे दोनों इतनी फुर्ती से लड़ रहे थे कि उन्हें अलग पहचानना कठिन था; एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से वे क्रोधपूर्वक युद्ध करते रहे।

श्लोक 13 (1.205.13)

कृते प्रतिकृतं पश्य पश्य बाहुबलं च मे । इति शूरार्थवचनैरभाषेतां परस्परम् ॥

kṛte pratikṛtaṃ paśya paśya bāhubalaṃ ca me | iti śūrārthavacanairabhāṣetāṃ parasparam

"मेरे प्रहार का उत्तर देखो! मेरी भुजाओं का बल देखो!" — ऐसे वीरोचित वचनों से वे एक-दूसरे को ललकारते रहे।

श्लोक 14 (1.205.14)

ततोऽर्जुनस्य भुजयोर्वीर्यमप्रतिमं भुवि । ज्ञात्वा वैकर्तनः कर्णः संरब्धः समयोधयत् ॥

tato'rjunasya bhujayorvīryamapratimaṃ bhuvi | jñātvā vaikartanaḥ karṇaḥ saṃrabdhaḥ samayodhayat

तब वैकर्तन कर्ण यह जानकर कि अर्जुन की भुजाओं का पराक्रम पृथ्वी पर अनुपम है, क्रोध में भरकर युद्ध करने लगा।

श्लोक 15 (1.205.15)

अर्जुनेन प्रयुक्तांस्तान्बाणान्वेगवतस्तदा । प्रतिहत्य ननादोच्चैः सैन्यानि तदपूजयन् ॥

arjunena prayuktāṃstānbāṇānvegavatastadā | pratihatya nanādoccaiḥ sainyāni tadapūjayan

अर्जुन के छोड़े हुए उन वेगवान बाणों को काटकर उसने ऊँचे स्वर में गर्जना की, और सेनाओं ने उसकी प्रशंसा की।

कर्ण उवाच

श्लोक 16 (1.205.16)

तुष्यामि ते विप्रमुख्य भुजवीर्यस्य संयुगे । अविषादस्य चैवास्य शस्त्रास्त्रविजयस्य च ॥

tuṣyāmi te vipramukhya bhujavīryasya saṃyuge | aviṣādasya caivāsya śastrāstravijayasya ca

"हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, युद्ध में तुम्हारी भुजाओं के बल से, तुम्हारे अदम्य उत्साह से और शस्त्रास्त्रों पर तुम्हारे अधिकार से मैं प्रसन्न हूँ।

श्लोक 17 (1.205.17)

किं त्वं साक्षाद्धनुर्वेदो रामो वा विप्रसत्तम । अथ साक्षाद्धरिहयः साक्षाद्वा विष्णुरच्युतः ॥

kiṃ tvaṃ sākṣāddhanurvedo rāmo vā viprasattama | atha sākṣāddharihayaḥ sākṣādvā viṣṇuracyutaḥ

हे विप्रश्रेष्ठ, क्या तुम साक्षात् धनुर्वेद हो, या परशुराम? अथवा साक्षात् इन्द्र हो, या स्वयं अच्युत विष्णु?

श्लोक 18 (1.205.18)

आत्मप्रच्छादनार्थं वै बाहुवीर्यमुपाश्रितः । विप्ररूपं विधायेदं मन्ये मां प्रतियुध्यसे ॥

ātmapracchādanārthaṃ vai bāhuvīryamupāśritaḥ | viprarūpaṃ vidhāyedaṃ manye māṃ pratiyudhyase

मुझे लगता है कि अपने को छिपाने के लिए तुमने यह ब्राह्मण-वेश धारण किया है और अपनी भुजाओं के बल के सहारे मुझसे लड़ रहे हो।

श्लोक 19 (1.205.19)

न हि मामाहवे क्रुद्धमन्यः साक्षाच्छचीपतेः । पुमान्योधयितुं शक्तः पाण्डवाद्वा किरीटिनः ॥

na hi māmāhave kruddhamanyaḥ sākṣācchacīpateḥ | pumānyodhayituṃ śaktaḥ pāṇḍavādvā kirīṭinaḥ

क्योंकि युद्ध में मेरे क्रुद्ध होने पर साक्षात् शचीपति इन्द्र या किरीटधारी पाण्डव अर्जुन के सिवा कोई दूसरा पुरुष मुझसे नहीं लड़ सकता।

श्लोक 20 (1.205.20)

दग्धा जतुगृहे सर्वे पाण्डवाः सार्जुनास्तदा । विनार्जुनं वा समरे मां निहन्तुमशक्नुवन् ॥

dagdhā jatugṛhe sarve pāṇḍavāḥ sārjunāstadā | vinārjunaṃ vā samare māṃ nihantumaśaknuvan

परन्तु अर्जुन सहित सभी पाण्डव तो तभी लाक्षागृह में जल चुके; और अर्जुन के सिवा उनमें से कोई भी युद्ध में मुझे मार नहीं सकता था।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (1.205.21)

तमेवंवादिनं तत्र फाल्गुनः प्रत्यभाषत । नास्मि कर्ण धनुर्वेदो नास्मि रामः प्रतापवान् ॥

tamevaṃvādinaṃ tatra phālgunaḥ pratyabhāṣata | nāsmi karṇa dhanurvedo nāsmi rāmaḥ pratāpavān

उसके ऐसा कहने पर अर्जुन ने उत्तर दिया — "कर्ण, न मैं धनुर्वेद हूँ, न प्रतापी परशुराम।

अर्जुन उवाच

श्लोक 22 (1.205.22)

ब्राह्मणोऽस्मि युधां श्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां वरः । ब्राह्मे पौरन्दरे चास्त्रे निष्ठितो गुरुशासनात् ॥

brāhmaṇo'smi yudhāṃ śreṣṭhaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | brāhme paurandare cāstre niṣṭhito guruśāsanāt

मैं ब्राह्मण हूँ — योद्धाओं में श्रेष्ठ और सब शस्त्रधारियों में उत्तम। गुरु की शिक्षा से मैं ब्रह्मास्त्र और इन्द्र के अस्त्र में पारंगत हूँ।

श्लोक 23 (1.205.23)

स्थितोऽस्म्यद्य रणे जेतुं त्वां वै वीर स्थिरो भव । निर्जितोऽस्मीति वा ब्रूहि ततो व्रज यथासुखम् ॥

sthito'smyadya raṇe jetuṃ tvāṃ vai vīra sthiro bhava | nirjito'smīti vā brūhi tato vraja yathāsukham

आज मैं तुम्हें जीतने के लिए रण में खड़ा हूँ; वीर, दृढ़ रहो। या फिर कह दो कि 'मैं हार गया', और जहाँ चाहो चले जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (1.205.24)

एवमुक्त्वाऽथ कर्णस्य धनुश्चिच्छेद पाण्डवः । ततोऽन्यद्धनुरादाय संयोद्धुं सन्दधे शरम् ॥

evamuktvā'tha karṇasya dhanuściccheda pāṇḍavaḥ | tato'nyaddhanurādāya saṃyoddhuṃ sandadhe śaram

यह कहकर पाण्डुपुत्र अर्जुन ने कर्ण का धनुष काट दिया। तब कर्ण ने दूसरा धनुष लेकर युद्ध के लिए बाण चढ़ाया।

श्लोक 25 (1.205.25)

दृष्ट्वा तच्चापि कौन्तेयश्छित्वा तद्धनुराशुगैः । तथा वैकर्तनं कर्णं बिभेद समरेऽर्जुनः ॥

dṛṣṭvā taccāpi kaunteyaśchitvā taddhanurāśugaiḥ | tathā vaikartanaṃ karṇaṃ bibheda samare'rjunaḥ

यह देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन ने अपने शीघ्रगामी बाणों से वह धनुष भी काट डाला और युद्ध में वैकर्तन कर्ण को बींध दिया।

श्लोक 26 (1.205.26)

ततः कर्णस्तु राधेयः छिन्नधन्वा महाबलः । शरैरतीव विद्धाङ्गः पलायनमथाकरोत् ॥

tataḥ karṇastu rādheyaḥ chinnadhanvā mahābalaḥ | śarairatīva viddhāṅgaḥ palāyanamathākarot

तब धनुष कट जाने पर और बाणों से अंग-अंग बुरी तरह बिंध जाने पर महाबली राधापुत्र कर्ण भाग खड़ा हुआ।

श्लोक 27 (1.205.27)

पुनरायान्मुहूर्तेन गृहीत्वा सशरं धनुः । ववर्ष शरवर्षाणि पार्थं वैकर्तनस्तथा ॥

punarāyānmuhūrtena gṛhītvā saśaraṃ dhanuḥ | vavarṣa śaravarṣāṇi pārthaṃ vaikartanastathā

क्षणभर में वह बाणों सहित धनुष लेकर लौट आया और वैकर्तन कर्ण ने अर्जुन पर बाणों की वर्षा की।

श्लोक 28 (1.205.28)

तानि वै शरजालानि कौन्तेयोऽभ्यहनच्छरैः । ज्ञात्वा सर्वाञ्शरान्घोरान्कर्णोऽधावद्द्रुतं बहिः ॥

tāni vai śarajālāni kaunteyo'bhyahanaccharaiḥ | jñātvā sarvāñśarānghorānkarṇo'dhāvaddrutaṃ bahiḥ

कुन्तीपुत्र ने अपने बाणों से उन बाण-जालों को नष्ट कर दिया। उन सभी बाणों को भयंकर जानकर कर्ण तेज़ी से युद्ध से बाहर भाग गया,

श्लोक 29 (1.205.29)

ब्राह्मं तेजस्तदाऽजय्यं मन्यमानो महारथः । अपरस्मिन्वनोद्देशे वीरौ शल्यवृकोदरौ ॥

brāhmaṃ tejastadā'jayyaṃ manyamāno mahārathaḥ | aparasminvanoddeśe vīrau śalyavṛkodarau

क्योंकि उस महारथी ने ब्राह्मण-तेज को अजेय माना। उधर रंगभूमि के दूसरे भाग में दोनों वीर शल्य और भीमसेन —

श्लोक 30 (1.205.30)

बलिनौ युद्धसंपन्नौ विद्यया च बलेन च । अन्योन्यमाह्वयन्तौ तु मत्ताविव महागजौ ॥

balinau yuddhasaṃpannau vidyayā ca balena ca | anyonyamāhvayantau tu mattāviva mahāgajau

दोनों बलवान, विद्या और बल दोनों में युद्धकुशल — मतवाले हाथियों की तरह एक-दूसरे को ललकारने लगे।

श्लोक 31 (1.205.31)

मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव निघ्नन्तावितरेतरम् । प्रकर्षणाकर्षणयोरभ्याकर्षविकर्षणैः ॥

muṣṭibhirjānubhiścaiva nighnantāvitaretaram | prakarṣaṇākarṣaṇayorabhyākarṣavikarṣaṇaiḥ

मुक्कों और घुटनों से एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए, धकेलते-खींचते, पास घसीटते और दूर झटकते हुए,

श्लोक 32 (1.205.32)

आचकर्षतुरन्योन्यं मुष्टिभिश्चापि जघ्नतुः । ततश्चटचटाशब्दः सुघोरो ह्यभवत्तयोः ॥

ācakarṣaturanyonyaṃ muṣṭibhiścāpi jaghnatuḥ | tataścaṭacaṭāśabdaḥ sughoro hyabhavattayoḥ

वे एक-दूसरे को घसीटते और मुक्कों से मारते रहे। तब उन दोनों से चट-चट की भयंकर ध्वनि उठने लगी।

श्लोक 33 (1.205.33)

पाषाणसंपातनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः । मुहूर्तं तौ तदाऽन्योन्यं समरे पर्यकर्षताम् ॥

pāṣāṇasaṃpātanibhaiḥ prahārairabhijaghnatuḥ | muhūrtaṃ tau tadā'nyonyaṃ samare paryakarṣatām

वे गिरती चट्टानों जैसे प्रहारों से एक-दूसरे को मारते रहे, और कुछ देर तक रण में एक-दूसरे को खींचते-घसीटते रहे।

श्लोक 34 (1.205.34)

ततो भीमः समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां शल्यमाहवे । अपातयत्कुरुश्रेष्ठो ब्राह्मणा जहसुस्तदा ॥

tato bhīmaḥ samutkṣipya bāhubhyāṃ śalyamāhave | apātayatkuruśreṣṭho brāhmaṇā jahasustadā

तब कुरुश्रेष्ठ भीम ने युद्ध में शल्य को दोनों भुजाओं से ऊपर उठाकर नीचे पटक दिया, और ब्राह्मण हँस पड़े।

श्लोक 35 (1.205.35)

तत्राश्चर्यं भीमसेनश्चकार पुरुषर्षभः । यच्छल्यं पातितं भूमौ नावधीद्बलिनं बली ॥

tatrāścaryaṃ bhīmasenaścakāra puruṣarṣabhaḥ | yacchalyaṃ pātitaṃ bhūmau nāvadhīdbalinaṃ balī

वहाँ पुरुषश्रेष्ठ भीमसेन ने एक आश्चर्यजनक काम किया — बलवान शल्य को भूमि पर गिराकर भी उस बली ने उसे मारा नहीं।

श्लोक 36 (1.205.36)

पातिते भीमसेनेन शल्ये कर्णे च शङ्किते । विस्मयः परमो जज्ञे सर्वेषां पश्यतां नृणाम् ॥

pātite bhīmasenena śalye karṇe ca śaṅkite | vismayaḥ paramo jajñe sarveṣāṃ paśyatāṃ nṛṇām

भीमसेन द्वारा शल्य के गिरा दिए जाने और कर्ण के आशंकित हो जाने पर देखने वाले सभी लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ।

श्लोक 37 (1.205.37)

ततो राजसमूहस्य पश्यतो वृक्षमारुजत् । ततस्तु भीमं संज्ञाभिर्वारयामास धर्मराट् ॥

tato rājasamūhasya paśyato vṛkṣamārujat | tatastu bhīmaṃ saṃjñābhirvārayāmāsa dharmarāṭ

तब राजाओं के समूह के देखते-देखते भीम ने एक वृक्ष उखाड़ लिया; पर धर्मराज युधिष्ठिर ने संकेतों से उसे रोक दिया।

श्लोक 38 (1.205.38)

आकारज्ञस्तथा भ्रातुः पाण्डवोऽपि न्यवर्तत । धर्मराजश्च कौरव्य दुर्योधनममर्षणम् ॥

ākārajñastathā bhrātuḥ pāṇḍavo'pi nyavartata | dharmarājaśca kauravya duryodhanamamarṣaṇam

भाई के मनोभाव को समझकर पाण्डुपुत्र भीम पीछे हट गया। और हे कुरुनन्दन, धर्मराज ने असहिष्णु दुर्योधन से

श्लोक 39 (1.205.39)

अयोधयत्सभामध्ये पश्यतां वै महीक्षिताम् । ततो दुर्योधनस्तं तु ह्यवज्ञाय युधिष्ठिरम् ॥

ayodhayatsabhāmadhye paśyatāṃ vai mahīkṣitām | tato duryodhanastaṃ tu hyavajñāya yudhiṣṭhiram

राजाओं के देखते-देखते सभा के बीच युद्ध किया। किन्तु दुर्योधन ने युधिष्ठिर की अवहेलना करके

श्लोक 40 (1.205.40)

नायोधयत्तदा तेन बलवान्वै सुयोधनः । एतस्मिन्नन्तरेऽविध्यद्बाणेनानतपर्वणा ॥

nāyodhayattadā tena balavānvai suyodhanaḥ | etasminnantare'vidhyadbāṇenānataparvaṇā

बलवान सुयोधन ने उस समय उनसे युद्ध नहीं किया। इसी बीच धर्मराज युधिष्ठिर ने झुकी गाँठों वाले बाण से

श्लोक 41 (1.205.41)

दुर्योधनममित्रघ्नं धर्मराजो युधिष्ठिरः । ततो दुर्योधनः क्रुद्धो दण्डाहत इवोरगः ॥

duryodhanamamitraghnaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | tato duryodhanaḥ kruddho daṇḍāhata ivoragaḥ

शत्रुनाशक दुर्योधन को बींध दिया। तब दुर्योधन डंडे से मारे गए साँप की तरह क्रुद्ध होकर

श्लोक 42 (1.205.42)

प्रत्ययुध्यत राजानं यत्नं परममास्थितः । छित्त्वा राजा धनुः सज्यं धार्तराष्ट्रस्य संयुगे ॥

pratyayudhyata rājānaṃ yatnaṃ paramamāsthitaḥ | chittvā rājā dhanuḥ sajyaṃ dhārtarāṣṭrasya saṃyuge

पूरे यत्न से राजा युधिष्ठिर से लड़ने लगा। तब राजा ने युद्ध में धृतराष्ट्रपुत्र का चढ़ा हुआ धनुष काट दिया

श्लोक 43 (1.205.43)

अभ्यवर्षच्छरौघैस्तं स हित्वा प्राद्रवद्रणम् । दुःशासनस्तु संक्रुद्धः सहदेवेन पार्थिव ॥

abhyavarṣaccharaughaistaṃ sa hitvā prādravadraṇam | duḥśāsanastu saṃkruddhaḥ sahadevena pārthiva

और उस पर बाणों की झड़ी लगा दी; तब वह रण छोड़कर भाग गया। हे राजन्, दुःशासन क्रोध में भरकर सहदेव से भिड़ा,

श्लोक 44 (1.205.44)

युद्ध्वा च सुचिरं कालं सहदेवेन निर्जितः । उत्सृज्य च धनुः सङ्ख्ये जानुभ्यामवनीं गतः । उत्थाय सोऽभिदुद्राव सोऽसिं जग्राह चर्म च ॥

yuddhvā ca suciraṃ kālaṃ sahadevena nirjitaḥ | utsṛjya ca dhanuḥ saṅkhye jānubhyāmavanīṃ gataḥ | utthāya so'bhidudrāva so'siṃ jagrāha carma ca

और बहुत देर तक लड़ने के बाद सहदेव से पराजित हो गया। युद्ध में धनुष छोड़कर वह घुटनों के बल भूमि पर आ गिरा; फिर उठकर आगे झपटा और उसने तलवार और ढाल उठा ली।

श्लोक 45 (1.205.45)

विकर्णचित्रसेनाभ्यां निगृहीतश्च कौरवः । मा युद्धमिति कौरव्य ब्राह्मणेनाबलेन वै ॥

vikarṇacitrasenābhyāṃ nigṛhītaśca kauravaḥ | mā yuddhamiti kauravya brāhmaṇenābalena vai

हे कुरुनन्दन, विकर्ण और चित्रसेन ने यह कहकर उस कौरव को रोक लिया — "दुर्बल ब्राह्मण से युद्ध मत करो।"

श्लोक 46 (1.205.46)

दुःसहो नकुलश्चोभौ युद्धं कर्तुं समुद्यतौ । तौ दृष्ट्वा कौरवा युद्धं वाक्यमूचुर्महाबलौ ॥

duḥsaho nakulaścobhau yuddhaṃ kartuṃ samudyatau | tau dṛṣṭvā kauravā yuddhaṃ vākyamūcurmahābalau

दुःसह और नकुल दोनों युद्ध के लिए तैयार खड़े थे। उन दोनों महाबलियों को युद्धरत देखकर कौरवों ने यह बात कही —

कौरवा ऊचुः

श्लोक 47 (1.205.47)

निवर्तन्तां भवन्तो वै कुतो विप्रेषु क्रूरता । दुर्बला ब्राह्मणाश्चेमे भवन्तो वै महाबलाः ॥

nivartantāṃ bhavanto vai kuto vipreṣu krūratā | durbalā brāhmaṇāśceme bhavanto vai mahābalāḥ

"आप लोग लौट चलें! ब्राह्मणों के प्रति ऐसी कठोरता क्यों? ये ब्राह्मण दुर्बल हैं और आप महाबली हैं।

श्लोक 48 (1.205.48)

द्वावत्र ब्राह्मणौ क्रूरौ वाय्विन्द्रसदृशौ बले । ये वा के वा नमस्तेभ्यो गच्छामः स्वपुरं वयम् ॥

dvāvatra brāhmaṇau krūrau vāyvindrasadṛśau bale | ye vā ke vā namastebhyo gacchāmaḥ svapuraṃ vayam

यहाँ दो ब्राह्मण बड़े उग्र हैं, बल में वायु और इन्द्र के समान। वे कोई भी हों, उन्हें नमस्कार! हम अपने नगर लौट रहे हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 49 (1.205.49)

एवं संभाषमाणास्ते न्यवर्तन्ताथ कौरवाः । जहृषुर्ब्राह्मणास्तत्र समेतास्तत्र सङ्घशः ॥

evaṃ saṃbhāṣamāṇāste nyavartantātha kauravāḥ | jahṛṣurbrāhmaṇāstatra sametāstatra saṅghaśaḥ

इस प्रकार बातें करते हुए कौरव लौट गए। वहाँ झुंड के झुंड इकट्ठे हुए ब्राह्मण हर्षित हो उठे।

श्लोक 50 (1.205.50)

बहुशस्ते ततस्तत्र क्षत्रिया रणमूर्धनि । प्रेक्षमाणास्तथाऽतिष्ठन्ब्राह्मणांश्च समन्ततः ॥

bahuśaste tatastatra kṣatriyā raṇamūrdhani | prekṣamāṇāstathā'tiṣṭhanbrāhmaṇāṃśca samantataḥ

बहुत से क्षत्रिय वहाँ रणभूमि के अग्रभाग में खड़े होकर चारों ओर ब्राह्मणों को देखते रहे।

श्लोक 51 (1.205.51)

ब्राह्मणाश्च जयं प्राप्ताः कन्यामादाय निर्ययुः । विजिते भीमसेनेन शल्ये कर्णे च निर्जिते ॥

brāhmaṇāśca jayaṃ prāptāḥ kanyāmādāya niryayuḥ | vijite bhīmasenena śalye karṇe ca nirjite

और विजयी ब्राह्मण कन्या को साथ लेकर बाहर निकल गए। भीमसेन द्वारा शल्य के जीत लिए जाने पर, कर्ण के पराजित हो जाने पर,

श्लोक 52 (1.205.52)

दुर्योधने चापयाते तथा दुःशासने रणात् । शङ्किताः सर्वराजानः परिवव्रुर्वृकोदरम् ॥

duryodhane cāpayāte tathā duḥśāsane raṇāt | śaṅkitāḥ sarvarājānaḥ parivavrurvṛkodaram

और दुर्योधन तथा दुःशासन के रण से चले जाने पर सभी राजा आशंकित होकर भीमसेन को घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 53 (1.205.53)

ऊचुश्च सहितास्तत्र साध्विमौ ब्राह्मणर्षभौ । विज्ञायेतां क्वजन्मानौ क्वनिवासौ तथैव च ॥

ūcuśca sahitāstatra sādhvimau brāhmaṇarṣabhau | vijñāyetāṃ kvajanmānau kvanivāsau tathaiva ca

वे सब मिलकर बोले — "वाह, ये दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण! पता लगाया जाए कि ये कहाँ जन्मे हैं और कहाँ रहते हैं।

राजान ऊचुः

श्लोक 54 (1.205.54)

को हि राधासुतं कर्णं शक्तो योधयितुं रणे । अन्यत्र रामाद्द्रोणाद्वा पाण्डवाद्वा किरीटिनः ॥

ko hi rādhāsutaṃ karṇaṃ śakto yodhayituṃ raṇe | anyatra rāmāddroṇādvā pāṇḍavādvā kirīṭinaḥ

क्योंकि परशुराम, द्रोण या किरीटधारी पाण्डव अर्जुन के सिवा राधापुत्र कर्ण से युद्ध में कौन लड़ सकता है,

श्लोक 55 (1.205.55)

कृष्णाद्वा देवकीपुत्रात्कृपाद्वापि शरद्वतः । को वा दुर्योधनं शक्तः प्रतियोधयितुं रणे ॥

kṛṣṇādvā devakīputrātkṛpādvāpi śaradvataḥ | ko vā duryodhanaṃ śaktaḥ pratiyodhayituṃ raṇe

या देवकीपुत्र कृष्ण, या शरद्वान के पुत्र कृप? और युद्ध में दुर्योधन का सामना कौन कर सकता है?

श्लोक 56 (1.205.56)

तथैव मद्राधिपतिं शल्यं बलवतां वरम् । बलदेवादृते वीरात्पाण्डवाद्वा वृकोदरात् ॥

tathaiva madrādhipatiṃ śalyaṃ balavatāṃ varam | baladevādṛte vīrātpāṇḍavādvā vṛkodarāt

इसी प्रकार बलवानों में श्रेष्ठ मद्रराज शल्य को — वीर बलदेव, पाण्डुपुत्र भीमसेन

श्लोक 57 (1.205.57)

वीराद्दुर्योधनाद्वाऽन्यः शक्तः पातयितुं रणे । क्रियतामवहारोऽस्माद्युद्धाद्ब्राह्मणसंवृतात् ॥

vīrādduryodhanādvā'nyaḥ śaktaḥ pātayituṃ raṇe | kriyatāmavahāro'smādyuddhādbrāhmaṇasaṃvṛtāt

या वीर दुर्योधन के सिवा और कौन युद्ध में गिरा सकता है? ब्राह्मणों से घिरे इस युद्ध से हमें हट जाना चाहिए।

श्लोक 58 (1.205.58)

ब्राह्मणा हि सदा रक्ष्याः सापराधाऽपि नित्यदा । अथैनानुपलभ्येह पुनर्योत्स्याम हृष्टवत् ॥

brāhmaṇā hi sadā rakṣyāḥ sāparādhā'pi nityadā | athainānupalabhyeha punaryotsyāma hṛṣṭavat

क्योंकि ब्राह्मण अपराधी हों तब भी उनकी सदा रक्षा करनी चाहिए। इनका पता लगा लेने के बाद हम फिर प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करेंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 59 (1.205.59)

तांस्तथावादिनः सर्वान्प्रसमीक्ष्य क्षितीश्वरान् । अथान्यान्पुरुषांश्चापि कृत्वा तत्कर्म संयुगे ॥

tāṃstathāvādinaḥ sarvānprasamīkṣya kṣitīśvarān | athānyānpuruṣāṃścāpi kṛtvā tatkarma saṃyuge

युद्ध में वह पराक्रम करने के बाद दोनों भाई इस प्रकार बोलते हुए उन सभी राजाओं को और अन्य लोगों को भी देखते हुए चुपचाप खड़े रहे।

श्लोक 60 (1.205.60)

तत्कर्म भीमस्य समीक्ष्य कृष्णः । कुन्तीसुतौ तौ परिशङ्कमानः । निवारयामास महीपतींस्ता- । न्धर्मेण लब्धेत्यनुनीय सर्वान् ॥

tatkarma bhīmasya samīkṣya kṛṣṇaḥ | kuntīsutau tau pariśaṅkamānaḥ | nivārayāmāsa mahīpatīṃstā- | ndharmeṇa labdhetyanunīya sarvān

भीम का वह पराक्रम देखकर और उन दोनों के कुन्तीपुत्र होने का अनुमान करके श्रीकृष्ण ने सभी राजाओं को यह समझाकर रोक दिया कि कन्या धर्मपूर्वक जीती गई है।

श्लोक 61 (1.205.61)

एवं ते विनिवृत्तास्तु युद्धाद्युद्धविशारदाः । यथावासं ययुः सर्वे विस्मिता राजसत्तमाः ॥

evaṃ te vinivṛttāstu yuddhādyuddhaviśāradāḥ | yathāvāsaṃ yayuḥ sarve vismitā rājasattamāḥ

इस प्रकार युद्धकुशल वे श्रेष्ठ राजा युद्ध से लौटकर विस्मित होते हुए अपने-अपने निवासों को चले गए।

श्लोक 62 (1.205.62)

वृत्तो ब्रह्मोत्तरो रङ्गः पाञ्चाली ब्राह्मणैर्वृता । इति ब्रुवन्तः प्रययुर्ये तत्रासन्समागताः ॥

vṛtto brahmottaro raṅgaḥ pāñcālī brāhmaṇairvṛtā | iti bruvantaḥ prayayurye tatrāsansamāgatāḥ

"रंगभूमि का यह आयोजन ब्राह्मणों की विजय पर समाप्त हुआ; पाञ्चाली को ब्राह्मणों ने पा लिया" — ऐसा कहते हुए वहाँ आए सभी लोग चले गए।

श्लोक 63 (1.205.63)

ब्राह्मणैस्तु प्रतिच्छन्नौ रौरवाजिनवासिभिः । कृच्छ्रेण जग्मतुस्तौ तु भीमसेनधनञ्जयौ ॥

brāhmaṇaistu praticchannau rauravājinavāsibhiḥ | kṛcchreṇa jagmatustau tu bhīmasenadhanañjayau

रुरु मृग की खाल ओढ़े ब्राह्मणों से घिरे हुए भीमसेन और अर्जुन बड़ी कठिनाई से वहाँ से निकल पाए।

श्लोक 64 (1.205.64)

विमुक्तौ जनसंबाधाच्छत्रुभिः परिविक्षतौ । कृष्णयानुगतौ तत्र नृवीरौ तौ विरेजतुः ॥

vimuktau janasaṃbādhācchatrubhiḥ parivikṣatau | kṛṣṇayānugatau tatra nṛvīrau tau virejatuḥ

भीड़ के दबाव से छूटकर, शत्रुओं के प्रहारों से क्षत-विक्षत, कृष्णा (द्रौपदी) को साथ लिए वे दोनों नरवीर ऐसे शोभा पा रहे थे

श्लोक 65 (1.205.65)

पौर्णमास्यां घनैर्मुक्तौ चन्द्रसूर्याविवोदितौ । तेषां माता बहुविधं विनाशं पर्यचिन्तयत् ॥

paurṇamāsyāṃ ghanairmuktau candrasūryāvivoditau | teṣāṃ mātā bahuvidhaṃ vināśaṃ paryacintayat

जैसे पूर्णिमा को बादलों से मुक्त होकर उदित चन्द्रमा और सूर्य। उधर उनकी माता अनेक प्रकार से उनके विनाश की आशंका करने लगीं,

श्लोक 66 (1.205.66)

अनागच्छत्सु पुत्रेषु भैक्षकाले च लङ्घिते । धार्तराष्ट्रैर्हताश्च स्युर्विज्ञाय कुरुपुङ्गवाः ॥

anāgacchatsu putreṣu bhaikṣakāle ca laṅghite | dhārtarāṣṭrairhatāśca syurvijñāya kurupuṅgavāḥ

क्योंकि उनके पुत्र लौटे नहीं थे और भिक्षा का समय बीत चुका था — "कहीं धृतराष्ट्र के पुत्रों ने इन कुरुश्रेष्ठों को पहचानकर मार तो नहीं डाला,

श्लोक 67 (1.205.67)

मायान्वितैर्वा रक्षोभिः सुघोरैर्दृढवैरिभिः । विपरीतं मतं जातं व्यासस्यापि महात्मनः ॥

māyānvitairvā rakṣobhiḥ sughorairdṛḍhavairibhiḥ | viparītaṃ mataṃ jātaṃ vyāsasyāpi mahātmanaḥ

या मायावी, भयंकर और कट्टर शत्रु राक्षसों ने? क्या महात्मा व्यास का भी विचार उलटा निकला?"

श्लोक 68 (1.205.68)

इत्येवं चिन्तयामास सुतस्नेहावृता पृथा । ततः सुप्तजनप्राये दुर्दिने मेघसंप्लुते ॥

ityevaṃ cintayāmāsa sutasnehāvṛtā pṛthā | tataḥ suptajanaprāye durdine meghasaṃplute

पुत्रों के स्नेह में डूबी पृथा इस प्रकार सोचती रहीं। तब, जब लगभग सभी लोग विश्राम कर रहे थे और दिन बादलों से घिरा, अँधेरा था,

श्लोक 69 (1.205.69)

महत्यथापराह्णे तु घनैः सूर्य इवावृतः । ब्राह्मणैः प्राविशत्तत्र जिष्णुर्भार्गववेश्म तत् ॥

mahatyathāparāhṇe tu ghanaiḥ sūrya ivāvṛtaḥ | brāhmaṇaiḥ prāviśattatra jiṣṇurbhārgavaveśma tat

दिन ढलने पर, बादलों से ढके सूर्य के समान अर्जुन ब्राह्मणों के साथ उस कुम्हार के घर में प्रविष्ट हुए।

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