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आदि पर्व · अध्याय 211

पाँच पतियों के प्रश्न पर व्यास का निर्णय

व्यास का आदरपूर्वक स्वागत होता है, और द्रुपद पूछते हैं कि एक स्त्री धर्म-संकर के बिना अनेक पुरुषों की पत्नी कैसे हो सकती है। व्यास सबसे उनका मत पूछते हैं: द्रुपद इसे अधर्म बताते हैं, और धृष्टद्युम्न कहते हैं कि यह विषय इतना संदिग्ध है कि उन जैसे लोग इसका निर्णय नहीं कर सकते। युधिष्ठिर सात ऋषियों के साथ रहने वाली जटिला और दस प्रचेताओं की पत्नी वार्क्षी के उदाहरण तथा माता के वचन की प्रामाणिकता बताते हैं; कुन्ती को भय है कि उनका वचन असत्य न हो जाए। व्यास उन्हें आश्वासन देते हैं कि वे असत्य से मुक्त होंगी, और फिर द्रुपद को एकान्त में ले जाकर बताते हैं कि यह विवाह धर्मसम्मत कैसे है और पाँच पतियों का वरदान कैसे मिला था।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.211.1)

ततस्ते पाण्डवाः सर्वे पाञ्चाल्यश्च महायशाः । प्रत्युत्थाय महात्मानं कृष्णं सर्वेऽभ्यवादयन् ॥

tataste pāṇḍavāḥ sarve pāñcālyaśca mahāyaśāḥ | pratyutthāya mahātmānaṃ kṛṣṇaṃ sarve'bhyavādayan

तब सब पाण्डवों और यशस्वी पाञ्चालनरेश ने उठकर महात्मा कृष्णद्वैपायन की अगवानी की और सबने उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 2 (1.211.2)

प्रतिनन्द्य स तां पूजां पृष्ट्वा कुशलमन्ततः । आसने काञ्चने शुद्धे निषसाद महामनाः ॥

pratinandya sa tāṃ pūjāṃ pṛṣṭvā kuśalamantataḥ | āsane kāñcane śuddhe niṣasāda mahāmanāḥ

उस पूजा को प्रसन्नता से स्वीकार करके और अन्त में उनका कुशल-क्षेम पूछकर वे महामना एक पवित्र स्वर्ण-आसन पर बैठ गए।

श्लोक 3 (1.211.3)

अनुज्ञातास्तु ते सर्वे कृष्णेनामिततेजसा । आसनेषु महार्हेषु निषेदुर्द्विपदां वराः ॥

anujñātāstu te sarve kṛṣṇenāmitatejasā | āsaneṣu mahārheṣu niṣedurdvipadāṃ varāḥ

अपार तेज वाले कृष्णद्वैपायन की अनुमति पाकर वे सब नरश्रेष्ठ बहुमूल्य आसनों पर बैठ गए।

श्लोक 4 (1.211.4)

ततो मुहूर्तान्मधुरां वाणीमुच्चार्य पार्षतः । पप्रच्छ तं महात्मानं द्रौपद्यर्थं विशांपते ॥

tato muhūrtānmadhurāṃ vāṇīmuccārya pārṣataḥ | papraccha taṃ mahātmānaṃ draupadyarthaṃ viśāṃpate

हे प्रजापालक, थोड़ी देर बाद पार्षत (द्रुपद) ने मधुर वाणी में उन महात्मा से द्रौपदी के विषय में पूछा —

द्रुपद उवाच

श्लोक 5 (1.211.5)

कथमेका बहूनां स्यान्न च स्याद्धर्मसंकरः । एतन्मे भगवान्सर्वं प्रब्रवीतु यथातथम् ॥

kathamekā bahūnāṃ syānna ca syāddharmasaṃkaraḥ | etanme bhagavānsarvaṃ prabravītu yathātatham

"एक स्त्री अनेक पुरुषों की पत्नी कैसे हो सकती है, और फिर भी धर्म में संकरता न आए? भगवन्, यह सब मुझे ठीक-ठीक बताइए।"

व्यास उवाच

श्लोक 6 (1.211.6)

अस्मिन्धर्मे विप्रलब्धे लोकवेदविरोधके । यस्य यस्य मतं यद्यच्छ्रोतुमिच्छामि तस्य तत् ॥

asmindharme vipralabdhe lokavedavirodhake | yasya yasya mataṃ yadyacchrotumicchāmi tasya tat

लोक और वेद के विरुद्ध प्रतीत होने वाले इस भ्रामक धर्म के विषय में मैं प्रत्येक का जो-जो मत हो, वह सुनना चाहता हूँ।

द्रुपद उवाच

श्लोक 7 (1.211.7)

अधर्मोऽयं मम मतो विरुद्धो लोकवेदयोः । न ह्येका विद्यते पत्नी बहूनां द्विजसत्तम ॥

adharmo'yaṃ mama mato viruddho lokavedayoḥ | na hyekā vidyate patnī bahūnāṃ dvijasattama

मेरे मत में यह अधर्म है, लोक और वेद दोनों के विरुद्ध। हे द्विजश्रेष्ठ, अनेक पुरुषों की एक पत्नी कहीं नहीं होती।

श्लोक 8 (1.211.8)

न चाप्याचरितः पूर्वैरयं धर्मो महात्मभिः । न चाप्यधर्मो विद्वद्भिश्चरितव्यः कथंचन ॥

na cāpyācaritaḥ pūrvairayaṃ dharmo mahātmabhiḥ | na cāpyadharmo vidvadbhiścaritavyaḥ kathaṃcana

न ही पूर्वकाल के महात्माओं ने इस धर्म का आचरण किया, और विद्वानों को किसी भी प्रकार अधर्म का आचरण नहीं करना चाहिए।

श्लोक 9 (1.211.9)

ततोऽहं न करोम्येनं व्यवसायं क्रियां प्रति । धर्मः सदैव संदिग्धः प्रतिभाति हि मे त्वयम् ॥

tato'haṃ na karomyenaṃ vyavasāyaṃ kriyāṃ prati | dharmaḥ sadaiva saṃdigdhaḥ pratibhāti hi me tvayam

इसीलिए मैं इस कार्य का निश्चय नहीं कर रहा हूँ; क्योंकि यह धर्म मुझे सदा संदिग्ध ही प्रतीत होता है।

धृष्टद्युम्न उवाच

श्लोक 10 (1.211.10)

यवीयसः कथं भार्यां ज्येष्ठो भ्राता द्विजर्षभ । ब्रह्मन्समभिवर्तेत सद्वृत्तः संस्तपोधन ॥

yavīyasaḥ kathaṃ bhāryāṃ jyeṣṭho bhrātā dvijarṣabha | brahmansamabhivarteta sadvṛttaḥ saṃstapodhana

हे द्विजश्रेष्ठ, हे तपोधन ब्रह्मन्, सदाचारी होते हुए बड़ा भाई अपने छोटे भाई की पत्नी के पास कैसे जा सकता है?

श्लोक 11 (1.211.11)

न तु धर्मस्य सूक्ष्मत्वाद्गतिं विद्मः कथंचन । अधर्मो धर्म इति वा व्यवसायो न शक्यते ॥

na tu dharmasya sūkṣmatvādgatiṃ vidmaḥ kathaṃcana | adharmo dharma iti vā vyavasāyo na śakyate

किन्तु धर्म सूक्ष्म होने के कारण हम उसकी गति किसी प्रकार नहीं जान पाते; यह अधर्म है या धर्म, इसका निश्चय —

श्लोक 12 (1.211.12)

कर्तुमस्मद्विधैर्ब्रह्मंस्ततोऽयं न व्यवस्यते । पञ्चानां महिषी कृष्णा भवत्विति कथंचन ॥

kartumasmadvidhairbrahmaṃstato'yaṃ na vyavasyate | pañcānāṃ mahiṣī kṛṣṇā bhavatviti kathaṃcana

— हम जैसे लोग नहीं कर सकते, हे ब्रह्मन्। इसलिए किसी प्रकार यह निश्चय नहीं हो पाता कि कृष्णा पाँचों की रानी हो।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 13 (1.211.13)

न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीयते मतिः । वर्तते हि मनो मेऽत्र नैषोऽधर्मः कथंचन ॥

na me vāganṛtaṃ prāha nādharme dhīyate matiḥ | vartate hi mano me'tra naiṣo'dharmaḥ kathaṃcana

मेरी वाणी ने कभी असत्य नहीं कहा, और मेरी बुद्धि अधर्म की ओर नहीं जाती। मेरा मन इसी में प्रवृत्त है, इसलिए यह किसी प्रकार अधर्म नहीं है।

श्लोक 14 (1.211.14)

श्रूयते हि पुराणेऽपि जटिला नाम गौतमी । ऋषीनध्यासितवती सप्त धर्मभृतां वरा ॥

śrūyate hi purāṇe'pi jaṭilā nāma gautamī | ṛṣīnadhyāsitavatī sapta dharmabhṛtāṃ varā

पुराण में भी सुना जाता है कि धर्मात्माओं में श्रेष्ठ गौतमवंशी जटिला नाम की स्त्री सात ऋषियों के साथ रही थी।

श्लोक 15 (1.211.15)

तथैव मुनिजा वार्क्षी तपोभिर्भावितात्मनः । संगताभूद्दश भ्रातॄनेकनाम्नः प्रचेतसः ॥

tathaiva munijā vārkṣī tapobhirbhāvitātmanaḥ | saṃgatābhūddaśa bhrātṝnekanāmnaḥ pracetasaḥ

इसी प्रकार मुनि-कन्या वार्क्षी तप से पवित्र हुए, एक ही नाम वाले दस भाइयों — प्रचेताओं — के साथ संयुक्त हुई थी।

श्लोक 16 (1.211.16)

गुरोर्हि वचनं प्राहुर्धर्म्यं धर्मज्ञसत्तम । गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमको गुरुः ॥

gurorhi vacanaṃ prāhurdharmyaṃ dharmajñasattama | gurūṇāṃ caiva sarveṣāṃ mātā paramako guruḥ

हे धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, गुरुजन के वचन को धर्मसंगत कहा गया है, और सब गुरुओं में माता सबसे बड़ी गुरु है।

श्लोक 17 (1.211.17)

सा चाप्युक्तवती वाचं भैक्षवद्भुज्यतामिति । तस्मादेतदहं मन्ये परं धर्मं द्विजोत्तम ॥

sā cāpyuktavatī vācaṃ bhaikṣavadbhujyatāmiti | tasmādetadahaṃ manye paraṃ dharmaṃ dvijottama

और उन्होंने कहा था, 'भिक्षा की भाँति मिलकर इसका उपभोग करो।' इसलिए, हे द्विजोत्तम, मैं इसे परम धर्म मानता हूँ।

कुन्त्युवाच

श्लोक 18 (1.211.18)

एवमेतद्यथा प्राह धर्मचारी युधिष्ठिरः । भुज्यतां भ्रातृभिः सार्धमित्यर्जुनमचोदयम् । अनृतान्मे भयं तीव्रं मुच्येऽहमनृतात्कथम् ॥

evametadyathā prāha dharmacārī yudhiṣṭhiraḥ | bhujyatāṃ bhrātṛbhiḥ sārdhamityarjunamacodayam | anṛtānme bhayaṃ tīvraṃ mucye'hamanṛtātkatham

धर्म का आचरण करने वाले युधिष्ठिर ने जैसा कहा है, बात वैसी ही है। मैंने ही अर्जुन से कहा था, 'भाइयों के साथ मिलकर इसका उपभोग करो।' मुझे असत्य का बड़ा भय है; मैं असत्य से कैसे छूटूँ?

व्यास उवाच

श्लोक 19 (1.211.19)

अनृतान्मोक्ष्यसे भद्रे धर्मश्चैव सनातनः । न तु वक्ष्यामि सर्वेषां पाञ्चाल शृणु मे स्वयम् ॥

anṛtānmokṣyase bhadre dharmaścaiva sanātanaḥ | na tu vakṣyāmi sarveṣāṃ pāñcāla śṛṇu me svayam

हे कल्याणी, तुम असत्य से मुक्त हो जाओगी, और यह सनातन धर्म ही है। किन्तु मैं यह सबके सामने नहीं कहूँगा; हे पाञ्चाल, तुम स्वयं मुझसे सुनो —

श्लोक 20 (1.211.20)

यथाऽयं विहितो धर्मो यतश्चायं सनातनः । यथा च प्राह कौन्तेयस्तथा धर्मो न संशयः ॥

yathā'yaṃ vihito dharmo yataścāyaṃ sanātanaḥ | yathā ca prāha kaunteyastathā dharmo na saṃśayaḥ

— कि यह धर्म किस प्रकार विहित हुआ और यह सनातन क्यों है। कुन्तीपुत्र ने जैसा कहा है, धर्म वैसा ही है; इसमें सन्देह नहीं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (1.211.21)

तत उत्थाय भगवान्व्यासो द्वैपायनः प्रभुः । करे गृहीत्वा राजानं राजवेश्म समाविशत् ॥

tata utthāya bhagavānvyāso dvaipāyanaḥ prabhuḥ | kare gṛhītvā rājānaṃ rājaveśma samāviśat

तब भगवान् व्यास द्वैपायन उठे और राजा का हाथ पकड़कर राजभवन के भीतर चले गए।

श्लोक 22 (1.211.22)

पाण्डवाश्चापि कुन्ती च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । विविशुस्तेऽपि तत्रैव प्रतीक्षन्ते स्म तावुभौ ॥

pāṇḍavāścāpi kuntī ca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | viviśuste'pi tatraiva pratīkṣante sma tāvubhau

पाण्डव, कुन्ती और पार्षत धृष्टद्युम्न भी वहीं प्रवेश करके उन दोनों की प्रतीक्षा करने लगे।

श्लोक 23 (1.211.23)

ततो द्वैपायनस्तस्मै नरेन्द्राय महात्मने । आचख्यौ तद्यथा धर्मो बहूनामेकपत्निता ॥

tato dvaipāyanastasmai narendrāya mahātmane | ācakhyau tadyathā dharmo bahūnāmekapatnitā

तब द्वैपायन ने उन महात्मा नरेश को बताया कि अनेक पुरुषों की एक पत्नी होना किस प्रकार धर्म है,

श्लोक 24 (1.211.24)

यथा च ते ददुश्चैव राजपुत्र्याः पुरा वरम् । धर्माद्यास्तपसा तुष्टाः पञ्चपत्नीत्वमीश्वराः ॥

yathā ca te daduścaiva rājaputryāḥ purā varam | dharmādyāstapasā tuṣṭāḥ pañcapatnītvamīśvarāḥ

और किस प्रकार पूर्वकाल में धर्म आदि देवों ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर राजकुमारी को पाँच पतियों की पत्नी होने का वर दिया था।

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