आदि पर्व · अध्याय 212
नालायनी की कथा
द्रुपद के साथ एकान्त में व्यास उनसे कहते हैं कि वे दुखी न हों: उनकी पुत्री के पाँच पति बहुत पहले ही याज और उपयाज के तप से निश्चित हो चुके थे। फिर वे नालायनी की कथा सुनाते हैं, जिसने अपने वृद्ध, रोगी और क्रोधी पति मौद्गल्य मुनि की निष्ठापूर्वक सेवा की, यहाँ तक कि उनका अँगूठा भोजन में गिर जाने पर भी वही अन्न खा लिया। प्रसन्न होकर मौद्गल्य ने पाँच रूप धारण करके उसकी कामना पूरी की, और दोनों अनेक रूपों में स्वर्ग और पृथ्वी पर साथ-साथ विचरे। व्यास बताते हैं कि वही नालायनी वेदी से द्रुपद की पुत्री कृष्णा के रूप में उत्पन्न हुई है। यह पूरा अध्याय समालोचनात्मक संस्करण में नहीं है।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (1.212.1)
मा भूद्राजंस्तव तापो मनस्थः । पञ्चानां भार्या दुहिता ममेति । मातुरेषा प्रार्थिता स्यात्तदानीं । पञ्चानां भार्या दुहिता ममेति ॥
mā bhūdrājaṃstava tāpo manasthaḥ | pañcānāṃ bhāryā duhitā mameti | mātureṣā prārthitā syāttadānīṃ | pañcānāṃ bhāryā duhitā mameti
हे राजन्, तुम्हारे मन में यह संताप न हो कि 'मेरी पुत्री पाँच की पत्नी है।' उस समय इसकी माता ने यही माँगा था — 'मेरी पुत्री पाँच की पत्नी हो।'
श्लोक 2 (1.212.2)
याजोपयाजौ धर्मरतौ तपोभ्यां । तौ चक्रतुः पञ्चपतित्वमस्याः । तत्पञ्चभिः पाण्डुसुतैरवाप्ता । भार्या कृष्णा मोदतां वै कुलं ते ॥
yājopayājau dharmaratau tapobhyāṃ | tau cakratuḥ pañcapatitvamasyāḥ | tatpañcabhiḥ pāṇḍusutairavāptā | bhāryā kṛṣṇā modatāṃ vai kulaṃ te
धर्मपरायण याज और उपयाज ने अपने तप से इसके पाँच पति होने का विधान किया था। इसलिए पाण्डु के पाँच पुत्रों की पत्नी बनी कृष्णा आनन्दित हो, और तुम्हारा कुल भी आनन्दित हो।
श्लोक 3 (1.212.3)
लोके नान्यो विद्यते त्वद्विशिष्टः । सर्वारीणामप्रधृष्योऽसि राजन् । भूयस्त्विदं शृणु मे त्वं विशोको । यथाऽऽगतं पञ्चपत्नीत्वमस्याः ॥
loke nānyo vidyate tvadviśiṣṭaḥ | sarvārīṇāmapradhṛṣyo'si rājan | bhūyastvidaṃ śṛṇu me tvaṃ viśoko | yathā''gataṃ pañcapatnītvamasyāḥ
संसार में तुमसे बढ़कर कोई नहीं है; हे राजन्, कोई भी शत्रु तुम्हें पराजित नहीं कर सकता। अब शोक छोड़कर मुझसे आगे यह सुनो कि यह पाँच की पत्नी कैसे बनी।
श्लोक 4 (1.212.4)
एषा नालायनी पूर्वं मौद्गल्यं स्थविरं पतिम् । आराधयामास तदा कुष्ठिनं तमनिन्दिता ॥
eṣā nālāyanī pūrvaṃ maudgalyaṃ sthaviraṃ patim | ārādhayāmāsa tadā kuṣṭhinaṃ tamaninditā
पूर्वकाल में यही नालायनी थी। उस अनिन्द्य स्त्री ने अपने वृद्ध पति मौद्गल्य की, जो कोढ़ से पीड़ित थे, बड़ी निष्ठा से सेवा की।
श्लोक 5 (1.212.5)
त्वगस्थिभूतं कटुकं लोलमीर्ष्युं सुकोपनम् । सुगन्धेतरगन्धाढ्यं वलीपलितमूर्धजम् ॥
tvagasthibhūtaṃ kaṭukaṃ lolamīrṣyuṃ sukopanam | sugandhetaragandhāḍhyaṃ valīpalitamūrdhajam
वे केवल हड्डी और चमड़ी रह गए थे; कटु स्वभाव वाले, चंचल, ईर्ष्यालु और अत्यन्त क्रोधी थे; उनके शरीर से दुर्गन्ध आती थी, त्वचा पर झुर्रियाँ थीं और बाल पक चुके थे;
श्लोक 6 (1.212.6)
स्थविरं विकृताकारं शीर्यमाणनखत्वचम् । उच्छिष्टमुपभुञ्जाना पर्युपास्ते महामुनिम् ॥
sthaviraṃ vikṛtākāraṃ śīryamāṇanakhatvacam | ucchiṣṭamupabhuñjānā paryupāste mahāmunim
वृद्ध, विकृत आकृति वाले, जिनके नख और त्वचा झड़ रहे थे। फिर भी उनका जूठा खाकर वह उन महामुनि की सेवा करती थी।
श्लोक 7 (1.212.7)
ततः कदाचिदङ्गुष्ठो भुञ्जानस्य व्यशीर्यत । अन्नादुद्धृत्य तच्चान्नमुपभुङ्क्तेऽविशङ्किता ॥
tataḥ kadācidaṅguṣṭho bhuñjānasya vyaśīryata | annāduddhṛtya taccānnamupabhuṅkte'viśaṅkitā
एक दिन भोजन करते समय उनका अँगूठा गलकर गिर पड़ा। उसने उसे अन्न में से निकाला और बिना किसी झिझक के वही अन्न खा लिया।
श्लोक 8 (1.212.8)
तेन तस्याः प्रसन्नेन कामव्याहारिणा तदा । वरं वृणीष्वेत्यसकृदुक्ता वव्रे वरं तदा ॥
tena tasyāḥ prasannena kāmavyāhāriṇā tadā | varaṃ vṛṇīṣvetyasakṛduktā vavre varaṃ tadā
इससे प्रसन्न होकर, मनचाहा वर देने को तत्पर उन मुनि ने उससे बार-बार कहा, 'वर माँगो।' तब उसने वर माँगा।
मौद्गल्य उवाच
श्लोक 9 (1.212.9)
नाहं वृद्धो न कटुको नेर्ष्यावान्नैव कोपनः । न च दुर्गन्धवदनो न कृशो न च लोलुपः ॥
nāhaṃ vṛddho na kaṭuko nerṣyāvānnaiva kopanaḥ | na ca durgandhavadano na kṛśo na ca lolupaḥ
मैं न वृद्ध हूँ, न कटु, न ईर्ष्यालु, न क्रोधी; न मेरे मुख से दुर्गन्ध आती है, न मैं दुबला हूँ, न लोभी।
श्लोक 10 (1.212.10)
कथं त्वां रमयामीह कथं त्वां वासयाम्यहम् । वद कल्याणि भद्रं ते यथा त्वं मनसेच्छसि ॥
kathaṃ tvāṃ ramayāmīha kathaṃ tvāṃ vāsayāmyaham | vada kalyāṇi bhadraṃ te yathā tvaṃ manasecchasi
मैं यहाँ तुम्हें किस प्रकार प्रसन्न करूँ? तुम्हें किस प्रकार रखूँ? हे कल्याणी, तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारा मन जैसा चाहता हो, वैसा कहो।
व्यास उवाच
श्लोक 11 (1.212.11)
सा तमक्लिष्टकर्माणं वरदं सर्वकामदम् । भर्तारमनवद्याङ्गी प्रसन्नं प्रत्युवाच ह ॥
sā tamakliṣṭakarmāṇaṃ varadaṃ sarvakāmadam | bhartāramanavadyāṅgī prasannaṃ pratyuvāca ha
तब उस निर्दोष अंगों वाली स्त्री ने अनायास महान कार्य करने वाले, वरदाता, सब कामनाएँ पूर्ण करने वाले अपने प्रसन्न पति से कहा —
नालायन्युवाच
श्लोक 12 (1.212.12)
पञ्चधा प्रविभक्तात्मा भगवांल्लोकविश्रुतः । रमय त्वमचिन्त्यात्मन्पुनश्चैकत्वमागतः ॥
pañcadhā pravibhaktātmā bhagavāṃllokaviśrutaḥ | ramaya tvamacintyātmanpunaścaikatvamāgataḥ
हे लोकविख्यात भगवन्, आप अपने को पाँच रूपों में विभक्त करके मुझे आनन्दित करें, और फिर, हे अचिन्त्यात्मा, पुनः एक हो जाएँ।
व्यास उवाच
श्लोक 13 (1.212.13)
तां तथेत्यब्रवीद्धीमान्महर्षिर्वै महातपाः । स पञ्चधा तु भूत्वा तां रमयामास सर्वतः ॥
tāṃ tathetyabravīddhīmānmaharṣirvai mahātapāḥ | sa pañcadhā tu bhūtvā tāṃ ramayāmāsa sarvataḥ
बुद्धिमान, महातपस्वी महर्षि ने उससे कहा, 'ऐसा ही हो।' और पाँच रूपों में होकर उन्होंने उसे सब प्रकार से आनन्दित किया —
श्लोक 14 (1.212.14)
नालायनीं सुकेशान्तां मौद्गल्यश्चारुहासिनीम् । आश्रमेष्वधिकं चापि पूज्यमानो महर्षिभिः ॥
nālāyanīṃ sukeśāntāṃ maudgalyaścāruhāsinīm | āśrameṣvadhikaṃ cāpi pūjyamāno maharṣibhiḥ
— मौद्गल्य ने सुन्दर केशों और मनोहर मुस्कान वाली नालायनी को आनन्दित किया। आश्रमों में महर्षियों से अत्यधिक सम्मानित होते हुए,
श्लोक 15 (1.212.15)
स चचार यथाकामं कामरूपवपुः पुनः । यदा ययौ दिवं चापि तत्र देवर्षिभिः सह ॥
sa cacāra yathākāmaṃ kāmarūpavapuḥ punaḥ | yadā yayau divaṃ cāpi tatra devarṣibhiḥ saha
वे इच्छानुसार रूप धारण करके स्वच्छन्द विचरते रहे। और जब वे देवर्षियों के साथ स्वर्ग गए,
श्लोक 16 (1.212.16)
चचार सोऽमृताहारः सुरलोके चचार ह । पूज्यमानस्तथा शच्या शक्रस्य भवनेष्वपि ॥
cacāra so'mṛtāhāraḥ suraloke cacāra ha | pūjyamānastathā śacyā śakrasya bhavaneṣvapi
तो वहाँ अमृत का आहार करते हुए देवलोक में विचरे, और इन्द्र के भवनों में शची से भी सम्मानित हुए।
श्लोक 17 (1.212.17)
महेन्द्रसेनया सार्धं पर्यधावद्रिरंसया । सूर्यस्य च रथं दिव्यमारुह्य भगवान्प्रभुः ॥
mahendrasenayā sārdhaṃ paryadhāvadriraṃsayā | sūryasya ca rathaṃ divyamāruhya bhagavānprabhuḥ
रमण की इच्छा से वे महेन्द्रसेना के साथ सब ओर विचरे; और वे भगवान् प्रभु सूर्य के दिव्य रथ पर चढ़कर,
श्लोक 18 (1.212.18)
पर्युपेत्य पुनर्मेरुं मेरौ वासमरोचयत् । आकाशगङ्गामाप्लुत्य तया सह तपोधनः ॥
paryupetya punarmeruṃ merau vāsamarocayat | ākāśagaṅgāmāplutya tayā saha tapodhanaḥ
फिर मेरु की परिक्रमा करके मेरु पर ही निवास करना उन्होंने चाहा। उस तपोधन ने उसके साथ आकाशगंगा में स्नान किया।
श्लोक 19 (1.212.19)
रश्मिजालेषु चन्द्रस्य उवास च यथाऽनिलः । गिरिरूपधरो योगी स महर्षिस्तदा पुनः ॥
raśmijāleṣu candrasya uvāsa ca yathā'nilaḥ | girirūpadharo yogī sa maharṣistadā punaḥ
वे वायु की भाँति चन्द्रमा की किरणों के जाल में रहे। फिर जब वे योगी महर्षि पर्वत का रूप धारण करते,
श्लोक 20 (1.212.20)
तत्प्रभावेन सा तस्य मध्ये जज्ञे महानदी । यदा पुष्पाकुलः सालः संजज्ञे भगवानृषिः ॥
tatprabhāvena sā tasya madhye jajñe mahānadī | yadā puṣpākulaḥ sālaḥ saṃjajñe bhagavānṛṣiḥ
तो उनके प्रभाव से वह उनके बीच से बहने वाली महानदी बन जाती। जब भगवान् ऋषि फूलों से लदा साल वृक्ष बने,
श्लोक 21 (1.212.21)
लतात्वमनुसंपेदे तमेवाभ्यनुवेष्टती । पुपोष च वपुर्यस्य तस्य तस्यानुगं पुनः ॥
latātvamanusaṃpede tamevābhyanuveṣṭatī | pupoṣa ca vapuryasya tasya tasyānugaṃ punaḥ
तो वह लता बनकर उन्हीं से लिपट गई। वे जो-जो शरीर धारण करते, वह भी उसके अनुरूप शरीर धारण कर लेती।
श्लोक 22 (1.212.22)
सा पुपोष समं भर्त्रा स्कन्धेनापि चचार ह । ततस्तस्य च तस्याश्च तुल्या प्रीतिरवर्धत ॥
sā pupoṣa samaṃ bhartrā skandhenāpi cacāra ha | tatastasya ca tasyāśca tulyā prītiravardhata
वह अपने पति के साथ-साथ बढ़ती और हर देह में उनके साथ विचरती। इस प्रकार दोनों का एक-दूसरे के प्रति प्रेम समान रूप से बढ़ता गया।
श्लोक 23 (1.212.23)
तथा स भगवांस्तस्याः प्रसादादृषिसत्तमः । विरराम च सा चैव दैवयोगेन भामिनी ॥
tathā sa bhagavāṃstasyāḥ prasādādṛṣisattamaḥ | virarāma ca sā caiva daivayogena bhāminī
इस प्रकार उसके अनुग्रह से वे भगवान् ऋषिश्रेष्ठ उससे विरत हुए, और दैवयोग से वह भामिनी भी।
श्लोक 24 (1.212.24)
स च तां तपसा देवीं रमयामास योगतः । एकपत्नी तथा भूत्वा सदैवाग्रे यशस्विनी ॥
sa ca tāṃ tapasā devīṃ ramayāmāsa yogataḥ | ekapatnī tathā bhūtvā sadaivāgre yaśasvinī
और उन्होंने तप और योग के बल से उस देवी को आनन्दित किया। इस प्रकार वह एकपतिव्रता बनी, सदा अग्रणी और यशस्विनी;
श्लोक 25 (1.212.25)
अरुन्धतीव सीतेव बभूवातिपतिव्रता । दमयन्त्याश्च मातुः सा विशेषमधिकं ययौ ॥
arundhatīva sīteva babhūvātipativratā | damayantyāśca mātuḥ sā viśeṣamadhikaṃ yayau
अरुन्धती और सीता की भाँति वह परम पतिव्रता हुई, और उसने अपनी माता दमयन्ती से भी बढ़कर उत्कर्ष प्राप्त किया।
श्लोक 26 (1.212.26)
एतत्तथ्यं महाराज मा ते भूद्बुद्धिरन्यथा । सा वै नालायनी जज्ञे दैवयोगेन केनचित् ॥
etattathyaṃ mahārāja mā te bhūdbuddhiranyathā | sā vai nālāyanī jajñe daivayogena kenacit
हे महाराज, यह सत्य है; तुम्हारी बुद्धि इसे अन्यथा न समझे। वही नालायनी किसी दैवयोग से —
श्लोक 27 (1.212.27)
राजंस्तवात्मजा कृष्णा वेद्यां तेजस्विनी शुभा । तस्मिंस्तस्या मनः सक्तं न चचाल कदाचन ॥
rājaṃstavātmajā kṛṣṇā vedyāṃ tejasvinī śubhā | tasmiṃstasyā manaḥ saktaṃ na cacāla kadācana
— हे राजन्, तुम्हारी पुत्री, तेजस्विनी और शुभ कृष्णा के रूप में वेदी से उत्पन्न हुई है। उसका मन उन मुनि में ही लगा रहा, और कभी विचलित नहीं हुआ;
श्लोक 28 (1.212.28)
तथा प्रणिहितो ह्यात्मा तस्यास्तस्मिन्द्विजोत्तमे ॥
tathā praṇihito hyātmā tasyāstasmindvijottame
इतना पूर्ण रूप से उसका हृदय उन द्विजश्रेष्ठ में लगा हुआ था।