आदि पर्व · अध्याय 215
द्रौपदी का पाँच पाण्डवों से विवाह
द्रुपद स्वीकार करते हैं कि भाग्य और शङ्कर का विधान टल नहीं सकता, और व्यास समझाते हैं कि यह विवाह केवल इन दिव्य जनों के लिए धर्मसम्मत है, अन्य मनुष्यों के लिए नियम नहीं। व्यास पुष्य नक्षत्र का दिन निश्चित करते हैं और द्रुपद भव्य विवाह की तैयारी करते हैं। धौम्य के पौरोहित्य में पहले युधिष्ठिर द्रौपदी का पाणिग्रहण करते हैं और फिर उनके भाई क्रमशः अगले दिनों में; प्रतिदिन वधू फिर से कन्या हो जाती है। द्रुपद पाण्डवों को रथ, हाथी, दासियाँ और धन भरपूर उपहार में देते हैं, और वे पाञ्चाल नगरी में सुखपूर्वक रहते हैं।
द्रुपद उवाच
श्लोक 1 (1.215.1)
अश्रुत्वैवं वचनं ते महर्षे । मया पूर्वं यतितं संविधातुम् । न वै शक्यं विहितस्यापयानं । तदेवेदमुपपन्नं विधानम् ॥
aśrutvaivaṃ vacanaṃ te maharṣe | mayā pūrvaṃ yatitaṃ saṃvidhātum | na vai śakyaṃ vihitasyāpayānaṃ | tadevedamupapannaṃ vidhānam
हे महर्षि, आपके ये वचन सुनने से पहले मैंने कुछ और व्यवस्था करने का प्रयत्न किया था। पर जो विधि-विहित है उसे टाला नहीं जा सकता; अतः यही विधान उचित ठहरा है।
श्लोक 2 (1.215.2)
दिष्टस्य ग्रन्थिरनिवर्तनीयः । स्वकर्मणा विहितं तेन किंचित् । कृतं निमित्तमिह नैकहेतो- । स्तदेवेदमुपपन्नं विधानम् ॥
diṣṭasya granthiranivartanīyaḥ | svakarmaṇā vihitaṃ tena kiṃcit | kṛtaṃ nimittamiha naikaheto- | stadevedamupapannaṃ vidhānam
भाग्य की गाँठ खोली नहीं जा सकती; जो विहित है वह अपने ही पूर्वकर्मों से होता है। यहाँ जो निमित्त बना, वह किसी एक प्रयोजन के लिए नहीं था; अतः यही विधान उचित ठहरा है।
श्लोक 3 (1.215.3)
यथैव कृष्णोक्तवती पुरस्ता- । न्नैकान्पतीन्मे भगवान्ददातु । स चाप्येवं वरमित्यब्रवीत्तां । देवो हि वेत्ता परमं यदत्र ॥
yathaiva kṛṣṇoktavatī purastā- | nnaikānpatīnme bhagavāndadātu | sa cāpyevaṃ varamityabravīttāṃ | devo hi vettā paramaṃ yadatra
जैसे कृष्णा ने पहले कहा था, "भगवान मुझे अनेक पति दें," वैसे ही देव ने भी उससे कहा, "यही तुम्हारा वर है।" इसमें जो परम सत्य है उसे देव ही जानते हैं।
श्लोक 4 (1.215.4)
यदि चैवं विहितः शङ्करेण । धर्मोऽधर्मो वा नात्र ममापराधः । गृह्णन्त्विमे विधिवत्पाणिमस्या । यथोपजोषं विहितैषां हि कृष्णा ॥
yadi caivaṃ vihitaḥ śaṅkareṇa | dharmo'dharmo vā nātra mamāparādhaḥ | gṛhṇantvime vidhivatpāṇimasyā | yathopajoṣaṃ vihitaiṣāṃ hi kṛṣṇā
यदि शङ्कर ने ही ऐसा विधान किया है, तो यह धर्म हो या अधर्म, इसमें मेरा कोई दोष नहीं। ये विधिपूर्वक, जैसा चाहें, इसका पाणिग्रहण करें; कृष्णा इन्हीं के लिए नियत है।
व्यास उवाच
श्लोक 5 (1.215.5)
नायं विधिर्मानुषाणां विवाहे । देवा ह्येते द्रौपदी चापि लक्ष्मीः । प्राक्कर्मणः सुकृतात्पाण्डवानां । पञ्चानां भार्या देवदेवप्रसादात् ॥
nāyaṃ vidhirmānuṣāṇāṃ vivāhe | devā hyete draupadī cāpi lakṣmīḥ | prākkarmaṇaḥ sukṛtātpāṇḍavānāṃ | pañcānāṃ bhāryā devadevaprasādāt
मनुष्यों के विवाह की यह विधि नहीं है। ये देवता हैं और द्रौपदी लक्ष्मी हैं। पाण्डवों के पूर्वजन्म के पुण्यकर्मों से और देवाधिदेव की कृपा से वह पाँचों की पत्नी है।
श्लोक 6 (1.215.6)
तेषामेवायं विहितः स्याद्विवाहो । यथा ह्येष द्रौपदीपाण्डवानाम् । अन्येषां नृणां योषितां च । न धर्मः स्यान्मानवोक्तो नरेन्द्र ॥
teṣāmevāyaṃ vihitaḥ syādvivāho | yathā hyeṣa draupadīpāṇḍavānām | anyeṣāṃ nṛṇāṃ yoṣitāṃ ca | na dharmaḥ syānmānavokto narendra
हे नरेन्द्र, ऐसा विवाह केवल इन्हीं के लिए विहित हो सकता है, जैसा द्रौपदी और पाण्डवों का यह विवाह है; अन्य पुरुषों और स्त्रियों के लिए यह मनु द्वारा कहा गया धर्म नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (1.215.7)
तत आजग्मतुस्तत्र तौ व्यासद्रुपदावुभौ । कुन्ती सपुत्रा यत्रास्ते धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । ततो द्वैपायनः कृष्णो युधिष्ठिरमथागमत् ॥
tata ājagmatustatra tau vyāsadrupadāvubhau | kuntī saputrā yatrāste dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | tato dvaipāyanaḥ kṛṣṇo yudhiṣṭhiramathāgamat
तब व्यास और द्रुपद दोनों वहाँ आए जहाँ कुन्ती अपने पुत्रों के साथ थीं और पृषत-पौत्र धृष्टद्युम्न भी थे। फिर कृष्ण द्वैपायन युधिष्ठिर के पास गए।
श्लोक 8 (1.215.8)
ततोऽब्रवीद्भगवान्धर्मराज- । मद्यैव पुण्येऽहनि पाण्डवेय । पुण्ये पुष्ये योगमुपैति चन्द्रमाः । पाणिं कृष्णायास्त्वं गृहाणाद्य पूर्वं ॥
tato'bravīdbhagavāndharmarāja- | madyaiva puṇye'hani pāṇḍaveya | puṇye puṣye yogamupaiti candramāḥ | pāṇiṃ kṛṣṇāyāstvaṃ gṛhāṇādya pūrvaṃ
भगवान व्यास ने धर्मराज से कहा, "हे पाण्डुनन्दन, आज ही पुण्य दिन है। आज चन्द्रमा पवित्र पुष्य नक्षत्र से योग कर रहा है। आज सबसे पहले तुम कृष्णा का पाणिग्रहण करो।"
श्लोक 9 (1.215.9)
एवमुक्त्वा धर्मराजं भीमादीनप्यभाषत ॥
evamuktvā dharmarājaṃ bhīmādīnapyabhāṣata
धर्मराज से ऐसा कहकर उन्होंने भीम आदि से भी कहा:
व्यास उवाच
श्लोक 10 (1.215.10)
क्रमेण पुरुषव्याघ्राः पाणिं गृह्णन्तु पाणिभिः । एवमेव मया सर्वं दृष्टमेतत्पुराऽनघाः ॥
krameṇa puruṣavyāghrāḥ pāṇiṃ gṛhṇantu pāṇibhiḥ | evameva mayā sarvaṃ dṛṣṭametatpurā'naghāḥ
"हे पुरुषसिंहो, तुम क्रम से एक-एक करके अपने हाथों में इसका हाथ ग्रहण करो। हे निष्पाप वीरो, यह सब मैंने बहुत पहले ही इसी प्रकार देख लिया था।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (1.215.11)
ततो राजा यज्ञसेनः सपुत्रो । जन्यार्थयुक्तं बहु तत्तदग्र्यम् । समर्थयामास महानुभावो । हृष्टः सपुत्रः सहबन्धुवर्गः । समानयामास सुतां च कृष्णा- । माप्लाव्य रत्नैर्बहुभिर्विभूष्य ॥
tato rājā yajñasenaḥ saputro | janyārthayuktaṃ bahu tattadagryam | samarthayāmāsa mahānubhāvo | hṛṣṭaḥ saputraḥ sahabandhuvargaḥ | samānayāmāsa sutāṃ ca kṛṣṇā- | māplāvya ratnairbahubhirvibhūṣya
तब राजा यज्ञसेन ने अपने पुत्रों के साथ बारात के योग्य अनेक उत्तम वस्तुएँ जुटाईं। अपने पुत्रों और बन्धु-बान्धवों सहित प्रसन्न होकर उस महानुभाव राजा ने सब तैयारी पूरी की, और अपनी पुत्री कृष्णा को स्नान कराकर अनेक रत्नों से सजाकर ले आए।
श्लोक 12 (1.215.12)
ततस्तु सर्वे सुहृदो नृपस्य । समाजग्मुः सहिता मन्त्रिणश्च । द्रष्टुं विवाहं परमप्रतीता । द्विजाश्च पौराश्च यथाप्रधानाः ॥
tatastu sarve suhṛdo nṛpasya | samājagmuḥ sahitā mantriṇaśca | draṣṭuṃ vivāhaṃ paramapratītā | dvijāśca paurāśca yathāpradhānāḥ
तब राजा के सभी मित्र और मन्त्री एक साथ बड़े हर्ष से विवाह देखने आए, और ब्राह्मण तथा नगरवासी भी अपने-अपने पद के अनुसार आए।
श्लोक 13 (1.215.13)
ततोऽस्य वेश्माग्र्यजनोपशोभितं । विस्तीर्णपद्मोत्पलभूषिताजिरम् । बलौघरत्नौघविचित्रमाबभौ । नभो यथा निर्मलतारकान्वितम् ॥
tato'sya veśmāgryajanopaśobhitaṃ | vistīrṇapadmotpalabhūṣitājiram | balaugharatnaughavicitramābabhau | nabho yathā nirmalatārakānvitam
तब श्रेष्ठ जनों से सुशोभित, फैले हुए कमलों और उत्पलों से सजे आँगन वाला, सेना के समूहों और रत्नों के ढेरों से विचित्र उनका भवन निर्मल तारों से जड़े आकाश के समान चमक उठा।
श्लोक 14 (1.215.14)
ततस्तु ते कौरवराजपुत्रा । विभूषिताः कुण्डलिनो युवानः । महार्हवस्त्राम्बरचन्दनोक्षिताः । कृताभिषेकाः कृतमङ्गलक्रियाः ॥
tatastu te kauravarājaputrā | vibhūṣitāḥ kuṇḍalino yuvānaḥ | mahārhavastrāmbaracandanokṣitāḥ | kṛtābhiṣekāḥ kṛtamaṅgalakriyāḥ
तब कुरुवंश के वे राजकुमार, युवा, आभूषणों और कुण्डलों से सजे, बहुमूल्य वस्त्र पहने, चन्दन से चर्चित, स्नान करके और मङ्गल-कृत्य सम्पन्न करके,
श्लोक 15 (1.215.15)
पुरोहितेनाग्निसमानवर्चसा । सहैव धौम्येन यथाविधि प्रभो । क्रमेण सर्वे विविशुस्ततः सदो । महर्षभा गोष्ठमिवाभिनन्दिनः ॥
purohitenāgnisamānavarcasā | sahaiva dhaumyena yathāvidhi prabho | krameṇa sarve viviśustataḥ sado | maharṣabhā goṣṭhamivābhinandinaḥ
हे प्रभो, अग्नि के समान तेजस्वी अपने पुरोहित धौम्य के साथ विधिपूर्वक, क्रम से, आनन्दित होकर उस सभा में ऐसे प्रविष्ट हुए जैसे बड़े-बड़े साँड़ गोशाला में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 16 (1.215.16)
ततः समाधाय स वेदपारगो । जुहाव मन्त्रैर्ज्वलितं हुताशनम् । युधिष्ठिरं चाप्युपनीय मन्त्रवि- । न्नियोजयामास सहैव कृष्णया ॥
tataḥ samādhāya sa vedapārago | juhāva mantrairjvalitaṃ hutāśanam | yudhiṣṭhiraṃ cāpyupanīya mantravi- | nniyojayāmāsa sahaiva kṛṣṇayā
तब वेदों में पारंगत पुरोहित ने अग्नि स्थापित करके मन्त्रों के साथ प्रज्वलित अग्नि में आहुतियाँ दीं, और मन्त्रज्ञ होकर युधिष्ठिर को लाकर कृष्णा के साथ जोड़ दिया।
श्लोक 17 (1.215.17)
प्रदक्षिणं तौ प्रगृहीतपाणी । समानयामास स वेदपारगः । विप्रांश्च संतर्प्य युधिष्ठिरो धनै- । र्गोभिश्च रत्नैर्विविधैश्च पूर्वम् ॥
pradakṣiṇaṃ tau pragṛhītapāṇī | samānayāmāsa sa vedapāragaḥ | viprāṃśca saṃtarpya yudhiṣṭhiro dhanai- | rgobhiśca ratnairvividhaiśca pūrvam
वेदपारग पुरोहित ने हाथ थामे हुए उन दोनों से अग्नि की परिक्रमा कराई। युधिष्ठिर ने पहले ही धन, गौओं और अनेक प्रकार के रत्नों से ब्राह्मणों को तृप्त कर दिया था।
श्लोक 18 (1.215.18)
तदा स राजा द्रुपदस्य पुत्रिका- । पाणिं प्रजग्राह हुताशनाग्रतः । धौम्येन मन्त्रैर्विधिवद्धुतेऽग्नौ । सहाग्निकल्पैर्ऋषिभिः समेत्य ॥
tadā sa rājā drupadasya putrikā- | pāṇiṃ prajagrāha hutāśanāgrataḥ | dhaumyena mantrairvidhivaddhute'gnau | sahāgnikalpairṛṣibhiḥ sametya
तब उस राजा ने अग्नि के सामने द्रुपद की पुत्री का पाणिग्रहण किया, जबकि अग्नि-समान ऋषियों के साथ मिलकर धौम्य ने मन्त्रों से विधिपूर्वक अग्नि में आहुति दी।
श्लोक 19 (1.215.19)
ततोऽन्तरिक्षात्कुसुमानि पेतु- । र्ववौ च वायुः सुमनोज्ञगन्धः । ततोऽभ्यनुज्ञाप्य समाजशोभितं । युधिष्ठिरं राजपुरोहितस्तदा ॥
tato'ntarikṣātkusumāni petu- | rvavau ca vāyuḥ sumanojñagandhaḥ | tato'bhyanujñāpya samājaśobhitaṃ | yudhiṣṭhiraṃ rājapurohitastadā
तब आकाश से फूल बरसे और मनोहर सुगन्ध वाली वायु बहने लगी। तब राजपुरोहित सभा में शोभित युधिष्ठिर से अनुमति लेकर,
श्लोक 20 (1.215.20)
विप्रांश्च सर्वान्सुहृदश्च राज्ञः । समेत्य राजानमदीनसत्वम् । जगाद भूयोऽपि महानुभावो । वचोऽर्थयुक्तं मनुजेश्वरं तम् ॥
viprāṃśca sarvānsuhṛdaśca rājñaḥ | sametya rājānamadīnasatvam | jagāda bhūyo'pi mahānubhāvo | vaco'rthayuktaṃ manujeśvaraṃ tam
और सब ब्राह्मणों तथा राजा के मित्रों से मिलकर, वह महानुभाव पुरोहित अदम्य साहस वाले राजा के पास गए और उस नरेश्वर से फिर सार्थक वचन बोले:
श्लोक 21 (1.215.21)
गृह्णन्त्वथान्ये नरदेवकन्या- । पाणिं यथावन्नरदेवपुत्राः । तमभ्यनन्दद्द्रुपदस्तथा द्विजं । तथा कुरुष्वेति तमादिदेश ॥
gṛhṇantvathānye naradevakanyā- | pāṇiṃ yathāvannaradevaputrāḥ | tamabhyanandaddrupadastathā dvijaṃ | tathā kuruṣveti tamādideśa
"अब अन्य राजकुमार भी यथाविधि राजकन्या का पाणिग्रहण करें।" द्रुपद ने ब्राह्मण के वचन का अभिनन्दन किया और आज्ञा दी, "ऐसा ही कीजिए।"
श्लोक 22 (1.215.22)
पुरोहितस्यानुमतेन राज्ञ- । स्ते राजपुत्रा मुदिता बभूवुः । क्रमेण चान्ये च नराधिपात्मजा । वरस्त्रियास्ते जगृहुः करं तदा ॥
purohitasyānumatena rājña- | ste rājaputrā muditā babhūvuḥ | krameṇa cānye ca narādhipātmajā | varastriyāste jagṛhuḥ karaṃ tadā
पुरोहित की अनुमति से राजपुत्र प्रसन्न हुए; और फिर क्रम से अन्य राजकुमारों ने उस श्रेष्ठ नारी का हाथ ग्रहण किया,
श्लोक 23 (1.215.23)
अहन्यहन्युत्तमरूपधारिणो । महारथाः कौरववंशवर्धनाः ॥
ahanyahanyuttamarūpadhāriṇo | mahārathāḥ kauravavaṃśavardhanāḥ
दिन-प्रतिदिन, उत्तम रूप वाले, कुरुवंश को बढ़ाने वाले उन महारथियों ने।
श्लोक 24 (1.215.24)
इदं च तत्राद्भुतरूपमुत्तमं । जगाद देवर्षिरतीतमानुषम् । महानुभावा किल सा सुमध्यमा । बभूव कन्यैव गते गतेऽहनि ॥
idaṃ ca tatrādbhutarūpamuttamaṃ | jagāda devarṣiratītamānuṣam | mahānubhāvā kila sā sumadhyamā | babhūva kanyaiva gate gate'hani
और वहाँ देवर्षि ने यह अद्भुत, अलौकिक बात बताई कि वह महानुभाव, सुन्दर कटि वाली स्त्री, कहते हैं, प्रत्येक दिन बीतने पर फिर से कन्या हो जाती थी।
श्लोक 25 (1.215.25)
पतिश्वशुरता ज्येष्ठे पतिदेवरताऽनुजे । मध्यमेषु च पाञ्चाल्यास्त्रितयं त्रितयं त्रिषु ॥
patiśvaśuratā jyeṣṭhe patidevaratā'nuje | madhyameṣu ca pāñcālyāstritayaṃ tritayaṃ triṣu
पाञ्चाली के लिए सबसे बड़े पति भी थे और बड़े भाई होने से ससुर-तुल्य भी; सबसे छोटे पति भी थे और देवर भी; और बीच के तीनों में से प्रत्येक के साथ उसके तीनों सम्बन्ध थे।
श्लोक 26 (1.215.26)
कृते विवाहे द्रुपदो धनं ददौ । महारथेभ्यो बहुरूपमुत्तमम् । शतं रथानां वरहेममालिनां । चतुर्युजां हेमखलीनमालिनाम् ॥
kṛte vivāhe drupado dhanaṃ dadau | mahārathebhyo bahurūpamuttamam | śataṃ rathānāṃ varahemamālināṃ | caturyujāṃ hemakhalīnamālinām
विवाह सम्पन्न होने पर द्रुपद ने महारथियों को अनेक प्रकार का उत्तम धन दिया: श्रेष्ठ स्वर्ण-मालाओं से सजे सौ रथ, जिनमें चार-चार घोड़े सोने की लगामों के साथ जुते थे,
श्लोक 27 (1.215.27)
शतं गजानामपि पद्मिनां तथा । शतं गिरीणामिव हेमशृङ्गिणाम् । तथैव दासीशतमग्र्ययौवनं । महार्हवेषाभरणाम्बरस्रजम् ॥
śataṃ gajānāmapi padmināṃ tathā | śataṃ girīṇāmiva hemaśṛṅgiṇām | tathaiva dāsīśatamagryayauvanaṃ | mahārhaveṣābharaṇāmbarasrajam
पद्म-चिह्नों वाले सौ हाथी, जो सोने के शिखरों वाले सौ पर्वतों जैसे थे, और इसी प्रकार भरपूर यौवन वाली सौ दासियाँ, जिनके वेश, आभूषण, वस्त्र और मालाएँ बहुमूल्य थीं।
श्लोक 28 (1.215.28)
पृथक्पृथग्दिव्यदृशां पुनर्ददौ । तदा धनं सौमकिरग्निसाक्षिकम् । तथैव वस्त्राणि विभूषणानि । प्रभावयुक्तानि महानुभावः ॥
pṛthakpṛthagdivyadṛśāṃ punardadau | tadā dhanaṃ saumakiragnisākṣikam | tathaiva vastrāṇi vibhūṣaṇāni | prabhāvayuktāni mahānubhāvaḥ
फिर उस महानुभाव सोमकवंशी राजा ने अग्नि को साक्षी बनाकर उन दिव्य दर्शन वाले वीरों में से प्रत्येक को अलग-अलग धन दिया, और साथ ही प्रभावशाली वस्त्र और आभूषण भी।
श्लोक 29 (1.215.29)
कृते विवाहे च ततस्तु पाण्डवाः । प्रभूतरत्नामुपलभ्य तां श्रियम् । विजह्रुरिन्द्रप्रतिमा महाबलाः । पुरे तु पाञ्चालनृपस्य तस्य ह ॥
kṛte vivāhe ca tatastu pāṇḍavāḥ | prabhūtaratnāmupalabhya tāṃ śriyam | vijahrurindrapratimā mahābalāḥ | pure tu pāñcālanṛpasya tasya ha
विवाह हो जाने पर इन्द्र के समान महाबली पाण्डव, रत्नों से सम्पन्न उस लक्ष्मी-स्वरूपा को पाकर, पाञ्चालराज की नगरी में आनन्द से रहने लगे।