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आदि पर्व · अध्याय 214

पाँच इन्द्र और द्रौपदी के पूर्वजन्म

व्यास द्रुपद को बताते हैं कि जब नैमिषारण्य में देवताओं के यज्ञ में यम के व्यस्त रहने से मनुष्यों का मरना रुक गया, तब इन्द्र गङ्गा के तट पर एक रोती हुई स्त्री के पीछे-पीछे शिव के पास पहुँचे, उनसे पराजित हुए और पर्वत की गुफा में बन्द चार पूर्व इन्द्रों को देखा। शिव ने आदेश दिया कि पाँचों मनुष्य बनकर पाण्डवों के रूप में जन्म लेंगे और श्री उनकी साझी पत्नी होंगी; विष्णु के श्वेत और कृष्ण केश बलराम और कृष्ण बने। व्यास द्रुपद को दिव्य दृष्टि देकर पाण्डवों के पूर्व शरीर दिखाते हैं, फिर नितन्तु के पाँच पुत्रों की पत्नी भौमाश्वी की कथा और उस ऋषिकन्या की कथा सुनाते हैं जिसने शङ्कर से पाँच बार पति माँगा और द्रौपदी बनकर जन्मी।

अध्याय 213अध्याय-सूचीअध्याय 215

व्यास उवाच

श्लोक 1 (1.214.1)

पुरा वै नैमिशारण्ये देवाः सत्रमुपासते । तत्र वैवस्वतो राजञ्शामित्रमकरोत्तदा ॥

purā vai naimiśāraṇye devāḥ satramupāsate | tatra vaivasvato rājañśāmitramakarottadā

प्राचीन काल में देवता नैमिषारण्य में एक सत्र-यज्ञ कर रहे थे। हे राजन्, वहाँ विवस्वान् के पुत्र यम ने पशु-बलि करने वाले (शमिता) का कार्य सँभाला।

श्लोक 2 (1.214.2)

ततो यमो दीक्षितस्तत्र राज- । न्नामारयत्कंचिदपि प्रजानाम् । ततः प्रजास्ता बहुला बभूवुः । कालातिपातान्मरणप्रहीणाः ॥

tato yamo dīkṣitastatra rāja- | nnāmārayatkaṃcidapi prajānām | tataḥ prajāstā bahulā babhūvuḥ | kālātipātānmaraṇaprahīṇāḥ

हे राजन्, वहाँ यज्ञ की दीक्षा लिए हुए यम ने किसी भी प्राणी को नहीं मारा। इससे प्रजा बहुत बढ़ गई, क्योंकि समय बीत जाने पर भी वह मृत्यु से मुक्त रही।

श्लोक 3 (1.214.3)

सोमश्च शक्रो वरुणः कुबेरः । साध्या रुद्रा वसवोऽथाश्विनौ च । प्रजापतिर्भुवनस्य प्रणेता । समाजग्मुस्तत्र देवास्तथाऽन्ये ॥

somaśca śakro varuṇaḥ kuberaḥ | sādhyā rudrā vasavo'thāśvinau ca | prajāpatirbhuvanasya praṇetā | samājagmustatra devāstathā'nye

सोम, इन्द्र, वरुण और कुबेर, साध्य, रुद्र, वसु और दोनों अश्विनीकुमार तथा अन्य देवता वहाँ एकत्र हुए जहाँ जगत् के विधाता प्रजापति थे।

श्लोक 4 (1.214.4)

ततोऽब्रुवँल्लोकगुरुं समेता । भयात्तीव्रान्मानुषाणां विवृद्ध्या । तस्माद्भयादुद्विजन्तः सुखेप्सवः । प्रयाम सर्वे शरणं भवन्तम् ॥

tato'bruvam̐llokaguruṃ sametā | bhayāttīvrānmānuṣāṇāṃ vivṛddhyā | tasmādbhayādudvijantaḥ sukhepsavaḥ | prayāma sarve śaraṇaṃ bhavantam

तब सबने मिलकर लोकगुरु से कहा, "मनुष्यों की वृद्धि से हमें तीव्र भय हो रहा है। उस भय से व्याकुल होकर और सुख की इच्छा से हम सब आपकी शरण में आए हैं।"

पितामह उवाच

श्लोक 5 (1.214.5)

किं वो भयं मानुषेभ्यो यूयं सर्वे यदाऽमराः । मा वो मर्त्यसकाशाद्वै भयं भवितुमर्हति ॥

kiṃ vo bhayaṃ mānuṣebhyo yūyaṃ sarve yadā'marāḥ | mā vo martyasakāśādvai bhayaṃ bhavitumarhati

तुम्हें मनुष्यों से क्या भय, जब तुम सब अमर हो? मर्त्यों से तुम्हें भय नहीं होना चाहिए।

देवा ऊचुः

श्लोक 6 (1.214.6)

मर्त्या अमर्त्याः संवृत्ता न विशेषोऽस्ति कश्चन । अविशेषादुद्विजन्तो विशेषार्थमिहागताः ॥

martyā amartyāḥ saṃvṛttā na viśeṣo'sti kaścana | aviśeṣādudvijanto viśeṣārthamihāgatāḥ

मर्त्य अमर हो गए हैं; अब कोई अन्तर नहीं रहा। इस अन्तर के मिट जाने से व्याकुल होकर हम यहाँ अन्तर स्थापित कराने आए हैं।

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 7 (1.214.7)

वैवस्वतो व्यापृतः सत्रहेतो- । स्तेन त्विमे न म्रियन्ते मनुष्याः । तस्मिन्नेकाग्रे कृतसर्वकार्ये । तत एषां भवितैवान्तकालः ॥

vaivasvato vyāpṛtaḥ satraheto- | stena tvime na mriyante manuṣyāḥ | tasminnekāgre kṛtasarvakārye | tata eṣāṃ bhavitaivāntakālaḥ

विवस्वान् के पुत्र यम सत्र में लगे हुए हैं, इसी कारण ये मनुष्य नहीं मरते। जब वे एकाग्र होकर अपना सारा कार्य पूरा कर लेंगे, तब इनका अन्तकाल आएगा।

श्लोक 8 (1.214.8)

वैवस्वतस्यैव तनुर्विभक्ता । वीर्येण युष्माकमुत प्रवृद्धा । सैषामन्तो भविता ह्यन्तकाले । न तत्र वीर्यं भविता नरेषु ॥

vaivasvatasyaiva tanurvibhaktā | vīryeṇa yuṣmākamuta pravṛddhā | saiṣāmanto bhavitā hyantakāle | na tatra vīryaṃ bhavitā nareṣu

विवस्वान् के पुत्र का ही विभक्त शरीर, तुम्हारे बल से पुष्ट होकर, अन्तकाल में इनका अन्त बनेगा; उसके सामने मनुष्यों में कोई बल नहीं रहेगा।

व्यास उवाच

श्लोक 9 (1.214.9)

ततस्तु ते पूर्वजदेववाक्यं । श्रुत्वा जग्मुर्यत्र देवा यजन्ते । समासीनास्ते समेता महाबला । भागीरथ्यां ददृशुः पुण्डरीकम् ॥

tatastu te pūrvajadevavākyaṃ | śrutvā jagmuryatra devā yajante | samāsīnāste sametā mahābalā | bhāgīrathyāṃ dadṛśuḥ puṇḍarīkam

तब पूर्वज देव ब्रह्मा के वचन सुनकर वे वहाँ गए जहाँ देवता यज्ञ कर रहे थे। वहाँ एक साथ बैठे उन महाबलियों ने भागीरथी में एक कमल देखा।

श्लोक 10 (1.214.10)

दृष्ट्वा च तद्विस्मितास्ते बभूवु- । स्तेषामिन्द्रस्तत्र शूरो जगाम । सोऽपश्यद्योषामथ पावकप्रभां । यत्र देवी गङ्गा सततं प्रसूता ॥

dṛṣṭvā ca tadvismitāste babhūvu- | steṣāmindrastatra śūro jagāma | so'paśyadyoṣāmatha pāvakaprabhāṃ | yatra devī gaṅgā satataṃ prasūtā

उसे देखकर वे विस्मित हो गए, और उनमें से वीर इन्द्र वहाँ गए। जहाँ देवी गङ्गा निरन्तर बहती हैं, वहाँ उन्होंने अग्नि के समान तेजस्विनी एक स्त्री को देखा।

श्लोक 11 (1.214.11)

सा तत्र योषा रुदती जलार्थिनी । गङ्गां देवीं व्यवगाह्य व्यतिष्ठत् । तस्याश्रुबिन्दुः पतितो जले य- । स्तत्पद्ममासीदथ तत्र काञ्चनम् ॥

sā tatra yoṣā rudatī jalārthinī | gaṅgāṃ devīṃ vyavagāhya vyatiṣṭhat | tasyāśrubinduḥ patito jale ya- | statpadmamāsīdatha tatra kāñcanam

वह स्त्री जल के लिए देवी गङ्गा में उतरकर रोती हुई खड़ी थी। उसके आँसू की जो बूँद जल में गिरती, वह वहाँ सोने का कमल बन जाती।

श्लोक 12 (1.214.12)

तदद्भुतं प्रेक्ष्य वज्री तदानी- । मपृच्छत्तां योषितमन्तिकाद्वै । का त्वं भद्रे रोदिषि कस्य हेतो- । र्वाक्यं तथ्यं कामयेऽहं ब्रवीहि ॥

tadadbhutaṃ prekṣya vajrī tadānī- | mapṛcchattāṃ yoṣitamantikādvai | kā tvaṃ bhadre rodiṣi kasya heto- | rvākyaṃ tathyaṃ kāmaye'haṃ bravīhi

वह अद्भुत दृश्य देखकर वज्रधारी इन्द्र ने पास जाकर उस स्त्री से पूछा, "हे भद्रे, तुम कौन हो? किस कारण रो रही हो? मैं सच्ची बात सुनना चाहता हूँ; बताओ।"

स्त्र्युवाच

श्लोक 13 (1.214.13)

त्वं वेत्स्यसे मामिह याऽस्मि शक्र । यदर्थं चाहं रोदिमि मन्दभाग्या । आगच्छ राजन्पुरतो गमिष्ये । द्रष्टाऽसि तद्रोदिमि यत्कृतेऽहम् ॥

tvaṃ vetsyase māmiha yā'smi śakra | yadarthaṃ cāhaṃ rodimi mandabhāgyā | āgaccha rājanpurato gamiṣye | draṣṭā'si tadrodimi yatkṛte'ham

हे इन्द्र, तुम जान जाओगे कि मैं कौन हूँ और मैं अभागिनी क्यों रो रही हूँ। आओ राजन्, मैं आगे चलती हूँ; तुम देख लोगे कि मैं किसके कारण रो रही हूँ।

व्यास उवाच

श्लोक 14 (1.214.14)

तां गच्छन्तीमन्वगच्छत्तदानीं । सोऽपश्यदारात्तरुणं दर्शनीयम् । सिद्धासनस्थं युवतीसहायं । क्रीडन्तमक्षैर्गिरिराजमूर्ध्नि ॥

tāṃ gacchantīmanvagacchattadānīṃ | so'paśyadārāttaruṇaṃ darśanīyam | siddhāsanasthaṃ yuvatīsahāyaṃ | krīḍantamakṣairgirirājamūrdhni

वह चली तो इन्द्र उसके पीछे गए, और पास ही उन्होंने गिरिराज के शिखर पर सिद्धासन में बैठे एक सुन्दर युवक को देखा, जिसके साथ एक युवती थी और जो पासों से खेल रहा था।

श्लोक 15 (1.214.15)

तमब्रवीद्देवराजो ममेदं । त्वं विद्धि विद्वन्भुवनं वशे स्थितम् । ईशोऽहमस्मीति समन्युरब्रवी- । द्दृष्ट्वा तमक्षैः सुभृशं प्रमत्तम् ॥

tamabravīddevarājo mamedaṃ | tvaṃ viddhi vidvanbhuvanaṃ vaśe sthitam | īśo'hamasmīti samanyurabravī- | ddṛṣṭvā tamakṣaiḥ subhṛśaṃ pramattam

देवराज ने उससे कहा, "हे विद्वन्, जान लो कि यह जगत् मेरा है और मेरे वश में है। मैं ही स्वामी हूँ।" उसे पासों में पूरी तरह मग्न देखकर इन्द्र ने यह क्रोध में कहा।

श्लोक 16 (1.214.16)

क्रुद्धं च शक्रं प्रसमीक्ष्य देवो । जहास शक्रं च शनैरुदैक्षत । संस्तम्भितोऽभूदथ देवराज- । स्तेनेक्षितः स्थाणुरिवावतस्थे ॥

kruddhaṃ ca śakraṃ prasamīkṣya devo | jahāsa śakraṃ ca śanairudaikṣata | saṃstambhito'bhūdatha devarāja- | stenekṣitaḥ sthāṇurivāvatasthe

इन्द्र को क्रुद्ध देखकर वे देव हँसे और धीरे से उनकी ओर देखा। तत्काल देवराज जड़ हो गए; उस दृष्टि के पड़ते ही वे खूँटे की भाँति स्थिर खड़े रह गए।

श्लोक 17 (1.214.17)

यदा तु पर्याप्तमिहास्य क्रीडया । तदा देवीं रुदतीं तामुवाच । आनीयतामेष यतोऽहमारा- । न्नैनं दर्पः पुनरप्याविशेत ॥

yadā tu paryāptamihāsya krīḍayā | tadā devīṃ rudatīṃ tāmuvāca | ānīyatāmeṣa yato'hamārā- | nnainaṃ darpaḥ punarapyāviśeta

जब उनका खेल पूरा हो गया, तो उन्होंने उस रोती हुई देवी से कहा, "इसे मेरे पास ले आओ, ताकि इसमें फिर कभी अहंकार न समाए।"

श्लोक 18 (1.214.18)

ततः शक्रः स्पृष्टमात्रस्तया तु । स्रस्तैरङ्गैः पतितोऽभूद्धरण्याम् । तमब्रवीद्भगवानुग्रतेजा । मैवं पुनः शक्र कृथाः कथंचित् ॥

tataḥ śakraḥ spṛṣṭamātrastayā tu | srastairaṅgaiḥ patito'bhūddharaṇyām | tamabravīdbhagavānugratejā | maivaṃ punaḥ śakra kṛthāḥ kathaṃcit

उसके छूते ही इन्द्र के अंग शिथिल हो गए और वे भूमि पर गिर पड़े। तब उग्र तेज वाले भगवान ने उनसे कहा, "इन्द्र, फिर कभी किसी प्रकार ऐसा मत करना।"

रुद्र उवाच

श्लोक 19 (1.214.19)

निवर्तयैनं च महाद्रिराजं । बलं च वीर्यं च तवाप्रमेयम् । छिद्रस्य चैवाविश मध्यमस्य । यत्रासते त्वद्विधाः सूर्यभासः ॥

nivartayainaṃ ca mahādrirājaṃ | balaṃ ca vīryaṃ ca tavāprameyam | chidrasya caivāviśa madhyamasya | yatrāsate tvadvidhāḥ sūryabhāsaḥ

इस महान गिरिराज को हटाओ, क्योंकि तुम्हारा बल और पराक्रम अपार है, और उस छिद्र के मध्य में प्रवेश करो जहाँ तुम्हारे जैसे सूर्य-समान तेजस्वी रह रहे हैं।

व्यास उवाच

श्लोक 20 (1.214.20)

स तद्विवृत्य विवरं महागिरे- । स्तुल्यद्युतींश्चतुरोऽन्यान्ददर्श । स तानभिप्रेक्ष्य बभूव दुःखितः । कच्चिन्नाहं भविता वै यथेमे ॥

sa tadvivṛtya vivaraṃ mahāgire- | stulyadyutīṃścaturo'nyāndadarśa | sa tānabhiprekṣya babhūva duḥkhitaḥ | kaccinnāhaṃ bhavitā vai yatheme

उन्होंने उस महापर्वत में एक दरार खोली और वहाँ अपने समान तेज वाले चार अन्य को देखा। उन्हें देखकर वे दुःखी हो गए और सोचने लगे, "कहीं मेरी भी यही दशा तो नहीं होगी?"

श्लोक 21 (1.214.21)

ततो देवो गिरिशो वज्रपाणिं । विवृत्य नेत्रे कुपितोऽभ्युवाच । दरीमेतां प्रविश त्वं शतक्रतो । यन्मां बाल्यादवमंस्थाः पुरस्तात् ॥

tato devo giriśo vajrapāṇiṃ | vivṛtya netre kupito'bhyuvāca | darīmetāṃ praviśa tvaṃ śatakrato | yanmāṃ bālyādavamaṃsthāḥ purastāt

तब पर्वतवासी देव गिरीश ने क्रोध से आँखें फैलाकर वज्रधारी से कहा, "हे शतक्रतु, इस गुफा में प्रवेश करो, क्योंकि तुमने बालबुद्धि से पहले मेरा अपमान किया है।"

श्लोक 22 (1.214.22)

उक्तस्त्वेवं विभुना देवराजः । प्रावेपताऽऽर्तो भृशमेवाभिषङ्गात् । स्रस्तैरङ्गैरनिलेनेव नुन्न- । मश्वत्थपत्रं गिरिराजमूर्ध्नि ॥

uktastvevaṃ vibhunā devarājaḥ | prāvepatā''rto bhṛśamevābhiṣaṅgāt | srastairaṅgairanileneva nunna- | maśvatthapatraṃ girirājamūrdhni

प्रभु के ऐसा कहने पर देवराज उस आघात से अत्यन्त काँप उठे; उनके अंग शिथिल हो गए, जैसे गिरिराज के शिखर पर हवा से हिलता पीपल का पत्ता।

श्लोक 23 (1.214.23)

स प्राञ्जलिर्वै वृषवाहनेन । प्रवेपमानः सहसैवमुक्तः । उवाच देवं बहुरूपमुग्र- । मद्याशेषस्य भुवनस्य त्वं भवाद्यः ॥

sa prāñjalirvai vṛṣavāhanena | pravepamānaḥ sahasaivamuktaḥ | uvāca devaṃ bahurūpamugra- | madyāśeṣasya bhuvanasya tvaṃ bhavādyaḥ

वृषभवाहन भगवान के सहसा ऐसा कहने पर इन्द्र ने काँपते हुए हाथ जोड़कर उन बहुरूपी उग्र देव से कहा, "हे भव, आज आप ही समस्त जगत् के आदि स्वामी हैं।"

श्लोक 24 (1.214.24)

तमब्रवीदुग्रवर्चाः प्रहस्य । नैवंशीलाः शेषमिहाप्नुवन्ति । एतेऽप्येवं भवितारः पुरस्ता- । त्तस्मादेतां दरीमाविश्य शेध्वम् ॥

tamabravīdugravarcāḥ prahasya | naivaṃśīlāḥ śeṣamihāpnuvanti | ete'pyevaṃ bhavitāraḥ purastā- | ttasmādetāṃ darīmāviśya śedhvam

उग्र तेज वाले भगवान ने हँसकर उनसे कहा, "ऐसे स्वभाव वालों को यहाँ कृपा नहीं मिलती। ये भी पहले तुम्हारे ही जैसे थे। इसलिए तुम सब इस गुफा में प्रवेश करके पड़े रहो।"

रुद्र उवाच

श्लोक 25 (1.214.25)

एषा भार्या भविता वो न संशयो । योनिं सर्वे मानुषीमाविशध्वम् । तत्र यूयं कर्म कृत्वाऽविषह्यं । बहूनन्यान्निधनं प्रापयित्वा ॥

eṣā bhāryā bhavitā vo na saṃśayo | yoniṃ sarve mānuṣīmāviśadhvam | tatra yūyaṃ karma kṛtvā'viṣahyaṃ | bahūnanyānnidhanaṃ prāpayitvā

यह स्त्री निःसन्देह तुम सबकी पत्नी होगी। तुम सब मानव-योनि में प्रवेश करो। वहाँ असह्य कर्म करके और बहुत-से अन्य लोगों को मृत्यु तक पहुँचाकर,

श्लोक 26 (1.214.26)

आगन्तारः पुनरेवेन्द्रलोकं । स्वकर्मणा पूर्वजितं महार्हम् । सर्वं मया भाषितमेतदेवं । कर्तव्यमन्यद्विविधार्थयुक्तम् ॥

āgantāraḥ punarevendralokaṃ | svakarmaṇā pūrvajitaṃ mahārham | sarvaṃ mayā bhāṣitametadevaṃ | kartavyamanyadvividhārthayuktam

तुम फिर इन्द्रलोक में लौट आओगे, उस बहुमूल्य लोक में जिसे तुमने पहले अपने कर्मों से जीता था। मैंने यह सब ऐसा ही कहा है; और अनेक प्रयोजनों वाला अन्य कार्य भी करना है।

पूर्वेन्द्रा ऊचुः

श्लोक 27 (1.214.27)

गमिष्यामो मानुषं देवलोका- । द्दुराधरो विहितो यत्र मोक्षः । देवास्त्वस्मानादधीरञ्जनन्यां । धर्मो वायुर्मघवानश्विनौ च ॥

gamiṣyāmo mānuṣaṃ devalokā- | ddurādharo vihito yatra mokṣaḥ | devāstvasmānādadhīrañjananyāṃ | dharmo vāyurmaghavānaśvinau ca

हम देवलोक से मनुष्यलोक में जाएँगे, जहाँ मोक्ष कठिनाई से मिलता है। किन्तु देवता ही हमें माता के गर्भ में स्थापित करें: धर्म, वायु, इन्द्र और दोनों अश्विनीकुमार।

व्यास उवाच

श्लोक 28 (1.214.28)

एतच्छ्रुत्वा वज्रपाणिर्वचस्तु । देवश्रेष्ठं पुनरेवेदमाह । वीर्येणाहं पुरुषं कार्यहेतो- । र्दद्यामेषां पञ्चमं मत्प्रसूतम् ॥

etacchrutvā vajrapāṇirvacastu | devaśreṣṭhaṃ punarevedamāha | vīryeṇāhaṃ puruṣaṃ kāryaheto- | rdadyāmeṣāṃ pañcamaṃ matprasūtam

ये वचन सुनकर वज्रधारी इन्द्र ने देवश्रेष्ठ से फिर कहा, "इस कार्य के लिए मैं अपने वीर्य से उत्पन्न एक पुरुष दूँगा, जो इनमें पाँचवाँ होगा।"

श्लोक 29 (1.214.29)

विश्वभुग्भूतधामा च शिबिरिन्द्रः प्रतापवान् । शान्तिश्चतुर्थस्तेषां वै तेजस्वी पञ्चमः स्मृतः ॥

viśvabhugbhūtadhāmā ca śibirindraḥ pratāpavān | śāntiścaturthasteṣāṃ vai tejasvī pañcamaḥ smṛtaḥ

वे थे विश्वभुक्, भूतधामा, प्रतापी इन्द्र शिबि, चौथे शान्ति, और पाँचवें तेजस्वी नाम से स्मरण किए जाने वाले।

श्लोक 30 (1.214.30)

तेषां कामं भगवानुग्रधन्वा । प्रादादिष्टं सन्निसर्गाद्यथोक्तम् । तां चाप्येषां योषितं लोककान्तां । श्रियं भार्यां व्यदधान्मानुषेषु ॥

teṣāṃ kāmaṃ bhagavānugradhanvā | prādādiṣṭaṃ sannisargādyathoktam | tāṃ cāpyeṣāṃ yoṣitaṃ lokakāntāṃ | śriyaṃ bhāryāṃ vyadadhānmānuṣeṣu

उग्र धनुष वाले भगवान ने अपनी सद्भावना से उन्हें उनका माँगा हुआ वर ठीक वैसे ही दे दिया। और उस लोकप्रिय स्त्री, स्वयं श्री को, मनुष्यों में उनकी पत्नी नियत कर दिया।

श्लोक 31 (1.214.31)

तैरेव सार्धं तु ततः स देवो । जगाम नारायणमप्रमेयम् । अनन्तमव्यक्तमजं पुराणं । सनातनं विश्वमनन्तरूपम् ॥

taireva sārdhaṃ tu tataḥ sa devo | jagāma nārāyaṇamaprameyam | anantamavyaktamajaṃ purāṇaṃ | sanātanaṃ viśvamanantarūpam

फिर उन्हीं के साथ वे देव अप्रमेय नारायण के पास गए, जो अनन्त, अव्यक्त, अजन्मा, पुराण, सनातन, विश्वरूप और अनन्त रूपों वाले हैं।

श्लोक 32 (1.214.32)

स चापि तद्व्यदधात्सर्वमेव । ततः सर्वे संबभूवुर्धरण्याम् । स चापि केशौ हरिरुद्बबर्ह । शुक्लमेकमपरं चापि कृष्णम् ॥

sa cāpi tadvyadadhātsarvameva | tataḥ sarve saṃbabhūvurdharaṇyām | sa cāpi keśau harirudbabarha | śuklamekamaparaṃ cāpi kṛṣṇam

उन्होंने भी यह सब विधान कर दिया, और तब वे सब पृथ्वी पर उत्पन्न हुए। और हरि ने अपने दो केश उखाड़े, एक श्वेत और दूसरा काला।

श्लोक 33 (1.214.33)

तौ चापि केशौ विशतां यदूनां । कुले स्त्रियौ रोहिणीं देवकीं च । तयोरेको बलदेवो बभूव । कृष्णो द्वितीयः केशवः संबभूव । केशो योऽसौ वर्णतः कृष्ण उक्तः ॥

tau cāpi keśau viśatāṃ yadūnāṃ | kule striyau rohiṇīṃ devakīṃ ca | tayoreko baladevo babhūva | kṛṣṇo dvitīyaḥ keśavaḥ saṃbabhūva | keśo yo'sau varṇataḥ kṛṣṇa uktaḥ

वे दोनों केश यदुवंश की दो स्त्रियों, रोहिणी और देवकी, में प्रविष्ट हुए। उनमें से एक बलदेव बने, और दूसरे केशव कृष्ण के रूप में उत्पन्न हुए, वही केश जो रंग से काला कहा गया था।

श्लोक 34 (1.214.34)

ये ते पूर्वं शक्ररूपा निबद्धा- । स्तस्यां दर्यां पर्वतस्योत्तरस्य । इहैव ते पाण्डवा वीर्यवन्तः । शक्रस्यांशः पाण्डवः सव्यसाची ॥

ye te pūrvaṃ śakrarūpā nibaddhā- | stasyāṃ daryāṃ parvatasyottarasya | ihaiva te pāṇḍavā vīryavantaḥ | śakrasyāṃśaḥ pāṇḍavaḥ savyasācī

जो पहले इन्द्र के रूप में उस उत्तरी पर्वत की गुफा में बन्दी थे, वे ही यहाँ पराक्रमी पाण्डव हैं; और पाण्डुपुत्र सव्यसाची अर्जुन स्वयं इन्द्र का अंश हैं।

श्लोक 35 (1.214.35)

एवमेते पाण्डवाः संबभूवु- । र्ये ते राजन्पूर्वमिन्द्रा बभूवुः । लक्ष्मीश्चैषां पूर्वमेवोपदिष्टा । भार्या यैषा द्रौपदी दिव्यरूपा ॥

evamete pāṇḍavāḥ saṃbabhūvu- | rye te rājanpūrvamindrā babhūvuḥ | lakṣmīścaiṣāṃ pūrvamevopadiṣṭā | bhāryā yaiṣā draupadī divyarūpā

हे राजन्, इस प्रकार ये पाण्डव उत्पन्न हुए, जो पहले इन्द्र थे; और लक्ष्मी पहले से ही इनकी पत्नी नियत थीं, यही दिव्य रूप वाली द्रौपदी।

श्लोक 36 (1.214.36)

कथं हि स्त्री कर्मणा ते महीतला- । त्समुत्तिष्ठेदन्यतो दैवयोगात् । यस्या रूपं सोमसूर्यप्रकाशं । गन्धश्चास्याः क्रोशमात्रात्प्रवाति ॥

kathaṃ hi strī karmaṇā te mahītalā- | tsamuttiṣṭhedanyato daivayogāt | yasyā rūpaṃ somasūryaprakāśaṃ | gandhaścāsyāḥ krośamātrātpravāti

दैवी विधान के बिना भला कोई स्त्री तुम्हारे यज्ञकर्म से पृथ्वी से कैसे प्रकट हो सकती है, वह जिसका रूप चन्द्र और सूर्य के समान दीप्त है और जिसकी सुगन्ध एक कोस तक फैलती है?

श्लोक 37 (1.214.37)

इदं चान्यत्प्रीतिपूर्वं नरेन्द्र । ददानि ते वरमत्यद्भुतं च । दिव्यं चक्षुः पश्य कुन्तीसुतांस्त्वं । पुण्यैर्दिव्यैः पूर्वदेहैरुपेतान् ॥

idaṃ cānyatprītipūrvaṃ narendra | dadāni te varamatyadbhutaṃ ca | divyaṃ cakṣuḥ paśya kuntīsutāṃstvaṃ | puṇyairdivyaiḥ pūrvadehairupetān

हे नरेन्द्र, प्रेमपूर्वक मैं तुम्हें एक और अत्यन्त अद्भुत वर देता हूँ: दिव्य दृष्टि। कुन्ती के पुत्रों को उनके पवित्र, दिव्य पूर्व शरीरों सहित देखो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 38 (1.214.38)

ततो व्यासः परमोदारकर्मा । शुचिर्विप्रस्तपसा तस्य राज्ञः । चक्षुर्दिव्यं प्रददौ तांश्च सर्वान् । राजाऽपश्यत्पूर्वदेहैर्यथावत् ॥

tato vyāsaḥ paramodārakarmā | śucirviprastapasā tasya rājñaḥ | cakṣurdivyaṃ pradadau tāṃśca sarvān | rājā'paśyatpūrvadehairyathāvat

तब परम उदार कर्मों वाले, पवित्र ब्राह्मण व्यास ने अपने तप के बल से राजा को दिव्य दृष्टि दी, और राजा ने उन सबको उनके पूर्व शरीरों में यथार्थ रूप से देखा।

श्लोक 39 (1.214.39)

ततो दिव्यान्हेमकिरीटमालिनः । शक्रप्रख्यान्पावकादित्यवर्णान् । बद्धापीडांश्चारुरूपांश्च यूनो । व्यूढोरस्कांस्तालमात्रान्ददर्श ॥

tato divyānhemakirīṭamālinaḥ | śakraprakhyānpāvakādityavarṇān | baddhāpīḍāṃścārurūpāṃśca yūno | vyūḍhoraskāṃstālamātrāndadarśa

उन्होंने उन्हें दिव्य रूप में देखा: सोने के मुकुट और मालाएँ धारण किए, इन्द्र के समान, अग्नि और सूर्य के वर्ण वाले, सिर पर आभूषण बाँधे, सुन्दर और युवा, चौड़ी छाती वाले और ताड़ के समान ऊँचे,

श्लोक 40 (1.214.40)

दिव्यैर्वस्त्रैरजोभिः सुगन्धै- । र्माल्यैश्चाग्र्यैः शोभमानानतीव । साक्षात्त्र्यक्षान्वा वसूंश्चापि रुद्रा- । नादित्यान्वा सर्वगुणोपपन्नान् ॥

divyairvastrairajobhiḥ sugandhai- | rmālyaiścāgryaiḥ śobhamānānatīva | sākṣāttryakṣānvā vasūṃścāpi rudrā- | nādityānvā sarvaguṇopapannān

दिव्य निर्मल वस्त्रों, सुगन्धों और श्रेष्ठ मालाओं से अत्यन्त शोभायमान, मानो साक्षात् त्रिनेत्र शिव हों, या वसु और रुद्र, या सर्वगुणसम्पन्न आदित्य।

श्लोक 41 (1.214.41)

तान्पूर्वेन्द्रानभिवीक्ष्याभिरूपा- । ञ्छक्रात्मजं चेन्द्ररूपं निशम्य । प्रीतो राजा द्रुपदो विस्मितश्च । दिव्यां मायां तामवेक्ष्याप्रमेयाम् ॥

tānpūrvendrānabhivīkṣyābhirūpā- | ñchakrātmajaṃ cendrarūpaṃ niśamya | prīto rājā drupado vismitaśca | divyāṃ māyāṃ tāmavekṣyāprameyām

उन सुन्दर पूर्व इन्द्रों को देखकर, और इन्द्रपुत्र को इन्द्र के ही रूप में पाकर, राजा द्रुपद उस दिव्य, अपार माया को देखकर प्रसन्न और विस्मित हुए।

श्लोक 42 (1.214.42)

तां चैवाग्र्यां स्त्रियमतिरूपयुक्तां । दिव्यां साक्षात्सोमवह्निप्रकाशाम् । योग्यां तेषां रूपतेजोयशोभिः । पत्नीं मत्वा हृष्टवान्पार्थिवेन्द्रः ॥

tāṃ caivāgryāṃ striyamatirūpayuktāṃ | divyāṃ sākṣātsomavahniprakāśām | yogyāṃ teṣāṃ rūpatejoyaśobhiḥ | patnīṃ matvā hṛṣṭavānpārthivendraḥ

और उस श्रेष्ठ, अतिशय रूपवती, दिव्य, साक्षात् चन्द्रमा और अग्नि के समान दीप्त स्त्री को देखकर, उसे रूप, तेज और यश में उनके योग्य पत्नी मानकर राजाधिराज हर्षित हुए।

श्लोक 43 (1.214.43)

स तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यरूपं । जग्राह पादौ सत्यवत्याः सुतस्य । नैतच्चित्रं परमर्षे त्वयीति । प्रसन्नचेताः स उवाच चैनम् ॥

sa taddṛṣṭvā mahadāścaryarūpaṃ | jagrāha pādau satyavatyāḥ sutasya | naitaccitraṃ paramarṣe tvayīti | prasannacetāḥ sa uvāca cainam

वह महान आश्चर्य देखकर उन्होंने सत्यवती-पुत्र व्यास के चरण पकड़ लिए और प्रसन्नचित्त होकर उनसे कहा, "हे महर्षि, आपमें यह कोई आश्चर्य की बात नहीं।"

व्यास उवाच

श्लोक 44 (1.214.44)

इदं चापि पुरावृत्तं तन्निबोध च भूमिप । कीर्त्यमानं नृपर्षीणां पूर्वेषां दारकर्मणि ॥

idaṃ cāpi purāvṛttaṃ tannibodha ca bhūmipa | kīrtyamānaṃ nṛparṣīṇāṃ pūrveṣāṃ dārakarmaṇi

हे भूपाल, यह प्राचीन वृत्तान्त भी सुनो, जो पूर्वकाल के राजर्षियों के विवाह के विषय में कहा जाता है।

श्लोक 45 (1.214.45)

नितन्तुर्नाम राजर्षिर्बभूव भुवि विश्रुतः । तस्य पुत्रा महेष्वासा बभूवुः पञ्च भूमिपाः ॥

nitanturnāma rājarṣirbabhūva bhuvi viśrutaḥ | tasya putrā maheṣvāsā babhūvuḥ pañca bhūmipāḥ

नितन्तु नाम के एक राजर्षि थे, जो पृथ्वी पर विख्यात थे। उनके पाँच पुत्र हुए, जो महान धनुर्धर और राजा थे।

श्लोक 46 (1.214.46)

साल्वेयः शूरसेनश्च श्रुतसेनश्च वीर्यवान् । तिन्दुसारोऽतिसारश्च क्षत्रियाः क्रतुयाजिनः ॥

sālveyaḥ śūrasenaśca śrutasenaśca vīryavān | tindusāro'tisāraśca kṣatriyāḥ kratuyājinaḥ

वे थे साल्वेय, शूरसेन, पराक्रमी श्रुतसेन, तिन्दुसार और अतिसार; ये सब यज्ञ करने वाले क्षत्रिय थे।

श्लोक 47 (1.214.47)

नातिचक्रमुरन्योन्यमन्योन्यस्य प्रियंवदाः । अनीर्ष्यवो धर्मविदः सौम्याश्चैव प्रियकराः ॥

nāticakramuranyonyamanyonyasya priyaṃvadāḥ | anīrṣyavo dharmavidaḥ saumyāścaiva priyakarāḥ

वे कभी एक-दूसरे का अतिक्रमण नहीं करते थे; एक-दूसरे से मधुर बोलते, ईर्ष्या से रहित, धर्म के ज्ञाता, सौम्य और एक-दूसरे का भला करने वाले थे।

श्लोक 48 (1.214.48)

एतान्नैतन्तवान्पञ्च शिबिपुत्री स्वयंवरे । अवाप स्वपतीन्वीरान्भौमाश्वी मनुजाधिपान् ॥

etānnaitantavānpañca śibiputrī svayaṃvare | avāpa svapatīnvīrānbhaumāśvī manujādhipān

शिबि की पुत्री भौमाश्वी ने स्वयंवर में नितन्तु के इन पाँच वीर, नरपति पुत्रों को अपने पति के रूप में प्राप्त किया।

श्लोक 49 (1.214.49)

वीणेव मधुरारावा गान्धर्वस्वरमूर्च्छिता । उत्तमा सर्वनारीणां भौमाश्वी ह्यभवत्तदा ॥

vīṇeva madhurārāvā gāndharvasvaramūrcchitā | uttamā sarvanārīṇāṃ bhaumāśvī hyabhavattadā

वीणा के समान मधुर स्वर वाली, गन्धर्वों के स्वरों से युक्त भौमाश्वी उस समय सब स्त्रियों में उत्तम थी।

श्लोक 50 (1.214.50)

यस्या नैतन्तवाः पञ्च पतयः क्षत्रियर्षभाः । बभूवुः पृथिवीपालाः सर्वैः समुदिता गुणैः ॥

yasyā naitantavāḥ pañca patayaḥ kṣatriyarṣabhāḥ | babhūvuḥ pṛthivīpālāḥ sarvaiḥ samuditā guṇaiḥ

उसके पाँचों पति, नितन्तु के पुत्र, क्षत्रियों में श्रेष्ठ, पृथ्वी के पालक और सब गुणों से सम्पन्न थे।

श्लोक 51 (1.214.51)

तेषामेकाभवद्भार्या राज्ञामौशीनरी शुभा । भौमाश्वी नाम भद्रं ते तथारूपगुणान्विता ॥

teṣāmekābhavadbhāryā rājñāmauśīnarī śubhā | bhaumāśvī nāma bhadraṃ te tathārūpaguṇānvitā

उन राजाओं की एक ही पत्नी थी, उशीनर-वंश की शुभ राजकुमारी, भौमाश्वी नाम की, तुम्हारा कल्याण हो, जो रूप और गुणों से युक्त थी।

श्लोक 52 (1.214.52)

पञ्चभ्यः पञ्चधा पञ्च दायादान्सा व्यजायत । तेभ्यो नैतन्तवेभ्यस्तु राजशार्दूल वै तदा ॥

pañcabhyaḥ pañcadhā pañca dāyādānsā vyajāyata | tebhyo naitantavebhyastu rājaśārdūla vai tadā

हे राजसिंह, उसने नितन्तु के उन पाँचों पुत्रों से, प्रत्येक से एक-एक करके, पाँच उत्तराधिकारी पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 53 (1.214.53)

पृथगाख्याऽभवत्तेषां भ्रातॄणां पञ्चधा भुवि । यथावत्कीर्त्यमानांस्ताञ्छृणु मे राजसत्तम ॥

pṛthagākhyā'bhavatteṣāṃ bhrātṝṇāṃ pañcadhā bhuvi | yathāvatkīrtyamānāṃstāñchṛṇu me rājasattama

उन भाइयों के वंश पृथ्वी पर पाँच अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध हुए। हे राजश्रेष्ठ, उन्हें यथावत् सुनो।

श्लोक 54 (1.214.54)

साल्वेयाः शूरसेनाश्च श्रुतसेनाश्च पार्थिवाः । तिन्दुसारातिसाराश्च वंशा एषां नृपोत्तम ॥

sālveyāḥ śūrasenāśca śrutasenāśca pārthivāḥ | tindusārātisārāśca vaṃśā eṣāṃ nṛpottama

हे नृपश्रेष्ठ, साल्वेय, शूरसेन, श्रुतसेन राजा, तिन्दुसार और अतिसार: ये उनके वंश हैं।

श्लोक 55 (1.214.55)

एवमेकाऽभवद्भार्या भौमाश्वी भुवि विश्रुता । तथैव द्रुपदैषा ते सुता वै देवरूपिणी । पञ्चानां विहिता पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता ॥

evamekā'bhavadbhāryā bhaumāśvī bhuvi viśrutā | tathaiva drupadaiṣā te sutā vai devarūpiṇī | pañcānāṃ vihitā patnī kṛṣṇā pārṣatyaninditā

इस प्रकार पृथ्वी पर विख्यात भौमाश्वी पाँचों की एक पत्नी थी; और हे द्रुपद, उसी प्रकार तुम्हारी यह दिव्य रूप वाली पुत्री, अनिन्दिता कृष्णा पार्षती, पाँचों की पत्नी नियत की गई है।

श्लोक 56 (1.214.56)

आसीत्तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः । नाध्यगच्छत्पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ॥

āsīttapovane kācidṛṣeḥ kanyā mahātmanaḥ | nādhyagacchatpatiṃ sā tu kanyā rūpavatī satī

एक तपोवन में किसी महात्मा ऋषि की कन्या रहती थी। रूपवती और सती होने पर भी उसे पति नहीं मिला।

श्लोक 57 (1.214.57)

तोषयामास तपसा सा किलोग्रेण शङ्करम् । तामुवाचेश्वरः प्रीतो वृणु काममिति स्वयम् ॥

toṣayāmāsa tapasā sā kilogreṇa śaṅkaram | tāmuvāceśvaraḥ prīto vṛṇu kāmamiti svayam

कहते हैं, उसने कठोर तप से शङ्कर को प्रसन्न किया, और प्रसन्न होकर ईश्वर ने स्वयं उससे कहा, "मनचाहा वर माँगो।"

श्लोक 58 (1.214.58)

सैवमुक्ताऽब्रवीत्कन्या देवं वरदमीश्वरम् । पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनःपुनः ॥

saivamuktā'bravītkanyā devaṃ varadamīśvaram | patiṃ sarvaguṇopetamicchāmīti punaḥpunaḥ

यह सुनकर उस कन्या ने वरदाता ईश्वर से बार-बार कहा, "मैं सब गुणों से युक्त पति चाहती हूँ।"

श्लोक 59 (1.214.59)

ददौ तस्यै स देवेशस्तं वरं प्रीतमानसः । पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति शङ्करः ॥

dadau tasyai sa deveśastaṃ varaṃ prītamānasaḥ | pañca te patayo bhadre bhaviṣyantīti śaṅkaraḥ

प्रसन्न मन वाले देवेश्वर ने उसे वह वर दिया। शङ्कर ने कहा, "हे भद्रे, तुम्हारे पाँच पति होंगे।"

श्लोक 60 (1.214.60)

सा प्रसादयती देवमिदं भूयोऽभ्यभाषत । एकं पतिं गुणोपेतं त्वत्तोऽर्हामीति शङ्कर ॥

sā prasādayatī devamidaṃ bhūyo'bhyabhāṣata | ekaṃ patiṃ guṇopetaṃ tvatto'rhāmīti śaṅkara

भगवान को प्रसन्न करती हुई उसने फिर कहा, "हे शङ्कर, मैं आपसे एक ही गुणवान पति पाने की अधिकारी हूँ।"

श्लोक 61 (1.214.61)

तां देवदेवः प्रीतात्मा पुनः प्राह शुभं वचः । पञ्चकृत्वस्त्वयोक्तोऽहं पतिं देहीति वै पुनः ॥

tāṃ devadevaḥ prītātmā punaḥ prāha śubhaṃ vacaḥ | pañcakṛtvastvayokto'haṃ patiṃ dehīti vai punaḥ

देवों के देव ने प्रसन्न होकर उससे फिर शुभ वचन कहे: "तुमने मुझसे पाँच बार कहा था, 'मुझे पति दीजिए'।

शङ्कर उवाच

श्लोक 62 (1.214.62)

तत्तथा भविता भद्रे वचस्तद्भद्रमस्तु ते । देहमन्यं गतायास्ते सर्वमेतद्भविष्यति ॥

tattathā bhavitā bhadre vacastadbhadramastu te | dehamanyaṃ gatāyāste sarvametadbhaviṣyati

हे भद्रे, वैसा ही होगा; तुम्हारा कल्याण हो। दूसरा शरीर पाने पर यह सब पूरा होगा।"

व्यास उवाच

श्लोक 63 (1.214.63)

द्रुपदैषा हि सा जज्ञे सुता वै देवरूपिणी । पञ्चानां विहिता पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता ॥

drupadaiṣā hi sā jajñe sutā vai devarūpiṇī | pañcānāṃ vihitā patnī kṛṣṇā pārṣatyaninditā

हे द्रुपद, वही तुम्हारी इस दिव्य रूप वाली पुत्री के रूप में जन्मी है: अनिन्दिता कृष्णा पार्षती, जो पाँचों की पत्नी नियत है।

श्लोक 64 (1.214.64)

सैव नालायनी भूत्वा रूपेणाप्रतिमा भुवि । मौद्गल्यं पतिमास्थाय शिवाद्वरमभीप्सती ॥

saiva nālāyanī bhūtvā rūpeṇāpratimā bhuvi | maudgalyaṃ patimāsthāya śivādvaramabhīpsatī

यही नालायनी होकर, पृथ्वी पर अनुपम रूपवती, मौद्गल्य को पति बनाकर शिव से वर पाने की इच्छा रखती थी।

श्लोक 65 (1.214.65)

एतद्देवरहस्यं ते श्रावितं राजसत्तम । नाख्यातव्यं कस्यचिद्वै देवगुह्यमिदं यतः ॥

etaddevarahasyaṃ te śrāvitaṃ rājasattama | nākhyātavyaṃ kasyacidvai devaguhyamidaṃ yataḥ

हे राजश्रेष्ठ, यह देवताओं का रहस्य मैंने तुम्हें सुनाया है। इसे किसी को नहीं बताना चाहिए, क्योंकि यह देवताओं का गुप्त विषय है।

श्लोक 66 (1.214.66)

स्वर्गश्रीः पाण्डवार्थं तु समुत्पन्ना महामखे । सेह तप्त्वा तपो घोरं दुहितृत्वं तवागता ॥

svargaśrīḥ pāṇḍavārthaṃ tu samutpannā mahāmakhe | seha taptvā tapo ghoraṃ duhitṛtvaṃ tavāgatā

स्वर्ग की श्री पाण्डवों के लिए महायज्ञ में उत्पन्न हुई है; यहाँ घोर तप करके वह तुम्हारी पुत्री बनी है।

श्लोक 67 (1.214.67)

सैषा देवी रुचिरा देवजुष्टा । पञ्चानामेका स्वकृतेनेह कर्मणा । सृष्टा स्वयं देवपत्नी स्वयंभुवा । श्रुत्वा राजन्द्रुपदेष्टं कुरुष्व ॥

saiṣā devī rucirā devajuṣṭā | pañcānāmekā svakṛteneha karmaṇā | sṛṣṭā svayaṃ devapatnī svayaṃbhuvā | śrutvā rājandrupadeṣṭaṃ kuruṣva

देवताओं द्वारा सेवित यह सुन्दर देवी अपने ही कर्मों के कारण स्वयम्भू ब्रह्मा द्वारा पाँचों की एक दिव्य पत्नी के रूप में रची गई है। हे राजा द्रुपद, यह सुनकर अब जैसा चाहो वैसा करो।

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