आदि पर्व · अध्याय 217
कौरवों की मन्त्रणा: शकुनि का युद्ध-परामर्श और सौमदत्ति का सन्धि-परामर्श
गुप्तचर राजाओं को समाचार देते हैं कि द्रौपदी को पाण्डवों ने प्राप्त किया है: लक्ष्य अर्जुन ने बेधा था, शल्य को भीम ने पटका और वृक्ष से युद्ध किया था, और युधिष्ठिर तथा दोनों जुड़वाँ भाइयों ने दुर्योधन और उसके भाइयों से युद्ध किया था। लाक्षागृह में जले समझे गए कुन्तीपुत्रों को जीवित जानकर राजा चकित होते हैं और पुरोचन के क्रूर कर्म के लिए भीष्म और धृतराष्ट्र को धिक्कारते हैं। दुर्योधन का पक्ष मन्त्रणा करता है: शकुनि कहता है कि वृष्णियों और शिशुपाल के द्रुपद से मिलने से पहले ही उसके नगर पर धावा बोल दिया जाए, परन्तु सौमदत्ति पाण्डवों के गुणों, उनके मित्रों और नगर की सुदृढ़ता को तौलकर सन्धि करके घर लौटने की सलाह देता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.217.1)
ततो राज्ञां चरैराप्तैः प्रवृत्तिरुपनीयत । पाण्डवैरुपसंपन्ना द्रौपदी पतिभिः शुभा ॥
tato rājñāṃ carairāptaiḥ pravṛttirupanīyata | pāṇḍavairupasaṃpannā draupadī patibhiḥ śubhā
तब विश्वस्त गुप्तचरों ने राजाओं तक यह समाचार पहुँचाया कि सुन्दरी द्रौपदी पाण्डवों को पति रूप में प्राप्त हुई है;
श्लोक 2 (1.217.2)
येन तद्धनुरादाय लक्ष्यं विद्धं महात्मना । सोऽर्जुनो जयतां श्रेष्ठो महाबाणधनुर्धरः ॥
yena taddhanurādāya lakṣyaṃ viddhaṃ mahātmanā | so'rjuno jayatāṃ śreṣṭho mahābāṇadhanurdharaḥ
कि जिस महात्मा ने वह धनुष उठाकर लक्ष्य बेधा था, वे विजेताओं में श्रेष्ठ, महान् धनुष और बाण धारण करने वाले अर्जुन थे;
श्लोक 3 (1.217.3)
यः शल्यं मद्रराजं वै प्रोत्क्षिप्यापातयद्बली । त्रासयामास संक्रुद्धो वृक्षेण पुरुषान्रणे ॥
yaḥ śalyaṃ madrarājaṃ vai protkṣipyāpātayadbalī | trāsayāmāsa saṃkruddho vṛkṣeṇa puruṣānraṇe
कि जिस बलवान ने मद्रराज शल्य को ऊपर उठाकर पटक दिया था और क्रोध में भरकर युद्ध में एक वृक्ष से लोगों को भयभीत किया था,
श्लोक 4 (1.217.4)
न चास्य संभ्रमः कश्चिदासीत्तत्र महात्मनः । स भीमो भीमसंस्पर्शः शत्रुसेनाङ्गपातनः ॥
na cāsya saṃbhramaḥ kaścidāsīttatra mahātmanaḥ | sa bhīmo bhīmasaṃsparśaḥ śatrusenāṅgapātanaḥ
और जिस महात्मा को वहाँ तनिक भी घबराहट नहीं हुई थी, वह भयंकर स्पर्श वाला, शत्रु-सेनाओं के अंगों को धराशायी करने वाला भीम था;
श्लोक 5 (1.217.5)
योऽसावत्यक्रमीद्युध्यन्युद्धे दुर्योधनं तथा । स राजा पाण्डवश्रेष्ठः पुण्यभाग्बुद्धिवर्धनः ॥
yo'sāvatyakramīdyudhyanyuddhe duryodhanaṃ tathā | sa rājā pāṇḍavaśreṣṭhaḥ puṇyabhāgbuddhivardhanaḥ
कि जिसने युद्ध करते हुए दुर्योधन को परास्त किया था, वह पाण्डवों में श्रेष्ठ, पुण्यवान और बुद्धि बढ़ाने वाला राजा (युधिष्ठिर) था;
श्लोक 6 (1.217.6)
दुर्योधनस्यावरजैर्यौ युध्येतां प्रतीपवत् । तौ यमौ वृत्तसंपन्नौ संपन्नबलविक्रमौ ॥
duryodhanasyāvarajairyau yudhyetāṃ pratīpavat | tau yamau vṛttasaṃpannau saṃpannabalavikramau
और जो दोनों दुर्योधन के छोटे भाइयों से डटकर लड़े थे, वे सदाचारी तथा बल और पराक्रम से सम्पन्न दोनों जुड़वाँ भाई (नकुल-सहदेव) थे।
श्लोक 7 (1.217.7)
ब्रह्मरूपधराञ्श्रुत्वा प्रशान्तान्पाण्डुनन्दनान् । कौन्तेयान्मनुजेन्द्राणां विस्मयः समजायत ॥
brahmarūpadharāñśrutvā praśāntānpāṇḍunandanān | kaunteyānmanujendrāṇāṃ vismayaḥ samajāyata
यह सुनकर कि शान्त स्वभाव वाले पाण्डुपुत्र, कुन्ती के बेटे, ब्राह्मणों का वेश धारण किए हुए थे, राजाओं को बड़ा विस्मय हुआ।
श्लोक 8 (1.217.8)
पौरा हि सर्वे राजन्याः समपद्यन्त विस्मिताः । सपुत्रा हि पुरा कुन्ती दग्धा जतुगृहे श्रुता ॥
paurā hi sarve rājanyāḥ samapadyanta vismitāḥ | saputrā hi purā kuntī dagdhā jatugṛhe śrutā
सभी नागरिक और क्षत्रिय चकित रह गए, क्योंकि पहले यह सुना गया था कि कुन्ती अपने पुत्रों सहित लाक्षागृह में जल गई थीं।
श्लोक 9 (1.217.9)
सर्वभूमिपतीनां च राष्ट्राणां च यशस्विनी । पुनर्जातानिव च तांस्तेऽमन्यन्त नराधिपाः ॥
sarvabhūmipatīnāṃ ca rāṣṭrāṇāṃ ca yaśasvinī | punarjātāniva ca tāṃste'manyanta narādhipāḥ
कुन्ती समस्त भूपतियों और राष्ट्रों में यशस्विनी थीं; और अब राजाओं ने उनके पुत्रों को मानो पुनर्जन्म पाया हुआ समझा।
श्लोक 10 (1.217.10)
धिगकुर्वंस्तदा भीष्मं धृतराष्ट्रं च कौरवम् । कर्मणाऽतिनृशंसेन पुरोचनकृतेन वै ॥
dhigakurvaṃstadā bhīṣmaṃ dhṛtarāṣṭraṃ ca kauravam | karmaṇā'tinṛśaṃsena purocanakṛtena vai
तब उन्होंने पुरोचन द्वारा किए गए उस अत्यन्त क्रूर कर्म के लिए भीष्म और कुरुवंशी धृतराष्ट्र को धिक्कारा,
श्लोक 11 (1.217.11)
धार्मिकान्वृत्तसंपन्नान्मातुः प्रियहिते रतान् । यदा तानीदृशान्पार्थानुत्सादयितुमिच्छति ॥
dhārmikānvṛttasaṃpannānmātuḥ priyahite ratān | yadā tānīdṛśānpārthānutsādayitumicchati
क्योंकि वह ऐसे धर्मात्मा, सदाचारी और माता के प्रिय तथा हित में लगे रहने वाले पृथापुत्रों का नाश करना चाहता था।
श्लोक 12 (1.217.12)
ततः स्वयंवरे वृत्ते धार्तराष्ट्राश्च भारत । मन्त्रयन्ति ततः सर्वे कर्णसौबलदूषिताः ॥
tataḥ svayaṃvare vṛtte dhārtarāṣṭrāśca bhārata | mantrayanti tataḥ sarve karṇasaubaladūṣitāḥ
हे भारत! तब स्वयंवर समाप्त हो जाने पर कर्ण और सौबल (शकुनि) के बहकाए हुए सभी धृतराष्ट्रपुत्र आपस में मन्त्रणा करने लगे।
शकुनिरुवाच
श्लोक 13 (1.217.13)
कश्चिच्छत्रुः कर्शनीयः पीडनीयस्तथाऽपरः । उत्सादनीयाः कौन्तेयाः सर्वक्षत्रस्य मे मताः ॥
kaścicchatruḥ karśanīyaḥ pīḍanīyastathā'paraḥ | utsādanīyāḥ kaunteyāḥ sarvakṣatrasya me matāḥ
"किसी शत्रु को दुर्बल करना चाहिए और किसी दूसरे को पीड़ित; परन्तु मेरे मत में कुन्ती के पुत्रों का तो समस्त क्षत्रियों द्वारा समूल नाश होना चाहिए।
श्लोक 14 (1.217.14)
एवं पराजिताः सर्वे यदि यूयं गमिष्यथ । अकृत्वा संविदं कांचिन्मनस्तप्स्यत्यसंशयम् ॥
evaṃ parājitāḥ sarve yadi yūyaṃ gamiṣyatha | akṛtvā saṃvidaṃ kāṃcinmanastapsyatyasaṃśayam
यदि तुम सब इस प्रकार पराजित होकर, कोई निश्चय किए बिना लौट जाओगे, तो निःसन्देह तुम्हारा मन पछतावे से जलेगा।
श्लोक 15 (1.217.15)
अयं देशश्च कालश्च पाण्डवाहरणाय नः । न चेदेवं करिष्यध्वं लोके हास्या भविष्यथ ॥
ayaṃ deśaśca kālaśca pāṇḍavāharaṇāya naḥ | na cedevaṃ kariṣyadhvaṃ loke hāsyā bhaviṣyatha
पाण्डवों को हटा देने के लिए यही हमारा उचित स्थान और समय है। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो संसार में उपहास के पात्र बनोगे।
श्लोक 16 (1.217.16)
यमेते संश्रिता वस्तुं कामयन्ते च भूमिपम् । सोऽल्पवीर्यबलो राजा द्रुपदो वै मतो मम ॥
yamete saṃśritā vastuṃ kāmayante ca bhūmipam | so'lpavīryabalo rājā drupado vai mato mama
जिस राजा का आश्रय लेकर वे रहना चाहते हैं, वह द्रुपद मेरे विचार में अल्प पराक्रम और बल वाला राजा है।
श्लोक 17 (1.217.17)
यावदेतान्न जानन्ति जीवतो वृष्णिपुङ्गवाः । चैद्यश्च पुरुषव्याघ्रः शिशुपालः प्रतापवान् ॥
yāvadetānna jānanti jīvato vṛṣṇipuṅgavāḥ | caidyaśca puruṣavyāghraḥ śiśupālaḥ pratāpavān
जब तक वृष्णिवंश के श्रेष्ठ वीर, और चेदिराज पुरुषसिंह प्रतापी शिशुपाल यह नहीं जानते कि ये जीवित हैं,
श्लोक 18 (1.217.18)
एकीभावं गतो राज्ञा द्रुपदेन महात्मना । दुराधर्षतरा राजन्भविष्यन्ति न संशयः ॥
ekībhāvaṃ gato rājñā drupadena mahātmanā | durādharṣatarā rājanbhaviṣyanti na saṃśayaḥ
(क्योंकि महात्मा राजा द्रुपद के साथ उसके एक हो जाने पर, हे राजन्, ये निःसन्देह और भी दुर्जेय हो जाएँगे)
श्लोक 19 (1.217.19)
यावच्चञ्चलतां सर्वे प्राप्नुवन्ति नराधिपाः । तावदेव व्यवस्यामः पाण्डवानां वधं प्रति ॥
yāvaccañcalatāṃ sarve prāpnuvanti narādhipāḥ | tāvadeva vyavasyāmaḥ pāṇḍavānāṃ vadhaṃ prati
और जब तक सभी राजा डाँवाडोल हैं, तभी तक हम पाण्डवों के वध का निश्चय कर लें।
श्लोक 20 (1.217.20)
मुक्ता जतुगृहाद्भीमादाशीविषमुखादिव । पुनस्ते यदि मुच्यन्ते महन्नो भयमागतम् ॥
muktā jatugṛhādbhīmādāśīviṣamukhādiva | punaste yadi mucyante mahanno bhayamāgatam
वे भयानक लाक्षागृह से ऐसे बच निकले मानो विषधर सर्प के मुख से छूटे हों। यदि वे फिर छूट गए तो समझो हम पर बड़ा भय आ पड़ा।
श्लोक 21 (1.217.21)
तेषामिहोपयातानामेषां तु चिरवासिनाम् । अन्तरे दुष्करं स्थातुं गजयोर्महतोरिव ॥
teṣāmihopayātānāmeṣāṃ tu ciravāsinām | antare duṣkaraṃ sthātuṃ gajayormahatoriva
यहाँ आए हुए इन (पाण्डवों) और यहाँ दीर्घकाल से रहने वाले इन (पांचालों) के बीच खड़े रह पाना वैसा ही कठिन है जैसा दो बड़े हाथियों के बीच।
श्लोक 22 (1.217.22)
हनध्वं प्रगृहीतानि बलानि बलिनां वराः । यावन्नः कुरुसेनायां पतन्ति पतगा इव ॥
hanadhvaṃ pragṛhītāni balāni balināṃ varāḥ | yāvannaḥ kurusenāyāṃ patanti patagā iva
हे बलवानों में श्रेष्ठ वीरो! उनकी सेनाएँ जब तक जुट ही रही हैं, तभी उन पर प्रहार करो, इससे पहले कि वे पक्षियों की भाँति कुरु-सेना पर टूट पड़ें।
श्लोक 23 (1.217.23)
तावत्सर्वाभिसारेण पुरमेतद्विहन्यताम् । एतन्मम मतं चैव प्राप्तकालं नरर्षभ ॥
tāvatsarvābhisāreṇa purametadvihanyatām | etanmama mataṃ caiva prāptakālaṃ nararṣabha
उससे पहले ही पूरी शक्ति से धावा बोलकर इस नगर को नष्ट कर दिया जाए। हे नरश्रेष्ठ! यही मेरा मत है और इसका समय आ पहुँचा है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (1.217.24)
शकुनेर्वचनं श्रुत्वा भाषमाणस्य दुर्मतेः । सौमदत्तिरिदं वाक्यं जगाद परमं ततः ॥
śakunervacanaṃ śrutvā bhāṣamāṇasya durmateḥ | saumadattiridaṃ vākyaṃ jagāda paramaṃ tataḥ
दुर्बुद्धि शकुनि के ये वचन सुनकर सौमदत्ति ने तब यह उत्तम बात कही—
सौमदत्तिरुवाच
श्लोक 25 (1.217.25)
प्रकृतीः सप्त वै ज्ञात्वा आत्मनश्च परस्य च । तथा देशं च कालं च षड्विधान्स नयेद्गुणान् ॥
prakṛtīḥ sapta vai jñātvā ātmanaśca parasya ca | tathā deśaṃ ca kālaṃ ca ṣaḍvidhānsa nayedguṇān
"राजा को अपने और शत्रु के राज्य के सात अंगों को, तथा देश और काल को जानकर नीति के छह गुणों का प्रयोग करना चाहिए;
श्लोक 26 (1.217.26)
स्थानं वृद्धिं क्षयं चैव भूमिं मित्राणि विक्रमम् । प्रसमीक्ष्याभियुञ्जीत परं व्यसनपीडितम् ॥
sthānaṃ vṛddhiṃ kṣayaṃ caiva bhūmiṃ mitrāṇi vikramam | prasamīkṣyābhiyuñjīta paraṃ vyasanapīḍitam
स्थिति, वृद्धि, क्षय, भूमि, मित्र और पराक्रम को भली-भाँति परखकर उसे विपत्ति से घिरे शत्रु पर ही आक्रमण करना चाहिए।
श्लोक 27 (1.217.27)
ततोऽहं पाण्डवान्मन्ये मित्रकोशसमन्वितान् । बलस्थान्विक्रमस्थांश्च स्वकृतैः प्रकृतिप्रियान् ॥
tato'haṃ pāṇḍavānmanye mitrakośasamanvitān | balasthānvikramasthāṃśca svakṛtaiḥ prakṛtipriyān
परन्तु मैं पाण्डवों को मित्रों और कोष से सम्पन्न, बल और पराक्रम में दृढ़, और अपने कर्मों से प्रजा का प्रिय देखता हूँ।
श्लोक 28 (1.217.28)
वपुषा हि तु भूतानां नेत्राणि हृदयानि च । श्रोत्रं मधुरया वाचा रमयत्यर्जुनो नृणाम् ॥
vapuṣā hi tu bhūtānāṃ netrāṇi hṛdayāni ca | śrotraṃ madhurayā vācā ramayatyarjuno nṛṇām
अर्जुन अपने सुन्दर रूप से प्राणियों के नेत्रों और हृदयों को, और मधुर वाणी से मनुष्यों के कानों को आनन्द देता है।
श्लोक 29 (1.217.29)
न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन भेजिरे । यद्बभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत् ॥
na tu kevaladaivena prajā bhāvena bhejire | yadbabhūva manaḥkāntaṃ karmaṇā sa cakāra tat
प्रजा केवल भाग्यवश नहीं, बल्कि प्रेम-भाव से उसकी ओर आकृष्ट हुई; जो कुछ उनके मन को प्रिय था, उसे उसने अपने कर्मों से कर दिखाया।
श्लोक 30 (1.217.30)
न ह्ययुक्तं न चासक्तं नानृतं न च विप्रियम् । भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य भारती ॥
na hyayuktaṃ na cāsaktaṃ nānṛtaṃ na ca vipriyam | bhāṣitaṃ cārubhāṣasya jajñe pārthasya bhāratī
मधुरभाषी पार्थ की वाणी से कभी कोई अनुचित, असंगत, असत्य या अप्रिय वचन नहीं निकला।
श्लोक 31 (1.217.31)
तानेवंगुणसंपन्नान्संपन्नान्राजलक्षणैः । न तान्पश्यामि ये शक्ताः समुच्छेत्तुं यथा बलात् ॥
tānevaṃguṇasaṃpannānsaṃpannānrājalakṣaṇaiḥ | na tānpaśyāmi ye śaktāḥ samucchettuṃ yathā balāt
ऐसे गुणों और राजलक्षणों से सम्पन्न उन (पाण्डवों) को बलपूर्वक उखाड़ फेंकने में समर्थ मुझे कोई दिखाई नहीं देता।
श्लोक 32 (1.217.32)
प्रभावशक्तिर्विपुला मन्त्रशक्तिश्च पुष्कला । तथैवोत्साहशक्तिश्च पार्थेष्वप्यधितिष्ठति ॥
prabhāvaśaktirvipulā mantraśaktiśca puṣkalā | tathaivotsāhaśaktiśca pārtheṣvapyadhitiṣṭhati
प्रभाव-शक्ति विपुल, मन्त्र-शक्ति प्रचुर और उसी प्रकार उत्साह-शक्ति भी पृथापुत्रों में विद्यमान है।
श्लोक 33 (1.217.33)
मौलमित्रबलानां च कालज्ञो वै युधिष्ठिरः । साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनेति युधिष्ठिरः ॥
maulamitrabalānāṃ ca kālajño vai yudhiṣṭhiraḥ | sāmnā dānena bhedena daṇḍeneti yudhiṣṭhiraḥ
युधिष्ठिर अपनी वंशानुगत सेना और मित्रों की सेना के उपयोग का उचित समय जानते हैं; युधिष्ठिर साम, दान, भेद और दण्ड से
श्लोक 34 (1.217.34)
अमित्रांश्च ततो जेतुं न रोषेणेति मे मतिः । परिक्रीय धनैः शत्रुं मित्राणि च बलानि च ॥
amitrāṃśca tato jetuṃ na roṣeṇeti me matiḥ | parikrīya dhanaiḥ śatruṃ mitrāṇi ca balāni ca
शत्रुओं को जीतना चाहते हैं, क्रोध से नहीं, ऐसा मेरा मत है। धन देकर शत्रु को, मित्रों को और सेनाओं को अपना बनाकर,
श्लोक 35 (1.217.35)
मूलं च सुकृतं कृत्वा भुङ्क्ते भूमिं च पाण्डवः । अशक्यान्पाण्डवान्मन्ये देवैरपि सवासवैः ॥
mūlaṃ ca sukṛtaṃ kṛtvā bhuṅkte bhūmiṃ ca pāṇḍavaḥ | aśakyānpāṇḍavānmanye devairapi savāsavaiḥ
और अपनी जड़ सुदृढ़ करके वह पाण्डव पृथ्वी का भोग करता है। मैं पाण्डवों को इन्द्र सहित देवताओं के लिए भी अजेय मानता हूँ,
श्लोक 36 (1.217.36)
येषामर्थे सदा युक्तौ कृष्णसंकर्षणावुभौ । श्रेयश्च यदि मन्यध्वं मन्मतं यदि वा मतम् ॥
yeṣāmarthe sadā yuktau kṛṣṇasaṃkarṣaṇāvubhau | śreyaśca yadi manyadhvaṃ manmataṃ yadi vā matam
जिनके लिए कृष्ण और संकर्षण (बलराम) दोनों सदा तत्पर रहते हैं। यदि तुम इसे कल्याणकारी समझो, यदि मेरा मत स्वीकार हो,
श्लोक 37 (1.217.37)
संविदं पाण्डवैः सर्वैः कृत्वा याम यथागतम् । गोपुराट्टालकैरुच्चैरुपतल्पशतैरपि ॥
saṃvidaṃ pāṇḍavaiḥ sarvaiḥ kṛtvā yāma yathāgatam | gopurāṭṭālakairuccairupatalpaśatairapi
तो सब पाण्डवों से समझौता करके हम जैसे आए थे वैसे ही लौट चलें। ऊँचे गोपुरों, अटारियों और सैकड़ों ऊपरी कक्षों से
श्लोक 38 (1.217.38)
गुप्तं पुरवरश्रेष्ठमेतदद्भिश्च संवृतम् । तृणधान्येन्धनरसैस्तथा यन्त्रायुधौषधैः ॥
guptaṃ puravaraśreṣṭhametadadbhiśca saṃvṛtam | tṛṇadhānyendhanarasaistathā yantrāyudhauṣadhaiḥ
यह श्रेष्ठ नगर सुरक्षित है और जल से घिरा है; यह घास, अन्न, ईंधन और रसों से, तथा यन्त्रों, शस्त्रों और औषधियों से भरा-पूरा है;
श्लोक 39 (1.217.39)
युक्तं बहुकवाटैश्च द्रव्यागारसुवेदिकैः । भीमोच्छ्रितमहाचक्रं बृहदट्टालसंवृतम् ॥
yuktaṃ bahukavāṭaiśca dravyāgārasuvedikaiḥ | bhīmocchritamahācakraṃ bṛhadaṭṭālasaṃvṛtam
इसमें अनेक कपाट हैं, भण्डार-गृह और सुन्दर वेदिकाएँ हैं, भयानक ऊँचाई तक उठे महाचक्र हैं, और यह बड़ी-बड़ी अटारियों से घिरा है;
श्लोक 40 (1.217.40)
दृढप्राकारनिर्यूहं शतघ्नीशतसंकुलम् । ऐष्टको दारवो वप्रो मानुषश्चेति यः स्मृतः ॥
dṛḍhaprākāraniryūhaṃ śataghnīśatasaṃkulam | aiṣṭako dāravo vapro mānuṣaśceti yaḥ smṛtaḥ
इसके प्राकार और बुर्ज दृढ़ हैं, और यह सैकड़ों शतघ्नियों से भरा है। ईंटों का, लकड़ी का, मिट्टी का और मनुष्यों का, ऐसे जो परकोटे बताए गए हैं,
श्लोक 41 (1.217.41)
प्राकारकर्तृभिर्वीरैर्नृगर्भस्तत्र पूजितः । तदेतन्नरगर्भेण पाण्डरेण विराजते ॥
prākārakartṛbhirvīrairnṛgarbhastatra pūjitaḥ | tadetannaragarbheṇa pāṇḍareṇa virājate
उनमें प्राकार बनाने वाले वीर मनुष्यों से भरे परकोटे को ही श्रेष्ठ मानते हैं; और यह नगर ऐसे ही योद्धाओं से भरे श्वेत परकोटे से शोभित है,
श्लोक 42 (1.217.42)
सालेनानेकतालेन सर्वतः संवृतं पुरम् । अनुरक्ताः प्रकृतयो द्रुपदस्य महात्मनः ॥
sālenānekatālena sarvataḥ saṃvṛtaṃ puram | anuraktāḥ prakṛtayo drupadasya mahātmanaḥ
अनेक ताड़ ऊँचा वह परकोटा नगर को सब ओर से घेरे हुए है। महात्मा द्रुपद की प्रजा उनसे अनुराग रखती है,
श्लोक 43 (1.217.43)
दानमानार्जिताः सर्वे बाह्याभ्यन्तरगाश्च ये । प्रतिरुद्धानिमाञ्ज्ञात्वा राजभिर्भीमविक्रमैः ॥
dānamānārjitāḥ sarve bāhyābhyantaragāśca ye | pratiruddhānimāñjñātvā rājabhirbhīmavikramaiḥ
बाहर और भीतर रहने वाले सभी लोग दान और सम्मान से उनके अपने हो चुके हैं। यह जानकर कि भयंकर पराक्रमी राजाओं ने इन्हें घेर लिया है,
श्लोक 44 (1.217.44)
उपयास्यन्ति दाशार्हाः समुदग्रोच्छ्रितायुधाः । तस्मात्संधिं वयं कृत्वा धार्तराष्ट्रस्य पाण्डवैः ॥
upayāsyanti dāśārhāḥ samudagrocchritāyudhāḥ | tasmātsaṃdhiṃ vayaṃ kṛtvā dhārtarāṣṭrasya pāṇḍavaiḥ
दाशार्ह (यादव) अपने शस्त्र ऊँचे उठाए आ पहुँचेंगे। इसलिए धृतराष्ट्रपुत्र और पाण्डवों के बीच सन्धि कराकर
श्लोक 45 (1.217.45)
स्वराष्ट्रमेव गच्छामो यद्याप्तं वचनं मम । एतन्मम मतं सर्वैः क्रियतां यदि रोचते । एतद्धि सुकृतं मन्ये क्षेमं चापि महीक्षिताम् ॥
svarāṣṭrameva gacchāmo yadyāptaṃ vacanaṃ mama | etanmama mataṃ sarvaiḥ kriyatāṃ yadi rocate | etaddhi sukṛtaṃ manye kṣemaṃ cāpi mahīkṣitām
हम अपने-अपने राज्यों को लौट चलें, यदि मेरी बात उचित लगे। यदि तुम्हें रुचे तो सब लोग मेरे इस मत के अनुसार चलें; मैं इसी को उत्तम और राजाओं के लिए कल्याणकारी मानता हूँ।"