Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 218

द्रुपद के नगर के सामने युद्ध; कृष्ण और बलराम का पांचाल आगमन

कर्ण सौमदत्ति की सलाह को नकारकर द्रुपद के नगर पर तुरन्त धावा बोलने और प्रत्येक शत्रु को मारने पर पुरस्कार की घोषणा करने की बात कहता है। कौरवपक्ष के राजा नगर पर चढ़ आते हैं, और द्रुपद, उनके पुत्र तथा पाण्डव उनका सामना करने निकलते हैं। कर्ण और जयद्रथ सुमित्र और प्रियदर्शन को मार डालते हैं; अर्जुन जयद्रथ और कर्ण के पुत्रों को मारते हैं; रथ नष्ट हो जाने पर भीम तलवार से और फिर उखाड़े हुए वृक्ष से लड़ते हैं, और अर्जुन के बाणों से घायल कर्ण को उसका सारथि रणभूमि से हटा ले जाता है। पराजित राजा लौट जाते हैं और कौरव हस्तिनापुर चले जाते हैं; पाण्डवों के दूतों से समाचार पाकर कृष्ण और बलराम यादवों के साथ पांचाल आते हैं, कुन्ती और द्रौपदी का सम्मान करते हैं और पाण्डवों के साथ वहीं रहते हैं।

अध्याय 217अध्याय-सूचीअध्याय 219

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.218.1)

सौमदत्तेर्वचः श्रुत्वा कर्णो वैकर्तनो वृषा । उवाच वचनं काले कालज्ञः सर्वकर्मणाम् ॥

saumadattervacaḥ śrutvā karṇo vaikartano vṛṣā | uvāca vacanaṃ kāle kālajñaḥ sarvakarmaṇām

सौमदत्ति के वचन सुनकर सब कार्यों का उचित समय जानने वाले वीर वैकर्तन कर्ण ने समय पर यह वचन कहा—

कर्ण उवाच

श्लोक 2 (1.218.2)

नीतिपूर्वमिदं सर्वमुक्तं वचनमर्थवत् । वचनं नाभ्यसूयामि श्रूयतां यद्वचस्त्विति ॥

nītipūrvamidaṃ sarvamuktaṃ vacanamarthavat | vacanaṃ nābhyasūyāmi śrūyatāṃ yadvacastviti

"यह सब वचन नीति के अनुसार और सार्थक कहा गया है; मैं इस कथन में दोष नहीं निकालता। परन्तु अब जो मेरा कहना है, वह सुनो।

श्लोक 3 (1.218.3)

द्वैधीभावो न गन्तव्यः सर्वकर्मसु मानवैः । द्विधाभूतेन मनसा अन्यत्कर्म न सिध्यति ॥

dvaidhībhāvo na gantavyaḥ sarvakarmasu mānavaiḥ | dvidhābhūtena manasā anyatkarma na sidhyati

मनुष्यों को किसी भी कार्य में दुविधा में नहीं पड़ना चाहिए; दुविधा में पड़े मन से कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 4 (1.218.4)

संप्रयाणासनाभ्यां तु कर्शनेन तथैव च । नैतच्छक्यं पुरं हर्तुमाक्रन्दश्चाप्यशोभनः ॥

saṃprayāṇāsanābhyāṃ tu karśanena tathaiva ca | naitacchakyaṃ puraṃ hartumākrandaścāpyaśobhanaḥ

यह नगर न चढ़ाई करके, न घेरा डालकर बैठे रहने से और न ही इसे दुर्बल करके लिया जा सकता है; और केवल ललकारते रहना भी शोभा नहीं देता।

श्लोक 5 (1.218.5)

अवमर्दनकालोऽत्र मतश्चिन्तयतो मम । यावन्नो वृष्णयः पार्ष्णिं न गृह्णन्ति रणप्रियाः ॥

avamardanakālo'tra mataścintayato mama | yāvanno vṛṣṇayaḥ pārṣṇiṃ na gṛhṇanti raṇapriyāḥ

मेरे विचार में इन्हें कुचल डालने का समय अभी है, इससे पहले कि युद्धप्रिय वृष्णिवंशी हमारे पीछे से आ पड़ें।

श्लोक 6 (1.218.6)

भवन्तश्च तथा हृष्टाः स्वबाहुबलशालिनः । प्राकारमवमृद्नन्तु परिघाः पूरयन्त्वपि ॥

bhavantaśca tathā hṛṣṭāḥ svabāhubalaśālinaḥ | prākāramavamṛdnantu parighāḥ pūrayantvapi

और तुम लोग, जो उत्साहित हो और अपने बाहुबल से सम्पन्न हो, परकोटे को ढहा दो और खाइयों को भी भर दो।

श्लोक 7 (1.218.7)

प्रस्रावयन्तु सलिलं क्रियतां विषमं समम् । तृणकाष्ठेन महता खातमस्य प्रपूर्यताम् ॥

prasrāvayantu salilaṃ kriyatāṃ viṣamaṃ samam | tṛṇakāṣṭhena mahatā khātamasya prapūryatām

जल को बहा दिया जाए, ऊबड़-खाबड़ भूमि समतल कर दी जाए, और इसकी खाई को घास और लकड़ी के बड़े ढेरों से पाट दिया जाए।

श्लोक 8 (1.218.8)

घुष्यतां राजमार्गेषु परेषां यो हनिष्यति । नागमश्वं पदातिं वा दानमानं स लप्स्यति ॥

ghuṣyatāṃ rājamārgeṣu pareṣāṃ yo haniṣyati | nāgamaśvaṃ padātiṃ vā dānamānaṃ sa lapsyati

राजमार्गों पर यह घोषणा करा दी जाए कि जो शत्रुओं के हाथी, घोड़े या पैदल सैनिक को मारेगा, उसे दान और सम्मान मिलेगा।

श्लोक 9 (1.218.9)

नागे दशसहस्राणि पञ्च चाश्वपदातिषु । रथे वै द्विगुणं नागाद्वसु दास्यन्ति पार्थिवाः ॥

nāge daśasahasrāṇi pañca cāśvapadātiṣu | rathe vai dviguṇaṃ nāgādvasu dāsyanti pārthivāḥ

राजा लोग हाथी के लिए दस हजार, घोड़े और पैदल सैनिक के लिए पाँच हजार, और रथ के लिए हाथी से दुगुना धन देंगे।

श्लोक 10 (1.218.10)

यश्च कामसुखे सक्तो बालश्च स्थविरश्च यः । अयुद्धमनसो ये च ते तु तिष्ठन्तु भीरवः ॥

yaśca kāmasukhe sakto bālaśca sthaviraśca yaḥ | ayuddhamanaso ye ca te tu tiṣṭhantu bhīravaḥ

जो काम-सुख में आसक्त है, जो बालक है, जो वृद्ध है, और जिनका मन युद्ध में नहीं लगता, वे डरपोक पीछे ही रहें।

श्लोक 11 (1.218.11)

प्रदरश्च न दातव्यो न गन्तव्यमचोदितैः । यशो रक्षत भद्रं वो जेष्यामो वै रिपून्वयम् ॥

pradaraśca na dātavyo na gantavyamacoditaiḥ | yaśo rakṣata bhadraṃ vo jeṣyāmo vai ripūnvayam

कोई भी पंक्ति न तोड़े और बिना आदेश के कोई आगे न बढ़े। अपने यश की रक्षा करो, तुम्हारा कल्याण हो; हम निश्चय ही शत्रुओं को जीतेंगे।

श्लोक 12 (1.218.12)

अनुलोमाश्च नो वाताः सततं मृगपक्षिणः । अग्नयश्च विराजन्ते शस्त्राणि कवचानि च ॥

anulomāśca no vātāḥ satataṃ mṛgapakṣiṇaḥ | agnayaśca virājante śastrāṇi kavacāni ca

हवाएँ हमारे अनुकूल बह रही हैं, पशु-पक्षी भी निरन्तर अनुकूल हैं; अग्नियाँ प्रज्वलित होकर शोभा पा रही हैं, और हमारे शस्त्र तथा कवच भी चमक रहे हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (1.218.13)

ततः कर्णवचः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रप्रियैषिणः । निर्ययुः पृथिवीपालाश्चालयन्तः परान्रणे ॥

tataḥ karṇavacaḥ śrutvā dhārtarāṣṭrapriyaiṣiṇaḥ | niryayuḥ pṛthivīpālāścālayantaḥ parānraṇe

कर्ण के वचन सुनकर धृतराष्ट्रपुत्र का प्रिय चाहने वाले राजा शत्रुओं को युद्ध में विचलित करने के लिए निकल पड़े।

श्लोक 14 (1.218.14)

न हि तेषां मनःसक्तिरिन्द्रियार्थेषु सर्वशः । यथा पुनररिघ्नानां प्रसभं युद्ध एव च ॥

na hi teṣāṃ manaḥsaktirindriyārtheṣu sarvaśaḥ | yathā punararighnānāṃ prasabhaṃ yuddha eva ca

उनका मन इन्द्रियों के विषयों में तनिक भी आसक्त नहीं था; शत्रुनाशक वीरों की भाँति वह पूरे वेग से केवल युद्ध में ही लगा था।

श्लोक 15 (1.218.15)

वैकर्तनपुरोवातः सैन्धवोर्मिमहास्वनः । दुःशासनमहामत्स्यो दुर्योधनमहाग्रहः ॥

vaikartanapurovātaḥ saindhavormimahāsvanaḥ | duḥśāsanamahāmatsyo duryodhanamahāgrahaḥ

वैकर्तन (कर्ण) जिसके आगे बहने वाली प्रचण्ड वायु था, सिन्धुराज (जयद्रथ) जिसकी लहरों का महान् गर्जन था, दुःशासन जिसका महामत्स्य और दुर्योधन जिसका महाग्राह था,

श्लोक 16 (1.218.16)

स राजसागरो भीमो भीमघोषप्रदर्शनः । अभिदुद्राव वेगेन पुरं तदपसव्यतः ॥

sa rājasāgaro bhīmo bhīmaghoṣapradarśanaḥ | abhidudrāva vegena puraṃ tadapasavyataḥ

राजाओं का वह भयंकर सागर, जिसका गर्जन और रूप दोनों भीषण थे, नगर को दाहिनी ओर रखते हुए वेग से उस पर टूट पड़ा।

श्लोक 17 (1.218.17)

तदनीकमनाधृष्यं शस्त्राग्निव्यालदीपितम् । समुत्कम्पितमाज्ञाय चुक्रुशुर्द्रुपदात्मजाः ॥

tadanīkamanādhṛṣyaṃ śastrāgnivyāladīpitam | samutkampitamājñāya cukruśurdrupadātmajāḥ

शस्त्रों के कारण अग्नि और सर्पों के समान दहकती उस अजेय सेना को उमड़ते देखकर द्रुपद के पुत्रों ने सिंहनाद किया।

श्लोक 18 (1.218.18)

ते मेघसमनिर्घोषैर्बलिनः स्यन्दनोत्तमैः । निर्ययुर्नगरद्वारात्त्रासयन्तः परान्रणे ॥

te meghasamanirghoṣairbalinaḥ syandanottamaiḥ | niryayurnagaradvārāttrāsayantaḥ parānraṇe

वे बलवान वीर मेघ के समान गर्जन करने वाले उत्तम रथों में बैठकर, युद्ध में शत्रुओं को भयभीत करते हुए नगर के द्वार से निकल पड़े—

श्लोक 19 (1.218.19)

धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सुमित्रः प्रियदर्शनः । चित्रकेतुः सुकेतुश्च ध्वजकेतुश्च वीर्यवान् ॥

dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca sumitraḥ priyadarśanaḥ | citraketuḥ suketuśca dhvajaketuśca vīryavān

धृष्टद्युम्न और शिखण्डी, सुमित्र और प्रियदर्शन, चित्रकेतु और सुकेतु, तथा पराक्रमी ध्वजकेतु,

श्लोक 20 (1.218.20)

पुत्रा द्रुपदराजस्य बलवन्तो जयैषिणः । द्रुपदश्च महावीर्यः पाण्डरोष्णीषकेतनः ॥

putrā drupadarājasya balavanto jayaiṣiṇaḥ | drupadaśca mahāvīryaḥ pāṇḍaroṣṇīṣaketanaḥ

राजा द्रुपद के ये बलवान और विजय के इच्छुक पुत्र। और स्वयं महापराक्रमी द्रुपद, जिनका चिह्न श्वेत पगड़ी थी,

श्लोक 21 (1.218.21)

पाण्डरव्यजनच्छत्रः पाण्डरध्वजवाहनः । स पुत्रगणमध्यस्थः शुशुभे राजसत्तमः ॥

pāṇḍaravyajanacchatraḥ pāṇḍaradhvajavāhanaḥ | sa putragaṇamadhyasthaḥ śuśubhe rājasattamaḥ

श्वेत चँवर और छत्र, श्वेत ध्वज और श्वेत वाहनों वाले वे श्रेष्ठ राजा अपने पुत्रों के समूह के बीच ऐसे शोभित हुए

श्लोक 22 (1.218.22)

चन्द्रमा ज्योतिषां मध्ये पौर्णमास्यामिवोदितः । अथोद्धूतपताकाग्रमजिह्मगतिमव्ययम् ॥

candramā jyotiṣāṃ madhye paurṇamāsyāmivoditaḥ | athoddhūtapatākāgramajihmagatimavyayam

जैसे पूर्णिमा की रात तारों के बीच उदित चन्द्रमा। फिर फहराती पताकाओं वाली, सीधी चाल से बढ़ती, अडिग

श्लोक 23 (1.218.23)

द्रुपदानीकमायान्तं कुरुसैन्यमभिद्रवत् । तयोरुभयतो जज्ञे तेषां तु तुमुलः स्वनः ॥

drupadānīkamāyāntaṃ kurusainyamabhidravat | tayorubhayato jajñe teṣāṃ tu tumulaḥ svanaḥ

द्रुपद की सेना को आते देख कुरु-सेना उस पर टूट पड़ी। दोनों ओर से भारी कोलाहल उठा,

श्लोक 24 (1.218.24)

बलयोः संप्रसरतोः सरितां स्रोतसोरिव । प्रकीर्णरथनागाश्वैस्तान्यनीकानि सर्वशः ॥

balayoḥ saṃprasaratoḥ saritāṃ srotasoriva | prakīrṇarathanāgāśvaistānyanīkāni sarvaśaḥ

जब दोनों सेनाएँ दो नदियों की धाराओं की भाँति आगे बढ़ीं। सब ओर बिखरे रथों, हाथियों और घोड़ों के कारण वे सेनाएँ

श्लोक 25 (1.218.25)

ज्योतींषीव प्रकीर्णानि सर्वतः प्रचकाशिरे । उत्कृष्टभेरीनिनदे संप्रवृत्ते महारवे ॥

jyotīṃṣīva prakīrṇāni sarvataḥ pracakāśire | utkṛṣṭabherīninade saṃpravṛtte mahārave

बिखरे हुए नक्षत्रों की भाँति सब ओर चमक उठीं। जब भेरियों का ऊँचा नाद हुआ और महान् कोलाहल छा गया,

श्लोक 26 (1.218.26)

अमर्षिता महात्मानः पाण्डवा निर्ययुस्ततः । रथांश्च मेघनिर्घोषान्युक्तान्परमवाजिभिः ॥

amarṣitā mahātmānaḥ pāṇḍavā niryayustataḥ | rathāṃśca meghanirghoṣānyuktānparamavājibhiḥ

तब उसे सहन न कर पाकर महात्मा पाण्डव निकल पड़े; मेघों के समान गर्जन करने वाले, उत्तम घोड़ों से जुते

श्लोक 27 (1.218.27)

धून्वन्तो ध्वजिनः शुभ्रानास्थाय भरतर्षभाः । ततः पाण्डुसुतान्दृष्ट्वा रथस्थानात्तकार्मुकान् ॥

dhūnvanto dhvajinaḥ śubhrānāsthāya bharatarṣabhāḥ | tataḥ pāṇḍusutāndṛṣṭvā rathasthānāttakārmukān

चमकीले ध्वजयुक्त रथों पर सवार होकर, शस्त्र लहराते हुए, भरतश्रेष्ठ आगे बढ़े। तब पाण्डुपुत्रों को धनुष उठाए रथों में खड़े देखकर

श्लोक 28 (1.218.28)

नृपाणामभवत्कम्पो वेपथुर्हृदयेषु च । निर्यातेष्वथ पार्थेषु द्रौपदं तद्बलं रणे ॥

nṛpāṇāmabhavatkampo vepathurhṛdayeṣu ca | niryāteṣvatha pārtheṣu draupadaṃ tadbalaṃ raṇe

राजाओं में कँपकँपी छा गई और उनके हृदय काँप उठे। पृथापुत्रों के निकल आने पर रणभूमि में द्रुपद की उस सेना में

श्लोक 29 (1.218.29)

आविशत्परमो हर्षः प्रमोदश्च जयं प्रति । सुमुहूर्तं व्यतिकरः सैन्यानामभवद्भृशम् ॥

āviśatparamo harṣaḥ pramodaśca jayaṃ prati | sumuhūrtaṃ vyatikaraḥ sainyānāmabhavadbhṛśam

परम हर्ष और विजय की आशा से उल्लास भर गया। कुछ समय तक दोनों सेनाओं में भीषण घमासान होता रहा।

श्लोक 30 (1.218.30)

ततो द्वन्द्वमयुध्यन्त मृत्युं कृत्वा पुरस्कृतम् । जघ्नतुः समरे तस्मिन्सुमित्रप्रियदर्शनौ ॥

tato dvandvamayudhyanta mṛtyuṃ kṛtvā puraskṛtam | jaghnatuḥ samare tasminsumitrapriyadarśanau

फिर वे मृत्यु को आगे रखकर जोड़ी-जोड़ी में लड़ने लगे। उस युद्ध में सुमित्र और प्रियदर्शन को

श्लोक 31 (1.218.31)

जयद्रथश्च कर्णश्च पश्यतः सव्यसाचिनः । अर्जुनः प्रेक्ष्य निहतौ सुमित्रप्रियदर्शनौ ॥

jayadrathaśca karṇaśca paśyataḥ savyasācinaḥ | arjunaḥ prekṣya nihatau sumitrapriyadarśanau

जयद्रथ और कर्ण ने सव्यसाची (अर्जुन) के देखते-देखते मार डाला। सुमित्र और प्रियदर्शन को मरा देखकर अर्जुन ने

श्लोक 32 (1.218.32)

जयद्रथसुतं तत्र जघान पितुरन्तिके । वृषसेनादवरजं सुदामानं धनंजयः ॥

jayadrathasutaṃ tatra jaghāna piturantike | vṛṣasenādavarajaṃ sudāmānaṃ dhanaṃjayaḥ

वहीं जयद्रथ के पुत्र को उसके पिता के पास ही मार डाला; और धनंजय ने वृषसेन के छोटे भाई सुदामा को,

श्लोक 33 (1.218.33)

कर्णपुत्रं महेष्वासं रथनीडादपातयत् । तौ सुतौ निहतौ दृष्ट्वा राजसिंहौ तरस्विनौ ॥

karṇaputraṃ maheṣvāsaṃ rathanīḍādapātayat | tau sutau nihatau dṛṣṭvā rājasiṃhau tarasvinau

कर्ण के उस महाधनुर्धर पुत्र को, रथ की बैठक से नीचे गिरा दिया। अपने दोनों पुत्रों को मरा देखकर वे दोनों वेगवान राजसिंह,

श्लोक 34 (1.218.34)

नामृष्येतां महाबाहू प्रहारमिव सद्गजौ । तौ जग्मतुरसंभ्रान्तौ फल्गुनस्य रथं प्रति ॥

nāmṛṣyetāṃ mahābāhū prahāramiva sadgajau | tau jagmaturasaṃbhrāntau phalgunasya rathaṃ prati

वे महाबाहु इसे सह न सके, जैसे श्रेष्ठ हाथी प्रहार को नहीं सहते। वे दोनों बिना घबराए फाल्गुन (अर्जुन) के रथ की ओर बढ़े,

श्लोक 35 (1.218.35)

प्रतिमुक्ततलत्राणौ शपमानौ परस्परम् । सन्निपातस्तयोरासीदतिघोरो महामृधे ॥

pratimuktatalatrāṇau śapamānau parasparam | sannipātastayorāsīdatighoro mahāmṛdhe

हाथों में तलत्राण बाँधे, एक-दूसरे के सामने शपथ लेते हुए। उस महासंग्राम में उनकी बड़ी भयंकर भिड़ंत हुई,

श्लोक 36 (1.218.36)

वृत्रशम्बरयोः सङ्ख्ये वज्रिणेव महारणे । त्रीनश्वाञ्जघ्नतुस्तस्य फल्गुनस्य नरर्षभौ ॥

vṛtraśambarayoḥ saṅkhye vajriṇeva mahāraṇe | trīnaśvāñjaghnatustasya phalgunasya nararṣabhau

जैसी महायुद्ध में वृत्र और शम्बर की वज्रधारी इन्द्र से हुई थी। उन दोनों नरश्रेष्ठों ने फाल्गुन के तीन घोड़े मार डाले।

श्लोक 37 (1.218.37)

ततः किलिकिलाशब्दः कुरूणामभवत्तदा । तान्हयान्निहतान्दृष्ट्वा भीमसेनः प्रतापवान् ॥

tataḥ kilikilāśabdaḥ kurūṇāmabhavattadā | tānhayānnihatāndṛṣṭvā bhīmasenaḥ pratāpavān

तब कौरवों में "किलकिला" का हर्षनाद होने लगा। उन घोड़ों को मरा देखकर प्रतापी भीमसेन ने

श्लोक 38 (1.218.38)

निमेषान्तरमात्रेण रथमश्वैरयोजयत् । उपयातं रथं दृष्ट्वा दुर्योधनपुरःसरौ ॥

nimeṣāntaramātreṇa rathamaśvairayojayat | upayātaṃ rathaṃ dṛṣṭvā duryodhanapuraḥsarau

पलक झपकते ही रथ में (नए) घोड़े जोत दिए। उस रथ को आते देखकर दुर्योधन को आगे रखकर शत्रुओं को तपाने वाले

श्लोक 39 (1.218.39)

सौबलः सौमदत्तिश्च समेयातां परन्तपौ । तैः पञ्चभिरदीनात्मा भीमसेनो महाबलः ॥

saubalaḥ saumadattiśca sameyātāṃ parantapau | taiḥ pañcabhiradīnātmā bhīmaseno mahābalaḥ

सौबल (शकुनि) और सौमदत्ति आ भिड़े। उन पाँचों से अदम्य महाबली भीमसेन

श्लोक 40 (1.218.40)

अयुध्यत तदा वीरैरिन्द्रियार्थैरिवेश्वरः । तैर्निरुद्धो न संत्रासं जगाम समितिंजयः ॥

ayudhyata tadā vīrairindriyārthairiveśvaraḥ | tairniruddho na saṃtrāsaṃ jagāma samitiṃjayaḥ

तब ऐसे लड़े जैसे जितेन्द्रिय पुरुष इन्द्रियों के विषयों से लड़ता है। उनसे घिर जाने पर भी युद्धविजयी भीम भयभीत नहीं हुए,

श्लोक 41 (1.218.41)

पञ्चभिर्द्विरदैर्मत्तैर्निरुद्ध इव केसरी । तस्यैते युगपत्पञ्च पञ्चभिर्निशितैः शरैः ॥

pañcabhirdviradairmattairniruddha iva kesarī | tasyaite yugapatpañca pañcabhirniśitaiḥ śaraiḥ

जैसे पाँच मतवाले हाथियों से घिरा सिंह। उन पाँचों ने एक साथ पाँच तीखे बाणों से

श्लोक 42 (1.218.42)

सारथिं वाजिनश्चैव निन्युर्वैवस्वतक्षयम् । हताश्वात्स्यन्दनश्रेष्ठादवरुह्य महारथः ॥

sārathiṃ vājinaścaiva ninyurvaivasvatakṣayam | hatāśvātsyandanaśreṣṭhādavaruhya mahārathaḥ

उनके सारथि और घोड़ों को यमलोक पहुँचा दिया। घोड़े मारे जाने पर उस श्रेष्ठ रथ से उतरकर वे महारथी

श्लोक 43 (1.218.43)

चचार विविधान्मार्गानसिमुद्यम्य पाण्डवः । अश्वस्कन्धेषु चक्रेषु युगेष्वीषासु चैव हि ॥

cacāra vividhānmārgānasimudyamya pāṇḍavaḥ | aśvaskandheṣu cakreṣu yugeṣvīṣāsu caiva hi

पाण्डव तलवार उठाकर अनेक प्रकार के पैंतरों से विचरने लगे। घोड़ों के कन्धों पर, पहियों पर, जुओं पर और रथ के दण्डों पर

श्लोक 44 (1.218.44)

व्यचरत्पातयञ्शत्रून्सुपर्ण इव भोगिनः । विधनुष्कं विकवचं विरथं च समीक्ष्य तम् ॥

vyacaratpātayañśatrūnsuparṇa iva bhoginaḥ | vidhanuṣkaṃ vikavacaṃ virathaṃ ca samīkṣya tam

वे शत्रुओं को गिराते हुए ऐसे विचरे जैसे सर्पों के बीच सुपर्ण (गरुड़)। उन्हें धनुष, कवच और रथ से रहित देखकर

श्लोक 45 (1.218.45)

अभिपेतुर्नरव्याघ्रा अर्जुनप्रमुखा रथाः । धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च यमौ च युधि दुर्जयौ ॥

abhipeturnaravyāghrā arjunapramukhā rathāḥ | dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca yamau ca yudhi durjayau

अर्जुन के नेतृत्व में पुरुषसिंह रथी वीर दौड़ पड़े: धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और युद्ध में दुर्जेय दोनों जुड़वाँ भाई।

श्लोक 46 (1.218.46)

तस्मिन्महारथे युद्धे प्रवृत्ते शरवृष्टिभिः । रथध्वजपताकाश्च सर्वमन्तरधीयत ॥

tasminmahārathe yuddhe pravṛtte śaravṛṣṭibhiḥ | rathadhvajapatākāśca sarvamantaradhīyata

महारथियों का वह युद्ध बाण-वर्षा के साथ छिड़ने पर रथ, ध्वज और पताकाएँ, सब कुछ (बाणों से ढककर) ओझल हो गया।

श्लोक 47 (1.218.47)

तत्प्रवृत्तं चिरं कालं युद्धं सममिवाभवत् । रथेन तान्महाबाहुरर्जुनो व्यधमत्पुनः ॥

tatpravṛttaṃ ciraṃ kālaṃ yuddhaṃ samamivābhavat | rathena tānmahābāhurarjuno vyadhamatpunaḥ

वह युद्ध बहुत देर तक चलता रहा और बराबरी का-सा प्रतीत हुआ। तब महाबाहु अर्जुन ने अपने रथ से उन्हें फिर तितर-बितर कर दिया।

श्लोक 48 (1.218.48)

तमापतन्तं दृष्ट्वैव महाबाहुर्धनुर्धरः । कर्णोऽस्त्रविदुषां श्रेष्ठो वारयामास सायकैः ॥

tamāpatantaṃ dṛṣṭvaiva mahābāhurdhanurdharaḥ | karṇo'straviduṣāṃ śreṣṭho vārayāmāsa sāyakaiḥ

उन्हें आते देखते ही अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, महाबाहु धनुर्धर कर्ण ने बाणों से उन्हें रोक दिया।

श्लोक 49 (1.218.49)

स तेनाभिहतः पार्थो वासविर्वज्रसन्निभान् । त्रीञ्शरान्संदधे क्रुद्धो वधात्क्रुद्धस्य पाण्डवः ॥

sa tenābhihataḥ pārtho vāsavirvajrasannibhān | trīñśarānsaṃdadhe kruddho vadhātkruddhasya pāṇḍavaḥ

उसके प्रहार से आहत होकर इन्द्रपुत्र पार्थ ने क्रोध में भरकर वज्र के समान तीन बाण चढ़ाए; वह पाण्डव क्रुद्ध शत्रु का वध करना चाहता था।

श्लोक 50 (1.218.50)

तैः शरैराहतं कर्णं ध्वजयष्टिमुपाश्रितम् । अपोवाह रथाच्चाशु सूतः परपुरंजयम् ॥

taiḥ śarairāhataṃ karṇaṃ dhvajayaṣṭimupāśritam | apovāha rathāccāśu sūtaḥ parapuraṃjayam

उन बाणों से घायल होकर ध्वजदण्ड का सहारा लिए हुए, शत्रुनगरों को जीतने वाले कर्ण को उसका सारथि तुरन्त रथ-युद्ध से दूर ले गया।

श्लोक 51 (1.218.51)

ततः पराजिते कर्णे धार्तराष्ट्रान्महाभयम् । विवेश समुदग्रांश्च पाण्डवान्प्रसमीक्ष्य तु ॥

tataḥ parājite karṇe dhārtarāṣṭrānmahābhayam | viveśa samudagrāṃśca pāṇḍavānprasamīkṣya tu

तब कर्ण के पराजित हो जाने पर, पाण्डवों को उत्साह से बढ़ते देखकर, धृतराष्ट्रपुत्रों में महान् भय समा गया।

श्लोक 52 (1.218.52)

तत्प्रकम्पितमत्यर्थं तद्दृष्ट्वा सौबलो बलम् । गिरा मधुरया चापि समाश्वासयतासकृत् ॥

tatprakampitamatyarthaṃ taddṛṣṭvā saubalo balam | girā madhurayā cāpi samāśvāsayatāsakṛt

उस सेना को अत्यन्त काँपती देखकर सौबल (शकुनि) ने मधुर वाणी से उसे बार-बार ढाढ़स बँधाया।

श्लोक 53 (1.218.53)

धार्तराष्ट्रैस्ततः सर्वैर्दुर्योधनपुरःसरैः । धृतं तत्पुनरेवासीद्बलं पार्थप्रपीडितम् ॥

dhārtarāṣṭraistataḥ sarvairduryodhanapuraḥsaraiḥ | dhṛtaṃ tatpunarevāsīdbalaṃ pārthaprapīḍitam

तब दुर्योधन को आगे रखकर सभी धृतराष्ट्रपुत्रों ने पार्थ से पीड़ित उस सेना को फिर से सँभाल लिया।

श्लोक 54 (1.218.54)

ततो दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमो भीमपराक्रमः । अक्रुध्यत्स महाबाहुरगारं जातुषं स्मरन् ॥

tato duryodhanaṃ dṛṣṭvā bhīmo bhīmaparākramaḥ | akrudhyatsa mahābāhuragāraṃ jātuṣaṃ smaran

तब दुर्योधन को देखकर भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीम लाक्षागृह को स्मरण करके क्रोध से भर उठे।

श्लोक 55 (1.218.55)

ततः संग्रामशिरसि ददर्श विपुलद्रुमम् । आयामभूतं तिष्ठन्तं स्कन्धपञ्चाशदुन्नतम् ॥

tataḥ saṃgrāmaśirasi dadarśa vipuladrumam | āyāmabhūtaṃ tiṣṭhantaṃ skandhapañcāśadunnatam

तब युद्ध के अग्रभाग में उन्होंने एक विशाल वृक्ष खड़ा देखा, जो लम्बा-चौड़ा था और जिसका तना पचास हाथ ऊँचा था,

श्लोक 56 (1.218.56)

महास्कन्धं महोत्सेधं शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् । तमुत्पाट्य च पाणिभ्यामुद्यम्य चरणावपि ॥

mahāskandhaṃ mahotsedhaṃ śakradhvajamivocchritam | tamutpāṭya ca pāṇibhyāmudyamya caraṇāvapi

जिसका तना विशाल और ऊँचाई बहुत अधिक थी, जो इन्द्रध्वज के समान ऊँचा उठा था। उसे दोनों हाथों से उखाड़कर, ऊपर उठाकर और पैरों से दौड़ते हुए

श्लोक 57 (1.218.57)

अभिपेदे परान्सङ्ख्ये वज्रपाणिरिवासुरान् । भीमसेनभयार्तानि फल्गुनाभिहतानि च ॥

abhipede parānsaṅkhye vajrapāṇirivāsurān | bhīmasenabhayārtāni phalgunābhihatāni ca

वे युद्ध में शत्रुओं पर ऐसे टूट पड़े जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरों पर। भीमसेन के भय से व्याकुल और फाल्गुन के बाणों से आहत

श्लोक 58 (1.218.58)

न शेकुस्तान्यनीकानि धार्तराष्ट्राण्युदीक्षितुम् । तानि संभ्रान्तयोधानि श्रान्तवाजिगजानि च ॥

na śekustānyanīkāni dhārtarāṣṭrāṇyudīkṣitum | tāni saṃbhrāntayodhāni śrāntavājigajāni ca

धृतराष्ट्रपुत्रों की सेनाएँ उनकी ओर देख भी न सकीं। जिनके योद्धा घबराए हुए थे और घोड़े तथा हाथी थक चुके थे, उन सेनाओं को

श्लोक 59 (1.218.59)

दिशः प्राकालयद्भीमो दिवीवाभ्राणि मारुतः । तान्निवृत्तान्निरानन्दान्नरवारणवाजिनः ॥

diśaḥ prākālayadbhīmo divīvābhrāṇi mārutaḥ | tānnivṛttānnirānandānnaravāraṇavājinaḥ

भीम ने दिशाओं में ऐसे खदेड़ दिया जैसे वायु आकाश में बादलों को। लौटते हुए, आनन्दहीन उन मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों का

श्लोक 60 (1.218.60)

नानुसस्रुर्न चाजघ्नुर्नोचुः किंचिच्च दारुणम् । स्वमेव शिबिरं जग्मुः क्षत्रियाः शरविक्षताः ॥

nānusasrurna cājaghnurnocuḥ kiṃcicca dāruṇam | svameva śibiraṃ jagmuḥ kṣatriyāḥ śaravikṣatāḥ

(पाण्डवों ने) न पीछा किया, न उन पर प्रहार किया और न कोई कठोर बात कही। बाणों से घायल वे क्षत्रिय अपने शिविर को लौट गए।

श्लोक 61 (1.218.61)

परेऽप्यभिययुर्हृष्टाः पुरं पौरसुखावहाः । मुहूर्तमभवद्युद्धं तेषां वै पाण्डवैः सह ॥

pare'pyabhiyayurhṛṣṭāḥ puraṃ paurasukhāvahāḥ | muhūrtamabhavadyuddhaṃ teṣāṃ vai pāṇḍavaiḥ saha

दूसरे पक्ष के वीर भी हर्षित होकर, नगरवासियों को सुख देते हुए, नगर में लौट गए। पाण्डवों के साथ उनका युद्ध थोड़ी ही देर चला;

श्लोक 62 (1.218.62)

यावत्तद्युद्धमभवन्महद्देवासुरोपमम् । तावदेवाभवच्छान्तं निवृत्ता वै महारथाः ॥

yāvattadyuddhamabhavanmahaddevāsuropamam | tāvadevābhavacchāntaṃ nivṛttā vai mahārathāḥ

देवासुर-संग्राम के समान वह महान् युद्ध जितनी जल्दी छिड़ा, उतनी ही जल्दी शान्त हो गया और महारथी लौट गए।

श्लोक 63 (1.218.63)

सुवृत्तं चक्रिरे सर्वे सुवृतामब्रुवन्वधूम् । कृतार्थं द्रुपदं चोचुर्धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ॥

suvṛttaṃ cakrire sarve suvṛtāmabruvanvadhūm | kṛtārthaṃ drupadaṃ cocurdhṛṣṭadyumnaṃ ca pārṣatam

सबने कहा कि सब कुछ भली-भाँति सम्पन्न हुआ और वधू का विवाह उत्तम हुआ; उन्होंने द्रुपद और पार्षत धृष्टद्युम्न को भी कृतार्थ बताया।

श्लोक 64 (1.218.64)

शकुनिः सिन्धुराजश्च कर्णदुर्योधनावपि । तेषां तदाभवद्दुःखं हृदि वाचा तु नाब्रुवन् ॥

śakuniḥ sindhurājaśca karṇaduryodhanāvapi | teṣāṃ tadābhavadduḥkhaṃ hṛdi vācā tu nābruvan

शकुनि और सिन्धुराज (जयद्रथ), तथा कर्ण और दुर्योधन के हृदय में दुःख तो हुआ, पर उन्होंने वाणी से कुछ नहीं कहा।

श्लोक 65 (1.218.65)

ततः प्रयाता राजानः सर्व एव यथागतम् । धार्तराष्ट्रा हि ते सर्वे गता नागपुरं तदा ॥

tataḥ prayātā rājānaḥ sarva eva yathāgatam | dhārtarāṣṭrā hi te sarve gatā nāgapuraṃ tadā

तब सभी राजा जैसे आए थे वैसे ही लौट गए, और धृतराष्ट्र के सभी पुत्र भी उस समय नागपुर (हस्तिनापुर) चले गए।

श्लोक 66 (1.218.66)

प्रागेव पूर्निरोधात्तु पाण्डवैरश्वसादिनः । प्रेषिता गच्छतारिष्टानस्मानाख्यात शौरये ॥

prāgeva pūrnirodhāttu pāṇḍavairaśvasādinaḥ | preṣitā gacchatāriṣṭānasmānākhyāta śauraye

नगर के घेरे से पहले ही पाण्डवों ने घुड़सवार यह कहकर भेज दिए थे: "जाओ, शौरि (कृष्ण) को बताओ कि हम सकुशल हैं।"

श्लोक 67 (1.218.67)

तेऽचिरेणैव कालेन संप्राप्ता यादवीं पुरीम् । ऊचुः संकर्षणोपेन्द्रौ वचनं वचनक्षमौ ॥

te'cireṇaiva kālena saṃprāptā yādavīṃ purīm | ūcuḥ saṃkarṣaṇopendrau vacanaṃ vacanakṣamau

वे थोड़े ही समय में यादवों की नगरी जा पहुँचे और बात करने में कुशल संकर्षण और उपेन्द्र (बलराम और कृष्ण) को सन्देश सुनाया।

श्लोक 68 (1.218.68)

कुशलं पाण्डवाः सर्वानाहुः स्मान्धकवृष्णयः । आत्मनश्चाहतानाहुर्विमुक्ताञ्जातुषाद्गृहात् ॥

kuśalaṃ pāṇḍavāḥ sarvānāhuḥ smāndhakavṛṣṇayaḥ | ātmanaścāhatānāhurvimuktāñjātuṣādgṛhāt

उन्होंने कहा कि पाण्डवों ने सब अन्धकों और वृष्णियों का कुशल पूछा है, और कहलाया है कि वे स्वयं सुरक्षित हैं तथा लाक्षागृह से बच निकले हैं।

श्लोक 69 (1.218.69)

समाजे द्रौपदीं लब्धामाहू राजीवलोचनाम् । आत्मनः सदृशीं सर्वैः शीलवृत्तसमाधिभिः ॥

samāje draupadīṃ labdhāmāhū rājīvalocanām | ātmanaḥ sadṛśīṃ sarvaiḥ śīlavṛttasamādhibhiḥ

उन्होंने बताया कि स्वयंवर-सभा में उन्होंने कमलनयनी द्रौपदी को प्राप्त किया है, जो शील, आचरण और एकाग्रता में उन सबके योग्य है।

श्लोक 70 (1.218.70)

तच्छ्रुत्वा वचनं कृष्णस्तानुवाचोत्तरं वचः । सर्वमेतदहं जाने वधात्तस्य तु रक्षसः ॥

tacchrutvā vacanaṃ kṛṣṇastānuvācottaraṃ vacaḥ | sarvametadahaṃ jāne vadhāttasya tu rakṣasaḥ

यह सुनकर कृष्ण ने उत्तर में उनसे कहा: "उस राक्षस के वध से ही मैं यह सब जान चुका हूँ।"

श्लोक 71 (1.218.71)

तत उद्योजयामास माधवश्चतुरङ्गिणीम् । सेनामुपानयत्तूर्णं पाञ्चालनगरीं प्रति ॥

tata udyojayāmāsa mādhavaścaturaṅgiṇīm | senāmupānayattūrṇaṃ pāñcālanagarīṃ prati

तब माधव ने अपनी चतुरंगिणी सेना तैयार की और उसे शीघ्र ही पांचालनगरी की ओर ले चले।

श्लोक 72 (1.218.72)

ततः संकर्षणश्चैव केशवश्च महाबलः । यादवैः सह सर्वैश्च पाण्डवानभिजग्मतुः ॥

tataḥ saṃkarṣaṇaścaiva keśavaśca mahābalaḥ | yādavaiḥ saha sarvaiśca pāṇḍavānabhijagmatuḥ

तब संकर्षण और महाबली केशव सब यादवों के साथ पाण्डवों के पास आए।

श्लोक 73 (1.218.73)

पितृष्वसारं संपूज्य नत्वा चैव तु यादवीम् । द्रौपदीं भूषणैः शुभ्रैर्भूषयित्वा यथाविधि ॥

pitṛṣvasāraṃ saṃpūjya natvā caiva tu yādavīm | draupadīṃ bhūṣaṇaiḥ śubhrairbhūṣayitvā yathāvidhi

अपनी बुआ का सम्मान करके और उन यादवकुल की कन्या (कुन्ती) को प्रणाम करके, तथा द्रौपदी को विधिपूर्वक उज्ज्वल आभूषणों से सजाकर,

श्लोक 74 (1.218.74)

पाण्डवान्हर्षयित्वा तु पूजयामासतुश्च तान् । न्यायतः पूजितौ राज्ञा द्रुपदेन महात्मना ॥

pāṇḍavānharṣayitvā tu pūjayāmāsatuśca tān | nyāyataḥ pūjitau rājñā drupadena mahātmanā

उन्होंने पाण्डवों को प्रसन्न करके उनका सत्कार किया। महात्मा राजा द्रुपद ने उन दोनों का यथोचित सम्मान किया।

श्लोक 75 (1.218.75)

यादवाः पूजिताः सर्वे पाण्डवैश्च महात्मभिः । रेमिरे पाण्डवैः सार्धं ते पाञ्चालपुरे तदा ॥

yādavāḥ pūjitāḥ sarve pāṇḍavaiśca mahātmabhiḥ | remire pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ te pāñcālapure tadā

महात्मा पाण्डवों ने सभी यादवों का सम्मान किया, और वे उस समय पांचालपुर में पाण्डवों के साथ आनन्दपूर्वक रहे।

अध्याय 217अध्याय-सूचीअध्याय 219