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आदि पर्व · अध्याय 219

कौरवों की वापसी और धृतराष्ट्र का दिखावा

स्वयंवर के बाद राजा लौट जाते हैं और दुर्योधन अपने साथियों के साथ उदास होकर हस्तिनापुर लौटता है; रास्ते में दुःशासन विलाप करता है कि दैव ने उनके प्रयत्नों को विफल कर दिया और पाण्डव लाक्षागृह से बच निकले। विदुर प्रसन्न होकर धृतराष्ट्र से कहते हैं कि कुरुवंशी बढ़ रहे हैं; अन्धे राजा यह समझकर कि द्रौपदी ने दुर्योधन का वरण किया है, उसके लिए आभूषण मँगवाते हैं। जब विदुर बताते हैं कि पाण्डव जीवित हैं और द्रुपद से जुड़ गए हैं, तो धृतराष्ट्र अपना भाव छिपाकर उनके प्रति प्रेम जताते हैं। विदुर के जाने के बाद दुर्योधन और कर्ण राजा को शत्रुओं की प्रशंसा करने के लिए उलाहना देते हैं और उनके विरुद्ध योजना बनाने का आग्रह करते हैं।

अध्याय 218अध्याय-सूचीअध्याय 220

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.219.1)

वृत्ते स्वयंवरे चैव राजानः सर्व एव ते । यथागतं विप्रजग्मुर्विदित्वा पाण्डवान्वृतान् ॥

vṛtte svayaṃvare caiva rājānaḥ sarva eva te | yathāgataṃ viprajagmurviditvā pāṇḍavānvṛtān

स्वयंवर समाप्त होने पर वे सभी राजा, यह जानकर कि पाण्डवों का वरण हुआ है, जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 2 (1.219.2)

अथ दुर्योधनो राजा विमना भ्रातृभिः सह । अश्वत्थाम्ना मातुलेन कर्णेन च कृपेण च ॥

atha duryodhano rājā vimanā bhrātṛbhiḥ saha | aśvatthāmnā mātulena karṇena ca kṛpeṇa ca

तब राजा दुर्योधन उदास मन से अपने भाइयों, अश्वत्थामा, मामा शकुनि, कर्ण और कृपाचार्य के साथ,

श्लोक 3 (1.219.3)

विनिवृत्तो वृतं दृष्ट्वा द्रौपद्या श्वेतवाहनम् । तं तु दुःशासनोऽव्रीडो मन्दंमन्दमिवाब्रवीत् ॥

vinivṛtto vṛtaṃ dṛṣṭvā draupadyā śvetavāhanam | taṃ tu duḥśāsano'vrīḍo mandaṃmandamivābravīt

द्रौपदी के द्वारा श्वेत घोड़ों वाले अर्जुन का वरण देखकर लौट पड़ा। तब निर्लज्ज दुःशासन ने उससे धीमे-धीमे स्वर में कहा—

दुःशासन उवाच

श्लोक 4 (1.219.4)

यद्यसौ ब्राह्मणो न स्याद्विन्देत द्रौपदीं न सः । न हि तं तत्त्वतो राजन्वेद कश्चिद्धनंजयम् ॥

yadyasau brāhmaṇo na syādvindeta draupadīṃ na saḥ | na hi taṃ tattvato rājanveda kaściddhanaṃjayam

यदि वह ब्राह्मण न होता तो द्रौपदी को प्राप्त न कर पाता; क्योंकि हे राजन्, कोई भी उसे सचमुच धनंजय के रूप में नहीं पहचान सका।

श्लोक 5 (1.219.5)

दैवं च परमं मन्ये पौरुषं चाप्यनर्थकम् । धिगस्तु पौरुषं मन्त्रं यद्धरन्तीह पाण्डवाः ॥

daivaṃ ca paramaṃ manye pauruṣaṃ cāpyanarthakam | dhigastu pauruṣaṃ mantraṃ yaddharantīha pāṇḍavāḥ

मैं दैव को ही सर्वोपरि मानता हूँ और पुरुषार्थ को निरर्थक। धिक्कार है ऐसे पुरुषार्थ और ऐसी मन्त्रणा को, जब पाण्डव यहाँ बाज़ी मार ले जाते हैं!

श्लोक 6 (1.219.6)

बद्ध्वा चक्षूंषि नः पार्था राज्ञां च द्रुपदात्मजाम् । उद्वाह्य राज्ञां तैर्न्यस्तो वामः पादः पृथासुतैः ॥

baddhvā cakṣūṃṣi naḥ pārthā rājñāṃ ca drupadātmajām | udvāhya rājñāṃ tairnyasto vāmaḥ pādaḥ pṛthāsutaiḥ

पार्थों ने हमारी और राजाओं की आँखों पर पट्टी बाँधकर द्रुपद की पुत्री से विवाह कर लिया; पृथा के पुत्रों ने राजाओं पर अपना बायाँ पैर रख दिया है।

श्लोक 7 (1.219.7)

विमुक्ताः कथमेतेन जतुवेश्महविर्भुजा । अस्माकं पौरुषं सत्वं बुद्धिश्चापि गता ततः ॥

vimuktāḥ kathametena jatuveśmahavirbhujā | asmākaṃ pauruṣaṃ satvaṃ buddhiścāpi gatā tataḥ

लाक्षागृह की इस आग से वे कैसे बच निकले? तब से हमारा पुरुषार्थ, साहस और बुद्धि सब जाते रहे।

श्लोक 8 (1.219.8)

वयं हता मातुलाद्य विश्वस्य च पुरोचनम् । अदग्ध्वा पाण्डवानेतान्स्वयं दग्धो हुताशने ॥

vayaṃ hatā mātulādya viśvasya ca purocanam | adagdhvā pāṇḍavānetānsvayaṃ dagdho hutāśane

मामा, आज हम मारे गए। हमने पुरोचन पर भरोसा किया, और वह इन पाण्डवों को जलाए बिना स्वयं ही आग में जल गया।

श्लोक 9 (1.219.9)

मत्तो मातुल मन्येऽहं पाण्डवा बुद्धिमत्तराः । तेषां नास्ति भयं मृत्योर्मुक्तानां जतुवेश्मनः ॥

matto mātula manye'haṃ pāṇḍavā buddhimattarāḥ | teṣāṃ nāsti bhayaṃ mṛtyormuktānāṃ jatuveśmanaḥ

मामा, मुझे लगता है कि पाण्डव मुझसे अधिक बुद्धिमान हैं। लाक्षागृह से बच निकलने वाले उन लोगों को मृत्यु का कोई भय नहीं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (1.219.10)

एवं संभाषमाणास्ते निन्दन्तश्च पुरोचनम् । पञ्चपुत्रां किरातीं च विदुरं च महामतिम् ॥

evaṃ saṃbhāṣamāṇāste nindantaśca purocanam | pañcaputrāṃ kirātīṃ ca viduraṃ ca mahāmatim

इस प्रकार बातें करते हुए वे पुरोचन को, पाँच पुत्रों वाली किरात-स्त्री को और महाबुद्धिमान विदुर को कोसते रहे;

श्लोक 11 (1.219.11)

विविशुर्हास्तिनपुरं दीना विगतचेतसः ॥

viviśurhāstinapuraṃ dīnā vigatacetasaḥ

और दीन तथा हतचेत होकर उन्होंने हस्तिनापुर में प्रवेश किया।

श्लोक 12 (1.219.12)

त्रस्ता विगतसंकल्पा दृष्ट्वा पार्थान्महौजसः । मुक्तान्हव्यभुजश्चैव संयुक्तान्द्रुपदेन च ॥

trastā vigatasaṃkalpā dṛṣṭvā pārthānmahaujasaḥ | muktānhavyabhujaścaiva saṃyuktāndrupadena ca

महातेजस्वी पार्थों को आग से बचा हुआ और द्रुपद से जुड़ा हुआ देखकर वे भयभीत थे और उनके सारे संकल्प टूट चुके थे;

श्लोक 13 (1.219.13)

धृष्टद्युम्नं तु संचिन्त्य तथैव च शिखण्डिनम् । द्रुपदस्यात्मजांश्चान्यान्सर्वयुद्धविशारदान् ॥

dhṛṣṭadyumnaṃ tu saṃcintya tathaiva ca śikhaṇḍinam | drupadasyātmajāṃścānyānsarvayuddhaviśāradān

और वे धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा सब प्रकार के युद्ध में निपुण द्रुपद के अन्य पुत्रों के विषय में सोच रहे थे।

श्लोक 14 (1.219.14)

विदुरस्त्वथ ताञ्श्रुत्वा द्रौपद्या पाण्डवान्वृतान् । व्रीडितान्धार्तराष्ट्रांश्च भग्नदर्पानुपागतान् ॥

vidurastvatha tāñśrutvā draupadyā pāṇḍavānvṛtān | vrīḍitāndhārtarāṣṭrāṃśca bhagnadarpānupāgatān

विदुर ने जब सुना कि द्रौपदी ने पाण्डवों का वरण किया है और धृतराष्ट्र के पुत्र लज्जित होकर, घमण्ड टूट जाने पर लौट आए हैं,

श्लोक 15 (1.219.15)

ततः प्रीतमनाः क्षत्ता धृतराष्ट्रं विशांपते । उवाच दिष्ट्या कुरवो वर्धन्त इति विस्मितः ॥

tataḥ prītamanāḥ kṣattā dhṛtarāṣṭraṃ viśāṃpate | uvāca diṣṭyā kuravo vardhanta iti vismitaḥ

तब हे प्रजानाथ, क्षत्ता विदुर मन में प्रसन्न हुए और विस्मित होकर धृतराष्ट्र से बोले—"सौभाग्य से कुरुवंशी बढ़ रहे हैं!"

श्लोक 16 (1.219.16)

वैचित्रवीर्यस्तु नृपो निशम्य विदुरस्य तत् । अब्रवीत्परमप्रीतो दिष्ट्या दिष्ट्येति भारत ॥

vaicitravīryastu nṛpo niśamya vidurasya tat | abravītparamaprīto diṣṭyā diṣṭyeti bhārata

हे भारत, विदुर की यह बात सुनकर विचित्रवीर्य के पुत्र राजा धृतराष्ट्र अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले—"अहो सौभाग्य! अहो सौभाग्य!"

श्लोक 17 (1.219.17)

मन्यते स वृतं पुत्रं ज्येष्ठं द्रुपदकन्यया । दुर्योधनमविज्ञानात्प्रज्ञाचक्षुर्नरेश्वरः ॥

manyate sa vṛtaṃ putraṃ jyeṣṭhaṃ drupadakanyayā | duryodhanamavijñānātprajñācakṣurnareśvaraḥ

क्योंकि प्रज्ञाचक्षु राजा ने अनजाने में यह समझ लिया था कि द्रुपद की कन्या ने उनके ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन का वरण किया है।

श्लोक 18 (1.219.18)

अथ त्वाज्ञापयामास द्रौपद्या भूषणं बहु । आनीयतां वै कृष्णेति पुत्रं दुर्योधनं तदा ॥

atha tvājñāpayāmāsa draupadyā bhūṣaṇaṃ bahu | ānīyatāṃ vai kṛṣṇeti putraṃ duryodhanaṃ tadā

फिर उन्होंने द्रौपदी के लिए बहुत-से आभूषण लाने की आज्ञा दी और अपने पुत्र दुर्योधन से कहा—"कृष्णा को यहाँ ले आओ।"

श्लोक 19 (1.219.19)

अथ स्म पश्चाद्विदुर आचख्यावम्बिकात्मजम् । कौरव्या इति सामान्यान्न मन्येथास्तवात्मजान् ॥

atha sma paścādvidura ācakhyāvambikātmajam | kauravyā iti sāmānyānna manyethāstavātmajān

इसके बाद विदुर ने अम्बिका के पुत्र को समझाया—"'कौरव' नाम दोनों के लिए समान है; इसलिए उससे केवल अपने पुत्रों को मत समझिए।"

विदुर उवाच

श्लोक 20 (1.219.20)

वर्धन्त इति मद्वाक्याद्वर्धिताः पाण्डुनन्दनाः । कृष्णया संवृताः पार्था विमुक्ता राजसङ्गरात् ॥

vardhanta iti madvākyādvardhitāḥ pāṇḍunandanāḥ | kṛṣṇayā saṃvṛtāḥ pārthā vimuktā rājasaṅgarāt

मेरे "बढ़ रहे हैं" कहने का आशय यह था कि पाण्डु के पुत्र बढ़े हैं। कृष्णा ने पार्थों का वरण किया है और वे राजाओं के साथ हुए संग्राम से सकुशल निकल आए हैं।

श्लोक 21 (1.219.21)

दिष्ट्या कुशलिनो राजन्पूजिता द्रुपदेन च ॥

diṣṭyā kuśalino rājanpūjitā drupadena ca

हे राजन्, सौभाग्य से वे सकुशल हैं और द्रुपद ने उनका सम्मान किया है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (1.219.22)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं विदुरस्य नराधिपः । आकारच्छादनार्थाय दिष्ट्यादिष्ट्येति चाब्रवीत् ॥

etacchrutvā tu vacanaṃ vidurasya narādhipaḥ | ākāracchādanārthāya diṣṭyādiṣṭyeti cābravīt

विदुर का यह वचन सुनकर राजा ने अपने मन का भाव छिपाने के लिए फिर कहा—"अहो सौभाग्य! अहो सौभाग्य!"

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 23 (1.219.23)

एवं विदुर भद्रं ते यदि जीवन्ति पाण्डवाः । न ममौ मे तनौ प्रीतिस्त्वद्वाक्यामृतसंभवा ॥

evaṃ vidura bhadraṃ te yadi jīvanti pāṇḍavāḥ | na mamau me tanau prītistvadvākyāmṛtasaṃbhavā

ऐसा ही हो, विदुर, तुम्हारा कल्याण हो! यदि पाण्डव जीवित हैं, तो तुम्हारे अमृत-जैसे वचनों से उपजा आनन्द मेरे शरीर में समा नहीं रहा।

श्लोक 24 (1.219.24)

साध्वाचारतया तेषां संबन्धो द्रुपदेन च । बभूव परमश्लाघ्यो दिष्ट्यादिष्ट्येति चाब्रवीत् ॥

sādhvācāratayā teṣāṃ saṃbandho drupadena ca | babhūva paramaślāghyo diṣṭyādiṣṭyeti cābravīt

अपने सदाचार के कारण द्रुपद से उनका सम्बन्ध हुआ है, जो अत्यन्त प्रशंसनीय है। और उन्होंने फिर कहा—"अहो सौभाग्य! अहो सौभाग्य!"

श्लोक 25 (1.219.25)

अन्ववाये वसोर्जातः प्रवरे मात्स्यके कुले । वृत्तविद्यातपोवृद्धः पार्थिवानां च संमतः ॥

anvavāye vasorjātaḥ pravare mātsyake kule | vṛttavidyātapovṛddhaḥ pārthivānāṃ ca saṃmataḥ

द्रुपद वसु के वंश में, मत्स्यों के श्रेष्ठ कुल में जन्मे हैं; वे आचरण, विद्या और तप में बढ़े-चढ़े हैं और राजाओं में सम्मानित हैं।

श्लोक 26 (1.219.26)

पुत्राश्चास्य तथा पौत्राः सर्वे सुचरितव्रताः । तेषां संबन्धिनश्चान्ये बहवः सुमहाबलाः ॥

putrāścāsya tathā pautrāḥ sarve sucaritavratāḥ | teṣāṃ saṃbandhinaścānye bahavaḥ sumahābalāḥ

उनके पुत्र और पौत्र भी सब उत्तम व्रतों का पालन करने वाले हैं, और उनके अन्य अनेक सम्बन्धी भी अत्यन्त बलवान हैं।

श्लोक 27 (1.219.27)

यथैव पाण्डोः पुत्रास्ते ततोऽप्यभ्यधिका मम । सेयमभ्यधिकान्येभ्यो वृत्तिर्विदुर मे मता ॥

yathaiva pāṇḍoḥ putrāste tato'pyabhyadhikā mama | seyamabhyadhikānyebhyo vṛttirvidura me matā

वे जैसे पाण्डु के पुत्र हैं, वैसे ही, बल्कि उससे भी बढ़कर, मेरे हैं। विदुर, उनके प्रति मेरा यह भाव दूसरों के प्रति भाव से कहीं अधिक है।

श्लोक 28 (1.219.28)

या प्रीतिः पाण्डुपुत्रेषु न साऽन्यत्र ममाभिभो । नित्योऽयं चिन्तितः क्षत्तः सत्यं सत्येन ते शपे ॥

yā prītiḥ pāṇḍuputreṣu na sā'nyatra mamābhibho | nityo'yaṃ cintitaḥ kṣattaḥ satyaṃ satyena te śape

हे प्रभो, पाण्डु-पुत्रों के प्रति मेरा जो प्रेम है, वैसा किसी और के प्रति नहीं। क्षत्ता, यह मेरा सदा का विचार है; मैं सत्य की शपथ लेकर तुमसे सच कहता हूँ।

श्लोक 29 (1.219.29)

यत्ते कुशलिनो वीराः पाण्डुपुत्रा महारथाः । मित्रवन्तोऽभवन्पुत्रा दुर्योधनमुखास्तथा ॥

yatte kuśalino vīrāḥ pāṇḍuputrā mahārathāḥ | mitravanto'bhavanputrā duryodhanamukhāstathā

वे वीर महारथी पाण्डु-पुत्र सकुशल हैं, इसलिए दुर्योधन आदि मेरे पुत्र भी मित्रों वाले हो गए हैं।

श्लोक 30 (1.219.30)

मया श्रुतं यदा वह्नेर्दग्धाः पाण्डुसुता इति । तदाऽदह्यं दिवारात्रं न भोक्ष्ये न स्वपामि च ॥

mayā śrutaṃ yadā vahnerdagdhāḥ pāṇḍusutā iti | tadā'dahyaṃ divārātraṃ na bhokṣye na svapāmi ca

जब मैंने सुना था कि पाण्डु के पुत्र आग में जल गए, तब मैं दिन-रात जलता रहा; न मैंने भोजन किया, न सोया।

श्लोक 31 (1.219.31)

असहायाश्च मे पुत्रा लूनपक्षा इव द्विजाः । तत्त्वतः शृणु मे क्षत्तः सुसहायाः सुता मम । अद्य वै स्थिरसाम्राज्यमाचन्द्रार्कं ममाभवत् ॥

asahāyāśca me putrā lūnapakṣā iva dvijāḥ | tattvataḥ śṛṇu me kṣattaḥ susahāyāḥ sutā mama | adya vai sthirasāmrājyamācandrārkaṃ mamābhavat

मेरे पुत्र कटे पंखों वाले पक्षियों की तरह असहाय थे। क्षत्ता, मुझसे सच सुनो—अब मेरे पुत्रों को अच्छे सहायक मिल गए हैं, और आज मेरा साम्राज्य चन्द्रमा और सूर्य के रहने तक के लिए स्थिर हो गया है।

श्लोक 32 (1.219.32)

को हि द्रुपदमासाद्य मित्रं क्षत्तः सबान्धवम् । न बुभूषेद्भवेनार्थी गतश्रीरपि पार्थिवः ॥

ko hi drupadamāsādya mitraṃ kṣattaḥ sabāndhavam | na bubhūṣedbhavenārthī gataśrīrapi pārthivaḥ

क्षत्ता, ऐसा कौन राजा है—भले ही उसकी लक्ष्मी नष्ट हो चुकी हो—जो ऐश्वर्य चाहते हुए, बन्धु-बान्धवों सहित द्रुपद को मित्र के रूप में पाकर फिर से उन्नति न चाहे?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 33 (1.219.33)

तं तथा भाषमाणं तु विदुरः प्रत्यभाषत । नित्यं भवतु ते बुद्धिरेषा राजञ्छतं समाः । इत्युक्त्वा प्रययौ राजन्विदुरः स्वं निवेशनम् ॥

taṃ tathā bhāṣamāṇaṃ tu viduraḥ pratyabhāṣata | nityaṃ bhavatu te buddhireṣā rājañchataṃ samāḥ | ityuktvā prayayau rājanviduraḥ svaṃ niveśanam

जब वे इस प्रकार बोल रहे थे, तब विदुर ने उत्तर दिया—"हे राजन्, आपकी यह बुद्धि सौ वर्षों तक सदा ऐसी ही बनी रहे।" हे राजन्, यह कहकर विदुर अपने भवन को चले गए।

श्लोक 34 (1.219.34)

ततो दुर्योधनश्चापि राधेयश्च विशांपते । धृतराष्ट्रमुपागम्य वचोऽब्रूतामिदं तदा ॥

tato duryodhanaścāpi rādheyaśca viśāṃpate | dhṛtarāṣṭramupāgamya vaco'brūtāmidaṃ tadā

हे प्रजानाथ, तब दुर्योधन और राधेय (कर्ण) धृतराष्ट्र के पास आकर उनसे यह बोले—

दुर्योधनकर्णावूचतुः

श्लोक 35 (1.219.35)

सन्निधौ विदुरस्य त्वां दोषं वक्तुं न शक्नुवः । विविक्तमिति वक्ष्यावः किं तवेदं चिकीर्षितम् ॥

sannidhau vidurasya tvāṃ doṣaṃ vaktuṃ na śaknuvaḥ | viviktamiti vakṣyāvaḥ kiṃ tavedaṃ cikīrṣitam

विदुर की उपस्थिति में हम आपसे आपका दोष नहीं कह सकते थे। अब एकान्त है, इसलिए कहेंगे—आप यह क्या करना चाहते हैं?

श्लोक 36 (1.219.36)

सपत्नवृद्धिं यत्तात मन्यसे वृद्धिमात्मनः । अभिष्टौषि च यत्क्षत्तुः समीपे द्विपदांवर ॥

sapatnavṛddhiṃ yattāta manyase vṛddhimātmanaḥ | abhiṣṭauṣi ca yatkṣattuḥ samīpe dvipadāṃvara

हे तात, आप शत्रुओं की वृद्धि को अपनी वृद्धि मानते हैं, और हे मनुष्यों में श्रेष्ठ, क्षत्ता के सामने उनकी प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 37 (1.219.37)

अन्यस्मिन्नृप कर्तव्ये त्वमन्यत्कुरुषेऽनघ । तेषां बलविघातो हि कर्तव्यस्तात नित्यशः ॥

anyasminnṛpa kartavye tvamanyatkuruṣe'nagha | teṣāṃ balavighāto hi kartavyastāta nityaśaḥ

हे निष्पाप राजन्, करना कुछ और चाहिए और आप कुछ और कर रहे हैं। हे तात, उनके बल को तो निरन्तर तोड़ते रहना चाहिए।

श्लोक 38 (1.219.38)

ते वयं प्राप्तकालस्य चिकीर्षां मन्त्रयामहे । यथा नो न ग्रसेयुस्ते सपुत्रबलबान्धवान् ॥

te vayaṃ prāptakālasya cikīrṣāṃ mantrayāmahe | yathā no na graseyuste saputrabalabāndhavān

इसलिए हम इस पर विचार कर रहे हैं कि इस समय क्या करना उचित है, जिससे वे हमें पुत्रों, सेना और बन्धुओं सहित निगल न जाएँ।

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