आदि पर्व · अध्याय 220
पाण्डवों के विरुद्ध दुर्योधन की युक्तियाँ
धृतराष्ट्र दुर्योधन और कर्ण से स्वीकार करते हैं कि वे भी वही चाहते हैं जो वे दोनों चाहते हैं, और पाण्डवों की प्रशंसा केवल विदुर से अपना मन छिपाने के लिए करते हैं; फिर वे उनसे परामर्श माँगते हैं। दुर्योधन एक के बाद एक युक्तियाँ गिनाता है—गुप्तचरों से भाइयों में फूट डालना, द्रुपद और उनके दरबार को धन का लालच देना, द्रौपदी को उनके विरुद्ध करना या उन्हें दूसरी स्त्रियों से लुभाना, भीम को छिपकर मरवाना, या उन्हें हस्तिनापुर बुलाकर मार डालना। वह पिता से आग्रह करता है कि पाण्डवों का द्रुपद पर भरोसा जमने से पहले ही कुछ किया जाए, और कर्ण से उसका मत पूछता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.220.1)
दुर्योधनेनैवमुक्तः कर्णेन च विशांपते । पुत्रं च सूतपुत्रं च धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥
duryodhanenaivamuktaḥ karṇena ca viśāṃpate | putraṃ ca sūtaputraṃ ca dhṛtarāṣṭro'bravīdidam
हे प्रजानाथ, दुर्योधन और कर्ण के ऐसा कहने पर धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र और सूतपुत्र से यह कहा—
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 2 (1.220.2)
अहमप्येवमेवैतच्चिकीर्षामि यथा युवाम् । विवेक्तुं नाहमिच्छामि त्वाकारं विदुरं प्रति ॥
ahamapyevamevaitaccikīrṣāmi yathā yuvām | vivektuṃ nāhamicchāmi tvākāraṃ viduraṃ prati
मैं भी ठीक वही करना चाहता हूँ जो तुम दोनों चाहते हो; परन्तु मैं विदुर के सामने अपना वास्तविक भाव प्रकट नहीं होने देना चाहता।
श्लोक 3 (1.220.3)
ततस्तेषां गुणानेव कीर्तयामि विशेषतः । नावबुध्येत विदुरो ममाभिप्रायमिङ्गितैः ॥
tatasteṣāṃ guṇāneva kīrtayāmi viśeṣataḥ | nāvabudhyeta viduro mamābhiprāyamiṅgitaiḥ
इसीलिए मैं विशेष रूप से उनके गुणों का ही बखान करता हूँ, ताकि विदुर मेरे संकेतों से मेरा अभिप्राय न भाँप सकें।
श्लोक 4 (1.220.4)
यच्च त्वं मन्यसे प्राप्तं तद्ब्रवीहि सुयोधन । राधेय मन्यसे यच्च प्राप्तकालं वदाशु मे ॥
yacca tvaṃ manyase prāptaṃ tadbravīhi suyodhana | rādheya manyase yacca prāptakālaṃ vadāśu me
सुयोधन, तुम जो उचित समझते हो वह बताओ; और राधेय, तुम जो इस समय के अनुकूल समझते हो, वह मुझसे शीघ्र कहो।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 5 (1.220.5)
अद्य तान्कुशलैर्विप्रैः सुगुप्तैराप्तकारिभिः । कुन्तीपुत्रान्भेदयामो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥
adya tānkuśalairvipraiḥ suguptairāptakāribhiḥ | kuntīputrānbhedayāmo mādrīputrau ca pāṇḍavau
आज ही हम कुशल, पूरी तरह गुप्त रहकर काम करने वाले विश्वस्त ब्राह्मणों के द्वारा कुन्ती के पुत्रों और माद्री के दोनों पुत्रों में फूट डलवाएँ।
श्लोक 6 (1.220.6)
अथवा द्रुपदो राजा महद्भिर्वित्तसंचयैः । पुत्राश्चास्य प्रलोभ्यन्ताममात्याश्चैव सर्वशः ॥
athavā drupado rājā mahadbhirvittasaṃcayaiḥ | putrāścāsya pralobhyantāmamātyāścaiva sarvaśaḥ
अथवा राजा द्रुपद, उनके पुत्रों और सभी मन्त्रियों को धन के बड़े-बड़े ढेरों का लालच दिया जाए,
श्लोक 7 (1.220.7)
परित्यजेद्यथा राजा कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । अथ तत्रैव वा तेषां निवासं रोचयन्तु ते ॥
parityajedyathā rājā kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | atha tatraiva vā teṣāṃ nivāsaṃ rocayantu te
जिससे राजा द्रुपद कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर का साथ छोड़ दें। अथवा वे लोग पाण्डवों के मन में वहीं रहने की रुचि जगाएँ,
श्लोक 8 (1.220.8)
इहैषां दोषवद्वासं वर्णयन्तु पृथक्पृथक् । ते भिद्यमानास्तत्रैव मनः कुर्वन्तु पाण्डवाः ॥
ihaiṣāṃ doṣavadvāsaṃ varṇayantu pṛthakpṛthak | te bhidyamānāstatraiva manaḥ kurvantu pāṇḍavāḥ
और उनमें से प्रत्येक के सामने अलग-अलग यहाँ के निवास को दोषपूर्ण बताएँ, ताकि पाण्डव फूट में पड़कर वहीं रहने का मन बना लें।
श्लोक 9 (1.220.9)
अथवा कुशलाः केचिदुपायनिपुणा नराः । इतरेतरतः पार्थान्भेदयन्त्वनुरागतः ॥
athavā kuśalāḥ kecidupāyanipuṇā narāḥ | itaretarataḥ pārthānbhedayantvanurāgataḥ
अथवा उपाय करने में निपुण कुछ चतुर लोग प्रेम को आधार बनाकर पार्थों को एक-दूसरे से अलग कर दें।
श्लोक 10 (1.220.10)
व्युत्थापयन्तु वा कृष्णां बहुत्वात्सुकरं हि तत् । अथवा पाण्डवांस्तस्यां भेदयन्तु ततश्च ताम् ॥
vyutthāpayantu vā kṛṣṇāṃ bahutvātsukaraṃ hi tat | athavā pāṇḍavāṃstasyāṃ bhedayantu tataśca tām
अथवा वे कृष्णा को उनके विरुद्ध कर दें—पति अनेक होने के कारण यह सरल है; या पाण्डवों को उससे विमुख करें और फिर उसे भी उनसे।
श्लोक 11 (1.220.11)
भीमसेनस्य वा राजन्नुपायकुशलैर्नरैः । मृत्युर्विधीयतां छन्नैः स हि तेषां बलाधिकः ॥
bhīmasenasya vā rājannupāyakuśalairnaraiḥ | mṛtyurvidhīyatāṃ channaiḥ sa hi teṣāṃ balādhikaḥ
अथवा हे राजन्, उपाय-कुशल लोग छिपकर भीमसेन की मृत्यु का प्रबन्ध करें, क्योंकि वही उनमें सबसे अधिक बलवान है।
श्लोक 12 (1.220.12)
तमाश्रित्य हि कौन्तेयः पुरा चास्मान्न मन्यते । स हि तीक्ष्णश्च शूरश्च तेषां चैव परायणम् ॥
tamāśritya hi kaunteyaḥ purā cāsmānna manyate | sa hi tīkṣṇaśca śūraśca teṣāṃ caiva parāyaṇam
उसी के भरोसे कुन्तीपुत्र पहले से हमें कुछ नहीं समझता। वह उग्र स्वभाव का और शूरवीर है, और उन सबका सहारा है।
श्लोक 13 (1.220.13)
तस्मिंस्त्वभिहते राजन्हतोत्साहा हतौजसः । यतिष्यन्ते न राज्याय स हि तेषां व्यपाश्रयः ॥
tasmiṃstvabhihate rājanhatotsāhā hataujasaḥ | yatiṣyante na rājyāya sa hi teṣāṃ vyapāśrayaḥ
हे राजन्, उसके मारे जाने पर उनका उत्साह और तेज नष्ट हो जाएगा और वे राज्य के लिए प्रयत्न नहीं करेंगे, क्योंकि वही उनका आश्रय है।
श्लोक 14 (1.220.14)
अजेयो ह्यर्जुनः सङ्ख्ये पृष्ठगोपे वृकोदरे । तमृते फाल्गुनो युद्धे राधेयस्य न पादभाक् ॥
ajeyo hyarjunaḥ saṅkhye pṛṣṭhagope vṛkodare | tamṛte phālguno yuddhe rādheyasya na pādabhāk
जब तक वृकोदर पीठ की रक्षा करता है, तभी तक अर्जुन युद्ध में अजेय है; उसके बिना फाल्गुन युद्ध में राधेय के चौथाई के बराबर भी नहीं।
श्लोक 15 (1.220.15)
ते जानानास्तु दौर्बल्यं भीमसेनमृते महत् । अस्मान्बलवतो ज्ञात्वा न यतिष्यन्ति दुर्बलाः ॥
te jānānāstu daurbalyaṃ bhīmasenamṛte mahat | asmānbalavato jñātvā na yatiṣyanti durbalāḥ
भीमसेन के बिना अपनी भारी दुर्बलता को जानकर, और हमें बलवान समझकर, वे दुर्बल होने के कारण कोई प्रयत्न नहीं करेंगे।
श्लोक 16 (1.220.16)
इहागतेषु वा तेषु निदेशवशवर्तिषु । प्रवर्तिष्यामहे राजन्यथाशास्त्रं निबर्हणम् ॥
ihāgateṣu vā teṣu nideśavaśavartiṣu | pravartiṣyāmahe rājanyathāśāstraṃ nibarhaṇam
अथवा हे राजन्, जब वे यहाँ आकर हमारी आज्ञा के अधीन हो जाएँगे, तब हम शास्त्र के अनुसार उनके विनाश में लग जाएँगे।
श्लोक 17 (1.220.17)
दर्पं वा वदतां तेषां केचिदत्र मनस्विनः । द्रुपदस्यात्मजा राजन्प्रभिद्यन्ते ततः परैः ॥
darpaṃ vā vadatāṃ teṣāṃ kecidatra manasvinaḥ | drupadasyātmajā rājanprabhidyante tataḥ paraiḥ
अथवा हे राजन्, जब वे घमण्ड भरी बातें करेंगे, तब वहाँ द्रुपद के कुछ स्वाभिमानी पुत्रों को दूसरे लोग उनसे अलग कर सकते हैं।
श्लोक 18 (1.220.18)
अथवा दर्शनीयाभिः प्रमदाभिर्विलोभ्यताम् । एकैकस्तत्र कौन्तेयस्ततः कृष्णा विरज्यताम् ॥
athavā darśanīyābhiḥ pramadābhirvilobhyatām | ekaikastatra kaunteyastataḥ kṛṣṇā virajyatām
अथवा सुन्दर स्त्रियों के द्वारा प्रत्येक कुन्तीपुत्र को लुभाया जाए, जिससे कृष्णा उनसे विरक्त हो जाए।
श्लोक 19 (1.220.19)
प्रेष्यतां चैव राधेयस्तेषामागमनाय वै । तैस्तैः प्रकारैः सन्नीय पात्यन्तामाप्तकारिभिः ॥
preṣyatāṃ caiva rādheyasteṣāmāgamanāya vai | taistaiḥ prakāraiḥ sannīya pātyantāmāptakāribhiḥ
और राधेय को उन्हें यहाँ लाने के लिए भेजा जाए; तरह-तरह के उपायों से उन्हें यहाँ लाकर विश्वस्त लोगों के द्वारा मरवा दिया जाए।
श्लोक 20 (1.220.20)
एतेषामप्युपायानां यस्ते निर्दोषवान्मतः । तस्य प्रयोगमातिष्ठ पुरा कालोऽतिवर्तते ॥
eteṣāmapyupāyānāṃ yaste nirdoṣavānmataḥ | tasya prayogamātiṣṭha purā kālo'tivartate
इन उपायों में से जो आपको निर्दोष लगे, उसी का प्रयोग कीजिए, इससे पहले कि समय निकल जाए।
श्लोक 21 (1.220.21)
यावद्ध्यकृतविश्वासा द्रुपदे पार्थिवर्षभे । तावदेव हि ते शक्या न शक्यास्तु ततः परम् ॥
yāvaddhyakṛtaviśvāsā drupade pārthivarṣabhe | tāvadeva hi te śakyā na śakyāstu tataḥ param
जब तक उन्हें राजाओं में श्रेष्ठ द्रुपद पर पूरा भरोसा नहीं हुआ है, तभी तक वे वश में किए जा सकते हैं; उसके बाद नहीं।
श्लोक 22 (1.220.22)
एषा मम मतिस्तात निग्रहाय प्रवर्तते । साध्वी वा यदि वाऽसाध्वी किं वा राधेय मन्यसे ॥
eṣā mama matistāta nigrahāya pravartate | sādhvī vā yadi vā'sādhvī kiṃ vā rādheya manyase
हे तात, उन्हें दबाने के लिए मेरा यही विचार है—चाहे वह अच्छा हो या बुरा। राधेय, तुम क्या सोचते हो?