Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 222

भीष्म का आधा राज्य देने का परामर्श

भीष्म धृतराष्ट्र और दुर्योधन से कहते हैं कि वे पाण्डु के पुत्रों से कोई विग्रह नहीं चाहते, क्योंकि वे उन्हें धृतराष्ट्र के पुत्रों जितने ही प्रिय हैं, और यह राज्य जितना दुर्योधन का है उतना ही उनके पिता और पूर्वजों का भी है। वे आग्रह करते हैं कि प्रेमपूर्वक आधा राज्य उन्हें दे दिया जाए, नहीं तो दुर्योधन को स्थायी अपयश मिलेगा, क्योंकि लाक्षागृह के दाह के लिए संसार पुरोचन से अधिक उसी को दोषी मानता है। उनका जीवित रहना उस पाप को धो डालने का अवसर है; उनके जीवित रहते स्वयं इन्द्र भी उनका भाग नहीं छीन सकते।

अध्याय 221अध्याय-सूचीअध्याय 223

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (1.222.1)

न रोचते विग्रहो मे पाण्डुपुत्रैः कथंचन । यथैव धृतराष्ट्रो मे तथा पाण्डुरसंशयम् ॥

na rocate vigraho me pāṇḍuputraiḥ kathaṃcana | yathaiva dhṛtarāṣṭro me tathā pāṇḍurasaṃśayam

पाण्डु के पुत्रों से विग्रह मुझे किसी भी प्रकार अच्छा नहीं लगता। जैसे धृतराष्ट्र मेरे लिए हैं, वैसे ही निःसन्देह पाण्डु भी हैं।

श्लोक 2 (1.222.2)

गान्धार्याश्च यथा पुत्रास्तथा कुन्तीसुता मम । यथा च मम ते रक्ष्या धृतराष्ट्र तथा तव ॥

gāndhāryāśca yathā putrāstathā kuntīsutā mama | yathā ca mama te rakṣyā dhṛtarāṣṭra tathā tava

जैसे गान्धारी के पुत्र मेरे हैं, वैसे ही कुन्ती के पुत्र भी। धृतराष्ट्र, जैसे उनकी रक्षा मुझे करनी है, वैसे ही तुम्हें भी।

श्लोक 3 (1.222.3)

यथा च मम राज्ञश्च तथा दुर्योधनस्य ते । तथा कुरूणां सर्वेषामन्येषामपि पार्थिव ॥

yathā ca mama rājñaśca tathā duryodhanasya te | tathā kurūṇāṃ sarveṣāmanyeṣāmapi pārthiva

और जैसे वे मेरे तथा राजा के हैं, वैसे ही दुर्योधन के भी; हे राजन्, उसी प्रकार वे सब कुरुओं के और अन्य लोगों के भी अपने हैं।

श्लोक 4 (1.222.4)

एवं गते विग्रहं तैर्न रोचे । सन्धाय वीरैर्दीयतामर्धभूमिः । तेषामपीदं प्रपितामहानां । राज्यं पितुश्चैव कुरूत्तमानाम् ॥

evaṃ gate vigrahaṃ tairna roce | sandhāya vīrairdīyatāmardhabhūmiḥ | teṣāmapīdaṃ prapitāmahānāṃ | rājyaṃ pituścaiva kurūttamānām

ऐसी स्थिति में मुझे उनसे विग्रह स्वीकार नहीं। उन वीरों से सन्धि करके उन्हें आधी भूमि दे दी जाए। यह राज्य उनके भी प्रपितामहों और पिता का है, जो कुरुओं में श्रेष्ठ थे।

श्लोक 5 (1.222.5)

दुर्योधन यथा राज्यं त्वमिदं तात पश्यसि । मम पैतृकमित्येवं तेऽपि पश्यन्ति पाण्डवाः ॥

duryodhana yathā rājyaṃ tvamidaṃ tāta paśyasi | mama paitṛkamityevaṃ te'pi paśyanti pāṇḍavāḥ

बेटा दुर्योधन, जैसे तुम इस राज्य को अपना पैतृक राज्य मानते हो, वैसे ही पाण्डव भी इसे अपना पैतृक मानते हैं।

श्लोक 6 (1.222.6)

यदि राज्यं न ते प्राप्ताः पाण्डवेया यशस्विनः । कुत एव तवापीदं भारतस्यापि कस्यचित् ॥

yadi rājyaṃ na te prāptāḥ pāṇḍaveyā yaśasvinaḥ | kuta eva tavāpīdaṃ bhāratasyāpi kasyacit

यदि यशस्वी पाण्डवों का राज्य पर अधिकार नहीं, तो यह तुम्हारा या किसी भी भरतवंशी का कैसे हो सकता है?

श्लोक 7 (1.222.7)

अधर्मेण च राज्यं त्वं प्राप्तवान्भरतर्षभ । तेऽपि राज्यमनुप्राप्ताः पूर्वमेवेति मे मतिः ॥

adharmeṇa ca rājyaṃ tvaṃ prāptavānbharatarṣabha | te'pi rājyamanuprāptāḥ pūrvameveti me matiḥ

हे भरतश्रेष्ठ, तुमने राज्य अधर्म से पाया है; और मेरे मत में वे तो तुमसे पहले ही राज्य के अधिकारी हो चुके थे।

श्लोक 8 (1.222.8)

मधुरेणैव राज्यस्य तेषामर्धं प्रदीयताम् । एतद्धि पुरुषव्याघ्र हितं सर्वजनस्य च ॥

madhureṇaiva rājyasya teṣāmardhaṃ pradīyatām | etaddhi puruṣavyāghra hitaṃ sarvajanasya ca

हे पुरुषसिंह, प्रेमपूर्वक राज्य का आधा भाग उन्हें दे दिया जाए; इसी में सब लोगों का हित है।

श्लोक 9 (1.222.9)

अतोऽन्यथा चेत्क्रियते न हितं नो भविष्यति । तवाप्यकीर्तिः सकला भविष्यति न संशयः ॥

ato'nyathā cetkriyate na hitaṃ no bhaviṣyati | tavāpyakīrtiḥ sakalā bhaviṣyati na saṃśayaḥ

यदि इसके विपरीत किया गया तो हमारा भला नहीं होगा, और तुम्हें पूरा-पूरा अपयश मिलेगा—इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 10 (1.222.10)

कीर्तिरक्षणमातिष्ठ कीर्तिर्हि परमं बलम् । नष्टकीर्तेर्मनुष्यस्य जीवितं ह्यफलं स्मृतम् ॥

kīrtirakṣaṇamātiṣṭha kīrtirhi paramaṃ balam | naṣṭakīrtermanuṣyasya jīvitaṃ hyaphalaṃ smṛtam

अपनी कीर्ति की रक्षा में लगो, क्योंकि कीर्ति ही सबसे बड़ा बल है। जिस मनुष्य की कीर्ति नष्ट हो गई, उसका जीवन निष्फल माना गया है।

श्लोक 11 (1.222.11)

यावत्कीर्तिर्मनुष्यस्य न प्रणश्यति कौरव । तावज्जीवति गान्धारे नष्टकीर्तिस्तु नश्यति ॥

yāvatkīrtirmanuṣyasya na praṇaśyati kaurava | tāvajjīvati gāndhāre naṣṭakīrtistu naśyati

हे कौरव, जब तक मनुष्य की कीर्ति नष्ट नहीं होती, तब तक वह जीवित रहता है; हे गान्धारीनन्दन, जिसकी कीर्ति नष्ट हो गई, वह स्वयं नष्ट हो जाता है।

श्लोक 12 (1.222.12)

तमिमं समुपातिष्ठ धर्मं कुरुकुलोचितम् । अनुरूपं महाबाहो पूर्वेषामात्मनः कुरु ॥

tamimaṃ samupātiṣṭha dharmaṃ kurukulocitam | anurūpaṃ mahābāho pūrveṣāmātmanaḥ kuru

कुरुकुल के योग्य इस धर्म का पालन करो। हे महाबाहु, अपने पूर्वजों के अनुरूप आचरण करो।

श्लोक 13 (1.222.13)

दिष्ट्या ध्रियन्ते पार्था हि दिष्ट्या जीवति सा पृथा । दिष्ट्या पुरोचनः पापो न सकामोऽत्ययं गतः ॥

diṣṭyā dhriyante pārthā hi diṣṭyā jīvati sā pṛthā | diṣṭyā purocanaḥ pāpo na sakāmo'tyayaṃ gataḥ

सौभाग्य से पार्थ जीवित हैं, सौभाग्य से पृथा जीवित है, और सौभाग्य से पापी पुरोचन अपनी इच्छा पूरी किए बिना ही नष्ट हो गया।

श्लोक 14 (1.222.14)

यदाप्रभृति दग्धास्ते कुन्तिभोजसुतासुताः । तदाप्रभृति गान्धारे न शक्नोम्यभिवीक्षितुम् ॥

yadāprabhṛti dagdhāste kuntibhojasutāsutāḥ | tadāprabhṛti gāndhāre na śaknomyabhivīkṣitum

हे गान्धारीनन्दन, जब से कुन्तिभोज की पुत्री के पुत्र जले, तब से मैं किसी से आँख नहीं मिला पाता।

श्लोक 15 (1.222.15)

लोके प्राणभृतां किंचिच्छ्रुत्वा कुन्तीं तथागताम् । न चापि दोषेण तथा लोको मन्येत्पुरोचनम् । यथा त्वां पुरुषव्याघ्र लोको दोषेण गच्छति ॥

loke prāṇabhṛtāṃ kiṃcicchrutvā kuntīṃ tathāgatām | na cāpi doṣeṇa tathā loko manyetpurocanam | yathā tvāṃ puruṣavyāghra loko doṣeṇa gacchati

संसार के प्राणियों में जिसने भी सुना कि कुन्ती की ऐसी गति हुई, वह पुरोचन को उतना दोषी नहीं मानता; हे पुरुषसिंह, जितना लोग तुम्हें दोषी मानते हैं।

श्लोक 16 (1.222.16)

तदिदं जीवितं तेषां तव किल्बिषनाशनम् । संमन्तव्यं महाराज पाण्डवानां च दर्शनम् ॥

tadidaṃ jīvitaṃ teṣāṃ tava kilbiṣanāśanam | saṃmantavyaṃ mahārāja pāṇḍavānāṃ ca darśanam

इसलिए हे महाराज, उनका जीवित रहना और पाण्डवों का दर्शन तुम्हें अपने पाप को मिटाने वाला मानकर स्वीकार करना चाहिए।

श्लोक 17 (1.222.17)

न चापि तेषां वीराणां जीवतां कुरुनन्दन । पित्र्योऽंशः शक्य आदातुमपि वज्रभृता स्वयं ॥

na cāpi teṣāṃ vīrāṇāṃ jīvatāṃ kurunandana | pitryo'ṃśaḥ śakya ādātumapi vajrabhṛtā svayaṃ

हे कुरुनन्दन, जब तक वे वीर जीवित हैं, तब तक स्वयं वज्रधारी इन्द्र भी उनके पिता का अंश नहीं छीन सकते।

श्लोक 18 (1.222.18)

ते सर्वेऽवस्थिता धर्मे सर्वे चैवैकचेतसः । अधर्मेण निरस्ताश्च तुल्ये राज्ये विशेषतः ॥

te sarve'vasthitā dharme sarve caivaikacetasaḥ | adharmeṇa nirastāśca tulye rājye viśeṣataḥ

वे सब धर्म में स्थित हैं और सब एक मन वाले हैं; और उन्हें अधर्मपूर्वक निकाला गया, वह भी उस राज्य से जिस पर उनका समान अधिकार है।

श्लोक 19 (1.222.19)

यदि धर्मस्त्वया कार्यो यदि कार्यं प्रियं च मे । क्षेमं च यदि कर्तव्यं तेषामर्धं प्रदीयताम् ॥

yadi dharmastvayā kāryo yadi kāryaṃ priyaṃ ca me | kṣemaṃ ca yadi kartavyaṃ teṣāmardhaṃ pradīyatām

यदि तुम्हें धर्म करना है, यदि मेरा प्रिय करना है और यदि सबका कल्याण करना है, तो उन्हें आधा राज्य दे दिया जाए।

अध्याय 221अध्याय-सूचीअध्याय 223