आदि पर्व · अध्याय 226
पाण्डवों का हस्तिनापुर लौटना
द्रुपद निर्णय युधिष्ठिर, बलराम और कृष्ण पर छोड़ते हैं; युधिष्ठिर द्रुपद की इच्छा को मानते हैं, और कृष्ण यात्रा का समर्थन करते हैं। विदुर कुन्ती से मिलते हैं, जो आँसू बहाते हुए पुत्रों के बच जाने के लिए उनका आभार मानती हैं, और विदुर उन्हें सान्त्वना देते हैं। द्रुपद हाथी, रथ, घोड़े, दास-दासियाँ और धन जैसे विवाह के भरपूर उपहार देकर पाण्डवों को विदा करते हैं, और धृतराष्ट्र विकर्ण, चित्रसेन, द्रोण और कृप को उनकी अगवानी के लिए भेजते हैं। हस्तिनापुर उनके स्वागत में सजाया जाता है, नगरवासी उन्हें आशीर्वाद देते हैं, और पाण्डव धृतराष्ट्र और भीष्म को प्रणाम करके अपने लिए निश्चित भवनों में प्रवेश करते हैं।
द्रुपद उवाच
श्लोक 1 (1.226.1)
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथात्थ विदुराद्य माम् । ममापि परमो हर्षः संबन्धेऽस्मिन्कृते प्रभो ॥
evametanmahāprājña yathāttha vidurādya mām | mamāpi paramo harṣaḥ saṃbandhe'sminkṛte prabho
हे महाप्राज्ञ विदुर! आज आप मुझसे जैसा कह रहे हैं, बात वैसी ही है। हे प्रभो! यह सम्बन्ध हो जाने से मुझे भी परम हर्ष है।
श्लोक 2 (1.226.2)
गमनं चापि युक्तं स्याद्दृढमेषां महात्मनाम् । न तु तावन्मया युक्तमेतद्वक्तुं स्वयं गिरा ॥
gamanaṃ cāpi yuktaṃ syāddṛḍhameṣāṃ mahātmanām | na tu tāvanmayā yuktametadvaktuṃ svayaṃ girā
इन महात्माओं का जाना भी अवश्य उचित है; परन्तु यह बात स्वयं अपने मुख से कहना मेरे लिए उचित नहीं।
श्लोक 3 (1.226.3)
यदा तु मन्यते वीरः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भीमसेनार्जुनौ चैव यमौ च पुरुषर्षभौ ॥
yadā tu manyate vīraḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | bhīmasenārjunau caiva yamau ca puruṣarṣabhau
जब कुन्तीपुत्र वीर युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन, तथा दोनों नरश्रेष्ठ जुड़वाँ भाई उचित समझें,
श्लोक 4 (1.226.4)
रामकृष्णौ च धर्मज्ञौ तदा गच्छन्तु पाण्डवाः । एतौ हि पुरुषव्याघ्रावेषां प्रियहिते रतौ ॥
rāmakṛṣṇau ca dharmajñau tadā gacchantu pāṇḍavāḥ | etau hi puruṣavyāghrāveṣāṃ priyahite ratau
और धर्म के ज्ञाता बलराम और कृष्ण भी ऐसा मानें, तब पाण्डव जाएँ; क्योंकि ये दोनों पुरुषसिंह इनके प्रिय और हित में लगे रहते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 5 (1.226.5)
परवन्तो वयं राजंस्त्वयि सर्वे सहानुगाः । यथा वक्ष्यसि नः प्रीत्या तत्करिष्यामहे वयम् ॥
paravanto vayaṃ rājaṃstvayi sarve sahānugāḥ | yathā vakṣyasi naḥ prītyā tatkariṣyāmahe vayam
हे राजन्! हम सब अपने अनुचरों सहित आपके अधीन हैं। आप स्नेहपूर्वक हमसे जो कहेंगे, हम वही करेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (1.226.6)
ततोऽब्रवीद्वासुदेवो गमनं रोचते मम । यथा वा मन्यते राजा द्रुपदः सर्वधर्मवित् ॥
tato'bravīdvāsudevo gamanaṃ rocate mama | yathā vā manyate rājā drupadaḥ sarvadharmavit
तब वासुदेव बोले, "मुझे इनका जाना ठीक लगता है, अथवा जैसा सब धर्मों के ज्ञाता राजा द्रुपद मानें।"
द्रुपद उवाच
श्लोक 7 (1.226.7)
यथैव मन्यते वीरो दाशार्हः पुरुषोत्तमः । प्राप्तकालं महाबाहुः सा बुद्धिर्निश्चिता मम ॥
yathaiva manyate vīro dāśārhaḥ puruṣottamaḥ | prāptakālaṃ mahābāhuḥ sā buddhirniścitā mama
दाशार्हवंशी महाबाहु वीर पुरुषोत्तम जो समयोचित मानें, वही मेरा भी निश्चित विचार है।
श्लोक 8 (1.226.8)
यथैव हि महाभागाः कौन्तेया मम सांप्रतम् । तथैव वासुदेवस्य पाण्डुपुत्रा न संशयः ॥
yathaiva hi mahābhāgāḥ kaunteyā mama sāṃpratam | tathaiva vāsudevasya pāṇḍuputrā na saṃśayaḥ
क्योंकि जैसे ये महाभाग कुन्तीपुत्र अब मेरे हैं, वैसे ही निःसंदेह ये पाण्डुपुत्र वासुदेव के भी हैं।
श्लोक 9 (1.226.9)
न तद्ध्यायति कौन्तेयः पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः । यथैषां पुरुषव्याघ्रः श्रेयो ध्यायति केशवः ॥
na taddhyāyati kaunteyaḥ pāṇḍuputro yudhiṣṭhiraḥ | yathaiṣāṃ puruṣavyāghraḥ śreyo dhyāyati keśavaḥ
पाण्डुनन्दन कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर भी इनके कल्याण का उतना चिन्तन नहीं करते, जितना पुरुषसिंह केशव करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (1.226.10)
पृथायास्तु ततो वेश्म प्रविवेश महामतिः । पादौ स्पृष्ट्वा पृथायास्तु शिरसा च महीं गतः ॥
pṛthāyāstu tato veśma praviveśa mahāmatiḥ | pādau spṛṣṭvā pṛthāyāstu śirasā ca mahīṃ gataḥ
तब महाबुद्धिमान विदुर पृथा के भवन में गए, और पृथा के चरण छूकर सिर झुकाकर भूमि पर प्रणाम किया।
श्लोक 11 (1.226.11)
दृष्ट्वा तु देवरं कुन्ती शुशोच च मुहुर्मुहुः ॥
dṛṣṭvā tu devaraṃ kuntī śuśoca ca muhurmuhuḥ
अपने देवर को देखकर कुन्ती बार-बार शोक करने लगीं।
कुन्त्युवाच
श्लोक 12 (1.226.12)
वैचित्रवीर्य ते पुत्राः कथंचिज्जीवितास्त्वया ॥
vaicitravīrya te putrāḥ kathaṃcijjīvitāstvayā
हे विचित्रवीर्यनन्दन! आपने ही किसी प्रकार अपने इन पुत्रों को जीवित बचाया है।
श्लोक 13 (1.226.13)
त्वत्प्रसादाज्जतुगृहे मृताः प्रत्यागतास्तथा । कूर्मी चिन्तयते पुत्रान्यत्र वा तत्र संमता ॥
tvatprasādājjatugṛhe mṛtāḥ pratyāgatāstathā | kūrmī cintayate putrānyatra vā tatra saṃmatā
आपकी कृपा से ही लाक्षागृह में मरे हुए-से ये लौट आए हैं। मादा कछुआ जहाँ कहीं भी रहे, अपने बच्चों का ध्यान करती रहती है,
श्लोक 14 (1.226.14)
चिन्तया वर्धिताः पुत्रा यथा कुशलिनस्तथा । तव पुत्रास्तु जीवन्ति त्वद्भक्त्या भरतर्षभ ॥
cintayā vardhitāḥ putrā yathā kuśalinastathā | tava putrāstu jīvanti tvadbhaktyā bharatarṣabha
और जैसे उसी ध्यान से उसके बच्चे बढ़ते और सकुशल रहते हैं, वैसे ही हे भरतश्रेष्ठ, आपकी भक्ति से आपके पुत्र जीवित हैं।
श्लोक 15 (1.226.15)
यथा परभृतः पुत्रानरिष्टा वर्धयेत्सदा । तथैव पुत्रास्तु मम त्वया तात सुरक्षिताः ॥
yathā parabhṛtaḥ putrānariṣṭā vardhayetsadā | tathaiva putrāstu mama tvayā tāta surakṣitāḥ
जैसे कौआ कोयल के बच्चों को सदा पालता है, वैसे ही हे तात, मेरे पुत्रों की आपने भली-भाँति रक्षा की है।
श्लोक 16 (1.226.16)
क्लेशास्तु बहवः प्राप्तास्तथा प्राणान्तिका मया । अतः परं न जानामि कर्तव्यं ज्ञातुमर्हसि ॥
kleśāstu bahavaḥ prāptāstathā prāṇāntikā mayā | ataḥ paraṃ na jānāmi kartavyaṃ jñātumarhasi
मैंने बहुत-से कष्ट झेले हैं, और कुछ तो प्राण ले लेने वाले थे। अब आगे क्या करना है, मैं नहीं जानती; उसे आप ही जानिए।
विदुर उवाच
श्लोक 17 (1.226.17)
न विनश्यन्ति लोकेषु तव पुत्रा महाबलाः । अचिरेणैव कालेन स्वराज्यस्था भवन्ति ते ॥
na vinaśyanti lokeṣu tava putrā mahābalāḥ | acireṇaiva kālena svarājyasthā bhavanti te
आपके महाबली पुत्र संसार में नष्ट नहीं होंगे; थोड़े ही समय में वे अपने राज्य पर प्रतिष्ठित होंगे,
श्लोक 18 (1.226.18)
बान्धवैः सहिताः सर्वे न शोकं कुरु माधवि ॥
bāndhavaiḥ sahitāḥ sarve na śokaṃ kuru mādhavi
सब अपने बन्धु-बान्धवों के साथ। हे माधवी! शोक मत कीजिए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (1.226.19)
ततस्ते समनुज्ञाता द्रुपदेन महात्मना ॥
tataste samanujñātā drupadena mahātmanā
तब महात्मा द्रुपद से अनुमति पाकर
श्लोक 20 (1.226.20)
पाण्डवाश्चैव कृष्णश्च विदुरश्च महामतिः । आदाय द्रौपदीं कृष्णां कुन्तीं चैव यशस्विनीम् ॥
pāṇḍavāścaiva kṛṣṇaśca viduraśca mahāmatiḥ | ādāya draupadīṃ kṛṣṇāṃ kuntīṃ caiva yaśasvinīm
पाण्डव, कृष्ण और महाबुद्धिमान विदुर, द्रौपदी कृष्णा और यशस्विनी कुन्ती को साथ लेकर,
श्लोक 21 (1.226.21)
सविहारं सुखं जग्मुर्नगरं नागसाह्वयम् । सुवर्णकक्ष्याग्रैवेयान्सुवर्णाङ्कुशभूषितान् ॥
savihāraṃ sukhaṃ jagmurnagaraṃ nāgasāhvayam | suvarṇakakṣyāgraiveyānsuvarṇāṅkuśabhūṣitān
आमोद-प्रमोद करते हुए सुखपूर्वक हाथी के नाम वाले नगर (हस्तिनापुर) की ओर चल पड़े। सोने के कमरबन्दों और कण्ठहारों से युक्त, सोने के अंकुशों से सजे,
श्लोक 22 (1.226.22)
जाम्बूनदपरिष्कारान्प्रभिन्नकरटामुखान् । अधिष्ठितान्महामात्रैः सर्वशस्त्रसमन्वितान् ॥
jāmbūnadapariṣkārānprabhinnakaraṭāmukhān | adhiṣṭhitānmahāmātraiḥ sarvaśastrasamanvitān
स्वर्ण के साज़ से अलंकृत, मदमत्त (जिनके गण्डस्थल से मद बह रहा था), महावतों से अधिष्ठित और सब प्रकार के शस्त्रों से युक्त,
श्लोक 23 (1.226.23)
सहस्रं प्रददौ राजा गजानां वरवर्मिणाम् । रथानां च सहस्रं वै सुवर्णमणिचित्रितम् ॥
sahasraṃ pradadau rājā gajānāṃ varavarmiṇām | rathānāṃ ca sahasraṃ vai suvarṇamaṇicitritam
ऐसे उत्तम कवचधारी एक हज़ार हाथी राजा ने दिए; और सोने तथा मणियों से जड़े एक हज़ार रथ,
श्लोक 24 (1.226.24)
चतुर्युजां भानुमच्च पञ्चानां प्रददौ तदा । सुवर्णपरिबर्हाणां वरचामरमालिनाम् ॥
caturyujāṃ bhānumacca pañcānāṃ pradadau tadā | suvarṇaparibarhāṇāṃ varacāmaramālinām
जो चार-चार घोड़ों से जुते, चमचमाते, सुनहरे साज़ और उत्तम चँवरों की मालाओं से सजे थे, उन्होंने तब पाँचों (पाण्डवों) को दिए।
श्लोक 25 (1.226.25)
जात्यश्वानां च पञ्चाशत्सहस्रं प्रददौ नृपः । दासीनामयुतं राजा प्रददौ वरभूषणम् । ततः सहस्रं दासानां प्रददौ वरधन्वनाम् ॥
jātyaśvānāṃ ca pañcāśatsahasraṃ pradadau nṛpaḥ | dāsīnāmayutaṃ rājā pradadau varabhūṣaṇam | tataḥ sahasraṃ dāsānāṃ pradadau varadhanvanām
राजा ने पचास हज़ार उत्तम नस्ल के घोड़े दिए; राजा ने सुन्दर आभूषणों से सजी दस हज़ार दासियाँ दीं; और फिर उत्तम धनुर्धर एक हज़ार दास दिए।
श्लोक 26 (1.226.26)
हैमानि शय्यासनभाजनानि । द्रव्याणि चान्यानि च गोधनानि । पृथक्पृथक्चैव ददौ स कोटिं । पाञ्चालराजः परमप्रहृष्टः ॥
haimāni śayyāsanabhājanāni | dravyāṇi cānyāni ca godhanāni | pṛthakpṛthakcaiva dadau sa koṭiṃ | pāñcālarājaḥ paramaprahṛṣṭaḥ
सोने के पलंग, आसन और पात्र, अन्य वस्तुएँ और गौओं के झुण्ड, इनमें से प्रत्येक एक-एक करोड़, पाञ्चालराज ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अलग-अलग दिए।
श्लोक 27 (1.226.27)
शिबिकानां शतं पूर्णं वाहान्पञ्चशतं नरान् ॥
śibikānāṃ śataṃ pūrṇaṃ vāhānpañcaśataṃ narān
पूरी सौ पालकियाँ, और उन्हें ढोने वाले पाँच सौ पुरुष।
श्लोक 28 (1.226.28)
एवमेतानि पाञ्चालो जन्यार्थे प्रददौ धनम् । हरणं चापि पाञ्चाल्या ज्ञातिदेयं च सोमकः ॥
evametāni pāñcālo janyārthe pradadau dhanam | haraṇaṃ cāpi pāñcālyā jñātideyaṃ ca somakaḥ
इस प्रकार पाञ्चालराज ने बारात के निमित्त यह धन दिया; और सोमकवंशी द्रुपद ने पाञ्चाली की विदाई की भेंट तथा सम्बन्धियों की ओर से दी जाने वाली भेंटें भी दीं।
श्लोक 29 (1.226.29)
धृष्टद्युम्नो ययौ तत्र भगिनीं गृह्य भारत । नानद्यमानो बहुशस्तूर्यघोषैः सहस्रशः ॥
dhṛṣṭadyumno yayau tatra bhaginīṃ gṛhya bhārata | nānadyamāno bahuśastūryaghoṣaiḥ sahasraśaḥ
हे भारत! धृष्टद्युम्न भी अपनी बहन को लेकर साथ गए, और हज़ारों तुरहियों का घोष बार-बार गूँजता रहा।
श्लोक 30 (1.226.30)
श्रुत्वा चोपस्थितान्वीरान्धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । प्रतिग्रहाय पाण्डूनां प्रेषयामास कौरवान् ॥
śrutvā copasthitānvīrāndhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | pratigrahāya pāṇḍūnāṃ preṣayāmāsa kauravān
वीरों के आ पहुँचने का समाचार सुनकर अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र ने पाण्डवों की अगवानी के लिए कौरवों को भेजा:
श्लोक 31 (1.226.31)
विकर्णं च महेष्वासं चित्रसेनं च भारत । द्रोणं च परमेष्वासं गौतमं कृपमेव च ॥
vikarṇaṃ ca maheṣvāsaṃ citrasenaṃ ca bhārata | droṇaṃ ca parameṣvāsaṃ gautamaṃ kṛpameva ca
हे भारत! महान धनुर्धर विकर्ण और चित्रसेन को, परम धनुर्धर द्रोण को, और गौतमवंशी कृप को।
श्लोक 32 (1.226.32)
तैस्तैः परिवृताः शूरैः शोभमाना महारथाः । नगरं हास्तिनपुरं शनैः प्रविविशुस्तदा ॥
taistaiḥ parivṛtāḥ śūraiḥ śobhamānā mahārathāḥ | nagaraṃ hāstinapuraṃ śanaiḥ praviviśustadā
इन वीरों से घिरे हुए, शोभा से दमकते वे महारथी धीरे-धीरे हस्तिनापुर नगर में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 33 (1.226.33)
पाण्डवानागताञ्छ्रुत्वा नागरास्तु कुतूहलात् । मण्डयाञ्चक्रिरे तत्र नगरं नागसाह्वयम् ॥
pāṇḍavānāgatāñchrutvā nāgarāstu kutūhalāt | maṇḍayāñcakrire tatra nagaraṃ nāgasāhvayam
पाण्डवों के आगमन का समाचार सुनकर नगरवासियों ने उत्सुकता से हस्तिनापुर नगर को सजाया।
श्लोक 34 (1.226.34)
मुक्तपुष्पावकीर्णं तु जलसिक्तं तु सर्वतः । धूपितं दिव्यधूपेन मङ्गलैश्चाभिसंवृतम् ॥
muktapuṣpāvakīrṇaṃ tu jalasiktaṃ tu sarvataḥ | dhūpitaṃ divyadhūpena maṅgalaiścābhisaṃvṛtam
वह चारों ओर बिखरे फूलों से ढका और जल से सींचा हुआ था, दिव्य धूप से सुगन्धित और मंगल-द्रव्यों से भरा हुआ था;
श्लोक 35 (1.226.35)
पताकोच्छ्रितमाल्यं च पुरमप्रतिमं बभौ । शङ्खभेरीनिनादैश्च नानावादित्रनिस्वनैः ॥
patākocchritamālyaṃ ca puramapratimaṃ babhau | śaṅkhabherīninādaiśca nānāvāditranisvanaiḥ
ऊँची पताकाओं और मालाओं से सजा वह नगर अनुपम शोभा पा रहा था, और शंख, भेरी तथा अनेक बाजों की ध्वनि से गूँज रहा था।
श्लोक 36 (1.226.36)
कौतूहलेन नगरं पूर्यमाणमिवाभवत् । यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शोकदुःखसमन्विताः ॥
kautūhalena nagaraṃ pūryamāṇamivābhavat | yatra te puruṣavyāghrāḥ śokaduḥkhasamanvitāḥ
उत्सुकता के कारण नगर मानो खचाखच भर गया। (लोग कह रहे थे,) "शोक और दुःख से भरे वे पुरुषसिंह,
श्लोक 37 (1.226.37)
निर्गताश्च पुरात्पूर्वं धृतराष्ट्रप्रबाधिताः । पुनर्निवृत्ता दिष्ट्या वै सह मात्रा परन्तपाः ॥
nirgatāśca purātpūrvaṃ dhṛtarāṣṭraprabādhitāḥ | punarnivṛttā diṣṭyā vai saha mātrā parantapāḥ
जो पहले धृतराष्ट्र से सताए जाकर नगर छोड़ गए थे, वे शत्रुओं को तपाने वाले वीर सौभाग्य से अपनी माता के साथ लौट आए हैं!"
श्लोक 38 (1.226.38)
इत्येवमीरिता वाचो जनैः प्रियचिकीर्षुभिः । तत उच्चावचा वाचः प्रियाः सर्वत्र भारत ॥
ityevamīritā vāco janaiḥ priyacikīrṣubhiḥ | tata uccāvacā vācaḥ priyāḥ sarvatra bhārata
प्रिय करने की इच्छा वाले लोगों ने ऐसी बातें कहीं। फिर, हे भारत, सब ओर तरह-तरह की प्रिय बातें
श्लोक 39 (1.226.39)
उदीरितास्तदाऽशृण्वन्पाण्डवा हृदयंगमाः ॥
udīritāstadā'śṛṇvanpāṇḍavā hṛdayaṃgamāḥ
कही जाने लगीं, और पाण्डवों ने हृदय को छू लेने वाली वे बातें सुनीं।
पौरा ऊचुः
श्लोक 40 (1.226.40)
अयं स पुरुषव्याघ्रः पुनरायाति धर्मवित् ॥
ayaṃ sa puruṣavyāghraḥ punarāyāti dharmavit
"यह वही धर्मज्ञ पुरुषसिंह फिर लौट रहे हैं,
श्लोक 41 (1.226.41)
यो नः स्वानिव दायादान्धर्मेण परिरक्षति । अद्य पाण्डुर्महाराजो वनादिव मनःप्रियम् ॥
yo naḥ svāniva dāyādāndharmeṇa parirakṣati | adya pāṇḍurmahārājo vanādiva manaḥpriyam
जो हमें अपने ही उत्तराधिकारियों के समान धर्मपूर्वक पालते हैं। आज मानो हमारे मन को प्रिय महाराज पाण्डु ही वन से लौट आए हैं,
श्लोक 42 (1.226.42)
आगतश्चैवमस्माकं चिकीर्षन्नात्र संशयः । किं न्वद्य सुकृतं कर्म सर्वेषां नः प्रियं परम् ॥
āgataścaivamasmākaṃ cikīrṣannātra saṃśayaḥ | kiṃ nvadya sukṛtaṃ karma sarveṣāṃ naḥ priyaṃ param
और निःसंदेह हमारा भला करने के लिए आए हैं। आज हमारा कौन-सा पुण्यकर्म फलित हुआ है, जो हम सबके लिए इतना प्रिय है,
श्लोक 43 (1.226.43)
यन्नः कुन्तीसुता वीरा भर्तारः पुनरागताः । यदि दत्तं यदि हुतं यदि वाप्यस्ति नस्तपः । तेन तिष्ठन्तु नगरे पाण्डवाः शरदां शतम् ॥
yannaḥ kuntīsutā vīrā bhartāraḥ punarāgatāḥ | yadi dattaṃ yadi hutaṃ yadi vāpyasti nastapaḥ | tena tiṣṭhantu nagare pāṇḍavāḥ śaradāṃ śatam
कि कुन्ती के वीर पुत्र, हमारे स्वामी, फिर लौट आए हैं? यदि हमने कुछ दान दिया हो, कुछ हवन किया हो, या हमारा कुछ तप हो, तो उसके प्रभाव से पाण्डव सौ वर्षों तक इस नगर में रहें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 44 (1.226.44)
ततस्ते धृतराष्ट्रस्य भीष्मस्य च महात्मनः । अन्येषां च तदर्हाणां चक्रुः पादाभिवन्दनम् ॥
tataste dhṛtarāṣṭrasya bhīṣmasya ca mahātmanaḥ | anyeṣāṃ ca tadarhāṇāṃ cakruḥ pādābhivandanam
तब उन्होंने धृतराष्ट्र, महात्मा भीष्म और अन्य पूजनीय जनों के चरणों में प्रणाम किया।
श्लोक 45 (1.226.45)
पृष्टास्तु कुशलप्रश्नं सर्वेण नगरेण ते । समाविशन्त वेश्मानि धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥
pṛṣṭāstu kuśalapraśnaṃ sarveṇa nagareṇa te | samāviśanta veśmāni dhṛtarāṣṭrasya śāsanāt
सारे नगर ने उनसे कुशल-समाचार पूछा, और फिर वे धृतराष्ट्र की आज्ञा से (अपने लिए निश्चित) भवनों में प्रविष्ट हुए।